एक समय था जब इनवैस्टमैंट के विषय पर न तो महिलाओं से सलाह की जाती थी, न ही उन्हें कोई मत देने का अधिकार दिया जाता था. उन से तो केवल यही कहा जाता था कि पैसे से जुड़े किसी भी विषय पर उन की सलाह का कोई अर्थ नहीं क्योंकि उन की बुद्धि इस लायक ही नहीं है. मगर उसी बुद्धि के दम पर आज महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के सामने न केवल उभर कर आ रही हैं बल्कि बहुत से क्षेत्रों में उन से बेहतर भी हैं. जैसे इनवैस्टमैंट क्षेत्र में एक तीव्र बदलाव देखा जा रहा है.

आज रिटेल इनवैस्टमैंट में 25% महिला निवेशक हैं और म्यूचुअल फंड का भी एकतिहाई हिस्सा उन के पास है. तो रियल ऐस्टेट में वे कैसे पीछे रह जाएंगी.

हाल ही में एक स्टडी के अनुसार, भारत में 44% सिंगल महिलाएं अपना घर खरीदना चाहती हैं. यह आंकड़ा सिंगल पुरुषों के मुकाबले ज्यादा है. वहीं इस बात को भी सामने रखा गया है कि 78% शादीशुदा महिलाएं घर को मुख्य रूप से सामाजिक सुरक्षा का जरीया मानती हैं. वहीं 84% सिंगल महिलाएं प्रौपर्टी खरीद को समझदारी भरा निवेश मानती हैं.

महिलाओं की भूमिका

इस में कोई शंका नहीं है कि घरपरिवार की कोई भी खरीद हो, उस के लिए एक महिला की पैसा बचाने की इच्छा और कोशिश पुरुष से अधिक होती है और जब बात घर की हो तो महिलाओं की भूमिका और बढ़ जाती है.

साथ ही यहां अब भूमिका में बहुत बड़ा और बेहतरीन बदलाव भी देखने को मिल रहा है. आज भारत में महिलाएं प्रौपर्टी खरीदने और अपने नाम पर खरीदने के लिए सदियों से बनाए निर्थक सामाजिक दायरों से बाहर आ रही हैं जो देश में बदलाव की एक बहुत बड़ी लहर है. एक होमबायर होने से न केवल वे अपने अधिकार को पाएंगी बल्कि फाइनैंशियल सिक्युरिटी, इनवैस्टमैंट और कौन्फिडैंट इन सभी का महत्त्व भी समझेगी.

रियल ऐस्टेट की स्टडीज यह कहती हैं कि आज देश में घर खरीदने वालों में महिलाएं दूसरा सब से बड़ा ग्रुप बन गई हैं. चाहे वे सिंगल हों या शादीशुदा भारत में महिलाएं अब अपना घर खरीदने के लिए आगे आ रही हैं. वहीं बड़ी अर्बन सिटीज में 22 से 30% प्रौपर्टी रजिस्ट्रेशन सिंगल वूमन के नाम है. कहा जा रहा है कि साल दर साल महिलाओं का प्रौपर्टी खरीद में 14% का इजाफा हो रहा है, जिस के प्रमुख कारण हैं:

अब महिलाएं आर्थिक रूप से ज्यादा मजबूत और आजाद हो रही हैं. इस की वजह है उन का नौकरीपेशा होना जो उन्हें आत्मनिर्भर बना रहा है. यह बदलाव मुख्य रूप से मुंबई, दिल्ली, बैंगलुरु जैसे बड़े शहरों में देखा जा रहा है.

अब रिश्ते में दासता नहीं बारबरी मांगी जा रही है. मांबाप ने शादी कर विदा किया और उन का घर छूट गया. शादी के बाद तलाक हुआ तो पति का घर छूट गया. तो फिर महिला जाएं कहां? इस प्रश्न की मार और जीवन की वास्तविक मार खाखा कर महिलाएं इस भ्रम से जाग चुकी हैं कि उन का कोई अधिकार नहीं है. इसलिए आज शादीशुदा महिला घर की चारदिवारी में बंध कर रहना नहीं बल्कि उन दीवारों पर अपना अधिकार सम?ा रही है और उस पर अधिकार की मांग भी कर रही है.

महिलाएं रियल इनवैस्टमैंट की सम?ा अपना चुकी है. जो लड़कियां शादीशुदा नहीं हैं वे अपने सुरक्षित भविष्य के लिए दूसरे पर निर्भर नहीं रहने के लिए और इनवैस्टमैंट की सम?ा रखते हुए प्रौपर्टी ले रही हैं.

सरकार की भूमिका

महिलाओं द्वारा जहां सोना खरीदना ही एक मात्र इनवैस्टमैंट का जरीया समझ जाता था, आज वहां प्रौपर्टी को सब से ज्यादा महत्त्व दिया जा रहा है. एक अपने खुद के घर या प्रौपर्टी की अहमियत महिलाएं अच्छे से समझ चुकी हैं. इसलिए आज वे किसी भी तरह की छोटीमोटी प्रौपर्टी इनवैस्टमैंट में अपना हर संभव प्रयास भी कर रही हैं. अब इन प्रयासों में सरकार के प्रयासों की भी बहुत बड़ी भूमिका बनती है, जिसे उन्हें आवश्यक छूट या रिबेट और उपयोगी योजनओं से लैस करना चाहिए.

आज सरकार कुछ योजनाओं और बैंकों द्वारा कम ब्याज दरों पर होम लोन दे उन्हें बढ़ावा दे रही है लेकिन वास्तविकता में यह काफी नहीं है क्योंकि यह दर और योजना बहुत अधिक अंतर नहीं ला पा रही है. साथ ही देश के राज्यों में यदि घर महिला के नाम पर रजिस्टर किया जाता है तो स्टांप ड्यूटी चार्ज में केवल 1 से 2त्न ही की छूट है जो बहुत ही कम है.

यदि सरकार अपनी योजना और छूट में और बदलाव करे तो महिलाओं को उपयुक्त सहायता और अधिक प्रोत्साहन मिलेगा जो उन्हें एक निवेशक के रूप में और एक घर के मालिक के रूप में आगे आने के लिए अधिक प्रोत्साहित करेगा.

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