Karwa Chauth Vrat : क्या किसी एक व्यक्ति का भूखा और प्यासा रहना किसी दूसरे व्यक्ति की उम्र बढ़ा सकता है? यह एक ऐसा सवाल है जो करवाचौथ जैसे लोकप्रिय त्योहार के धार्मिक आवरण को हटाते ही सब से पहले सामने आता है. सदियों से ‘पति की दीर्घायु’ और ‘परिवार के कल्याण’ के नाम पर महिलाओं पर निर्जला उपवास और कठिन कर्मकांडों का धार्मिक बोझ डाला जाता रहा है.
एक तरफ जहां धार्मिक कर्मकांड ‘पति की आयु’ का आधार पत्नी के त्यागमय उपवास को मानते हैं, वहीं दूसरी तरफ आधुनिक विज्ञान और तर्कशास्त्र इस दावे के वैज्ञानिक और जैविक आधार पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं.
करवाचौथ का धार्मिक पक्ष : पति की लंबी आयु और किस्मत से जुड़ा भ्रम
धर्म क्या कहता है : धार्मिक मान्यता है कि करवाचौथ का व्रत पत्नी पति की लंबी उम्र के लिए रखती है. अगर पत्नी करवाचौथ के दिन पूरा दिन निर्जल उपवास कर के पूजापाठ में व्यस्त रह कर पति की लंबी उम्र की कामना करती है, तो वह यमराज से लड़ कर अपने मरे हुए पति को भी लौटा सकती है.
विज्ञान क्या कहता है
अगर ऐसा होता तो दुनिया में कोई भी महिला विधवा नहीं होती. हर नारी के पास वह शक्ति होती कि वह अपने पति की आयु को अपनी इच्छानुसार करवा दे या फिर अगर पति से बन नहीं रही तो उसे छोटा भी कर दे. मतलब यह हुआ कि पति पत्नियों के हाथों के खिलोने हैं. आज उन पर प्यार आ रहा है तो उम्र लंबी कर दो और गुस्सा है तो छोटी कर दो.
वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण से किसी एक व्यक्ति के भूखे रहने से किसी दूसरे व्यक्ति की जैविक आयु या स्वास्थ्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता. उम्र पूरी तरह से आनुवंशिकी, जीवनशैली, पोषण और चिकित्सा सुविधाओं पर निर्भर करती है.
किसी भी जीव की आयु मुख्य रूप से उस के जैनेटिक्स, खानपान, शारीरिक सक्रियता, पर्यावरण और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों की उपलब्धता पर निर्भर करती है. शरीर एक जैविक मशीन की तरह काम करता है, जिस की उम्र कोशिकाओं की मरम्मत और उन की क्षमता से तय होती है, न कि किसी अन्य व्यक्ति की भक्ति, पूजा या व्रत से.
यदि यह मान लिया जाए कि भाग्य सब कुछ पहले से तय कर चुका है, तो व्यक्ति का कर्म, पुरुषार्थ और वैज्ञानिक प्रगति बेमानी हो जाते हैं. चिकित्सा विज्ञान, दुर्घटना से बचाव के सुरक्षा नियम और स्वस्थ जीवनशैली इस बात का प्रमाण हैं कि हम अपने निर्णयों से अपनी स्थिति और जीवन की गुणवत्ता बदल सकते हैं.
निर्जला व्रत का वैज्ञानिक प्रभाव
धर्म क्या कहता है : कहते हैं कि भूखेप्यासे रह कर आप में इतनी शक्ति आ जाती है कि आप चाहें, तो मरे हुए व्यक्ति को भी जिंदा कर सकते हैं.
विज्ञान क्या कहता है : पूरे दिन बिना पानी और भोजन के रहना शरीर के मेटाबोलिज्म पर दबाव डालता है. विज्ञान के अनुसार, डिहाइड्रेशन से सिरदर्द, थकान, एसिडिटी और ब्लड प्रेशर में उतारचढ़ाव हो सकता है. इस वजह से इतनी कमजोरी आ जाती है कि महिला दूसरे किसी के प्राण तो क्या ही बचाएगी उस के अपने ही प्राण जाने की नौबत आ जाती है और वह सब भूल बस चांद निकलने का इंतजार करती है ताकि वह खाना खा सके. ऐसी स्थिति में इसे किसी आध्यात्मिक ‘सिद्धि’ से जोड़ना स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से तर्कसंगत नहीं है.
धर्म नहीं अंधविश्वास है
जब कोई लड़की शादी कर के आती है तो उस पर इस व्रत को करना परंपरा के नाम पर जबरदस्ती थोप दिया जाता है. चाहे व्रत करने का लड़की का मन हो या न हो लेकिन उसे परंपरा के नाम पर इतना डरा दिया जाता है जैसे कि व्रत न रखा तो आज ही पति के प्राण चले जाएंगे. इसलिए हिम्मत न होते हुए भी उसे यह व्रत मजबूरी में रखना पड़ता है.
वैसे भी बचपन से ही जब कोई व्यक्ति अपने आसपास सभी को एक ही काम करते देखता है, तो सवाल पूछने की क्षमता दब जाती है. तर्क के बजाय ‘सब कर रहे हैं तो कुछ सोचसमझ कर ही कर रहे होंगे’ वाली मानसिकता हावी हो जाती है.
यदि किसी ने व्रत रखा और सब ठीक रहा, तो उस का श्रेय अनुष्ठान को दे दिया जाता है. लेकिन यदि अनुष्ठान के बावजूद कोई अनहोनी हो जाए, तो उसे विधि में चूक या भाग्य का लिखा कह कर टाल दिया जाता है.
जैंडर आधारित असमानता है करवाचौथ
करवाचौथ के इस भय का सब से बड़ा बोझ अकसर महिलाओं पर डाला जाता है. परिवार की सुरक्षा, पति की दीर्घायु और संतानों के कल्याण की पूरी नैतिक और धार्मिक जिम्मेदारी महिलाओं के व्रतों और त्याग से जोड़ दी जाती है, जो एकतरफा मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा करता है. पत्नी को पति की जरूरत है तो क्या पति को पत्नी की नहीं? अगर इस व्रत को करने से पति की आयु बढ़ जाती है तो पति को भी यह व्रत कर के पत्नी की आयु बढ़ानी चाहिए या फिर धर्म के हाथों का डमरू बनना छोड़ देना चाहिए.
