DINK Lifestyle : दीप्ति  अपनी सास की बारबार टोकाटाकी से परेशान हो चुकी थी कि शादी के 2 साल हो गए, बच्चे के बारे में कब सोचोगी?

पति धीरज कहते हैं ‘इग्नोर करो उन की बातों को. लेकिन कोई कितना इग्नोर करे? दीप्ति की सास जब देखो बस यही बात दोहराती रहती है कि उसे एक पोता या पोती चाहिए और दीप्ति का कहना है कि जब उसे बच्चा चाहिए ही नहीं तो पैदा क्यों करे?

बात तो सही है कि जब उसे बच्चा चाहिए ही नहीं तो पैदा क्यों करे?

दीप्ति का पति धीरज पुणे में एक आईटी कंपनी में मैनेजर की पोस्ट पर कार्यरत है और दीप्ति भी पुणे में ही एक बड़ी कंपनी में जौब करती है. दोनों ने वहीं अपना घर भी ले लिया है और उन की जिंदगी बड़े मजे से गुजर रही है. शादी से पहले उस ने और धीरज ने यह फैसला कर लिया था कि वे अपना कोई बच्चा नहीं करेंगे, संतानमुक्त रहेंगे.

श्रुति के साथ भी यही हुआ. शादी के सालभर बाद ही उस की सास और मां उस पर बच्चा करने का दबाव बनाने लगीं. जबकि श्रुति और उस के पति ने शादी से पहले ही यह फैसला कर लिया था कि वे अपना कोई बच्चा नहीं करेंगे. जब उस ने यह बात अपनी मां को बताई तो उन्हें तो जैसे शौक लग गया. गुस्से में आ कर उन्होंने अपनी बेटी से सारे रिश्ते तोड़ लिए. श्रुति ने भी कह दिया कि किसी को खुश करने के लिए वह अपना फैसला नहीं बदल सकती.

परिवार है महत्त्वपूर्ण

हमारे भारतीय परिवारों में शादी का एक मुख्य उद्देश्य वंश आगे बढ़ाना होता है. लेकिन कहीं न कहीं वे यह बात भूल जाते हैं बच्चे की सारी जिम्मेदारी मातापिता पर ही होती है.

बता दें कि भारत दुनिया का दूसरा सब से बड़ा आबादी वाला देश है. इस का सब से महत्त्वपूर्ण कारण है कि भारत में अभी भी परिवार को बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है. भारत में जब किसी लड़केलड़की की शादी होती है तो उन से जल्द से जल्द बच्चे के मातापिता बनने की उम्मीद की जाती है ताकि उन का परिवार आगे बढ़ पाए.

एक मामला हरिद्वार का है, जहां एक बुजुर्ग दंपती साधना और संजीव ने बुढ़ापे में मांबाप की देखरेख न करने और दादादादी बनने की खुशी से वंचित रखने पर अपने बेटेबहू पर मुकदमा कर दिया. उन का बेटा पायलट है और बहू एक बड़ी कंपनी में जौब करती है.

साधना और संजीव का कहना है कि जब भी वे अपने बेटेबहू से बच्चे की बात करते थे, वे टाल जाते थे. जब वे उन पर बच्चा पैदा करने का दबाव बनाने लगे और कहा कि उन्हें एक पोता या पोती दे दो, फिर जो चाहे करें तब बेटेबहू बोले कि जब उन्हें कोई बच्चा चाहिए ही नहीं तो पैदा क्यों करें?

बेटेबहू की ऐसी बातों से क्षुब्ध हो कर बुजुर्ग दंपती ने उन पर मुकदमा ठोंक दिया. बुजुर्ग दंपती का कहना है कि उन्होंने अपने जीवनभर की जमापूंजी बेटे के लालनपालन, उस का भविष्य बनाने और शादी पर खर्च कर दी. शादी के बाद हनीमून पर अपने खर्चे पर उन्हें विदेश भी भेजा. लेकिन बदले में बेटेबहू ने उन्हें पोता या पोती का सुख तक नहीं दिया. उन का कहना है कि बेटे के बच्चा पैदा नहीं करने के कारण समाज के लोग उन्हें ताने देते हैं और मानसिक उत्पीड़न करते हैं. उन का वंश समाप्त होने की कगार पर है. यह सोचसोच कर उन्हें बहुत मानसिक पीड़ा पहुंच रही है.

बच्चे को जन्म देना या न देना

लैंगिक समानता को ले कर मुखर सामाजिक कार्यकर्ता गीता गैरोल का कहना है कि मांबाप का नैतिक अधिकार है कि बुढ़ापे में उन की देखभाल हो और उन्हें मानसिक भावनात्मक मदद मिले. अपने बेटेबहू पर उन का पूरा हक है और वे उन से आर्थिक देखभाल की मांग कर सकते हैं. लेकिन बच्चे को जन्म देना या न देना किसी स्त्री का अधिकार है. ग्रैंड पेरैंट्स पोता या पोती की मांग रख कर वे स्त्री के अधिकार का हनन नहीं कर सकते हैं. यदि कोई स्त्री मां नहीं बनना चाहती है तो वंश के नाम पर उसे जबरन बच्चा पैदा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है.

उन बुजुर्ग दंपती साधना और संजीव से जब कुछ नहीं सू?ा तो उन्होंने विकल्प के रूप में अपने बेटेबहू से 5 करोड़ रुपए मुआवजे की मांग कर दी. उन का कहना है कि अब तक अपने बेटे पर जितने पैसे उन्होंने खर्च किए, सब उन्हें चाहिए.

दूसरी तरफ एक 27 साल का लड़का अपने ही मातापिता पर केस करना चाहता है, इसलिए क्योंकि उन्होंने उसे पैदा क्यों किया? उस का कहना है कि उसे पैदा करने से पहले उस से पूछा क्यों नहीं गया कि वह इस दुनिया में आना चाहता है भी या नहीं? इस लड़के का कहना है मैं यहां इस दुनिया में दूसरों के कारण हूं तो मैं क्यों सफर करूं? मैं क्यों काम करूं?

यह ट्रेंड जिसे डिंक डबल इनकम, नो किड्स कहा जाता है में दंपती अपने कैरियर पर फोकस और आजादी चुनते हैं, बच्चे नहीं.

चाइल्ड फ्री मैरिज का एक उदाहरण ‘बिग बौस विनर’ गौरव खन्ना और उन की पत्नी आकांक्षा के जरीए देखने को मिला. आकांक्षा ने बताया कि उन्हें बच्चा नहीं चाहिए. वे उस के लिए तैयार नहीं हैं.

एक महिला का कहना है कि बच्चे पैदा करने के फैसले अकसर महिलाओं पर थोप दिए जाते हैं. मातृत्व और स्त्रीत्व को एकदूसरे में गूंथ दिया गया है. ऐसे में महिलाओं पर जिंदगी की परंपराओं को निभाने का ज्यादा दबाव रहता है.

लड़कियां मां क्यों नहीं बनना चाहतीं

शादी के बाद बहुत सी लड़कियां तुरंत या मां बनना ही नहीं चाहतीं, इसलिए क्योंकि वे अपने कैरियर और आर्थिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता देती हैं. वे ‘मदरहुड पेनाल्टी’ (मां बनने पर कैरियर का नुकसान) से बचना चाहती हैं.

‘मौडर्न इंडियन वूमन’ के बारे में बात करते हुए कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री डा. के. सुधाकर ने एक ऐसा बयान दिया था कि सोशल मीडिया पर उन की खूब खिंचाई हुई थी. डा. के. सुधाकर ने एक सभा में कहा था कि आज की मौडर्न भारतीय महिलाएं सिंगल रहना पसंद करती हैं, शादी के बाद भी वे बच्चे पैदा नहीं करना चाहतीं और सरोगेसी के जरीए बच्चे चाहती हैं. तब उन से यह सवाल किया गया कि आखिर वे लड़कियों पर ही बच्चे पैदा करने का मानसिक दबाव क्यों बना रहे हैं? इस के जवाब में उन्होंने कहा कि वे तो सिर्फ सर्वे के आधार पर जनता के बीच बात रख रहे थे.

दरअसल, 2020 में एक सर्वे में सामने आया कि 19% मिलेनियल्स शादी और बच्चे दोनों चाहते हैं, वहीं 9% भारतीय यंगस्टर्स ऐसे हैं जो शादी तो करना चाहते हैं लेकिन बच्चे नहीं चाहते यानी चाइल्डफ्री रहना चाहते हैं.

हमारी सामाजिक और पारिवारिक परंपराएं कहती हैं कि शादी के साथ संतान अनिवार्य है. भारत में किसी महिला के लिए यह कहना कि मु?ो बच्चे नहीं चाहिए क्रांतिकारी जैसा लग सकता है. एक ऐसा देश जहां मातृत्व को पवित्र माना जाता है, वहां संतानहीन रहने का विचार आज भी अपरिचित और अस्वीकार्य सा लगता है.

महिलाएं इसलिए मां बनती हैं क्योंकि उन से यही अपेक्षा की जाती रही है. भारत में संतानहीनता को ले कर एक सांस्कृतिक कलंक है. अगर कोई महिला शादी के कुछ सालों में मां नहीं बन पाती है तो उसे बां?ा का दर्जा दे दिया जाता है. लेकिन अब इस में बदलाव आना शुरू हो गया है.

कोई पछतावा नहीं

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षणों के साक्ष्य के अनुसार, भारत में निस्संतान महिलाओं की संख्या 2015-16 में 7% से बढ़ कर 2019-21 में 12% हो गई है जो सांख्यिकीय रूप से महत्त्वपूर्ण वृद्धि है. यह वृद्धि उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाओं, देर से विवाह करने वाली महिलाओं और शहरी क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं में अधिक देखा गया है.

हालांकि भारत में स्वेच्छा से संतानहीनता अभी भी व्यापक रूप से स्वीकार्य नहीं है. संतानहीन रहने का विकल्प चुनने वाली महिला को अकसर भ्रम, चिंता या अविश्वास का सामना करना पड़ता है.

एक महिला का कहना है कि मेरी शादी के 8 साल हो जाने के बाद भी दोस्त, परिचित, पड़ोसी और यहां तक कि जिन्हें मैं जानती तक नहीं, पूछने आ जाते हैं कि मैं बच्चे के बारे में कब सोचूंगी? कई बार तो पुरुषों ने भी मुझे मातृत्व की भावना समझने की कोशिश की कि क्या बाद में मुझे बच्चा नहीं करने का पछतावा नहीं होगा? अभी भी समय है, बच्चा कर लो. लेकिन मैं आज भी यही कहती हूं कि मुझे बच्चा नहीं चाहिए, तो लोग मुझे हैरानी से देखते हैं जैसेकि मैं ने कोई बहुत अजीब बात कह दी हो.

मैं उन्हें बताना चाहती हूं कि मुझे कोई दुख नहीं है बच्चा नहीं करने का बल्कि कई महिलाएं हैं जो गर्व से बच्चे रहित जीवन चुन रही हैं. वे दिन चले गए जब मातृत्व को महिला का एकमात्र उद्देश्य माना जाता था. आज महिलाएं अपनी भूमिकाओं और प्राथमिकताओं को फिर से परिभाषित कर रही हैं और बच्चे के बिना जीवन जीना चाहती हैं.

एक युवा दंपती का कहना है कि हम बच्चा इसलिए पैदा करें ताकि हमारा बुढ़ापा सिक्योर हो जाए तो यह हमारा बहुत बड़ा स्वार्थ है. उन का मानना है कि अगर बच्चा नहीं होगा तो तनाव भी नहीं होगा और सेविंग्स भी ज्यादा होगी और अपने हिसाब से आजाद हो कर जी पाएंगे.

शिखा ने शादी इसलिए तोड़ दी क्योंकि उस ने अपने मंगेतर के सामने अपने मन की बात रख दी कि शादी के बाद वे अपना कोई बच्चा नहीं करेगी बल्कि किसी अनाथ बच्चे को गोद ले लेगी, जिस से उसे भी मांबाप का प्यार और एक घर मिल जाएगा. इतना सुनते ही उस के मंगेतर ने उसी वक्त उस से सगाई तोड़ दी.

तो क्या शादी का मतलब सिर्फ बच्चा पैदा करना होता है? लोग सिर्फ वंश बढ़ाने के लिए ही शादी करते हैं?

प्राचीनकाल से विवाह केवल वंशवृद्धि के लिए किए जाते थे. मुख्यत: राजाओं में, राजा के लिए वारिसदार आवश्यक था. हिंदू धर्म में इसे एक पवित्र संस्कार माना गया है, जिस में धर्म का पालन और पिता का कर्ज, संतान के माध्यम से, चुकाना मुख्य था.

वंश बढ़ाना आज भी कई परिवारों के लिए महत्त्वपूर्ण पहलू है लेकिन यह एकमात्र या प्राथमिक कारण नहीं रह गया है. अब लोग इसे व्यक्तिगत खुशी, आपसी प्रेम, सहमति, भावनात्मक जुड़ाव, समानता और साथी के रूप में शादी को ज्यादा देखते हैं. आधुनिक युग में समलैंगिक विवाह और सिंगलपेरैंटिंग जैसी अवधारणाओं ने भी विवाह और परिवार के पारंपरिक अर्थ को काफी बदल दिया है.

अनाथ बच्चों को गोद लेने की सोच

देश में करोड़ों अनाथ बच्चे हैं, जिन की देखभाल कई सरकारी व गैरसरकारी संस्थाएं करती हैं. तो कुछ भारतीय कपल्स की सोच ऐसे बदल रही है कि अब वे खुद का बच्चा करने के बजाय अनाथ बच्चों को गोद लेना चाहते हैं ताकि उन बच्चों को एक परिवार मिल सके. वहीं कुछ कपल की प्लानिंग यह होती है कि वे एक बच्चा पैदा करते हैं और दूसरा गोद ले लेते हैं.

आखिर कुछ दंपती अपना बच्चा क्यों नहीं चाहते हैं? तो इस के पीछे आर्थिक और मानसिक कारण हैं.

आर्थिक दबाव: महंगाई, बच्चों की महंगी होती पढ़ाई, उन के स्वास्थ्य और भविष्य को ले कर चिंता, इन्हें बच्चा करने से रोकती है. कई दंपती बच्चे की जगह अपने कैरियर और आजादी को चुनते हैं. उन्हें लगता है कि हम खुद ही ठीक से संभल जाएं, वही बहुत है. खासकर महिलाएं अपनी पहचान, कैरियर और स्वतंत्रता को प्राथमिकता देती हैं. मातृत्व को एक जिम्मेदारी के रूप में देखती हैं. उन्हें लगता है कि मां बनते ही उन की मानसिक शांति और व्यक्तिगत आजादी छिन जाएगी क्योंकि बच्चे के साथ जिम्मेदारियां, समय की कमी, ट्रैवल, शौक, निजी जीवन प्रभावित होता है. ये समस्याएं अनाथ बच्चे को गोद लेने पर भी बरकरार रहती हैं.

पर्यावरण नहीं सुरक्षित: एक कपल जिन की शादी 2019 में हुई थी और दोनों दिल्ली में जौब करते हैं, का कहना है कि जौब की वजह से वे दिल्ली नहीं छोड़ सकते हैं. लेकिन दिल्ली की दमघोंटू हवा में सांस लेना उन के लिए मुश्किल हो रहा है. दोनों कई बीमारियों से घिर चुके हैं तो ऐसे में वे बच्चे को जन्म दे कर उसे प्रदूषण का शिकार नहीं बनना चाहते. दिल्ली की हवा इतनी ज्यादा जहरीली हो गई है कि एक बार सांस लेना 10 सिगरेट पीने के बराबर है. यही हाल देश के अन्य सभी बड़े शहरों का भी है.

अकेले ज्यादा खुश: ज्यादातर कपल यह मान रहे हैं कि उन्हें ज्यादा बड़ा परिवार नहीं चाहिए और न ही बच्चे की जिम्मेदारियां. इसलिए कई कपल अकेले रह कर घूमनेफिरने और अपने अनुसार जीवन जीने में विश्वास रखते हैं और अकेले ज्यादा खुश हैं.

कैरियर पर ज्यादा फोकस: कई कपल्स की यह सोच होती है कि आप चाहे नौकरी करें या बिजनैस या फिर अपना पैशन फौलो कर रहे हों, परिवार और बच्चा आप को सीमित कर देता है, जिस की वजह से हमारे जैसे यंग कपल्स बच्चा नहीं चाहते. कई कपल्स शादी से पहले खुल कर इस बात पर चर्चा करने लगे हैं कि शादी के बाद उन्हें बच्चा करना है या नहीं. अगर विचार मिलते हैं तभी जीवन में आगे के बारे में सोचते हैं.

चाइल्डहुड ट्रौमा, बच्चा न करने के पीछे यह भी एक कारण: जिन का बचपन किसी तरह से चाइल्ड ऐब्यूज में गुजरा हो, वे अकसर इस सदमे से बाहर नहीं निकल पाते हैं, इसलिए शादी के बाद बच्चा करने से डरते हैं. जिन्होंने बचपन में अपने मातापिता को लड़ते?ागड़ते देखा है, बड़ा होने पर उन के मन से वह घाव नहीं जाता. वे बच्चों को उस दर्द से बचाने के लिए बच्चा प्लान ही नहीं करते.

30 से पहले ही करवा लेती हैं नसबंदी: अब भारतीय महिलाएं भी चाइल्ड फ्री पौलिसी को अपनाने लगी हैं. भले ही इस के पीछे का कारण जो भी हो लेकिन स्टडी की मानें तो समय के साथ बच्चे पैदा करने का ट्रेंड हमेशा से बदलता आ रहा है.

गाइनेकोलौजिस्ट का कहना है कि भले ही आज बच्चा न करने का ट्रेंड बढ़ता जा रहा है लेकिन कहीं न कहीं बच्चा न पैदा करने से महिलाओं के स्वास्थ्य पर कई तरह से असर पड़ता है, खासकर उन की रिप्रोडक्टिव हैल्थ पर. डाक्टर का कहना है कि प्रैगनैंसी के समय शरीर में होने वाले बदलाव से स्तन सुरक्षित रहते हैं. प्रैगनैंसी के कारण महिला के रिप्रोडक्टिव और्गन जैसेकि यूटरस, ओवरी, फैलोपियन ट्यूब्स, सर्विक्स और वैजाइना कैंसर से काफी हद तक सेफ रहती है.

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में चाइल्डफ्री होना एक सामान्य बात हो जाएगी. जब लोग ज्यादा चाइल्डफ्री लोगों से मिलेंगे तो इस मिथक को खत्म करने में मदद मिलेगी कि वे स्वार्थी और सिर्फ अपने बारे में सोचने वाले लोग होते हैं.

हालांकि इस मामले में कितना बदलाव आएगा, यह बात उस जगह के मीडिया पर और वहां के राजनीतिक और धार्मिक परिवेश पर निर्भर करेगी.

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