फिल्म ‘कहानी’ के चार साल बाद आई सुजॉय घोष की फिल्म कहानी 2 सिक्वल नहीं बल्कि एक फ्रेंचाइज है. इस फिल्म में भी थ्रिल, रोमांच और विद्या है, लेकिन कहानी दुर्गारानी सिंह की है. पहली फिल्म से सुजॉय को जितनी वाहवाही मिली थी, ये फिल्म उससे दूर लगती है. फिल्म ‘चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज’ के बारें में है, जो एक बड़ा मुद्दा है और हर जगह व्याप्त है.
फिल्म में विद्या बालन और अर्जुन रामपाल के दो चेहरे को दिखाया गया है. हालांकि इस तरह की कहानी पर बनी फिल्म पहले भी आ चुकी है, अंतर सिर्फ इतना है कि इसमें विद्या बालन है और इसकी पूरी शूटिंग कोलकाता और कलिम्पोंग में हुई है.
फिल्म को अलग और ‘एलीट’ बनाने के चक्कर में निर्देशक ने फिल्म की सिनेमेटोग्राफी को 70 के दशक की बनायी है, जहां सीन्स में डार्कनेस अधिक है. किसी का चेहरा ठीक से देख पाना संभव नहीं था और पूरे समय तक हॉल में बैठे रहना भारी पड़ रहा था. विद्या बालन की एक्टिंग विद्या सिन्हा और वांटेड दुर्गारानी सिंह के रूप में निखर कर आई है. उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि किसी भी रोल में वह फिट है. अर्जुन रामपाल पुलिस की भूमिका में कुछ खास नहीं दिखे.
कहानी इस प्रकार है
पश्चिम बंगाल के एक छोटे से शहर चंदन नगर में कामकाजी महिला विद्या सिन्हा (विद्या बालन) अपने टीनएजर बेटी मिनी को सम्हाल रही है. एक दिन उसकी ‘मेड सर्वेंट’ के न आने पर वह उसे अकेला छोड़कर ऑफिस जाने को बाध्य होती है. ऑफिस में पता चलता है कि उसकी ‘मेड’ देर से ही सही, पर आ चुकी है. लेकिन विद्या के घर आने पर पता चलता है कि उसकी बेटी किडनैप हो चुकी है, इतने में उसके पास फोन आता है कि अगर वह बेटी से मिलना चाहती है तो जल्दी कोलकाता आ जाए. वह बेटी से मिलने के लिए भागती है, ऐसे में उसकी दुर्घटना, कार की टक्कर लगने से हो जाती है, उसे अस्पताल पहुंचाया जाता है, वह कोमा में चली जाती है.
इस केस को पुलिस ऑफिसर इन्द्रजीत (अर्जुन रामपाल) अपने हाथ में लेता है, जो विद्या को इस हालत में देखकर चौंक जाता है, क्योंकि उसका भूतकाल इससे कही न कही जुड़ा हुआ है. इसके बाद वह विद्या की ऐसी हालत होने की वजह तक पहुँचता है. काफी मुश्किलों और तहकीकात के बाद कहानी रिविल होती है.
फिल्म में विद्या की लुक एकदम सादा और ‘डीग्लैमर’ वाली है. फिल्म की कुछ बातें अनसुलझी रह गई हैं, जैसे कि विद्या अगर बचपन में ‘चाइल्ड एब्यूज’ की शिकार हुई तो कब और कैसे? लेकिन इस तरह की घटना से किसी महिला के व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ता है, उन बारीकियों को निर्देशक ने अच्छी तरह दिखाया है.
जुगल हंसराज विलेन के रूप में बहुत थोड़े समय के लिए दिखे. फिल्म का थ्रीलर अंत तक कायम रहा. कोलकाता के स्थानीय कलाकारों ने अच्छा काम किया है. बहरहाल फिल्म एक बार देखने लायक है इसे थ्री स्टार दिया जा सकता है.