प्रकृति से प्रेम करने वाला और खूबसूरत वादियों के नज़ारे को देखने की शौक रखने वाला व्यक्ति अधिकतर अपने परिवार और दोस्तों के साथ सुकून और प्रदूषण रहित स्थान पर जाने की कल्पना करता है, जो आजकल मैदानी इलाकों में खासकर बड़े या छोटे शहरों में मिलना संभव नहीं, जहां नीले खुले आकाश में हरी-भरी वादियाँ और पक्षियों की चहचहाहट सुनने को मिले. आज हम बताते है तमिलनाडू में स्थित बेहतरीन पर्यटन स्थल पहाड़ों की रानी ऊटी के बारें में, जो प्रकृति प्रेमियों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं. दूर-दूर तक फैली हसीन वादियाँ, हरे-भरे पेड़ पौधे इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगाते है. यह बेस्ट हनीमून डेस्टिनेशन है. जहाँ अधिकतर जोड़े शादी के बाद आते है और अपनी खूबसूरत यादे लेकर वापस जाते है.

समुद्र की सतह से करीब 7,700 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह पर्यटन स्थल देश में ही नहीं विदेश में भी प्रचलित है. यहाँ का तापमान सर्दियों के अलावा सालभर सुहाना रहता है, केवल जाड़े में तापमान शून्य से भी नीचे चला जाता है, पर यहाँ बर्फ नहीं गिरती. निलगिरी हिल्स पर स्थित चाय के बागान, अलग-अलग तरह की वनस्पतियाँ पर्यटकों को अनायास ही आकर्षित करती है.यहाँ कई टूरिस्ट स्पॉट है मसलन डोडा बेट्टा पीक, लैम्ब्स रॉक, कोडानाद व्यू पॉइंट, बोटानिकल गार्डन, निलगिरी माउंटेन, चर्च आदि है.

आकर्षक जगहें

ऊटी जाने के बाद पहले दिन ऊटी और कुन्नूर को घूमना अच्छा रहता है, अगले दिन पाईकरा  मदुमलाई, उसके बाद अव्लांचे लेक, 3 दिन में पूरी ऊटी को घूमा जा सकता है. सफारी का आनंन्द भी ऊटी में आप उठा सकते है जो सुबह 9 बजे से शाम को 6 बजे तक होता है. इसके लिए परमिशन की जरुरत नहीं होती. जंगल की गाडी ही इस सफारी को करवाती है. जिसका मूल्य प्रति व्यक्ति 400 रुपये होती है. हर दिन इसे आप कर सकते है. कई बार यहाँ हर तरह के जंगली जानवर से भी रूबरू होना पड़ता है.

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डोडा बेट्टा पीक के बारें में कार चालक स्माइल बताते है कि ऊटी शहर से 8 से 9 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ, ये पीक यहाँ की सबसे ऊँची चोटी है. इसकी ऊँचाई 2623 मीटर है इसके बाद पहाड़ी से नीचे की ओर जाना पड़ता है. यहाँ पर्यटक अधिकतर कार से आते है. यहाँ जंगलों में कई प्रकार के जंगली जानवर जैसे बाईसन, हिरण और चीता है. यहाँ चीड़ के पेड़ काफी मात्रा में पाए जाते है.यहाँ बारिश के मौसम में लैंडस्लाइड नहीं होती, इसलिए सैलानी यहाँ हर मौसम में आ सकते है, यहाँ से ऊटी का पूरा नज़ारा देखने लायक होता है. 90 प्रतिशत लोग यहाँ आते है. इसके अलावा लैम्ब्स रॉक कुनूर से केवल 9 किलोमीटर की दूरी पर है. यहाँ से कोयंबटूर के सुंदर और चाय के बागानों के मनमोहक दृश्य आसानी से देखे जा सकते है, जिसे फोटोग्राफी के शौक़ीन व्यक्ति कैमरे में कैद कर सकते है. कोडानाद व्यू पॉइंट भी ऐसी ही एक सुंदर पीक है, यह निलगिरी पर्वत श्रृंखला के पूर्वी छोर पर कोटागिरी से 16 किलोमीटर की दूरी पर है. यहाँ से मयार नदी और चाय के बागान देखे जा सकते है.

निलगिरी माउंटेन के बारें में स्टर्लिंग हॉलीडेज के रीजनल मैनेजर मुत्थुराज रिचार्ड बताते है कि ऊटी की निलगिरी चाय 187 सालों से प्रसिद्ध है, ये 1832 में क्रिस्टी नाम के एक सर्जन ने इसे उगाया था. जब वह एक दिन इन पहाड़ियों के बीच से गुजर रहा था तो चाय के तरह के केमेलिया वेरायटी के पौधों को पहाड़ियों पर देखा और चीन से कुछ चाय के बीज मंगवाकर इन पहाड़ियों पर लगवाएं. जब तक पौधे बड़े होते उनकी मृत्यु हो चुकी थी. इसके बाद सरकार ने 1935 में इस तरफ ध्यान दिया. यहाँ की सरकार ने इसकी पहली नर्सरी केटी वैली में शुरू की और चाय की खेती शुरू हुई. जिसे यहाँ के लोग पहाड़ों की ढलान पर सीढ़ीनुमा खेतो में उगाते है. ये चाय स्वाद और सुगंध के लिए बहुत मशहूर है. सैलानी यहाँ आने पर उसका अच्छा लुत्फ़ उठाते है. कोरा कोंडा सबसे ऊँची चाय के बागान है. कई प्रकार के चाय यहाँ पायी जाती है. यहाँ की पहाड़ियों में ग्रीन टी, ब्लैक टी, वाइट टी आदि कई वैरायटी है. जिसमें वाइट टी सबसे अधिक महँगी और स्वाद में अच्छी होती है. ये निलगिरी पहाड़ियों की सबसे ऊँचाई पर ही पैदा होती है. इसके कली के खिलने से पहले इसे तोड़ी जाती है, ताकि इसकी फ्लेवर बनी रहे. अधिक ऊँचाई पर उगने वाले चाय का स्वाद और सुगंध सबसे अच्छा होता है.

इसके अलावा निलगिरी पर्वत नाम पड़ने के बारें में ऊटी निवासी संतोष कहते है कि इन पहाड़ियों में निलगिरी के पेड़ काफी मात्रा में है, जिसकी महक ऊटी जाते समय ही अनुभव होता है. निलगिरी का तेल सैलानी यहाँ से ले जाते है, जो सर्दी जुकाम और सिरदर्द के लिए काफी उपयोगी होता है. कुछ लोग मानते है कि बसंत ऋतु में एक ख़ास तरह के नीले फूल इन पर्वत श्रृंखलाओं पर खिलते है, जिससे पूरा पर्वत माला नीला दिखाई पड़ता है, इसलिए इसे निलगिरी पर्वत कहा जाता है.

प्रकृति प्रेमियों के लिए वनस्पति उद्यान ऊटी की एक खास जगह है, इसकी स्थापना साल 1847 में की गयी थी. 22 हेक्टेयर में फैले इस वन की रखवाली वनविभाग करती है. यहाँ पेड़-पौधों की 650 प्रजातियाँ है और यह करीब 2 करोड़ वर्ष पुराना है.

ऊटी झील में नौका विहार सबसे अच्छा और खूबसूरत है. मछली के शिकार करने के लिए यहाँ परमिशन लेनी पड़ती है. इसका निर्माण साल 1825 में जॉन सुलिवान ने करवाया था. यह झील 2.5 किलोमीटर लम्बी है. इसके अलावा यहाँ एक बगीचा और जेट्टा भी है.

जाने ऊटी की इतिहास करीब से

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स्टर्लिंग हॉलीडेज के मुख्य मार्केटिंग ऑफिसर पेशवा आचार्य बताते है कि निलगिरी चेर साम्राज्य  का भाग हुआ करती थी. इसके बाद वह गंग साम्राज्य के पास गयी और 12वीं शताब्दी में होयसल साम्राज्य के राजा विष्णुवर्धन के अंतर्गत आ गयी और बाद में यह मैसूर राज्य का हिस्सा बना. 18 शताब्दी में टीपू सुल्तान ने इसे अंग्रेजों के हवाले कर दिया, लेकिन पड़ोसी कोयम्बटूर के गवर्नर जॉन सुलिवान को यहाँ का मौसम बहुत सुहावना लगा और उन्होंने यहाँ बसे आदिवासियों, जिसमें तोडा, इरुम्बा और बडगा प्रमुख थे, उनसे जमीनें खरीदनी शुरू कर दी. इस जगह का अधिक विकास ब्रिटिश राज्य में हुआ. बाद में ऊटी को मद्रास प्रेसिडेंसी की ग्रीष्मकालीन राजधानी का दर्जा दिया गया. तोडा लोग भैस पालने के लिए जाने जाते थे, जबकि बडगा अच्छी खेती करने में माहिर माने जाते है. यहाँ की अर्थव्यवस्था अधिकतर पर्यटन और कृषि पर ही टिकी हुयी है. ठंडी मौसम होने की वजह से चाय के अलावा यहाँ की आलू, गाजर, गोभी आदि की खेती काफी अच्छी होती है. इसके आगे उनका कहना है कि ऊटी की तोडा आदिवासियों के बारें में जानकारी, उनकी संस्कृति और हेंडीक्राफ्ट को आगे लाने के लिए वे निरंतर प्रयास कर रहे है.

क्या खाए और कहाँ से  

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एक्जीक्यूटिव शेफ सर्वानन्द बताते है कि इस तरह के चाय किसी भी समय आप कभी भी ले सकते है. इसके अलावा ऊटी की स्ट्राबेरी स्मूदी डीटोक्स करने के लिए बहुत अच्छी होती है जो यहाँ के लोग अधिकतर घर पर ही बनाते है. यहाँ का मौसम पूरे साल ठंडा रहता है. इसलिए सैलानी पूरे साल यहाँ घूमने आते है. यहाँ के फ़ूड की बात करें तो यहाँ की अधिकतर व्यंजन कर्नाटक और साउथ इंडियन फ़ूड से ही प्रेरित है. जिसे आप किसी भी रेस्तरां या होटल से खा सकते है. इसके अलावा यहाँ आने पर बडगांव फ़ूड और ऊटी वर्की जो यहाँ के आदिवासी अधिक खाते है. ऊटी वर्की मक्खन और मैदे के साथ मिलाकर बनाया जाता है, उसे अवश्य खाने की कोशिश करें. यहाँ बडगाव के लोग अधिक बसते है. ऊटी की सेव जो बेसन, चावल के आटे, काजू और मसालें से बनायी जाती है, जिसे किसी भी व्यंजन के साथ या खाली खा सकते है ये हर डिश को लज़ीज़ बनाती है. असल में ऊटी 8 जिले के अन्तर्गत विभाजित है. यहाँ हजारों प्रकार की इडली प्रसिद्द है. जो उस समय के राजा-रजवाड़े के खान पान से प्रेरित है. संतागई एक ब्रेकफास्ट फ़ूड है, जिसे चावल और उर्द के पेस्ट से बनायीं जाती है इसके अलावा कांचीपुरम इडली, जैस्मिन इडली आदि कई है. यहाँ के लोग अधिकतर स्टीम्ड फ़ूड खाते है, क्योंकि वे अधिकतर किसान है, इसलिए वे इस तरह के भोजन करने पर पूरा दिन काम कर सकते है. इसे बनाना, खाना और हज़म करना आसान होता है. इतना ही नहीं यहाँ के किसान अधिकतर चावल और मक्खन खाते है.

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कैसे जाएँ

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निकटतम हवाई अड्डा कोयम्बटूर है, यहाँ से गाडी से ऊटी की 87 किलोमीटर की दूरी करीब 3 घंटे की जर्नी कर पहुंचा जा सकता है, जबकि रेलवे स्टेशन उदगमंडलम है, यहाँ से टॉय ट्रेन से ऊटी पहुँचने में साढ़े 6 घंटे लगते है.

ठहरने की सुविधा

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ऊटी में रहने की बहुत सुविधाएँ है. शॉप में काम करने वाले सरजू कहते है कि हर बजट के होटल और हॉलिडे होम्स यहाँ पर उपलब्ध है. 1 हज़ार रुपये प्रतिदिन से लेकर 6 हज़ार रुपये के अच्छे कमरे मिल सकते है. अप्रैल से जून तक का समय घूमने के लिए सबसे अच्छा होता है और अधिकतर सैलानी तभी आते है. ठंड में पर्यटकों की संख्या कम हो जाती है.

क्या खरीदें

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शॉप के ओनर उमेश का कहना है कि ऊटी के चाय, हाथ से बनी चोकलेट, खुशबूदार निलगिरी तेल और मसालों के लिए प्रसिद्द है. बाज़ार में आसपास की दुकानों पर ये आसानी से मिल जाता है. यहाँ के तोडा आदिवासी महिलाएं हाथ से कपड़ा, शाल और स्टोल बुनती है. इसके अलावा तोडा शैली के चांदी के पारंपरिक गहने भी आसानी से मिलते है, जिसे वे सोने में भी बना देते है. तमिलनाडू के हस्तशिल्प केंद्र से इसे ख़रीदा जा सकता है.

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