समय के साथ बदला स्वरूप साड़ी की उत्पत्ति करीब दो हजार साल पहले उत्तर भारत में हुई थी. शुरुआती दौर में यह सफेद रंग की एकदम प्लेन होती थी. उस दौरान इसे धोती कहा जाता था. तब पुरुष भी इसी वस्त्र को पहना करते थे. जनाने-मर्दाने का विभेद करने के लिए बाद में इसमें किनारे बनाई जाने लगी. पुरुषों की धोती में छोटी और महिलाओं की साड़ी में मोटी किनारी. शुभ कार्यो में साड़ी को रंग कर पहना जाने लगा. राजा-महाराजा जहां इसे केसर में रंगवाते थे तो आम प्रजा हल्दी में रंगकर पहनने लगी. इसके बाद रंगों का आविष्कार हुआ तो साड़ी का यौवन परवान चढ़ने लगा. कभी प्रिंटेड तो कभी प्लेन साड़ी का दौर आया. मौजूदा समय में नेट की साड़ियों की सबसे ज्यादा मांग है. इसके साथ-साथ ब्राोकेड, टिश्यू, जार्जट, क्रेपकॉटन की भी अच्छी मांग है.

भारत में जैसा देश, वैसा वेष की तर्ज पर विभिन्न इलाकों में भिन्न-भिन्न तरह की साड़ियां पहनी जाती है. इनका पहनावा भौगोलिक स्थिति, पारंपरिक मूल्यों और रुचियों पर निर्भर करता है. अलग-अलग शैलियों की साड़ियों में कांजीवरम, बनारसी, पटोला, हकोबा, चंदेरी, माहेश्वरी, मधुबनी, मूंगा, पैथानी, तांची, जामदानी, बालू व कांथाटैगेल साड़ियां प्रमुख है.

- उत्तर प्रदेश में बनारसी साड़ियों का कारोबार व्यापक पैमाने पर होता है. बनारस और इसके आसपास के क्षेत्र चंदौली, मिर्जापुर और भदोही में अरसे से साड़ियां तैयार की जा रही है जो प्योर सिल्क से बनाई जाती है. बनारसी साड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल चुकी है. इन साड़ियों का बड़े पैमाने पर दुनिया भर में निर्यात भी किया जाता है. इसके अलावा लखनऊ की चिकन एम्ब्राइडरी साड़ी प्रसिद्ध है.

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