Married Daughter : शादी के बाद एक लड़की की जिंदगी में बहुत कुछ बदल जाता है. नया घर, नए रिश्ते और नई जिम्मेदारियां. वह अपने पति और ससुराल के साथ जिंदगी बिताने लगती है, लेकिन उस के पीछे एक घर ऐसा भी होता है, जहां उस के मातापिता रहते हैं. खासकर जब वह उन की इकलौती संतान हो, तो शादी के बाद भी उन की चिंता उस के मन से कभी दूर नहीं होती.

बचपन से जिन मातापिता ने अपनी बेटी की हर खुशी का खयाल रखा, उस के भविष्य के लिए अपनी जरूरतों तक को पीछे रखा, उम्र बढ़ने पर अगर वही मातापिता अपनी बेटी को अपने पास देखना चाहें, तो इस में गलत क्या है?

बुढ़ापे का सहारा

मुश्किल तब शुरू होती है, जब बेटी के मातापिता चाहते हैं कि वह उन के घर के पास ही एक घर ले ले, ताकि जरूरत पड़ने पर वह उन के पास आ सकें. वे अपनी बेटी पर बोझ नहीं बनना चाहते, बस बुढ़ापे में उस के करीब रहना चाहते हैं.

लेकिन कई बार ससुराल में इस बात को आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता. सवाल उठते हैं कि शादी के बाद भी मायके की इतनी चिंता क्यों? अपने मातापिता के लिए अलग घर क्यों खरीदना है? अपनी जिम्मेदारियों से पहले उन्हें क्यों रखा जा रहा है?

लङकी क्या करे

ऐसे में लड़की करे तो क्या करे? एक तरफ वे मातापिता हैं, जिन्होंने उसे पालपोस कर बड़ा किया, दूसरी तरफ उस का अपना परिवार है, जिस के साथ उस ने जिंदगी बिताने का वादा किया है. वह किसी को दुख नहीं पहुंचाना चाहती, लेकिन सब को खुश रखने की कोशिश में खुद ही परेशान रहने लगती है.

कई बार उस के मन में यह सवाल भी आता है कि क्या इकलौती बेटी होना उस की गलती है? क्या उसे शादी ही नहीं करनी चाहिए थी, ताकि वह अपने मातापिता के साथ रह सके और उन की देखभाल कर सके?

सवाल यह भी है

लेकिन सवाल शादी करने या न करने का नहीं है. सवाल उस सोच का है, जिस में शादी के बाद बेटी से उम्मीद की जाती है कि वह अपने मातापिता की जिम्मेदारियों को पीछे छोड़ दे. अगर बेटा शादी के बाद अपने मातापिता की देखभाल कर सकता है, तो बेटी क्यों नहीं? क्या मातापिता के प्रति प्यार और जिम्मेदारी सिर्फ बेटों के हिस्से में आती है?

यह भी सच है कि घर खरीदने या आर्थिक फैसले लेने में पतिपत्नी दोनों की सहमति जरूरी है. लेकिन बातचीत से रास्ता निकालने के बजाय अगर बेटी को ही गलत ठहराया जाए, तो उस के मन में दुख और अकेलापन बढ़ने लगता है. वह अपने मातापिता के लिए कुछ करना चाहती है, लेकिन उसे लगता है कि ऐसा करने से कहीं उस का अपना घर न बिगड़ जाए.

समान अधिकार

असल में, इकलौती बेटी को किसी एक परिवार को चुनने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए. उसे अपने मातापिता की चिंता करने का भी अधिकार है और अपने वैवाहिक जीवन में खुश रहने का भी. जरूरत है कि शादी से पहले ही इन बातों पर खुल कर चर्चा हो, ताकि बाद में किसी को शिकायत न रहे.

मातापिता भी यह चाहते हैं कि उन की बेटी खुश रहे, लेकिन उम्र के उस पड़ाव पर जब उन्हें सहारे की जरूरत होती है, तब उस का साथ उन के लिए बहुत मायने रखता है. वे यह नहीं चाहते कि बेटी अपने पति से दूर हो जाएं. वे बस इतना चाहते हैं कि उन की बेटी उन से इतनी दूर न हो जाएं कि जरूरत पड़ने पर भी वे उसे बुलाने से पहले सौ बार सोचें.

शादी बाद मायका

आखिर शादी के बाद बेटी का मायका खत्म तो नहीं हो जाता. उस के मातापिता आज भी उस के अपने हैं और उन की चिंता करना उस का स्वाभाविक अधिकार है. समाज को यह समझना होगा कि बेटी की शादी का मतलब यह नहीं कि उस के मातापिता की जिम्मेदारी किसी और की हो गई या अब उन्हें अपनी बेटी से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए.

इकलौती बेटी होना कोई गुनाह नहीं है. उसे भी हक है कि वह अपने मातापिता का सहारा बने, अपने पति के साथ खुश रहे और बिना किसी अपराधबोध के अपनी जिंदगी जीए. उसे 2 घरों के बीच पिसने के बजाय दोनों घरों का प्यार और सहयोग मिलना चाहिए क्योंकि बेटी को शादी के बाद अपना घर जरूर मिलता है, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि उस के मातापिता का घर उस से छिन जाता है.

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