Bhawani Thekkada : कोडगु  कर्नाटक से आने वाली भवानी थेक्कडा आज भारत की नंबर 1 महिला क्रौस कंट्री स्कीयर हैं और पिछले 4 सालों से लगातार नैशनल रैंकिंग में नंबर 1 पर हैं. एनसीसी माउंटेनियरिंग कैंप से शुरू हुई उन की जर्नी 2019 में न्यूजीलैंड से इंटरनैशनल इंस्ट्रक्टर सर्टिफिकेट और 2020 में जवाहर इंस्टिट्यूट कश्मीर में स्की इंस्ट्रक्टर बनने तक पहुंचीं. वे इतिहास की पहली भारतीय हैं जिन्होंने एफआईएस वर्ल्ड कप में डेब्यू किया. 2025 में नौर्वे में हुई नार्डिक वर्ल्ड चैंपियनशिप और एशियन विंटर गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया और एशियन विंटर गेम्स 2025 में भारत की फ्लैग बियरर बनीं.

भवानी के नाम वे रिकौर्ड हैं जो आज तक इस गेम में किसी भारतीय महिला ने नहीं बनाए. 2022 में इटली में सिल्वर मैडल

जीत कर इंटरनेशनल मैडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला. 2025 में चिली में साउथ अमेरिकन चैंपियनशिप में 2 ब्रौंज मैडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला और खेलो इंडिया विंटर गेम्स की मल्टीपल गोल्ड मैडलिस्ट. 2026 में उन्होंने अपना दबदबा जारी रखा. चिनार ओपन विंटर गेम्स में 1 किलोमीटर स्प्रिंट में गोल्ड और खेलो इंडिया विंटर गेम्स 2026 में 1.5 किलोमीटर स्प्रिंट में गोल्ड के साथ 10 किलोमीटर और 15 किलोमीटर में 2 ब्रौंज मैडल जीते. इस से पहले 2024 में भी उन्होंने खेलो इंडिया में 10 किलोमीटर,

5 किलोमीटर और 1.5 किलोमीटर स्प्रिंट में 3 गोल्ड जीते थे. साथ ही 2026 में (वर्ल्ड लोपेट मेरिनो मस्टर) न्यूजीलैंड में 21 किलोमीटर रेस में सिल्वर मैडल जीता.

आइए, भवानी थेक्कडा से जानते हैं कैसा रहा कोडागु से पहाड़ों तक का उन का यह सफर:

‘‘मैं कर्नाटक के कोडगु जिले के छोटे से नापक्लू गांव की रहने वाली हूं. वहां चारों तरफ कौफी के बागान हैं और बर्फ का नाम तक कोई नहीं जानता. हमारा वहां छोटा सा कौफी का बगीचा है जिसे मम्मीपापा ही मैनेज करते हैं. बचपन में तो हमें पहाड़ों के बारे में पता भी नहीं था. साउथ में हमारा जो हिल स्टेशन है वह वैस्टर्न घाट्स ही है सो बस वही देखा था. पढ़ाई वगैरह सब कोडगु में ही की. उस के बाद ग्रैजुएशन के लिए मैं मंगलूर यूनिवर्सिटी में गई थी. वहां बोला गया कि आप को कोई ऐक्टिविटी लेनी पड़ेगी. इस वजह से मैं ने एनसीसी जौइन किया. उसी समय 2011 में ‘ये जवानी है दीवानी’ मूवी आई थी. मैं तब जवाहर नवोदय विद्यालय बोर्डिंग स्कूल में 12वीं कक्षा में थी. वह मूवी देख कर मैं ने पहली बार सोचा था कि जब पढ़ाई खत्म कर लूंगी तो एक दिन हिमालय देखने जाऊंगी.’’

एनसीसी और पहली बार मनाली जाना

‘‘एनसीसी में चंद्र प्रकाश नाम के एक सर थे जिन्हें हम सीपी सर बुलाते थे वे उत्तराखंड से थे और इंडियन एअरफोर्स में थे. वे मु?ो रोज ड्रिल सिखाते थे. वे अकसर कहते थे कि तुम्हारा ड्रिल इतना अच्छा है कि एक दिन तुम दिल्ली में रिपब्लिक डे परेड में मार्च करोगी. फिर एक दिन सीपी सर ने मु?ो फोन किया और कहा कि भवानी तुम माउंटेनियरिंग कैंप के लिए जा रही हो. बताओ तुम्हें मनाली जाना है या उत्तराखंड? मनाली में ‘अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टिट्यूट औफ माउंटेनियरिंग’ है और उत्तराखंड में ‘नेहरू इंस्टिट्यूट औफ माउंटेनियरिंग’ है जो इंडिया में बैस्ट इंस्टिट्यूट्स हैं. पर उस समय मु?ो तो पता ही नहीं था कि माउंटेनियरिंग क्या होता है. मैं उस समय तक कहीं गई नहीं थी. उत्तराखंड कहां है, क्या है यह भी पता नहीं था. मैं ने कहा कि मनाली तो मूवी में देखी है इसलिए वहीं चली जाऊंगी. सर ने कहा कि मूवी में जैसे सब पहाड़ चढ़ते हैं न बस वही करना है. इस तरह 2014 में पहली बार एनसीसी के थ्रू मैं मनाली बेसिक माउंटेनियरिंग कोर्स करने (बीएमसी) गई. सर खुद मु?ो छोड़ने आए थे. उस वक्त मेरी हिंदी बहुत टूटीफूटी थी. मेरे साथ मंगलूर से एक और लड़की थी. हम दोनों को कर्नाटक एनसीसी की तरफ से भेजा गया था.’’

एमओआई कोर्स और इंस्ट्रक्टर बनने की कहानी

‘‘फिर उस के बाद मैं ने एमओआई यानी ‘मैथड औफ इंस्ट्रक्शन’ कोर्स किया. यह माउंटेनियरिंग का फाइनल कोर्स होता है जिसे कर के आप इंस्ट्रक्टर बन सकते हो. यह मैं ने हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टिट्यूट (एचएमआई) दार्जिलिंग से किया है. यह बहुत टौप लैवल के माउंटेनियरिंग इंस्टिट्यूट्स में से एक है. यहां पर मैं पहले भी एनसीसी की तरफ से कुछ कोर्सेज कर चुकी थी. मेरी ग्रैजुएशन 2016 में खत्म हो चुकी थी और यह एमओआई कोर्स मैं ने उस के बाद खुद से किया था. जब मैं ने वहां कोर्स किया तो मु?ो ए ग्रेड मिला. वहां 50% मिलिटरी वाले आते हैं. सर ने मु?ो जौब औफर दे दिया.

‘‘मैं ने सोचा आईटी कंपनी में जौब करने से अच्छा है पहाड़ों में ही जौब कर लूं. उस टाइम मैं आर्मी जौइन करने की तैयारी भी कर रही थी तो लगा कि यहां फिटनैस भी बनी रहेगी और आर्मी के ऐग्जाम की पढ़ाई भी हो जाएगी. इसलिए मैं ने 2017 में एचएमआई दार्जिलिंग में माउंटेनियरिंग इंस्ट्रक्टर के तौर पर जौइन किया. उस समय मैं 21 साल की थी और वहां की सब से छोटी इंस्ट्रक्टर थी.’’

स्कीइंग की शुरुआत और आगे की जर्नी

‘‘उसी दौरान एक बार बेस कैंप में मैं बहुत बोर हो रही थी क्योंकि मेरे पास आर्मी ऐग्जाम की किताबों के अलावा कुछ नहीं था. तो मैं ने एक इंस्ट्रक्टर से मूवी मांगी तो उन्होंने मु?ो ‘एडी द ईगल’ मूवी दी. यह एक ब्रिटिश स्की जंपर पर बनी है जो पहली बार ब्रिटेन की तरफ से ओलिंपिक में स्की जंपिंग के लिए गया था.

‘‘मूवी देख कर मु?ो लगा कि मैं ने मनाली और कश्मीर में लोगों को स्की करते देखा है पर कभी खुद ट्राई नहीं किया. मु?ो लगा कि विंटर में तो इंस्टिट्यूट बंद रहता है और फरवरी में मेरा आर्मी का ऐंट्रैंस ऐग्जाम है. उस के बाद रिजल्ट आने तक डेढ़ महीना फ्री रहूंगी. तो मैं ने प्रिंसिपल सर से बोला कि मु?ो स्की कोर्स की एक सीट दिला दीजिए. मैं ने सोचा एक एड औन स्किल हो जाएगी. जिस पहाड़ को चढ़ती हूं उसे स्की कर के उतर भी सकूंगी.

‘‘मैं रेसर बनने के लिए नहीं बस माउंटेनियरिंग के लिए एक स्किल के तौर पर सीखना चाहती थी. 2018 में मैं पहलगाम, कश्मीर में जेआईएम यानी ‘जवाहर इंस्टिट्यूट औफ माउंटेनियरिंग ऐंड विंटर स्पोर्ट्स’ गई और वहां बेसिक और इंटरमीडिएट कोर्स किया. मु?ो लगा मैं अच्छा कर रही हूं तो मैं ने सोचा इसे कंप्लीट करना चाहिए. इसी बीच मैं रशिया में माउंट एल्ब्रस भी चढ़ कर आई जो यूरोप का सब से ऊंचा पीक है. वापस आ कर 2019 में मैं ने गुलमर्ग में आईआईएसएम यानी ‘इंडियन इंस्टिट्यूट औफ स्कीइंग ऐंड माउंटेनियरिंग’ से एडवांस कोर्स किया.’’

एडवांस कोर्स के बाद प्रैक्टिस

‘‘जब मैं ने एडवांस कोर्स किया तो मु?ो लगा मैं तो अच्छी स्की कर रही हूं तो क्यों न मैं थोड़ा और स्की कर लूं और फिर पहाड़ चढ़ कर स्की डाउन करने का कोई रिकौर्ड अटैंप्ट कर सकती हूं. यह सोच कर मैं कोर्स के बाद

1 महीना कश्मीर में ही रुक गई और सुबहशाम स्की किया. वहां जो आर्मी के ऐथलीट थे मैं उन को देखती थी. वे लोग भी यही करते थे तो मैं उन से मदद मांगती थी कि भैया बता दो मैं क्या करूं, टैक्नीक कैसे इंप्रूव करूं. मैं सुबह 7:30-8:00 बजे चली जाती थी जब आर्मी वाले आते थे. उस टाइम कोई टूरिस्ट नहीं आता और स्की का लिफ्ट भी नहीं खुलता. लिफ्ट से ऊपर जा कर नीचे स्की करते हुए आते हैं. पर मैं स्की को कंधे पर ले कर पैदल ही ऊपर चढ़ती थी और फिर नीचे उतरती थी, फिर चढ़ती थी फिर उतरती थी. वहां आर्मी के भैया लोग भी मुझे थोड़ाबहुत बताते रहते थे.’’

मैरिट ब्योर्गेन से इंस्पिरेशन

‘‘उसी टाइम 2018 में विंटर ओलिंपिक हुआ था. हमारे इंडिया से एक भैया थे जगदीश वे उस में कंपीट कर रहे थे. अब मैं खुद स्की करती थी तो मैं ने विंटर ओलिंपिक देखना शुरू किया. मैं यूएस की एक ऐथलीट लिंजी वौन के लिए देख रही थी पर उसी टाइम न्यूज में मैरिट ब्योर्गेन नाम की एक लेडी के बारे में बहुत आ रहा था. उस वक्त वे 38 साल की थीं और उन का एक बच्चा भी हुआ था हाल ही में. मैटरनिटी लीव के बाद वे फिर आई थी. उन्होंने एक ही ओलिंपिक, 2018 वाले ओलिंपिक में 5 ओलिंपिक मैडल जीते थे.

‘‘न्यूज वायरल हो रहा था कि अगर वे एक और मैडल जीत लेगी तो हिस्ट्री में सब से ज्यादा पदक वाली स्कीयर बन जाएगी क्योंकि उन के पास आलरेडी 14 मैडल थे और एक और आते ही 15 ओलिंपिक मैडल हो जाते. इंडिया में बचपन से सुना है कि 30 के बाद लड़कियां ज्यादा कुछ नहीं कर सकतीं, शादी के बाद या बच्चा होने के बाद कुछ नहीं कर पाओगी. पर मैं स्कूल टाइम में मैरी कौम मैम और पीटी उषा मैम की बहुत बड़ी फैन थी क्योंकि मैरी कौम मैम ने भी बच्चों के बाद बौक्सिंग की थी. इसी तरह मैरिट ब्योर्गेन की स्टोरी देख कर भी मैं बहुत इंस्पायर हो गई.

‘‘फिर मैं ने देखा कि वे क्या करती हैं तो पता चला कि एक इवेंट है क्रौस कंट्री स्कीइंग. यह एक तरह से मैराथन जैसा है जैसे लोग मैराथन दौड़ते हैं वैसे ही स्कीइंग का मैराथन है. इस में 10, 15, 20, 50 किलोमीटर की रेस होती है स्की पहन कर. आप को ऊपरनीचे, टनर्स सबकुछ स्की पर ही करना पड़ता है. वे लेडी यही इवेंट करती थीं. उन से इंस्पिरेशन मिला तो मैं ने उन्हें सोशल मीडिया में फौलो किया. ’’

15 दिन में नैशनल का चैलेंज

‘‘2019 में मैं ने इंस्ट्रक्टर का कोर्स किया. फिर मैं ने जिम इंस्टिट्यूट में कश्मीर में इंस्ट्रक्टर के रूप में काम शुरू किया. 2020 में जब मैं ने वहां जौइन किया तो सर ने मेरे स्टैमिना के बारे में पूछ कर कहा कि वह आर्मी या दूसरे इंस्टिट्यूट से स्की ला कर देंगे. फिर उन्होंने मु?ो क्रौस कंट्री करने को कहा. हमेशा से मेरे मन में था कि मैं यह ट्राई करूं मगर सर ने बोला कि 15 दिन में नैशनल होने वाला है औली में सो तुम उस के लिए तैयार हो जाओ. इस पर मैं घबरा गई कि आज तक जिंदगी में कभी क्रौस कंट्री किया ही नहीं है तो मैं 15 दिन में एक नया स्पोर्ट्स सीख कर इतने बड़े कंपीटिशन में कैसे कंपीट करूं. तब सर ने सम?ाया कि अधिक से अधिक क्या हो जाएगा बारबार गिरोगी या लास्ट आओगी या रेस कंप्लीट नहीं कर पाओगी मगर इस से कोई नुकसान नहीं है.

‘‘आज तक साउथ इंडिया से किसी ने भी विंटर स्पोर्ट्स में, स्कीइंग में कंपीट नहीं किया है. हमेशा नौर्थ वाले या मिलिटरी वाले ही खेलते हैं. इसलिए पार्टिसिपेट करना चाहिए. मु?ो भी सही लगा और हामी भर दी और तैयारी शुरू की.’’

स्पोर्ट्स में भारत और बाहर की सुविधाओं में फर्क

‘‘मुझे लगता है हम एक ऐसे देश से हैं जहां टैलेंट की कोई कमी नहीं है पर यहां जो डिजर्विंग ऐथलीट हैं अकसर उन्हें सपोर्ट मिलती ही नहीं है. सपोर्ट मिलती भी है तो कामयाबी मिलने के बाद मिलती है. अब अगर मुझे ओलिंपिक के बाद पैसे मिलते हैं तो मैं क्या करूंगी जबकि मु?ो जरूरत अभी है. अभी सपोर्ट मिलेगा तो हम उस लैवल तक पहुंच सकते हैं पर इंडिया में क्या होता है कि आप पहले सबकुछ कर लो उस के बाद आप को पैसा दिया जाता है या तब जा कर आप को पहचान मिलती है. विदेशों में ऐसे नहीं होता. वहां बचपन से सपोर्ट दी जाती है.

‘‘जैसे वर्ल्ड कप में जब मैं गई थी तो मैं अकेली खड़ी थी. न मेरे पास कोच हैं न मैनेजर और न फिजियो. मैं अकेली स्टार्ट लाइन पर खड़ी थी जबकि दूसरी कंट्री की ऐथलीट्स के साथ उन का कोच, उन का फिजियो, उन का मैनेजर सब साथ होते है. कोई हाथ मसाज कर दे रहा है, कोई बता रहा है क्या करना है, कैसे रेस दौड़ना है तो कोई उसे जैकेट पकड़ रहा है और मैं वहां खड़ी हो कर सोचती थी कि हमारे पास यह सब क्यों नहीं है. जबकि इंडिया इतना बड़ा देश है और लोगों के पास इतना पैसा है. हमें इन का 10% भी सपोर्ट मिल जाता तो कितना अच्छा होता.

‘‘मैं 25 साल की एज में साउथ से आ कर इस गेम के बारे में कुछ भी जानकारी न होने के बावजूद इस लैवल तक पहुंच सकती हूं तो सोचिए हमारे इंडिया में छोटेछोटे बच्चे जो हिमालयन रीजन या लद्दाख के हैं, जिन की लंग कैपेसिटी इतनी अच्छी है उन बच्चों को सही टाइम पर टैक्नीक और फाइनैंशियल सपोर्ट मिले, ट्रेनिंग मिले और फैसिलिटीज मिलें तो इंडिया के लिए मैडल लाना कोई मुश्किल बात नहीं है.’’

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