Maternity benefits : हाल  ही में देश के एक राज्य में ऐसी योजना की घोषणा की गई है जिस में जनसंख्या नियंत्रण से हट कर जनसंख्या संरक्षण की महत्ता की बात को लक्ष्य बनाया गया है. आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने विश्व जनसंख्या दिवस (11 जुलाई, 2026) के अवसर पर ‘पिल्लाले संपदा’ योजना को लागू किया. यह योजना जनसंख्या संरक्षण के अंतर्गत तीसरे बच्चे के लिए क्व30 हजार और चौथे बच्चे के लिए क्व40 हजार वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है.

इस वित्तीय प्रोत्साहन का उद्दयेश है घटती प्रजनन दर का मुकाबला करना ताकि राज्य में जनसंख्या गिरावट को दूर किया जा सके क्योंकि इस समय राज्य में अधिकांश जनसंख्या वृद्धों की है, जिस से भविष्य में विकास के लिए वर्कफोर्स की भरी कमी होगी.

इस योजना के समर्थन में उदाहरण दिया गया कि जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को लगातार घटती जनसंख्या वृद्धि के कारण गंभीर आर्थिक और वर्कफोर्स संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. इन वैश्विक जनसंख्या रु?ानों से सीख लेते हुए आंध्र प्रदेश वित्तीय प्रोत्साहन देने से बड़े परिवारों को बढ़ावा दिया जा रहा है अर्थात परिवार में 1 या 2 बच्चे नहीं उन से अधिक बच्चों का पैदा होना.

साथ ही इस योजना को एक समाधान की तरह देखा जा रहा है जिस से आने वाले समय में अधिक श्रमिकबल, कार्यबल यानी वर्कफोर्स बढ़ेगी, राज्य में आर्थिक विकास, औद्योगिक वृद्धि, सामाजिक कल्याण कार्यक्रम और भविष्य की उत्पादकता बढ़ेगी.

अधिक जनसंख्या अधिक वर्कफोर्स

इन सभी तर्कों पर विचार करें तो कहा जा सकता है कि हां अधिक जनसंख्या अधिक वर्कफोर्स बनाती है लेकिन क्या यह भी सत्य नहीं कि जनसंख्या का पैदा होना एक निजी मामले या फैसले से जुड़ा है.

जनसंख्या का बढ़ना यानी किसी बच्चे का पैदा एक स्त्री के निजी जीवन की घटना है न कि किसी संघ का कार्यक्त्रम. तो फिर इस तरह की योजना लाने से पहले स्त्रियों की राय, उन का मत, उन का स्वास्थ्य, उन की मानसिकता, उन के विचार क्यों नहीं जाने जाते?

क्या योजना बनाने वाले जानते हैं कि एक स्त्री को कितने बच्चे चाहिए कितने नहीं? क्या योजना वालों को पता है कि अधिक बच्चे रहेंगे कहां? खाएंगे क्या? उन्हें शिक्षा मिलेगी या नहीं?

जब इन सवालों के जवाब उन के पास हैं ही नहीं तो वे अधिक बच्चे पैदा करने का सुझाव और प्रोत्साहन कैसे दे सकते हैं. क्या देश या राज्य नहीं जानता कि हमारे पास सीमित साधन हैं? क्या देश में मौजूदा बच्चों के लिए उपयुक्त मात्रा में भोजन, चिकित्सा, शिक्षा और रोजगार है कि वे और बच्चों को पैदा करने की बात कह रहे हैं?

एक निजी फैसला

सब से बड़ी बात बच्चा पैदा करने के लिए सब से पहले आप स्त्री की राय, उस का स्वाथ्य और उस की इच्छा नहीं जानेंगे? बच्चे पैदा करना एक व्यक्तिगत, एक निजी फैसला है. इस पर यों कोई योजना लाना ठीक नहीं. हां योजना लानी हैं तो इस पर लाएं कि बच्चा 1 हो या 3 राज्य किस तरह स्त्री और प्रजनन में मैडिकल जांच और सहायता देगा? कैसे नवजात को मैडिकल जांच और उपचार मिलेगा, न कि वितीय प्रलोभन देना.

आज भी ऐसे अनगिनत परिवार हैं जो केवल यह धनराशि प्राप्त करने के लिए स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उस से बच्चे पैदा कराएंगे. आज भी देश में ऐसी बहुत महिला जो केवल आर्थिक तंगी के कारण यह धन प्राप्त करने के लिए बच्चे पैदा भी करेगी, तब भी जब उन का खुद का स्वास्थ्य इस लायक न हो. साथ ही यह भी देखे कि एक बार की धनराशि के लिए बच्चा पैदा कर भी लें तो क्या आप पूरी जिंदगी उसे पालने का खर्चा उठा पाएंगे? क्व30 हजार की राशि तो कुछ समय में ही खत्म हो जाएगी तो फिर आगे कहां से लाएंगे?

माना कि वर्कफोर्स कम है, वृद्धों की संख्या बढ़ रही है, वोट कम हो जाएंगे लेकिन यह भी सच है कि स्त्री कोई बच्चा पैदा करने की मशीन नहीं कि इस तरह का वित्तीय प्रलोभन दिया जा रहा है. क्या इस वित्तीय अनुदान से अधिक महत्त्वपूर्ण स्त्री की अपनी इच्छा, उस का अपना शरीर नहीं.

कड़वा सत्य

क्या यह भी सच नहीं कि आज भी कई महिलाओं के पहले से 2 बच्चे होते हुए भी वे मजदूरी कर रही हैं, ईंटें ढो रही हैं. वहीं आज भी किसान परिवारों में भी 2-3 बच्चे होने के बाद भी यह सोच हावी है कि जितने अधिक बच्चे उतना खेतों में अधिक काम होगा.

तो क्या इन वर्गों में ऐसी योजना इन्हें और बच्चे पैदा करने को नहीं उकसाएगी? जबकि कड़वा सत्य यह है कि इस तरह की योजना से एक गर्भवती ईंटें ढोने से बचेगी बल्कि एक और बच्चा आने से उस की ईंटों का भार और बढ़ जाएगा और दूसरी ओर न ही किसान के खेतों की फसलें बढ़ेंगी क्योंकि एक बच्चा और अधिक होने से खेत तो नहीं बढ़ेंगे बल्कि उन खेतों का एक और हिस्सेदार बढ़ेगा.

जिस देश में आज भी सभी बच्चों के लिए पर्याप्त शिक्षा व्यवस्था नहीं, आवश्यक उपचार नहीं, न ही रोजगार है क्या वहां इस तरह की योजना केवल अपर्याप्तता को और बढ़ाने का कारण नहीं बन जाएगी? क्या यह विकास का माध्यम बनने की जगह और बेरोजगार युवा खड़े नहीं कर देगी?

योजना तो वह होनी चाहिए जो बच्चे हैं उन्हें पढ़ालिखा कर काबिल बनाया जाए. जब ये विकास कर पाएंगे तभी तो भावी पीढ़ी के लिए कोई रास्ता बनेगा अन्यथा वह भी इन्हीं की तरह बेरोजगारी की भीड़ में सिर्फ एक बड़ा आंकड़ा बन कर रह जाएगी.

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