Salary Management : दिल्ली के 40 साल के प्रखर की टेक-होम सैलरी 80 हजार रुपये है. घर की ईएमआई 35  हजार रुपये और बच्चों की फीस, राशन, बिजली-पानी व आने-जाने जैसे ज़रूरी खर्च करीब 25 हजार रुपये हैं. इसके बाद मेडिकल इंश्योरेंस, मोबाइल, ओटीटी, छोटी-मोटी शॉपिंग, वीकेंड आउटिंग, ऑनलाइन खाना और ना जाने कितने खर्च महीना पूरा होने से पहले ही उनका अकॉउंट खाली कर देते है. हर महीने बचत करने का उनका प्लान बस प्लान ही रह जाता है उल्टा अगर कोई बड़ा खर्चा अचानक से आ जाएँ तो उन्हें उधार लेना पड़ता है.

दरअसल, गलती यह है कि सैलरी आते ही उन्होंने पूरे 80 हजार रुपये को खर्च के लिए उपलब्ध मान लिया, जबकि उसका एक हिस्सा पहले ही बचत, सुरक्षा और आने वाले खर्चों के लिए तय होना चाहिए था. ऐसा सिर्फ प्रखर के साथ ही नहीं हो रहा बल्कि हम में से बहुत से लोग है जो इस तरह की समस्या से जूझ रहें है.

बचत करने का तरीका गलत है

दरअसल, हम में से अधिकतर लोग यही सोचते है कि सारे खर्चें पूरे होने के बाद जो अमाउंट बचेगा उसकी सेविंग करेंगे लेकिन सच यह है कि घर के खर्चें कभी पूरे ही नहीं होते और सेविंग लायक अमाउंट बचता ही नहीं है.

इसका सही तरीका है कि जितना सेव करना है उसे पहले ही अलग निकाले और बाकी जो बचें उसमें अपने महीने के खर्च उसी हिसाब से मैनेज करें जितना पैसा है. इससे आपको जो है उसमें ही खर्चा करने की आदत हो जाएगी और सेविंग भी ठीक से होगी.

‘पहले बचाएं,  फिर खर्च’ करें

अगर आप भी उन लोगों में से है जो महीने का पूरा खर्च कर लेने के बाद जो महीने के आखिर में जो बचता है उसे अपनी सेविंग समझते है तो आप यहाँ पूरी तरह से गलत है. सैलरी मिलते ही सबसे पहले अपनी बचत और निवेश (SIP या RD) की राशि को अलग कर लें. अब जो पैसे बचेंगे, आपको उसी में पूरे महीने का घर चलाना होगा. यही सही तरीका है.

अपनी इनकम और खर्च का पता लगाएं

इनकम और खर्च में बैलेंस जरूरी है. इसके लिए आप डायरी बना सकते हैं, जिसमें सारे खर्च का रिकॉर्ड रख सकें.

हर महीने होने वाले खर्चे

इनकम का सबसे ज्यादा हिस्सा महीने के होने वाले खर्चों में लगता है. इसलिए हमें महीने के होने वाले खर्चे का हिसाब भी अलग-अलग रखना चाहिए.

घरेलु खर्च

मकान का किराया, राशन, बिजली पानी का बिल, फ़ोन, मोबाइल, इंटरनेट का बिल.

ट्रैवलिंग का खर्च

इसमें हर रोज ऑफिस आने जाने के खर्च के साथ हर हफ्ते घूमने जाने पर होने  भी शामिल है.

जो खर्चे चल रहें है

बच्चों के स्कूल, कॉलेज, टूशन,इंशोरेंस पॉलिसी, शॉपिंग, गिफ्ट्स आदि.

50-30-20 का नियम अपनाएँ

  1. 50% –  ये वे खर्च हैं जिनके बिना रोजमर्रा का जीवन चलाना संभव नहीं है.

जैसे कि मकान का किराया, होम लोन/कार लोन EMI, राशन, बिजली, पानी, गैस बिल, बच्चों की स्कूल फीस और इंश्योरेंस प्रीमियम (टर्म व हेल्थ).

करें क्या-  कोशिश करें कि आपकी कुल लोन ईएमआई (EMI) आपकी इन-हैंड सैलरी के 30 से 35 प्रतिशत से अधिक न हो. यदि यह हिस्सा 50% से अधिक जा रहा है, तो अनावश्यक सब्सक्रिप्शन या गैर-ज़रूरी लोन से बचें.

30% – ये वे खर्च हैं जो जीवन को आरामदायक और आनंददायक बनाते हैं, लेकिन जिनके बिना भी काम चलाया जा सकता है.

जैसे कि बाहर आउटिंग करने जाना, शॉपिंग करना, कहीं बाहर घूमने जाना.

करें क्या-  इस हिस्से पर नियंत्रण रखना सबसे कठिन होता है. इसके लिए आप महीने की शुरुआत में ही लाइफस्टाइल खर्च के लिए एक अलग बजट तय कर सकते हैं, ताकि अनिवार्य जरूरतों या बचत के पैसे में कटौती न हो.

20% – यह आपकी आर्थिक स्वतंत्रता और सुरक्षित भविष्य की नींव है.

क्या करें-  इमरजेंसी फंड (आपातकालीन कोष)- सबसे पहले अपने 3 से 6 महीने के खर्चों के बराबर राशि लिक्विड फंड या बैंक एफडी में रखें.

सुरक्षा कवच-  एक पर्याप्त सम-इन्श्योर्ड वाला टर्म प्लान और हेल्थ इंश्योरेंस लें.

दीर्घकालिक संपत्ति निर्माण-  शेष राशि को इक्विटी म्यूचुअल फंड्स (SIP), पीपीएफ (PPF), या एनपीएस (NPS) जैसे साधनों में अनुशासित तरीके से निवेश करें.

इन बातों का भी रखें ख्याल-

सैलरी आते ही पार्टी या बड़ी खरीदारी न करें

कई लोग महीने के पहले हफ्ते में ही अपनी पसंद की महंगी चीजें या दोस्तों के साथ डिनर पर बहुत अधिक पैसा खर्च कर देते हैं. उत्साह में आकर तुरंत बड़ा खर्च करने से बचें.

अनावश्यक खर्च बंद करें

जिन सब्सक्रिप्शन या सेवाओं का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, उन्हें तुरंत बंद करें. फूड डिलीवरी और ऑनलाइन ऑर्डर कम करें.

क्रेडिट कार्ड या ईएमआई पर अंधाधुंध निर्भरता न रखें

क्रेडिट कार्ड को अपनी अतिरिक्त कमाई न समझें. यदि आप महीने के अंत में बिल चुकाने के लिए संघर्ष करते हैं, तो कार्ड का उपयोग तुरंत बंद कर दें.

सोशल मीडिया के प्रेशर में खर्च ना करें

आज की युवा पीढ़ी अक्सर सोशल मीडिया पर दिखने वाले ट्रेंड्स और दोस्तों की लाइफस्टाइल देखकर जरूरत से ज्यादा खर्च कर देती है. कई बार ऐसी चीजें खरीदी जाती हैं जिनकी वास्तव में कोई जरूरत नहीं होती.

बिना योजना के डिजिटल पेमेंट न करें

छोटे-छोटे ऑनलाइन ट्रांजैक्शन (जैसे ऑनलाइन शॉपिंग या कैब बुकिंग) का हिसाब नहीं रहता और देखते-देखते बड़ा अमाउंट कट जाता है.

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