ऐसे बनाएं खुद को मजबूत

अधिकतर हम देखतें हैं कि महिलाओं में सहनशीलता परुषों के मुकाबले बहुत अधिक होती है जो कुछ हद तक बहुत अच्छी बात है लेकिन जब यह जरूरत से ज्यादा आप के जीवन का हिस्सा बन जाएं तो यह उतना ही घातक बन जाती है. क्योंकि तब उसे हरकोई अपने दबाव में रखना पसंद करता है जिस से वह अपना आत्मविश्वास खोने लगती है और कई बार यही परेशानी उसे मानसिक रूप से कमजोर बनाने का काम करती है.

इसलिए जरूरी है कि आप को पता हो कब और कौन आप का फायदा उठाने की कोशिश में है. जिस के लिए आप को वक्त रहते मानसिक और भावनात्मक तौर पर कमजोर होने से बचना आना चाहिए.

चलिए, जानते हैं कुछ ऐसी बातें जो हर महिला को अपने जीवन में अपनाना आना चाहिए जिस से वह जीवन का हर आंनद ले सकें.

आत्मविश्वास में कमी न आने दें

अकसर महिलाएं दूसरों पर बहुत जल्दी भरोसा कर लेती हैं. जिस का कई बार लोग बहुत जल्दी फायदा उठाने से नहीं चूकते. आत्मविश्वास मैंटली स्ट्रौंग होने की नींव है. इसलिए जरूरी है कि हर महिला को अपने ऊपर पूर्ण आत्मविश्वास हो. साथ ही किसी भी बात का निर्णय लेने से पहले जांचनेपरखने का गुण आता हो. खुद को आत्मनिर्भर बनाएं.

डर के आगे जीत है

यदि हमारी कमजोरी किसी और को पता होगी तो वह बहुत जल्दी उस का फायदा उठाने की सोचगा. इसलिए जरूरी है कि अपनी कमजोरियों पर काम करें और उसे अपनी खूबियों में तबदील करने कि पूरी कोशिश करें.

खुद से प्यार करें

 

जीवन में हर रिश्ता महत्त्वपूर्ण है लेकिन ऐसे में हम खुद को भूल जाते हैं. इसलिए खुद से प्यार करना न भूलें. यदि आप अपनी नजरों में बैस्ट हैं तो हर किसी कि नजरों में आप बैस्ट ही रहेंगी. अपने मन में सैल्फ डाउट को पनपने न दें.

सकरात्मक रवैया रखें

साईकोलौजिकली देखें तो हमारी आदत होती है कि हमारा ध्यान नकारात्मक बातों पर या चीजों पर बहुत जल्दी जाता है जिस कारण हम परेशानियों से घिर जाते हैं. ऐसे में जरूरी है कि अपनी सोच को सकरात्मक बनाएं व ज्यादा सोचविचार यानी ओवर थिंकिंग से बचें. बारबार एक ही बात के बारे में सोचना हमारी मानसिक स्थिति को बिगाड़ता है.

मन को खाली करें

अधिकतर महिलाएं अपनी परेशानियों को दूसरे से साझा करने में कतराती हैं जिस कारण वे अंदर ही अंदर घुटती रहती हैं जिस का असर उन पर न सिर्फ मानसिक बल्कि शरारिक रूप से भी पड़ता है. ऐसे में किसी अपने से अपने मन की बात करने से कतराएं नहीं. ऐसा करने से आप का मन हलका और तनाव कम होगा.

रिलेशनशिप के लिए ग्रहण है ओवरथिंकिंग, आपको भर देगी नेगेटिव सोच से

रिश्ते में एक दूसरे की केयर करना, उसे जताना, पार्टनर के पास मौजूद न होने पर भी उसे महसूस करना आदि आपके प्यार को बढ़ाता है.लेकिन अगर ये केयर और प्यार जुनून बन जाए तो ये रिश्ते की खुशियों के लिए सबसे घातक स्थिति है.ओवरथिंकिंग भी ऐसा ही जुनून है.जो आपको आज में नहीं जीने देती.या तो आप अतीत के अंधेरे में घूमते रहते हैं या फिर आने वाले कल की चिंता में घुटते रहते हैं.ओवरथिंकिंग किसी भी रिश्ते को टॉक्सिक बना सकती है.यह आपको इतना इनसिक्योर बना देती है कि आप सही और गलत का अंतर ही नहीं कर पाते.इससे शक, शंका, संदेह पैदा होने लगते हैं और ये सभी मिलकर आपके रिश्ते को अंधेरे में धकेल देते हैं.शायद यही कारण है कि हमारे बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि अति हर बात की बुरी होती है.किसी भी शख्स या रिश्ते के बारे में ज्यादा सोचना आपके लिए हानिकारक हो सकती है.

आपके रिश्ते को ऐसे प्रभावित करती है ओवर थिंकिंग

कहते हैं गुजरा हुआ समय लौटकर नहीं आता.अगर आप भी अपने रिश्ते को लेकर ओवर थिंक कर रहे हैं तो याद रखिए आपका अच्छा समय निकल सकता है, जो फिर वापस लौटकर कभी नहीं आएगा.ओवरथिंकिंग आपके रिश्ते को खोखला कर सकती है.

1. बात कम, झगड़े ज्यादा : जब आप अपने रिश्ते को लेकर ओवरथिंक करने लगते हैं तो आप दिमाग में उसकी एक छवि बना लेते हैं.आप उसी के अनुसार सोचने लगते हैं.सामने वाले की हर बात आपको गलत लगने लगती है.या फिर आप उसका गलत अर्थ निकालने लगते हैं.पार्टनर की हर बात में आप नेगेटिव एंगल खोजने लगते हैं, जिससे रिश्ता कमजोर हो जाता है.

2. बढ़ती है टेंशन : जब आप लगातार बातों और घटनाओं को तोलने में लगते हैं तो ये टेंशन का कारण बन जाता है.यह आपको मेंटली और फिजिकली दोनों तरीकों से प्रभावित करता है.ऐसे में आप हमेशा चिड़चिड़े, उदास या गुस्से में रहने लगते हैं.ये सभी बातें आपके रिश्ते के लिए घातक हो जाती हैं.

3. बेवजह बात बढ़ाना : ये बात सही है कि किसी भी परेशानी या समस्या का हल निकाला जा सकता है, लेकिन हर वक्त सिर्फ उसी के बारे में सोचने से आप परेशान हो जाएंगे और सही हल भी नहीं खोज पाएंगे.जब आप किसी बात पर ओवरथिंक करते हैं तो मुख्य बात से भटक जाते हैं और उससे कनेक्ट दूसरी बातों के बारे में ज्यादा सोचने लगते हैं.ऐसे में समस्या वहीं की वहीं खड़ी रहती है.

4. अविश्वास : किसी भी रिश्ते या व्यक्ति के बारे में बहुत ज्यादा सोचने का मतलब है रिश्ते की नींव को कमजोर करना.ओवरथिंकिंग के कारण आप किसी पर पूरा विश्वास नहीं कर पाते.आप हर किसी को संदेह की नजरों से देखने लगते हैं.आप सही काम के पीछे भी गलत उद्देश्य को खोजने में जुट जाते हैं.पार्टनर अगर आपको कुछ गिफ्ट दे तो खुश होने की जगह उसके पीछे के कारण खोजना, आपके अविश्वास को दिखाता है.

5. खत्म हो जाता है अपनापन : ओवर थिंकिंग को अपनेपन का दुश्मन कह सकते हैं.जब आप हमेशा पार्टनर की हर बात और एक्शन को लेकर ओवरथिंक करेंगे तो आपस में अविश्वास पैदा होने लगता है.ऐसे में आप न ही फिजिकली साथ रह पाते हैं और न ही मेंटली.धीरे-धीरे रिश्ते में नजदीकियां, अपनापन, प्यार, सहानुभूति, खुशियां सब कम होने लगती हैं.क्योंकि इन सभी की जगह ओवर थिंकिंग के कारण संदेह और नेगेटिव विचार ले लेते हैं.ऐसे में रिश्ते की नाजुक डोर बोझिल होकर टूटने लगती है.

6. फैसला लेने में परेशानी : आपने देखा होगा कि कुछ लोग बहुत छोटे-छोटे फैसले भी बहुत ही मुश्किल से कर पाते हैं.ये ओवरथिंकिंग का नतीजा भी हो सकता है.ओवरथिंकर अक्सर आसानी से फैसले नहीं ले पाते.वे हमेशा इसी कन्फ्यूजन में रहते हैं कि हमने ऐसा किया तो क्या होगा.या फिर हमने ऐसा नहीं किया तो क्या होगा.इसी फेर में वे आज को ठीक से जी ही नहीं पाते।

कहीं आप भी तो नहीं हो गए हैं डिप्रेशन का शिकार, इन 6 टिप्स से लगाएं पता

तनाव या कहें तो स्ट्रेस आज लोगों के बीच आम हो चुका है. अगर समय रहते इस समस्या को काबू नहीं किया गया तो इसके नतीजे बुरे हो सकते हैं. स्ट्रेस के कारण ना सिर्फ मानसिक अशांति होती है, बल्कि भूख, और नींद पर भी इसका असर होता है. इस खबर में हम आपको उन संकेतों के बारे में बताएंगे जिनसे आप स्ट्रेस के बारे में समझ पाएंगे.

आइए जाने उन संकेतों के बारे में…

1. नींद ना आना

जब आप तनाव में होते हैं, नींद नहीं आती. कई बार आप सोना चाहते हैं पर आपको नींद नहीं आती. रातभर जागना, मोबाइल फोन का अत्यधिक इस्तेमाल की वजह से लोग पूरी नींद नहीं ले पाते है और इसका असर शरीर पर दिखता है.

2. वजन का बढ़ना

जब आप ज्यादा तनाव में होते हैं, आपके हार्मोंस पर असर पड़ता है. इसका ये नतीजा ये होता है कि वजन बढ़ने लगता है.

3. पेट में दर्द और जलन

अगर आप ज्यादा बाथरूम जाते हैं. चिंता और तनाव की वजह से होता है कि आपको बार बार बाथरुम का चक्‍कर लगाना पड़ता है। पेट में दर्द होना और हार्ट बर्न होना भी इसकी समस्‍या है.

4. चिड़चिड़ाहट

तनाव में चिड़चिड़ाहट बेहद आम है. मरीज को छोटी छोटी बातों से काफी उलझन होती है. किसी से सही तरीके से बात नहीं करते है और हर छोटी सी बात पर परेशान हो जाते हैं. अगर लंबे समय तक आपको ऐसी परेशानी हो रही है तो सतर्क हो जाइए.

 

5. गैरजरूरी बातों को सोचते रहना

अगर आप लगातार गैर जरूरी बातों को सोचते रहते हैं, तो समझ जाइए कि आप तनाव में हैं. ऐसा इस लिए होता है क्योंकि इस दौरान आप बहुत ज्यादा सोचने लगते हैं, आप चीजों पर फोकस नहीं कर पातें, जिसके बाद आपके दिमाग में गैरजरूरी बातें आने लगती हैं, आपका कौंफिडेंस भी कम होने लगता है.

6. सख्त होने लगते हैं मसल्स और ज्वाइंट्स

अक्सर ज्यादा स्ट्रेस लेने से कंधों में, जोड़ो में परेशानी होने लगती है. कभी कभी सर से ले कर पांव में एंठन होती है. ये सब ज्यादा तनाव के कारण होता है.

क्यों महसूस होता है अकेलापन और कैसे पाएं इससे निजात

कोरोना महामारी के समय लोगों के जीवन में भारी बदलाव देखने को मिले. उस दौरान लोगों को महामारी से खुद को बचाए रखने के लिए मजबूरन घरों में आइसोलेट होना पड़ रहा था. महामारी में होने वाली मौतों के कारण लोगों ने अपनों को खोया और वे डिप्रैशन का शिकार हुए.

अकसर देखा गया है कि डिप्रैशन अकेलेपन को जन्म देता है. डिप्रैस्ड व्यक्ति अकेला रहना चाहता है, भीड़ से कटने लगता है, अपने दिलोदिमाग में पनप रहे खयालों को किसी से शेयर करने से कतराने लगता है.

ब्रेकअप के बाद भी लोग एकांत में चले जाते क्योंकि किसी बहुत खास व्यक्ति को खोना किसी की मानसिक स्थिति को बहुत प्रभावित कर सकता है.

द्य सोशल मीडिया के ज्यादा इस्तेमाल से भी ऐसा होता है. लोग घंटों सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं. ऐसे लोगों को फौलो कर रहे हैं जो अधिकतर अकेला रहने की हिदायतें देते हैं. इस से भी लोगों की बाहरी दुनिया में रुचि कम हो सकती है.

लंबी बीमारी से जू?ा रहे लोग अकसर खुद को बाहरी दुनिया से अलगथलग पाते हैं. उन के दोस्त रिश्तेदार उन से पहले की कि तरह मेलजोल नहीं रखते तो वे खुद भी दूसरों से स्वाभाविक दूरी बना लेते हैं. कभीकभी अनजाने में उन का सैल्फ आइसोलेशन गहरा हो जाता है, वे खुद को हीन सम?ाने लगते हैं.

‘‘बचपन में जब रोना आता है तो बड़े बोलते हैं आंसू पोंछो. जब गुस्सा आता है तो बड़े कहते हैं मुसकराओ ताकि घर की शांति बनी रहे. नफरत करना चाहे, तो इजाजत नहीं दी और जब प्यार करना चाहे तो पता चला यह साला इमोशनल सिस्टम ही गड़बड़ा गया, काम नहीं कर रहा, काम नहीं कर सकता. रोना, गुस्सा, नफरत कुछ भी खुल के ऐक्सप्रैस नहीं करने दिया. अब प्यार कैसे ऐक्सप्रैस करे?’’

फिल्म ‘डियर जिंदगी’ में शाहरुख खान के ये डायलौग जिस बात और मनोस्थिति की तरफ इशारा करते हैं वे वर्तमान में हर युवा की इमोशनल हालत को रिप्रैजेंट करते हैं.

ऐसे ही ‘लंचबौक्स’ जैसी फिल्म जो मिडल ऐज के लोगों में पनप रहे अकेलेपन को बयां करती है और ‘तमाशा,’ ‘तारे जमी पर,’ ‘बर्फी,’ ‘लुटेरा’ और ‘इंगलिशविंगलिश’ जैसी कितनी फिल्मों में किरदारों के माध्यम से अकेलेपन या लोनलीनैस जैसी समस्या को सामने रखने की कोशिश की गई है जोकि पिछले दशकों में बढ़ती ही जा रही है. इसे नजरअंदाज किया जा रहा है.

क्या है स्थिति

अकसर हम परेशानी में, गुस्से में या उदासी में अपनेआप को जाहिर करने के बजाय उसे दबाते चले जाते हैं, जो आगे चल कर उन्हें अकेलेपन की ओर धकेल देती है. असुरक्षा और रिश्तों में बढ़ती अविश्वसनियता के चलते और कभीकभार परिस्थितियों के कारण लोगों में खासकर युवा पीढ़ी में पहले के मुकाबले अकेलेपन की समस्या बढ़ती जा रही है. कहीं न कहीं आप को ऐसे लोग मिल ही जाएंगे जो अकेलेपन की समस्या से जू?ा रहे हैं.

अकेलापन थोड़ाबहुत मात्रा में सभी में रहता ही है इसलिए इसे अकसर नजरअंदाज किया जाता रहा है. जबकि अकेलापन व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक दोनों पहलुओं को प्रभावित करती है. डब्ल्यूएचओ भी इस बात से इनकार नहीं करता कि अकेलापन गंभीर स्वास्थ्य समस्या के तौर पर उभर रहा है खासकर युवाओं के इस से प्रभावित होने की संभावना तेजी से बढ़ी है.

भारत सहित कई देशों में इस का खतरा हाल के वर्षों में काफी बढ़ा है,. विशेषतौर पर कोरोना महामारी के बाद लोनलीनैस के कारण होने वाली मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की समस्या अब ज्यादा दर्ज की जा रही है.

2021 में एक वैश्विक सर्वेक्षण से पता चला था कि 43% भारतीय अकेलापन महसूस करते हैं. अकेलेपन की व्यापकता के मामले में भारत विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर है. चिंताजनक बात यह है कि 13 से 15 वर्ष की आयु के लगभग 25% बच्चे अकेलेपन की भावनाओं की भी शिकायत करते हैं. इस के बाद 35 से 44 वर्ष के 26%, 18 से 24 वर्ष के 9% और 45 से 54 वर्ष के 6% लोगों ने चिकित्सकों से अपने अकेलेपन की बात कही है. कुल सलाह लेने वालों में 67% पुरुष तो 33% महिलाएं थीं. ये आंकडे़ निजी कंसल्टेशन यानी डाक्टरी सलाह पर आधारित रहे.

अकेलेपन के नुकसान भी कम नहीं

अकेलापन कोई मैंटल हैल्थ प्रौब्लम नहीं है हालांकि ये एकदूसरे से गहनता से जुड़े हुए हैं. खराब मैंटल हैल्थ आप को अकेलापन महसूस करा सकती है. इसी तरह अकेलापन मैंटल हैल्थ को इंपैक्ट कर सकता है.

अकेलापन डिप्रैशन, शराब का सेवन, बाल शोषण, नींद की समस्या, व्यक्तित्व विकार और अल्जाइमर रोग मानसिक विकारों को जन्म दे सकता है. ध्यान न देने पर अकेलापन लोगों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर परिणाम डाल सकता है.

अकेले रहने वाले लोग खुद पर ध्यान देना छोड़ देते हैं. नहाना, साफसफाई और खुद को अपग्रेड करने जैसी बातें उन्हें बेमानी सी लगने लगती हैं. लोगों और समाज से संपर्क टूट जाने के कारण, समाज में हो रहे बदलावों से भी वे दूर हो जाते है. कपड़ों में, खानेपीने की चीजों में और घूमनेफिरने में उन की कोई रुचि नहीं होती. वे हमेशा थके हुए होते हैं. कहीं जाने की बात पर ‘मन नहीं है, इच्छा नहीं है’ जैसी बातें बोलते हैं.

भारत में अकेलेपन के मनोवैज्ञानिक और शारीरिक प्रभावों पर बहुत कम शोध किया गया है. भारत में ऐसे कुछ ही अध्ययन हुए हैं, जिन में अकेलेपन के अन्य मानसिक विकारों के साथ संबंध का अध्ययन किया गया है. हालांकि इन में से अधिकांश अध्ययन केवल बुजुर्ग रोगियों पर किए गए थे, युवाओं पर नहीं.

एकदूसरे से जुड़े हैं अकेलापन और बेरोजगारी: उन्होंने कहा कि आप ज्यादा अकेले हैं तो आप की नौकरी खोने की संभावना ज्यादा होती है. आप का काम में मन नहीं लगता और परफौरमैंस गिरती चली जाती है.

लाभदायक भी हो सकता है अकेलापन: अकेला महसूस करना एक स्वस्थ भावना है और वास्तव में एक अवधि का एकांतवास करना लाभदायक भी हो सकता है अगर उस का इस्तेमाल खुद अपग्रेड करने में किया जाए.

अपनी पर्सनैलिटी को सवारें, किताबें पढ़ें अपनी नौलेज को बढ़ाएं. सैड रह कर वक्त जाया न करें बल्कि उस का सदुपयोग करें.

कुछ लोगों में अस्थायी या लंबे समय का अकेलापन कला और रचनात्मक अभिव्यक्ति का रूप ले सकता है. लोग नईनई विद्याएं सीखते हैं. जैसे लैंग्वेज, डांस और पेंटिंग जो उन्हें नई ऐनर्जी देता है. नए उद्देश्य देता है.

अकेलापन आप को संवार भी सकता है और बिगाड़ भी: यह बिलकुल वैसा ही है जैसे दीवार में उगता हुआ पीपल का पेड़ जो अकेला होते हुए भी अपने आसपास के ऐन्वायरन्मैंट में खुद को ढाल लेता है. उतनी सफलता से विकसित होता है जितनी सफलता से कहीं और तो यह पूरी तरह आप पर निर्भर करता है.

क्या है कौग्निटिव ओवरलोडिंग

आजकल की भागदौड़ भरी दिनचर्या में सभी को बस एक ही शिकायत है कि यह काम करने समय का ही नहीं मिला यानी आज समय कम और काम ज्यादा हैं जिस के कारण कुछ काम अधूरे ही छूट जाते हैं. इसे आजकल की शब्दावली में कौग्निटिव ओवरलोड कहा जाता है.

कौग्निटिव ओवरलोड एक तरह की मानसिक थकावट की एक स्थिति है जो तब होती है जब हमारी वर्किंग मैमोरी पर लोड उस की  क्षमता से अधिक हो जाता  है और वह चीजों को याद नहीं रख पाती.

आजकल बच्चे हों या बड़े सभी दबाव में हैं. सभी के पास सूचनाओं और जानकारी की भरमार है. दिनभर इंटरनैट, सोशल मीडिया पर आती खबरें, जानकारी, अलर्ट और नोटिफिकेशन उन की मैमोरी को भरने का काम करते रहते हैं और दिमाग को पूरा समय व्यस्त रखते हैं जिस के कारण हमारी मैमोरी ओवरलोड हो रही है और हमें चीजों को याद करने में परेशानियों का सामना भी करना पड़ रहा है.

सिर्फ वही जानकारी या काम याद रख पा रहे हैं जो हमारी दिनचर्या का हिस्सा हैं या जिन कामों को हम रोज कर रहे हैं जैसे कंप्यूटर को शटडाउन करना, औफिस जाते समय घर को लौक करना, लाइट्स बंद करना, औफिस से घर लौटते समय दूध, ब्रैड आदि सामान लेना और व्यवस्थित रखना. यदि इस के आलावा कोई और ऐक्स्ट्रा काम यदि बीच में आ जाए तो उसे करने और याद रखने में परेशानी हो रही है क्योंकि यह ऐक्स्ट्रा काम हमारी औटोमैटिक मैमोरी का हिस्सा नहीं है.

अपनी मस्तिष्क यानी दिमाग की संरचना के हिसाब से हम एक बार में एक काम ही अच्छे से कर सकते हैं और यदि एक से ज्यादा काम करते हैं तो काम प्रभावित होता है और वह अच्छे से पूरा नहीं हो पाता है. ठीक इसी तरह जब किसी को एक बार में बहुत अधिक जानकारी दी जाती है या एकसाथ बहुत सारे कार्य दिए जाते हैं, जिस के परिणामस्वरूप जानकारी को मैमोराइज करने और फिर उस के अनुसार काम को करने में परेशानी का सामना करना पड़ता है या हम कार्य को अच्छे से कर पाने में सक्षम नहीं होते हैं.

अमूनन जानकारी और सूचना की अधिकता के कुछ लक्षण देखने को मिलते हैं. जैसे काम अच्छे से न कर पाना, भ्रम, निर्णय लेने में देरी, जानकारी, सूचना सही है या गलत उस की आलोचना का मूल्यांकन सही न कर पाना, सूचना पर नियंत्रण की हानि, जानकारी प्राप्त करने से इंकार, काम में गलती के प्रति अधिक सहनशीलता, चिंता, तनाव, आत्मविश्वास में कमी, नकारात्मकता बढ़ना आदि. इसलिए मैमोरी के ओवरलोड और कौग्निटिव ओवरलोड से बचने के लिए अनावश्यक कंटैंट से बनाएं दूरी. आजकल इंटरनैट आसानी से उपलब्ध है और इस पर जानकारी का असीमित भंडार है. ऐसे में धैर्य रखते हुए केवल वही कंटैंट देखना चाहिए जो आप के काम का हो. अनावश्यक कंटैंट और जानकारी से दूर रहने की कोशिश करना चाहिए ताकि अपने दिमाग को कुछ आराम दे सकें और मैमोरी ओवरलोड से बच सके.

करें डिस्कनैक्ट

कुछ समय के लिए दिन में कम से कम 1-2 घंटों के लिए खुद को मोबाइल और इंटरनैट की दुनिया से डिस्कनैक्ट करें और सारा फोकस या ध्यान खुद पर केंद्रित करें ताकि आत्मावलोकन कर सकें. इस के लिए मैडिटेशन और योग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाए रखें. ऐसा करने से निर्णय लेने की क्षमता में सुधार होगा और रचनात्मकता बढ़ेगी.

रुकावटें कम करें

एक समय में एक ही चीज पर काम करें. ईमेल, फोन कौल और अन्य संदेशों के जवाब देने के लिए प्रत्येक दिन एक समय निर्धारित करें. अपने साथ वालों को बताएं कि तुरंत रिप्लाई की अपेक्षा न करें. ऐसे अलर्ट को बंद करें जो आप की एकाग्रता को बाधित करते हों. ऐसा करने से कार्य करने की क्षमता में वृद्धि होगी साथ ही आत्मविश्वास भी बढ़ेगा.

सूचनाओं को करें फिल्टर

एक अच्छी मैमोरी के लिए हमें अपने मस्तिष्क को आराम देने की आवश्यकता होती है ताकि हम प्राथमिकता वाले अपने सारे कामों पर अच्छे ढंग से ध्यान केंद्रित कर सकें क्योंकि आजकल जानकारी की अधिकता के कारण हम मैमोरी में बहुत अधिक मात्रा में जानकारी संग्रहित करने की कोशिश करते हैं और ऐसा कर के लगातार सिस्टम और मस्तिष्क पर भार डालते हैं जिस की वजह से मस्तिष्क को आराम नहीं मिलता और वह धीरेधीरे याद रखने की क्षमता को खोने लगता है. इस से बचने के लिए अपनी सूचनाओं को फिल्टर करें यानी वही जानकारी पढ़ें या देखें जो आप के काम की हो.

काग्निटिव ओवरलोड से बचने के लिए करें ये उपाय

जटिल कामों के बीच में ब्रेक लेते रहें ताकि दिमाग को आराम मिल सके. द्य सूचनाओं और जानकारी को छोटेछोटे हिस्सों मे बांट लें ताकि उन्हें याद रखने में परेशानी न हो और आप उन पर अच्छे से काम कर पाएं.

द्य अनुशासित और व्यवस्थित दिनचर्या अपनाएं ताकि सारे काम समय पूरा हो सकें और आप कुछ समय सुकून से बैठ सकें एवं तनाव से दूर रहें और रात में भरपूर नींद ले सकें ताकि अगले दिन ऊर्जा से भरे हुए रहें और अपना पूरा फोकस काम पर अच्छे से लगा पाएं.

कामों की प्राथमिकता तय करें

अपने कामों की प्राथमिकता के अनुसार उन की सूची बनाएं और उस के अनुसार काम करें. यदि कुछ काम ऐसे हों जिन्हें आप एकसाथ कर सकते हों उन्हें करें जैसे महिलाएं खाना बनाते हुए किसी से बात कर सकती हैं या कुछ और काम  जैसे कपड़ों की तह लगाना, बरतन जमाना, सब्जी धोना आदि पूरे कर सकती हैं, बच्चों को होमवर्क कराते हुए बीच में चाय आदि बना सकती हैं.

ऐसा कर आप समय की बचत कर सकती हैं

और बचे हुए समय में उन कामों को कर सकती हैं जो एकसाथ नहीं किए जा सकते जैसे सिलाईबुनाई, पेंटिंग, कपड़े धोना, औफिस का कोई काम करना आदि, साथ ही उन कामों को पहले करें जो जल्दी हो जाएं और कम थकाने वाले हों.

करें समय का सही प्रबंधन

अपने कामों की सूची उसे पूरा करने की समय सीमा और काम को करने में कितना समय लगेगा के अनुसार बनाएं ताकि आप के पास जो समय है और जो काम पहले पूरा करना है उसे दे सकें. कुछ काम एकसाथ करना संभव हो तो कामों को उन की जटिलता के हिसाब से बांटें और उस के अनुसार उन्हें समय दें.

 

 

World Hearing Day 2024: कान बहने की समस्या को न लें हल्के में, जानें एक्सपर्ट की राय

World Hearing Day 2024: कान और उसकी हेल्थ के बारे में सीके बिरला हॉस्पिटल गुरुग्राम में लीड ईएनटी कंसल्टेंट डॉक्टर अनिष गुप्ता ने विस्तार से जानकारी दी है. उन्होंने बताया कि पिछले कुछ समय में मिडल ईयर में बहाव के साथ ओटिटिस मीडिया का प्रसार काफी तेजी से बढ़ा है. इस परेशानी को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है लेकिन अगर इसका इलाज न कराया जाए तो गंभीर परिणाम हो सकते हैं. 3 मार्च को मनाए जाने वाले वर्ल्ड हियरिंग डे के अवसर को देखते हुए ये जरूरी है कि सुनने की क्षमता वाली इस परेशानी के बारे में चर्चा की जाए और इसके खतरे के बारे में समझा जाए.

बहाव के साथ ओटिटिस मीडिया (ओएमई) होने के कई कारण हो सकते हैं जिसमें लगातार कोल्ड होना, एलर्जी, वायरल इंफेक्शन, एडेनोओडाइटिस और एडेनोइड हाइपरट्रॉफी शामिल है. इससे मिडल ईयर यानी मध्य कान का इंफेक्शन हो सकता है या मिडिल ईयर में धीरे-धीरे वेंटिलेशन की समस्या हो सकती है.

ओएमई की घटनाएं खासकर कोविड काल के बाद ज्यादा बढ़ी हैं और इसकी वजह एडेनोइड संक्रमण और हाइपरट्रॉफी को माना जाता है. हालांकि, कोविड वायरस से इसका डायरेक्ट रिलेशन स्थापित होना अभी बाकी है, लेकिन हाल के वक्त में ओएमई के मामलों में 25 से 30 फीसदी का इजाफा हुआ है. 3 से 6 साल के बच्चों को इस समस्या की गिरफ्त में आने का ज्यादा खतरा है, ऐसे में उनकी लगातार स्क्रीनिंग और चेकअप कराने की जरूरत है. जिन बच्चों को एडोनोइड हाइपरट्रॉफी, बार-बार सर्दी, खांसी और एलर्जी होती है, उनके लिए ये जरूरी है.

अगर ओएमई की समस्या की पहचान वक्त पर न हो पाए या फिर इलाज में देरी हो जाए तो इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं. ईयरड्रम को डैमेज हो सकता है, और फिर कान की बीमारी हो सकती है. इस सबके कारण सुनने की क्षमता कम हो सकती है, कान बहने लगते हैं और दूसरी अन्य समस्याएं भी हो जाती हैं. ऐसे में ओएमई के नकारात्मक प्रभाव से बचाव के लिए इससे बचाव और शुरुआती इंटरवेंशन बेहद जरूरी है. समय पर इलाज से ओएमई की समस्या को बढ़ने से रोका जा सकता है और सुनने की क्षमता को बचाया जा सकता है.

जिन लोगों को ये समस्या होने का खतरा है उनकी लगातार स्क्रीनिंग कराने की जरूरत है. मां-बाप, केयर टेकर और मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े लोगों के बीच अवेयरनेस फैलाने के साथ ही ओएमई के शुरुआती लक्षणों के बारे में सबको बताने की जरूरत है ताकि समय पर इलाज किया जा सके.

शैक्षिक अभियान और सामुदायिक आउटरीच प्रोग्राम ओएमई की रोकथाम और मैनेजमेंट में अहम भूमिका निभा सकते हैं. कान की हेल्थ के बारे में लोगों को सचेत करके, इसके अर्ली डिटेक्शन की जानकारी देकर हम संयुक्त रूप से ओएमई से संबंधित परेशानियों से बचाव कर सकते हैं.

इस वर्ल्ड हियरिंग डे के अवसर पर सब लोग मिलकर कान और सुनने की क्षमता पर ध्यान दें, ओएमई से संबंधित रिस्क के बचाव के बारे में जागरूकता फैलाएं. हम सब मिलकर ये सुनिश्चित कर सकते हैं कि हर व्यक्ति की समय पर जांच हो, समय पर इलाज मिले और उनकी सुनने की शक्ति प्रभावित न हो. आइए मिलकर ऐसे समाज की कल्पना करें जहां हर शख्स को कान की सेहत से जुड़े मामलों में बेहतर से बेहतर ट्रीटमेंट मिल सके और वो मिडिल ईयर की समस्याओं से निजात पा सकें.

डिलीवरी से पहले कराएं Prenatal Testing ताकि ले सकें समय रहते महत्वपूर्ण फैसला

35 वर्षीय स्नेहा को जैसे ही पता लगा कि वो गर्भवती है उसे सैकड़ो चिताओं ने घेर लिया.वो ये सोच सोच कर परेशान रहती थी ,” लेट प्रेगनेंसी के साइड इफेक्ट्स बहुत ज्यादा होते है.उसका आने वाला बच्चा स्वस्थ होगा कि नहीं?”

एक दिन चेकअप के दौरान स्नेहा ने अपने मन का डर डॉक्टर से साझा किया तो उन्होंने स्नेहा को प्रीनेटल जेनेटिक टेस्ट सजेस्ट किये.क्या होता है प्रीनेटल जेनेटिक टेस्ट आप भी जान लीजिए.

प्रीनेटल जेनेटिक टेस्टिंग के तहत् कुछ ऐसी जांच शामिल होती हैं जो अजन्मे शिशु में संभावित आनुवांशिक विकारों (जेनेटिक डिसऑडर्र) की पुष्टि करती हैं.आनुवांशिक विकार किसी व्यक्ति की जीन्स में होने वाले बदलावों के कारण पैदा होते हैं.इन परीक्षणों से क्रोमोसोम में कम/अतिरिक्त क्रोमोसोम (डाउन्स सिंड्रोम) या जीन्स में होने वाले बदलावों, यानि म्युटेशंस (थैलसीमिया) का पता लगाया जाता है.जरूरी नहीं कि जेनेटिक डिसॉर्डर का कारण हमेशा आनुवांशिक ही हो.

डॉ तलत खान, डॉक्टर इंचार्ज, मेडिकल जेनेटिक्स, मैट्रोपोलिस हैल्थकेयर लिमिटेड के मुताबिक सभी गर्भवती महिलाओं को ये जांच जरूर करवानी चाहिए.दरअसल आंकड़ों के मुताबिक मैट्रोपॉलिस हैल्थकेयर लैबोरेट्री में 1 साल में प्रीनेटल जेनेटिक टेस्टिंग करवाने वाली 50,000 महिलाओं में से करीब 4 फीसदी की रिपोर्ट पॉजिटिव आयी.जो कि चिंताजनक है.लेकिन परेशानी ये है कि भारत में इस विषय पर अभी भी खुलकर बातचीत नहीं होती और यही कारण है कि जागरूकता स्तर को बेहतर बनाए जाने की जरूरत है.

अमेरिकल कॉलेज ऑफ ऑब्सटैट्रिशियन्स एंड गाइनीकोलॉजिस्ट्स (ACOG) की नवीनतम गाइडलाइंस और फेडेरेशन ऑफ ऑब्सटैट्रिक्स एंड गाइनीकोलॉजिकल सोसायटीज़ ऑफ इंडिया (FOGSI) के मुताबिक, सभी गर्भवती महिलाओं की एन्यूप्लोइडी (aneuploidy) के लिए प्रीनेटल जेनेटिक टेस्टिंग की जानी चाहिए और यह गर्भवती की उम्र या अन्य किसी भी रिस्क फैक्टर्स के संदर्भ के बगैर होनी चाहिए.
प्रेग्नेंसी की शुरुआत होते ही जल्द से जल्द जेनेटिक टेस्टिंग पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए यानी पहले ट्राइमेस्टर के दौरान क्योंकि 10 से 18 हफ्ते की प्रेग्नेंसी के समय ही जांच करवाने की सलाह दी जाती है.
सभी गर्भवती महिलाओं की जांच उनकी गेस्टेशनल एज के मुताबिक डुअल मार्कर टेस्ट (11 से 13.6 हफ्ते), क्वाड्रपल मार्कर टेस्ट (14 से 17 हफ्ते) और नॉन-इन्वेसिव प्रीनेटल टेस्टिंग (एनआईपीटी – 10 हफ्ते के बाद) होना चाहिए.ये टैस्ट नॉन-फास्टिंग ब्लड सैंपल पर किए जा सकते हैं.

यदि स्क्रीनिंग से संभावित समस्या का संकेत मिलता है, तो 30 साल से अधिक उम्र की गर्भवती, फैमिली हिस्ट्री या जेनेटिक डिसऑर्डर के रिस्क को बढ़ाने वाली मेडिकल कंडीशंस वाली महिलाओं को इन्वेसिव प्रीनेटल डायग्नॉस्टिक टेस्ट करवाने चाहिए.

ये डायग्नॉस्टिक टेस्ट, कोरियॉनिक विलस सैंपलिंग और एम्नियोटिक फ्लूइड अनॅलिसिस के आधार पर किए जाते हैं और किसी भी अनुवांशिक या जेनेटिक बीमारी की पुष्टि करने के एकमात्र साधन भी हैं.लेकिन यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि इनके साथ गर्भपात का 0.1% खतरा भी जुड़ा होता है.

महिलाओं के मन में उठने वाले सवाल

टैस्ट रिजल्ट मिलने के बाद क्या होता है?

यदि जांच के नतीजे सामान्य रेंज में होते हैं तो इनसे चिंता काफी हद तक दूर हो जाती है और प्रेग्नेंसी पर नज़र रखने के लिए रूटीन एंटीनेटल चेक-अप तथा फॉलो-अप यूएसजी की मदद ली जाती है.

क्या हाइ-रिस्क सूचना से प्रीनेटल केयर पर असर पड़ता?

प्रीनेटल टेस्टिंग से हैल्थकेयर प्रोवाइडर को उन तमाम स्थतियों की जानकारी मिल जाती है जो प्रसव के बाद इलाज के लिए आवश्यक हो सकती हैं, और इस प्रकार वे संभावित कॉम्प्लीकेशन्स के लिए पहले से तैयारी कर पाते हैं.

स्क्रीनिंग टेस्ट कितने सही होते हैं?

सामान्य ट्राइसॉमी के लिए सभी स्क्रीनिंग टेस्ट 90% संवेदी होते हैं.

क्या एम्नयोसेंटेसिस से गर्भपात (एबॉर्शन) का खतरा होता है?

एम्नियोसेंटेसिस 99.9% सुरक्षित होती है और इसमें गर्भपात का खतरा केवल 0.1% होता है.

क्या इन परीक्षणों से गर्भ में पल रहे भ्रूण के लिंग का भी पता लगाया जा सकता?

नहीं, PCPNDT गाइडलाइंस के मुताबिक, प्रसव पूर्व शिशु के लिंग की जानकारी देना गैर-कानूनी होता है.

क्या प्रीनेटल जेनेटिक टेस्ट के साथ फौलो-अप सोनोग्राफी की आवश्यकता होती है?

हां, अल्ट्रासाउंड का समय और फ्रीक्वेंसी का निर्धारण ऑब्सटैट्रिशयन द्वारा किया जाता है और यह हर मरीज के मामले में फर्क हो सकता है.

निष्कर्षः

जेनेटिक टेस्टिंग की सलाह दी जाती है ताकि आप पहली बार प्रीनेटल विजिट के दौरान ही चर्चा कर सकें.
ज्यादातर महिलाओं के मामले में दोनों जेनेटिक स्क्रीनिंग और डायग्नॉस्टिक टेस्ट नेगेटिव आ सकते हैं.
स्क्रीनिंग पर पॉजिटिव रिजल्ट आए तो दोबारा डायग्नोस्टिक टेस्ट करवाएं ताकि पुष्टि की जा सके.
यह जानकारी आगे टेस्टिंग के लिए, अतिरिक्त मेडिकल केयर, प्रेग्नेंसी के विकल्पों या प्रसव के बाद रिसोर्स/सपोर्ट की तलाश में मददगार हो सकती है.

सर्दियों में करें शिशु की देखभाल

सर्दी का मौसम शिशुओं के लिए एक नाजुक मौसम होता है. सर्दी की शुरुआत शिशुओं के लिए विशेषतौर पर बहुत संवेदनशील होती है क्योंकि शिशुओं के तापमान में व्यस्कों की अपेक्षा जल्दी गिरावट आती है. जितना छोटा शिशु होता है, उतनी ही आसानी से वह रोग से ग्रस्त हो सकता है क्योंकि उस के अंदर कंपकंपा कर अपने शरीर में गरमी उत्पन्न करने की क्षमता नहीं होती है तथा उस के शरीर में इतनी वसा भी नहीं होती है जिस का प्रयोग कर वह अपने शरीर के अंदर गरमी पैदा कर सके.

इसलिए स्वाभाविक है कि शिशु को गरम एवं सुरक्षित रखने हेतु उचित व्यवस्था की जाए.

शिशु को आवश्यकतानुसार ऊनी कपड़े पहनाएं बच्चों को मौसम के अनुसार ऊनी कपड़े पहनाना बेहद आवश्यक होता है. उन की त्वचा अत्यंत नाजुक होती है इसलिए उन्हें सर्वप्रथम कोई सूती वस्त्र पहना कर उस के ऊपर ऊनी वस्त्र, स्वैटर अथवा जैकेट आदि पहननी चाहिए क्योंकि ज्यादा गरम कपड़े पहनने पर यदि शिशु को पसीना आता है तो सूती वस्त्र उसे सोख लेता है और शिशु को आराम पहुचाता है. साथ ही ऊनी वस्त्र सीधे शिशु के संपर्क में नहीं आता है जिस से ऊनी रेशों के कारण उस की त्वचा पर किसी भी प्रकार का संक्रमण नहीं होता है और चकत्ते भी नहीं पड़ते हैं.

माताओं को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि शिशु को एक मोटा ऊनी कपड़ा पहनाने की अपेक्षा 2 कम गरम ऊनी कपड़े पहनाएं. इस से यदि सर्दी में कमी होने लगे तो वे कपड़े को उतार भी सकती हैं. इस से बच्चे की सर्दी से बचाच भी रहेगा और साथ ही उसे अनावश्यक रूप से पसीना व उल?ान का शिकार भी नहीं होना पड़ेगा. शिशु के पैर में भी उचित रूप से गरम वस्त्र जैसे पाजामा, मोजे आदि पहनाने चाहिए. सिर व हाथों को भी उचित वस्त्रों से ढकना चाहिए ताकि शिशु का शरीर गरम रह सके.

शिशु को घर के अंदर रखें

सर्दी के मौसम में अकसर तापमान में अचानक गिरावट आ जाती है और कई बार तेज हवाएं और बारिश स्थिति को और भी गंभीर बना देती है. ऐसे में शिशु को घर के अंदर रखना उचित होता है. घर का तापमान उचित रखें जिस से शिशु को अत्याधिक वस्त्र न पहनाने पड़ें. कमरे का उचित तापमान 68 डिगरी फारेनहाइट से 72 डिगरी फारेनहाइट माना गया है. रात को सोते समय कमरे का तापमान 65 डिगरी फारेनहाइट से 68 डिगरी फारेनहाइट होना चाहिए. इस से शिशु सुरक्षित रहता है और कमरे के वातावरण में नमी की कमी भी नहीं होती है.

कमरे का तापमान यदि ज्यादा गरम हुआ तो वातावरण में नमी तथा औक्सीजन की कमी हो सकती है जिस से बच्चे के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है. अत: माताओं को ध्यान देना चाहिए कि कमरे का तापमान सामान्य रूप से गरम रहे. यदि कमरे को गरम करने के लिए

हीटर या आग का प्रयोग करते हैं, तो सोने से पूर्व उसे बंद कर दे. वायु के संचार का ध्यान रखें अन्यथा औक्सीजन की कमी से शिशु की मृत्यु हो सकती है.

शिशु को बाहर ले जाते समय सावधानियां

यदि किसी कारणवश शिशु को बाहर ले जाना आवश्यक है तो उसे उचित वस्त्र पहना कर ले जाएं. समयसमय पर यह जांच करती रहें कि शिशु को कोई परेशानी तो नहीं हो रही है. घर से बाहर शिशु को अपने शरीर के पास ही रखें. मानव शरीर की गरमी से शिशु सुरक्षित रहता है. उस के सिर और पैर हमेशा ढक कर रखें. शिशु को ढक कर रखते समय या उस के शरीर को गरमाहट देते समय ध्यान रखें कि उस को सांस लेने में तकलीफ न होने पाए. यह सावधानी शिशु को वस्त्र पहनाते समय भी रखनी चाहिए.

शिशु के खानपान का ध्यान रखें

नवजात का पहला भोजन मां का दूध ही है. उसे पहले 6 माह तक मां का दूध ही देना चाहिए क्योंकि मां के दूध में शिशु के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्त्व उचित मात्रा में उपलब्ध होते हैं. इस के उपरांत शिशु को मां के दूध के साथ ऊपरी आहार देना शुरू कर देना चाहिए. शुरुआत में शिशु को दिया जाने वाला भोजन सौम्य, तरल व कुनकुना होना चाहिए. उस के बाद शिशु को अर्ध ठोस आहार देना चाहिए जैसे हलवा, खिचड़ी, मसला हुआ केला, उबला सेब आदि.

8वें माह के पश्चात जब शिशु के दांत निकलना प्रारंभ होने लगें तो उसे ठोस आहार देना चाहिए. शिशु का आहार अधिक तीखा, मिर्चमसाले वाला नहीं होना चाहिए. भोजन में समयसमय पर 1/2 से 1 छोटा चम्मच घी भी दिया जाना चाहिए. ध्यान रहे कि प्यारदुलार में ज्यादा घी न खिलाएं क्योंकि अधिक घी शिशु के लिवर के लिए हानिकारक होता है. शिशु को दिन में कई बार भोजन देना चाहिए. खाली पेट या प्रयाप्त भोजन न देने से शिशु को ठंड जल्दी लग जाएगी और आप का शिशु कुपोषित भी हो सकता है.

शिशु की त्वचा की देखभाल

सर्दी के मौसम में तापमान गिरने तथा वातावरण में हवा के संचार की कमी होने के कारण शिशु की त्वचा में रूखापन हो जाता है तथा कभीकभी उस पर चकत्ते भी पड़ जाते हैं. इस के निवारण के लिए शिशु की त्वचा को साफ रखने के लिए उसे साफ कुनकुने पानी से नहलाना चाहिए. यदि सर्दी अधिक हो तो शिशु को गरम पानी में तौलिया भिगो कर पोंछ देना (स्पंज करना) चाहिए. स्पंज ऐसे स्थान पर करें जहां गरमी हो एवं हवा शांत हो. शिशु की त्वचा रूखी न होने पाए, इस के लिए लोशन लगाएं अथवा तेल से उस की मालिश भी अवश्य करें. इस से शिशु की त्वचा मुलायम, शरीर में रक्तसंचार सही रहता है और उस के शरीर में गरमाहट भी उत्पन्न होती है. मालिश के लिए जैतून, सरसों अथवा नारियल का तेल प्रयोग कर सकते हैं.

मातापिता आलस न करें

ठंड के कारण मातापिता शिशु की देखभाल में बिलकुल लापरवाही न बरतें. यदि उन्हें या परिवारजनों में से किसी को सर्दीजुखाम हुआ है तो शिशु को उस से दूर ही रखना चाहिए क्योंकि शिशु को किसी भी बीमारी का संक्रमण जल्दी होता है. शिशु को उचित समय पर रोगप्रतिरोधक टीके अवश्य लगवाएं क्योंकि टीकाकरण बच्चों को विभिन्न जानलेवा बीमारियों से बचाता है. सर्दी के मौसम के कारण मातापिता इस में जरा भी लापरवाही न बरतें क्योंकि शिशु संवेदनशील होता है और समय से टीकाकरण उसे कई गंभीर बीमारियों से बचाता है.

शिशु को प्राय: सर्दीजुकाम होता रहता है. यदि सही से देखभाल व इलाज न किया जाए तो उसे निमोनिया हो जाने का खतरा भी हो सकता है. शिशु की नाजुक त्वचा की भी उचित देखभाल करना आवश्यक है. उसे कुछ समय तक सूर्य की रोशनी में रखना बेहद आवश्यक है क्योंकि इस से विटामिन डी मिलता है जिस से शिशु की हड्डियां मजबूत होती हैं और साथ ही शरीर में खून का सही प्रवाह शिशु को हृष्टपुष्ट बनाता है और उस की वृद्धि एवं विकास में सहयोग करता है. उस की त्वचा भी स्वस्थ रहती है.

Winter Special: बढ़ता है सर्दियों में डिप्रेशन का खतरा

सर्दियों का मौसम खान पान  के मामले में बहुत अच्छा होता हैं लेकिन इस मौसम में डिप्रेशन के मरीज़ों की संख्या अधिक बढ़ जाती हैं सर्दिया आते ही वे लोग दुखी रहने लगते हैं इस तरह के डिप्रेशन को सीज़नल अफेक्टिव डिसऑर्डर भी कहा जाता है. मतलब SAD सर्दियों में ठंड इतनी ज्यादा होती है कि  हमारा किसी काम को करने का मन नहीं करता  व बिस्तर में  लेटे  रहने का मन करता है. सर्दियों के दिनो में  मूड स्विंग बहुत ज्यादा होता हैं  यदि कोई पहले से ही डिप्रेशन का शिकार है तो इन दिनों में उसका तनाव बढ़ सकता है.तो  चलिए जानते हैं आखिर  क्यों बढ़  जाता है डिप्रेशन का खतरा.

धूप ना निकलना

मौसम के  प्रभाव के कारण जिस तरह हमारे खाने पीने कि चॉइस में बदलाव आता हैं उसी तरह हमारे  रहन सहन  में भी बदलाव आता है और मौसम का  प्रभाव हमारे मन, मस्तिष्क पर भी पड़ता है. हमारे शरीर में दो प्रकार के रसायन बनते हैं मेलाटोनिन और सेरेटोनिन. सर्दियों में सूरज जल्दी छिप जाता हैं जिस कारण रात जल्दी हो जाती  हैं  रात में  मेलाटोनिन कि मात्र बढ़ने से  नींद का संतुलन बिगड़ जाता हैं वहीं दिन में सेरेटोनिन हॉर्मोन का सीक्रेशन प्रभावित होता है. क्योंकि यह एक मूड लाइटनिंग हॉर्मोन होता है, जिसे हैपी हॉर्मोन भी कहते  हैं सूरज की रोशनी हमारी बायलॉजिकल क्लॉक को प्रभावित करती है जिसकी वजह से सेरोटोनिन का प्रोडक्शन कम होने लगता है और यह हमारे मानसिक स्वास्थ पर असर डालने लगता है.

दिनचर्या में बदलाव

ठंड अधिक रहने के कारण लोग सुबह में देर से सो कर उठते हैं जिस से दिनचर्या बिगड़ जाती है ज्यादा ठंड होने के कारण हम फिजिकली एक्टिव नहीं रह पाते जिससे  पूरा दिन काम का प्रेशर बना रहता है और वहीं प्रेशर स्ट्रेस का कारण भी बनता है. साथ ही सर्दी कि वजह से लोग घर के अंदर रहना पसंद करते हैं जिससे लोगो से मिलना  झूलना  कम हो जाता है और यही अकेलपन अवसाद का कारण बनता है.

विटामिन डी की  कमी

हम सभी जानते हैं कि धूप विटामिन डी का सबसे अच्छा स्त्रोत है सर्दियों में धूप कि कमी के कारण शरीर में विटामिन डी कि कमी होने लगती है जिस कारण हमारे शरारिक व मानसिक स्वस्थ पर असर पड़ने लगता है जिसे  कारण चिड़चिड़ाना, दर्द, तनाव बढ़ने लगता है.

क्या करें

  • विटामिन डी से भरपूर डाइट लें.
  • मौसमी फल अवश्य खाएं.
  • जब भी धूप निकले तो थोड़ी देर धूप में अवश्य बैठे.
  • रोज थोड़ी  देर के लिए व्यायाम अवश्य करें.
  • सोशल कनेक्शन को खत्म ना करें यदि आप कहीं जा ना  सकें तो फ़ोन के जरिए ही लोगो के सम्पर्क में रहें. अपने मन कि बातों को साझा करें.

खांस-खांसकर बुरा हाल है तो इसे हल्के में न लें, हो सकते हैं कैंसर के संकेत

शिवानी हर समय गले में दर्द और खांसी रहने की समस्या से परेशान रहती थी. उसने पहले घरेलू नुस्खे अपनाये. फिर आराम न मिलने पर डाक्टर से मिली और बोला,” डॉक्टर साब इतनी दवाइयां कर लीं पर आराम नहीं.”

इस पर डॉक्टर ने कहा,”थ्रोट कैंसर यानी गले के कैंसर में कई तरह के कैंसर शामिल होते हैं जिसमें लैरिनिक्स, फैरिनिक्स और टॉन्सिल्स के कैंसर होते हैं. इनके अलग-अलग लक्षण होते हैं जिनसे कैंसर का पता चलता है. इन लक्षणों पर ध्यान देकर तुरंत इलाज की जरूरत होती है. मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत , हेड व नेक कैंसर के सर्जन डॉक्टर अक्षत मलिक का मानना है कि इन लक्षणों को पहचानकर इसका इलाज कराना बेहद महत्वपूर्ण है.

गले के कैंसर के जो लक्षण होते हैं हालांकि दूसरी अन्य बीमारियों के कारण भी सामने आते हैं, लेकिन अगर ये लक्षण लगातार 2-3 हफ्तों तक दिखाई दे और वक्त के साथ-साथ हालात बिगड़ते जाएं तो इन्हें दरकिनार नहीं करना चाहिए.

लक्षण

लगातार आवाज बैठना या आवाज में बदलाव: अगर किसी का गला लगातार बैठा रहता है या आवाज दबी रहती है तो इस पर ध्यान देने की जरूरत है.

गला सूखा: अगर गला सूखा रहने की परेशानी पुरानी है या फिर लगातार ऐसा रहता है और सामान्य इलाज से भी ठीक नहीं होता तो इसे इग्नोर न करें.

निगलने में समस्या: अगर खाना निगलने में दिक्कत हो रही है तो ये ट्यूमर के लक्षण हो सकते हैं.

लगातार खांसी: आमतौर पर लोग खांसी बहुत हल्के में लेते हैं लेकिन अगर सांस की दिक्कत आदि न हो और फिर भी लगातार खांसी रहती है तो दिखाने की जरूरत है.

एस्पिरेशन: कुछ निगलने पर खांसी आती है तो समस्या है. ऐसा हवा के पाइप में खाना जाने के कारण भी हो सकता है.

कान में दर्द: एक या दोनों कानों में बिना किसी खास वजह के दर्द होना भी गले में समस्या के कारण हो सकता है.

वजन कम होना: अचानक यूं ही वजन कम हो जाना, खाना निगलने में परेशानी और खाने की आदतों में बदलाव भी कैंसर के लक्षण हो सकते हैं.

गर्दन में गांठ: अगर गर्दन में गांठ हो या सूजन हो तो ये बढ़े हुए लिम्फ नोड्स के कारण हो सकता है और इससे कैंसर फैलने के संकेत मिलते हैं.

सांस लेने में कठिनाई: अगर गले का कैंसर एडवांस स्टेज में हो तो इससे सांस की समस्या भी हो सकती है.

लगातार सांस में बदबू: अगर आप टूथब्रश करते हैं और मुंह साफ करने के अन्य तरीके भी अपनाते हैं और फिर सांसों में बदबू रहती है तो ये चिंता का कारण हो सकता है.

डॉक्टर के मुताबिक ये सभी लक्षण किसी कम गंभीर बीमारी के कारण भी हो सकते हैं. लेकिन अगर ऐसा होता है तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं. ऐसा करने से ट्यूमर होने की स्थिति में जल्दी डायग्नोज हो जाएगा और इलाज से इसे ठीक करना संभव रहेगा. वहीं, जो लोग स्मोकिंग करते हैं, तंबाकू का सेवन करते हैं, शराब पीते हैं वैसे लोग रेगुलर चेकअप कराएं और अपनी सेहत की मॉनिटरिंग रखें.

अपनी सेहत को सबसे ऊपर रखें, अवेयरनेस बढ़ाएं, समय पर डॉक्टर से सलाह लें और बेहतर इलाज लें ताकि गले के कैंसर के खिलाफ लड़ाई को जीता जा सके.

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