REVIEW: जानें कैसी है Tiger Shroff की Heropanti 2

रेटिंगः आधा स्टार

निर्माताः साजिद नाड़ियादवाला

निर्देशकः अहमद खान

कलाकारः टाइगर श्राफ,तारा सुतारिया, नवाजुद्दीन सिद्दिकी,

अवधिः दो घंटे  22 मिनट

2014 की सफल फिल्म ‘‘हीरोपंती’’ से अपने कैरियर की शुरूआत की थी,जिसका लेखन संजीव दत्ता,निर्देशन सब्बीर खान और निर्माण साजिद नाड़ियादवाला ने किया था. अब पूरे आठ वर्ष बाद उसी फिल्म का सिक्वअल ‘‘हीरोपंती’’ 29 अप्रैल को सिनेमाघरो में पहुंची है. फिल्म ‘‘हीरोपंती 2’’ के  निर्माता साजिद नाड़ियादवाला ने खुद ही इस बार कहानी लिखी है. यह बात गले नहीं उतरती कि साजिद ने क्या सोचकर अपनी इस बकवास कहानी पर फिल्म के निर्माण पर पैसे खर्च कर डाले. इससे ज्यादा बकवास फिल्म अब तक नही बनी है.

एक फिल्म के निर्माण में तकरीबन सौ से अधिक लोगों की मेहनत लगी होती है. एक फिल्म की सफलता व असफलता का असर हजार से अधिक परिवारों की रसोई पर पड़ता है. इस वजह से अमूमन मैं फिल्म की समीक्षा लिखते दर्शक फिल्म देखने न जाएं,ऐसा लिखने से बचने का प्रयास करता हॅूं,मगर ‘‘हीरोपंती 2’’ देखने का अर्थ सिरदर्द मोल लेेन के साथ ही समय व पैसे का क्रिमिनल वेस्टेज ही होगा.

कहानीः

लैला जादूगर (नवाजुद्दीन सिद्दिकी ) की आड़ में पूरे विश्व के साइबर क्राइम के मुखिया हैं. जिसने योजना बनायी है कि 31 मार्च के दिन भारत के सभी बैंको में सभी नागरिको के बैंक एकाउंट को हैककर सारा धन अपने पास ले लेंगें. बबलू( टाइगर श्राफ )दुनिया का सबसे बड़ा हैकर है,जिसकी सेवाएं कभी सीबाआई प्रमुख खान( जाकिर हुसेन ) के लिया करते थे. अब बबलू अपनी सेवाएं लैला को दे रहे हंै. लैला की बहन इनाया( तारा सुतारिया) ,बबलू से प्यार करती है. फिर बबलू का हृदय परिवर्तन भी होता है.

लेखन व निर्देशनः

फिल्म ‘‘हीरोपंती 2’’ में ऐसा कुछ नही है,जिसे अच्छा कहा जा सके. घटिया कहानी,घटिया पटकथा और घटिया निर्देशन अर्थात फिल्म ‘‘हीरोपंती 2’’ है. लेखक व निर्देशक के दीमागी दिवालिएपन की हालत यह है कि एम्बूलेंस ड्रायवर का मकान अंदर से किसी आलीशान बंगले से कमतर नही है. टाइगर श्राफ की पहचान बेहतरीन डांसर व एक्शन दृश्यों को लेकर होती है,लेकिन इस फिल्म में यह दोनो पक्ष भी कमजोर हैं. फिल्म में कई एक्शन दृश्य ऐसे है, जिन्हे देखते हुए लगता है हम मोबाइल पर एक्शन का वीडियो देख रहे हो. मजेदार बात यह है कि एक्शन दृश्य देखकर हंसी आती है. एक व्यक्ति दोनों हाथांे में मशीनगन पकड़कर टाइगर श्राफ पर गोलियां चला रहा है,मगर टाइगर पर असर नही पड़ता. तो वहीं कहीं किसी भी दृश्य के बाद कोई भी गाना ठूंस दिया गया है. फिल्म में एक भी दृश्य ऐसा नही है,जिसमें कुछ नयापना हो. सब कुद बहुत बचकाना सा है. अब तीन मिनट के सिंगल गानों के जो म्यूजिक वीडियो बन रहे हैं,उनमें भी एक अच्छी कहानी होती है,मगर ‘हीरोपंती 2’’ की पटकथा इतनी खराब लिखी गयी है कि दर्शक अपना माथा पीटता रहता है.

अहमद खान अच्छे नृत्य निर्देशक रहे हैं,मगर बतौर निर्देशक वह बुरी तरह से मात खा गए हैं. वैसे अहमद खान ने इससे पहले ‘बागी 2’ और ‘बागी 3’ जैसी अर्थहीन फिल्मंे  निर्देशित कर चुके हैं.

फिल्म में एक दृश्य पांच सितारा होटल के अंदर से शुरू होता है,जहां इयाना (तारा सुतारिया ) बबलू (टाइगर श्राफ ) की होटल के बाहर बीच सड़क पर अपने आदमियों से बबलू की पैंट उतरवाकर  पीठ के नीचे कमर पर तिल की तलाश करवाती है. यह अति भद्दा व वाहियात दृश्य है. इसे करने के लिए टाइगर श्राफ क्या सोचकर तैयार हुए,पता नही. जबकि इस दृश्य से कहानी का कोई लेना देना नही है.

इसके संवाद भी अति घटिया हैं. फिल्म में नवाजुद्दीन का संवाद है-‘‘यह तुम्हारी मां है और यह मेरी बहन है. अब तुम दोनो जाकर मां बहन करो. ’’

लैला यानी कि नवाजुद्दीन सिद्दिकी के कम्प्यूटर रूम में सीसीटीवी कैमरा लगा है,जो कि अजीब ढंग से घूमता रहता है. यह कैमरा क्यों लगा हुआ है,किस पर निगाह रख रहा है,पता ही नहीं चलता.

अभिनयः

इनाया के किरदार में तारा सुतारिया का अभिनय अति घटिया है. पूरी फिल्म में वह विचित्र से कपड़े पहने,विचित्र सी हरकतें करते हुए नजर आती है.

जादूगर लैला के किरदार में नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने अब तक का सबसे निम्न स्तर का अभिनय किया है. वह कभी ट्रांसजेंडर की तरह हाव भाव करते व चलते नजर आते हैं,तो कभी कुछ अलग ही चाल ढाल होती है. नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने इस फिल्म में क्यों काम किया,यह समझ से परे है. शायद वह सिर्फ पैसा बटोरने के चक्कर में कला व अभिनय को तिलांजली देने पर उतारू हो चुके हैं.

टाइगर श्राफ हर दृश्य में अपना सपाट सा चेहरा लिए हुए नजर आते हैं. उनके चेहरे पर कहीं कोई भाव नहीं आते. बेवजह उछलकूद करते हुए नजर आते हैं.

अफसोस की बात यह है कि इस बकवास फिल्म के गीतों को संगीत से ए आर रहमान ने संवारा है. फिल्म के गाने घटिया हैं और बेवजह फिल्म के बीच बीच में ठॅूंसे गए हैं. फिल्म के अंत में ‘व्हिशल बाजा’ प्रमोशनल गाने में कृति सैनन को देखकर लगा कि शायद अब उनका कैरियर पतन की ओर जाने लगा है.

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REVIEW: समाज के कड़वे सच को उभारती नवाजुद्दीन सिद्दिकी की फिल्म ‘सीरियस मेन’

रेटिंग: साढे़ तीन स्टार

निर्माता व निर्देशक: सुधीर मिश्रा
लेखक: भावेश मंडालिया
कलाकारः नवाजुद्दीन सिद्दिकी,  इंदिरा तिवारी, अक्षत दास, श्वेता बसु प्रसाद,  नासर, संजय नार्वेकर व अन्य
अवधिः एक घंटा 54 मिनट
ओटीटी प्लेटफार्मः नेटफ्लिक्स

जून 2010 में मनु जोसेफ का एक उपन्यास ‘‘सीरियस मेन’’ प्रकाशित हुआ था और देखते ही देखते यह काफी लोकप्रिय हो गया था. अब इसी उपन्यास पर इसी नाम से फिल्मकार सुधीर मिश्रा फिल्म लेकर आए हैं, जो कि दो अक्टूबर से ‘‘ओटीटी’’प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स पर देखी जा सकती है. भारत के भविष्य को लेकर जो सपने दिखाए जा रहे हैं, उस पर यह फिल्म अति तीखा व्यंग है.

यह एक आम भारतीय की कहानी है, जो बेहतर जीवन जीने की आस को पूरा करने के लिए सारे नैतिक सिद्धांतो व मापदंडों की परवाह किए बगैर किसी भी हद तक जा सकता है.

कहानीः

फिल्म की कहानी के केंद्र में मुंबई के सिद्धांत और अनुसंधान संस्थान में एक ब्राह्मण खगोलशास्त्री डाॅ. अरविंद आचार्य (नासर)के सहायक के रूप में काम करने वाले मध्यम आयु के तमिल दलित अय्यन मणि(नवाजुद्दीन सिद्दिकी) के इर्द गिर्द घूमती है. जो कि मुंबई के वर्ली इलाके की बीडीडी चाल में किराए की खोली में अपनी पत्नी ओजा(इंदिरा तिवारी)और बेटे आदि के साथ रहता है. दलित होने के चलते उसने खेतों में काम करने वाले अपने माता पिता की तकलीफांे को देखा है. अपने समुदाय में वह पहला बालक था, जिसे पढ़ने का मौका मिला था. अब वह तय करता है कि जो कुछ उसके माता पिता या उसने इस समाज में झेला है,  वह सब वह अपने बेटे आदि(अक्षत दास)के जीवन में नही आने देगा.

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मुंबई के सिद्धांत और अनुसंधान संस्थान में अय्यान अपने ब्राह्मण बाॅस डाॅ. आचार्य को खुश करने के लिए जितना अधिक प्रयास करता है, उतना ही उसे अप्रिय व्यवहार मिलता है. अय्यान इसे डाॅ.  आचार्य की बेवकूफी मानता है.

अय्यन एक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में अपने बेटे के प्रवेश के लिए डाॅ.  आचार्य का पत्र लेकर जाता है, मगर पता चलता है कि डाॅ. आचार्य ने स्कूल के प्रबंधक से कह दिया कि पत्र को नजरंदाज कर मैरिट पर ही प्रवेश दिया जाए. परिणामतः आदि को स्कूल मंे प्रवेश नही मिलता है. अय्यन को लगता है कि वह दलित है,  इसलिए ब्राम्हण कुल के डाॅ. आचार्य ने इस तरह उसका अपमान किया है. अपने अपमान में जल रहे अय्यन अपनी अपमान जनक कहानी विकसित कर अपने 10 वर्षीय साधारण बुद्धि के बेटे आदि को झूठ का सहारा लेकर एक गणितीय प्रतिभा के रूप में समाज के सामने लाता हैै. आदि को सिंगापुर के विज्ञान संस्थान से पुरस्कृत किया जाता है, तब उसी स्कूल की प्रिंसिपल खुद आदि को बुलाकर अपने स्कूल में प्रवेश देती है. अय्यन अपने बेटे आदि को हथियार बना, उसे रटाते हुए शिक्षकों को भी मात देता रहता है, तो वहीं आदि अपने आश्चर्यजनक गणित- सुलझाने के कौशल के साथ प्रिंसिपल का संरक्षण प्राप्त करता है. इधर अय्यन अपने तरीके से आदि को गणित व विज्ञान में महारथी साबित करता रहता है,  जिसके चलते एक दिन स्कूल की प्रिंसिपल, अय्यान से कहती है कि वह अपने संस्थान के चपरासी की तरह क्रिश्चियन धर्म को स्वीकार कर ले, तो उसे कई तरह की आर्थिक व अन्य सुविधाएं मिल सकती हैं. पर अय्यन इसे ठुकरा देता है.  अच्छी शिक्षा और प्रतिभा इंसान को न सिर्फ बेहतर जीवन जीने योग्य बनाती है, बल्कि उसे जातिवाद के चक्रब्यूह को भी तोड़ने में मदद करती है. मगर अय्यन तो कुछ और ही सोच के साथ कदम आगे बढ़ता है.

अय्यन को पता है कि पीड़ित कार्ड को खेलकर वह क्या कर सकता है,  पर इसी खेल में वह खुद को कब वास्तविकताओं से कोसो दूर लेकर चला जाता है, इसका अहसास उसे भी नहीं हो पाता. आदि की बनावटी प्रतिभा कौशल का प्रभाव मीडिया और राजनेताओ पर भी है. क्षेत्र के नेता केशव(संजय नार्वेकर) और उनकी एमबीए पास बेटी अनुजा (श्वेता बसु प्रसाद )अपने निजी स्वार्थ के चलते आदि के कौशल का उपयोग करते हैं. एक दिन ऐसा आता है, जब अय्यन,  बदले की आग में जलते हुए डां आचार्य को नौैकरी से निकलवाने में कामयाब हो जाते हैं. क्योंकि डाॅं आचार्य का माइक्रो एलियन व ब्लैक होल की खोज भी झूठ का पुलंदा ही होता है.  उसके बाद कहानी में कई मोड़ आते हैं. अंततः एक दिन यह झूठ अय्यन मणि व आदि दोनांे के नियंत्रण से बाहर हो जाता है.

निर्देशनः

बतौर निर्देशक सुधीर मिश्रा ने लंबे सम बाद पुनः वापसी की है और वह एक बार फिर इस बात को साबित करने में सफल हो रहे हैं कि उनके अंदर की आगे ठंडी नही हुई है. उन्हे आज भी सामाजिक बुराइयों और भेदभाव का अहसास है, जिस पर वह कटाक्ष करने से नहीं चुकेंगे. सुधीर मिश्रा उन फिल्म फिल्मकारों में से हैं, जिन्हे राजनीति की अच्छी समझ है. जाति-आधारित आरक्षण, पिता पुत्र का संबंध, राजनीति सहित हर मुद्दे पर सुधीर मिश्रा ने अपनी विचारधाराओं को अच्छी तरह से गढ़ने में सफल रहे हैं. अपनी पिछली फिल्मों के ही तर्ज पर ‘‘सीरियस मेन’’उन्होने एक बार फिर गरीब व बीडीडी चाल की खोली में रहने वालों की महत्वाकांक्षाओं और उनके दमन को रेखांकित किया है. वहीं निर्देशक ने अपनी फिल्म के माध्यम से सवाल उठाया है कि अपनी महत्वाकांक्षाओ व खुशी को पाने के लिए अपने बेटे के बचपन को हथियार के तौर पर उपयोग करना कितना जायज है?यह सुधीर मिश्रा के निर्देशन की ही खूबी है कि फिल्म संदेश देेने के साथ ही मनोरंजन भी करती है.

फिल्म की एक खासियत यह है कि क्रूर समाज का सर्वाधिक प्रभाव झेलने वाला आदि अंततः लड़खड़ाने लगता है, पर वह अपने चरित्र दोष को बचाने का प्रयास नही करता.

फिल्म में अनावश्यक रूप से सेक्स दृश्य व कुछ अवांछित अश्लील संवादों को पिरोया गया है, यदि फिल्मकार इससे ख्ुाद को बचा लेते तो यह फिल्म पूरे परिवार के साथ देखी जा सकती.
फिल्म में कुछ प्रतीकात्मक दृश्य काफी बेहतरीन बन पड़े हैं. मसलन-अय्यन द्वारा कब्जा किए हुए कबूतरों को पिंजड़े से मुक्त करना, पर भारी बारिश के चलते कबूतरों का पुनः वापस आ जाना. यह दृष्श् इस बात का प्रतीक है कि कैसे खुद को मुक्त करने के बावजूद अय्यन मणि अभी भी फंसे हुए हैं.

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अभिनयः

नवाजुद्दीन सिद्दीकी बेहतरीन अभिनेता हैं, इसमें कोई षक नही रहा. अय्यान के गुस्से को जिस तरह से वह परदे पर उकेरते हैं, उससे हर किसी को उनसे हमदर्दी हो जाती है. ओजा के किरदार में इंदिरा तिवारी का अभिनय भी अच्छा है. वैसे इंदिरा तिवारी के हिस्से फिल्म में करने के लिए बहुत कम आया है. बाल कलाकार अक्षय दास ने आदि के किरदार में जान डाल दी है. फिल्म का असली स्टार तो वही है.  डाॅ. अरविंद आचार्य के किरदार में नासर याद रह जाते हैं. राजनेता केशव के किरदार में संजय नार्वेकर और उनकी बेटी अनुजा के किरदार में श्वेता बसुप्रसाद अपने अभिनय की छाप छोड़ जाते हैं.

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साधारण कद काठी के अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने अपने अभिनय बल पर यह सिद्ध कर दिया है कि कलाकार को सिर्फ अभिनय का मौका मिलना बहुत आवश्यक  है, ताकि वह अपनी प्रतिभा को आगे ला सकें. हालांकि इसके लिए उन्होंने सालों बहुत मेहनत किये, पर आज वे अपनी कामयाबी से खुश है और नयी-नयी भूमिकाएं करने की चुनौती को स्वीकार रहे है. किसान परिवार में जन्में नवाज को बचपन से ही अभिनय का शौक था और इसके लिए उन्होंने हर तरह का प्रशिक्षण लिया और अभिनय क्षेत्र की ओर मुड़े. देर से ही सही पर आज उनका नाम नामचीन अभिनेताओं की सूची में शामिल हो चुका है. उनके हिसाब से वक़्त बदलता है, पर इंडस्ट्री कभी नहीं बदलती. नवाज ने कई ग्रे शेड के अभिनय किये और सफल रहे, पर अब उन्होंने रोमांटिक कौमेडी ड्रामा फिल्म ‘मोतीचूर चकनाचूर’ में पुष्पिंदर त्यागी की भूमिका निभा रहे है, उनसे मिलकर बात करना रोचक था, पेश है अंश.

सवाल-फिल्म में आपने दिखाया है कि शादी को लेकर आप चूजी नहीं, किसी भी लड़की से आपकी शादी हो जानी चाहिए, क्या रियल लाइफ में आप ऐसे ही थे?

मैंने अपनी शादी को लेकर बहुत अधिक सोचा नहीं था,क्योंकि काम और कैरियर को लेकर मैं बहुत व्यस्त था. संघर्ष ही कर रहा था, ताकि कुछ अच्छा काम मिले, ऐसे में विवाह को लेकर अधिक चिंता नहीं थी.

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सवाल-शादीशुदा जिंदगी में सामंजस्य रखना कितना जरुरी है?

शादी में एक दूसरे के काम को समझना और उसे सम्मान देना बहुत जरुरी है. मैं एक मध्यमवर्गीय परिवार से हूं, जहाँ मेहनत काम के लिए करना पड़ता है. कई बार काम करते हुए रात भी हो जाती है, समय का पता नहीं चलता, ऐसे में घर पर रहने वाले व्यक्ति को समझने की बहुत जरुरत होती है.

सवाल-फिल्म इंडस्ट्री में शादी लोग जल्दी नहीं कर पाते, क्योंकि कैरियर की बात होती है, आपकी सोच इस बारें में क्या है? किस उम्र में शादी कर लेना सही होता है?

शादी की उम्र से कोई लेना-देना नहीं होनी चाहिए. जब आपको अपना मनपसंद साथी मिले, आप शादी कर सकते है. कैरियर को सेट करने के बाद शादी करना अच्छा होता है.

सवाल-इस फिल्म में आपको खास क्या लगा?

मेरी फिल्मों को पूरा परिवार कभी नहीं देख सकते थे, क्योंकि मेरी फिल्मों में एडल्ट कन्टेन अधिक रहता था. ग्रे, डार्क या इंटेंस फिल्में होती थी, जिसमें रोमांस की कोई जगह नहीं होती थी. ये फिल्म रोमकौम फिल्म है, जिसे पूरा परिवार साथ बैठकर देख सकते है. ये मेरी पहली ऐसी फिल्म है और इसे करने में भी बहुत मज़ा आया. अभी मेरी बेटी शोरा 9 साल की हो गयी है और वह मेरी फिल्में नहीं देख पाती थी, अब मैंने उसका ख्याल रखा है. ये कॉमेडी और गुदगुदाने वाली फिल्म है. किसी प्रकार के वल्गर जोक्स इसमें नहीं है. इसे करते हुए बहुत अच्छा लगा. इसके अलावा इस फिल्म के लिए अधिक तैयारियां भी नहीं करनी पड़ी,क्योंकि यह एक आम लडके की कहानी है.

सवाल-अथिया शेट्टी के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

अथिया ने इस फिल्म के लिए पिछले 3 महीने से मेहनत की है. उसने सारे संवाद अच्छी तरह से याद किये और उसी लहजे में बोले है,जो अच्छी लगी.

सवाल-लोग विदेश जाने को लेकर बहुत उतावले रहते है, पहली बार आप विदेश कब गए? आपकी रिएक्शन क्या थी?

विदेश जाना हर कोई पसंद करता है. मैं पहली बार दुबई एक्टिंग की वर्कशौप लेने गया था.

सवाल-आपने एक सफल कैरियर तय किया है, क्या कोई मलाल अभी बाकी है?

मैंने इंटेंस भूमिका बहुत निभाई है और अब लव स्टोरी करने की इच्छा है. मैं लाइट स्टोरी पर ध्यान देना चाहता हूं. इंटेंस भूमिका करने पर दिमाग पर बहुत जोर लगता है. बहुत डिटेल चरित्र में जाना पड़ता है. इस तरह की फिल्मों में अधिक डिटेल में जाना नहीं पड़ता .लोग इन्हें जानते है और मैं भी आसपास में ऐसे कई चरित्र को देखता हूं.

सवाल- कोई ऐसा चरित्र जिससे निकलने में समय लगा हो?

मंटो और ठाकरे ऐसी ही फिल्में थी ,जिससे निकलने में मुझे महीनों लगे थे. उस चरित्र से बाहर निकलना ही पड़ता है नहीं तो आप उस कॉम्फोर्ट जोन में चले जाते है. सेल्फिश होकर उससे अपने दिल से निकालना पड़ता है, क्योंकि ऐसा न करने पर अगले चरित्र में भी उसकी झलक देखने को मिलती है. नए भूमिका को हमेशा जीरो लेवल से ही शुरू करना अच्छा होता है.

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सवाल-आप लक या हार्डवर्क किस पर अधिक विश्वास करते है?

मैं लक पर नहीं मेहनत, पर अधिक विश्वास करता हूं.  मैं एक प्रशिक्षित कलाकार हूं और अच्छी अभिनय की हमेशा कोशिश करता हूं.

सवाल-अवार्ड आपके लिए कितना महत्व रखते हूं?

अवार्ड का महत्व तब होता है जब उसका आकलन सही तरीके से हो. मेरा उसपर अधिक विश्वास नहीं है. अगर पुरस्कार स्किल और एबिलिटी को देखकर दिया जाय, तो अच्छा लगता है.

सवाल-आपकी आगे आने वाली फिल्में कौन सी है?

मेरे भाई एक फिल्म मेरे साथ बना रहे है. बहुत ही इंटेंस लव स्टोरी है. इसके अलावा बांग्लादेश के लिए ‘मुस्तफा फारुखी’ एक फिल्म कर रहा हूं. जिसकी शूटिंग न्यूयार्क और सिडनी में होने वाली है. अलग-अलग भाषा में काम करते हुए मुझे बहुर ख़ुशी होती है और ये एक कलाकार के लिए जरुरी होता है. इससे आप बहुत कुछ सीखते है.

मैं कोई रईस बाप का बेटा नहीं : नवाजुद्दीन सिद्दीकी

हिंदी फिल्म ‘शूल’ और ‘सरफरोश’ से अभिनय कैरियर की शुरुआत करने वाले अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरपुर जिले के बुधाना कस्बे के एक किसान परिवार से हैं. अभिनय की इच्छा उन्हें बचपन से ही थी. यही वजह थी कि विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने दिल्ली के नेशनल स्कूल औफ ड्रामा से भी स्नातक की शिक्षा पूरी की और थिएटर में अभिनय करने लगे. शुरुआत में उन्होंने कई बड़े और छोटे फिल्मों में काम किया, पर वे अधिक सफल नहीं रहे. असली पहचान उन्हें फिल्म पिपली लाइव, कहानी, गैंग्स औफ वासेपुर, लंचबौक्स जैसी फिल्मों से मिली. साधारण कदकाठी के होते हुए भी उन्होंने फिल्मों में अपनी एक अलग पहचान बनायीं. अभी उनकी फिल्म ‘फोटोग्राफ’ रिलीज पर है. जिसे लेकर वे काफी उत्सुक हैं. पेश है कुछ अंश.

इस फिल्म में आपकी चुनौती क्या रही?

इसमें अपने आपको साधारण रखना ही चुनौती थी. निर्देशक रितेश बत्रा ने मुझे एक आम फोटोग्राफर की तरह लुक रखने को कहा, जो मेरे लिए आसान नहीं था, क्योंकि एक्शन बोलते ही एक्टिंग का सुर लग जाता है और उसी को निर्देशक ने दबाया है. एक्टिंग न करना ही इसमें चुनौती रही. जब हम कैजुअल होते थे, तभी निर्देशक उसे शूट करता था.

आपने इस चरित्र के लिए क्या-क्या तैयारियां की है?

गेट वे औफ इंडिया से कई फोटोग्राफर को बुलाया गया और उनके काम को मैंने नजदीक से देखा और पाया कि कैसे वे पूरा दिन काम करते हैं, दोपहर तक कैसे थक जाते हैं आदि सभी को फिल्म में दिखाने की कोशिश की गयी है.

आपने पहला पोर्टफोलियो कब बनाया था?

मैं साल 2000 में मुंबई आ गया था. उस समय मेरे पास पैसे नहीं थे, इसलिए वर्ष 2003 में मैंने पहला पोर्टफोलियो बनाया था.

इस फिल्म में दिखाए गए बेमेल रिलेशनशिप पर आप कितना विश्वास रखते हैं?

ऐसे रिश्ते बहुत होते हैं और इसमें मैं विश्वास रखता हूं. फिल्मों में उन्ही घटनाओं को दिखाया जाता है, जो रुचिकर और अलग हो. जिसमें ड्रामा होता है. इसमें एक पड़ाव है कोई ड्रामा नहीं है.

शादी का प्रेशर आप पर कितना था और अपने रिश्ते को परिवार तक कैसे ले गए?

मुझपर अधिक शादी का प्रेशर नहीं था. मैंने अपने रिश्ते को बताया और उन्होंने हां कर दी.

आपकी फिल्में लगातार आ रही हैं क्या आपको ओवर एक्सपोज होने का डर नहीं है?

मैंने अपने जीवन में थिएटर में 211 चरित्र निभाए हैं. 200 नाटक किये हैं और रियल लाइफ में मैंने तकरीबन 3 हजार लोगों को औब्जर्व किया है, क्योंकि जब मेरे पास काम नहीं था. आगे के सौ साल भी मेरे लिए कोई मुश्किल नहीं, क्योंकि मेरे पास मसाला बहुत है. मैंने हर तरह के लोगों के साथ मिलकर समय बिताया है, मैं कोई रईस बाप का बेटा नहीं हूं, जिसे आस-पास के बारें में पता न हो.

क्या आपको लगता है कि अभी फोटोग्राफ की कोई एल्बम नहीं बनती, जिसे देखकर पुरानी बातों की यादें ताजा की जा सके?

ये सही है कि अब यादें जल्दी धुंधली पड़ जाती है, क्योंकि मोबाइल और उसकी तस्वीरें अधिक दिनों तक नहीं रहती, पर जमाना ऐसा है और लोग इसे ही पसंद कर रहे हैं. तस्वीरों की एल्बम होना आवश्यक है, जिसे आप बाद में याद कर सकें.

आपने खेतिहर किसानों के लिए अपने गांव में काफी सारा काम किया है, अभी वह कैसा चल रहा है?

मैंने डेढ़ साल से गांव में जाना कम कर दिया है. मेरा किसान भाई आधुनिक तरीके से खेती कर रहा है, जिसमें कम पानी में अधिक फसल उगाई जा सकती है. इसके लिए अधिक से अधिक प्रयोग किसानों को करना जरुरी है, क्योंकि हमारे यहां ट्यूबवेल से जो पानी आता है. उसका लेवल कम हो रहा है. पहले जब मैं खेती करता था तो 80 फीट पर पानी आ जाता था. अब 400 फीट पर पानी आता है. मैं चाहता हूं कि किसानों में इस बारें में जागरूकता बढे. अभी हमारे गांव के आसपास के क्षेत्र में काम हो रहा है, आगे और अधिक काम करने की इच्छा है.

आप स्टारडम को कितना एन्जाय करते हैं?

मैं अभी काम कर रहा हूं, स्टारडम को एन्जाय करने का समय नहीं है.

क्या दूसरे भाषाओं की फिल्में करने की इच्छा है?

मैं अच्छी किसी भी भाषा की कहानी को करना पसंद करता हूं.

अभी आप अपने व्यक्तित्व में क्या परिवर्तन पाते हैं?

मेरी पर्सनालिटी कभी कुछ खास नहीं थी. मैंने सोच रखा था कि मुझे जो काम मिलेगा, उसे मैं करता रहूंगा. मेरा कोई ड्रीम नहीं था, उसकी कोई शुरुआत भी नहीं थी, पर अब मैं खुश हूं.

फिल्म रिव्यू : ठाकरे

रेटिंग : दो स्टार

इन दिनों बौलीवुड में बायोपिक फिल्मों का दौर जारी है. इसी दौर में महाराष्ट्र के राजनीतिक दल ‘‘शिवसेना’’ के नेता व सांसद संजय राउत शिवसेना प्रमुख रहे बाल केशव ठाकरे यानी कि बाला साहेब ठाकरे के कृतित्व पर आधारित फिल्म ‘‘ठाकरे’’ लेकर आए हैं, जिसका पहला भाग 25 जनवरी को सिनेमाघरों में पहुंचा है.

बाल केशव ठाकरे अपने समय के सर्वाधिक विवादास्पद इंसान थे. वह महाराष्ट्रियन के लिए समान अधिकार की लड़ाई लड़ने वाले सम्मानजनक इंसान थे. मगर यह फिल्म एक निष्पक्ष व बेहतरीन बायोपिक फिल्म की श्रेणी में नहीं गिनी जा सकती.

फिल्म की शुरुआत होती है लखनऊ में बाबरी विध्वंस केस की सुनवाई के लिए अदालत के अंदर बाला साहेब ठाकरे के आगमन के साथ. अदालत में वकील के सवालों के जवाब के साथ ही कहानी अतीत में जाती है. बाला साहेब ठाकरे मुंबई के एक अखबार मेंकार्टूनिस्ट के रूप में नौकरी कर रहे हैं. ठाकरे अपने कार्टून में सच को व्यंग के साथ पेश करते हैं, पर इससे अखबार के मालिक के सामने समस्या पैदा होती है और बाला साहेब ठाकरे नौकरी से त्यागपत्र देकर मुंबई के ‘ईरोज’ थिएटर में महाराष्ट्यिन यानी कि मराठी भाषी लोगों का अपमान करने वाली फिल्म देखकर वह मराठियों के लिए क्रांति लाने का मन बनाते हैं.

Thackrey

उन्हे लगता है कि मुंबई व महाराष्ट्र पर गैर मराठियों, गुजराती, दक्षिण भारतीयों व गैर महाराष्ट्रिट्यन का ही शासन है. इसलिए वह मराठियों की लड़ाई लड़ने के लिए  ‘मार्मिक’ नामक मराठी भाषा में साप्ताहिक पत्र निकालने का ऐलान करते हैं, जिसका सर्मथन उनके पिता प्रबोधन ठाकरे भी करते हैं. ‘मार्मिक’ के पहले अंक का विमोचन महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री यशवंतरावचौहाण करते हुए बाला साहेब ठाकरे की काफी तारीफ करते हैं. मार्मिक में समाज के सच का चित्रण होता है.

मार्मिक की लोकप्रियता के बाद वह आम लोगों की समस्याओं का निवारण करने लगते हैं. फिर अपने पिता के कहने पर ‘शिवसेना’का गठन करते हैं. राजनीति के साथ समाज सेवा के कार्य शुरू होते हैं. गैर मराठी भाषियों के खिलाफ आंदोलन करवाते हैं.शिवसैनिक हिंसा का सहारा लेते हैं, जिसका बाला साहेब ठाकरे पूरा समर्थन करते हैं. पुलिस विभाग में भी तमाम लोग बाला साहेब ठाकरे का समर्थन करने के साथ साथ उनके साथ हो जाते हैं.

बेलगाम व करवार को महाराष्ट्र में शामिल करने के आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के मुंबई आगमन पर उनसे मिलने का बाला साहेब ठाकरे असफल प्रयास करते हैं, पर शिवसैनिक व पुलिस के बीच मुठभेड़ और फिर शिवसैनिकों द्वारा मुंबईशहर में जमकर तोड़फोड़ और आगजनी की जाती है. उस वक्त महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री वसंत राव नाइक का उन्हे मौन समर्थन प्राप्त रहता है. केंद्र सरकार के सख्त रवैये के चलते बाला साहेब ठाकरे को गिरफ्तार किया जाता है, पर मुंबई बंद रहती है.

जार्ज फर्नांडिस जेल में ठाकरे से मिलकर उनकी तारीफ करते हैं कि उन्होंने मुंबई को बंद किया. बीच में एक बार वह मुस्लिम लीग के मंच पर जाकर भाषण देते हैं कि उन्हे किसी के धर्म से परहेज नहीं है, पर उन्हे मिलकर काम करना रहना चाहिए और ईद के साथ शिवाजी जयंती भी मनानी चाहिए. पर बात नहीं बनती. 1966 से शिवसेना की गतिविधियों, आपातकाल के दौरान मुंबई आने पर प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से मिलकर बाला साहेब ठाकरे अनुशासन के नाम पर आपातकाल का समर्थन कर‘शिवसेना’ पर बैन लगाने के प्रस्ताव को खारिज कराने में सफल हो जाते हैं. मुंबई महानगर पालिका और फिर महाराष्ट्र मेंशिवसेना की सरकार बनने पर मनोहर जोशी द्वारा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने तक की कहानी है. इसके आगे की कहानी फिल्म के दूसरे भाग में दिखायी जाएगी.

Nawazuddin-Siddiqui

यूं तो बाला साहेब ठाकरे के जीवन व कृतित्व को ढाई घंटे की फिल्म में समेटना असंभव है, मगर संजय राउत की कहानी पर लेखक व निर्देशक अभिजीत पनसे ने एक बेहतरीन प्रचारात्मक फिल्म बनायी है. उन्होंने फिल्म में बाला साहेब ठाकरे के व्यक्तित्व व सोच को सही ढंग से चित्रित करने का सफल प्रयास किया है. पर यह फिल्म बाला साहेब ठाकरे का महिमा मंडन है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता.

यूं तो राजनीतिक व्यक्ति पर बनने वाली फिल्म में सच व कूटनीति के बीच रेखा खींचना आसान नहीं होता. पर इस फिल्म में फिल्मकार अभिजीत पनसे ने सच की बजाय कूटनीति को ही महत्व देते हुए बाला साहेब के प्रशंसकों को खुश करने का प्रयास किया है. फिल्म में इसी हिसाब से राजनीतिक घटनाक्रमों को भी पिरोया गया है. फिल्म में लोकतंत्र व राजनीति को लेकर उनकी सोच व पसंद को भी सही ढंग से उकेरा गया है. मगर यह निष्पक्ष व बेहतरीन बायोपिक फिल्म की बजाय प्रचारात्मक फिल्म बनकर उभरती है.

राष्ट्रवाद के नाम पर फिल्म में दक्षिण भारतीयों के खिलाफ ‘‘उठाओ लुंगी बजाओ पुंगी’ जैसा संवाद प्रमुखता से है, तो वहींशिवसैनिकों द्वारा मार्क्सवादी नेता कृष्णा देसाई की हत्या को मील के पत्थर के रूप में चित्रित किया गया है. तो वहीं बाबरी मस्जिद को गिराना व जय श्रीराम के नारों का भी उपयोग है.

फिल्म की विडंबना यह है कि बाला साहेब ठाकरे ने गैर महाराष्ट्यिन के खिलाफ अपनी राजनीतिक पार्टी शुरू की थी और वह इनके खिलाफ आवाज उठाते रहे, पर यह फिल्म ऐसे ही गैर महाराष्ट्रियन लोगों के सहयोग से बनी है, जिस तरह मुंबई के विकास में इन गैर महाराष्ट्यिन का योगदान रहा है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो एक निडर और कुछ भी कर सकने वाले इंसान की छवि वाले बाला साहेब ठाकरे को परदे पर जिस तरह से नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने अपने अभिनय से जीवंतता प्रदान की है, उसके लिए वह बधाई के पात्र हैं. नवाजुद्दीन की अभिनय प्रतिभा के बल पर बाला साहेब ठाकरे एक सशक्त चरित्र बनकर उभरते हैं. मीनाताई के किरदार में अमृता राव ने काफी सधा हुआ अभिनय किया है. इंदिरा गांधी का किरदार निभाने वाली अदाकारा पूरी तरह से मात खा गयी हैं. फिल्म में इंदिरागांधी का किरदार महज रोबोट बनकर रह गया है.

लगभग ढाई घंटे की अवधी वाली फिल्म ‘‘ठाकरे’’ का निर्माण ‘वायकौम 18 मोशन पिक्चर्स’, डा श्रीकांत भासी, वर्षा संजय राउत, पुर्वशी संजय राउत व विधिता संजय राउत ने किया है. फिल्म के निर्देशक अभिजीत पनसे, कहानीकार संजय राउत,पटकथा लेखक अभिजीत पनसे, संवाद लेखक अरविंद जगताप व मनोज यादव, संगीतकार रोहन रोहन, संदीप शिरोड़कर,पार्श्वसंगीत अमर मोहिले, कैमरामैन सुदीप चटर्जी तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं – नवाजुद्दीन सिद्दिकी,अमृता राव, सुधीर मिश्रा, अब्दुल कादिर अमीन, लक्ष्मण सिंह राजपूत, अनुष्का जाधव, निरंजन जवीर, डा. सचिन ए जयंत,विशाल सुदर्शनवार, राधा सागर, सतीश अलेकर, आनंद विकास पोटदुखे व अन्य.

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