Child Mental Health : शिव और रुद्र दोनों जुड़वे बच्चे है, शिव उम्र के हिसाब से समय पर बोलना शुरू कर दिया, लेकिन रुद्र एक दो शब्द के अलावा पूरे वाक्य नहीं बोल पाता, वह पेरेंट्स के कहने पर केवल उसे किसी तरह आवाज से दोहरा लेता है. इतना ही नहीं, कुछ भी उसे लेने की इच्छा होने पर वह सिर्फ रोता है और अपना सिर पटकता है. पहले तो उसके पेरेंट्स इस बात को मान नहीं पा रहे थे कि उन्हे डॉक्टर के पास जाना है, लेकिन स्कूल के टीचर के कहने पर उन्होंने डॉक्टर से संपर्क किया, जहां उन्हे स्पीच थिरेपी दी गई है और उसकी भाषा में थोड़ा परिवर्तन आया है.
ये सही है कि बच्चे की ज़िंदगी के शुरुआती 5 साल उसके दिमाग, भावनाओं, सामाजिक तालमेल और भाषा के तेज़ी से विकास का समय होता हैं. इस उम्र में बच्चे अपनी भावनाओं को समझना, अपनी ज़रूरतें बताना और अपने बर्ताव को संभालना सीख रहे होते हैं. इसीलिए उनका चिड़चिड़ा होना, बार-बार रोना, ज़िद करना, गुस्सा दिखाना या नखरे करना उनके बड़े होने का एक सामान्य हिस्सा हो सकता है, लेकिन जब ऐसा बर्ताव बहुत ज़्यादा होने लगे, उग्र रूप लेने लगे, लगातार जारी रहे या बच्चे के विकास में रुकावट बनने लगे, तो इस पर खास ध्यान देने की ज़रूरत होती है.
इस बारें में मुंबई की कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल के निओनेटल, पीडियाट्रिक और कार्डियक इन्टेंसिविस्ट, कंसल्टेंट डॉ प्रीथा जोशी कहती है कि भाषा और भावनाओं का विकास एक दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ होता है. जब एक बच्चा यह नहीं बता पाता कि वह क्या चाहता है, कैसा महसूस कर रहा है या उसे किस चीज़ की ज़रूरत है, तो वह परेशान हो जाता है, ऐसे में वह रोकर, चिल्लाकर या आक्रामक बर्ताव करके अपनी बात कहने की कोशिश करता है. इसीलिए माता-पिता को न केवल इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि बच्चा कितना बोलता है, बल्कि इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि क्या वह छोटी-छोटी बातें समझ पाता है, इशारे करता है, चीज़ों की तरफ उंगली उठाता है और अपनी ज़रूरतें समझा पाता है आदि. कुछ खास कमी कई इस उम्र में बच्चों में देखी जा सकती है, जिसका निवारण शुरू में करवा लेना चाहिए, ताकि समय रहते इसे ठीक किया जा सकें.
जिद्दीपन
छोटे बच्चों में अक्सर अपनी हताशा, निराशा या गुस्से को ज़ाहिर करने के लिए ज़रूरी मानसिक समझ और शब्द नहीं होते. नतीजा यह होता है कि वे रोने लगते हैं, चिल्लाते हैं, चीज़ें फेंकते हैं, दूसरों को मारते हैं या फिर अपना सिर तक पटकने लगते हैं. कभी-कभार ऐसा होना, खासकर दो-तीन साल की उम्र में उनके सामान्य विकास का हिस्सा हो सकता है, लेकिन खुद को चोट पहुंचाने वाला बर्ताव, बहुत ज़्यादा आक्रामक होना या ऐसे नखरे, जिन्हें शांत करना बहुत मुश्किल हो जाए, उन्हें महज़ “ज़िद्दीपन या बुरा बर्ताव” मानकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए. ये लक्षण कभी-कभी बच्चे में भावनाओं को संभालने की मुश्किल, बातचीत करने में आ रही परेशानी या किसी अन्य अंदरूनी मानसिक विकास से जुड़ी चिंता का संकेत हो सकते हैं.
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर
यह एक न्यूरोलॉजिकल विकास से जुड़ा विकार है. इनमें शामिल हैं, नज़रें मिलाने में कतराना, नाम पुकारने पर भी कोई जवाब न देना, दूसरों के साथ मेलजोल बढ़ाने में कम दिलचस्पी लेना, अपनी काल्पनिक दुनिया में न खेलना जैसे खिलौनों से डॉक्टर-मरीज या घर-घर का खेल, माता-पिता के साथ किसी चीज़ पर मिलकर ध्यान न दे पाना, एक ही हरकत को बार-बार दोहराना या अपनी उम्र के हिसाब से बातचीत न कर पाना. सबसे ज़रूरी बात, अगर बच्चा पहले से सीखी हुई कोई आदत या हुनर अचानक भूलने लगे, तो इसे बहुत गंभीरता से लें और तुरंत डॉक्टर से जांच करवाएं.
ध्यान का अभाव
इस स्थिति में बच्चे का ध्यान बहुत जल्दी भटकता है, वह एक जगह शांत नहीं बैठ पाता और ज़रूरत से ज्यादा हाईपरऐक्टिव या इम्पल्सिव व्यवहार करता है. हालांकि कई बच्चे के विकास की रफ्तार थोड़ी अलग होती है, फिर भी माता-पिता को उनके विकास के मुख्य पड़ावों की जानकारी होनी चाहिए.
• आमतौर पर लगभग 1 साल की उम्र तक बच्चे इशारे करना और मतलब वाले शब्द या आवाज़ें निकालना शुरू कर देते हैं.
• 2 साल की उम्र आते-आते, कई बच्चे दो शब्दों को जोड़कर बोलना और छोटी-मोटी बातें समझना सीख जाते हैं.
• 3 साल की उम्र तक, उनकी बोली साफ़ होने लगती है और वे छोटी-सी बातचीत में शामिल हो सकते हैं, लेकिन अगर बच्चा भाषा समझने या बोलने में लगातार परेशानी का सामना कर रहा हो, सीखी हुई बातें भूलने लगा हो या अपनी उम्र के बाकी बच्चों से बहुत पीछे हो, तो इस बारे में पीडियाट्रिशियन से ज़रूर सलाह लेनी चाहिए.
डॉ. प्रीथा आगे कहती है कि बोलने की देरी, सीखी हुई आदतों को भूलना, बातचीत करने में गंभीर परेशानी, बार-बार खुद को चोट पहुंचाना, बहुत ज़्यादा गुस्सा या आक्रामकता, दूसरों से मेलजोल न रख पाना, नाम पुकारने पर बहुत कम ध्यान देना या उसके कुल मिलाकर विकास से जुड़ी कोई भी चिंता पेरेंट्स को बच्चे में लगातार दिखाई देती है, तो उन्हें तुरंत किसी पीडियाट्रिशियन या बच्चों के विकास के डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. ज़रूरत पड़ने पर बच्चों के मनोवैज्ञानिक या न्यूरोलॉजिस्ट की मदद भी ली जा सकती है. डॉक्टर से जांच कराने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि बच्चे को कोई बीमारी या समस्या ही है, बल्कि यह बच्चे की ज़रूरतों को समझने और उसे सही समय पर सही मदद देने की दिशा में एक बहुत ज़रूरी कदम है.
ऐंगज़ाइटी डिसॉर्डर
इस उम्र में बच्चों को अत्यधिक डर, माता-पिता से अलग होने का भारी तनाव या किसी विशेष चीज़ या स्थिति से असहनीय घबराहट हो सकती है. इसमें वे कई प्रकार के टेंट्रम का सहारा लेते है. आमतौर पर बच्चों का सामान्य टेंट्रम होता है, जिसे दुलार या शांत होने का समय देने पर वे धीरे-धीरे मान जाते हैं, लेकिन पेरेंट्स को तब ज़्यादा सतर्क हो जाना चाहिए, जब ये टेंट्रम बहुत ज़्यादा हों, बहुत लंबे समय तक चलें, स्थिति के मुकाबले बहुत ज्यादा हों, खुद को नुकसान पहुँचाने या आक्रामकता का कारण बनें या फिर बच्चे के खाने, सोने, खेलने और सामाजिक मेलजोल को गंभीर रूप से प्रभावित करें.
इमोशनल या रिलेशनशिप डिसॉर्डर
जब बच्चा गुस्से या अधिक रोने का सहारा लेता हो, तब वह लंबी-चौड़ी बातों को समझने की स्थिति में नहीं होता. इसलिए जब वह पूरी तरह शांत हो जाए, तब माता-पिता को उसकी भावनाओं को समझना चाहिए, एक सीधी और साफ़ सीमा तय करनी चाहिए और उसे अपनी बात कहने का दूसरा तरीका सिखाना चाहिए, जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना, इशारों से समझाना या मदद मांगना. बहुत ज़्यादा टेंट्रम अगर वह दिखा रहा हो या आक्रामक बर्ताव कर रहा हो, तो सबसे पहले उसकी सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए, ऐसे समय में माता-पिता को खुद शांत रहना चाहिए, आस-पास से ऐसी चीज़ें हटा देनी चाहिए जिससे बच्चे को चोट लग सकती हो और उसे मारने, चिल्लाने या डराने-धमकाने से पूरी तरह बचना चाहिए.
ऑपोजिशनल डिफिएंट डिसऑर्डर
इसमें बच्चा बार-बार जिद्द करने के साथ – साथ बहुत ज्यादा गुस्सा दिखाता है. यह अधिकतर देखभाल करने वालों के प्रति आक्रामक या विद्रोही रवैया होता है. इसकी वजह नींद पूरी न होना और सोने का कोई तय समय न होना भी उन्हे चिड़चिड़ा और भावुक बना सकता है. साथ ही मोबाइल या टीवी स्क्रीन के सामने बहुत ज़्यादा समय बिताने से बच्चों को आपस में बातचीत करने, खुलकर खेलने और अपनी बात कहने के मौके कम मिलते हैं. ऐसे में सही दिनचर्या बनाए रखना, भरपूर नींद, खेल-कूद और पेरेंट्स के साथ नियमित बातचीत बच्चे के सही मानसिक और भावनात्मक विकास में बहुत जरूरी होता है.
इस प्रकार माता-पिता को इस बात का इंतज़ार करने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है कि बच्चा बड़ा होकर खुद इन परेशानियों से बाहर निकल जाएगा. बोलने, व्यवहार, भावनाओं या मानसिक विकास से जुड़ी समस्याओं की शुरुआती पहचान से सही समय पर इसे ठीक किया जा सकता है, क्योंकि इस उम्र में बच्चों का दिमाग बहुत तेज़ी से चीज़ों को ग्रहण करता है. परेशानी के हिसाब से बच्चे को स्पीच और लैंग्वेज थेरेपी, व्यावहारिक सुधार के तरीके, ऑक्युपेशनल थेरेपी, मनोवैज्ञानिक मदद या सही मानसिक विकास के लिए डॉक्टर का सहारा लेने की जरूरत होती है, ताकि आपका बच्चा बड़े होकर एक खुशहाल जिंदगी जी सकें.
