मां और बच्चों की केयर से जुड़ी सावधानियों के बारे बताइए?

सवाल-

मेरी उम्र 37 वर्ष है और मेरी 7 महीने में प्रीमैच्योर डिलिवरी हुई है. मैं पूरी प्रैगनैंसी के दौरान लगातार मैडिसिन पर चल रही हूं. मेरा दूध बच्चे के लिए पूरा नहीं हो पाता है इसलिए मैं उसे फौर्मूला मिल्क दे रही हूं. लेकिन उस से बच्चे का पेट साफ ही नहीं हो पाता है. लगातार बच्चे को कौन्सिपेशन रहती है. कृपया बताएं कि मैं क्या करूं?

जवाब

आप के बच्चे का जन्म 7वें महीने में हुआ है. समय से पहले जन्म होने के कारण ऐसे बच्चों का संपूर्ण शारीरिक व मानसिक विकास सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त पोषण का मिलना बेहद आवश्यक हो जाता है क्योंकि ऐसे बच्चों का जीवन तब तक संकट में होता है जब तक इन का पूरा टर्म यानी 36 हफ्ते पूरे न हो जाएं. ऐसे में बच्चे की मां के गर्भ के समान तापमान में संरक्षित रखने के लिए जितना उसे नियोनेटल केयर यूनिट में रखा जाना आवश्यक होता है उतना ही जरूरी है उसे आवश्यक न्यूट्रिशन प्रदान करना. इसलिए बच्चे की मां का दूध दिया जाना चाहिए. अगर आप का दूध नहीं बन पा रहा है तो अपने लिए न्यूट्रिशनिस्ट की मदद से संपूर्ण आहार सुनिश्चित करें. बच्चे को 8-12 बार फीड करने की कोशिश करें क्योंकि जब बच्चा स्तनपान करता है तो ऐसे हारमोन बनते हैं जिन से अपनेआप दूध बनने लगता है. खाने में दूध, अलसी, ओट्स और गेहूं का सेवन बढ़ाएं.

सवाल-

मेरी 2 महीने की बच्ची है. मेरे घर में सभी सदस्य कोरोना पीडि़त हो गए हैं. मैं थोड़ा डरी हुई हूं कि क्या मुझे अपनी बच्ची को स्तनपान करवाना चाहिए? मेरे घर के सभी सदस्य ऐसा करने से मना कर रहे हैं?

जवाब

वर्ल्ड हैल्थ और्गेनाइजेशन द्वारा साफतौर पर यह दिशानिर्देश जारी किए हैं कि हर मां कोरोना प्रभावित होने के बावजूद अपने बच्चे को स्तनपान करवा सकती है. यहां आप तो कोरोना से प्रभावित हैं भी नहीं तो आप को बिना किसी संशय के बच्चे को स्तनपान करवाते रहना चाहिए. आप का दूध ही बच्चे के लिए सुरक्षाकवच का काम करेगा, फिर चाहे वह कोरोना हो या अन्य कोई भी संक्रमण. साथ ही आप को बच्चे के आहार में गोजातीय दूध आधारित उत्पादों जैसेकि फौर्मूला मिल्क से बचना चाहिए. आखिर में यह बेहद आवश्यक है कि आप बच्चे का नियमित चैकअप करवाती रहें. हर ऐक्टिविटी पर रखें नजर. जैसे ही आप को कोई लक्षण दिखाई दे तुरंत डाक्टर के पास जाएं.

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सवाल

मैं ने 40 वर्ष की आयु में आईवीएफ की मदद से 2 जुड़वां बच्चों को जन्म दिया है. मेरी डिलिवरी औपरेशन से हुई है. औपरेशन की वजह से मेरा शरीर बेहद कमजोर हो गया है. मैं दोनों बच्चों को ठीक से फीड नहीं करा पाती, उन्हें ज्यादातर गाय का दूध देना पड़ता है. अब बच्चे भी ऊपर का दूध पीने में ज्यादा सहज रहते हैं. अगर मैं उन्हें फीड करवाने की कोशिश भी करती हूं तो वे पीते नहीं हैं.

जवाब-

औपरेशन से डिलिवरी होने की वजह से आप यकीनन अपने बच्चों को पहले घंटे में अपना दूध नहीं पिला पाई होंगी. मां का पहला दूध बच्चे के लिए प्रतिरक्षा का काम करता है. ऐसे में आप के लिए बहुत जरूरी हो जाता है कि आप बच्चों को अपना दूध दें. अगर वे आप का दूध नहीं पीते हैं तो अपना मिल्क, पंप की मदद से स्टरलाइज किए गए कंटेनर में निकालें और बच्चों को चम्मच की मदद से पिलाएं.

गायभैंस का दूध बिलकुल नहीं दें क्योंकि इस दूध से बच्चों को ऐलर्जी और अन्य हैल्थ रिस्क हो सकते हैं. इस दूध के सेवन से बच्चे में इन्फैक्शन का खतरा बढ़ जाता है. अगर आप को लगता है कि 2 बच्चों के लिए आप का दूध पर्याप्त नहीं है तो नियोलेक्टा का 100% ह्यूमन मिल्क भी आप बच्चों को दे सकती हैं क्योंकि यह उत्पाद डोनेट किए गए ब्रैस्ट मिल्क को ही पाश्च्युराइज्ड कर के बनाया जाता है. लेकिन पहले डाक्टर से सलाह जरूर कर लें.

सवाल-

मेरा बच्चा 4 महीने का है. उसे मेरी मदर इन ला चम्मच से साधारण पानी और अन्य सभी तरह के पेयपदार्थ पिलाती हैं और कभीकभी आलू मैश कर के भी देती हैं. मैं अपने बच्चे की सेहत को ले कर चिंतित हूं. मैं ने सभी जगह पढ़ा है और डाक्टर भी यही सलाह देते हैं कि 6 महीने तक बच्चे को सिर्फ मां का दूध दें और कुछ भी ऊपर का खानपान नहीं देना चाहिए. क्या इस से मेरे बच्चे की पाचनक्रिया पर प्रभाव पड़ेगा?

जवाब-

घर में अकसर बड़ेबुजुर्ग अपने देशी नुसखे बच्चों पर आजमाते हैं. हालांकि उन की भावना अच्छी होती है लेकिन एक डाक्टर होने के नाते मैं इस की सपोर्ट नहीं करती. बच्चे की पाचनक्रिया विकसित हुए बिना उसे अनाज या अन्य खाद्यपदार्थ नहीं देना चाहिए. इतना ही नहीं अगर गरमी का मौसम हो तो भी बच्चे को बारबार और आवश्यकतानुसार स्तनपान कराने पर उसे पानी या किसी अन्य तरल पेय की आवश्यकता नहीं होती है. इसलिए दाई या अन्य लोगों के कहने पर पानी आदि अन्य पेयपदार्थ देने की कोशिश न करें.

मानव दूध ऐंटीबौडी प्रदान करता है और आसानी से पचने योग्य होता है. इस में वे सभी आवश्यक पोषक तत्त्व होते हैं, जो बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए बेहद आवश्यक होते हैं.

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सवाल-

मैं 7 महीने के बच्चे की मां हूं. मेरा दूध इतना ज्यादा बनता है कि कई बार कहीं भी बहने लगता है, जो मेरे लिए काफी मुश्किल भरी स्थिति हो जाती है. मैं क्या करूं?

जवाब-

अगर आप का दूध बहुत अधिक मात्रा में बनता है तो इस का मतलब है आप पूरी तरह से स्वस्थ हैं. ब्रैस्ट मिल्क कुदरत की नेमत की तरह है. अगर अपने बच्चे को फीड कराने के बाद भी आप का बहुत दूध बनता है तो आप पंप की मदद उसे निकाल कर मदर मिल्क बैंक में डोनेट कर सकती हैं क्योंकि दुनिया में लाखों बच्चे ऐसे हैं जिन्हें कई कारणों से मां के दूध का पोषण नहीं मिल पाता और उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ती है. इसलिए आप अपने नजदीकी मदर मिल्क बैंक में दूध को जरूर डोनेट करें. यदि आप जाने में समर्थ नहीं हैं तो मिल्क बैंक से संपर्क करें. वे स्वयं आप के यहां से मिल्क कंटेनर तय समय पर कलैक्ट कर लेंगे.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

न्यू बौर्न की स्किन का रखें खास खयाल

न्यू बौर्न की स्किन बहुत पतली और नाजुक होती है, क्योंकि इतनी जल्दी स्किन प्रोटैक्टिव बैरियर पूरी तरह विकसित नहीं कर पाती. इस में करीब 1 साल का समय लगता है. वातावरण और तापमान में होने वाले परिवर्तन प्रत्यक्ष रूप से शिशु की स्किन को प्रभावित करते हैं. इस वजह से इन की स्किन को ज्यादा केयर की जरूरत पड़ती है. कोशिश करनी चाहिए कि शिशु के लिए अच्छे बेबी केयर प्रोडक्ट्स का ही उपयोग किया जाए. इस के अलावा सही तापमान और मौइस्चराइजर के उचित उपयोग जैसे पहलुओं पर भी विचार करना होगा. शिशु की स्किन की सेहत का खयाल रखने और ऐलर्जी या इन्फैक्शन का रिस्क कम करने की जिम्मेदारी पेरैंट्स की ही होती है.

स्किन पर होने वाली आम समस्याएं

झुर्रियां, स्किन का लाल होना और ड्राइनैस जैसी समस्याएं न्यू बौर्न की स्किन में बहुत आम हैं. न्यू बौर्न की स्किन में कोई समस्या दिखे तो घबराएं नहीं. वह मां के गर्भ से बाहर आने के बाद नए वातावरण में खुद को ऐडजस्ट करने की कोशिश कर रहा होता है. उस की स्किन भी नए वातावरण के संपर्क में आती है तो कुछ समस्याएं स्वाभाविक रूप से पैदा हो सकती हैं, जो समय के साथ ठीक भी हो जाती हैं. कई दफा प्रीमैच्योर बेबी के चेहरे और पीठ पर नर्म बाल होते हैं. वहीं जो न्यू बौर्न देर से पैदा होते हैं उन की स्किन अकसर ड्राई और पपड़ीदार दिखाई देती है. लेकिन कुछ ही हफ्तों में उन की स्किन की ये परेशानियां कम हो जाती हैं. यदि समय के साथ न्यू बौर्न की स्किन पर उभरी समस्याएं ठीक न हो तो अपने डाक्टर से संपर्क जरू करें.

बर्थमार्क

इमैच्योर ब्लड की वजह से न्यू बौर्न की स्किन में छोटे लाल धब्बे दिखाई दे सकते हैं. ये निशान चेहरे या गरदन के पीछे हो सकते हैं. जब शिशु रोता है तो ये ज्यादा दिखाई देते हैं. लेकिन ये सारे निशान 1 साल के अंदर खुद ही गायब हो जाते हैं. पैदा होने पर अकसर शिशु की स्किन पर छोटी खरोंचें या खून के धब्बे दिख सकते हैं. ये भी कुछ ही हफ्तों में ठीक हो जाते हैं.

बरतें कुछ सावधानियां

शिशु की स्किन हैल्दी और सौफ्ट बनी रहे, इस के लिए दैनिक जीवन में कुछ सावधानियां जरूरी हैं:

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शिशु को नहलाना: न्यू बौर्न की स्किन बहुत संवेदनशील और कोमल होती है. इसलिए उसे नहलाते समय बहुत सावधानी की जरूरत होती है. उसे रोज नहलाने की जरूरत नहीं होती. पहले कुछ हफ्तों के दौरान न्यू बौर्न का गंदा डायपर बदलना और स्पंज बाथ देना ही काफी होता है. 1 साल से छोटे शिशु को हर 2-3 दिनों में नहलाया जा सकता है. इस से कीटाणुओं से बचाव के साथ वह फ्रैश भी फील करता है. नहलाने के लिए टब में 3-4 इंच पानी भरने की जरूरत होती है. उसे नहलाने से पहले पानी चैक कर लें कि वह बहुत गरम तो नहीं. हलके गरम पानी में 2-3 मिनट नहलाना पर्याप्त होता है. इस दौरान ध्यान रखें कि साबुन या शैंपू उस की आंखों में न जाए.

बारबार नहलाने से न्यू बौर्न की स्किन ड्राई हो सकती है. इसलिए नहलाने के बाद कोई अच्छा बेबी पाउडर और मौइस्चराइजर लगा सकती हैं. अगर लोशन का इस्तेमाल करती हैं तो उस की गीली स्किन पर ही लोशन लगाएं. उस की स्किन को रगड़ने से बेहतर है कि उसे हौले से थपथपाएं. शिशु के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले बेबी स्किन केयर प्रोडक्ट्स जैसेकि लोशन, साबुन, शैंपू आदि का चुनाव करते समय याद  रखें कि ये सारे प्रोडक्ट्स सौफ्ट व पैराबीनफ्री हों. हो सके तो उस के लिए मार्केट में उपलब्ध खास बेबी स्किन केयर रेंज का ही चुनाव करें.

मसाज: शिशु की मालिश करने की प्रथा सदियों से चली आ रही है. प्राकृतिक तेलों से मसाज करना उस की स्किन को पोषण देता है. शिशु की मालिश के लिए जैतून का तेल, सरसों का तेल, नारियल तेल या आमंड बेबी औयल का उपयोग किया जा सकता है. ये तेल बेहद गुणकारी होते हैं. शिशु की सुगंधित और कैमिकलयुक्त तेल से मालिश करने से बचना चाहिए. वरना उस की स्किन पर रिऐक्शन हो सकता है. ध्यान रखें कि मालिश करने से पहले शिशु में स्तनपान न किया हो और जिस कमरे में मालिश कर रही हैं उस का तापमान सामान्य हो.

डायपर से जुड़ी देखभाल: शिशु के शरीर पर डायपर रैशेज की समस्या हो सकती है. सामान्यतया डायपर रैशेज तभी होते हैं जब डायपर को लंबे समय तक पहना कर रखा जाता है. न्यू बौर्न बारबार डायपर गीला कर सकता है. ऐसे में अगर समय पर डायपर न बदला जाए तो उसे रैशेज हो सकते हैं. शिशु के उस हिस्से के आसपास की स्किन लाल और पपड़ीदार हो जाती है. उस में खुजली हो सकती है. इस से बचने के लिए गीले डायपर को जितनी जल्दी हो सके बदल दें. अगर डायपर बहुत टाइट है या शिशु की स्किन किसी खास ब्रैंड के डायपर के प्रति ऐलर्जिक है तब भी आप को डायपर तुरंत बदल देना चाहिए, वरना इस से इन्फैक्शन होने की संभावना हो सकती है.

शिशु के गुप्तांग के हिस्से को हमेशा साफ व सूखा रखें. डायपर बदलते समय उस हिस्से को गरम पानी से साफ कर अच्छी तरह पोंछ कर ही नया डायपर पहनाएं. उस के लिए ऐसे डायपर का चुनाव करें जो मुलायम और अधिक सोखने वाला हो. रैशेज की समस्या ज्यादा होने लगे तो डाक्टर की सलाह से जिंकऔक्साइड बेस्ड डायपर रैश क्रीम ले सकती हैं.

सूर्य की रोशनी: जन्म के शुरुआती दिनों में बेबी को सूर्य की रोशनी के सीधे संपर्क में रखने से बचना चाहिए. इस से उसे सनबर्न हो सकता है. अगर आप कहीं बाहर जा रहे हैं और शिशु लंबे समय तक धूप में रहने वाला है तो उसे पूरी बांह के कपड़े और पैंट पहनाएं, साथ ही कैप भी लगाएं. खुले हिस्सों में बेबीसेफ सनस्क्रीन लगाना भी जरूरी है. जब वह बड़ा हो जाए तो उसे कुछ समय के लिए धूप में ले जाया जा सकता है.

इस से उस के शरीर में विटामिन डी की कमी  पूरी हो जाएगी.

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कौटन के कपड़े पहनाएं

न्यू बौर्न को रैशेज बहुत आसानी से हो जाते हैं, क्योंकि उस की स्किन फोल्ड्स में पसीना बहुत ज्यादा आता है. इसलिए उसे कौटन के कपड़े पहनाने चाहिए. ये कपड़े मुलायम होते हैं और पसीना आसानी से सोख लेते हैं. सिंथैटिक कपड़ों से शिशु को ऐलर्जिक रिऐक्शन हो सकता है. उस के कपड़ों को धोने के लिए हमेशा सौफ्ट डिटर्जैंट का उपयोग करें. आजकल बाजार में ऐसे डिटर्जैंट ही उपलब्ध हैं जिन्हें खासतौर पर बच्चों के कपड़े धोने के लिए तैयार किया गया है.

तापमान का खयाल रखें

शिशु की स्किन की अच्छी देखभाल के लिए तापमान का खयाल रखना भी जरूरी है. तापमान ज्यादा या कम होने पर शिशु आराम की नींद नहीं सो पाएगा जिस से उस की शारीरिक ग्रोथ पर असर पड़ेगा. इसलिए आप को तापमान में बदलाव का ध्यान रखना होगा खासकर ज्यादा गरमी या ज्यादा सर्दी के दिनों में अधिक ध्यान रखने की जरूरत पड़ती है.

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