मोबाइल, इंटरनेट व शौपिंग क्रेज से बच्चों में खर्च करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है. बच्चों की खर्चीली आदतों को देखते हुए हाल ही में कुछ बैंकों के ब्रांच मैनेजरों ने एक गोष्ठी का आयोजन किया. यहां बैंकर्स ने ‘बच्चों को सेविंग के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए?’ जैसे विचारों से लोगों को अवगत कराया तथा अपनी कई स्कीमें समझाईं. कई बैंक तो बच्चों के लिए डिफरेंट सेविंग स्कीम्स भी ला रहे हैं. बैंक अब बच्चों के लिए एटीएम कार्ड भी जारी कर रहे हैं. आज मातापिता के लिए बच्चों को पाकेटमनी देना तो स्टेटस सिंबल बन चुका है. वे यह नहीं समझते कि जानेअनजाने में वे अपने बच्चों के अंदर एक ऐसी आदत को जन्म दे रहे हैं, जो भविष्य में उन्हीं के लिए नुकसानदायक साबित होगी.

आज टीनएजर्स स्कूल की छुट्टी के बाद पान की दुकान पर सिगरेट, गुटखा इत्यादि खरीदते आसानी से दिख जाते हैं. कहींकहीं ये बच्चे शराब की दुकान पर बीयर खरीदते दिख जाते हैं. हो सकता है उस समय इन की माताएं किटी पार्टी और पिता व्यवसाय में व्यस्त हों. जेब में पैसा जरूरत को जन्म देता है, इसलिए अगर बच्चे को पैसे देना बहुत जरूरी है तो उस का उपयोग सिखाना उस से भी ज्यादा जरूरी है.

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