सामाजिक मुद्दों या आम जनता से जुड़े किसी भी मुद्दे पर एक कमर्शियल मनोरंजक फिल्म लिखना या निर्देशित करना हर किसी के बस की बात नहीं हो सकती. आम जनता के मुद्दे पर मनोरंजक फिल्म का मतलब रिश्तों की कहानी के साथ चलो और क्लायमेक्स में अदालत के अंदर दुनियाभर का संदेश परोसने वाला भाषण देते हुए उसे मन की भड़ास कहना तो कदापि नहीं होना चाहिए. मगर फिल्म ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ के लेखक व निर्देशक ने इस फिल्म में यही किया है. परिणामतः देश का आम इंसान से कहीं ज्यादा निरीह और बेचारे तो लेखक व निर्देशक ही नजर आते हैं.

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