REVIEW: जानें कैसी है ऋषि कपूर की आखिरी फिल्म ‘शर्माजी नमकीन’

रेटिंगः तीन स्टार

निर्माताः एक्सेल इंटरटेनमेंट व मकगफिन पिक्चर्स

निर्देशकः हितेश भाटिया

कलाकारः स्व.  ऋषि कपूर,  परेश रावल, जुही चावला, सतीश कौशिक,  गुफी पेंटल, सुहेल नय्यर, तरन बजाज,  विकास मोहला, शुभंकर त्रिपाठी, इशा तलवार, आकाशदीप साबिर, संजय कोटा व अन्य.

अवधिः दो घंटे

ओटीटी प्लेटफार्मः अमेजॉन प्राइम वीडियो

भारतीय सिनेमा जगत के सर्वाधिक लोकप्रिय अभिनेता ऋषि  कपूर (1952 से 2022) हर फिल्म में अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ते रहे. उनके अभिनय से सजी यह उनकी अंतिम फिल्म है, जिसकी शूटिंग के दौरान  उनका निधन हो गया. उसके बाद इस फिल्म को पूरा करने की जिम्मेदारी निभाते हुए उसी किरदार को परेश रावल ने निभाया. मगर फिल्म पुनः नही फिल्मायी गयी. बल्कि एक अनूठा प्रयोग किया गया. इस प्रयोग के तहत जिन दृश्यों को ऋषि कपूर नहीं फिल्माया जा सका था, सिर्फ उन्ही दृश्यांे को परेश रावल पर फिल्माया गया. मगर फिल्म देखते समय ऋषि कपूर की अनुपस्थिति के ेचलते कुछ हलके झटके लगते हैं, मगर मनोरंजन में कमी नही आने पाती. फिल्म वास्तव में खट्टी मीठी व नमकीन है. अवकाश प्राप्त पिता द्वारा अपने बेटे के अहसास दिलाने के संघर्ष कि वह घर में पड़े हुए फर्नीचर मात्र नही है को फिल्म में बाखूबी पेश किया गया है.

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कहानीः

दिल्ली में मधुबन होम अप्लाइसेंस में कार्यरत ब्रज गोपाल शर्मा जी(स्व.  ऋषि कपूर और परेश रावल ) को जबरन वीआर एस देकर अवकाश ग्रहण करा दिया जाता है. शर्मा जी को भ्रम है कि कंपनी के एम डी सिक्का(दीपक कृपलानी) उनकी कद्र करते हैं. शर्मा जी की पत्नी सुमन का देहांत हो चुका हैं.  घर मंे दो बेटे संदीप शर्मा उर्फ रिंकू (सुहेल नय्यर ) और विंसी( तारूक रैना ) है. रिंकू किसी कंपनी में नौकरी कर रहा है और उर्मी (इशा तलवार )से रोमांस फरमा रहा है और जल्द शादी करने की योजना है. शादी के बाद अलग रहने के लिए रिंकू ने शर्मा जी से छिपाकर पंद्रह लाख रूपए देकर गुड़गांव में बिल्डर जैन(आकाशदीप शाबिर ) द्वारा बनाई जा रही इमारतो में से एक इमारत में एक फल्ैट बुक कर लिया है. छोटा बेटा विंशी बीकाम की पढ़ाई कर रहा है. दोनो बेटे अपने आप में मस्त हैं. खाना बनाने से लेकर बिजली का बिल भरने तक घर के सभी काम शर्मा जी खुद ही करते हैं.  उन्हे घर पर खाली बैठना पसंद नही. वह कई तरह के काम करने की योजना बनाते हैं, मगर हर बार रिंकू को तकलीफ है कि लोग क्या कहेंगे. किसी अन्य कंपनी में उन्हें नौकरी नही मिलती, क्योकि वहां पर युवा पीढ़ी का कब्जा है. फिर शर्मा जी अपने दोस्त चड्ढा (सतीश कौशिक) के कहने पर औरतांे की किट्टी पार्टी के दिन उनके घर जाकर खाना बनाने लगते हैं. इसी दौरान उनकी दोस्ती वीना(जुही चावला )  से हो जाती है. वीना के कहने पर वह महापौर रॉबी के यहां पार्टी में भी खाना बनाते हैं. इस तरह शर्मा जी काफी खुशहाल जिंदगी जीने लगते हैं. पर जब यह राज उनके बेटों के सामने आता है, तो रिंकू को यह बात पसंद नहीं आती. उधर बिल्डर की तरफ से रिंकू को फ्लैट का कब्जा नही मिल रहा, पता चलता है कि उसने जंगल की सरकारी जमीन पर इमारतें खड़ी कर दी हैं. फिर कहानी कई मोड़ लेती है और सुखद मोड़ पर खत्म होती है.

लेखन व निर्देशनः

जब से सरकार अर्थात सेंसर बोर्ड ने फिल्म की शुरूआत में फिल्म के कलाकारो व तकनीशियनों आदि के नाम हिंदी में देना अनिवार्य किया है, तब से हर फिल्मकार अपनी फिल्म में सभी क्रेडिट व नाम अंग्रेजी के अलावा हिंदी में देने लगे हैं, मगर इस फिल्म में हिंदी की वर्तनी की तमाम गल्तियां हैं, जो कि अखरती हैं. क्योंकि इस फिल्म का निर्माण एक्सेल इंटरटेनमेंट ने किया है, जिसके मुखिया मशहूर पटकथा लेखक व गीतकार जावेद अख्तर के बेटे फरहान अख्तर हैं.

उत्तरी दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली के संघर्ष के केंद्र पर बनी इस फिल्म की शुरूआत काफी धीमी है, पर जब फिल्म रफ्तार पकड़ती है, तो इंसान के रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी को केंद्र में रखते हुए  रोजमर्रा की जिंदगी के छोटे छोटे मुद्दों के साथ ही मध्यमवर्गीय परिवार की औरतों से जुड़े मुद्दे, अवैध निर्माण में संलग्न बिल्डर और पुलिस की सांठ गांठ, आम इंसानों को बेवजह परेशान करने वाली पुलिस किस तरह नेता के सामने दुम हिलाती है आदि को बहुत ही सहज अंदाज में चित्रित किया गया है. औरतों के इस दर्द को भी उकेरा गया है कि पुरूष कुछ भी करें, पर औरतों को हर काम करने से पहले पुरूषों से इजाजत लेनी पड़ती है.  फिल्मकार ने मध्यमवर्गीय जीवन से जुड़े तत्वों को बड़ी खूबी से उकेरा है.

अवकाश प्राप्त पिता द्वारा अपने बेटे को इस बात का अहसास दिलाने का संघर्ष कि वह सेवा निवृत्त होने के बाद घर मंे फर्नीचर की तरह पड़ा नहीं रह सकता, बल्कि उसे भी जीवन की जरुरत है. इसे फिल्मकार बहुत ही सरल अंदाज में पेश करने में सफल रहे हैं.

बतौर निर्देशक हितेश भाटिया की यह पहली फिल्म है. उनका निर्देशन शक्तिशाली है. वैसे ऋषि कपूर और परेश रावल जैसे मंजे हुए अभिनेताओं के साथ ने उनकी परेशानी कम कर दी और वह अपने काम को बेहतर तरीके से अंजाम देने में सफल रहे हैं. पर कुछ जगह फिल्म में उनकी पकड़ गायब नजर आती है.

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अभिनयः

इस संसार को अलविदा करने से पहले इस फिल्म में भी ऋषि कपूर अपने अभिनय की छाप छोड़ गए हैं. ऋषि कपूर के ही ब्रज गोपाल शर्मा के किरदार में परेश रावल ने जान डाल दी है. वीना के किरदार में जुही चावला अपने अभिनय की छाप छोड़ जाती हैं.

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