एक समय था जब सर्दी का मौसम आते ही महिलाएं स्वैटर बुनने लगती थीं. दोपहर में धूप सेंकती हुई वे बुनाई, कढ़ाई या सिलाई आदि करती रहतीं और एकदूसरे से नईनई डिजाइनें सीखती थीं. अब इसे लोगों की व्यस्तता कहें या फिर बाजार में मशीन से बने स्वैटरों, कपड़ों और सामानों की बहार, आधुनिकता के इस दौर में ये कलाएं खोती जा रही हैं. पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि हाथ से बने कपड़े और स्वेटर सिर्फ ठंड ही नहीं भगाते बल्कि उन के साथ भावनाओं की गर्माहट भी होती है. इसलिए इन की अहमियत कभी कम नहीं हो सकती.

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