मां और बच्चों की केयर से जुड़ी सावधानियों के बारे बताइए?

सवाल-

मेरी उम्र 37 वर्ष है और मेरी 7 महीने में प्रीमैच्योर डिलिवरी हुई है. मैं पूरी प्रैगनैंसी के दौरान लगातार मैडिसिन पर चल रही हूं. मेरा दूध बच्चे के लिए पूरा नहीं हो पाता है इसलिए मैं उसे फौर्मूला मिल्क दे रही हूं. लेकिन उस से बच्चे का पेट साफ ही नहीं हो पाता है. लगातार बच्चे को कौन्सिपेशन रहती है. कृपया बताएं कि मैं क्या करूं?

जवाब

आप के बच्चे का जन्म 7वें महीने में हुआ है. समय से पहले जन्म होने के कारण ऐसे बच्चों का संपूर्ण शारीरिक व मानसिक विकास सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त पोषण का मिलना बेहद आवश्यक हो जाता है क्योंकि ऐसे बच्चों का जीवन तब तक संकट में होता है जब तक इन का पूरा टर्म यानी 36 हफ्ते पूरे न हो जाएं. ऐसे में बच्चे की मां के गर्भ के समान तापमान में संरक्षित रखने के लिए जितना उसे नियोनेटल केयर यूनिट में रखा जाना आवश्यक होता है उतना ही जरूरी है उसे आवश्यक न्यूट्रिशन प्रदान करना. इसलिए बच्चे की मां का दूध दिया जाना चाहिए. अगर आप का दूध नहीं बन पा रहा है तो अपने लिए न्यूट्रिशनिस्ट की मदद से संपूर्ण आहार सुनिश्चित करें. बच्चे को 8-12 बार फीड करने की कोशिश करें क्योंकि जब बच्चा स्तनपान करता है तो ऐसे हारमोन बनते हैं जिन से अपनेआप दूध बनने लगता है. खाने में दूध, अलसी, ओट्स और गेहूं का सेवन बढ़ाएं.

सवाल-

मेरी 2 महीने की बच्ची है. मेरे घर में सभी सदस्य कोरोना पीडि़त हो गए हैं. मैं थोड़ा डरी हुई हूं कि क्या मुझे अपनी बच्ची को स्तनपान करवाना चाहिए? मेरे घर के सभी सदस्य ऐसा करने से मना कर रहे हैं?

जवाब

वर्ल्ड हैल्थ और्गेनाइजेशन द्वारा साफतौर पर यह दिशानिर्देश जारी किए हैं कि हर मां कोरोना प्रभावित होने के बावजूद अपने बच्चे को स्तनपान करवा सकती है. यहां आप तो कोरोना से प्रभावित हैं भी नहीं तो आप को बिना किसी संशय के बच्चे को स्तनपान करवाते रहना चाहिए. आप का दूध ही बच्चे के लिए सुरक्षाकवच का काम करेगा, फिर चाहे वह कोरोना हो या अन्य कोई भी संक्रमण. साथ ही आप को बच्चे के आहार में गोजातीय दूध आधारित उत्पादों जैसेकि फौर्मूला मिल्क से बचना चाहिए. आखिर में यह बेहद आवश्यक है कि आप बच्चे का नियमित चैकअप करवाती रहें. हर ऐक्टिविटी पर रखें नजर. जैसे ही आप को कोई लक्षण दिखाई दे तुरंत डाक्टर के पास जाएं.

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सवाल

मैं ने 40 वर्ष की आयु में आईवीएफ की मदद से 2 जुड़वां बच्चों को जन्म दिया है. मेरी डिलिवरी औपरेशन से हुई है. औपरेशन की वजह से मेरा शरीर बेहद कमजोर हो गया है. मैं दोनों बच्चों को ठीक से फीड नहीं करा पाती, उन्हें ज्यादातर गाय का दूध देना पड़ता है. अब बच्चे भी ऊपर का दूध पीने में ज्यादा सहज रहते हैं. अगर मैं उन्हें फीड करवाने की कोशिश भी करती हूं तो वे पीते नहीं हैं.

जवाब-

औपरेशन से डिलिवरी होने की वजह से आप यकीनन अपने बच्चों को पहले घंटे में अपना दूध नहीं पिला पाई होंगी. मां का पहला दूध बच्चे के लिए प्रतिरक्षा का काम करता है. ऐसे में आप के लिए बहुत जरूरी हो जाता है कि आप बच्चों को अपना दूध दें. अगर वे आप का दूध नहीं पीते हैं तो अपना मिल्क, पंप की मदद से स्टरलाइज किए गए कंटेनर में निकालें और बच्चों को चम्मच की मदद से पिलाएं.

गायभैंस का दूध बिलकुल नहीं दें क्योंकि इस दूध से बच्चों को ऐलर्जी और अन्य हैल्थ रिस्क हो सकते हैं. इस दूध के सेवन से बच्चे में इन्फैक्शन का खतरा बढ़ जाता है. अगर आप को लगता है कि 2 बच्चों के लिए आप का दूध पर्याप्त नहीं है तो नियोलेक्टा का 100% ह्यूमन मिल्क भी आप बच्चों को दे सकती हैं क्योंकि यह उत्पाद डोनेट किए गए ब्रैस्ट मिल्क को ही पाश्च्युराइज्ड कर के बनाया जाता है. लेकिन पहले डाक्टर से सलाह जरूर कर लें.

सवाल-

मेरा बच्चा 4 महीने का है. उसे मेरी मदर इन ला चम्मच से साधारण पानी और अन्य सभी तरह के पेयपदार्थ पिलाती हैं और कभीकभी आलू मैश कर के भी देती हैं. मैं अपने बच्चे की सेहत को ले कर चिंतित हूं. मैं ने सभी जगह पढ़ा है और डाक्टर भी यही सलाह देते हैं कि 6 महीने तक बच्चे को सिर्फ मां का दूध दें और कुछ भी ऊपर का खानपान नहीं देना चाहिए. क्या इस से मेरे बच्चे की पाचनक्रिया पर प्रभाव पड़ेगा?

जवाब-

घर में अकसर बड़ेबुजुर्ग अपने देशी नुसखे बच्चों पर आजमाते हैं. हालांकि उन की भावना अच्छी होती है लेकिन एक डाक्टर होने के नाते मैं इस की सपोर्ट नहीं करती. बच्चे की पाचनक्रिया विकसित हुए बिना उसे अनाज या अन्य खाद्यपदार्थ नहीं देना चाहिए. इतना ही नहीं अगर गरमी का मौसम हो तो भी बच्चे को बारबार और आवश्यकतानुसार स्तनपान कराने पर उसे पानी या किसी अन्य तरल पेय की आवश्यकता नहीं होती है. इसलिए दाई या अन्य लोगों के कहने पर पानी आदि अन्य पेयपदार्थ देने की कोशिश न करें.

मानव दूध ऐंटीबौडी प्रदान करता है और आसानी से पचने योग्य होता है. इस में वे सभी आवश्यक पोषक तत्त्व होते हैं, जो बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए बेहद आवश्यक होते हैं.

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सवाल-

मैं 7 महीने के बच्चे की मां हूं. मेरा दूध इतना ज्यादा बनता है कि कई बार कहीं भी बहने लगता है, जो मेरे लिए काफी मुश्किल भरी स्थिति हो जाती है. मैं क्या करूं?

जवाब-

अगर आप का दूध बहुत अधिक मात्रा में बनता है तो इस का मतलब है आप पूरी तरह से स्वस्थ हैं. ब्रैस्ट मिल्क कुदरत की नेमत की तरह है. अगर अपने बच्चे को फीड कराने के बाद भी आप का बहुत दूध बनता है तो आप पंप की मदद उसे निकाल कर मदर मिल्क बैंक में डोनेट कर सकती हैं क्योंकि दुनिया में लाखों बच्चे ऐसे हैं जिन्हें कई कारणों से मां के दूध का पोषण नहीं मिल पाता और उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ती है. इसलिए आप अपने नजदीकी मदर मिल्क बैंक में दूध को जरूर डोनेट करें. यदि आप जाने में समर्थ नहीं हैं तो मिल्क बैंक से संपर्क करें. वे स्वयं आप के यहां से मिल्क कंटेनर तय समय पर कलैक्ट कर लेंगे.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

Global Parents Day: रखें New Born बेबी का पूरा ध्यान

मानव जीवन में माता पिता का सर्वोच्च स्थान है. बच्चों के जन्म से ही माता-पिता उनके लिए आदर्श के रूप में होते हैं. भागदौड़ की इस जिंदगी में भले ही हम अपने माता-पिता से दूर हैं, लेकिन दुख हो या सुख हर परिस्थिति में वह हमारे साथ होते हैं .

परिवार के साथ- साथ, बच्चों का पोषण और संरक्षण माता-पिता की एक प्राथमिक जिम्मेदारी है. बच्चों के विकास के लिए आवश्यक है कि वे अच्छे पारिवारिक माहौल में बड़े हों, जहां खुशी, प्यार और विश्वास हो.

जब बात हो न्यू बौर्न बेबी की देखभाल की सबसे महत्वपूर्ण समय मां के गर्भ के दौरान होता है. गर्भ के दौरान यदि मां स्वस्थ है, उसका खानपान उचित हो और गर्भ से संबंधित कोई विकार ना हो तो बच्चा जन्म के समय स्वस्थ रहता है. अपने नवजात बेबी की देखभाल करना माता-पिता के जीवन के सबसे खास अनुभवों में से एक होता है.

बेबी की सम्पूर्ण देखभाल के लिए कुछ सरल  टिप्स,  जिससे नए माता-पिता अपने बेबी  के साथ किसी भी चिंता के बिना पैरंटहुड का आनंद ले सकते हैं –

बेबी के  लिए चुने सही बाथिंग प्रोडक्ट्स –

बेबी के बॉथिंग प्रोडक्ट्स में  इस बात का ख़ास ध्यान रखना चाहिए की वह प्रोडक्ट्स बेबी की त्वचा को रूखा न  बनाये  और उसकी त्वचा पर कोमल  हों. बच्चों के साबुन की जगह बाथिंग जेल का प्रयोग किया जा सकता है जो की 100% साबुन मुक्त फार्मूला से बनाया जाता है और बेबी की  नाजुक त्वचा को जेंटली साफ करता है .  यह  नो टीयर्स फार्मूला इस तरह बनाया जाता है की यह बेबी की नाजुक आँखों  को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा. यह हर रोज बेबी  के लिए प्रयोग किया जा सकता है  जिससे बेबी की त्वचा सॉफ्ट  और मॉइस्चरीज़ड बनी  रहे.

बेबी की मालिश के लिए –

भारत में बच्चों की मालिश का चलन नया नहीं है. बच्चे की मालिश नहलाने से एक घंटे पहले करनी चाहिए. बेबी मसाज ऑयल आपके बच्चे की नाजुक त्वचा को मॉइस्चराइज करता है. यह बच्चे की हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत करने में मदद करता है. इससे बच्चों का शारीरिक विकास बेहतर होता है और वह हेल्थी रहते है| इसके लिए एक एलर्जी मुक्त , डर्मटॉलॉजिस्ट टेस्टेड मालिश का तेल प्रयोग में लाएं. ऑलिव और आलमंड आयल के तत्त्व बेबी की मालिश के लिए अत्यधिक लाभकारी होते हैं. नेचुरल स्किन इलास्टिसिटी बढ़ाने के लिए मालिश का  तेल  अत्यंत  उपयोगी  हैं.

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बेबी के दांत और मसूड़े के स्वस्थ्य के लिए –

बेबी की देखभाल करते समय बेबी के  मुँह की  स्वच्छता सबसे महत्वपूर्ण  है. बेहतर ओरल केयर प्रोडक्ट्स बच्चों के दांतों को साफ रखने के साथ-साथ मसूढ़ों को बैक्टीरिया मुक्त बनाने में काफी मदद करते  है. शुरुआती महीनों में बच्चे के मसूड़ों और दांतों की देखभाल करते समय अत्यधिक ध्यान देने की आवश्यकता होती है. बेबीओं  के  टूथपेस्ट  फ्लोराइड – फ्री  होने चाहिए  ताकि  अगर  छोटे बच्चे टूथपेस्ट निगल भी ले तो भी वह उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाए.  टूथब्रश का शेप और ब्रिस्ल्स  दोनों का ही  अकार  बच्चो  के  मुँह के  हिसाब से डिज़ाइन किए जाता है जिससे वह मुँह के  अन्दर कोने-कोने तक सफाई कर सके और  ब्रिस्ल्स  काफी  मुलायम  होते  हैं  जो टेपरेड़  टेक्नोलॉजी से बनते हैं जिससे बच्चो के मसूड़े और  दांत  पर  सख्त नहीं होते. सही टूथपेस्ट और सही टूथब्रश चुन कर बच्चे की ओरल हेल्थ का ध्यान रखें.  स्वस्थ आदतों का अभ्यास करने से बेबीओं और बच्चों में कैविटी, दांतों की सड़न को रोकने या कम करने में मदद मिल सकती है.

बेबी को सुलाने के लिए  –

नींद पूरे परिवार के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है, इसलिए अपने बच्चे की नींद को सुगम बनाने के लिए आदर्श समाधान खोजना महत्वपूर्ण है. पहले महीनों के दौरान, पालना सबसे अच्छा समाधान है क्योंकि एक समर्पित स्थान बच्चे को सुरक्षित और संरक्षित रखता है, जैसा उसने जन्म से नौ महीने पहले महसूस किया था. यह वैज्ञानिक रूप से प्रदर्शित है, कि बच्चे को माता-पिता पालने में अपने बिस्तर के जितना पास हो सके सुलायें. यह बच्चे के लिए सुरक्षित है और कई फायदे देता है: यह स्तनपान को आसान बनाता है, यह नवजात बेबी की मदद करता है सोने-जागने की लय को विनियमित करने में और यह बच्चे और माता-पिता के बीच के बंधन को मजबूत करता है.

बेबी को घुमाने के लिए –

स्ट्रोलर का सही तरीके से चुनाव  करना  बहुत आवश्यक है- ना सिर्फ बच्चे के आराम और सुरक्षा के लिए पर माता-पिता की सुविधा के हिसाब से भी. बेबी के स्ट्रोलर की सीट आरामदायक और आसानी से अडजस्टेबल होनी चाहिए. सबल स्ट्रोलर फ्रेम के साथ व्हील पर लगे सस्पेंशन और लॉक्स बच्चे को हर तरह के रास्तों पर सुरक्षित रखते है.  एक हाथ से फोल्ड और कॉम्पैक्ट हो जाने वाले स्ट्रोलर पेरेंट्स के लिए बहुत सुविधाजनक होते हैं और उन्हें अपने बच्चों के साथ बिताए समय का पूरी तरह से आनंद लेने  देते हैं.

बच्चों के कपड़ो को विशेष रूप से बेबी के कपड़ों के लिए बनाये गए लांड्री डिटर्जेंट से ही धोएं – माता पिता को केवल बेबी के कपड़ों के लिए बनाये गए लांड्री डिटर्जेंट का ही उपयोग करना चाहिए – जो ज़िद्दी दाग व गंध हटाने में कारगर हो.  इसके साथ साथ लांड्री डिटर्जेंट में रोगाणुओं का नाश करने की क्षमता होनी चाहिये. क्यूंकि हम जानते है कि बेबी की त्वचा कोमल होती है, इसलिए बेबी के कपड़ों को डर्मटोलॉजिकली टेस्टेड लांड्री डिटर्जेंट से ही धोना चाहिए.

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बेबी के लिए कॉटन के कपडे –

गर्मी का मौसम हो तो नवजात को कॉटन के कपड़े पहनाने चाहिए. कॉटन  के  हवादार  और  अच्छी  क्वालिटी  के  कपडे  न  केवल  आरामदायक  होते  है  बल्कि  ट्रेंडी  भी  होते  है.  समर ट्रेंड्स में  बच्चों क लिए सबसे  ज्यादा  क्यूट  प्रिंट्स  जैसे – एनिमल मैस्कॉट , शेप्स , फ्लोरल  प्रिंट्स  देखने  को  मिलते हैं.  इन प्रिंट्स में बच्चे बहुत खूबसूरत दिखते  है और साथ  ही जानवर, नेचर और शेप्स पहचानना भी सीखते है.

श्री राजेश वोहरा, चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर, आर्ट्साना ग्रुप, इन एसोसिएशन विद कीको रिसर्च सेण्टर के द्वारा.

जानें क्यों जरुरी है ब्रेस्टफीडिंग

दुनिया भर में केवल पांच में से दो बच्चे जन्म के दो घंटे के भीतर स्तनपान का लाभ ले पाते  हैं – वह  सुनहरे घंटे शिशु को बढ़ने और विकसित होने का सबसे अच्छा मौका देते है. ब्रेस्टफीडिंग  नई  माताओं  को  अपने शिशु  के  साथ शारीरिक और भावनात्मक  रूप से  बांड बनाने में मदद करती है. जन्म से लेकर छह महीनों तक शिशु के स्वास्थ्य के लिए स्तनपान  बहुत  महत्वपूर्ण है. मां का दूध  शिशुओं में  शारीरिक  विकास को बढ़ावा देने के साथ, पोषक तत्व भी प्रदान करता है.

श्री राजेश वोहरा, चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर, आर्ट्साना ग्रुप, इन एसोसिएशन विद कीको रिसर्च सेंटर, बताते हैं कि शिशु के साथ-साथ स्तनपान मां के लिए भी अति लाभदायी  होता है. स्तनपान के सबसे महत्वपूर्ण लाभों में से एक लाभ यह है कि स्तनपान कराने की सुविधा देने वाला मुख्य हार्मोन गर्भाशय को उसकी पूर्व स्थिति मे लाने में  मदद  करता है. नई माताओं में  यह मोटापा और ऑस्टियोपोरोसिस को रोकने के साथ-साथ स्तन और ओवेरियन कैंसर के खतरे को भी  कम करता है. पहले के समय में  माताएं  घर  पर  रह  कर शिशु का लालन- पोषण  करती थी और उनको छह माह से लेकर साल भर  तक स्तनपान कराती थी.

लेकिन आज की परिस्थिति कुछ अलग  है. आजकल अधिकांश माताएं   काम पर जाती  हैं और उन्हें लंबे समय तक घर  से दूर रहना पड़ता है. हालांकि पिछले कुछ महीनों से बहुत सी माताएं घर से ही काम कर रही हैं , लेकिन घर के काम और ऑफिस के रूटीन के चलते वह हर समय शिशु को स्तनपान नहीं करा पाती , जिससे नई माताओं के लिए स्तनपान का अभ्यास जारी रखना मुश्किल हो जाता है. लेकिन, यह सुनिश्चित करना बेहद ज़रूरी है कि शिशु कम से कम छह महीने से लेकर एक साल तक के लिए विशेष रूप से स्तनपान पर निर्भर रहे.

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संक्रमण को रोकने में मदद करने के लिए कुछ सुझाव शिशु के पोषण के साथ साथ एक मां को स्तनपान कराते समय स्वच्छता का भी अधिक ध्यान देना चाहिए.

  • आपको अपने बच्चे को स्तनपान कराने से पहले एवं बाद में अपने हाथों को अच्छे से धोना चाहिए. हाथ धोने से सर्दी, फ्लू और पेट से जुड़ी समस्याएं नहीं होतीं.
  • अपने निपल्स को साफ और सूखा रखें
  • अपने निपल्स को धोने के लिए अल्कोहल युक्त सुगंधित साबुन या किसी भी चीज़ का उपयोग न करें. यह सूखापन पैदा कर सकता है और आपके बच्चे के लिए हानिकारक हो सकता है.
  • यदि आप ब्रेस्ट पैड्स का उपयोग करते हैं, तो नम हो जाने पर उन्हें बदलना अनिवार्य है जिससे कि बैक्टीरिया या फंगल संक्रमण का खतरा न हो
  • स्तनपान करने वाली माताओं को अपने कपड़े रोज़ बदलने चाहिए और जितना हो सके वह हवादार कॉटन के कपडे ही पहनें

नई  माताओं  को  साफ़ – सफाई के साथ-साथ अपने खान- पान का बहुत ख्याल रखना चाहिए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्तनपान  कराते समय आपके शरीर को उन पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, जो दूध की गुणवत्ता बढ़ाने में सहायक होते हैं. इसलिए नई माताओं को पौष्टिक आहार में कैल्शियम युक्त खाद्य पदार्थ जैसे कि दूध, दही, पनीर, हरी पत्तेदार सब्जियां आदि खाना चाहिए जिससे शिशु को भी पोषण मिले.

कोलोस्ट्रम के लाभ

कोलोस्ट्रम मां द्वारा निर्मित पहला दूध होता है और इसमें नवजात शिशु के लिए कई फायदे हैं- यह शिशु को एक मज़बूत इम्यून सिस्टम बनाने में मदद करता है; कोलोस्ट्रम में पाए जाने वाले पदार्थ शिशु की जीवाणुजनित और विषाणुजनित संक्रमणों से रक्षा करने में मदद करते हैं. मां  के दूध में प्राकृतिक एंटीबॉडीज़ होते हैं, जो शिशुओं को गैस्ट्राइटिस, दस्त और निमोनिया जैसी बिमारियों से बचाते हैं. और शिशुओं के मानसिक विकास में भी मदद करते हैं.

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शिशु की देखभाल में  अक्सर व्यस्त  हो जाने के कारण नई  माताएं अपना  ख्याल ठीक से नहीं रख पाती है.  एक स्वस्थ  शरीर और स्वस्थ  दिमाग ही एक स्वस्थ  और खुशनुमा जीवन प्रदान कर सकता है इसलिए अपने शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य की देखभाल के लिए नई माताओं को  दिन में कुछ समय अपने लिए रखना चाहिए.जिससे वह खुश  रहे , स्वस्थ  रहे  और  अपने शिशु व  परिवार  की देखभाल भी अच्छे से कर  पाएं.

न्यू बौर्न की स्किन का रखें खास खयाल

न्यू बौर्न की स्किन बहुत पतली और नाजुक होती है, क्योंकि इतनी जल्दी स्किन प्रोटैक्टिव बैरियर पूरी तरह विकसित नहीं कर पाती. इस में करीब 1 साल का समय लगता है. वातावरण और तापमान में होने वाले परिवर्तन प्रत्यक्ष रूप से शिशु की स्किन को प्रभावित करते हैं. इस वजह से इन की स्किन को ज्यादा केयर की जरूरत पड़ती है. कोशिश करनी चाहिए कि शिशु के लिए अच्छे बेबी केयर प्रोडक्ट्स का ही उपयोग किया जाए. इस के अलावा सही तापमान और मौइस्चराइजर के उचित उपयोग जैसे पहलुओं पर भी विचार करना होगा. शिशु की स्किन की सेहत का खयाल रखने और ऐलर्जी या इन्फैक्शन का रिस्क कम करने की जिम्मेदारी पेरैंट्स की ही होती है.

स्किन पर होने वाली आम समस्याएं

झुर्रियां, स्किन का लाल होना और ड्राइनैस जैसी समस्याएं न्यू बौर्न की स्किन में बहुत आम हैं. न्यू बौर्न की स्किन में कोई समस्या दिखे तो घबराएं नहीं. वह मां के गर्भ से बाहर आने के बाद नए वातावरण में खुद को ऐडजस्ट करने की कोशिश कर रहा होता है. उस की स्किन भी नए वातावरण के संपर्क में आती है तो कुछ समस्याएं स्वाभाविक रूप से पैदा हो सकती हैं, जो समय के साथ ठीक भी हो जाती हैं. कई दफा प्रीमैच्योर बेबी के चेहरे और पीठ पर नर्म बाल होते हैं. वहीं जो न्यू बौर्न देर से पैदा होते हैं उन की स्किन अकसर ड्राई और पपड़ीदार दिखाई देती है. लेकिन कुछ ही हफ्तों में उन की स्किन की ये परेशानियां कम हो जाती हैं. यदि समय के साथ न्यू बौर्न की स्किन पर उभरी समस्याएं ठीक न हो तो अपने डाक्टर से संपर्क जरू करें.

बर्थमार्क

इमैच्योर ब्लड की वजह से न्यू बौर्न की स्किन में छोटे लाल धब्बे दिखाई दे सकते हैं. ये निशान चेहरे या गरदन के पीछे हो सकते हैं. जब शिशु रोता है तो ये ज्यादा दिखाई देते हैं. लेकिन ये सारे निशान 1 साल के अंदर खुद ही गायब हो जाते हैं. पैदा होने पर अकसर शिशु की स्किन पर छोटी खरोंचें या खून के धब्बे दिख सकते हैं. ये भी कुछ ही हफ्तों में ठीक हो जाते हैं.

बरतें कुछ सावधानियां

शिशु की स्किन हैल्दी और सौफ्ट बनी रहे, इस के लिए दैनिक जीवन में कुछ सावधानियां जरूरी हैं:

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शिशु को नहलाना: न्यू बौर्न की स्किन बहुत संवेदनशील और कोमल होती है. इसलिए उसे नहलाते समय बहुत सावधानी की जरूरत होती है. उसे रोज नहलाने की जरूरत नहीं होती. पहले कुछ हफ्तों के दौरान न्यू बौर्न का गंदा डायपर बदलना और स्पंज बाथ देना ही काफी होता है. 1 साल से छोटे शिशु को हर 2-3 दिनों में नहलाया जा सकता है. इस से कीटाणुओं से बचाव के साथ वह फ्रैश भी फील करता है. नहलाने के लिए टब में 3-4 इंच पानी भरने की जरूरत होती है. उसे नहलाने से पहले पानी चैक कर लें कि वह बहुत गरम तो नहीं. हलके गरम पानी में 2-3 मिनट नहलाना पर्याप्त होता है. इस दौरान ध्यान रखें कि साबुन या शैंपू उस की आंखों में न जाए.

बारबार नहलाने से न्यू बौर्न की स्किन ड्राई हो सकती है. इसलिए नहलाने के बाद कोई अच्छा बेबी पाउडर और मौइस्चराइजर लगा सकती हैं. अगर लोशन का इस्तेमाल करती हैं तो उस की गीली स्किन पर ही लोशन लगाएं. उस की स्किन को रगड़ने से बेहतर है कि उसे हौले से थपथपाएं. शिशु के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले बेबी स्किन केयर प्रोडक्ट्स जैसेकि लोशन, साबुन, शैंपू आदि का चुनाव करते समय याद  रखें कि ये सारे प्रोडक्ट्स सौफ्ट व पैराबीनफ्री हों. हो सके तो उस के लिए मार्केट में उपलब्ध खास बेबी स्किन केयर रेंज का ही चुनाव करें.

मसाज: शिशु की मालिश करने की प्रथा सदियों से चली आ रही है. प्राकृतिक तेलों से मसाज करना उस की स्किन को पोषण देता है. शिशु की मालिश के लिए जैतून का तेल, सरसों का तेल, नारियल तेल या आमंड बेबी औयल का उपयोग किया जा सकता है. ये तेल बेहद गुणकारी होते हैं. शिशु की सुगंधित और कैमिकलयुक्त तेल से मालिश करने से बचना चाहिए. वरना उस की स्किन पर रिऐक्शन हो सकता है. ध्यान रखें कि मालिश करने से पहले शिशु में स्तनपान न किया हो और जिस कमरे में मालिश कर रही हैं उस का तापमान सामान्य हो.

डायपर से जुड़ी देखभाल: शिशु के शरीर पर डायपर रैशेज की समस्या हो सकती है. सामान्यतया डायपर रैशेज तभी होते हैं जब डायपर को लंबे समय तक पहना कर रखा जाता है. न्यू बौर्न बारबार डायपर गीला कर सकता है. ऐसे में अगर समय पर डायपर न बदला जाए तो उसे रैशेज हो सकते हैं. शिशु के उस हिस्से के आसपास की स्किन लाल और पपड़ीदार हो जाती है. उस में खुजली हो सकती है. इस से बचने के लिए गीले डायपर को जितनी जल्दी हो सके बदल दें. अगर डायपर बहुत टाइट है या शिशु की स्किन किसी खास ब्रैंड के डायपर के प्रति ऐलर्जिक है तब भी आप को डायपर तुरंत बदल देना चाहिए, वरना इस से इन्फैक्शन होने की संभावना हो सकती है.

शिशु के गुप्तांग के हिस्से को हमेशा साफ व सूखा रखें. डायपर बदलते समय उस हिस्से को गरम पानी से साफ कर अच्छी तरह पोंछ कर ही नया डायपर पहनाएं. उस के लिए ऐसे डायपर का चुनाव करें जो मुलायम और अधिक सोखने वाला हो. रैशेज की समस्या ज्यादा होने लगे तो डाक्टर की सलाह से जिंकऔक्साइड बेस्ड डायपर रैश क्रीम ले सकती हैं.

सूर्य की रोशनी: जन्म के शुरुआती दिनों में बेबी को सूर्य की रोशनी के सीधे संपर्क में रखने से बचना चाहिए. इस से उसे सनबर्न हो सकता है. अगर आप कहीं बाहर जा रहे हैं और शिशु लंबे समय तक धूप में रहने वाला है तो उसे पूरी बांह के कपड़े और पैंट पहनाएं, साथ ही कैप भी लगाएं. खुले हिस्सों में बेबीसेफ सनस्क्रीन लगाना भी जरूरी है. जब वह बड़ा हो जाए तो उसे कुछ समय के लिए धूप में ले जाया जा सकता है.

इस से उस के शरीर में विटामिन डी की कमी  पूरी हो जाएगी.

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कौटन के कपड़े पहनाएं

न्यू बौर्न को रैशेज बहुत आसानी से हो जाते हैं, क्योंकि उस की स्किन फोल्ड्स में पसीना बहुत ज्यादा आता है. इसलिए उसे कौटन के कपड़े पहनाने चाहिए. ये कपड़े मुलायम होते हैं और पसीना आसानी से सोख लेते हैं. सिंथैटिक कपड़ों से शिशु को ऐलर्जिक रिऐक्शन हो सकता है. उस के कपड़ों को धोने के लिए हमेशा सौफ्ट डिटर्जैंट का उपयोग करें. आजकल बाजार में ऐसे डिटर्जैंट ही उपलब्ध हैं जिन्हें खासतौर पर बच्चों के कपड़े धोने के लिए तैयार किया गया है.

तापमान का खयाल रखें

शिशु की स्किन की अच्छी देखभाल के लिए तापमान का खयाल रखना भी जरूरी है. तापमान ज्यादा या कम होने पर शिशु आराम की नींद नहीं सो पाएगा जिस से उस की शारीरिक ग्रोथ पर असर पड़ेगा. इसलिए आप को तापमान में बदलाव का ध्यान रखना होगा खासकर ज्यादा गरमी या ज्यादा सर्दी के दिनों में अधिक ध्यान रखने की जरूरत पड़ती है.

न्यू बौर्न बेबी की इन प्रौब्लम से घबराएं नहीं

लेखक -डा. व्योम अग्रवाल

रात के करीब 3 बजे मुझे अंजनी का फोन आया. बड़ी घबराहट भरी आवाज में पहले तो उन्होंने मुझ से असमय फोन करने पर खेद जताया और फिर लगभग रोते हुए बोलीं कि उन का 5 दिन का बच्चा आधे घंटे से बहुत परेशान था. फिर अचानक चीख मार कर रोने लगा. 5 मिनट पहले उस ने पेशाब किया. उस के बाद अब वह आराम से सो रहा है.

दरअसल, उन्हें डर था कि बच्चे के मूत्रमार्ग में कोई रुकावट या इन्फैक्शन है या फिर किडनी की कोई परेशानी है. मैं ने सारी बात सुन कर सांत्वना देते हुए समझाया कि यह नवजातों के लिए बिलकुल सामान्य है. इस का कारण कदाचित यह होता है कि शिशुओं का अपने मूत्र विसर्जन पर नियंत्रण नहीं होता, इसलिए उन का मूत्रमार्ग कस कर बंद होता है, जिस से कि उन का पेशाब हर समय टपकता न रहे. सामान्यतया 2 महीने की उम्र तक यह होना बंद हो जाता है. इस के लिए न तो घबराने की जरूरत है न ही किसी जांच की. यदि अंजनी को यह जानकारी पहले से होती तो कदाचित वह उस के परिजन (और मैं भी) रात में परेशान न होते.

बच्चे का जन्म परिवार में सब को खुशियों से भर देता है. विशेषतया प्रथम बार मातृसुख का अनुभव करने वाली युवतियों के लिए तो यह अविस्मरणीय समय व अनुभव होता है. घर की अनुभवी महिलाएं जैसे दादी, नानी, भाभी, ननद इत्यादि बहुत सीख दे कर मां को असली मातृत्व के लिए तैयार करती हैं व दिनप्रतिदिन आने वाली समस्याओं का सरल उपाय भी बताती रहती हैं. एकल परिवारों में यह कमी प्रथम बार मां बनने वाली युवतियों के द्वारा बारबार महसूस की जाती है और दूसरों से मिलने वाली सलाह भी ठीक है या नहीं, इस का निर्णय कर पाना भी अधिकांश समय संभव नहीं हो पाता.

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1. शिशुओं की सामान्य समस्याएं

अपने लगभग 24 सालों के अनुभव से मैं ने जाना है कि नवजात के अस्पताल से घर जाने के बाद माताएं लगभग एकजैसी परेशानियां अनुभव करती हैं और उस समय डाक्टर से तुरंत संपर्क न होने पर या सही जानकारी के अभाव में बहुत विचलित हो जाती हैं. मातृत्व की दहलीज पर पहला कदम रखने वाली महिलाओं की इसी तरह की मुश्किल को ध्यान में रखते हुए शिशुओं की कुछ सामान्य समस्याओं के बारे में जानकारी दी जा रही है.

2. शरीर पर लाल दाने

कुछ दिन पहले एक बच्चा सांस में दिक्कत के कारण जन्म के 3 दिन बाद तक हमारी नर्सरी में रहा. चौथे दिन बच्चे को मां के पास दूध पिलाने के लिए भेजा गया. कुछ ही देर बाद बच्चे की नानी बहुत गुस्से में नर्सरी में आईं और करीब लड़ते हुए शिकायत करने लगीं कि नर्सरी में बच्चे को जो दवा दी गई उस के कारण उसे ऐलर्जी हो गई है. उस के पूरे शरीर पर खसरे जैसे दाने निकले हुए हैं.

हमारे डाक्टर उसी समय बच्चे के पास गए और उस का अच्छी तरह से परीक्षण किया. फिर हम ने सब परिवार वालों को तसल्ली देते हुए समझाया कि ज्यादातर शिशुओं के शरीर पर

जन्म के दूसरे दिन से लाल दाने दिखाई देने लगते हैं. इन्हें इरीदेमा टौक्सिकम कहा जाता है. इसे वायु के प्रथम संपर्क में आने पर होने वाली ऐलर्जी के रूप में समझा जा सकता है. ये दाने पूर्णरूप से अहानिकारक होते हैं और 6-7 दिनों में अपनेआप ठीक हो जाते हैं.

3. हरे रंग का मल

आमतौर पर बच्चे पहले 2 दिन पहले हरे, काले रंग का मल त्याग करते हैं. अगले कुछ दिनों तक रंग बदलता है और 10 दिन तक यह सामान्य रंग का हो जाता है. सफेद रंग का मल लिवर के रोगों में ही होता है. सामान्य रूप में यदि बच्चा केवल स्तनपान पर है तो वह दिन में कितनी ही बार मल त्याग करे यह चिंता का विषय नहीं होता व केवल स्तनपान कराने वाली मांओं को इस से परेशान नहीं होना चाहिए.

अकसर मांओं को दिनप्रतिदिन बदलते रंग या बारबार दस्त आते देख बहुत चिंता हो जाती है. बारबार यह हर दुग्धपान के बाद मलत्याग उतना ही सामान्य है जितना 3-4 दिन तक पेट का साफ न होना. मैं हर माता को समझाता हूं या बिना पूछे ही यह जानकारी अवश्य देता हूं कि यह कोई घबराने की बात नहीं है, परंतु यदि

शिशु सुस्त दिखे, स्तनपान छोड़ दे या पेशाब करना कम कर दे तो निश्चित रूप से बाल रोग विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए.

4. स्तनपान

एक दिन एक नवजात शिशु की मां ने मुझ से पूछा कि बच्चा केवल स्तनपान करता है पर दिन में 15-20 लंगोट खराब करता है. मेरे पूछने पर उन्होंने मुझे बताया कि वे एक स्तन से दूध पिलाना शुरू करती हैं और 5 से 10 मिनट बाद दूसरे स्तन से दूध पिलाती हैं. उन के अनुसार ऐसा वह स्तन के खाली होने के कारण नहीं, बल्कि एक मुद्रा में बैठने से थक जाने के कारण करती हैं.

वस्तुत: यही बच्चे के ज्यादा बार मलत्याग का कारण है. मां के स्तनों में शुरू का दूध शर्करा से युक्त होता है और बाद में दूध वसा से युक्त. वसा से तृप्ति आती है, जबकि शर्करा ज्यादा होने से ज्यादा मल बनता है. बच्चे के स्वास्थ्य के लिए दोनों मिश्रित और सही मात्रा में होने जरूरी हैं. इसलिए मैं ने उन्हें समझाया कि आगे से उन्हें एक बार में एक स्तन से पूरा दूध पिलाने पर यदि जरूरत रह जाए तो दूसरे स्तन से दूध पिलाना चाहिए. 2 दिन बाद ही उन का फोन आया कि बच्चे में बहुत सुधार लग रहा है.

5. दूध उगलना

शायद ही ऐसा कोई शिशु हो जो दूध न गिराता हो. कुछ सामान्य बालक तो नाक से भी दूध निकाल देते हैं. यदि बच्चे का वजन ठीक बढ़ रहा हो, उसे दूध पीते समय फंदा सा यानी सांस की नली में कुछ अटकना न महसूस होता हो, पेशाब पूरा आता हो, वह दूध पी कर निकालने के बाद भी तुरंत भूखा न हो जाता हो, उस का पेट फूलता न हो, वह चुस्त हो और निकला दूध हरे रंग का न हो तो दूध गिराना या हर बार दूध पी कर थोड़ी उलटी करना बिलकुल सामान्य बात है. बच्चे का वजन न बढ़ना इस बात का सूचक हो सकता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है और डाक्टर से परामर्श की जरूरत है.

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6. सोनेजागने का समय

बच्चे के जन्म के बाद के प्रथम परामर्श में थकी सी प्रतीत होती मांओं की सब से बड़ी परेशानी यह है कि बच्चा दिन में तो दूध पी कर सो जाता है पर रात को हर 10-20 मिनट में उठ जाता है, रोता है और बारबार दूध मांगता है. इस का कारण गर्भावस्था में मां के सोनेजागने के चक्र से जुड़ा है. साधारण भाषा में समझें तो जब मां दिन में चलती है तो शिशु झूला पा कर सो जाता है. रात में मां के लेटने के बाद गर्भस्थ शिशु उठ जाता है और घूमता है, पैर चलाता है और सक्रिय हो जाता है. जन्म के बाद उस की दिनरात की आदतें बदलने में करीब 2 महीने लगते हैं.

अत: रात में बच्चा जागा रहता है और जागे रहने पर उसे 2 ही काम आते हैं- रोना और दूध पीना. यही उस के रात को जागने और रोने का कारण है. मांओं को चाहिए कि वे दिन में विश्राम कर लें ताकि रात को बच्चे को पूर्ण स्तनपान करा पाएं. बीचबीच में हिलाना, कमरे में धीमी रोशनी, धीमा संगीत बच्चे को रात में भी ज्यादा सोने में मदद करते हैं. किसी भी अवस्था में बच्चे का रोज केवल रात में रोने को मां के दूध की कमी नहीं समझा जाना चाहिए और बच्चे तथा मां के स्वस्थ जीवन के लिए 6 माह तक बच्चे को केवल स्तनपान पर ही रखना चाहिए.

7. नवजात लड़की में रक्तस्राव

सरीन को अपनी बच्ची के डायपर को बदलते समय उस के योनिमार्ग से खून आता दिखाई दिया तो वे घबरा गईं. नवजात लड़कियों में जन्म के पहले सप्ताह में माहवारी जैसा रक्तस्राव हो सकता है जो कि 5-6 दिन तक हो सकता है. यह रक्तस्राव कुछ बूंदों जितना होता है और स्वत: ही कुछ दिनों में रुक जाता है. जन्म के बाद मां के हारमोन शरीर से हट जाने से यह होता है और कदापि चिंता का विषय नहीं होता.

मांओें को सलाह दी जाती है कि शिशुओं के विषय में कोई भी समस्या आने पर स्वयं डाक्टर बनने की कोशिश न करें वरन तुरंत बालरोग विशेषज्ञ को दिखाएं.

तो नहीं होगा मां और बच्चे में कुपोषण

बच्चे के जन्म के तुरंत बाद कुपोषण का बुरा असर मां और बच्चे दोनों पर पड़ता है. गर्भावस्था के दौरान और उस के बाद होने वाला कुपोषण बच्चे के लिए बेहद घातक हो सकता है. इसे रोकना बहुत जरूरी है.

गर्भावस्था के बाद कुपोषण के कारण

स्तनपान इस का सब से पहला और मुख्य कारण है. बच्चे को दूध पिलाने वाली मां को रोजाना कम से कम 1000 कैलोरी ऊर्जा की जरूरत होती है. ज्यादातर महिलाएं या तो सही डाइट चार्ट के बारे में नहीं जानती हैं या फिर इस की अनदेखी करती है, जिस के कारण वे डिहाइडे्रशन, विटामिन या मिनरल की कमी और कभीकभी खून की कमी यानी ऐनीमिया की शिकार हो जाती हैं. इसे पोस्ट नेटल मालनयूट्रिशन यानी बच्चे के जन्म के बाद होने वाला कुपोषण कहा जा सकता है.

स्तनपान कराने से मां को ज्यादा भूख लगती है और अकसर वह ऐसे खाद्यपदार्थ खाती है, जो पोषक एवं सेहतमंद नहीं होते. स्वाद में अच्छे लगने वाले खाद्यपदार्थों में विटामिन और मिनरल्स की कमी होती है, जिस के कारण मां कुपोषण से ग्रस्त हो जाती है.

बच्चे के जन्म से पहले और बाद में प्रीनेटल विटामिन का सेवन करना बहुत जरूरी है. प्रीनेटल विटामिन जैसे फौलिक ऐसिड पानी में घुल कर शरीर से बाहर निकलते रहते हैं, जिस के चलते अकसर बच्चे के जन्म के बाद महिलाएं फौलिक ऐसिड की कमी के कारण ऐनीमिया से ग्रस्त हो जाती हैं.

बच्चे के जन्म के बाद कुपोषण के कारण अकसर महिलाएं पोस्टपार्टम डिप्रैशन की भी शिकार हो जाती हैं. बच्चे को जन्म देने के बाद उन में भावनात्मक बदलाव आते हैं, जिस के कारण डिप्रैशन की समस्या हो सकती है. इस के कारण कई बार महिलाएं ठीक से खाना खाना बंद कर देती हैं और कुपोषण की शिकार हो जाती हैं.

गर्भावस्था के दौरान लगभग सभी महिलाओं का वजन बढ़ जाता है. कई बार वे वजन में कमी लाने के लिए ठीक से खाना खाना बंद कर देती हैं, और कुपोषण की शिकार हो जाती हैं. अत: गर्भावस्था के बाद वजन में धीरेधीरे कमी लाने की कोशिश करें ताकि अचानक कुपोषण की शिकार न हो जाएं बच्चे को जन्म देने के तुरंत बाद वे आसानी से 1 ही महीने में 4-5 पाउंड वजन कम कर सकती हैं. इसलिए जरूरत से ज्यादा डाइटिंग न करें.

बच्चे के जन्म के बाद अकसर महिलाएं ठीक से सो नहीं पातीं. अत: नींद पूरी न होने के कारण शरीर में पोषक पदार्थ अवशोषित नहीं होते, जिस के कारण वे कुपोषण का शिकार हो जाती हैं.

शिशु के लिए जोखिम

गर्भवती महिला में कुपोषण का बुरा असर उस के पेट में पल रहे बच्चे पर पड़ता है. ऐसे में बच्चे का विकास ठीक से नहीं हो पाता और जन्म के समय उस का वजन सामान्य से कम रह जाता है. गर्भावस्था के दौरान मां में कुपोषण, आईयूजीआर यानी इंट्रायूटरिन ग्रोथ रिस्ट्रिक्शन और जन्म के समय कम वजन का बुरा असर बच्चे पर पड़ता है जिस के कई बुरे असर हो सकते हैं जैसे- जन्मजात दोष, दिमाग को नुकसान, समय से पहले जन्म, कुछ अंगों का विकास न होना, बच्चे में न्यूरोलौजिकल, इंटेस्टाइनल, रेस्पीरेटरी या सर्कुलेटरी डिसऔर्डर. कुछ बच्चे पैदा होते ही नहीं रोते. इन में से 50 फीसदी मामलों का कारण आईयूजीआर होता है.

बच्चे के आने वाले जीवन पर असर

अगर गर्भावस्था के दौरान मां में पोषण की कमी हो तो बच्चे को अपने जीवन में इन बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है:

औस्टियोपोरोसिस, क्रोनिक किडनी फेल्योर, टाइप 2 डायबिटीज, मेलिटस, क्रोनिक औब्स्ट्रक्टिव लंग्स डिजीज, खून में लिपिड्स की मात्रा असामान्य होना, इंम्पेयर्ड ऐनर्जी होम्योस्टेसिस (जब शरीर अपनेआप में ऊर्जा के स्तर को विनियमित नहीं रख पाता), वे बच्चे जिन का वजन जन्म के समय सामान्य से कम होता है, उन का विकास ठीक से नहीं हो पाता.

गर्भावस्था से पहले, उस के दौरान और बाद में पोषण की कमी के परिणाम कुछ इस तरह हो सकते हैं. स्कूल में बच्चे की परफौर्मैंस अच्छी नहीं रहती, वह ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाता, उस का विकास ठीक से नहीं होता, बच्चा शारीरिक रूप से कमजोर होता है और उस में ताकत की कमी होती है.

मां के लिए समस्याएं

अगर गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में पोषण की कमी हो तो उन में मृत्यु दर की संभावना अधिक होती है. इस के अलावा बच्चे का समय से पहले पैदा होना, गर्भपात जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं. और भी कई समस्याएं हो सकती हैं जैसे संक्रमण, ऐनीमिया यानी खून की कमी, उत्पादकता में कमी, सुस्ती और कमजोरी, औस्टियोपोरोसिस.

कुपोषण को कैसे रोका जा सकता है

संतुलित आहार के सेवन से कुपोषण को रोका जा सकता है. महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त मात्रा में फल, सब्जियों, पानी, फाइबर, प्रोटीन, वसा एवं कार्बोहाइड्रेट का सेवन करना चाहिए. वे महिलाएं जो गर्भधारण की योजना बना रही हैं, उन्हें प्रीनेटल विटामिन शुरू कर देने चाहिए. इस के अलावा सेहतमंद आहार लें और नियमित व्यायाम करें. गर्भावस्था के दौरान पोषक खाद्यपदार्थों का सेवन करें. बच्चे के जन्म के बाद भी विटामिनों का सेवन करें. इस से मां और बच्चा दोनों स्वस्थ रहेंगे.

पोषण संबंधी जरूरतें

आयरन: शरीर में हीमोग्लोबिन बनाने के लिए आयरन बहुत जरूरी है. हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाता है और पूरे शरीर में आक्सीजन पहुंचाता है. अगर शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी हो जाए तो शरीर के सभी अंगों तक आक्सीजन पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाती. अगर महिला आयरन का सेवन ठीक से न करे तो धीरेधीरे हीमोग्लोबिन की कमी होने लगती है और वह ऐनीमिक हो जाती है. उस के शरीर में बीमारियों से लड़ने की ताकत नहीं रहती.

प्रीनेटल विटामिन: गर्भवती महिलाओं को प्रीनेटल विटामिन लेने की सलाह दी जाती है ताकि बच्चे को विटामिन और मिनरल्स पर्याप्त मात्रा में मिलते रहें. लेकिन कुछ मामलों में जन्म के बाद प्रीनेटल विटामिनों की जरूरत नहीं होती. इसलिए डाक्टर से पूछ लें कि आप को कितने समय तक विटामिन जारी रखने चाहिए.

ओमेगा 3 फैटी ऐसिड: बच्चे के जन्म के बाद खासतौर पर स्तनपान कराने वाली महिलाओं को अपने आहार में ओमेगा 3 फैटी ऐसिड का सेवन जरूर करना चाहिए. अलसी के बीज, सोया, अखरोट और कद्दू के बीजों में ओमेगा 3 फैटी ऐसिड पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है.

कैल्सियम: महिलाओं को जीवन की हर अवस्था में कैल्सियम की सही मात्रा की जरूरत होती है. इस के लिए डेयरी उत्पादों, गहरी हरी पत्तेदार सब्जियों, ब्रोकली, दूध एवं दूध से बनी चीजों, कैल्सियम फोर्टिफाइड खाद्यपदार्थों का सेवन करें.

बच्चे को जन्म देने के बाद महिलाओं के लिए विशेष सुझाव:

सिर्फ कैलोरीज के सेवन से बचें: बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती दिनों में महिलाएं बच्चे की देखभाल में बहुत ज्यादा व्यस्त हो जाती हैं. ऐसे में वे सेहतमंद आहार पर ध्यान नहीं दे पातीं और जानेअनजाने हाईकैलोरी भोजन खाती रहती हैं. इस दौरान गाजर, फलसब्जियां, लोफैट योगर्ट, उबला अंडा, लो फैट चीज, अंगूर, केला, किशमिश, मेवे का सेवन करना चाहिए.

बारबार थोड़ाथोड़ा खाएं: एक ही बार भरपेट खाने के बजाय, बारबार कम मात्रा में खाती रहें. इस से दिनभर ऊर्जा बनी रहेगी. भारी भोजन को पचाने के लिए ज्यादा ऊर्जा की जरूरत होती है. लेकिन इस समय मां की नींद पूरी नहीं हो पाती, जिस से भारी भोजन पचाना मुश्किल होता है, इसलिए हलका आहार लें ताकि शरीर में ऊर्जा का सही स्तर बना रहे और आप दिनभर थकान न महसूस करें.

डिहाइड्रेशन से बचें: बच्चे को जन्म देने के दौरान शरीर से तरल पदार्थ बहुत ज्यादा मात्रा में निकल जाते हैं, इसलिए इस दौरान हाइड्रेशन का खास ध्यान रखें. डिहाइड्रेशन से मां कमजोरी और थकान महसूस कर सकती है.

बच्चे के जन्म के बाद पोषण और वजन में कमी: बच्चे के जन्म के बाद अकसर महिलाएं एकदम अपना वजन कम करना चाहती हैं, जिस के कारण उचित आहार का सेवन नहीं करतीं. स्तनपान कराने से वजन खुद ही कम हो जाता है, बल्कि स्तनपान कराने वाली मां को रोजाना 300 अतिरिक्त कैलोरीज की जरूरत होती है. इसलिए डाक्टर की सलाह से व्यायाम करें और अतिरिक्त कैलोरीज के सेवन से बचें.

श्रुति शर्मा

बैरिएट्रिक काउंसलर और न्यूट्रिशनिस्ट, जेपी हौस्पिटल, नोएडा

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