Child Care Legislation : जैसेजैसे तलाकों की संख्या बढ़ रही है और लिव इन रिलेशनशिप में चाइल्ड बर्थ हो रहे हैं, चाइल्ड मैंटेनैंस खर्चों और चाइल्ड कस्टडी के सवाल अदालतों में खड़े होने लगे हैं. तलाक से पहले या बाद में बच्चे किस पेरैंट के पास रहेंगे, यह सवाल अब बड़ा होता जा रहा है. मदर्स नेचर की वजह से यह राइट मांगती हैं तो फादर्स लव, सपोर्ट, अपने खून के हिस्से के नाम पर. अदालतें आमतौर पर दुविधा में रहती हैं कि क्या किया जाए?

चाइल्ड कस्टडी में मैटर तब कौंप्लिकेटेड हो जाता है जब इकलौते बेटे की इकलौती संतान हो तो ग्रैंड पेरैंट्स हिंदू रिचुअल्स के नाम पर बेटे को अपने पास रखना चाहते हैं चाहे उन का बेटा पूरी तरह उस चाइल्ड को अटैंशन दे पाए या नहीं. कई बार मां की दूसरे किसी और से शादी के कारण कस्टडी पिता को मिल जाती है पर मां के विजिटिंग राइट्स रहते ही हैं.

इस उधेड़बुन में चाइल्ड केयर बुरी तरह इफैक्ट होती है और यह फुटबाल का खेल अनऐंडिंग हो जाता है जिस में बच्चे को किक्स दोनों ओर से मिलती हैं. अच्छा यह रहेगा कि चाइल्ड केयर पर एक कानून बना दिया जाए और सही या गलत यह फिक्स कर दिया जाए कि कस्टडी किसे मिलेगी. कानून चाहे सही हो या गलत देखा जाएगा, कम से कम पहले दिन तो संशय नहीं रहेगा.

हालांकि आजकल इस तरह के कानून बनने की गुंजाइश कम है क्योंकि आज की सरकार सिर्फ वे कानून बना रही है जिन से एक तो हिंदूमुसलिम विवाद बढ़ें और दूसरे वे जिन से पंडितों की दानदक्षिणा सुरक्षित हो. वे तो यही कहेंगे कि पुराणों को खोल कर देख लो कि वहां क्या लिखा है. वहां तो गांधारी को अपनी आंखों पर पट्टी बांधनी पड़ी थी क्योंकि पति अंधा था और रानियों को नियोग से बच्चे पैदा करने पड़े थे क्योेंकि पौराणिक राजाओं के बेटों ने बचपन में ही यौन रोग तरहतरह की औरतों के साथ सो कर पाल लिए थे.

चाइल्ड कस्टडी के चक्कर में असल में मांओं को प्रैक्टिकली ज्यादा जिद नहीं करनी चाहिए. पिताओं के लिए यह सिर्फ इगो इशू होता है क्योंकि बच्चे छोटे हों या बड़े मां को नेचर की ताकत की वजह से सूंघ कर जानते हैं. पिता उन के लिए सदा बायोलौजिकली पराया ही होता है. अगर पिता के पास चाइल्ड केयर की जिम्मेदारी होगी तो मांओं को आजादी मिलेगी कि वे अपना कैरियर बनाएं, अपने नए साथी चुनें, अपने पर खर्च करें और दोहरी जिम्मेदारी न उठाएं.

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