Bigg Boss 16 में फैशन के जलवे बिखेरेगी Imlie, देखें फोटोज

कलर्स टीवी का फेमस रियलिटी शो बिग बॉस 16 (Bigg Boss 16 Premier) जल्द ही शुरु होने वाला है, जिसके चलते शो में हिस्सा लेने वाले प्रतियोगियों के नाम एक-एक करके सामने आ रहे हैं. वहीं इन नामों में टीवी बहू इमली यानी एक्ट्रेस सुंबुल तौकीर खान (Imlie Aka Sumbul Tauqeer Khan) का नाम भी कंफर्म हो गया है. वहीं शो में एंट्री से पहले एक्ट्रेस सुंबुल तौकीर खान अपने नए-नए लुक से फैंस को दीवाना बना रही हैं. आइए आपको दिखाते हैं टीवी की सिंपल बहू के जलवे की झलक…

पीला लहंगा फ्लौट करती दिखीं इमली

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sumbul Touqeer Khan (@sumbul_touqeer)

सीरियल इमली में अपनी सादगी से फैंस का दिल जीतने वाली सुंबुल तौकीर खान इन दिनों अपने इंडियन और वेस्टर्न लुक शेयर कर रही हैं. इमली के सादगी वाले लुक में नजर आने वाली सुंबुल ने हाल ही में अपने पीले लहंगे में कुछ फोटोज शेयर की थी, जिसमें उनका औफ शोल्डर ब्लाउज के साथ पीला लहंगा काफी खूबसूरत लग रहा था. वहीं इसके साथ मैचिंग ज्वैलरी एक्ट्रेस के लुक पर चार चांद लगा रहा था.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sumbul Touqeer Khan (@sumbul_touqeer)

वेस्टर्न लुक में लगती हैं कमाल

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sumbul Touqeer Khan (@sumbul_touqeer)

इंडियन लुक के अलावा एक्ट्रेस सुंबुल तौकीर खान का वेस्टर्न लुक काफी खूबसूरत है. वह जींस हो या ड्रैसेस, हर अवतार में खूबसूरत लगती हैं. वहीं डस्की स्किन वाली लड़कियों को उनका ये फैशन काफी पसंद आने वाला है.

स्टार परिवार में दिखा अलग अंदाज

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sumbul Touqeer Khan (@sumbul_touqeer)

सीरियल इमली के अलावा स्टार परिवार शो का हिस्सा बनने वाली एक्ट्रेस सुंबुल तौकीर खान का मौर्डन बहू का अंदाज काफी खूबसूरत था. फैंस एक्ट्रेस के लहंगा हो या साड़ी , हर लुक की तारीफ कर रहे हैं. वहीं फहमान खान संग एक्ट्रेस सुंबुल तौकीर खान की जोड़ी को दोबारा साथ देखने की बात कर रहे हैं.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sumbul Touqeer Khan (@sumbul_touqeer)

बता दें, सीरियल इमली में आर्यन यानी फहमान खान संग रोमांस करने वाली एक्ट्रेस सुंबुल तौकीर खान इन दिनों अपनी डेटिंग की खबरों के लिए सोशलमीडिया पर छाई हुई हैं. हालांकि इस रिश्ते पर एक्ट्रेस की तरफ से कोई रिएक्शन सामने नहीं आया है.

एक और करवाचौथ- भाग 3

पहले श्यामली का माथा ठनका. आखिर स्त्री की छठी इंद्री ऐसी शक्ति है जो उस पर पड़ी परपुरुष की निगाह की भाषा भी पढ़ लेती है और अपने पति की परस्त्री की तरफ पड़ी निगाहों की भाषा भी. शुभांगी व मानव का नैनमटक्का उस की निगाह में धीरेधीरे खटकने लगा पर बोलने के लिए कुछ था ही नहीं. उधर वरुण तो बीवी को अपने व परिवार की लंबी उम्र व सलामती के लिए व्रतउपवासों व ऐसे ही मौकों पर दोनों परिवारों के सामूहिक पर्व मनाने का इंतजार करते देख फूला न समाता और सोचता कि शुभांगी अब उसे कितना प्यार करने लगी है. उस की हर बात मानती है. सास भी अब कुछ खुश रहने लगी थी.

सालभर बीततेबीतते करवाचौथ फिर आ गई. श्यामली और वरुण इस बार बहुत खुश थे, क्योंकि इस बार तो शुभांगी व मानव भी करवाचौथ पूरे मन से मनाएंगे. इसलिए दोनों परिवारों का शाम को सामूहिक आयोजन होना तय हुआ था. उन दोनों की बातों में महीनाभर पहले से ही इस की झलक मिलने लगी थी. इसलिए दोनों का घमासान शुरू हो गया था.

मगर शुभांगी व मानव मन ही मन चिड़चिड़ा रहे थे. करवाचौथ वाले दिन महिलाएं भले ही आपस में मिल कर अपनी पूजा निबटा लें पर उन्हें रहना तो अपनेअपने साथी के साथ ही पड़ेगा. उन की बेचैनी व दिल्लगी अब सीमा पार करने लगी थी. एकदूसरे के बिना अब जिंदगी बेनूर लग रही थी.

आखिर दिल के हाथों मजबूर हो कर दोनों ने अब अपना रिश्ता जगजाहिर करने की ठान ली. समाज व परिवार को ठोकर मारते हुए दोनों ने करवाचौथ वाले दिन औफिस से ही भागने की योजना बना ली. सामूहिक करवाचौथ का आयोजन शुभांगी के घर पर होना तय हुआ था.

करवाचौथ वाले दिन दोनों घरों के लोगों में उत्साह का माहौल था. पर सुबह औफिस गए शुभांगी व मानव रात तक घर ही नहीं पहुंचे. चांद निकल कर चमक कर, पूजा करवा कर सुस्ताने भी लगा पर शुभांगी व मानव नदारद थे. श्यामली का मेकअप मलिन पड़ गया था और वरुण का इंतजार भी फीका पड़ गया था.

दोनों अपने फोन घर छोड़ गए थे और मजे की बात यह कि वरुण यह कह कर कि

कार में कुछ खराबी आ रही है, कार न ले जा कर टैक्सी से औफिस चला गया था. इसलिए सब का इंतजार गहराती रात के साथ चिंता में बदलने लगा था. आखिर चिंतित हो कर श्यामली के पापा व वरुण की मां ने पुलिस में रिपोर्ट लिखवा दी. हालांकि श्यामली व वरुण इतनी जल्दी नहीं करना चाह रहे थे. पता नहीं क्यों दोनों का माथा ठनक रहा था.

उधर प्रेमरोग से ग्रस्त शुभांगी व मानव, लैपटौप बैग में 2-4 कपड़े व जरूरी सामान डाल कर औफिस से हाफ डे कर के घर से भाग कर तो आ गए थे पर शहर के आखिरी कोने में स्थित होटल के कमरे में तब से सिर झुकाए बैठे दोनों विचारों में गुम थे कि अच्छा किया या बुरा.

वैवाहिक जीवन में सबकुछ ठीक चलते हुए प्रेम की पींगे बढ़ा लेना अलग बात है, पर इस तरह परिवार व बच्चे छोड़ कर प्रेमी के साथ घर छोड़ कर भाग जाना सरल नहीं है. दोनों को प्यार पर अब नैतिकता भारी पड़ती महसूस हो रही थी.

सामाजिक, पारिवारिक मानमर्यादा को ठोकर मारना इतना भी आसान नहीं लग रहा था अब. आने वाली जिंदगी के बारे में सोच रहे थे. भावावेश में लिए गए इस निर्णय से भविष्य में आने वाली कठिनाइयों से निबटना दुष्कर कार्य था. यह कोई 3 घंटे की फिल्म नहीं थी. दोनों की नौकरी थी, 10-10 साल की शादियां थी, बच्चे थे. बिना तलाक के वे शादी कर नहीं सकते और तलाक लेना क्या इतना आसान है? सालों खप जाएंगे. ऊपर से बच्चों का क्या भविष्य होगा, यह भी चिंता थी. दोनों ऊहापोह में बैठे, नैतिक दुविधा में उलझे थे. एकदूसरे के लिए भागे हुए वे अब एकदूसरे की तरफ भी नहीं देख पा रहे थे. एकदूसरे का साथ पाने का खयाली तिलिस्म भी फीका पड़ गया था.

उधर पुलिस में रिपोर्ट हो जाने पर पुलिस छानबीन में लग गई. फोन क्योंकि दोनों घर छोड़ गए थे. इसलिए उन की लोकेशन ढूंढ़ना आसान नहीं था. औफिस कर्मियों से भी कुछ पता नहीं चला. औफिस में भी सबकुछ सामान्य रहा था और दोनों हाफ डे कर के अपनेअपने घर निकल गए. हां, मानव आज कार छोड़ कर टैक्सी से औफिस यह कह कर गया था कि उसे बौस के साथ किसी क्लाइंट से मिलने जाना है. शुभांगी तो वैसे भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट से ही आतीजाती थी. पुलिस ने भी कुछ घंटे इधरउधर माथापच्ची की, हवा में तीर चलाए. सारे अस्पताल, सड़कें भी छान मारीं. कुछ क्षेत्रों के थानों में भी फोन किया कि कहीं कोई दुर्घटना इत्यादि की सूचना तो नहीं दर्ज हुई. फिर वापस आ गई.

उधर सिर झुकाए बैठे शुभांगी व मानव समझ नहीं पा रहे थे कि आगे कि रूपरेखा क्या होगी.

‘‘अब?’’ एकाएक शुभांगी ने चेहरा उठाया.

‘‘अब…अब क्या?’’ मानव के चेहरे पर भी कुछ हताशा, कुछ दुविधा वाले भाव थे.

‘‘क्या हम ने ठीक किया मानव? क्या सचमुच एकदूसरे को पा कर जीवन सुंदर, सुगम, सरल व चमदार हो जाएगा, जैसा हम चाहते हैं?’’

‘‘शायद नहीं,’’ मानव लाचारी से बोला, ‘‘इतना आसान नहीं है, बहुत सारे बैरिकेड्स हैं, जिन्हें हटाते जिंदगी की चमक फीकी पड़ जाएगी. ऊपर से कुछ गलत कर देने की मानसिक यंत्रणा से भी हम शायद कभी नहीं निकल पाएंगे.’’

‘‘हूं,’’ शुभांगी भी गहरे विचारों में डूबी हुई बोली, ‘‘और हमारे बच्चे? उन का क्या होगा? मेरे बच्चे मां के बिना कैसे रहेंगे और तुम्हारे बच्चे बिना आर्थिक संबल के कैसे पलेंगे? सबकुछ छिन्नभिन्न हो जाएगा.’’

‘‘सही कह रही हो शुभांगी. शायद मनुष्य की फितरत है, अप्राप्त फल पाने की… सबकुछ था न हमारे पास… पर हमारे विचार हमारे साथियों से मेल नहीं खाते थे और हम उन के विचारों के साथ घुटन महसूस करते थे. लेकिन वे हमारे लिए बुरे तो नहीं थे… विचारों की समानता हमें करीब ले आई. पर स्त्रीपुरुष के बीच में दोस्ती अकसर प्रेम का ही रूप क्यों ले बैठती है? क्या यह रिश्ता स्वस्थ नहीं रह सकता था? जैसे श्यामली और वरुण का था. वे दोनों भी तो एक ही वैचारिक धरातल पर विचरण करते हैं. तो क्या वे भाग गए एकदूसरे के साथ?’’ मानव स्थिति का सही विश्लेषण कर मन की दुविधा को शब्द देता हुआ बोला.

‘‘हां मानव, सही कह रहे हो. हमें अपनेअपने साथी में थोड़ाबहुत बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए थी. पूरी तरह तो कोई नहीं बदल सकता. न हम, न वे पर बस सभी सरलता से जिंदगी को ले पाते, इतनी कोशिश तो की जा सकती थी.’’

‘‘हूं… तुम भी वरुण की जोरजबरदस्ती से घबरा गई और मैं भी हर समय श्यामली की सात्विक व अंधविश्वासी विचारधारा से तंग आ गया… मुझे एक आधुनिक विचारधारा वाली पत्नी चाहिए थी… वह मुझे तुम में दिखाई दी पर इस का मतलब यह तो नहीं कि विवाह को सूली पर टांग दिया जाए. इस के अलावा तो कोई शिकायत नहीं थी मुझे श्यामली से… मैं भी कोशिश कर सकता था धीरेधीरे उसे अपने विचार समझाने की पर मैं उस से हमेशा चिढ़ जाता था और दूर भागता रहता था.’’

‘‘हूं,’’ शुभांगी एक लंबी सांस भर कर गहरी सोच में डूब गई.

‘‘फिर, अब क्या करें?’’ थोड़ी देर बाद मानव बोला, ‘‘घर पर तो हम दोनों के गायब होने से हड़कंप मच गया होगा… सभी समझ गए होंगे अब तक तो… श्यामली को तो पहले ही शक हो रहा था.’’

इस तरह बच्चों में डालें पढ़ने की आदत

आजकल सभी मातापिता यह शिकायत करते हैं कि बच्चे स्मार्टफोन, टैबलेट, टीवी या फिर मोबाइल पर गेम्स खेलने में लगे रहते हैं. मंजीत कहते हैं, ‘‘एक हमारा जमाना था जब हम पढ़ते हुए कभी नहीं थकते थे.’’ साथ में बैठी उन की पत्नी फौरन बोल उठीं, ‘‘मुझे तो मीकू, चीकू बहुत पसंद थे.’’  बालपुस्तकों की कमी आज भी नहीं, किंतु आज की पीढ़ी पढ़ने का खास शौक नहीं रखती है. कहीं इस के जिम्मेदार हम ही तो नहीं? पहले इतनी तकनीक हर हाथ में उपलब्ध नहीं होती थी कि बच्चे किताबों के अलावा मन लगा पाते. आजकल गैजेट्स हर छोटेबड़े हाथ को आसानी से प्राप्त हैं.

अपने नन्हे को पढ़ कर सुनाएं : 

अपने नन्हेमुन्ने का अपने जीवन में स्वागत करने के कुछ वर्षों बाद ही आप उसे कहानी पढ़ कर सुनाने की प्रक्रिया आरंभ कर दें. इस से न केवल आप का अपने बच्चे से बंधन मजबूत होगा बल्कि स्वाभाविक तौर पर उसे पुस्तकों से प्यार होने लगेगा.  उम्र के छोटे पड़ाव से ही किताबों के साथ से बच्चों में पढ़ने की अच्छी आदत विकसित होती है. प्रयास करें कि प्रतिदिन कम से कम 20 मिनट आप अपने बच्चों के साथ मिल कर बैठें और पढ़ें. पुस्तकों में कोई रोक न रखें, जो आप के बच्चे को पसंद आए, उसे वह पढ़ने दें.

पढ़ने के साथ समझना भी जरूरी : 

बच्चा तेजी के साथ किताब पढ़ पाए, यह हमारा लक्ष्य नहीं है, बल्कि जो कुछ वह पढ़ रहा है, उसे समझ भी सके. इस के लिए आप को बीचबीच में कहानी से संबंधित प्रश्न करना चाहिए. इस से बच्चा न केवल पढ़ता जाएगा, बल्कि उसे समझने की कोशिश भी करेगा. आप ऐसे प्रश्न पूछें, जैसे अब आगे क्या होना चाहिए, क्या फलां चरित्र ठीक कर रहा है, यदि तुम इस की जगह होते तो क्या करते. ऐसे प्रश्नों से आप का बच्चा कहानी में पूरी तरह भागीदार बन सकेगा तथा उस की अपनी कल्पनाशक्ति भी विकसित होगी.

बच्चे के रोलमौडल बनें : 

यदि आप का बच्चा बचपन से पढ़ने का शौकीन है तब भी घर में किसी रोलमौडल की अनुपस्थिति उसे इधरउधर भटकने पर मजबूर कर सकती है. आप स्वयं अपने बच्चे के रोलमौडल बनें और उस की उपस्थिति में अवश्य पढ़े. चाहे आप को स्वयं पढ़ना बहुत अधिक पसंद न भी हो तब भी आप को प्रयास करना होगा कि बच्चे के सामने आप पढ़ते नजर आएं. क्या पढ़ते हैं, यह आप की इच्छा है, लेकिन आप के पढ़ने से आप का बच्चा यह सीखेगा कि पढ़ना उम्र का मुहताज नहीं होता और हर उम्र में इंसान सीखता रह सकता है.

आसपास देख कर सिखाइए : 

छोटे बच्चे बिना पढ़े ही क्रीम की बोतल के नाम, शैंपू के नाम, उन के पसंदीदा रैस्तरां, जैसे डोमिनोज का नाम आदि जान जाते हैं. कैसे? चिह्नों द्वारा. मीनल बताती हैं कि उन की डेढ़ वर्र्र्षीया बिटिया ढेर सारे चिह्न (कंपनियों के लोगो) पहचानती है और उन की कंपनियों के नाम बता देती है तो जब उन के दूसरा बच्चा होने का समय निकट आया, उन्होंने नवजात शिशु की कौट के ऊपर उस के नाम के अक्षर टांग दिए. इस का असर यह हुआ कि न केवल उन की बड़ी बिटिया नाम की स्पैलिंग सीख गई, बल्कि छोटी भी बहुत जल्दी वर्णमाला सीख गई. तकनीकी भाषा में इसे ‘एनवायरनमैंटल पिं्रट’ कहते हैं अर्थात चिह्नों की सहायता से बच्चे, बिना पढ़े ही, भिन्न रैस्तरां, सौंदर्य प्रसाधन, ट्रैफिक सिग्नल, कपड़े, पुस्तकें आदि पहचानने लगते हैं और उन में भेद कर सकते हैं.  नन्हे बच्चों की उत्सुक प्रवृत्ति का लाभ उठाते हुए आप उन्हें न केवल किसी चीज का शाब्दिक अर्थ बल्कि सामाजिक महत्त्व तथा उपयोग भी बता सकते हैं. अपने आसपास की चीजें देख वे प्रश्न करेंगे और आप उत्तर के द्वारा उन्हें कईर् चीजें सिखा सकते हैं.

भिन्न प्रकार की पुस्तकों को बनाएं मित्र :

  जब आप का बच्चा पढ़ने लगे, तब आप उसे भिन्न प्रकार की पुस्तकें पढ़ने को दें, जैसे अक्षर ज्ञान वाली पुस्तकें, बाल कहानियां, कविताओं की पुस्तकें आदि. साथ ही, वह एक प्रकार की कहानियों को दूसरी से अलग करने में अपने दिमाग में विचारों को बनाना व संभालना सीखेगा.

खेलखेल में :

कई खेलों द्वारा आप अपने छोटे बच्चे को पढ़ने की ओर आकर्षित कर सकती हैं. दिल्ली की प्रेरणा सिंह कहती हैं, ‘‘हर शुक्रवार वे अपनी सोसाइटी में 5 से 7 साल के बच्चों के लिए ‘फन फ्राइडे’ मनाती हैं. यहां वे बच्चों की टोली को अलगअलग टीम में विभाजित कर खेलों द्वारा पढ़ने की ओर उन का रुझान पैदा करती हैं. इस के लिए वे कई खेलों का सहारा लेती हैं.

वे कहती हैं, ‘‘केवल स्कूली पढ़ाई ही जीवन में काम नहीं आती. जो कुछ हम अपने वातावरण से सीखते हैं, वही हमारा व्यक्तित्व बनता है और जिंदगी में हमारे काम आता है.’’

डिजिटल बनाम प्रिंट

वर्ष 2013 से 2015 तक नाओमि बैरोन द्वारा किए गए शोध में 5 देशों-भारत, जापान, अमेरिका, जरमनी व स्लोवेनिया के 429 विश्ववि-ालयों के छात्रों से जब डिजिटल बनाम कागज की किताबों की तुलना करने को कहा गया तो छात्रों की प्रतिक्रिया थी कि उन्हें कागज की खुशबू भाती है. उन्हें कागज को छूने, देखने, पकड़ने से आभास होता है कि वे पढ़ रहे हैं. पिं्रट उन्हें बेहतर समझ में आता है और अधिक याद रहता है.

सोशल मीडिया का असर

सोशल मीडिया पर ज्ञान तो बहुत है पर सही या गलत, इस का कोई प्रमाण नहीं है. जिस के जो दिल में आता है, वह उस का औडियो या वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर अपलोड कर देता है. बच्चे व किशोर ज्ञान की कमी के कारण इस अधकचरी जानकारी को प्राप्त कर समझते हैं कि उन्हें किताबें पढ़ने की आवश्यकता नहीं है.

बच्चे को सिर्फ अक्षरज्ञान देना नहीं है, बल्कि पुस्तकों जैसे सच्चे मित्र द्वारा सामाजिक ज्ञान के साथ भावनात्मक संबलता भी प्रदान करना है. बच्चा जो पढ़े, जो सीखे, उसे गुने भी. इस के बिना पढ़ना व्यर्थ है.  केवल पढ़ना ही ध्येय नहीं, लिखना भी लक्ष्य होना चाहिए. और अच्छा लिखने के लिए ज्यादा पढ़ना आवश्यक है. अच्छी किताबें बच्चों को ज्ञान के साथ एक नई दुनिया दिखाती हैं, उन्हें सही राह पर चलने की प्रेरणा देती हैं.

खेल ऐसा जो पढ़ने में रुचि जगाए

कुछ आकर्षक खेल जिन के द्वारा आप अपने बच्चों में पढ़ने की अभिरुचि विकसित कर सकती हैं-

–     हर अक्षर की कठपुतलियां बनाइए. कोई एक शब्द कहिए, जिस की स्पैलिंग बच्चों को कठपुतलियों को उठा कर बनानी है. जो टोली पहले बना देगी, वह जीत जाएगी.

–     हर टोली में से एक बच्चा आएगा और एक बड़े बोर्ड पर किसी वस्तु की कलाकारी करेगा. दूसरी टीम को उस की स्पैलिंग बतानी होगी.

–     जिस बच्चे ने जो भी नई कहानी पढ़ी है, वह उसे पूरे समूह को सुनाएगा. कहानी समाप्त होने पर सब तालियां बजाएंगे.

–     सब बच्चों को एक विषय दिया जाएगा और उस पर उन्हें एक छोटी कहानी बनानी होगी.

–     बारीबारी से सब बच्चे दी हुई पुस्तक में से कहानीपाठ या कवितापाठ करेंगे.

शोध जो कहता है

–     करीब 1,500 अभिभावकों, जिन के 8 वर्ष तक की आयु के बच्चे हैं, से लंदन के बुकट्रस्ट द्वारा बातचीत करने पर परिणाम आया कि अभिभावक मानते हैं कि डिजिटल के मुकाबले कागज से बच्चों की दृष्टि को कम खतरा रहता है, उन को कम सिरदर्द होता है और बेहतर नींद आती है.

–     92 फीसदी लोगों का कागज की किताब में अधिक ध्यान लगता है.

–     86 फीसदी डिजिटल के मुकाबले प्रिंट को पसंद करते हैं.

–     45 फीसदी लोगों ने इस बात का भय जताया कि गैजेट के हाथ में आने से बच्चों का स्क्रीनटाइम बढ़ जाएगा.

–     31 फीसदी को डर था कि गैजेट से बच्चे गलत साइट पर जा कर कुछ अनर्गल भी देख सकते हैं.

एक और करवाचौथ- भाग 2

श्यामली फिर उखड़ गई. वह किचन में चाय बनाने चली गई. मानव को अफसोस हुआ कि वह चुप नहीं रह पाता है. श्यामली के इन विश्वासों पर व्यंग्य किए बिना जैसे उस का खाना ही नहीं पचता. उस का मूठ ठीक करने के लिए उस ने जेब से लिफाफा निकाला और उसे देने चला गया.

काफी इंतजार के बाद चांद निकला और श्यामली ने छलनी से चांद व अपने

पिया को निहारा, पैर छुए. मानव ने पानी पिला कर उस का व्रत खुलवाया. बच्चे वीडियो बनाने में मस्त थे. मानव को लग रहा था वह किसी शौर्ट फिल्म में ऐक्टिंग कर रहा है.

उधर शुभांगी जब घर पहुंची तो उस का पति वरुण उस से पहले ही घर पहुंच गया था, ‘‘बहुत देर कर दी तुम ने आज?’’

‘‘देर कहां? रोज वाले टाइम से ही तो आई हूं,’’ थकी, भूखी शुभांगी बोली.

‘‘मैं ने सोचा था. आज करवाचौथ है, तुम जल्दी आओगी,’’ वरुण ऐसे बोला जैसे जल्दी न आ कर उस ने करवाचौथ व पति दोनों का अपमान किया है.

‘‘हां, पर करवाचौथ पर हाफ डे नहीं होता है न औफिस में… मेरी समझ से सरकारी व गैरसरकारी सभी संस्थानों में करवाचौथ के दिन पूरी छुट्टी हो जानी चाहिए… आखिर देश के पुरुषों की सलामती की बात है…’’ शुभांगी थकी हुई थी और भूखी भी, इसलिए चिढ़ कर बोली, ‘‘अब हम महिलाएं आज के दिन अपने लिए तो कुछ करती नहीं हैं… बल्कि मैं तो कहती हूं हरतालिका तीज, वट सावित्री व्रत, नवरात्रे वगैरह जितने भी व्रतउपवास, पूजा वगैरह महिलाएं अपने बच्चों, पति, घरपरिवार की सलामती के लिए करती हैं… इन दिन राष्ट्रीय छुट्टी घोषित हो जानी चाहिए. आखिर परिवार सलामत रहेंगे… परिवार में बच्चे, पुरुष सलामत रहेंगे. तभी तो देश सलामत रहेगा. तो एक तरह से यह सिर्फ महिलाओं की नहीं, देश की समस्या है. सरकार को इस समस्या के विषय में विचार करना चाहिए,’’ चिढ़ी हुई शुभांगी गंभीरता से बोल कर बैडरूम में चली गई.

वरुण वहीं बैठा रह गया. शुभांगी की सास अपनी कुसंस्कारी बहू को घृणा से देख रही थी, जिसे अपने सुहाग की लंबी उम्र की जरा भी चिंता नहीं थी.

बैडरूम में जा कर शुभांगी थोड़ी देर खिन्न हो कर बैठी रही, फिर किसी तरह मूड ठीक किया. फ्रैश हुई. ‘अब जब सुबह से भूखी रह ही गई है तो शेष औपचारिकताएं भी निभा ही ले,’ सोच कपड़े बदल कर वह बाहर आ गई. उसे देख सास ने मुंह बिचका लिया, एक दिन भी ठीक से तैयार नहीं हो सकती?’’

‘‘कुछ अच्छा सा पहन लेती,’’ वरुण उस का मूड ठीक देख कर बोला.

‘‘ठीक मतलब? अच्छा ही तो पहना है वरुण. अभी औफिस से थक कर आई हूं. सुबह भी तुम्हारी जिद्द से कार्टून बन कर गई थी… मुझे नहीं पसंद यह चमकदमक… क्या यही पहन कर बताना पड़ेगा कि मैं तुम से प्यार करती हूं.’’ शुभांगी का मूड फिर उखड़ने लगा.

तभी बच्चे भागते आ गए, ‘‘मम्मी, चांद निकल गया… चांद निकल गया…’’

शुभांगी ने अपनी थाली उठाई और सब छत पर चले गए. वरुण अपनी आरती उतरवाते ऐसे खुश हो रहा था जैसे बस आज ही भांवरें पड़ने वाली हों.

मानव की पत्नी श्यामली व शुभांगी का पति वरुण दोनों परले दर्जे के दकियानूसी, रीतिरिवाजों के प्रति कट्टर, व्रतउपवास, कर्मकांड को मानने वाले और मानव व शुभांगी ठीक उस के विपरीत. मानव जितना श्यामली को बदलने की कोशिश करता, श्यामली उसे उतना ही संस्कृति व परंपरा का पाठ पढ़ाती. उधर शुभांगी यदि वरुण को कुछ समझाने की कोशिश करती तो दोनों मांबेटा अपनी इस कुसंस्कारी बहू व बीवी के लिए अपने को कोसते.

फलस्वरूप शुभांगी व मानव को अपनेअपने घर में न चाहते हुए भी सुखशांति व मानमर्यादा के लिए कई बातों में अपनेअपने जीवनसाथियों का साथ देना पड़ता. वे दोनों जो कुछ अपने घर में बेमन से करते, औफिस में एकदूसरे को बहुत मन से बताते और बता कर अपने मन की भड़ास निकालते. वे एकदूसरे के करीब आते जा रहे हैं, यह समझते हुए भी वे समझना नहीं चाह रहे थे.

समान विचारधारा और एकदूसरे से अपने दिल की बात करने की स्वतंत्रता होने का भरोसा उन्हें एकदूसरे के मन में गहरे बैठा रहा था. अब दोनों का काफी समय साथ बीतने लगा था. दोनों ने अपनेअपने घर में शिकायतें करना लगभग बंद कर दिया. उन की मानसिक, भावनात्मक, वैचारिक जरूरतें पूरी हो रही थीं. उधर दोनों के साथी समझ रहे थे कि उन्होंने दोनों को सुधार दिया.

श्यामली मानव में आए परिवर्तन को लक्ष्य ही नहीं कर पा रही थी. मानव अब उस की बात मान कर आराम से जान छुड़ा लेता. वह पारंपरिक भारतीय स्त्री की तरह अपनी मान्यताओं व विश्वासों में उलझी सालभर में आने वाले अपने तमाम रिचुअल्स में डूबी रहती और मानव के लिए यह और भी अच्छा हो गया था कि श्यामली अपनेआप में मस्त रहे और उस से अधिक पूछताछ न करे. उसे भी वह जो कुछ करने को कहती, वह चुपचाप कर देता था.

यही हाल कमोवश वरुण का भी था. उस ने भी यह सोचने की जहमत नहीं उठाई कि हर व्रतउपवास, पूजापाठ पर उखड़ने वाली शुभांगी इतनी सरलता से हर बात कैसे मानने लगी है. इसे वह अपनी जीत समझने में लगा था. शुभांगी उस के मन का कर के, उसे उस की खुशियों के साथ छोड़ कर अपनी खुशी के साथ मस्त थी.

शुभांगी और मानव का अब यह हाल हो गया था कि वे अब एकदूसरे के बिना रह ही नहीं पा रहे थे. औफिस के बाद भी अकसर दोनों मिलना चाहते. इस के लिए दोनों ने अच्छा हल यह निकाला कि दोनों परिवारों की मित्रता करा दी जाए और इस तरह एकदूसरे के घर में उन का आनाजाना शुरू हो गया. श्यामली और वरुण जहां हमेशा अपनी सात्विक चर्चा में लीन रहते, मानव व शुभांगी की नजरें उन से बच कर अपने जादुई संसार की संरचना को अलग ही आकार देती रहतीं.

मगर शुभांगी व मानव के बीच क्या पक रहा है और कितना पक गया है, इस से वे दोनों अनजान थे. उन के अब लगभग सभी तीजत्योहार, व्रतउपवास, साथ ही मनने लगे थे. एकदूसरे का साथ मिल जाने के कारण शुभांगी व मानव को भी अब ऐसे अवसरों का बेसब्री से इंतजार रहता. कहा जाता है कि इश्क व जंग में सब जायज है पर जब पानी सिर से गुजरने लगता है तो कहा यह भी जाता है कि ‘इश्क व मुश्क छिपाए नहीं छिपता.’

गरबा 2022: स्मार्ट कुकिंग के 9 टिप्स

वर्किंग वूमन के लिए घर और औफिस दोनों को एकसाथ संभालना किसी चुनौती से कम नहीं. उन्हें दोनों जगह अपना शत प्रतिशत देने के लिए जल्दबाजी में कभी अपनी सेहत से खिलवाड़ करना पड़ता है तो कभी स्वाद को दरकिनार करना पड़ता है, क्योंकि उन के लिए कम समय में हैल्दी और टेस्टी डिश बनाना आसान नहीं होता. उन की इस उलझन को सुलझाने के लिए और उन के कुकिंग स्टाइल को ईजी बनाने के लिए कुकरी ऐक्सपर्ट एवं शैफ पल्लवी निगम सहाय ने कुछ स्मार्ट टिप्स दिए.

1. वीकली मील प्लान बनाएं

अगर आप भी डाइनिंग टेबल पर परिवार के साथ हर सुबह इत्मिनान से चाय की चुसकियों का मजा लेना चाहती हैं तो कल क्या बनाऊं की सोच में सारी रात गुजारने के बजाय रविवार की शाम को ही वीकली मील प्लान बना लें. इस लिस्ट में सोमवार से ले कर रविवार तक के ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर में क्या बनाएंगी, यह तय कर के लिख लें और फिर उसी हिसाब से, उसी क्रम में रोजाना ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर बनाएं. इस से आप का काफी समय बचेगा और आप आज क्या बनाऊं, यह सोचने के झंझट से भी मुक्त हो जाएंगी.

2. वीकैंड में करें शौपिंग

एक बार आप का वीकली मील प्लान तैयार हो जाए तो फिर उसी के अनुसार वीकैंड में एक बार शौपिंग के लिए निकल जाएं. शौपिंग के दौरान सोमवार से ले कर रविवार तक के लंच और डिनर में बनने वाली सब्जियां ला कर फ्रिज में स्टोर कर दें. इसी तरह अगर आप ब्रेकफास्ट में ओट्स, पोहा, उपमा, सैंडविच जैसी आइटम्स बनाने वाली हैं तो ग्रोसरी की शौप से सारी सामग्री की खरीदारी कर के स्टोर कर लें. इस से आप को रोज सब्जी के लिए बाजार जाने की जरूरत नहीं होगी और न ही ग्रोसरी शौप के चक्कर लगाने होंगे, साथ ही समय की भी बचत होगी.

3. वीकैंड में यों करें तैयारी

अगर आप रोजाना खाना बनाते वक्त इस्तेमाल होने वाली चीजों को रैडी टू कुक कंडीशन में तैयार कर लेती हैं तब भी आप अपना कीमती समय बचा सकती हैं, जैसे

– प्याजलहसुन का प्रयोग सब तरह के पकवान बनाने में किया जाता है. ऐसे में रोजरोज प्याजलहसुन छीलने के बजाय सप्ताह भर के लिए एक ही दिन में छील कर रख लें.

– आप चाहें तो अदरक और लहसुन का पेस्ट भी बना कर रख सकती हैं. इस से आप का काफी काम आसान हो जाएगा.

– अगर हरीमिर्च का पेस्ट भी रैडी कर के रख लेती हैं, तो इस से रोजाना आप को मिर्च काटने की जरूरत नहीं होगी.

– टमाटर, लहसुन, अदरक, पुदीनापत्ती और धनियापत्ती की चटनी पीस कर एअरटाइट कंटेनर में रख दें. इस का इस्तेमाल सप्ताह भर सैंडविच, रैप्स, परांठों आदि के साथ करें.

– अगर आप पेस्टो सौस बना कर किसी एअरटाइट कंटेनर में रख लेती हैं तो सप्ताह भर उस का इस्तेमाल स्नैक्स के साथ बतौर डिप्स, सलाद के ऊपर ड्रैसिंग की तरह और रैप्स, सैंडविच में चटनी की तरह कर सकती हैं.

– आप चाहें तो पास्ता, आलू, नूडल्स, मटर, चना जैसी चीजों को उबाल कर भी रख सकती हैं. इस से उन्हें बनाने में ज्यादा देर नहीं लगेगी.

4. कुकिंग के बजाय बेकिंग

कम समय में अपना काम जल्दी निबटाने के लिए कुकिंग के बजाय ओवन या माइक्रोवेव में बेकिंग भी कर सकती हैं जैसे चिकन, फूलगोभी, मटर, पनीर, मिक्स वैजिटेबल को बेक कर के आप इन से कोई भी रैसिपी आसानी से बना सकती हैं. बेकिंग के लिए आप को बस टाइम सैट कर के सामग्री को ओवन या माइक्रोवेव में रखना होगा. न तो खड़े रह कर उस की निगरानी करनी होगी और न ही उस के जलने का डर होगा. इतना ही नहीं, उतनी देर में आप अपना दूसरा काम भी निबटा लेंगी.

5. बनाएं ड्राई स्नैक्स

शाम में चाय की चुसकियों के साथ खाने के लिए बाजार से स्नैक्स खरीदने या औफिस से आ कर घर पर कुछ बनाने के चक्कर में न पड़ें. वीकैंड में या फिर छुट्टी के दिन सप्ताह भर के ड्राई स्नैक्स बना कर एअरटाइट कंटेनर में रख लें जैसे थेपला, चिड़वा, नमकीन, कुकीज आदि.

6. बनाएं हैल्दी ड्रिंक्स

बच्चों के स्कूल, पति और खुद के औफिस से आने के बाद चाय या कौफी बनाने के बजाय वीकैंड में कुछ हैल्दी ड्रिंक्स बना कर फ्रिज में स्टोर कर लें. जैसे लस्सी, पीनट बटर स्मूदी, छाछ, लैमन हनी कूलर, नीबू पानी आदि. इसी तरह फ्रैश फ्रूट्स का जूस निकाल कर भी स्टोर कर सकती हैं. यह सेहत के लिए भी फायदेमंद होगा.

7. टेस्टी भी हैल्दी भी

टेस्ट के साथसाथ अपनी और परिवार की हैल्थ का भी खयाल रखें. ऐसे में जंक फूड के बजाय हैल्दी फूड बनाएं. सैंडविच के लिए मेयोनीज का इस्तेमाल करने के  बजाय दही, प्रोसैस्ड चीज की जगह पनीर, घी की जगह हलका सा तेल यूज करें ताकि स्वाद के साथ सेहत भी बनी रहे. वीकैंड पर रोटी पिज्जा बनाएं. इस के लिए रोटी पर सब्जी फैलाएं और उस के ऊपर चीज स्प्रैड कर हलका सा गरम करें. फिर पिज्जे की तरह काट कर गरमगरम रोटी पिज्जा सर्व करें.

8. मदद लेने में झिझकें नहीं

ऐसा नहीं है कि आप गृहिणी हैं, इसलिए खाना बनाने का सारा काम आप को ही करना है. आप इस काम में घर के बाकी सदस्यों की भी मदद ले सकती हैं. जैसे रोटी आप खुद बेल कर सेंकें, लेकिन आटा गूंधने के लिए किसी की मदद ले लें. इसी तरह सब्जी खुद छौंकें, लेकिन सब्जी किसी और से कटवा लें. इसी तरह बाकी कामों में भी मदद ले कर आप किचन का काम आधे घंटे में पूरा कर सकती हैं. इसी बहाने परिवार के सदस्यों के साथ थोड़ी गपशप भी हो जाएगी.

9. किचन गैजेट्स

बाजार में उपलब्ध स्मार्ट किचन गैजेट्स जैसे फ्रूटवैजिटेबल पीलर, वैजिटेबर कटर, वैजिटेबल चौपर, ग्रेटर, जूसर, टोस्टर, कौफी मेकर आदि खरीद लें. इन की मदद से आप का काम भी आसान हो जाएगा.

मीत मेरे- भाग 3

धड़कते दिल के साथ नेहा हैरी के म्यूजिक स्कूल पहुंची. गौरव उसे पहुंचा कर चला गया. स्कूल की भव्य इमारत देख कर यह सहज ही अनुमान हो गया कि स्कूल बहुत अच्छा चल रहा है. हैरी के रूम में पहुंची नेहा का हैरी ने खड़े हो कर स्वागत किया. नेहा से हाथ मिलाते हुए हैरी का चेहरा चमक रहा था, ‘‘वेलकम. इट्स ए प्लेजर टु हैव यू विद अस.’’

‘‘थैंक्स,’’ कहती नेहा ने अपना हाथ खींच लिया.

‘‘ओह,’’ हैरी को जैसे अपनी भूल ज्ञात हो गई.

नेहा का अन्य अमेरिकी टीचरों से परिचय कराते हुए हैरी ने गर्व से कहा, ‘‘अब हम म्यूजिक के माध्यम से इंडियन कम्युनिटी के और ज्यादा नजदीक आ सकेंगे.’’

पास खड़ी नेहा से उस ने कहा, ‘‘हमारे पास आलरेडी 10 ऐप्लिकेशंस आ चुकी हैं.

1 घंटे बाद तुम्हारे स्टूडेंट्स आने वाले हैं. आर यू रेडी टु स्टार्ट योर क्लास?’’

‘‘जी,’’ नेहा के चेहरे पर हलकी मुसकान थी.

नेहा की म्यूजिक क्लास में 7 लड़कियां और 3 लड़के थे. सब के नाम पूछ कर नेहा ने समझाया, ‘‘मुझे खुशी है कि तुम सब को इंडियन म्यूजिक अच्छा लगता है. अगर तुम मन लगा कर अभ्यास करोगे तो जल्दी ही हिंदी गीत गा सकोगे.’’

‘‘मैम, असल में मुझे तो आप के म्यूजिक में कोई इंटरैस्ट नहीं है, पर मौम कहती हैं, इसलिए आना पड़ा,’’ एक लड़की ने कुछ उद्दंडता से कहा.

उस के सपाट जवाब से एक पल को नेहा चौंक सी गई, फिर उसे याद आया, वह भी तो नई टीचर को ऐसे ही परेशान करती थी. नहीं, उसे हार नहीं माननी है.

उस ने प्यार से कहा, ‘‘मुझे इंडियन और वैस्टर्न म्यूजिक दोनों अच्छे लगते हैं. दोनों में मिठास होती है. देखो, उस में डो रे मी फा सो ला… की सरगम है तो इंडियन म्यूजिक की सरगम में सा रे गा मा पा… है. अगर हिंदुस्तानी संगीत नहीं सीख पाओगी तो मैं तुम्हें वैस्टर्न संगीत की क्लास में खुद भेज दूंगी, पर कोशिश कर के देखो, तुम्हारा गला बहुत मधुर है. तुम इंडियन म्यूजिक सीख कर अच्छी गायिका बन सकती हो.’’

‘‘सच मैम, तब तो मैं जरूर ट्राई करूंगी.’’

अचानक एक लड़की ने कहा, ‘‘मैम, आप जींस क्यों नहीं पहनतीं? यू.एस.ए. में वर्क पर जाने के लिए प्रौपर ड्रैस पहननी होती है.’’

‘‘तुम्हें मेरी साड़ी अच्छी नहीं लगती? देखो, इस में कितने सुंदर रंगों वाला डिजाइन बना है. साड़ी हमारी इंडिया की ड्रैस है.’’

‘‘आई लाइक योर ड्रैस,’’ एक लड़के ने प्रशंसा में कहा.

‘‘थैंक यू. कल मैं सलवारसूट पहन कर आऊंगी. वह ड्रैस जींस से मिलती है. हमारे देश में अलगअलग जगहों का अलगअलग पहनावा होता है. चलो, बहुत बातें हो गईं, अब काम की बातें करें. आज हम सरगम से शुरू करते हैं.’’

नेहा ने अपनी मीठी आवाज में सरगम शुरू की तो सब मंत्रमुग्ध रह गए. सरगम दोहराते वे संकुचित थे, पर नेहा के प्रोत्साहन पर उन्होंने प्रयास शुरू किया. थोड़ी देर में माहौल बदल गया, सब सरगम दोहराते खुश थे.

क्लास के बाद नेहा को विदा करते हुए हैरी ने कहा, ‘‘इतनी मीठी आवाज के साथ इंडियन ब्यूटी तुम में साकार है, नेहा. आई कैन से गौरव इज ए लकी चैप.’’

हैरी की बात पर नेहा सोच में पड़ गई, क्या गौरव भी ऐसा ही महसूस करता है? शादी के बाद से आज तक उस ने कभी नेहा के संगीत या रूप की प्रशंसा में शायद ही कभी कुछ कहा हो. उस की उदासीनता को नेहा ने उस का स्वभाव मान अपने मन को समझा लिया था.

घर आई नेहा बेहद उत्साहित थी. उस ने गौरव से कहा, ‘‘संगीत सिखाना उतना कठिन नहीं जितना मैं सोच रही थी, गौरव. स्टूडेंट्स अगर रुचि लेने लगें तो काम और भी आसान हो जाएगा.’’

‘‘चलो, तुम्हारा शौक पूरा हो गया. तुम्हें मुझ से शिकायत थी, मैं ने कभी तुम्हारे संगीत ज्ञान को जानने की कोशिश नहीं की. सच कहूं तो संगीत से मेरा कोई लगाव नहीं है. चलो, बधाई,’’ होंठ भींच, गौरव ने बधाई दी.

नेहा को एक कड़वा सच याद हो आया, शादी के बाद दबी फुसफुसाहटों ने उसे जता दिया था, गौरव के साथ उस की शादी उस के घर से आए भारी दहेज के कारण हुई थी, वरना उस का मन तो कहीं और बंधा था. गौरव उस लड़की की गायकी पर फिदा था, पर उस लड़की की गरीबी के कारण गौरव के माता पिता ने संबंध स्वीकार नहीं किया. अपनी 3 अनब्याही बहनों के विवाह की समस्या ने गौरव को नेहा से विवाह करने को विवश कर दिया. उस के रिटायर्ड पिता कैसे बेटियों के विवाह निबटाते?

विवाह की पहली रात नेहा ने जानना चाहा था, ‘‘सुना है, आप किसी और को चाहते थे?’’

‘‘एक बात याद रखो, मेरे अतीत को कुरेदने की कोशिश न करने में ही सुख है. मुझे भी तुम्हारे अतीत से कुछ लेनादेना नहीं है. जिंदगी शांति से काटना चाहता हूं, बस. तुम से इतने सहयोग की उम्मीद रखता हूं, इसी में हमारी भलाई है. अगर तुम ऐसा न कर सकीं तो अशांति के लिए तुम जिम्मेदार होगी. तुम पढ़ीलिखी, समझदार लड़की हो, निर्णय तुम्हारे हाथ में है.’’

नेहा चुप रह गई, पर विवाह के बाद एक प्रेमी पति पाने के उस के सपने चूरचूर हो गए. नेहा के मीठे गीतों ने सब की प्रशंसा पाई, पर गौरव उदासीन ही रहा. नेहा के प्रति पति का कर्तव्य गौरव उसी तटस्थता से निभाता रहा.

नेहा ने उस की उदासीनता को अपनी नियति मान कर जीवन जीना शुरू किया था. अचानक अमेरिका से मिले नौकरी के प्रस्ताव ने नेहा को उत्साहित कर दिया. नए परिवेश में शायद पुरानी यादें धूमिल हो जाएं और वह गौरव को पूरी तरह से पा सके.

अमेरिका में नए काम के उत्साह के साथ अच्छा वेतन मिलने से गौरव भी सामान्य हो चला था, पर अचानक जौब चली जाने से गौरव फिर उदास हो गया था.

नेहा के विचार में उन की उस परेशानी में नेहा को जौब मिलना एक वरदान ही था. गौरव की कुंठा वह समझ रही थी, पर उस का सोचना था, शांत रह कर अच्छे समय की प्रतीक्षा करने में ही समझदारी है.

दूसरे दिन स्कूल पहुंची नेहा को रोक कर हैरी ने कहा, ‘‘तुम्हारी क्लास में एक नया स्टूडेंट आना चाहता है, एडमिट करोगी?’’ परिहास हैरी के चेहरे पर स्पष्ट था.

‘‘यह तुम्हारा स्कूल है, तुम्हें डिसाइड करना है,’’ नेहा ने कहा.

‘‘तुम्हारा नया स्टूडेंट मैं हूं, नेहा. मैं ने इंडियन म्यूजिक हमेशा सीखना चाहा, पर कोई गुरु नहीं मिला. मुझे सिखाओगी? विश्वास रखो, मैं एक अच्छा स्टूडेंट साबित होऊंगा.’’

‘‘बच्चों के साथ तुम सीख सकोगे, हैरी? वे हंसेंगे नहीं?’’

‘‘नहीं, मेरी क्लास लेने के लिए तुम्हें अपने समय से 1 घंटा पहले आना होगा. स्कूल के समय तो मैं अपनी गिटार क्लासेस लेता हूं. मेरी क्लास के लिए तुम्हें अलग से ऐक्स्ट्रा पैसे मिलेंगे. वैसे कोई जबरदस्ती नहीं है, तुम मेरी रिक्वैस्ट पर सोच लो.’’

‘‘ठीक है, मैं जल्दी आ सकती हूं. अच्छा स्टूडेंट भी मुश्किल से मिलता है, हैरी, पर क्या तुम सचमुच सीरियस हो?’’

‘‘इस में तुम्हें शक क्यों है, नेहा? मेरे पास भीमसेन जोशी और जगजीत सिंह की सीडीज हैं. कभी फुरसत में हम दोनों साथसाथ उन गीतों और गजलों का आनंद लेंगे.’’

‘‘सच? मेरे पास भी कुछ अच्छे म्यूजीशियंस की सीडीज हैं, तुम्हें दूंगी. मैं नहीं जानती थी, तुम्हें इंडियन म्यूजिक से प्यार है.’’

‘‘मेरे ग्रैंड फादर इंडिया में काफी टाइम तक रहे थे. उन से इंडिया की बहुत तारीफ सुनी थी. वे इंडिया को दिल से चाहते थे. उन के पास इंडियन गीतों के रेकार्ड थे. मुझे भी वे गीत बहुत अच्छे लगते थे. तब से इंडियन म्यूजिक सीखना चाहता था.’’

‘‘तुम जैसे संगीतप्रेमी को संगीत सिखाने में मुझे खुशी होगी, हैरी.’’

‘‘थैंक्स, नेहा. मैं कल अपनी नई क्लास का वेट करूंगा.’’

हैरी को संगीत सिखाना आसान था, उसे स्वर का ज्ञान था, पर हिंदी का उच्चारण ठीक कराती नेहा अकसर हंस पड़ती. बच्चों जैसा भोला मुंह बना हैरी ‘सौरी’ कह क्षमा मांग लेता. कभीकभी गीत गाती नेहा को हैरी मुग्ध देखता रह जाता और गीत की पंक्ति भूल जाता. नेहा नाराज होती, ‘‘तुम ध्यान से क्यों नहीं सुनते, हैरी?’’

‘‘एक्सक्यूज मी. असल में तुम्हारा चेहरा जैसे खुद गीत बन गया था, मैं भूल गया कि तुम गा रही हो, बस, और कुछ याद नहीं रहा,’’ हैरी ने सचाई से कहा.

‘‘गीत में जो भाव होते हैं वे चेहरे पर तो आ ही सकते हैं, पर इस का मतलब यह नहीं कि तुम गीत की जगह चेहरा देखो.’’

सचाई यह थी कि हैरी की उस बात ने नेहा को गुदगुदा दिया. ऐसी बात सुनने का उसे अभ्यास नहीं था.

‘‘ओ.के., टीचरजी, अब मिस्टेक नहीं होगी.’’

दोनों की सम्मिलित हंसी से संगीत कक्ष गूंज उठा. अकसर नेहा की क्लास में हैरी अपने गिटार के साथ आ जाता और स्टूडेंट्स के गीतों के साथ अपना गिटार बजा, उन की खुशी बढ़ा देता. नेहा का समय अच्छा बीत रहा था. हैरी की बातें और उस का गिटार नेहा को अच्छा लगता. स्कूल में नेहा अपने घर की समस्याएं भूल जाती, लगता मानो वक्त पंख लगा कर उड़ जाता. घर में गौरव की मायूसी उसे उदास कर देती. काश, गौरव को कोई जौब मिल जाती.

हर ओर से मायूस गौरव ने एक छोटी सी स्टार्टअप कंपनी में सहायक मार्केटिंग मैनेजर की जौब कर ली. कंपनी को अपने काम को बढ़ाने के लिए अमेरिका के कई शहरों में सैंटर्स खोलने थे. पहले तो वह उन केंद्रों में दौरे पर जाया करता था, पर एक नया सैंटर खोलने के लिए उसे 2 महीनों के लिए अपने शहर से बहुत दूर जाने के आदेश मिले. गौरव परेशान हो उठा, पर नेहा ने समझाया, ‘‘परेशान क्यों होते हो, हो सकता है तुम्हारे अच्छे काम से खुश हो कर तुम्हें इसी कंपनी में प्रमोशन मिल जाए. तुम्हें सफलता जरूर मिलेगी.’’

‘‘तुम अकेली कैसे मैनेज करोगी?’’

‘‘क्यों, यहां इंडिया से न जाने कितनी लड़कियां अकेले पढ़ने या जौब के लिए आती हैं. मेरे पास तो एक जौब भी है यानी मैं एक वर्किंग वुमन हूं, जनाब. मेरी मदद के लिए यहां मंगला और हैरी भी तो हैं,’’ नेहा ने मजाक कर गौरव को हंसाना चाहा.

‘‘फिर भी अचानक मुश्किल के समय 911 काल करना मत भूलना. फोन पाते ही पुलिस तुरंत मदद के लिए आ जाती है.’’

‘‘जानती हूं, गौरव. तुम मेरी चिंता छोड़, अपनी पैकिंग कर डालो. मैं मदद करती हूं.’’ गौरव को विदा करती नेहा ने कब सोचा था कि उस के जाते ही सचमुच मुश्किल आ जाएगी. सीढ़ी से उतरती नेहा का अचानक पांव फिसल गया. पांव में इतना जबरदस्त दर्द था कि एक कदम चलना असंभव लग रहा था. मंगला अपने काम पर जा चुकी थी. किसी तरह अपने को घसीट नेहा कमरे में पहुंच सकी. फोन मिलते ही हैरी पहुंच गया.

हास्पिटल में एक्सरे से पता लगा, एड़ी के पास हड्डी चटक गई थी. नेहा के पैर पर प्लास्टर लगा दिया गया, चलनेफिरने के लिए बैसाखी का सहारा लेना जरूरी हो गया.

‘‘मैं अब स्कूल नहीं आ सकूंगी, हैरी. सोचती हूं, गौरव को खबर कर दूं.’’

‘‘बिलकुल नहीं, पहली बात तो तुम्हारी छुट्टी ग्रांट नहीं करूंगा. यह अमेरिका है, मैडम. यहां पूरी तरह से इन्वैलिड लोग भी काम करते हैं. इतनी मामूली तकलीफ के लिए स्कूल सफर नहीं कर सकता. दूसरी बात, गौरव को इन्फार्म नहीं करना है. अभी उस ने नई जौब ली है, पहले असाइन्मैंट पर गया है, उस का छुट्टी लेना क्या ठीक होगा?’’ हैरी ने समझाने के अंदाज में कहा.

‘‘तुम्हीं बताओ, मैं कैसे मैनेज करूंगी?’’ नेहा की बड़ीबड़ी आंखों में आंसू आ गए.

‘‘मुझ पर यकीन नहीं है, नेहा? मैं तुम्हारे साथ हूं. तुम्हें संभालना मेरी रिसपौंसिबिलिटी है,’’ प्यार से नेहा के आंसू पोंछ, हैरी ने कहा.

‘‘नहीं, तुम्हें अपना घर और स्कूल दोनों देखने हैं. एलिजाबेथ को तुम्हारा टाइम चाहिए. मैं तुम्हें तकलीफ नहीं दे सकती, हैरी.’’

‘‘ओह, मैं बताना ही भूल गया, एलिजाबेथ अपनी बेटी के साथ समर कैंप के लिए 1 महीने के लिए कनाडा गई है. तुम्हारी सेवा के लिए मैं पूरी तरह फ्री हूं. ऐनी अदर प्रौब्लम?’’ हैरी हंस रहा था. हैरी की बात पर नेहा अपना दर्द भूल कर हंस पड़ी.

‘‘यह हुई न बात, इसी बात पर कौफी बनाता हूं. हां, लंच में क्या लोगी, मुझे इंडियन कुकिंग नहीं आती. मेरी कुकिंग तुम्हें पसंद नहीं आएगी,’’ हैरी परेशान था.

‘‘अभी तो फ्रिज में काफी खाना रखा है. वैसे अब यहां इंडियन स्टोर्स में भी पकापकाया खाने का सारा सामान पैक्ड मिलता है. तरहतरह की तैयार सब्जियों के साथ बढि़या नान, रोटी, परांठे, चाट सब कुछ मिलता है. तुम ने सेवा का फैसला किया है तो लिस्ट दे दूंगी, सामान लाना होगा. वैसे भी मेरे हाथ सहीसलामत हैं, आराम से चेयर पर बैठ कर खाना बना सकती हूं और तुम्हें खिला भी सकती हूं,’’ नेहा भी मजाक कर बैठी.

‘‘इंपौसिबिल, इस हाल में तुम कोई काम नहीं करोगी. आई एम ऐट योर सर्विस मैम,’’ हैरी ने झुक कर आदाब किया.

नेहा के साथ कौफी पी कर हैरी ने नेहा के साथ लंच भी लिया. दूसरे दिन अपने साथ स्कूल ले जाने को कह, हैरी ने विदा ली. बैसाखी के साथ दरवाजे तक आई नेहा को देख मंगला चौंक गई. वह अपनी 1 बजे तक की ड्यूटी कर के वापस आई थी.

‘‘रामा रामा, यह क्या होने का, नेहा, कैसे हुआ?’’

नेहा से पूरी बात सुन कर मंगला बोली, ‘‘तुम फिक्कर नहीं करने का. हम काम से छुट्टी लेने का. इधर गौरवजी भी नहीं, हम तुम को हैल्प करेगा, नेहा.’’

‘‘थैंक्यू, मंगला बहन. अमेरिका में काम से बेकार छुट्टी लेना ठीक नहीं, मैं भी तो काम पर जाऊंगी. अगर जरूरत हुई तो मैं आप की हैल्प जरूर लूंगी.’’

‘‘ठीक है, पर तुम को खाना नहीं बनाने का, हम खाना देगा.’’

‘‘अभी फ्रिज में खाने का बहुत सामान है, संडे को अगर आप का इडली बनाने का प्रोग्राम हुआ तो जरूर दीजिएगा. आप जैसी इडली कोई नहीं बना सकता.’’

‘‘जरूर बनाएगा. उधर होटल में भी सब ऐसा ही कहता है,’’ मंगला खुश हो गई.

दूसरी सुबह नेहा स्कूल जाने को तैयार थी. हैरी ठीक कहता है, जहां तक हो सके तकलीफ में भी काम करने की हिम्मत रखनी चाहिए. खुद नेहा ने यहां ऐसे व्यक्तियों को काम करते देखा है, जिन के हाथपांव बेकार हैं, पर व्हीलचेयर और अन्य इलैक्ट्रोनिक उपकरणों की सहायता से सामान्य व्यक्तियों की तरह काम करते हैं.

इस देश में विकलांगता अभिशाप नहीं है. विकलांगों पर सरकार की ओर से हर संभव सुविधा और सहायता उपलब्ध कराई जाती है. ठीक समय पर हैरी की कार की आवाज ने नेहा के विचारों की शृंखला तोड़ दी. हैरी के सहारे नेहा आसानी से सीढि़यां उतर कर कार में बैठ गई.

अब हैरी का रोज का नियम हो गया, सुबह नेहा को स्कूल ले जाता और शाम को उस के साथ कौफी पीता. कभीकभी नेहा के अनुरोध पर डिनर भी लेना पड़ता. कोई अच्छी सी गजल या गीत सुनते हुए दोनों को साथ समय बिताते अच्छा लगता. कभीकभी हैरी अपने हाथों से कुकिंग कर के नेहा को चमत्कृत कर देता.

‘‘वाह, तुम तो बहुत अच्छे कुक हो, हैरी. तुम्हें तो गिटारिस्ट नहीं, किसी होटल का शैफ होना चाहिए,’’ नेहा परिहास करती.

‘‘तब तो इस शैफ को इनाम मिलना चाहिए, नहीं, क्या कहते हैं, बख्शीश दो,’’ नेहा से संगीत सीखने के साथसाथ वह हिंदी बोलना भी सीख रहा था.

‘‘तुम्हें इनाम तो जरूर मिलना चाहिए. तुम्हारी वजह से आज हम यहां रह रहे हैं. गौरव जब भी फोन करता है तुम्हारा हाल पूछता है. तुम्हें थैंक्स देता है.’’

‘‘गौरव का काम कैसा चल रहा है, तुम्हें तो बहुत मिस करता होगा. अगर वह cजान जाए उस की ऐबसेंस में मैं तुम्हारी कंपनी एंजौय कर रहा हूं तो वह शायद काम छोड़ कर वापस आ जाए. ऐसी वाइफ को छोड़ कर दूर रहना पौसिबिल नहीं होता,’’ हैरी की मुग्ध दृष्टि अपने पर गड़ी पा कर नेहा संकुचित हो गई.

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. गौरव बहुत प्रैक्टिकल इनसान हैं, भावुक तो शायद मैं

बहुत हूं. वैसे उस का मन इस नए काम में नहीं लग रहा है. पता नहीं वह इस काम को कंटीन्यू करेगा या नहीं?’’ नेहा ने अपना भय प्रकट किया.

‘‘इस इकोनोमिक क्राइसिस के समय जौब छोड़ना मिस्टेक होगी. आई होप वह ऐसा न करे,’’ हैरी ने सलाह दी.

‘‘मैं उस तक तुम्हारी सलाह पहुंचा दूंगी. तुम ने हमारी बहुत मदद की है, हैरी.’’

‘‘चलो, इस टौपिक को यहीं छोड़ते हैं, आज एक प्रेम गीत सुनने का मन चाह रहा है. देखो, मैं इसलिए अपना गिटार भी लाया हूं. मेरा गिटार तुम्हारे गीत का साथ देगा.’’

‘‘प्रेम गीत? क्या एलिजाबेथ की याद आ रही है?’’ नेहा के चेहरे पर शरारत थी.

‘‘जरूरी तो नहीं प्रेम गीत के साथ वाइफ की याद आए. प्रेम तो एक ऐसा भाव है, कभी भी जाग जाए. अब प्लीज, गीत गाना शुरू करो, नेहा. इट्स माई रिक्वैस्ट,’’ हैरी गंभीर था.

एक और करवाचौथ- भाग 1

‘‘सुनोआज शाम को जल्दी आ जाना?’’ श्यामली स्वर में मिठास घोल कर औफिस के लिए तैयार होते मानव से बोली.

‘‘क्यों रोज ही तो समय से आता हूं. आज क्या खास बात है?’’

‘‘अरे भूल गए क्या? 1 महीने से बता रही हूं और कल भी याद दिलाया था. आज करवाचौथ है, मेरा व्रत है. शाम को बाहर खाना खाने चलेंगे. यह देखो मेरी मेहंदी भी कितनी खिली है. सब कह रही थीं कि सब से ज्यादा मेहंदी श्यामली की खिली है… इस का पति इसे सब से ज्यादा प्यार करता है. पता है पूजा और नीरा के पति भी उपवास रख रहे हैं. पत्नियों की लंबी उम्र के लिए,’’

मानव झुंझला कर बोला, ‘‘उफ, तुम्हारे इन बकवास उपवासों से किसी की उम्र बढ़ती है क्या? कभी तीजव्रत, कभी वट सावित्री व्रत, कभी करवाचौथ व्रत, जन्माष्टमी, शिवरात्री, नवरात्रे, सावन के सोमवार और भी न जाने क्याक्या… तुम ने पढ़लिख कर भी अपनी आधी जिंदगी भूखे रह कर गुजार दी और मुझ से भी यही उम्मीद करती हो. मुझे नौकरी नहीं करनी है क्या? नाश्ता लगाओ. मुझे देर हो रही है.’’

मानव की झिड़की खा कर श्यामली टूटा दिल लिए नाश्ता लगाने चली गई. नाश्ता कर के मानव औफिस के लिए निकल गया पर श्यामली का मन खिन्न हो गया. आज वह अपने कुछ दोस्तों को घर बुलाने की सोच रहा था पर जब श्यामली ने करवाचौथ की याद दिलाई तो वह मन ही मन चिढ़ गया.

उच्चशिक्षित होने के बावजूद पता नहीं श्यामली इतने रीतिरिवाजों, व्रतउपवासों, पूजापाठ में क्यों डूबी रहती है… वह इन बातों से जितना दूर भागता है श्यामली उतनी ही इन में उलझी रहती है. उस की बातें भी हर समय वैसी ही होती हैं. 10 साल होने वाले हैं उन के विवाह को पर श्यामली के पूरा साल व्रतत्योहार चलते रहते हैं. मानव सोचता, खूब फुरसत है श्यामली को. अगर कहीं नौकरी कर रही होती तो क्या इतनी फुरसत मिल जाती. बच्चों को पढ़ाने के लिए फुरसत मिले न मिले, लेकिन इन सब बातों के लिए उसे खूब फुरसत रहती है.

इसी उधेड़बुन में मानव औफिस पहुंच गया. उस के औफिस में कुछ ही महीने पहले आई उस की सहकर्मी शुभांगी उसे लिफ्ट में ही मिल गईर्. उसे देख कर न जाने क्यों उस का दिल हमेशा बल्लियों उछल जाता. 2 बच्चों की मां शुभांगी आधुनिक खयालों वाली स्मार्ट महिला थी, जो उस के खुद के विचारों के साथ पूरी तरह मेल खाती थी. मगर आज उसे सोलहशृंगार में देख कर वह दुविधा में पड़ गया.

‘‘क्या बात है, आज क्या तुम्हारी शादी की सालगिरह है?’’ मानव ने पूछा.

‘‘नहीं भई, आज तो करवाचौथ है,’’ शिवानी मुसकराते हुए बोली, ‘‘क्यों तुम्हारी पत्नी ने नहीं रखा व्रत?’’

‘‘रखा है पर क्या तुम भी…’’

‘‘अरे भई मैं भी क्या… मेरे घर में सब इतना मानने वाले हैं कि पूछो मत… फिर पति मेरे प्रेम को ही इन्हीं सब बातों से आंकते हैं. इसीलिए मैं भी रख लेती. बेकार का झंझट खड़ा करने का क्या फायदा. मैं भी सजधज लेती हूं. शाम को कोई अच्छा सा गिफ्ट भी मिल जाता है. बुरा क्या है… वह मुसकराई.’’

जवाब में मानव भी मुसकरा दिया. अपने गिफ्ट देने की बात भी याद आ गई. कब खरीदेगा गिफ्ट… लिफाफा ही दे देगा… उफ, ये बीवियां… तभी लिफ्ट का दरवाजा खुल गया और दोनों बाहर निकल गए.

औफिस में दूसरी भी कई महिलाएं कुछ कम या ज्यादा सजधज कर आईं थीं. पति तो आज बलि के बकरे थे. कुछ खुशी से हलाल होने वाले थे, कुछ मजबूरी में… सोच कर मानव मुसकराया और फिर सोच ही सोच में अपनी पौकेट को तोला. एक सूट या साड़ी के पैसे तो निकालने ही पड़ेंगे वरना पड़ोसिनों के सामने श्यामली के पतिप्रेम की व्याख्या फीकी पड़ जाएगी.

लंच पर शुभांगी सामने बैठी थी, ‘‘मुझे तो आज पानी भी नहीं पीना है… शाम तक तो निढाल हो जाऊंगी,’’ मानव को खाते देख उस के पेट में चूहे कूद रहे थे.

‘‘तो चायबिस्कुट खा लो. यह कोई खाना थोड़े ही है,’’ मानव हंसता हुआ बोला, ‘‘वैसे भी मैं तुम्हारे पति को बताने वाला नहीं हूं.’’

शुभांगी ठहाका मार कर हंस पड़ी, ‘‘मेरे पति की उम्र कम हो जाएगी…

और मेरी सास को पता चल गया तो साथ में बिना बात मेरी भी… तुम्हारी पत्नी पीछे से कुछ खा ले तो तुम्हारी भी खैर नहीं.’’

‘‘वहां से कोई खतरा नहीं… जबरदस्ती भी खिला दूं तो उलटी कर देगी… इस जन्म छोड़ने वाली नहीं है मुझे…’’ मानव ने भी ठहाका लगाया.

‘‘और तुम उसे इसी जन्म में नहीं झेल पा रहे हो.’’

‘‘तुम झेल पा रही हो क्या अपने दकियानूसी पति को?’’

‘‘हूं…’’ शुभांगी धीमे से मुसकराई, ‘‘बहुत मुश्किल है. कोईर् भी तीजत्योहार, व्रत, उपवास नहीं छोड़ सकती मैं… मांबेटा जीना दूभर कर देंगे. कैसे समझाऊं कि ये सब ढकोसले हैं.’’

मानव उस दिन घर पहुंचा. रास्ते से एक लिफाफा खरीद कर, मन मार कर उस में रुपए रखे. बेमौसम बजट बिगड़ रहा था. अभी तो डिनर पर भी जाना है पर श्यामली के दिनभर भूखे रहने का मेहनताना तो देना ही था. आज तो घंटी बजाने की भी जरूरत नहीं पड़ी. श्यामली इंतजार में पलकपांवड़े बिछाए दरवाजे पर खड़ी थी.

‘‘कितनी देर कर दी… मैं कब से इंतजार कर रही थी.’’

मानव ने घड़ी देखी, ‘‘देर कहां, रोज वाले टाइम से ही तो आया हूं,’’ कह वह अंदर चला गया.

श्यामली पीछेपीछे आ गई. ‘‘मैं कैसी लग रही हूं?’’

उस ने ध्यान से श्यामली की तरफ देखा. शादी वाली लाल साड़ी, गहने, पूरा मेकअप, हाथों में मेहंदी… लेकिन चेहरे पर भूख व थकान के मारे मुरदनी छाई थी.

‘‘हां, ठीक लग रही हो,’’ वह लापरवाही से बोला.

‘‘बस ठीक लग रही हूं? ब्यूटीपार्लर से मेकअप करवा कर आई हूं… मेहंदी लगवाने में भी इतना खर्च किया… सब कुछ तुम्हारे लिए ही तो… और तुम हो कि…’’ वह रोंआसी हो गई. यह भी एक एहसान था मानव पर.

खर्च की बात सुन कर उस के कान खड़े हो गए. यह खर्चा भी बाकी खर्चे में जोड़ लिया.

‘‘तो किस ने कहा था ये सब करने को… मुझे तो तुम वैसे ही अच्छी लगती हो.’’

यह सुनते ही श्यामली का मूड ठीक हो गया. ‘‘सच?’’ वह पास आ गई.

‘‘हां, पर मुझे भूख लग रही है. चाय बना दो और कुछ खाने को भी दे दो,’’ वह थोड़ा पीछे हटते हुए बोला.

‘‘भूख तो मुझे भी लग रही है. पर यह चांद… अभी तक नही निकला,’’ श्यामली बड़बड़ाई.

‘‘हां, यह तो गलती है चांद की… कम से कम आज के दिन तो जल्दी निकलना चाहिए था…पता नहीं उसे कि पृथ्वी पर महिलाएं आज के दिन ही तो उस की बाट सब से अधिक जोहती है,’’ मानव ने गंभीरता से उस की बात का समर्थन किया.

एक और करवाचौथ- भाग 4

‘‘वापस चलते हैं… अब जो भी होगा देर आयद, दुरुस्त आयद… अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा… एक रात भी बाहर नहीं रहे हैं अभी… बात संभल जाएगी… माफी मांग लेंगे… गलती की है तो सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी…’’ शुभांगी धीरज बंधाती हुई बोली.

‘‘ठीक है, चलो फिर…’’ दोनों ने अपना इरादा मजबूत कर अपनाअपना बैग उठाया और बाहर निकल गए.

उधर पुलिस वाले यह कह कर पलट रहे थे कि आगे की कार्यवाही कल करेंगे. तभी गेट पर एक टैक्सी रुकी, गेट खुला और शुभांगी व मानव अंदर आते दिखाई दिए. सब लोग चिंतित से बाहर ही खड़े थे, उन्हें देख कर सब चौंक गए.

‘‘कहां, चले गए थे तुम लोग?’’ वरुण की मां बोली.

‘‘औफिस के काम से निकले थे आंटीजी…रास्ते में टैक्सी खराब हो गई…दूसरी मिली ही नहीं…इसीलिए इतनी देर हो गई,’’ मानव किसी तरह बात बना कर बोला.

सभी समझ रहे थे कि मानव झूठ बोल रहा है. मानव ने भी इस समय समझबूझ कर पुलिस वाले व सब के सामने बात बनाई थी. पर समय को देखते हुए सब ने उस झूठ को सच ही रहने दिया.

‘‘चलो श्यामली, घर चलें… टैक्सी खड़ी है बाहर…’’ समय व

स्थिति को देखते हुए श्यामली दोनों बच्चों को ले कर गेट की तरफ बढ़ गई. शुभांगी घर के अंदर चली गई और बच्चे उस के पीछेपीछे. पुलिस वाला आंखों में शक लिए बाहर निकलते हुए कह गया, ‘‘कल थाने आ कर आवश्यक कार्यवाही पूरी कर दीजिएगा?’’

शुभांगी लौबी में सिर झुकाए बैठी थी. वरुण की मां ने घृणा से उस की तरफ देखा और अपने कमरे में चली गई. वरुण ने भी दोनों बच्चों का हाथ पकड़ा और बैडरूम की तरफ चला गया.

उधर श्यामली और मानव घर पहुंचे तो श्यामली ने दोनों बच्चों सहित बैडरूम में जा कर दरवाजा बंद कर दिया. मानव ड्राइंगरूम में बैठा रह गया. दोनों घरों में यह करवाचौथ एक सन्नाटा ले कर आईर् थी जिसे दूर करने का तरीका किसी को नहीं सूझ रहा था.

बच्चों को सुला कर श्यामली छत को एकटक घूरे जा रही थी कि क्या फायदा इन व्रतउपवासों का? वह पति की लंबी उम्र की कामना में लगी रही और पति अपनी उम्र किसी दूसरी पर कुरबान करने को तैयार हो गया. अनायास ही उस की आंखों से आंसू बरसने लगे… गलती हो गई उस से. कहां कमी की उस ने मानव के प्रति प्यार में या गृहस्थी संभालने में… फिर यह धोखा क्यों?

यह सही है कि वह कईर् तरह के विश्वासों, रीतिरिवाजों व व्रतउपवासों में उलझी रहती है और मानव को यह सब कभी पसंद नहीं रहा. पर बाकी तो कमी नहीं की उस ने अपना प्यार लुटाने में… पर वैचारिक मतभेद उन्हें एकदूसरे से इतना दूर कर देगा, ऐसा तो उस के खयालों में भी नहीं आया. कई बार कहा भी मानव ने, कभी चिढ़ कर, कभी मजाक उड़ा कर, कभी गंभीरता से. पर वह हमेशा इसे मानव की गलती समझती रही और उसे भी जबरदस्ती वही सब करने, मानने के लिए विवश करती रही. लेकिन हरेक का वैचारिक धरातल अलग होता है. किसी पर जबरदस्ती अपने विचार, अपनी मान्याएं लादना क्या उचित है?

उस ने ये सब मानव की इच्छा के विपरीत तो किया ही, मानव को भी जबरदस्ती इन सब में शरीक होने के लिए बाध्य करती रही पर क्या इस का यह मतलब है कि मानव बीवीबच्चों को छोड़ कर भाग खड़ा हो.

मगर गलती कुछ हुई तो है उस से भी. दिल और भावनाओं के साथसाथ दिमागी व वैचारिक स्तर पर भी प्रतिबद्धता होनी चाहिए. तभी जिंदगी सुगम और सरल बन पाती है. फिर जिस के लिए वह ये सब करती रही, जब इस सब के बावजूद उसीको अपना नहीं पाई तो क्या औचित्य है इन ढकोसलों का.

श्यामली उठी और दरवाजा खोल कर बाहर आ गई. मानव बैठा था. उसे देख कर शर्मिंदगी से मुसकराया. वह किचन में गई. प्लेट में कुछ खाने के लिए डाला और मानव की बगल में आ कर बैठ गई. कुछ पिघली हुई नजरों से मानव की तरफ देखा.

‘‘मुझे माफ कर दो श्यामली,’’ मानव ने दोनों कान पकड़ लिए, ‘‘भविष्य में ऐसी गलती कभी नहीं होगी. वादा करता हूं और यह भी विश्वास दिलाता हूं कि मैं व शुभांगी भावनात्मक स्तर पर भले ही बहक गए थे पर रिश्ता दोस्ती से बाहर नहीं गया कभी.’’

सुन कर श्यामली के चेहरे पर कुछ विराम के से भाव उभरे. उस ने बिना कुछ कहे रोटी का टुकड़ा सब्जी में लपेट कर मानव के मुंह में ठूस दिया. मानव ने श्यामली को खींच कर बांहों में भींच लिया.

‘‘मैं भी पता नहीं किनकिन अजीबोगरीब विश्वासों से घिरी रहती हूं हर वक्त… तुम सही कहते हो, आधा साल तो भूखी रहती हूं… इतना समय किसी सार्थक काम में लगाऊं तो शायद कुछ अच्छा कर सकूं,’’ श्यामली भर्राए कंठ से बोली.

‘‘बस अब कुछ मत कहो,’’ मानव ने उसे और भी जोर से भींच लिया.

उधर शुभांगी भी सिर झुकाए सोफे पर बैठी थी. शर्म के कारण उसे कुछ नहीं सूझ रहा था. अंदर लेटा मानव सोच रहा था कहां गलती हो गई उस से शुभांगी को समझने में? आखिर क्या कारण था कि शुभांगी मानव की तरफ इतनी आकर्षित हो गई? कहीं मां के धार्मिक विचार खुद उस पर इतने अत्यधिक हावी तो नहीं हो गए थे कि जो एक कामकाजी महिला होने के नाते शुभांगी के लिए घुटन पैदा कर रहे हों? वह खुद इन विश्वासों से हर समय भरा रहता था और शुभांगी को भी ये सब मानने के लिए बाध्य करता था वरना रुतबा, खूबसूरती, पैसा, कहीं से भी तो कम नहीं है वह मानव से. अपने विचार हर समय जबरदस्ती शुभांगी पर लाद कर उस ने उस के लिए जीवन दूभर तो नहीं बना दिया था? कुछ गलती तो हुई है उस से भी.

कुछ सोच कर वह उठा और बाहर आ गया. शुभांगी ने उस की तरफ देखा, फिर

गरदन झुका ली. वरुण उस की बगल में बैठ गया. थोड़ी देर उसे चुपचाप निहारता रहा. शुभांगी की आंखें डबडबा गईं.

‘‘कुछ गलती हो गई थी क्या मुझ से शुभांगी या फिर कोई कमी है मुझ में?’’ वह निराश स्वर में बोला.

‘‘मुझे माफ कर दो वरुण… गलती तो मुझ से हो गई… बस इतना विश्वास दिलाती हूं कि शुभांगी पूरी तरह तुम्हारी ही है अभी भी,’’ कहतेकहते वह सिसकने लगी.

‘‘नहीं, गलती शायद मुझ से भी हुई है तुम्हें समझने में. जब विचार टकराते हैं तो इनसान भावनात्मक स्तर पर भी दूर होने लगता है और जब पतिपत्नी दिल से एकदूसरे के पास नहीं हैं तो फिर ये रिचुअल्स तो सब ढकोसले हैं. अब से ऐसा नहीं होगा… वैसे भी मेरे और बच्चों की सलामती के लिए तुम जो इतने व्रतउपवास कर भूखी रहती हो उस से हमारी उम्र को कुछ नहीं होने वाला. जिस की जितनी उम्र है उतनी ही रहेगी. मां को समझाने के बजाय पता नहीं मैं कब इन सब बातों में उलझ गया. पर अब से तुम अपने विचारों व मान्यताओं के साथ स्वतंत्र हो… जो करना चाहती हो करो… मेरी तरफ से कभी कोई दबाव नहीं रहेगा.’’

‘‘सच?’’ शुभांगी उस की तरफ देख कर आश्चर्य से बोली, ‘‘तुम ने मुझे माफ कर दिया वरुण?’’

जवाब में वरुण ने शुभांगी को खींच कर छाती से लगा लिया.

‘‘आज तो मेरी भी करवाचौथ हो गई. पेट खाली है. चूहे कूद रहे हैं… चल कर कुछ खा लें…’’ दोनों भरी आंखों से खिलखिला कर एकदूसरे से लिपट गए.

परदे की ओट से दोनों की बातें सुनती शुभांगी की सास भी विचारमग्न सी कुछ सोचती हुए वापस मुड़ गईं.

शायद वे सोच रही थीं कि उन्हें भी पुरानी सड़ीगली मान्यताएं त्याग कर अब आगे बढ़ जाना चाहिए. व्रत का मतलब भूखा रहना ही नहीं होता. व्रत का मतलब प्रतिज्ञा भी होता है. एक वचनबद्धता होती है एकदूसरे के प्रति. एकदूसरे की कमियों को आत्मसात करने के प्रति, एकदूसरे की खूबियों से प्यार करने के प्रति, हर व्रत पर वचनबद्धता थोड़ी और बढ़ जाए, इस कोशिश के प्रति. जो करवाचौथ इस साल इन चारों के बीच आई. एकदूसरे की गलतियों को माफ कर अपनी गलतियों को समझ उन्हें सुधारने की. इस से बढ़ कर करवाचौथ की सार्थकता भला और क्या हो सकती है?

मैं प्रैग्नेंसी में अकेली हूं, क्या आगे जाकर कोई प्रौब्लम होगी?

सवाल-

मैं एक युवक से (जो सैनिक है) बहुत प्यार करती हूं. हम दोनों ने अपने घर वालों से चोरीछिपे विवाह कर लिया है. हमारी शादी रजिस्टर्ड नहीं है. विवाह के बाद मैं ने अपना घर छोड़ दिया और 5 महीनों से दिल्ली में अकेली रह कर नौकरी कर रही हूं. मैं 2 महीने की गर्भवती हूं. मेरा पति अपनी ड्यूटी पर चला गया है. कहता है कि नवंबर में आ कर मुझे ले जाएगा. मैं चिंतित हूं कि यहां अकेले में मुझे कोई समस्या हुई तो क्या करूंगी? मैं अपने घर भी नहीं जा सकती.

जवाब-

आप ने पूरा खुलासा नहीं किया कि क्या वजह थी कि आप दोनों ने ही अपने घर वालों को विश्वास में लिए बिना चोरीछिपे शादी की. यदि दोनों ही परिवार शादी के खिलाफ थे तो भी आप को कोर्ट मैरिज करनी चाहिए थी अथवा जिस भी विधि से विवाह किया था उस का रजिस्ट्रेशन तो कराना चाहिए था. अब भी समय गंवाए बिना अपनी शादी को रजिस्टर कराएं. जहां तक अपनी गर्भावस्था को ले कर आप की चिंता है वह सही है. जब तक आप अकेली रह रही थीं संतानोत्पत्ति के लिए जल्दी नहीं करनी चाहिए थी. अब भी आप को लगता है कि आप दोनों अभी संतानोत्पत्ति की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार नहीं हैं तो पति की सहमति से गर्भपात करवा लें. बाद में जब स्थिति अनुकूल हो तब इस विषय में सोच सकते हैं.

ये भी पढ़ें- 

गर्भावस्था के दौरान मां की सेहत का तुरंत और लंबे समय में बच्चे की सेहत पर गहरा प्रभाव पड़ता है. गर्भकाल की डायबिटीज और एनीमिया, यानी कि मां में एनीमिया और डायबिटीज बच्चे की सेहत पर बुरा असर डाल सकते हैं. मां में एनीमिया हो तो बच्चे का जन्म के समय 6.5 प्रतिशत मामलों में वजन कम होने और 11.5 प्रतिशत मामलों में समय से पहले प्रसव की समस्या हो सकती है. गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज की वजह से बच्चे को 4.9 प्रतिशत मामलों में एनआईसीयू (नवजात गहन चिकित्सा इकाई) में भरती होने और 32.3 प्रतिशत मामलों में सांस प्रणाली की समस्याएं होने का खतरा रहता है.

गर्भावस्था में इन समस्याओं की वजह से पैदा हुए बच्चों में मोटापे, दिल के विकार और टाइप 2 डायबिटीज होने का खतरा उम्रभर रहता है.

गर्भावस्था के दौरान हाइपरटैंशन, जो कि 20वें सप्ताह में होता है, पर भी ध्यान देने की आवश्यकता होती है. इस से गर्भनाल (एअंबीलिकल कौर्ड) की रक्तधमनियां सख्त हो जाती हैं जिस से भू्रूण तक औक्सीजन और पोषण उचित मात्रा में नहीं पहुंच पाता. इस वजह से गर्भाशय में बच्चे की वृद्धि में रोक, जन्म के समय बच्चे का कम वजन, ब्लडशुगर में कमी और लो मसल टोन जैसी समस्याएं हो सकती हैं. कुछ मामलों में आगे चल कर किशोरावस्था में बच्चे में हाइपरटैंशन की समस्या भी हो सकती है.

मां में मोटापा हो तो गर्भावस्था में डायबिटीज होने की संभावना होती है जिस वजह से समय से पहले प्रसव और बच्चे में डायबिटीज व मोटापा होने के खतरे रहते हैं. गर्भावस्था के दौरान मां के पोषण में मामूली कमी का भी प्रतिकूल असर बच्चे की सेहत पर पड़ सकता है, जैसे कि गर्भावस्था में विटामिन डी की कमी से आगे चल कर जच्चा और बच्चा दोनों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं.

पूरी खबर पढ़ने के लिए- प्रैग्नेंसी में रखें ये सेहतमंद आदतें

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

एक और मित्र- भाग 3: प्रिया की मदद किसने की

वीरा और भाभी के बहुत जोर देने पर वह बाहर आ कर बैठ तो गई पर उस का मन अनमना ही रहा. कानपुर जाने के लिए उन लोगों को अगले दिन का आरक्षण मिला था.

रात में भैया, प्रणव और दिनेश की खानेपीने की विशेष महफिल जम गई. भाभी और वीरा ने मिल कर कई तरह के मांसाहारी व्यंजन बना लिए थे.

‘‘वीरा, मटन चाप तो तुम्हीं बनाओ, तुम्हारे भैया बहुत पसंद करते हैं,’’ भाभी ने हंस कर वीरा से कहा. पर उस समय वे यह नहीं देख पाईं कि वहीं खड़ी प्रिया का मुंह अचानक ही सिकुड़ कर रह गया था.

मन में पलती अपमान की पीड़ा को सिरदर्द का नाम दे कर प्रिया जल्द ही बिस्तर पर आ गई. प्रणव भी 12 बजते- बजते नींद से बोझिल आंखें लिए पलंग पर लेटते ही सो गए. पर बिस्तर पर करवटें बदलते हुए देर तक जागती प्रिया के कानों में कुछ आवाजें रहरह कर आ रही थीं.

प्रणव के आने के बाद वह स्नानघर जाने के लिए कमरे से बाहर निकली ही थी कि खाने के कमरे से आती दिनेश की आवाज सुन कर वह चौंक कर ठिठक गई. वह कह रहा था, ‘‘भैया, आप चिंता मत करिए, कोई न कोई हल शीघ्र ही निकल आएगा.’’

‘‘अरे, मुझ से ज्यादा तो चिंता सुलेखा को है जो दिनरात उसी में घुली जाती है. देखते नहीं इस का चेहरा,’’ यह भैया का स्वर था.

‘‘अरे भाभी, जब तक हम हैं तब तक तुम्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं. हम लोग कोई न कोई रास्ता खोज ही लेंगे,’’ वीरा के स्वर में दिलासा के रंग लबालब छलक रहे थे, जिन्हें महसूस कर के ही शायद भैया ने भरे कंठ से कहा, ‘‘मैं जानता हूं. तुम लोग ही तो हो जिन पर मुझे पूरा भरोसा है.’’

स्नानघर से आते ही अपमान की अग्नि में प्रिया का तनमन सुलग उठा, ‘तो क्या मैं इतनी पराई हूं, दिनेश के सम्मुख भैया अपनी समस्या कह सकते हैं, पर अपनी ही सगी बहन से इतना दुराव? मैं तो भैयाभाभी के घर कोे बिलकुल अपना समझ कर यहां आने को उत्सुक रहती थी. पर क्या मालूम था कि उन का स्नेह और सत्कार केवल दिखावा है. अपनापन तो केवल वीरा के हिस्से में…’

मन आहत हुआ तो आंखों से बरबस ही गंगाजमुना की धार बह निकली और वह उसी पानी में डूब कर कब सो गई, पता ही नहीं चला.

सुबह जब वह सो कर उठी तो वाकई उस का सिर भारी था पर रात के अनुभव की खटास अभी दिल से मिटी नहीं थी. उस ने फैसला कर लिया कि अब वह दिल्ली जल्दी नहीं आएगी. पर रात को वीरा, दिनेश और भैया की बात का अधूरा सिरा अभी भी उस के सीने में फांस की तरह चुभ रहा था. जब सबकुछ असहनीय हो गया तो वह वीरा को ले कर ऊपर चली आई, ‘‘मुझे तुझ से अकेले में कुछ बात करनी है.’’

उस दिन इतवार था. बच्चे टीवी देखने में व्यस्त थे और नाश्ते के बाद प्रणव दिनेश के साथ बाजार चले गए. भैया बैठक में किसी से बातें कर रहे थे और भाभी नहा रही थीं.

‘‘पर ऐसी क्या बात है जो तुम भाभी के सामने…?’’ वीरा ने छत की मुंडेर पर बैठते हुए पूछा तो प्रिया बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘क्यों, बहुत सी बातें क्या ऐसी नहीं हैं जो भाभी मेरे सामने नहीं कहना चाहतीं?’’

‘‘मैं समझी नहीं, तुम कहना क्या चाहती हो?’’ बहन का तल्ख स्वर वीरा को हतप्रभ कर गया.

‘‘देख वीरा, अनजान बनने की कोशिश मत कर. मैं कल से देख रही हूं अपने प्रति सब का बेगाना व्यवहार. और जिसे मैं इतने दिन तक उन का प्यार समझती रही, अब जा कर मालूम हुआ कि वह एक खोखला दिखावा था,’’ प्रिया का स्वर अभी भी कसैला था.

पर वीरा ने अपना स्वर यथासंभव कोमल बना लिया, ‘‘यह तुम कैसे कह सकती हो?’’

‘‘कैसे कह सकती हूं,’’ प्रिया गुस्से से बोली, ‘‘कल से मैं देख नहीं रही कि हर बात में भैयाभाभी का तुझ से मशवरा करना, वह घुटघुट कर बातें करना और भैया की कुछ समस्या…’’ आखिरी शब्दों पर प्रिया हिचकिचा गई तो वीरा व्यंग्य से मुसकरा दी, ‘‘हूं, तो तुम ने सब सुन लिया. चलो, यह भी अच्छा ही हुआ.’’

पर उस ओर बिना ध्यान दिए प्रिया अपनी ही रौ में शिकायत करती जा रही थी, ‘‘देख वीरा, मैं तुझ से बड़ी हूं. फिर 2 बहनों के बीच भैया का यों अंतर रखना क्या अच्छी बात है? और मुझे तुझ से भी ऐसी उम्मीद नहीं थी.’’

बहन के आखिरी लफ्जों पर ध्यान न दे कर वीरा अपने एकएक शब्द पर जोर दे कर बोली, ‘‘पर दीदी, यह अंतर बनाया किस ने? यह तुम ने कभी सोचा?’’

 

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि यह अंतर तुम ने स्वयं अपने हाथों गढ़ा है,’’ वीरा अचानक ही जैसे कू्रर हो उठी.

‘‘मैं ने? पर…’’

‘‘हां, दीदी, तुम ने भैया को सदैव रिश्ते की छड़ी से दबाए रखा. उन के कर्तव्यों की तो हमेशा तुम्हें याद रही पर अपने फर्ज की ओर भूल कर भी नहीं देखा. दीदी, तुम यह भूल गईं कि खून के संबंध जन्म से जरूर अपना महत्त्व और मजबूती लिए होते हैं पर कभीकभी बाद में यही संबंध मात्र बोझ बन कर रह जाते हैं, जिन्हें निभाने की बस एक विवशता होती है. अब समय आ गया है कि इस बोझ को हम जानबूझ कर अपनों के कंधों पर न डालें.’’

‘‘यह तू क्या कह रही है, वीरा? तू कहना चाहती है कि मैं भैया से अपना संबंध…’’ प्रिया का स्वर हैरानी के आरोह को पार कर पाता इस से पहले ही वीरा ने हंस कर उसे पकड़ लिया, ‘‘नहीं, दीदी, भैया से तुम्हारा संबंध अपनी जगह पर है. पर हां, यदि तुम इसी रिश्ते में विवशता की जगह मित्रता का रंग मिला दो तो तुम्हारा संबंध और गहरा हो उठेगा. क्योंकि मित्रता उस पुष्प की भांति है जिस की सुगंध कभी खत्म नहीं होती.

‘‘रिश्ते चुने नहीं जा सकते पर मित्र बनाना हमारे अपने अधिकार में है. रिश्ते हमारे शरीर के साथ जन्म लेते हैं जबकि मित्र हमारा मन स्वयं चुनता है. इसीलिए उन में औपचारिकता नहीं होती, रिश्तों का परंपरागत आडंबर नहीं होता.

‘‘मैं ने भी यही किया है दीदी, औपचारिकता की सारी कडि़यां एक ओर समेट मैं ने भैयाभाभी को अपना मित्र बना लिया है.’’

‘‘मैं समझी नहीं, वीरा?’’

‘‘तुम तो जानती हो दीदी, दिनेश के साथ मैं अकसर दिल्ली आ जाती हूं. पर एक बहन के अधिकार से नहीं बल्कि एक मित्र की हैसियत से और इसी नाते मैं उन का हर सुखदुख बांटने का प्रयत्न करती हूं.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें