Digital Eye Care : डिजिटल इंडिया और बढ़ते स्क्रीन टाइम के कारण भारत में लोगों को आंखों से जुड़ी कई समस्याएं तेजी से हो रही हैं, जिनमें डिजिटल आई स्ट्रेन या कंप्यूटर विज़न सिंड्रोम सबसे आम है. मोबाइल, लैपटॉप और टीवी का घंटों उपयोग करने से आंखों में दर्द, थकान, लालिमा और जलन होती है.

अमेरिकन ऑप्टोमेट्रिक एसोसिएशन के अनुसार, डिजिटल उपकरणों का उपयोग करने वाले लगभग 75 प्रतिशत से अधिक लोग कंप्यूटर विज़न सिंड्रोम या डिजिटल आई स्ट्रेन के लक्षणों का अनुभव करते हैं. जो लोग प्रतिदिन 8 घंटे या उससे अधिक समय स्क्रीन के सामने बिताते हैं, उनमें से 90 प्रतिशत लोगों को नियमित रूप से आंखों में तनाव और बेचैनी की समस्या होती है. 20 से 30 वर्ष की आयु के युवाओं और कामकाजी वयस्कों में यह समस्या सबसे अधिक है, जहां लगभग 70 प्रतिशत से 73 प्रतिशत वयस्क आंखों की थकान और ड्राई आइस से पीड़ित है.

सभी के पास है मोबाईल

इस बारें में वाराणसी के कैटरैक्ट, रिफ्रैक्टिव एवं ग्लूकोमा स्पेशलिस्ट डॉ प्रत्यूष रंजन कहते है कि आज हर पीढ़ी और वर्ग के व्यक्ति के पास एक मोबाईल है, जिसमें होमवर्क से लेकर मनोरंजन के सभी साधन उपलब्ध है. आज के टीचर भी होमवर्क मोबाईल पर ही देते है, जिससे बच्चा दिन – रात उसी पर व्यस्त रहता है. इससे सबसे अधिक आँखों की समस्या बच्चों और यूथ पर हो रहा है, जिस पर वे ध्यान नहीं देते.
असल में आंख एक कैमरे जैसी है. बढ़ते बच्चे की आई बॉल जरूरत से ज्यादा लंबा हो जाए, तो दूर की तस्वीर पर्दे यानि रेटिना से आगे बनने लगती है, और बोर्ड धुंधला हो जाता है. इसी को मायोपिया कहते हैं. चश्मा तस्वीर को वापस पर्दे पर ले आता है, पर आई बॉल को लंबा होने से नहीं रोक पाता और चशमें का नंबर जितनी कम उम्र में शुरू हो, उतने ज्यादा साल उसे बढ़ने के लिए मिलते हैं.

आँकड़े है चौंकाने वाले

अनुमानतः साल 2050 तक दुनिया का हर दूसरा इंसान मायोपिया का शिकार होगा. दिल्ली के स्कूलों में यह एक दशक में 7.4 प्रतिशत से बढ़कर 13.1प्रतिशत हो गया, जो डराने वाली है. चीन के फेइचेंग शहर में 1.2 लाख बच्चों की जांच में छह साल के बच्चों का मायोपिया 5.7 प्रतिशत से उछलकर 21.5 प्रतिशत पर पहुंच गया.

आंकड़ों के अनुसार, हर 10 में से लगभग 7 से 8 व्यक्ति डिजिटल आई स्ट्रेन की समस्या से प्रभावित हैं. यदि डिजिटल आई स्ट्रेन को लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाए और इसका इलाज या बचाव न किया जाए, तो यह आगे चलकर कई गंभीर शारीरिक और मानसिक समस्या का रूप ले सकता है, जिसमें क्रोनिक ड्राई आई सिंड्रोम, कमजोर नजर, क्रोनिक सिरदर्द, समय से पहले प्रेसबायोपिया आदि यानि अधिक स्क्रीन टाइम के कारण आँखों की फोकस करने की प्राकृतिक क्षमता समय से पहले कमजोर हो सकती है. डिजिटल इंडिया के वजह से कुछ आम समस्याएं निम्न है.

ड्राई आईस

स्क्रीन देखते समय पलकें कम झपकती हैं, जबकि सामान्यतः 15 से 20 बार की बजाय 5 से 7 बार प्रति मिनट, जिससे आंखों की नमी सूख जाती है, उनमें सूखापन और किरकिरापन पैदा होता है.

मायोपिया

दूर की दृष्टि कमजोर होना इसमें अधिकतर होता है. बच्चों और युवाओं में मोबाइल और स्क्रीन के अत्यधिक उपयोग तथा बाहरी गतिविधियों में कमी के कारण मायोपिया के मामले तेजी से बढ़ा हैं.

गलत पोश्चर

इससे आंखों पर पड़ने वाले तनाव के कारण बार-बार सिरदर्द और गर्दन या पीठ में दर्द होता है.

नींद में समस्या

स्मार्टफोन और कंप्यूटर स्क्रीन से निकलने वाली नीली ब्लू लाइट नींद के चक्र को प्रभावित करती है.

क्या करें

डॉक्टर आगे कहते है कि ऐसे में कुछ सुझाव निम्न है, जिसे अपनाकर व्यक्ति इससे कुछ हद तक निजात पा सकता है.

• 20-20-20 नियम बहुत कारगर होता है, जिसमें हर 20 मिनट के स्क्रीन उपयोग के बाद, 20 सेकंड के लिए स्क्रीन से हटकर कम से कम 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखें.
• जब आप स्क्रीन पर लगातार देखते है, तो पलकों का झपकना कम हो जाता है, इसलिए बार-बार पलकें झपकाने की कोशिश करें, इससे आंखों में नमी बनी रहती है, इसलिए बीच-बीच में जानबूझकर पलकें झपकाते रहें.
• स्क्रीन की दूरी और ऊंचाई का हमेशा ध्यान रखें, कंप्यूटर या लैपटॉप की स्क्रीन को आंखों से करीब 20 से 24 इंच दूर और आंखों के स्तर से थोड़ा नीचे रखें.
• वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) और इंडियन एकादमी ऑफ पेडियट्रिक्स (IAP) की सलाह के अनुसार 2 साल से कम में मोबाईल बिल्कुल नहीं देना है. 2 से 5 साल में ज्यादा से ज्यादा एक घंटा, 5 से 10 साल में पढ़ाई समेत दो घंटे से कम होने की जरूरत है. इसके अलावा इंटेरटैनमेंट स्क्रीन टाइम रोज एक घंटे से कम, जिसमें खाने की मेज पर और सोने से एक घंटा पहले बंद कर देना सही रहता है.
• लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स इस समय बहुत अच्छा सिद्ध होता है. आंखों में सूखापन महसूस होने पर डॉक्टर की सलाह से आई ड्रॉप्स का उपयोग करें.
• ब्राइटनेस और लाइटिंग का सही होना बहुत जरूरी होता है. कमरे में पर्याप्त रोशनी रखें और स्क्रीन की ब्राइटनेस को आसपास के माहौल के अनुसार सेट करें.

नंबर की जांच आंखों की जांच नहीं

इसके आगे डॉ. प्रत्यूष कहते है कि कुछ लोग चश्मे की दुकान में जाकर चश्मे का नंबर ले लेते है और सोचते है कि आई चेकअप हो गया, जबकि ऐसा नहीं होता. दुकान की मशीन बिना आई ड्रॉप डाले करीब एक नंबर ज्यादा माइनस दिखा देती है. बच्चे का पहला चश्मा, और नंबर बढ़ने का हर फैसला, पुतली फैलाने वाली बूंद डालकर की गई जांच पर ही होना चाहिए. उसी जांच में भेंगापन और लेजी आई भी पकड़ में आते हैं. नंबर वाले बच्चे की हर छह महीने जांच और आंख के ऐक्सीअल लेंथ यानि आँख के सबसे सामने वाले हिस्से, कॉर्निया से लेकर आँख के सबसे पिछले हिस्से रेटिना तक की दूरी को आमतौर पर मिलीमीटर में मापा जाता है, उसकी जांच करनी पड़ती है. एक स्त्री को मेनोपॉज के बाद ड्राई आई होना आम है.

इस प्रकार डिजिटल दुनिया में आँखों की सही देखभाल करना बेहद ज़रूरी है क्योंकि आज हमारा ज़्यादातर समय स्मार्टफोन, लैपटॉप, कंप्यूटर और टीवी स्क्रीन के सामने बीतता है. लगातार स्क्रीन देखने से आँखों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, जिससे न केवल आँखों की रोशनी प्रभावित होती है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ सकता है. सही देखभाल से ही आप लंबे समय तक स्वस्थ आँखों की सौगात पा सकती है.

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...