Best Kahaniyan : घड़ी की सूई जैसे ही 7 और 6 के बीच आई, आकृति ने स्पोर्ट्स शू पहने और घूमने निकल गई. नीचे पहुंचते ही 5 मिनट के अंदर उस ने अपनी जरूरी फोन काल्स निबटानी शुरू कर दीं. 8 बजते ही वह ऊपर आई, हाथमुंह धो कर दूध बनाया और पूरे परिवार को दिया. फिर 9 बजतेबजते आकृति अपना लैपटौप खोल कर काम में डूब गई. रात के 11 बजे सोने से पहले आकृति ने बच्चों के कमरे में जा कर चैक किया कि वे सो गए हैं या नहीं.
जैसे ही आकृति अंदर घुसी तो देखा कि लाइट जली हुई थी. दीया कोरियन ड्रामों में व्यस्त थी और बार्बी फोन पर. आकृति गुस्से में बोली, ‘‘कल क्या स्कूल नहीं जाना है?’’
दीया बोली, ‘‘मम्मी प्लीज अभी 1 घंटे में सो जाउंगी.’’
बार्बी बोली, ‘‘ममा फ्रेंड का बर्थडे हैं,
12 बजे के बाद सो जाएगी.’’
आकृति भुनभुनाते हुए अपने बैडरूम में आई तो देखा विपुल उसी की प्रतीक्षा कर रहा था. विपुल ने जैसे ही प्रेम क्रीड़ा की शुरुआत करी, अचानक आकृति उठ खड़ी हुई और बोली, ‘‘कल साबूदाने की खिचड़ी बनेगी नाश्ते में. मैं भूल गई हूं भिगोना. एक मिनट रुको.’’
विपुल गुस्से में मुंह फेर कर लेट गया. आकृति वापस आ कर विपुल को मनाने की कोशिश करने लगी और बोली, ‘‘विपुल कल नाश्ते में यही लिखा हुआ था टाइमटेबल में… अरे 10 बज गए, मेरा टाइम हो गया सोने का.’’
आकृति सो गई और विपुल पूरी रात करवट बदलता रहा. वह आकृति के टाइमटेबल से थक गया था. उसे लगता था वह अपनी पत्नी के साथ नहीं किसी रोबोट के साथ रह रहा है.
आकृति के अंदर कोई कमी भी नहीं थी पर वह परफैक्शन के चक्कर मे इतनी ज्यादा टाइमटेबल में बंध चुकी थी कि विपुल को आकृति का साथ एक गैजेट जैसा लगने लगा था. औरों की नजरों में आकृति एक परफैक्ट वाइफ और मम्मी थी पर आकृति को खुद ही नहीं पता था कि उस का यह टाइम में बंधा हुआ लाइफस्टाइल उस के पति और बच्चों को नहीं भाता है. पर आकृति को लगता था कि अगर वह थोड़ी सी भी ढील दी देगी तो पूरे घर का डिसिप्लिन खराब हो जाएगा.
आकृति को लगने लगा था कि उस की वैल्यू घर और दफ्तर में उस के काम के कारण है. आकृति जीतोड़ मेहनत करती थी अपने हर काम को परफैक्शन के साथ करने की.
विपुल 45 वर्ष की उम्र में भी 30 का लगता था, यह आकृति की मेहनत का ही नतीजा था. परंतु आकृति यह भूल गई थी कि जीवन का सहज रस तो खुल कर जीने में हैं. अगर उस के रूटीन में 1 मिनट भी इधरउधर हो जाता था तो बेचैन हो उठती थी. इस चक्कर मे कभीकभी वह शालीनता की सीमा भी पार कर देती थी.
अभी पिछले हफ्ते की ही बात थी. विपुल ने अपने 2 दोस्त सपरिवार डिनर पर
बुलाए थे. दोनों दोस्त और उन के परिवार आकृति के चमकते हुए घर से बेहद प्रभावित थे. आकृति ने आते ही जूस दिया, फिर नाश्ता और चाय प्रस्तुत करी. उस के कुछ देर बाद सूप आ गया परंतु आकृति 2 मिनट के लिए भी मेहमानों के साथ नही बैठ रही थी.
विपुल के एक दोस्त ने तो कहा भी ‘‘आकृति भाभी आप थोड़ी देर बैठ जाइए, डिनर तो हम लोग रात के 10 बजे करेंगे.’’
यह बात सुनते ही आकृति बेचैन हो उठी. वह कैसे अपने टाइमटेबल में कोई रुकावट बरदाश्त कर सकती थी.
उस ने दोस्त से तो कुछ नहीं कहा परंतु ठीक 7 बजे डिनर लगा दिया और फिर मुसकराते हुए बोली, ‘‘भाई साहब, मुझे और मेरे परिवार को जल्दी खाने की आदत है, इसलिए आज आप हमारे हिसाब से खा लीजिए.’’
बड़ी अनिच्छा से मेहमान खाने की मेज पर बैठे परंतु उन्होंने खाने को बस थोड़ा से चखा ही. पूरा समय आकृति जल्दी खाने और सोने का गुणगान करती रही. खाने के पश्चात उस ने अपने दोनों बच्चों को सोने भेज दिया. विपुल के दोस्त के बच्चे ठगे से खड़े रहे.
यही नहीं आकृति खाने के तुरंत बाद रसोई समेटने लगी. उस ने इतना भी नहीं सोचा कि दोनों दोस्तों की पत्नियां आकृति के व्यवहार से बेहद आहत होंगी.
जातेजाते आखिरकार एक दोस्त की पत्नी ने विपुल को बोल ही दिया ‘‘भाई साहब अगली बार आप आकृतिजी का टाइमटेबल भेज दीजिए, हम उसी के अनुसार आ जाएंगे. आज तो ऐसा लग रहा था मानो हम मिलने नहीं बस खाना खाने आए थे.’’
मेहमानों के जाते ही आकृति और विपुल में कहासुनी हो गई. विपुल ने कहा, ‘‘तुम ने आज मेरे दोस्तों का अपमान किया है. क्या आसमान फट जाता अगर आज हम डिनर थोड़ा लेट कर लेते?’’
आकृति गुस्से में बोली, ‘‘ये सब मैं तुम्हारे लिए करती हूं और बात रूटीन की होती है, जल्दी या देर से खाने की नहीं.’’
आकृति को समझ1 नहीं आता था कि क्यों उस के बच्चे और पति उस की खिल्ली उड़ाते हैं.
जैसे ही छुट्टी का दिन होता दीया और बार्बी दोनों मौसी के घर चली जातीं और विपुल कार उठा कर न जाने कहांकहां भटकता रहता. आकृति कितनी कोशिश करती थी अपने परिवार के करीब जाने की पर दीया, बार्बी और विपुल आकृति से दूर भागते थे.
आकृति बहुत कोशिश करती कि रविवार को थोड़ा रिलैक्स करे पर उस
के टाइमटेबल में कहीं भी इस के लिए जगह नहीं थी. आकृति की धीरेधीरे ऊर्जा और रचनात्मकता समाप्त होती जा रही थी. उसे अब हर नया सवेरा नई उमंग के साथ नहीं बल्कि एक बोरियत के साथ आता था.
कहीं बाहर का प्रोगाम बनता तो विपुल पहले ही बोल देता, ‘‘आकृति, तुम चलोगी क्या? क्या तुम्हारे टाइमटेबल में जगह है?’’
दीया और बार्बी मुंह बनाते हुए बोलतीं, ‘‘पापा, मम्मी को रहने दो, मम्मी बिलकुल मजा नहीं करतीं और न ही करने देतीं.’’
आकृति खिसिया जाती. अपने ही परिवार में वह अकेली हो गई थी. वह जिंदगी जी तो रही थी पर ऐसी जिंदगी जिस में रस नही था.
एक रात अचानक आकृति की आंख खुली तो देखा विपुल बिस्तर से गायब था. वह परेशान सी बाहर निकली तो देखा विपुल किसी से मोबाइल पर बड़ी आत्मीयता से बात कर रहा था. आकृति ने जैसे ही विपुल को आवाज दी, उस का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया.
आकृति विपुल से गुस्से में बोली, ‘‘तभी सारा दिन मोबाइल में घुसे रहते हो.’’
विपुल बेशर्मी से बोला, ‘‘पहले खुद के अंदर झांको. मैं इंसान हूं, मेरे अंदर भावनाएं हैं. तुम्हारी तरह मैं रोबोट नहीं हूं जो घड़ी की सुइयों से बंध कर जिंदगी बिता दूं.’’
‘‘तुम तो रात के 10 बजे सो जाती हो, किस के साथ बाते करूं, किस से अपना तनाव बांटूं?’’
आकृति बोली, ‘‘अपने गलत काम को बड़े अच्छे से जस्टिफाई कर रहे हो.’’
विपुल बिना कुछ कहे पीठ फेर कर सो गया. पर उस पूरी रात आकृति को नींद नहीं आई. कब वह अपनों के ही बीच अकेली हो गई, उसे पता ही नहीं चला.
अगले दिन हमेशा की तरह आकृति सुबह ही टाइमटेबल के अनुसार उठ गई. नाश्ता बना कर, सही टाइम पर तैयार हो कर अपने दफ्तर चली गई. दफ्तर में जैसे ही आकृति पहुंची, उस ने देखा जगहजगह ग्रुप बना कर लोग गौसिप में मस्त हैं. बस यही तो प्रौब्लम है लोगों की. फ्री की सैलरी चाहिए. काम की तो फिक्र ही नहीं.
आकृति को देखते ही सब इधरउधर चले गए.
आकृति जैसे ही अपनी टेबल पर बैठी
तो उस की सहकर्मी और अच्छी सहेली श्वेता बोली, ‘‘यह टाइमटेबल के चेहरे पर 12 क्यों बज रहे हैं?’’
आकृति फीकी हंसी हंसते हुए बोली, ‘‘यार श्वेता क्या मैं इतनी बुरी हूं कि कोई भी मेरे करीब नहीं आना चाहता है? क्या समय पर काम करना कोई अवगुण है?’’
श्वेता बोली, ‘‘नहीं समय का पाबंद होना बुरा नहीं है पर अपनी जिंदगी को टाइमटेबल के सांचे में ढाल लेना गलत है. ‘‘कभी तो खुद को थोड़ा सा ढीला छोड़ दो, खुल कर हंसो, खाओ. जिंदगी को अगर खुल कर जीओगी तो खुद भी खुश रहोगी और दूसरे भी खुश रहेंगे.’’
आकृति सोच में पड़ गई कि वह तो ये सब अपने और अपने परिवार की भलाई के लिए ही करती है.
शाम होतेहोते मानसिक तनाव और थकान के कारण आकृति का शरीर निढाल पड़ गया था. परंतु टाइमटेबल के हिसाब से ही उस ने दाल और सब्जी बनाई.
रातभर आकृति का शरीर बुखार में तपता रहा. परंतु सुबह 5 बजे उठने वाली आकृति जब 7 बजे तक भी न उठी तो विपुल एकाएक हड़बड़ाहट के साथ उठा. आकृति को जैसे ही उस ने हाथ लगाया तो घबरा उठा. आकृति का शरीर तप रहा था.
विपुल ने फौरन आकृति को एक बिस्कुट खिलाया और बुखार कम करने की दवा दी. आकृति जैसे ही उठने की कोशिश करने लगी एकाएक कमजोरी के कारण गिर पड़ी. दीया और बार्बी भी आंखें मलते हुए आकृति के कमरे में आ गए.
विपुल बोला, ‘‘आज सब छुट्टी कर लेते हैं. मैं पहले नाश्ते का इंतजाम करता हूं और फिर डाक्टर के पास चलते हैं.’’
डाक्टर ने आकृति का चैकअप करने के बाद विपुल से पूछा, ‘‘आकृतिजी ने कब से आराम नहीं किया है?’’
विपुल बोला, ‘‘मैं समझ नहीं डाक्टर?’’
डाक्टर बोले, ‘‘आप की पत्नी की बीमारी मानसिक है. ये मानसिक रूप से इतनी अधिक थकी हुई हैं कि इन के शरीर ने जवाब दे दिया है. मेरी सलाह माने इन्हें किसी अच्छे मनोचिकित्सक के पास ले जाएं.’’
घर आ कर विपुल ने आकृति से कहा, ‘‘आकृति तुम आज बस आराम करो, आज घर की जिम्मेदारी मेरी है.’’
मगर आकृति को हर चीज टाइम से और परफैक्शन के साथ करने की आदत थी. बुखार उतरते ही वह फिर से काम में जुट गई. विपुल और बच्चों के किए गए काम को उस ने फिर से दोबारा किया.
इस बात से चिढ़ कर दोनों बेटियां अपने कमरे में बंद हो गई थीं. विपुल भी बिना कुछ कहे कार उठा कर निकल गया.
अगले दिन विपुल और आकृति मनोचिकित्सक के पास गए.
मनोचिकित्सक ने आकृति से कुछ प्रश्न पूछे और उस के बाद आकृति को अगले दिन अकेले आने को कहा. आकृति का हफ्ते में 2 दिन सैशन होता.
आकृति की मनोचिकित्सक का नाम दिव्या था. दिव्या आकृति को सम?ाने की कोशिश करती रही और 4 सैशन के बाद दिव्या को आकृति की प्रौब्लम सम?ा आ गई. आकृति को हर काम को परफैक्शन के साथ करने की ऐंग्जाइटी रहती थी.
दिव्या ने धीरेधीरे आकृति को सम?ाया कि अपनेआप को थोड़ा रिलैक्स करने की इजाजत दो. जरूरी नहीं कि हर काम परफैक्शन से हो क्योंकि हर इंसान की एक लिमिट होती है. सारा काम खुद करने के बजाय डिवाइड करना सीखो. जिंदगी का मतलब बस काम नहीं है.’’
आकृति ने दिव्या के हिसाब से खुद को बदलने की कोशिश तो करी मगर फैला हुआ घर, लटकते जाले आदि आकृति को चिढ़ा रहे थे. उसे लगा गलत वह नहीं बल्कि ये लोग हैं जो समय की अहमियत को नहीं सम?ाते हैं.
आकृति फिर से टाइमटेबल में बंध गई. उसे लोगों का बिना किसी प्लानिंग के जीना बहुत अधिक खटकता था. आकृति चाह कर भी खुद को बदल नहीं पा रही थी क्योंकि उसे लग ही नहीं रहा था कि उसे बदलने की जरूरत भी है.
विपुल ने काउंसलर दिव्या के कहे अनुसार आकृति से चिढ़ने के बजाय उसे सम?ाना शुरू कर दिया. मगर आकृति विपुल की हर बात का मजाक उड़ाती. आकृति के हिसाब से विपुल इतना सहज इसलिए है क्योंकि आकृति इतनी डिसिप्लिन्ड है. आकृति के हिसाब से सब लोग आलसी और कामचोर हैं.
आकृति का परिवार अब उस की बातों पर अधिक ध्यान नहीं देता था. उसे सम?ा आ गया था कि आकृति के साथ सिर फोड़ने से कोई फायदा नहीं है. वह खुद ही अपनी मदद नहीं करना चाहती है. आकृति अपनेआप को जरा भी बदलना नहीं चाहती थी बल्कि वह सब लोगों को खुद के अनुसार बदलना चाहती थी.
आज बार्बी की फ्रैंड जब घर आई तो आकृति ने तोलती निगाहों से बार्बी की फ्रैंड से कहा, ‘‘अभी तो बार्बी और दीया का पढ़ने का समय है.’’
बार्बी की फ्रैंड को बहुत बुरा लगा और वह उलटे पैर लौट गई. अगले दिन स्कूल में बार्बी का बहुत मजाक बना कि बार्बी को घर में सांस भी टाइमटेबल के हिसाब से लेनी होती है.
घर आ कर बार्बी बहुत रोई और उस ने साफसाफ कह दिया कि अब वह कभी
किसी फ्रैंड को घर नहीं बुलाएगी.
‘‘पापा, अब मुझे किसी फ्रैंड के घर आने या जाने पर कोई नहीं रोकेगा.’’
विपुल बोला, ‘‘बेटा ठीक है, यह घर तो घर नहीं जेल ही है और मुझे तो उम्रकैद की सजा मिली हुई है.’’
ऐसे ही आकृति हर रोज अपनी डायरी में अपना टाइमटेबल लिखती और अगर किसी काम को करने में चूक जाती तो उस की रात बेचैनी में बीत जाती. फिर अगले दिन आकृति सुबहसवेरे ही उठ जाती और काम में जुट जाती. जब तक आकृति का काम पूरा नहीं होता तब तक उसे चैन नहीं आता. चाहे इस से पूरे घर की नींद खराब हो.
आज आकृति जब दफ्तर के बाद घर जा रही थी तो उसे लगा कि वे बच्चों के लिए चाइनीज रेस्तरां से खाना ले चले. और्डर में थोड़ी देर थी इसलिए आकृति अंदर बैठ गई तभी उस ने सामने वाली सीट पर देखा कि विपुल और उस के साथ एक महिला बैठी है. उन के बैठने के ढंग से लग रहा था कि वे दोनों काफी करीब हैं. इस से पहले आकृति कुछ सोचती उस का पार्सल आ गया. आकृति ने घड़ी की तरफ देखा वह आलरैडी आधा घंटा लेट थी.
घर आ कर आकृति ने जल्दीजल्दी सारे काम निबटाए. आज हर हाल में आकृति को विपुल से बात करनी ही है. मगर विपुल के आने का टाइम आकृति के टाइमटेबल में फिट नहीं बैठा था. जब तक विपुल घर आया, आकृति सो चुकी थी.
सुबह आकृति फिर से अपने टाइमटेबल के अनुसार काम में लग गई थी. शाम को आकृति ने विपुल से इस बारे में बात करनी चाही तो विपुल मजाकिया लहजे में बोला, ‘‘अरे 8 बज गए हैं, तुम्हारे घूमने का समय हो गया है.’’
आकृति नीचे तो चली गई मगर उस का मन भटकता रहा. वह विपुल, दीया और बार्बी से खुल कर बात करना चाहती थी मगर उस का पूरा परिवार एक खोल में सिमट गया था.
उधर आकृति के परिवार ने भी उस के टाइमटेबल से शिकायत करनी छोड़ दी थी. सब ने अपने लिए एक नई राह ढूंढ़ ली थी. एक अजीब से द्वंद्व में आकृति फंस कर रह गई थी. न वह खुद के साथ चैन से रह पा रही थी और न ही अपने परिवार से बात कर पा रही थी.
हर साल की तरह विपुल ने अपना और आकृति का मैडिकल टैस्ट कराया. आकृति की सारी रिपोर्ट्स ऊपर, नीचे थी. हाई कोलैस्ट्रौल और हाई शुगर के अलावा किडनी और लिवर की रिपोर्ट भी ठीक नहीं थी.
आकृति को समझ नहीं आ रहा था कि कैसे इतनी सिस्टेमैटिक जिंदगी जीने के बावजूद उस का स्वास्थ्य लगातार खराब हो रहा है.
रिपोर्ट देखने के बाद विपुल ने आकृति को रिपोर्ट पकड़ाते हुए व्यंग्य से कहा, ‘‘आकृति अपने टाइमटेबल में अपने लिए और हमारे रिश्ते के लिए भी एक पीरियड एडजस्ट कर लो. हो सकता है जिंदगी के समीकरण थोड़े बेहतर हो जाएं.’’
आकृति की मैडिकल रिपोर्ट के पन्ने बिस्तर पर चारों तरफ बिखर गए. आकृति को ऐसा लगा मानो उस का टाइमटेबल ही तितरबितर हो गया हो.
