stress-free life : आज  के लाइफस्टाइल में स्ट्रैस से बचना आसान नहीं. इस की वजह है सख्त डैडलाइन, लगातार आने वाले नोटिफिकेशन, औफिस में लंबे समय तक काम करना और पर्सनल व प्रोफैशनल जिम्मेदारियों में बैलेंस बनाने का दबाव किसी भी प्रोडक्टिव इंसान को थका सकता है. हालांकि हम अकसर अच्छी परफौर्मैंस की उम्मीद करने से पहले स्ट्रैस वाला टाइम बीतने का इंतजार करते हैं लेकिन सच तो यह है कि स्ट्रैस के ऐसे ही पलों के बीच इफैक्टिवली काम करना सीखना ही सब से कीमती हुनर है.

असल में तनाव के दौरान मस्तिष्क ‘सर्वाइवल मोड’ में चला जाता है. हाइपोथैलेमस और ऐमिग्डाला मिल कर कोर्टिसोल और ऐड्रेनालाइन जैसे हारमोन छोड़ते हैं जो दिल की धड़कन बढ़ाते हैं. इस से तात्कालिक ऊर्जा तो मिलती है लेकिन लंबे समय तक रहने पर सोचनेसम झने की क्षमता कमजोर हो सकती है.

स्ट्रैस को करें मैनेज

इस बारे में लाइफ कोच की ऐक्सपर्ट डा. प्रिया कौल कहती हैं कि इस में अच्छी बात है कि स्ट्रैस को मैनेज करने के लिए हमेशा अपने लाइफस्टाइल में बहुत बड़े बदलाव करने की जरूरत नहीं होती है. हमारी छोटीछोटी और सोचीसम झी आदतें ही मुश्किल दिनों में भी हमारा फोकस, इमोशनल बैलेंस और प्रोडक्टिविटी बढ़ाने में काफी मदद कर सकती हैं.

काम करते रहना हर इंसान के लिए जरूरी है क्योंकि काम से ही आप का स्ट्रैस कम होता है क्योंकि व्यक्ति अपनी कमिटमैंट पर सही उतर सकता है. ऐसी ही 5 प्रैक्टिकल टैक्नीक को अपना कर व्यक्ति अपने रोजमर्रा के स्ट्रैस को कम कर सकता है:

अचीवेबल और छोटे टास्क से करें काम शुरू

जब स्ट्रैस का लैवल बहुत ज्यादा होता है तो दिमाग हर बचे हुए काम को बराबर अर्जैंट सम झने लगता है. इस से देरी या मैंटल पैरालिसिस हो सकता है. सबकुछ एक ही बार में निबटाने की कोशिश करने के बजाय ऐसे छोटे मैनेज हो सकने वाले टास्क से शुरुआत करें, जिसे अगले 10 से 15 मिनट में पूरा किया जा सकता हो.

एक सिंपल टास्क पूरा करने के बाद कुछ हासिल करने का एहसास होता है, काम करने का मोमैंटम बन जाता है और दिमाग पर जो काम का भारी बो झ महसूस हो रहा होता है वह काफी हद तक कम हो जाता है.

छोटा टास्क चाहे वह किसी जरूरी ईमेल का जवाब देना हो, अपने वर्कस्पेस को और्गेनाइज करना हो या फिर किसी मीटिंग का एजेंडा तैयार करना हो, ये छोटीछोटी विनिंग आप के कौन्फिडैंस को वापस लाती हैं और मैंटल क्लैरिटी को बेहतर बनाती हैं.

शौर्ट ब्रेक लेने की कोशिश करें

बहुत से लोगों का मानना है कि लगातार काम करना प्रोडक्टिव बने रहने का सब से बेस्ट तरीका है लेकिन रिऐलिटी में लंबे टाइम तक लगातार काम करने से मानसिक थकावट बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, कंसट्रेशन कम हो सकता है और स्ट्रैस का लैवल भी बढ़ सकता है.

अध्ययनों से पता चलता है कि तय सीमा से अधिक काम करने पर ऐंग्जाइटी और तनाव के लक्षणों में 17% से 74% तक की वृद्धि हो सकती है. इसलिए हर 60 से 90 मिनट में शौर्ट ब्रेक लेने से दिमाग को रिकवर होने का मौका मिलता है.

इस टाइम का इस्तेमाल स्ट्रैचिंग, वौक, पानी पीने या कुछ मिनटों के लिए स्क्रीन से नजर हटाने के लिए कर सकते हैं. यह छोटा सा ब्रेक न केवल आप को बर्नआउट से बचा सकता है बल्कि आप के काम पर फोकस, क्रिएटिविटी और सही फैसले लेने की क्षमता को भी काफी हद तक बेहतर बना सकता है. छोटा ब्रेक लेना आलस की निशानी नहीं है बल्कि यह लंबे समय तक प्रोडक्टिविटी बनाए रखने के लिए की गई इन्वैस्टमैंट है.

दिमाग को रीसैट करने की करें कोशिश

स्ट्रैस की वजह से अकसर हमारी सांसें छोटी और तेज होने लगती हैं. यह बौडी को ज्यादा अलर्ट रहने का सिगनल होता है. कौंशियस ब्रीदिंग हमारे नर्वस सिस्टम को शांत करने का सब से फास्ट और असरदार तरीका है.

इस के लिए यह बहुत सिंपल टैक्नीक अपनाएं– अपनी नाक से 4 सैकंड तक धीरेधीरे गहरी सांस अंदर खींचें, फिर 4 सैकंड के लिए अपनी सांस को होल्ड कर के रखें और फिर उस के बाद 6 सैकंड तक धीरेधीरे सांस को छोड़ें. इसे 5-6 बार रिपीट करने से फिजिकल टैंशन कम करने, तेजी से चल रहे विचारों को स्लो करने और कंसट्रेशन बेहतर करने में मदद मिल सकती है. यह प्रैक्टिस अधिकतर किसी जरूरी मीटिंग, प्रेजैंटेशन या किसी मुश्किल कन्वर्सेशन से ठीक पहले बहुत मददगार साबित हो सकती है, जिस से आप को किसी बात पर रिएक्ट करने के बजाय सोचसम झ कर सही रिस्पौंड करने में मदद मिलेगी.

जिसे कंट्रोल कर सकते हैं उस पर फोकस करें

डा. प्रिया कहती हैं कि स्ट्रैस अकसर तब बढ़ जाता है जब हम उन हालात के बारे में सोच कर अपनी ऐनर्जी बरबाद करने लगते हैं जो हमारे कंट्रोल से बाहर होते हैं जैसे अचानक होने वाली देरी, दूसरे लोगों के काम और अनिश्चित रिजल्ट जो आप के वश में न हों. ज्यादा प्रोडक्टिव अप्रोच यह है कि आप जानबू झ कर अपना ध्यान उस ओर शिफ्ट करें, जिसे आप बदल सकते हैं. खुद से पूछें कि अगला कौन सा कदम है जो मैं अभी उठा सकता हूं. यह सिंपल सा सवाल आप का फोकस चिंताओं से हटा कर सीधे ऐक्शन पर ले जाएगा.

प्रोडक्टिविटी पर करें केंद्रित

यह सोच लंबे समय से चले आ रहे स्ट्रैस को कम करने में बहुत मदद करती है और टाइम के साथ इमोशनली फ्लैक्सिबल बना देती है. प्रोडक्टिविटी का मतलब यह नहीं है कि आप रोजाना परफैक्ट ही हों, प्रोडक्टिविटी का मतलब मुश्किल समय में खुद पर हद से ज्यादा दबाव डालना नहीं है बल्कि यह सम झदारी से काम करने, अपनी बौडी और माइंड की जरूरतों को सम झने और एक ऐसा रूटीन तैयार करने के बारे में है जो आप की परफार्मैंस और सेहत दोनों को सपोर्ट करे.

समय के साथ यह आसान टैक्नीक आप के स्ट्रैस भरे दिनों को एक थका देने वाले ऐक्सपीरिएंस से बदल कर फ्लैक्सिबल, कौन्फिडैंट और इमोशनली मजबूत बनाने के बेहतरीन मौकों में बदलने में हैल्प कर सकती है.

दिन के आखिर में काम की करें समीक्षा

तनाव से भरे दिन शायद ही कभी वैसे गुजरते हैं जैसी उन के लिए प्लानिंग करते हैं. ऐसे में दिन खत्म होने पर जो चीजें गलत हुई हैं उन पर फोकस करने के बजाय कुछ मिनट शांति से बैठें और उन के बारे में सोचें, जिन्हें आप आज के मुश्किल हालात के बावजूद पूरा करने में सफल रहे. ऐसी 3 चीजें लिखिए जो अच्छी रहीं, भले ही वे कितनी भी छोटी क्यों न हों.

एक जरूरी टास्क पूरा हो जाना, किसी मुश्किल कन्वर्सेशन को शांति से हैंडल करना या फिर मन में घबराहट होने के बावजूद हिम्मत न हारना और अपने काम पर डटे रहना हो सकता है.

इस प्रकार लंबे समय तक रहने वाला स्ट्रैस शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है क्योंकि इस से हाई ब्लड प्रैशर, हृदय रोग, डायबिटीज, डिप्रैशन, पेट की समस्याएं और कमजोर इम्यूनिटी जैसी कई बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए जरूरी है मानसिक स्ट्रैंथ को बना कर काम करते जाना ताकि आप को हमेशा काम से खुशी की अनुभूति हो और आप एक स्वस्थ लाइफस्टाइल जी सकें.

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