नजरिया: क्यों पुरुषों से नफरत करती थी सुरभि

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नजरिया: भाग 3- क्यों पुरुषों से नफरत करती थी सुरभि

आज फिर से नई ऊर्जा का संवरण हो चुका था. उस ने स्वयं से वादा किया कि अब वह अपने सपनों को साकार करेगी. 4-5 दिन पंख लगा कर उड़ गए. वही पुरानी सुरभि अपने अंदर उसे नजर आने लगी, जिस ने कभी भी हिम्मत नहीं हारी. आज खुद से किया वादा उसे आत्मविश्वास से परिपूर्ण कर नए नजरिए से समझने के लिए प्रेरित कर रहा था.

दिल्ली घर वापस आने तक सुरभि का जैसे दोबारा जन्म हो गया था.

राहुल की बातों ने सोई हुई लालसा को जगा दिया था. आज उस के अंतस में सुरभि महक रह थी. कालेज के दिनों में जन्में उस के शौक व अपनी पसंद को उस ने फिर से अपने जीवन में शामिल कर लिया था. उसे अब किसी बात की परवाह नहीं थी न ही किसी के शक का भय था. अपने सपनों को जीवंत कर के सुरभि जैसे महकने लगी थी व उस की महक फिजां में भी महकने लगी. सुरभि ने फिर से रंगों को अपने जीवन में उतार कर जीना सीख लिया था. उस के शौक अब उस का आसमान बन गए थे.

विनोद भी उस के इस परिवर्तन से हैरान था. एक दिन चाय पीते हुए विनोद अचानक बोला, ‘‘क्या बात है सुरभि बहुत बदलीबदली नजर आ रही हो, कहां क्या किया, किसकिस से मिली… कुछ बताया नहीं? आजकल खूब जलवे बिखेर रही हो…’’

सुरभि ने बात काट कर कहा, ‘‘कुछ नहीं अपना बचपन जी रही हूं. तुम ने मुझे कभी देखा ही कहां है… कितना जानते हो मेरे बारे में व मेरे शौक के बारे में?’’ सुरभि की आवाज में ऐसी तलखी थी कि आज विनोद चुप हो कर उसे देखने लगा आगे कुछ कहने का साहस उसे नहीं हुआ.

एक समय के बाद नदी का प्रवाह भी पत्थर से टकरा कर अपने निशान उस पर अंकित कर देता है. आज सुरभि के मन की कोमल संवेदनाएं पत्थर से टकरा कर चूर हो गई थीं. उस ने उन्हें सहेजने का प्रयास नहीं किया.

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वक्त ने जीवन की करवट बदल दी थी. अपने नाम को सार्थक करती हुई सुरभि फिर से अपने सपनों के साथ महकने लगी. उस के भावों का संसार रंगों के माध्यम से अपना एक आसमान तैयार कर रहा था. विनोद बस चुपचाप उसे बदलते हुए देखता रहा. सुरभि अपने संसार में धीरेधीरे डूबने लगी.

काम में तल्लीन सुरभि आज भी फोन की घंटी बजते ही फोन में कुछ तलाशने लगती. सुरभि की आंखें हर पल किसी की आहट का इंतजार करती थीं. कान अब भी राहुल को सुनने के लिए बेकरार थे. राहुल के फोन का इतजार उसे रहने लगा. उस ने 1-2 बार राहुल को संदेश भी भेजा पर कोई उस का कोई जवाब नहीं आया. राहुल अपनी सीमा जानता था.

इंतजार सप्ताह से बढ़ कर महीने फिर साल में

परिवर्तित होता चला गया पर राहुल का फोन नहीं आया. उस के साथ व्यतीत हुए 6-7 घंटों ने सुरभि को जीने का मकसद सिखा दिया, किंतु उस के उपेक्षित व्यवहार ने सुरभि का पुरुषों के प्रति नजरिया बदल दिया था. उसे अचानक उस के शब्द याद आने लगे. राहुल ने कहा था खून से बढ़ कर नमक का रिश्ता नहीं होता है. हर बात की एक मर्यादा होती है.

सुरभि समझ गई थी कि सब पुरुष एकजैसे ही होते हैं. शायद कथनी व करनी में अंतर होता है. पुरुषों की सोच का दायरा ही सीमित होता है. स्त्री के प्रति उन का नजरिया नहीं बदलता है. पुरुष उस पर एकछत्र राज्य ही करना चाहते हैं, अपने घर के बाहर मर्यादा की रेखा खींच कर दोहरा व्यक्तित्व जीते है. स्त्रीपुरुष की मित्रता वे सामान्य तरीखे से लेना कब सीखेंगे, नारी के लिए लकीर खींचने का हक पुरुषों को किस ने दिया है? ये सीमाएं तय करने वाले वे कौन है. दोनों अलग व्यक्तित्व हैं फिर हर फैसला लेने का अधिकार पुरुषों को कैसे हो सकता है? मन के भाव शब्दों व लाल रंगों के माध्यम से अपनी बात बेखौफ कहने लगे. तूफान गुजरने के बाद घर का नजारा कुछ बिखरा सा था. उस का कमरा ही उस की दुनिया बन गई. कमरे में रंगों को सहेज कर वह बाहर आ गई.

आज मन शांत हो गया था. शायद विनोद को समझना उस के लिए अब सरल हो गया था कि पुरुषों की सोच का दायरा ही ऐसा होता है, जिसे बदला नहीं जा सकता है. तूलिका रंगों के माध्मम से जीवन को सफेद कागज पर जीवंत करने लगी. सुप्त मन के भाव अपना आकार लेने लगे. उस का मन उस चंचल हिरणी के समान हो गया था जो अपने ही जंगल में विचरण का पूर्ण आनंद लेती है.

अपने रंगों व अनुभूतियों में डूबी सुरभि आज अपने पिंजरे में भी खुश थी. पिंजरे के साथ ही उस ने उड़ना सीख लिया था. मेज पर रखा आधा भरा गिलास भी खाली नहीं लग रहा था. उस आधे हिस्से में हवा थी जो गिलास के कोरों पर चिपकी पानी की बूंदों को आत्मसाध करना चाहती थी. खिड़की से आ रही शीतल हवा पास में रखे चाय के कप की खुशबू को उड़ाने का प्रयास कर रही थी. मेज पर रखा हुआ चाय का कप भी आधा भरा था.

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हालांकि सुरभि को पूरा कप भर के चाय पीना पसंद है, पर आज वह आधा कप चाय भी सुकून का एहसास दे रही थी. यह देखने वालों का ही नजरिया होता है कि किसी को कप खाली लगता है किसी को आधा भरा हुआ. उस के जीवन में अब खालीपन का स्थान नहीं था. चाय से निकलती हुई भाप हवा में अपने अस्तित्व का संकेत दे कर विलय हो रही थी. इलायची की खुशबू वातावरण को महका रही थी.

चाय पीने की तलब ने हाथों को कप की तरफ बढ़ा कर कप को होंठों से लगा लिया. चाय की चुसकियां व बंजर होते जीवन में वसंत ने अपने रंग भर दिए थे. रेडियो पर बज रहा गाना गुनगुनाने को मजबूर कर रहा था. ‘मेरे दिल में आज क्या है तू कहे तो में बता दूं…’ दिल आज भी उस आवाज को सुन कर धन्यवाद देना चाहता है जिस ने अनजाने ही सूखे गुलाब में इत्र की कुछ बूंदों को छिड़क दिया था. आज भी सुरभि को राहुल के फोन का इंतजार है, शायद कभी तो हवा का रुख बदले.

नजरिया: भाग 2- क्यों पुरुषों से नफरत करती थी सुरभि

सब से मिल कर सुरभि बहुत उत्साहित थी. घर का खुला वातावरण हवा में ताजगी और रिश्तों में अपनेपन की सोंधी महक घोल रहा था. आज मन उसी मोड़ पर खड़ा था जहां वह अपना बचपन उनमुक्त तरीके से जीती थी. वही मस्ती वही उमंगें, किसी ने सच ही कहा है मायका ऐसी जगह है जहां जन्नत मिलती है. न रोकटोक न कोई बंधन, हम मांपापा के बच्चे और दिल है छोटा सा… वाली कहावत सही सिद्ध हो जाती है. सारा समय यों ही चुटकी बजा कर निकल गया. पार्टी खत्म होने के बाद सब थक कर सोने चले गए पर सुरभि की आंखों से नींद गायब थी.

राहुल को उस ने फिर फोन लगा कर तन को अपने बिस्तर पर निढाल सा छोड़ दिया. कुछ पल बात कर के दिल को सुकून मिला. अपने बिस्तर पर लेटी सुरभि खिड़की से बाहर खुला आसमान निहार रही थी. मौसम साफ नहीं था. काले बादल चांद को बारबार ढक रहे थे. काले बादलों को देख कर उसे जीवन के निराशाभरे काले पल याद आने लगे. मन अवसाद से भरने लगा कि उस के आसमान पर ही काले बादल क्यों मंडराते हैं.

नींद आंखों से कोसों दूर होने लगी. भरे मन से उस ने दिल्ली फोन लगा कर अपने

सकुशल पहुंचने की सूचना विनोद को दे दी. पर नेह की एक बूंद को तरसता उस का प्यासा मन रेगिस्तान के समान सदैव तपता रहा है. विनोद का बेरूखा सा व्यवहार उसे अंदर तक सालता रहा है. अनजाने ही मन को उदासी के बादल घेर रहे थे. राहुल ने उस में मन में दबी हुई चिनगारी को शांत करने में अनजाने ही हवा भी दी थी. चिनगारी का कारण उस के पति विनोद थे.

विनोद बिलकुल उस के विपरित स्वभाव के थे. जहां सुरभि खुले विचारों वाली हंसमुख व विनोदी स्वभाव की लड़की थी, वहीं पेशे से वकील विनोद की सोच पारंपरिक व संकीर्णवादी थी. आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी की सोच इतनी छोटी होगी यह उसे शादी के बाद ही पता चला. किसी से भी ज्यादा बात करना विनोद को पसंद नहीं था. चाहे वह रिश्तेदार हो या उन के पारिवारिक मित्र, सुरभि का परपुरुष से बातें करना उसे नागवार गुजरता था. कोई राह चलता पुरुष भी यदि सुरभि को देख लेता, तब भी विनोद की शक्की निगाहें व तीखे वाण सुरभि पर ही चलते कि फलां तुम्हें क्यों देख रहा था.

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जरूर तुम ने ही पहले देखा होगा… पूरे कपड़े पहना करो. यह मत पहनो, ऐसे मत रहो, समय के साथ चलने वाली सुरभि समय से कटने लगी थी. शादी के बाद लोगों से पारिवारिक संबंध व मित्रों की संख्या कम भी नग्ण्य हो गई. जो कुछ उस के मित्र शेष थे वे भी विनोद के शक व इस नए रिश्ते की भेंट चढ़ गये. वह कब क्या समझे, क्या कहे कहना मुशकिल था. जासूसी निगाहें घर में घूमती थीं. किस दिशा में कदम बढ़ाए मन दिशा से भ्रमित व भयभीत रहता था.

सुरभि ने धीरेधीरे खुद को बदल कर विनोद के इर्दगिर्द समेट लिया था. कहते हैं न इंसान प्यार में अंधा हो जाता है सुरभि ने प्यार किया पर विनोद का प्यार जंजीर बन कर उसे जकड़ चुका था. घुटन सी होने लगी थी. लेकिन जब भी बाहर जाती खुल कर अकेले में हंसने का प्रयास करती थी. धीरेधीरे बच्चे भी विनोद की मानसिकता के शिकार हो रहे थे. उसे बच्चों का व उस का व्हाट्सऐप या सोशल मीडिया का उपयोग करना पसंद नहीं था.

बेटी को भी शक की निगाहों से देखने लगा कि कहीं कुछ गलत तो नहीं कर रही.

जब उस का मन करता है सब से मेलजोल बढ़ाता है. जहां पारिवारिक संबंध बनने लगते हैं वहीं पर लगाम कसने लगता है. गुस्सा आने पर या मतभेद होने पर सप्ताहों तक अकारण अबोलापन कायम रहना आम बात थी. घर में सीमित वार्त्तालाप सुरभि के अकेलेपन को जन्म दे चुका था.

घर का बो?िल वातावरण घुटनभरा होने लगा जैसे हवा का दबाव सांस लेने के लिए अनुपयुक्त था. परिवार में सासससुर, जेठजिठानी, मामाभानजी, साली सलहज जैसे रिश्ते भी विनोद के शक की आग में लग कर दूर हो गए थे. सुरभि के मन में डर का दानव अपना विकराल रूप लेने लगा था, मन की कली रंगों से परहेज करने लगी थी.

सुरभि के पास सहने के अतिरिक्त कोई उपाय भी नहीं था. विनोद के पीछे सब हंसतेबोलते थे, लेकिन उस के सामने मजाक करना भी दुश्वार लगता था. धीरेधीरे बच्चे भी अपनी जिंदगी में रम गए. अपना अकेलापन दूर करने के लिए सुरभि का समय सहेलियों के साथ ही व्यतीत होने लगा. पर मन आज भी प्यासा सा शीतल जल की तलाश कर रहा है.

विनोद ने कभी भूले से भी सुरभि से यह नहीं पूछा कि तुम्हें क्या पसंद है. रूठनामनाना तो बस फिल्मों में होता है. न कोई शौक न उत्साह. जीवन जैसे बासी कढ़ी बन गया था जिस में उबाल आने की गुंजाइश भी शेष न हो. नारी का कोमल मन यही चाहता है कि उस की भावनाओं की कद्र हो, प्यार व विश्वास का खुला आसमान हो, उमंगें जवां हों. पलपल जीवन को जीया जाए. पर विनोद ने खुद को गाहेबगाहे सुरभि पर थोपना जारी रखा. जब उम्र आधी गुजर जाने के बाद भी विनोद की सोच में समयानुसार परिवर्तन नहीं आया, तो सुरभि का मन उस से विरक्त होने लगा. वह अपने सुकून को तलाशने लगी. आज उस का दूर रहना ही मन को शांति दे रहा था. कम से कम घुटनभरे क्षण कुछ तो कम होंगे.

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राहुल के अपनेपन ने कलेजे में ठंडक सी प्रदान की. दर्द आंखों से बाहर निकल चुका था. सुरभि के मन में कशिश ही रह गई कि काश विनोद उस का सच्चा हमसफर व एक दोस्त बन पाता जिस से वह खुल कर अपने सब रंग बांट सकती थी. जिंदगी के सारे चटक रंगों को अपने जीवन में भर सकती थी. सोचतेसोचते कब आंख लगी पता ही नहीं चला.

कोरों से निकले हुए आंसू गालों पर रेखाचित्र बना कर अपने निशान छोड़ गए थे. मुखड़े को चूमती हुई भोर की किरणों ने उसे गुदगुदा कर उठा दिया. आईने में खुद को निहार कर तिर आई मुसकान ने आंखों में वही चमक पैदा कर दी थी. खुद से प्यार होने लगा. अपने में मस्त रहने वाली वही सुरभि जिसे दुनिया से नहीं अपने सपनों से प्यार था. जीवन के स्वपनिल रंगों में भीगी शोख अदाएं जिन पर कालेज में सब मर मिटते थे आज वही शोखी उस की आंखों में नजर आ रही थी. उस के सपने उसे ऊर्जावान बनाते थे वहीं आकाश को आंचल में भरने का ख्वाब, कागजों पर सुनहरे रंगों से कलाकारी, भावों को अभिव्यक्त करती कलम का संसार जीवंत रखता था.

आगे पढ़ें- दिल्ली घर वापस आने तक…

नजरिया: भाग 1- क्यों पुरुषों से नफरत करती थी सुरभि

सुरभि अपने भाई से मिलने दुबई जाने वाली फ्लाइट में बैठी विंडो के बाहर नजारों का आनंद ले रही थी. लंबे समय बाद अकेला सफर जहां उसे रोमाचिंत कर रहा था, वहीं आज उमंगें जवां थीं. वह हर पल, हर लमहा खुशनुमा जीने की कोशिश कर रही थी. खुली हवा में सांस लेना व बाहर की धुंध को अंतस में उतारने का असफल प्रयत्न भी हृदय को असीम सुख प्रदान कर रहा था.

विमान की उड़ान के साथ तन के साथ मन भी हलका महसूस कर रहा था. उड़ते बादलों के संग मन भी उड़ान भर रहा था. रुई के समान बाहर बिखरे बादलों पर गिरती सुनहरी किरणें जैसे सोना बरसा रही थीं. रंगों को नयनों में भर कर दिल तूलिका पकड़ने के लिए मचलने लगा…

‘‘कृपया सभी यात्री ध्यान दें. फौग व खराब मौसम के कारण विमान को हमें टरमैक पर वापस उतारना होगा. आप की असुविधा के लिए हमें खेद है. मौसम खुलते ही हम उड़ान भरेंगे. तब तक अपनी सीट पर ही बैठे रहें.’’

विमान को वापस टरमैक पर उतारना पड़ा. सुरभि के बराबर वाली सीट पर एक बातूनी सा सभ्य दिखने वाला व्यक्ति बैठा था. विमान में बैठेबैठे लोग कर भी क्या सकते थे. समय काटने के लिए उस ने स्वयं सुरभि से बात छेड़ दी.

‘‘हैलो, मैं राहुल हूं, आप दुबई से हैं?’’

सुरभि ने उसे प्रश्नवाचक निगाहों से देखा, तो उस ने पलक झपकते ही कहा, ‘‘आप अन्यथा न लें. मौसम के व्यवधान के कारण हमें विमान में ही बैठना होगा. आप के हाथ में किताब देख कर महसूस हुआ कि आप को पढ़ने का शौक है. सोचा आप से चर्चा कर के समय अच्छा गुजर जाएगा. आप क्या करती हैं.’’

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‘‘हां, आप ने सही कहा…’’ सुरभि ने भी शांत मन से जवाब दिया, ‘‘मैं थोड़ाबहुत लिखती हूं पर मुझे रंगों से बहुत लगाव है. चित्रकारी का भी बहुत शौक है.’’

‘‘अरे वाह, मुझे भी पहले लिखने का शौक था जो समय के साथ कहीं खो सा गया है. समय के साथ सब बदल जाता है जरूरतें भी… यही जीवन है… कितना अच्छा लगता है रंगों से खेलना… अच्छा आप के पसंदीदा राइटर कौन हैं?…’’ राहुल अपनी ही धुन में बोलता चला गया.

न चाह कर भी सुरभि उस के जवाबों का हिस्सा बनती रही.

फिर लेखकों व किताबों से शुरू हुई बातों का सिलसिला धीरेधीरे गहराता चला गया.

एकजैसी पसंद व स्वभाव ने एकदूसरे के साथ को आसान बना दिया. राहुल की आंखों में अजब सी गहराई थी जहां राहुल के गहरे बोलते नयनों व बातों की कशिश ने सुरभि को आकर्षित किया वही सुरभि के हंसमुख, सरल स्वभाव व निश्चल हंसी व सादगी ने भी राहुल के मन में जगह बना कर हृदय को गुदगुदा दिया. दोनों एकदूसरे के प्रति आकर्षण महसूस कर रहे थे. सुरभि चेहरा पढ़ना जानती थी. यह आकर्षण एक नया आत्मिक रिश्ता पनपा रहा था. दोनों को शायद किसी दोस्त की जरूरत थी.

बातें करते हुए दोनों एकदूसरे के इतने करीब आ गए कि विचारों का आदानप्रदान करतेकरते अपने जीवन के पन्ने भी एकदूसरे के सामने खोलते चले गए. आज सुरभि ने भी अपना दर्द उस से साझ कर दिया. ऐसा लगा कि जैसे पतझड़ बीत गया हो व वसंत ने अपनेपन की दस्तक दे कर हृदय फिर से गुलजार कर दिया. एकदूसरे का साथ पा कर वक्त भी पंख लगा कर उड़ गया. विमान में अपनी ही दुनिया बना कर दोनों मग्न थे. कब विमान अपने गंतव्य तक पहुंचा उन्हें खबर ही नहीं हुई. इन 6-7 घंटों में दोस्ती इतनी गहराई कि फोन नंबर के आदानप्रदान के साथ अनकहे शब्द भी नजरों ने बांच दिए थे. विदा लेने के क्षण भी करीब आ रहे थे.

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तभी एयरहोस्टेस ने अनाउंस किया, ‘‘यात्रीगण कृपया अपनी सीट बैल्ट बांध लें. विमान अपने गंतव्य पर उतरने के लिए तैयार है.’’

तभी राहुल ने सुरभि से पूछा, ‘‘सुरभि आप कब तक दुबई में हैं?’’

‘‘मैं 2-4 दिन यहां हूं, फिर दिल्ली की वापसी है और आप कब तक हैं…?’’

‘‘मुझे राहुल ही कहो सुरभि, यह अपनेपन का एहसास देता है. मैं अपने काम से यहां आया हूं. 2 दिन बाद दिल्ली फिर मुंबई चला जाऊंगा.’’

‘‘ठीक है राहुल, सच में वक्त पंख लगा कर उड़ गया. अच्छा लगा तुम से मिल कर.’’

‘‘हां सुरभि मुझे भी तुम से मिल कर बहुत अच्छा लगा, अब हम दोस्त हैं, यह दोस्ती बनी रहेगी, एक बात तुम से कहना चाहता हूं कि परिस्थिति कैसी भी हो, हमें उसे अपने मन पर हावी नहीं होने देना चाहिए नहीं तो जीवन बो?िल प्रतीत होता है. हम सभी वक्त के हाथों अपने कर्तव्यों से बंधे हुए हैं. हमें कर्म को ही प्राथमिकता देनी होगी. विषम परिस्थितियों में भी अपनी प्यारी अनुभूतियों को याद कर के गुनगुनाओ और हंस कर जीयो, तुम से मिल कर बहुत कुछ समेटा है अपने भीतर… यों ही हंसतीमुसकराती रहना सुरभि.’’

‘‘हां राहुल, मुझे भी बहुत अच्छा लगा. फिर शायद ही कभी मिलना होगा. पर फोन पर बात जरूर करते रहना.’’

‘‘हां जरूर सुरभि.’’

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अब तक विमान लैंड कर चुका था. गरमजोशी से हाथ मिला कर दोनों विमान से बाहर आ गए. पर अलग होने का मन अभी भी नहीं हुआ. राहुल वहां सुरभि के परिजनों के आने तक रुका, फिर गहरी सांस ले कर विदा होने का मन बनाया. वह उस के परिजनों से मिल कर चला गया. सुरभि आज स्वयं को आनंदित महसूस कर रही थी जैसे वर्षों बाद किसी कैद से बाहर निकल आई हो. मन में नवसंचार की अनुभूति थी, धड़कनों पर आज वश नहीं था. जाने क्यों दिल जोरजोर से धड़क रहा था. मन न जाने क्यों गुदगुदा रहा था. राहुल से बिछड़ने पर एक अजीब सी कशिश उसे महसूस हो रही थी जैसे कुछ छूट रहा हो… किंतु सब भूल कर परिजनों से मिलने लगी.

जब तक दुबई से दिल्ली वापसी नहीं हुई तब तक राहुल से फोन पर बात होती रही. मन रोमाचिंत होने लगा… वह समझ रही थी कि यह गलत है पर न जाने क्योंकर अच्छा लगा. जब तपते रेगिस्तान पर पानी की बूंदें गिरती हैं तो वे सबकुछ सोख लेती हैं. शायद यही कण कुछ शीतलता प्रदान कर देते हैं.

वह घर आ कर अपनों के साथ अपना बचपन जी रही थी वरना शादी के बाद जैसे कहीं ठहराव सा आ गया था जीवन में. हंसीमजाक व ठहाकों के दौर शुरू थे. कालेज की बातें, पुराने दिन, सहेलियों से मस्ती, बचपन के सभी पल याद आ गए. घर में भाईर् ने पार्टी रखी थी. सभी दोस्त आने वाले थे जो बचपन से साथ पढ़े थे.

आगे पढ़ें- राहुल को उस ने फिर फोन…

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