Breastfeeding : स्तनपान के दौरान निप्पल में दर्द, क्रैक या घाव का ध्यान रखना जरूरी है, क्योंकि इनकी अनदेखी करने से गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण या मास्टिटिस का खतरा बढ़ जाता है. कई बार तेज दर्द के कारण माँ स्तनपान समय से पहले बंद कर देती है, जबकि यह शिशु के ठीक से न जुड़ने या गलत लैचिंग का संकेत होता है, जिसे डॉक्टर की सलाह से ठीक किया जा सकता है.
असल में कटी-फटी त्वचा या घाव के रास्ते कीटाणु आसानी से स्तन के अंदर जा सकते हैं. दरारों से खून आने पर शिशु के पेट में जाना या संक्रमण का जोखिम और अधिक बढ़ सकता है. ये सही है कि मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य के लिए स्तनपान बेहद महत्वपूर्ण है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सलाह के अनुसार, शिशु को जन्म के पहले घंटे में स्तनपान शुरू कराना और पहले छह महीने तक केवल मां का दूध देना चाहिए. छह महीने के बाद पौष्टिकता से भरपूर आहार शुरू करते हुए स्तनपान दो साल या उससे अधिक समय तक जारी रखा जा सकता है, लेकिन अगर किसी भी प्रकार की समस्या माँ को स्तनपान कराते समय हो रहा है, तो शिशु को बीच में ही स्तनपान को बंद भी करना जरूरी होता है, जिसे कई बार नई माएँ समझ नहीं पाती और स्तन के निप्पल्स के पास संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है और ठीक होने में समय लगता है.
एक्सपर्ट की राय
इस बारें में मुंबई की कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल की गायनॅकॉलॉजिस्ट डॉ. नेहा पवार कहती है कि स्तनपान शुरू करने के शुरुआती दिनों में निप्पल में हल्की संवेदनशीलता या दर्द आम हो सकता है, लेकिन लगातार दर्द, निप्पल में दरार, घाव या खून आना सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इसका सबसे आम कारण बच्चे का स्तन को सही तरीके से मुंह में न लेना यानी गलत लैच या पोजिशनिंग हो सकती है. इससे निप्पल पर लगातार दबाव और घर्षण होता है. अगर दरार या घाव की समय पर देखभाल न की जाए, तो संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है. इसके अलावा, स्तन में दूध जमा होने और सूजन के कारण मास्टाइटिस जैसी समस्या भी हो सकती है. यह समस्या सबसे आम तौर पर स्तनपान कराने वाली महिलाओं में देखी जाती है, जिसे लैक्टेशन मास्टाइटिस कहते हैं. मास्टाइटिस स्तन के टिश्यू में होने वाली एक दर्दनाक सूजन है, जो अक्सर इन्फेक्शन का रूप ले लेती है.
समस्याओं से बचने की सावधानियां
• इसमें सबसे जरूरी है कि बच्चे का लैच सही हो. स्तनपान कराते समय बच्चे का मुंह केवल निप्पल पर नहीं, बल्कि एरिओला के पर्याप्त हिस्से पर होना चाहिए. यदि हर फ़ीड के दौरान दर्द हो रहा है, तो लैक्टेशन कंसल्टेंट या डॉक्टर से बच्चे की पोजिशनिंग और अटैचमेंट की जांच करवाएं.
• निप्पल को बार-बार साबुन से धोने से बचें, क्योंकि इससे त्वचा रूखी हो सकती है.
• स्तनपान के बाद निप्पल को कुछ समय हवा में सूखने दें और गीले ब्रेस्ट पैड्स को बदलते रहें.
• आरामदायक, सही फिटिंग वाली ब्रा पहनें और बहुत तंग कपड़ों को पहनने से बचें.
कब करें डॉक्टर से संपर्क
डॉ. नेहा कहती है कि यदि निप्पल में गहरी दरार, लगातार खून आना, पस, बढ़ता हुआ दर्द या घाव ठीक न हो रहा हो, तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी होता है, कुछ नई माँ घरेलू नुस्खे अपनाने लगती है, जिससे बीमारी अधिक बढ़ सकती है.
स्तन में मास्टाइटिस के होने से लालिमा, गर्माहट, सूजन, गांठ, तेज दर्द या बुखार के साथ फ्लू जैसे लक्षण के संकेत हो सकते हैं. ऐसी परिस्थिति में डॉक्टर से जल्द संपर्क करना आवश्यक होता है.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल निप्पल में दर्द या हल्की दरार होने पर अपने आप स्तनपान बंद न करें. सही लैच और उचित उपचार से समस्या सुधर भी सकती है.
शिशु को स्तनपान बंद करने से पहले
किसी समस्या के चलते अगर स्तनपान बंद करने की जरूरत हो, तो अचानक बंद करने के बजाय धीरे-धीरे कम करना बेहतर होता है. शुरुआत में दिन का एक फ़ीड कम करें और कुछ दिनों बाद शरीर और शिशु को इसके अनुसार ढलने का समय दें. बच्चे की उम्र के अनुसार उसके आहार में पर्याप्त और पौष्टिक कॉम्पलेमेन्टरी फूड शामिल करें. अचानक स्तनपान रोकने से ब्रेस्ट एनगॉर्जमेंट और मास्टाइटिस का खतरा कई बार बढ़ जाता है.
इस प्रकार स्तनपान के दौरान दर्द को “सामान्य” मानकर सहते रहना जरूरी नहीं. शिशु को फ़ीड कराते समय, सही ब्रेस्टफीडिंग टेक्निक अपनाना जरूरी होता है, ताकि इसमें होने वाले किसी भी समस्या को चिकित्सकीय उपचार से ठीक किया जाय, जिससे मां के लिए स्तनपान अधिक आरामदायक और सुरक्षित हो सकें.
