Shweta Tripathi Interview : ‘मिर्जापुर’ वैब सीरीज में गोलू गुप्ता की भूमिका निभा कर चर्चित हुईं श्वेता त्रिपाठी शर्मा एक अभिनेत्री, मौडल, निर्माता और निर्देशक हैं, जिन्हें मुख्य रूप से हिंदी सिनेमा और वैब सीरीज में उन के बेहतरीन अभिनय के लिए जाना जाता है. अभी उन्होंने बतौर प्रोड्यूसर अपनी पहली फीचर फिल्म ‘मुझे जान न कहो मेरी जान’ को टोरंटो फिल्म फैस्टिवल के ‘गोल्ड हाउस पिच’ में वैश्विक स्तर पर पेश किया और अवार्ड भी जीता.
अभिनय में आने से पहले श्वेता त्रिपाठी ने एक फोटो एडिटर और प्रोडक्शन असिस्टेंट के रूप में भी काम किया है. उन्होंने कम उम्र से थिएटर में अभिनय किया, जो धीरेधीरे उन के पैशन में बदल गया.
उन्हें टेलीविजन पर पहली बड़ी पहचान शो ‘क्या मस्त है लाइफ’ में ‘जीनिया खान’ की भूमिका निभा कर मिली. इस के बाद उन्होंने कई बड़ेबड़े ब्रैंड्स के विज्ञापनों में भी काम किया.

स्वभाव से विनम्र व हंसमुख श्वेता इन दिनों थिएटर और फिल्म दोनों के लिए एक निर्माता के रूप में काम कर रही है. हाल ही में उन्होंने गृहशोभा के लिए खास बातचीत की. पेश हैं, कुछ खास अंश.
मंजिल नहीं था आसान
अभिनेत्री से प्रोड्यूसर से बनने का सपना सच तो हुआ है, लेकिन यह उन के लिए आसान नहीं था. वे कहती हैं कि सपनों को फौलो करना, जिसे मैं ने बचपन में सोचा था, वह आसान नहीं था. इन सपनों को पूरा करने के लिए 2 चीजें बहुत जरूरी थीं, वे हैं अनुसाशन और साहस. मेरे जीवन में कई बार ऐसे मौके आए, जब मुझे लगा था कि इसे मैं कैसे कर पाऊंगी. ऐसे में हौसला बनाए रखना पड़ता रहा. निर्माता बनने के बाद किसी आइडिया के साथसाथ उस का समाधान भी आप को ही समझना पड़ता है.
नहीं है समस्या
पुरुष प्रधान इंडस्ट्री में महिलाओं का काम करना आज आसान हो चुका है और कई महिलाएं अच्छा काम भी कर रही हैं, लेकिन इस क्षेत्र में महिलाओं को मजबूत और धीरज धरते हुए आगे बढ़ना होता है. वे कहती हैं कि एक प्रोड्यूसर बनने के बाद मेरा अनुभव यह रहा है कि आइडिया आप के पास सोल्यूशन के साथ होना चाहिए.
वे कहती हैं कि पुरुष प्रधान इंडस्ट्री की बात करें, तो इंडस्ट्री सोसाइटी का हिस्सा है और सोसाइटी इंडस्ट्री का, ऐसे में अगर इंडस्ट्री पुरुष प्रधान है, तो समाज भी पुरुष प्रधान है. घर में अगर बदलाव हम नहीं लाते हैं तो आगे भी बदलाव नहीं दिखेगा.

इस के लिए इंडस्ट्री या बाहर की सभी लड़कियों को एकदूसरे को सपोर्ट करना चाहिए. आज के कुछ पुरुष एक स्त्री को सपोर्ट करने लगे हैं, लेकिन हमारे शरीर की एक जर्नी होती है, जिस में पीरियड से ले कर मेनोपौज का सफर, जो एक बेटी, मां, बहन, पत्नी, आदि सभी को गुजरना पड़ता है. अगर इस परिवर्तन को नहीं लिखा जाता है, तो एक पुरुष की समझ मे ये बातें नहीं आएंगी.
मिला सहयोग
वे कहती हैं कि मेरे साथ मेरे परिवार से ले कर टीम के सारे पुरुष सदस्य फिर चाहे वे मेरे पति, पिता, ससुर या टीम के सारे लोग हों, मुझे हौसला देते रहते हैं, जबकि फीमेल मैंबर के सपोर्ट की कमी मुझे महसूस होती है. मुझे उन की सपोर्ट आगे बढ़ने के लिए चाहिए. अगर मैं निर्माता गुनीत मोंगा की बात करूं, तो उन्होंने केवल अपने लिए जगह इंडस्ट्री में नहीं बनाई, बल्कि उन्होंने दूसरों के लिए भी दरवाजा खोल दिया है.
वोकल रहना है जरूरी
इस के आगे श्वेता कहती हैं कि आजकल हम सभी ट्रोलिंग की दुनिया में रहते हैं और इस से उस व्यक्ति के बारे में नकारात्मक प्रभाव बढ़ता है, जो उस के लिए खतरा पैदा करता है। ऐसे में निडर होना जरूरी है, ताकि आप खुद के लिए खड़े रह सकें. बल और बुद्धि के प्रयोग को कैसे करना है, यह मैं ने गोलू गुप्ता की भूमिका से सीखा है. दिखने में कैसे भी हो, लेकिन खुद की देखभाल करना जरूरी है. आज की स्त्रियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, जिसे मैं अपनी टीम के साथ सैलिब्रेट कर रही हूं. मैं बचपन से बहुत वोकल रही हूं और अपनी परेशानी बताने में संकोच नहीं करती. सवाल उठाना बहुत जरूरी है.
मैं ने जब निर्माता की जर्नी शुरू की थी, तो स्क्रिप्ट ले कर बनाने के बारे में पूछने के लिए अनुराग कश्यप के पास पहुंच गई थी. उन्होंने मुझे बजट से ले कर टीम के बारे में पूरी जानकारी दी और लगे रहने की सलाह दी थी. सोचविचार, अच्छी आदतें, आइडियाज और लगन आप के पास है, तो आप को कोई रोक नहीं सकता.
पुरस्कार से हौसला
श्वेता को टोरंटो फिल्म फैस्टिवल में अवार्ड मिला है, जिसे ले कर वे काफी खुश हैं। वे कहती हैं कि पुरस्कार से जो शाबासी आप को मिलती है, उस से लगता है कि आप सही दिशा में जा रहे हो. ये छोटीछोटी जीत आप को आगे बढ़ने की हौसला देती है. एक निर्माता के रूप में वैसी ही फिल्में या वैब सीरीज बनाना चाहती हूं, जिसे लोग देखें और महसूस करें.
मिली प्रेरणा
श्वेता आगे कहती हैं कि मेरी प्रेरणा थी कि मैं जिंदगीभर छात्र बन कर रहूं क्योंकि मुझे हमेशा सीखते रहना है. यह मुझे इस क्षेत्र में मिला. अगर आप का डाइरैक्शन और सोच सही है, तो आप जो करना चाहते हैं, वह कर पाते हैं. मेरे परिवार वालों ने हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहन दिया और यहीं से मुझे कुछ नया करने की प्रेरणा मिलती रही.

दर्शक और मीडिया की भूमिका है जरूरी
आजकल मारधाड़ की फिल्में बहुत अधिक बन रही हैं, जिसे जेन जी की पसंद बता कर बनाया जाता है। यह कितना सही है? पूछने पर श्वेता कहती हैं कि जो बिकता है, उसे ही फिल्म मेकर बनाते हैं। ऐसे में दर्शकों को इन फिल्मों का बहिष्कार करने की जरूरत है, ताकि वे न बनाएं, जेन जी ही नहीं, हर वर्ग को यह करना पड़ेगा. जितनी जिम्मेदारी एक स्टोरी टेलर्स की है, उतनी ही किसी दर्शक की भी होती है. मैं ने बहुतों को देखा है कि वे किसी फिल्म को खराब कहेंगे, पर ओटीपी पर देखेंगे, जबकि कई अच्छे शो को वे नहीं देखते. इस से उस फिल्म के नंबर बढ़ जाते हैं और फिल्म मेकर को लगता है कि उन की फिल्म सही है.
‘काल कूट’ जैसी वैब सीरीज में विजय वर्मा ने काफी अच्छी ऐक्टिंग की है, लेकिन बहुत कम लोगों ने उन्हे देखा है. इस में मैं दर्शक और मीडिया की भूमिका को सब से जरूरी मानती हूं.
आज हर जैनरेशन के लोग कार चलाने से ले कर भोजन करने तक मोबाइल के साथ रहते हैं. हम सभी सोशल मीडिया के दलदल में फंसते जा रहे हैं, जिस से निकल पाना हर व्यक्ति के लिए मुश्किल है.
मुझे हर तरीके की शोज पसंद है, लेकिन मुझे ड्रामा वाली फिल्में बहुत पसंद हैं. हर इमोशन को मैं परदे पर लाना चाहती हूं.

किताबें पढ़ना जरूरी
सोशल मीडिया की बढ़ती भूमिका के बारे में श्वेता कहती हैं कि आज के हर जैनरेशन ने किताबें पढ़ना बंद कर दिया है, जबकि किताब पढ़ने से हम सभी एक अलग दुनिया में चले जाते हैं और आप के सोचने का तरीका बदल जाता है. किताबें आज सभी को गिफ्ट करने की जरूरत है. दोस्तों के बीच में किताबों की एक लाइब्रेरी बनाने की जरूरत है, जिस में सभी किताबों की अनुभव को एकदूसरे से शेयर करते रहना है. मेरे हिसाब से अगर आप किसी से प्यार करते हैं, तो उसे किताबें गिफ्ट में अवश्य दें.
सुपर पावर मिलने पर
सुपर पावर मिलने पर श्वेता पूरे देश में एक अच्छी शिक्षा प्रणाली शुरू करना चाहती हैं क्योंकि अच्छी शिक्षा देश के हर नागरिक की सोच और समझ को बदल सकती है, जिस से कोई उंचनीच, छोटेबड़े की भावना उन में खत्म हो सकती है.
