एक पुरानी कहावत है कि किसी किताब के मृख्य पृष्ठ को देखकर उसकी अच्छी या बुरी होने का निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए. यही बात विज्ञापन फिल्म बनाते बनाते फिल्म निर्देशक बने कुशल श्रीवास्तव की मनोवैज्ञानिक रोमांचक फिल्म ‘‘वोदका डायरीज’’ को लेकर कहा जाना चाहिए. इस फिल्म में शराब वाली न वोदका है और न ही कोई रहस्य व रोमांच.

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