दादामुनी अशोक कुमार और लेखक शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के बीच की दोस्ताना कैमिस्ट्री का एक मजेदार वाकेआ रहा. अशोक कुमार जब छोटे थे तो छुट्टियों में अपने ननिहाल जरूर जाया करते थे. उन की अपने नाना राजा साहब से बहुत बनती थी. वे बालक अशोक को रोज कहानी सुनाते थे.
अशोक ने भी एक दिन उन को एक दिलचस्प कहानी सुनाई. वे बोले कि नाना जब आप घर पर नहीं थे तो तो मैं जंगल में गया था. वहां शेर से मेरा सामना हुआ, लेकिन शेर मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ पाया. नाना ने आश्चर्य से पूछा क्यों? तो अशोक बोले कि उसी समय मैं ने अपने शरीर में छिपे पंखों को बाहर निकाल लिया और शेर मेरे पास आता कि इस से पहले मैं उड़ गया और शेर देखता रह गया. वे अशोक की बातों पर खूब हंसे और बोले कि जरा हमें भी अपने पंख दिखाओ, तो अशोक ने बड़ी तत्परता से बाल सुलभ जवाब दिया कि आप पहले शेर बन कर दिखाओ.
शरतचंद्र अशोक के नाना के घर के पास ही रहते थे. वे एक दिन शरतचंद्र से अशोक को मिलवाने ले गए और उन से कहा कि यह भी तुम्हारी तरह बातें बनाने में माहिर है. तभी अशोक ने शरतचंद्र से कहा कि दादा, आप ने कभी चांदी के चावल और परवल खाए हैं? शरतचंद्र ने जवाब दिया कि अभी तक तो नहीं, जब खाऊंगा तुम्हें जरूर बताऊंगा.
