ठहाकों में लपेट कर सच बोलो तो सिस्टम हिल जाता है : प्रीति दास
सीमाओं की वर्जना चाहे कुछ भी हो, मगर प्रीति भारत की एकमात्र ऐसी कौमेडियन हैं, जो अपनी कौमेडी के जरीए यह सोचने पर विवश करती हैं जिन पर नौर्मल तौर पर बात भी नहीं की जाती...
सीमाओं की वर्जना चाहे कुछ भी हो, मगर प्रीति भारत की एकमात्र ऐसी कौमेडियन हैं, जो अपनी कौमेडी के जरीए यह सोचने पर विवश करती हैं जिन पर नौर्मल तौर पर बात भी नहीं की जाती...