भारतीय समाज में कई पितृ सत्तात्मक सोच वाली परंपराएं सतत चलती जा रही हैं. देश में नारी स्वतंत्रता व नारी उत्थान के तमाम नारे दिए जा रहे हैं, तमाम उद्घोष हो रहे हैं. मगर हकीकत यह है कि औरतों के हक को लेकर कुछ नही हो रहा है. सारी नारी बाजी ढाक के तीन पात हैं. भारतीय समाज में आज भी शमशान भूमि शमशान घाट पर महिलाओं का प्रवेश वर्जित है. महिलाएं अपने किसी भी प्रिय पारिवारिक सदस्य या प्रियजन का आज भी ‘दाह संस्कार कर्म’नही कर सकती. उनका अंतिम संस्कार अग्नि नहीं दे सकती. इस मसले पर कोई बात नही करता. यहां तक कि सामाजिक बदलाव का बीड़ा उठाने वाले फिल्मकारों ने भी चुप्पी साध रखी है.

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