लंबी कहानी: कुंजवन (भाग-8)

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‘‘दादू, अब रुक जाओ. यह दोनों विदेशी आर्डर चले जाएं तब दोनों चलेंगे. कुछ नए पेड़पौधे और लगवाने हैं. मैं ‘ब्रह्मकमल लगवाना चाहती हूं.’ ’’

‘‘दोनों साथ आफिस छोड़ कैसे जा सकते हैं बेबी.’’

‘‘8-10 दिन में कुछ नहीं होगा. सभी तो पुराने स्टाफ है.’’

‘‘ठीक है हाथ का काम समाप्त हो तब चलेंगे. हां एक कहावत है ‘‘दुश्मन को कभी दुरबल मान कर मत चलना’’ इसे हमेशा याद रखना.

‘‘दादू, मैं सतर्क हूं.’’

‘‘बेटा एक प्रश्न मुझे बेचैन कर रहा है. जवाब दोगी?’’

‘‘पूछो दादू.’’

‘‘उस दिन तू ने कहा था कि सुकुमार को अपने जीवन से निकाल फेंकने का एक कारण है जो तू बता नहीं सकती. मैं समझता हूं कि वो कारण गंभीर ही होगा. प्रश्न यह है कि क्या सुकुमार को पता है कि वो कारण क्या है?’’

‘‘नहीं दादू. उसे कुछ नहीं पता तभी तो मेरे इस व्यवहार से वो इतना दुखी और आहत हुआ था.’’

‘‘सत्यानाश, अब तो बात बनने की कोई आशा नहीं.’’

‘‘भूल जाइए दादू जैसे ईश्वर मेरे हाथ में विवाह रेखा डालना भूल गए.’’

‘‘मेरी बच्ची.’’

एक हफ्ते बाद काम कर रही थी शिखा. उस का अपना मोबाइल बजा. आजकल यह बहुत कम बजता है. सहेलियों की शादी हो गई तो कुछ देश में कुछ विदेशों में घरपरिवार में व्यस्त हैं, दोस्त कुछ दिल्ली में ही हैं पर नौकरी या बिजनैस में पिल रहे हैं कुछ दिल्ली या देश के बाहर भी चले गए हैं. दादू से तो बैठ कर ही बात होती है. उस दिन के बाद से दुर्गा मौसी का भी फोन नहीं आता. फिर कौन? वो भी औफिस टाइम में इतना फालतू समय है किस के पास. मोबाइल उठा कर देखते ही मिजाज खराब हो गया ‘बंटी’. सोचा काट दे पर उत्सुकता हुई अब क्या मतलब है सुन ही लिया जाए. उस की आवाज सुन हैरान हुई. इतना भी निर्लज्ज हो सकता है कोई यह पता नहीं था उसे अपने को संयत कर शांत स्वर में कहा,

‘‘जो कहना है जल्दी से कहो. मुझे काम है.’’

‘‘मैं भी खाली नहीं हूं. मुझे दो करोड़ चाहिए.’’

‘‘तो.’’

‘‘मुझे तुम से दो करोड़ चाहिए अभी के अभी.’’

‘‘अच्छा. कोई बड़ी बात नहीं. दो करोड़ है ही कितना?’’

‘‘तो मैं कब आ जाऊं लेने?’’

‘‘पहले जरा यह बताओ कि यह दो करोड़ तुम ने कब जमा किए थे मेरी कंपनी में? क्योंकि मुझे याद नहीं इसलिए जमा करने के कागज भी लेते आना.’’

‘‘बंटी ने उद्दंडता से कहा,’’

‘‘मैं ने कोई पैसा जमा नहीं किया. मुझे चाहिए बस.’’

‘‘तो क्या मैं ने तुम से उधार लिया था? मुझे वो भी याद नहीं तो उधार का कागज लेते आना.’’

वो चीखा,

‘‘मैं मजाक नहीं कर रहा?’’

‘‘मैं भी नहीं, और सुनो औफिस आने की कोशिश मत करना. गार्ड इज्जत करना नहीं जानता.’’

‘‘देखो नया काम डालना है. पैसों का जुगाड़ नहीं हुआ.’’

‘‘उधार का बाजार खुला है ब्याज पर दो क्यों दस ले लो.’’

‘‘मतलब तुम नहीं दोगी.’’

‘‘समझने में इतनी देर लगी?’’

‘‘पर समझ गया. मुझे तुम ने नहीं पहचाना अभी तक.’’

‘‘गलत. पहचान गई तभी तो…’’

‘‘ना. एक दम नहीं पहचाना मैं तुम्हारे सोच से बहुत आगे हूं.’’

‘‘ईश्वर तुम को और आगे बढ़ाए मेरी शुभकामनाएं. उस ने फोन काट दिया. ओफ: मरतेमरते भी बेटी से बदला लेने मां उस के पीछे शनिचर लगा गई. कमाल की मां है. रात को पूरी बात सुन दादू की चिंता और बढ़ी. कहा उन्होंने कुछ नहीं पर देर रात तक कमरे की बत्ती जलती रही. मोबाइल पर बारबार किसी से संपर्क करते रहे.’’

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बंटी की आरे से एक प्रयास और आया इस बार वो नहीं उस के पिता मेहताजी स्वयं आए. औफिस में रोक बंटी पर थी उस के पिता पर नहीं वो औपचारिकता निभा कर ही आए. पर शिखा ने उन के आदरसत्कार में कोई कमी नहीं होने दी. कौफी पिलाया, सम्मान से पेश आई. कौफी पीतेपीते मेहताजी बाले,

‘‘बेटा, तुम ने बंटी से रिश्ता तोड़ा इस बात को ले मांबेटे गुस्सा हैं तुम से, पर मैं उन के सामने तो बोल नहीं पाता. तुम से बोल रहा हूं तुम ने एकदम ठीक निर्णय लिया. वो नालायक तुम्हारे लायक है ही नहीं. मेरा इतना बड़ा कारोबार तफरीह और लापरवाही में बरबाद कर के रख दिया.’’

‘‘मन ही मन हंस दी शिखा,’’ यह नया जाल है पर अभी समझ नहीं पा रही कि तीर किस दिशा में चलेगा. कारोबार बरबाद करने में वो बेटे के बराबर के हिस्सेदार हैं, बोली,

‘‘पर अंकल, आप तो अनुभवी बिजनैसमैन हैं. आप के रहते…’’

‘‘मैं ने तो बहुत कोशिश की बचाने की घर तक गिरवी रख दिया, पर जड़ तो मां के सिर चढ़ाए नवाबजादे ने पहले ही खोखली कर दी थी.’’

शिखा चुप रही. वो कौफी समाप्त कर बोले,

‘‘रिश्ता टूटा तो कोई बात नहीं तुम मेरी गोद खिलाई बच्ची हो तुम्हारे पिता मेरे नजदीकी दोस्त थे.’’

एक और सफेद झूठ. पापा ऐसे लोगों को एकदम पसंद नहीं करते थे. हाईहैलो तक ही सीमित होती थी उन की वार्तालाप.

‘‘वो रिश्ता तो नहीं टूटा ना टूटेगा.’’

‘‘मेहताजी के गले में स्नेह का झरना.’’

‘‘सारे रास्ते बंद हो गए तब आया हूं तुम्हारे पास?’’

सावधान हो गई शिखा.

‘‘जी अंकल, पर इस समय, मैं एक लाख भी निकालने की स्थिति में नहीं हूं.’’

‘‘नहीं नहीं तुम गलत समझ रही हो. पैसा नहीं चाहिए मुझे. मैं जानता हूं व्यापार में फैले पैसों से थोड़ा भी निकालना कितना मुश्किल होता है. पैसा नहीं चाहिए.’’

अवाक हुई शिखा. पैसा नहीं, विवाह नहीं तो फिर क्या चाहिए? यह कौन सा नया जाल है रे बाबा. मन ही मन शंकित हो उठी वो.

‘‘तो अंकलजी फिर आप…’’

‘‘अरे घबराओ नहीं मामूली बात है तुम्हें लाभ है मुझे भी थोड़ी राहत मिलेगी. असल में मेरी एक योजना है. हां मेरी योजना से बंटी को मैं ने कोसों दूर रखा है. इस में उस की परछाई तक पड़ने नहीं दूंगा यह वादा है तुम से मेरा. एक नंबर का नालायक है वो.’’ गला सूखने लगा शिखा का.

‘‘आप की योजना क्या है?’’

‘‘बताता हूं. आजकल बड़ेबड़े पैसे वाले लोग धार्मिक स्थलों के आसपास एकांत स्थानों में रिसोर्ट या काटेज बनाना पसंद करने लगे हैं. दो एक लोगों ने बनाया तो चौगुना दामों में बिक गए. तो बेटी मैं कह रहा था तुम्हारे पास तो जोशीमठ के पास चार एकड़ की जमीन पड़ी है वहां हाऊसिंग प्रोजेक्ट क्यों नहीं चालू करतीं.’’

शिखा उन का मकसद समझ गई. मुख कठोर हो गया उस का पर दादू ने सिखाया कि बिजनैस का मूलमंत्र है धैर्य, मिजाज पर नियंत्रण रखना. मधुरता से हंसी वो, ‘‘अंकलजी, वो पापा की बड़ी मनपसंद जगह थी, मेरी भी. वहां हम ने काटेज भी बना रखा है. जाते भी हैं कभीकभी.’’

‘‘कोई बात नहीं जगह तो बहुत बड़ी है.’’

‘‘उस में फूलों की खेती हो रही है. पापा ब्रह्मकमल भी लगाना चाहते थे. फिर अंकल यही काम नहीं संभाल पा रही नए काम में अभी हाथ डालना…’’

वो व्यस्त हो उठे,

‘‘अरे नहीं बेटी, मुझे पता नहीं है क्या कि तुम्हारे ऊपर कितना बोझ है. ना बेटी तुम को उंगली भी नहीं हिलानी पड़ेगी. जमीन पैसा तुम्हारा, मालकिन भी तुम ही रहोगी बस दौड़धूप, झंझटझमेला सब मैं संभाल लूंगा मुनाफा बराबर बांट लेंगे.’’

शिखा को जोर का झटका लगा उस ने समझने के लिए थोड़ा समय लिया मेहताजी ने कुछ और समझा बोले,

‘‘मुझे पता है मेरे बच्चे कि तुम क्या सोच रही हो. जानता हूं कि मेरा बेटा कितना नालायक है. तुम चिंता मत करो मेरा वादा है तुम से कि हमारे प्रोजैक्ट में उस की परछाई तक नहीं पड़ने दूंगा. पूरा काम मैं अकेला संभालूंगा.’’

मधुर स्वर में शिखा ने कहा.

‘‘आप पर मुझे उतना ही भरोसा है जितना पापा पर था. जोशीमठ की जमीन पापा का सपना था, पापा के लिए शांतिस्थल था. वहां वो ऐसेऐसे फूल लगाना चाहते थे जो आमतौर पर नहीं पाए जाते. मैं चाहती हूं उसे ठीक वैसा ही बना दूं जैसा पापा का सपना था.’’

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एकदम बुझ गए मेहताजी.

‘‘बेटा, मैं ने सोचा था.’’

तरस आया शिखा को. कुछ भी हो पापा के हमउम्र हैं. उस ने सांत्वना दी.

‘‘कोई बात नहीं. जमीन और भी मिल जाएंगे. मैं जरा हाथ के काम निबटा लू फिर सोचती हूं. थोड़ी देर में वो उठ गए शिखा काम में लग गई.’’

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