Late Parenthood : आज लड़कियां पढ़ रही हैं, नौकरी कर रही हैं और अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं. ऐसे में 35 या 40 साल के बाद मां बनना कोई अचरज की बात नहीं रही. औफिस में प्रमोशन, शादी का लेट होना और जिंदगी को थोड़ा सेटल करने की चाहत ने इस उम्र को आगे बढ़ा दिया है. आज हर 5 में से 1 महिला 35 के बाद मां बन रही है.
मगर इस बदलाव के साथ एक दूसरा सच भी है जो इंस्टाग्राम के खुशी भरे फोटो में नहीं दिखता. जब 40 साल की मां रात को तीसरी बार बच्चे को गोद में ले कर उठती है तो उस की कलाई में दर्द होने लगता है, कमर जवाब दे जाती है. जब पेरैंट टीचर मीटिंग में बाकी मांएं 30 की लगती हैं और आप 45 की तो मन में एक अजीब सा अकेलापन आता है.
ये वे प्रैक्टिकल बातें हैं जो डाक्टर की परची पर नहीं लिखी होतीं पर हर लेट मदर या फायर रोज महसूस करता है. इसलिए लेट मां बनने को सिर्फ मैडिकल रिस्क के नजरिए से देखना अधूरा है. असली चुनौती तो रोज की जिंदगी में है. बच्चे की स्पीड के साथ भागने में, उस की नई दुनिया को सम?ाने में और अपने बूढ़े होते शरीर और समाज के सवालों के बीच तालमेल बैठाने में.
शरीर और रोजमर्रा की दिक्कतें
बच्चे को लगातार गोद में लेने से हाथपैरों में दर्द: नवजात को दिन में 12 से 15 बार उठाना पड़ता है. 35 के बाद हड्डियों और नसों की ताकत कम होने लगती है. 35 के बाद कैल्सियम पहले ही कम होता है ऊपर से सारा बच्चे में जा रहा होता है. इसलिए कलाइयों, कंधों और कमर में बहुत जल्दी दर्द शुरू हो जाता है.
फर्श पर बैठ कर काम करने में तकलीफ: बच्चे की मालिश, उस के साथ खेलना, उसे सुलाना यह सब नीचे बैठ कर होता है. इस उम्र में ज्यादा देर नीचे बैठने के बाद उठने में परेशानी होती है और घुटनों में दर्द बढ़ जाता है.
नींद पूरी न होना: छोटा बच्चा रात में हर 2 घंटे में उठता है. कम उम्र में तो महिला रातभर जाग कर भी दिन में फुरती से काम कर सकती है, 2 घंटे सो कर भी जिम चली जाती है, मगर उम्र बढ़ने पर 6 घंटे सोने पर भी सिर फटता है क्योंकि इस उम्र में शरीर को रिकवरी के लिए ज्यादा नींद चाहिए होती है जो मिल नहीं पाती. इस से पूरा दिन थकान और चिड़चिड़ापन रहता है.
खुद की सेहत पर ध्यान न दे पाना:बच्चे के टीके और डाक्टर के चक्कर में मातापिता अपना बीपी, शुगर, थायराइड का चैकअप टाल देते हैं, जबकि इस उम्र में यह चैकअप हर 6 महीने में जरूरी होता है.
ऐनर्जी का फर्क: 3-4 साल का बच्चा बहुत दौड़ताभागता है. उस के साथ पार्क में भागना, उसे पकड़ना 40 साल के बाद उतना आसान नहीं रहता. जल्दी थकान हो जाती है.
सोच और पसंद में अंतर: जब बच्चा 10-12 साल का होगा तब आप 50 के आसपास होंगे. उस की भाषा, उस के गेम, उस का म्यूजिक आप को समझ नहीं आएगा और उसे लगेगा आप उस की दुनिया नहीं समझते.
स्कूल में अलग महसूस होना: पेरैंट्स मीटिंग में बाकी मातापिता आप से 10 साल छोटे होंगे. उन की बातें, उन का गु्रप अलग होगा. इस से कई बार बड़ी उम्र की मां दूसरी मांओं के बीच खुद को अलगथलग पाती है और उसे अकेलापन महसूस होता है.
बच्चे द्वारा टोका जाना: बच्चा कई बार अनजाने में कह देता है कि आप जल्दी थक जाती हैं या आप को नए जमाने की बातें नहीं पता. यह बात छोटी है पर मन पर गहरी लगती है.
टीनऐज में ज्यादा रोकटोक लगना: जब आप 55 की होंगी तो बच्चा 16 का होगा. उसे रात को 11 बजे तक दोस्तों के साथ रहना होगा और आप को डर लगेगा. आप रोकेंगी तो वह कहेगा कि आप तो डरती हो, आप तो बोरिंग हो. आप का प्यार उसे पाबंदी लगेगा.
टैक्नोलौजी का गैप: बच्चे एआई, नए ऐप्स और औनलाइन दुनिया में बड़े होंगे. इस तेज बदलाव के साथ चलना बड़ी उम्र के मातापिता के लिए मुश्किल होता है. बच्चा कहेगा कि मां चैटजीपीटी या क्लौड से कर लो. आप गूगल पर उंगली से टाइप कर रही होंगी.
बुजुर्गों और बच्चे दोनों की जिम्मेदारी एकसाथ: लेट बच्चा होने पर आप के मातापिता या सासससुर भी 65-70 साल के हो चुके होते हैं. आप को एकसाथ छोटे बच्चे और बुजुर्गों दोनों को संभालना पड़ता है.
पतिपत्नी के बीच समय की कमी: दोनों की उम्र ज्यादा, दोनों पर काम का दबाव और ऊपर से बच्चे की जिम्मेदारी. इस से आपस में बात करने और समय बिताने का मौका कम मिलता है.
समाज के सवाल और जजमैंट: लोग सवाल करते हैं कि इतनी लेट शादी क्यों? बच्चा कब? अब कैरियर कैसे होगा? नौकरी करती हैं तो भी सवाल और छोड़ दी तो भी सवाल.
बच्चे का अकेलापन: डाक्टर अकसर इस उम्र के बाद दूसरा बच्चा मना कर देते हैं. वैसे भी पहले बच्चे के बाद शरीर इतना थक चुका होता है और उम्र इतनी बढ़ चुकी होती है कि दूसरा बच्चा प्लान करना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में बच्चा अकेला बड़ा होता है और उसे भाईबहन की कमी महसूस होती है.
रिटायरमैंट और पढ़ाई का खर्च एकसाथ आना: जब आप रिटायर होंगे तब बच्चा कालेज में होगा. उस समय एकसाथ घर चलाना और लाखों की फीस देना बहुत बड़ा आर्थिक बो?ा बन जाता है.
अपने शौक और सामाजिक जीवन का खत्म होना: 35-40 तक आप के दोस्त, घूमनाफिरना, अपने शौक सब सैट हो चुका होता है. बच्चे के आने के बाद यह सब फिर से बंद हो जाता है.
इमरजैंसी में भागदौड़ में दिक्कत: रात के 2 बजे अगर बच्चा 102 बुखार में तप रहा हो तो 25 साल की मां उसे गोद में ले कर तुरंत भाग सकती है. मगर 45 साल की मां पहले घुटने पकड़ती है, फिर चश्मा ढूंढ़ती है, फिर पति को उठाती है. ऐसे में वे 10 मिनट बहुत भारी लगते हैं. मगर इस उम्र पर शारीरिक सक्रियता कम होना बहुत नौर्मल है.
बच्चे के बड़े होने पर खुद की उम्र का डर: बरात में नाचना, बच्चे के साथ ट्रिप पर जाना, उस के बच्चों को गोद में खिलाना, इन सब सपनों में उम्र और सेहत आड़े आती है.
उम्र के फासले का बच्चे पर असर, फाइनैंस और बौंडिंग: ‘पीएलओएस वन’ में छपी रिसर्च कहती है, लेट शादी/बच्चा करने वाले पेरैंट्स के पास कैरियर तो अच्छा होता है पर बच्चे के लिए समय और ऐनर्जी कम होती है, जिस से बच्चे के काग्निटिव डैवलपमैंट पर असर पड़ता है.
पेरैंट्स के मन में हमेशा एक डर रहता है कि जब बच्चा 20-25 साल का होगा तब हम 60-65 के होंगे. क्या हम तब तक उस के साथ मजबूती से खड़े रह पाएंगे?
लेट मातापिता बनना गलत नहीं है लेकिन इस के लिए पहले से शारीरिक, मानसिक और आर्थिक तैयारी बहुत जरूरी है.
समय पर डाक्टर से सलाह, मदद लेना और अपनी सेहत का ध्यान रखना ही इस का सब से सही हल है.
