Religion and Society: पुलिस के अनुसार तो यह रैकेट था जो दिल्ली में पिछले जून में उस ने एक विशेष रेड में पकड़ा था, जिस में एक अस्पताल चाइल्डलैस कपल को न्यू बौर्न बेबी 5 लाख रुपए में बिकवा रहा था पर असल में यह एक उम्मीद की किरण है कि आजकल भी लोग अपने नाम का बच्चा चाहते हैं. इस में
स्पैशल सिग्निफिकैंस यह है कि कपल इतना डैस्प्रेट था कि उस ने खरीदे बच्चे के पेरैंट्स की न जाति पूछी, न धर्म.
यह बात पुलिस ने एडमिट की है कि इस मामले में बेबी चुराया गया नहीं, असली पेरैंट्स से डेढ़ लाख रुपए में खरीदा गया था. डील से पहले चाइल्डलैस कपल में वाइफ ने अपने को प्रैगनैंट घोषित कर दिया और एक गुमनाम से हौस्पिटल ने पूरा रिकौर्ड तैयार किया हुआ था और खरीदे बच्चे को बायोलौजिकल बच्चा बना कर खरीदार पेरैंट्स को दिया गया था.
यह सैटिस्फैक्ट्री बात इसलिए है कि आज लोग किसी भी कास्ट, रिलीजन का बच्चा लेने को तैयार हैं और उस पर अपना प्यार उडे़लने को तैयार हैं. इस का यह मतलब हुआ कि वे उन ढकोसलों में विश्वास नहीं करते कि बच्चे में मांबाप दोनों का खून, जिसे आज की भाषा में जींस कहा जाएगा, एक ही होना चाहिए.
बच्चे सुख की गारंटी तो नहीं पर घर लाया हर बच्चा एक मैरिज को कंप्लीट करता है चाहे वह खुद का हो, लीगली ऐडौप्ट किया हो या इल्लीगली खरीदा हुआ हो. अगर इल्लीगली खरीदे बच्चे के पेरैंट्स अपना मुंह बंद रख कर ट्रुथ को छिपा कर रख सकते हैं तो यह मैरिज को रीयल में सौलिड पार्टनरशिप बना देगा.
असल में जब बच्चे कम हो रहे हैं तो कानून को रिलैक्स करना चाहिए और सरोगैसी और ऐडौप्शन को आसान बनाना चाहिए. लेट मैरिजस की वजह से बहुत से कपल चाइल्डलैस रह जाते हैं. उन्हें अगर पेरैंट बनने का सुख मिल सकता है तो सरकार या कानून बीच में क्यों आ रहा है.
यह न भूलें कि ज्यादातर धर्मों में कितने ही देवतादेवियों के जन्म डाउटफुल हैं और यह बात उस युग में भी लिख दी गई थी जब मोरैलिटी के स्टैंडर्ड कुछ और थे. धर्म, अपना खून, अपना बच्चा सब भ्रम है. जिसे आप ने पाला वही आप का है. इस प्रिंसिपल को ले कर कपल्स को भी चलना चाहिए और कानून को भी जनता की इच्छा का आदर करना चाहिए.
