हम कई बार इस बात को रेखांकित करते आए हैं कि जब फिल्मकार सरकार के अजेंडे पर फिल्म बनाता है, तो वह मनोरंजन व कथानक से भटक जाता है. ‘‘दम लगा के हईशा’’ जैसी सफलतम फिल्म के लेखक व निर्देशक शरत कटारिया की फिल्म ‘‘सुई धागा’’ मूलतः प्रधानमंत्री के ‘‘मेक इन इंडिया’’ कार्यक्रम को प्रसारित करने के लिए बनायी गयी फिल्म का अहसास कराती है. पर फिल्मकार ने फिल्मी स्वतंत्रता इस कदर ले ली कि फिल्म का बंटाधार कर दिया. यदि शरत कटारिया ने ‘‘मेक इन इंडिया’’ को प्रचारित करने का लक्ष्य न रखा होता, तो आत्मविश्वास जगाने, अपनी जिंदगी को अपने हाथों बुनने के साथ साथ बड़े शहरों के धूर्त व बेईमान इंसानों के मुकाबले छोटे शहर के इमानदार लोगों की जीत का जश्न मनाने वाली एक बेहतरीन फिल्म बन सकती थी.

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