जलन एक सामान्य भावना है. सब का अपने जीवन में इस भावना से सामना होता ही है, चाहे कोई इसे स्वीकार करे या न करे, पर यह भावना एक स्वस्थ भाव से अस्वस्थ और हानिकारक भाव में बदल जाए, तब चिंता की बात है.
जलन के भी अनेक रूप होते हैं. यह केवल दूसरों की उपलब्धियों को सहन कर पाने की अक्षमता के रूप में हो सकती है या इस में यह इच्छा भी शामिल हो सकती है कि वे उपलब्धियां हमें हासिल हों. हम यह चाहें कि हमारे पास वह हो जो दूसरों के पास हो और हम यह भी चाह सकते हैं कि उस के पास वह चीज न रहे.
जलन अकसर ही क्रोध, आक्रोश, अपर्याप्तता, लाचारी और नफरत के रूप में भावनाओं का एक संयोजन होता है. यह एक मानसिक कैंसर है.
‘जलन तू न गई मेरे मन से...‘ रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित एक निबंध है. इस में लेखक ने जलन होने के कारण और उस से होने वाले नुकसानों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है. जलनलु व्यक्ति असंतोषी प्रवृत्ति के होते हैं.
