सोने से पहले भूलकर भी न खाएं ये 5 चीजें

काम का दबाव, परिवार का तनाव, आर्थिक उलझन और ऐसी ही कुछ दूसरी परेशानियों के चलते अक्सर लोगों को नींद नहीं आने या चैन की नींद नहीं आने की शिकायत हो जाती है. जिसके चलते कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं भी हो जाती हैं.

पर इन कारणों के अलावा एक कारण और भी है जिससे नींद प्रभावित होती है. शायद आपको पता नहीं हो लेकिन हमारी नींद, काफी हद तक हमारे डिनर पर भी निर्भर करती है.

खाने-पीने की कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिनसे नींद अच्छी आती है तो वहीं कुछ ऐसी भी हैं जिनके सेवन से आपकी नींद खराब हो सकती है. सामान्य तौर पर एक शख्स को करीब 7 से 8 घंटे की नींद लेने की सलाह दी जाती है.

ऐसे में ये सुनिश्च‍ित करना बहुत जरूरी हो जाता है कि हम रात में कुछ भी ऐसा न खाएं जिससे नींद खराब हो या कोई दूसरी समस्या हो जाए.

सोने से पहले नहीं करें इन चीजों का सेवन:

1. कैफीन

कैफीन का सीधा असर हमारे मस्त‍िष्क पर पड़ता है. कैफीन की मात्रा वाली किसी भी चीज के सेवन से नींद पर असर पड़ता है. कैफीन का असर उसे लेने के पांच घंटे बाद तक बना रहता है.

2. बहुत अधिक मसालेदार खाना

रात के समय बहुत स्पाइसी खाना खाना सही नहीं है. बहुत अधिक मसालेदार खाना खाने से जलन और गैस की समस्या हो जाती है. जिससे अच्छी नींद नहीं आती.

3. मीट

मीट में उच्च मात्रा में फैट और प्रोटीन होते हैं. जिन्हें पचने में काफी समय लगता है. ऐसे में रात के समय मीट खाने से आप रातभर बेचैन हो सकते हैं.

4. जंक फूड

जंक फूड में उच्च मात्रा में सैचुरेटेड फैट होता है. जिसे पचने में काफी लंबा समय लगता है. रात के समय जंक फूड खाकर, चैन की नींद सो पाना थोड़ा मुश्क‍िल है.

5. फल

अगर आप सोने के ठीक पहले फल खाने जा रहे हैं तो रुक जाइए. फलों में नेचुरल शुगर होती है जिसे पचने में वक्त लगता है.

गरबा 2022: त्यौहार पर स्मार्ट शॉपिंग करने के 7 टिप्स

त्यौहारों का सीजन प्रारम्भ हो चुका है..भांति भांति के सामान और नए फैशन के कपड़ों से बाजार सजा हुआ है. इसके साथ ही अनेकों ऑफर्स की भी विभिन कम्पनियों में होड़ भी लगी हुई है अक्सर जब भी हम बाजार जाते हैं तो काफी कुछ खरीदने का मन करने लगता है और कई बार तो हम बिना सोचे विचारे सामान खरीद भी लाते हैं परन्तु घर आकर लगता है कि नाहक ही खरीद लिया बिना इसके भी काम चल सकता था. यही नहीं कई बार इस चक्कर में हमारा बजट भी बिगड़ जाता है. आज हम आपको त्यौहारी सीजन में शॉपिंग करने के कुछ टिप्स बता रहे हैं जिन्हें ध्यान में रखकर आप स्मार्टली शॉपिंग भी कर पाएंगे और आपका बजट भी नहीं गड़बड़ायेगा.

-बजट और लिस्ट बनाएं

सबसे पहले आप शॉपिंग के लिए एक बजट निर्धारित करें फिर बाजार जाने से पूर्व पूरे घर और किचिन पर एक नजर डालें और फिर बाजार से लाये जाने वाले सामान की एक लिस्ट बनाएं. अब इस लिस्ट को अपने बजट के अनुसार जांचें यदि लिस्ट का सामान ओवर बजट है तो कुछ कटाई छंटाई करें इससे अनावश्यक सामान खरीदने से आप बची रहेंगी.

-ऑफर चेक करें

आजकल कम्पनियां डेबिट और क्रेडिट कार्ड पर अनेकों ऑफर देतीं हैं बाजार जाने से पहले ऑफर्स को चेक करें ताकि आप उनका लाभ ले सकें. यदि कोई महंगा आयटम ले रहीं हैं तो नो कॉस्ट ई एम आई पर भी लिया जा सकता है पर लेने से पहले आप सेलरी में से किश्त निकालना अवश्य सुनिश्चित कर लें. एक से अधिक कार्ड होने पर सभी ऑफर्स की तुलना कर लें ताकि आप अधिक से अधिक लाभ प्राप्त कर सकें.

-बकाया चुकाएं

यदि आपके क्रेडिट कार्ड पर कुछ राशि पहले से बकाया है तो उसे पहले चुकाएं फिर अगली शॉपिंग करें. इससे आपको अपने बजट का अंदाजा रहेगा. टी. वी. फ्रिज. ए सी जैसी बड़ी चीजों को छोड़कर छोटी मोटी चीजों को लोन पर लेने से बचें.

-लोन से बचें

लोन प्राप्त करने के एवज में आपको कुछ कागजात या गहने आदि गिरवी रखने पड़ते हैं इससे आप बर्डन में आ जाते हैं इसकी अपेक्षा आप आजकल बाजार में बहुप्रचलित नो कॉस्ट ई एम आई सुविधा का लाभ उठाएं  या फिर क्रेडिट कार्ड से ई एम आई से शॉपिंग करें.

-नजर रखें

कोरोना के बाद से ऑनलाइन शॉपिंग के बढ़े चलन को देखकर अनेकों कम्पनियां त्यौहारी सीजन में सेल निकालतीं हैं जिन पर कई बार सामान काफी सस्ता मिल जाता है ऐसी कम्पनियों नजर रखें क्योकिं ये अपने ऑफर्स को सीमित अवधि के लिए ही खोलतीं हैं. हां आपको क्या लेना है इसकी लिस्ट भी पहले से बनाकर रखें.

-कवर्ड पर डालें नजर

यदि आप कपड़े खरीदने जा रहे हैं तो बाजार जाने से पहले अपनी कवर्ड पर नजर अवश्य डालें ताकि आप अपनी जरूरत को समझ सकें और उसी के अनुसार शॉपिंग भी कर पाएं. मसलन यदि आपके पास कोई  फैंसी दुपट्टा और लेगिंग्स है तो उसकी मैचिंग का कुर्ता खरीदकर आप काफी बचत कर लेंगी.

-थोक बाजार भी हैं उपयोगी

त्यौहारी सीजन में गिफ्ट्स का लेनदेन भी काफी बड़ी मात्रा में होता है. यदि आपको कोई भी सामान अधिक मात्रा में लेना है तो फुटकर की अपेक्षा थोक मार्केट से शॉपिंग करें इससे आप काफी उचित दाम में शॉपिंग कर सकेंगी.

गरबा 2022: इन 5 Tips से बालों पर देखें चीनी का कमाल

अपने बालों के प्रति सजग होना बहुत जरूरी है और आप हमेशा ही अपने बालों को लेकर चिंतित रहते हैं. तमाम तरह के शैम्पू आपसे कई बड़े-बड़े दावे करते हैं और इसके बाद वे अपने दावों पर पूर्णतया खरे नहीं उतरते. ऐसे में हम आपको बताना चाहते हैं कि आप अपने शैम्पू में एक चम्मच शुगर यानि कि चीनी या शक्कर मिला कर लगा सकते हैं.

दरअसल इन दिनों प्रदूषण जैसी कई समस्याओं की मार हमारे बालों को सबसे ज्यादा झेलनी पड़ती है. अब ऐसे में यदि आप अपने बालों की अच्छे से देखरेख नहीं करते हैं, तो आपके बाल झड़ने लगते हैं और साथ ही डैंड्रफ, रूखापन, बेजान हो जाने जैसी समस्याऐं भी हो सकती हैं. अब ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि इस समय में आपको क्या करना चाहिए. हर किस्म के शैम्पू अपनाने के बाद भी आपके बाल स्वस्थ्य नजर नहीं आते.

हम आपको बता रहे हैं कि आप अपने शैम्पू में एक चम्मच शुगर यानी चीनी मिला कर फिर उसका इस्तेमाल कर सकते हैं. आपके बालों में आपको बहुत से परिवर्तन देखने को मिलेंगे ऐर साथ ही अन्य कई लाभ भी हासिल होंगे.

1. बालों का माइश्चराइजर

आपके बालों को माइश्चराइज करने में शुगर या चीनी का बहुत बड़ा योगदान होता है. शैम्पू में एक चम्मच शुगर मिलाने से बाल माइश्चराइज्ड होते हैं. केश स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि शुगर की मदद से आपके बालों का नैचुरल लुक लौट आता है और केमिकल्स से जो भी नकारात्मक प्रभाव आपके बालों पर होते हैं, उनमें भी कमी आती है.

2. बालों की बेहतर वृद्धि

आप में से बहुत से लोगों की अक्सर यही शिकायत रहती है कि बाल नहीं बढ़ते. ऐसे में आपको अपने शैम्पू में एक चम्मच शुगर मिलकार फिर शैम्पू का इस्तेमाल करना चाहिए. इससे आपके बालों की ग्रोथ अच्छी होगी और साथ ही बाल सिल्की और सॉफ्ट भी होंगे. इसे कोई भी इस्तेमाल कर सकता है. अगर आपके बाल मोटे और रूखे हैं तो ये मिश्रण आपके लिए खासा उपयोगी हो सकता है.

3. बालों की डेड स्किन को निकाले

कई कैमिकल्स युक्त शैम्पू से आपके बालों के साथ साथ आपकी स्कैल्प भी प्रभावित होती है और कई बार तो त्वचा भी डेड हो जाती है और इसका नतीजा ये होता है कि आपके बालों की स्किन में रैशे व दानें जैसी समस्याऐं होने लगती हैं. बस अपने शैन्पू में एक चम्मच चीनी मिला कर लगाऐं. आपकी स्कैल्प में किसी भी तरह की समस्याऐं जन्म नहीं ले पाएगी.

4. डैंड्रफ से छुटकारा

अधिक ठण्डे और अधिक गर्म पानी से सिर धोने के कारण ज्यादातर लोगों को डैंड्रफ की समस्या हो जाती है. यदि आप अपने शैम्पू में नियमित चीनी मिला कर सप्ताह में कम से कम दो बार धोते हैं, तो आपके बालों की डैंड्रफ की समस्या जड़ से खत्म हो सकती है. सौंदर्य विशेषज्ञों के मुताबिक चीनी मिलाने से आपके बालों से डैंड्रफ का नामोनिशान तक मिट जाता है. जिन लोगों के बाल लम्बे हैं और उन्हें नियमित बाहर निकलना होता है, तो उन्हें चाहिए कि वे शैम्पू में चीनी का इस्तेमाल अवश्य करें.

5. सॉफ्ट और सिल्की बाल

किसी भी तरह से आपके बालों में केमिकल्स का इस्तेमाल आपके बालों को रूखा और बेजान बना दोता है. जब तक आप अपने बालों में केमिकल्स का उपयोग करते रहते हैं तब तक आपके बाल अच्छे लगते हैं, पर जैसे ही इनका असर खत्म हो जाता है बालों की स्थति बहुत खराब हो जाती कहै. ऐसे में आपके चाहिए कि अपने हर बार बाल धोते समय शैम्पू में एक चम्मच शुगर मिला दें और इस बात का ख्याल जरूर रखें कि बाल बार बार धोने की बजाय सप्ताह में दो या तीन बार ही धोएं.

उन से करें मन की बात

शादी करने जा रही, जस्ट मैरिड लड़कियों के लिए खासतौर से और सभी पत्नियों के लिए आमतौर से ‘मन की बात’ इसीलिए करनी पड़ रही है क्योंकि पहले जो तूतू, मैंमैं, जूतमपैजार, सिर फुटव्वल एकडेढ़ साल बाद होते थे, अब 4-5 महीनों में हो रहे हैं. ऐडवांस्ड जमाना है भई सबकुछ फास्ट है.

पतियों से बहुत प्रौब्लम रहती है हमें. उन की बात तो होती रहती है. क्यों न एक बार अपनी बात कर लें हम?

– शादी हुई है, ठीक है, अकसर सब की होती है. तो खुद को पृथ्वी मान कर और पति को सूर्य मान कर उस की परिक्रमा मत करने लगो. न यह शकवहम पालो कि उस के सौरमंडल में अन्य ग्रह या चांद टाइप कोई उपग्रह होगा ही होगा. दिनरात उसी के आसपास मंडराना, अपनी लाइफ उसी के आसपास इतनी फोकस कर लेना कि उसे भी उलझन होने लगे, ऐसा मत करो, गिव हिम अ ब्रेक (यहां स्पेस पढि़ए). अपने लिए भी एक कोना रिजर्व रखना हमेशा.

– अपने अपनों को, दोस्त, सखीसहेलियों को छोड़ कर आने का दुख क्या होता है तुम से बेहतर कौन जानता है. तो उस से भी एकदम उस के पुराने दोस्तों और फैमिली मैंबर्स से कटने को मत कहो. बदला क्यों लेना है आखिर अपना घर छोड़ने का? ‘तुम तो मुझे टाइम ही नहीं देते.’ का मतलब ‘तुम बस मुझे टाइम दो’ नहीं होता समझो वरना हमेशा बेचारगी और उपेक्षा भाव में जीयोगी.

– जो काम हाउसहैल्प/घर के अन्य सदस्य कर रहे हों उन्हें जबरदस्ती हाथ में लेना यह सोच कर कि इन से परफैक्ट कर के दिखाओगी, कतई समझदारी नहीं है. अगर सास का दिल जीतने टाइप कोई मसला न हो तो इन से गुरेज करें, क्योंकि पुरुष

आमतौर पर इन मसलों में बौड़म होते हैं और आप को जब वे ताबड़तोड़ तारीफें न मिलें जो आप ने ऐक्सपैक्ट कर रखी हैं, तो डिप्रैशन होगा. बिना बात थकान और वर्कलोड अलग बढ़ेगा. तो जितने से काम चल रहा हो उतने से ही चलाओ.

– लीस्ट ऐक्सपैक्टेशंस पालो. जितनी कम अपेक्षाएं उतना सुखी जीवन. अगर ऐक्सपैक्टेशन या बियौंड ऐक्सपैक्टेशन कुछ मिल गया तो बोनस.

– न अपने खुश रहने का सारा ठेका पतिपरमेश्वर को दे दो न अपने दुखी होने का ठीकरा उस के सिर फोड़ो. अपनी खुशियां खुद ढूंढ़ो. अपनी हौबीज की बलि मत चढ़ाओ और न अपनी प्रतिभा को जंग लगाओ. बिजी रहोगी, खुश रहोगी तो वह भी खुश रहेगा. याद रखो तुम उस के साथ खुश हो, यह मैटर करेगा उसे. उसी की वजह से खुश हो नहीं. मैं कैसी दिख रही हूं, कैसा पका रही हूं, सब की अपेक्षाओं पर खरी उतर रही हूं, कहीं इन का इंट्रैस्ट मुझ में कम तो नहीं हो रहा ये ऐसी चीजें हैं, जिन में कई औरतें मरखप कर ही बाहर निकल पाती हैं, जबकि पतियों के पास और भी गम होते हैं जमाने के.

– शक का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं था. उम्मीद है ऐसी सर्जरी जो ब्रेन के उस हिस्से को काट फेंके जो शक पैदा करता है, जल्दी फैशन में आ जाए. तब तक ओवर पजैसिव और इनसिक्योर होने से बचो. कहीं का टौम क्रूज नहीं है वह जो सब औरतें पगलाती फिरें उस के पीछे. हो भी तो तुम्हारे खर्चे पूरा कर ले वही बहुत है. फिर फैमिली का भी तो पालन करना है. औलरैडी टौम है, तो बेचारे की संभावनाओं के कीड़े औलमोस्ट मर ही चुके समझो.

– लड़ाईझगड़े, चिड़चिड़ाना कौमन और एसैंशियल पार्ट हैं मैरिड लाइफ के. फिर बाद में वापस सुलह हो जाना भी उतना ही कौमन और एसैंशियल है. बस करना यह है कि जब अगला युद्ध हो तो पिछले के भोथरे हथियारों को काम में नहीं लाना है. पिछली बार भी तुम ने यही किया/कहा था, तुम हमेशा यही करते हो, रिश्तों में कड़वाहट घोलने में टौप पर हैं. जो बीत गई सो बात गई.

– हम लोग परेशान होने पर एकदूसरे से शेयर कर के हलकी हो लेती हैं, जबकि पुरुषों को ज्यादा सवालजवाब नहीं पसंद. कभी वह परेशान दिखे और पूछने पर न बताना चाहे तो ओवर केयरिंग मम्मा बनने की कोशिश मत करो. बताओ मुझे, क्या हुआ, क्यों परेशान हो, क्या बात है, मैं कुछ हैल्प करूं, प्यार नहीं खीझ बढ़ाते हैं. बेहतर है उसे एक कप चाय थमा कर 1 घंटे को गायब हो जाओ. फोकस करेगा तो समाधान भी ढूंढ़ लेगा. लगेगा तो बता भी देगा परेशानी की वजह. दोनों का मूड सही रहेगा फिर.

– कितनी भी, कैसी भी लड़ाई हो, शारीरिक हिंसा का एकदम सख्ती और दृढ़ता से प्रतिरोध करो. याद रखो एक बार उठा हाथ फिर रुकेगा नहीं. पहली बार में ही मजबूती से रोक दो. साथ ही बेइज्जती सब के सामने, माफीतलाफी अकेले में, यह भी न हो. अपनी सैल्फ रिस्पैक्ट को बरकरार रखो, हमेशा हर हाल में ईगो और सैल्फ रिस्पैक्ट के फर्क को समझते हुए.

– आदमी चेहरा और ऐक्सप्रैशंस पढ़ने में औरतों की तरह माहिर नहीं होते. इसलिए मुंह सुजा कर घूमने, भूख हड़ताल आदि के बजाय साफ बताओ क्या दिक्कत है.

– किसी भी मतलब किसी भी पुरुष से स्पष्ट और सही उत्तर की अपेक्षा हो तो सवाल एकदम सीधा होना चाहिए, जिस का हां या न में जवाब दिया जा सके. 2 उदाहरण हैं-

पहला

‘‘क्या हम शाम को मूवी चल सकते हैं?’’

‘‘हम्म, ठीक है, कोशिश करूंगा, जल्दी आने की, काम ज्यादा है.’’

दूसरा

‘‘क्या हम शाम को मूवी चलें? आ जाओगे टाइम पर?’’

‘‘नहीं, मीटिंग है औफिस में, लेट हो जाऊंगा तो चिढ़ोगी स्टार्टिंग की निकल गई. कल चलते हैं.’’

जब पुरुष का मस्तिष्क ‘सकना’ टाइप के कन्फ्यूजिंग शब्द सुनता है तो उत्तर भी कन्फ्यूजिंग देता है. अब पहली स्थिति में उम्मीद तो दिला दी थी. तैयार हो कर बैठने की मेहनत अलग जाती, टाइम अलग वेस्ट होता और पति के आने पर घमासान अलग. कभी किसी पुरुष को कहते नहीं सुना होगा कि क्या तुम मुझ से प्यार कर सकती हो या मुझ से शादी कर सकती हो? वे हमेशा स्पष्ट होते हैं, डू यू लव मी, मुझ से शादी करोगी? तो स्पष्ट सवाल की ही अपेक्षा भी करते हैं.

लास्ट बट नौट लीस्ट, अगर वह आप के साथ खड़ा है जिंदगी के इस सफर में, आप का साथ दे रहा है, तो यह सब से जरूरी बात है. आप इसलिए साथ नहीं हैं कि बुढ़ापे में अकेले न पड़ जाओ, न इसलिए कि इन प्यारेप्यारे बच्चों के फ्यूचर का सवाल है, बस इसलिए साथ हैं कि दोनों ने एकदूसरे का साथ चुना है, आखिर तक निभाने को…

डा नाजिया नईम

वार पर वार: नमिता की हिम्मत देख क्यों चौंक गया भूषण राज

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मुसलिम औरतों के हिजाब पर आपत्ति

औरतों के लिए तरहतरह के कपडों तक के नियम धर्म ने तय कर रखे हैं. लगभग हर धर्म औरतों के लिए तय करता है कि कब क्या करना है क्या नहीं. उत्तर भारतीय वधूओं के लिए घूंघट आज भी जरूरी है. गनीमत है कि अब दिन भर सिर पर पल्लू या घर में जेठ या ससुर के सामने पूरा घूंघट सिर्फ गांवों तक रह गया है. मुसलमानों में हिजाब एक विवाद बन गया है.

हिजाब ड्रैस का कोई दिखावटी हिस्सा नहीं है और यह कहना कि औरतें अपनी मर्जी से उसे पहन रही हैं. धर्म के कहने पर अपने को धोखा देना है. हिजाब कोरा धार्मिक है वर्ना इसे घर में भी पहना जाता. जो मुसलिम औरतें कह रही हैं कि हिजाब उन की आईडैंटिटी की निशानी है, वे केवल धर्म गुरूओं के आदेशों पर कर रही हैं. ईरान की औरतों ने यह साबित कर दिया है.

ईरान में 22 साल एक औरत को पब्लिक में हिजाब जलाने पर मोरल पुलिस, यानी धाॢमक पुलिस ने पकड़ लिया और अगले दिन उस की लाश मिली जैसा हमारे यहां होता है. कस्टोडियल डैं्रस ईरान, भारत जैसे देशों में आम है.

पर जो बात ईरानी धार्मिक मुल्लाओं ने सोची नहीं थी, वह हुई. इस मौत पर हंगामा हुआ. पूरा देश हिजाब की जबरदस्ती पर खड़ा हो गया है. जगहजगह उपद्रव हो रहे हैं. आगजनी हो रही है. ईरान सरकार जो मुल्लाओं के हिसाब से चलती हुआ नहीं कर रही कि इन लोगों को दबाने के लिए काफिरों की बनाई गई बंदूकों से आम जनता को डरा कर घरों या  जेलों में बंद कर रही है.

म्हासा अमीनी की पुलिस के हाथों मौत हुई. अब ईरानी पुलिस, भारतीय पुलिस की तर्ज पर, कह रही है कि मौत तो हार्ट फेल होने से हुई थी. जिस औरत ने पब्लिक में विरोध किया हो, उस का दिल इतना कमजोर नहीं होता कि पुलिस के हाथों में जाते ही टूट जाए. ईरान के 10-12 शहरों में मोरल पुलिस की मनमानी के खिलाफ दंगे होने लगे हैं.

यह हाल बिलकुल भारत जैसा है. ईरान में भी भारत जैसी धर्म की देन सरकार है जो धर्म को पहला फर्ज मानती है, गुड गवनैंस को नहीं. भारत में भी सरकार का कर्म धर्म के हिसाब से हो रहा है. मंदिरों और तीर्थों के लिए सडक़ें बन रही है और उन्हें विकास कहा जा रहा है. मुसलमानों के मकान तोड़े जा रहे है और उसे एनक्रोसमैंट के रोकने का एक्शन कहा जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट को समय हिजाब और ज्ञानवापी मसजिद की गुत्थी सुलझाने में लगाया जा रहा है और इसे न्याय करना सिखाया कहा जा रहा है. जबकि संपत्ति, अपराधों, तलाक, जेलों में बंद निर्दोषों के मामले 10-10 साल से लटक रहे हैं. ईरान और भारत में बहुत सी बातें एक सी हैं.

हमारे यहां मुसलिम औरतों के हिजाब पर आपत्ति है पर किसी हिंदू औरत तो किसी मंदिर में बिना सिर ढके जाने पर भी रोक है. हिंदू औरतें अगर देवीदेवता के सामने बिना सिर ढके चली जाएं तो उन्हें मारापीटा तो नहीं पर टोका जरूर जाता है. भारत सरकार और ईरान सरकार दोनों औरतों को धर्म की गुलाम मानती हैं और ऐसी औरतों की भी कमी नहीं जो अपनी आजादी को धर्म के नाम पर कुर्बान करने में आसानी से तैयार हो जाती हैं. म्हासा अमीनी की मौत ने अंधविश्वास के सड़े भूसे में एक चिंगारी फेंकी है. यह आग कितनी फैलती है देखना बाकी है.

खस्ताहाल बौलीवुड, दोषी कौन

आज बौलीवुड का एक भी कलाकार या निर्देशक जमीन से जुड़ा हुआ नहीं है. परिणामस्वरूप बौलीवुड की फिल्में बौक्स औफिस पर बुरी तरह से औंधे मुंह गिर रही हैं. वर्तमान समय के सभी कलाकार खुद को आम इंसानों से दूर ले जाने के तरीकों पर ही अमल करते हैं. मु झे अच्छी तरह याद है कि एक वक्त वह था, जब हम किसी भी फिल्म के सैट पर कभी भी जा सकते थे और सैट पर स्पौट बौय से ले कर कलाकार तक किसी से भी मिल सकते थे. उन दिनों कलाकारों के फैंस भी सैट पर आ कर उन से मिला करते थे. उन दिनों सैट पर हर किसी का भोजन एकसाथ ही लगता था. लेकिन अब ऐसा नहीं रहा. अब कलाकार पहली फिल्म साइन करते ही पीआर, मैनेजर व सुरक्षा के लिए बाउंसरों की सेवाएं ले कर खुद को कैद कर लेता है. सैट पर पत्रकारों या फैंस का जाना मना हो चुका है.

अब कलाकार सैट पर ज्यादा देर नहीं रुकता. वह हमेशा अपनीअपनी वैनिटी में बैठा रहता है. सीन के फिल्मांकन के वक्त वैनिटी वैन से निकल कर कैमरे के सामने जा कर परफौर्म करता है और फिर वैनिटी वैन में घुस जाता है.

ऐसे में जमीनी हकीकत से कैसे वाकिफ हो सकता है? उसे कैसे पता चलेगा कि उस की अपनी फिल्म के सैट पर किस स्पौट बौय के साथ किस तरह की समस्याएं हैं अथवा किस स्पौट बौय के पड़ोसी अब किस तरह की फिल्में देखना चाहते हैं.

इस के ठीक विपरीत दक्षिण भाषी कलाकार सदैव ऐसे लोगों के साथ जुड़ा रहता है. जब रामचरन की फिल्म ‘आरआरआर’ ने खूब पैसे कमाए और इस के लिए मुंबई में पांचसितारा होटल में फंक्शन रखा गया, तो मुंबई आने से पहले रामचरन ने इस फिल्म से जुड़े लोगों को अपने घर बुलाया और सभी को 10-10 ग्राम सोने के सिक्के देते हुए उन के साथ लंबी बातचीत की. सभी का हालचाल भी पूछा.

फिल्म के प्रदर्शन से पहले कलाकार पत्रकारों के बड़े समूह से 15-20 मिनट मिलता है, कुछ रटेरटाए शब्द बोल कर गायब हो जाता है. ऐसे में वह कैसे सम झेगा कि उस की परफौर्मैंस को ले कर कौन क्या सोचता है? आजकल पत्रकार भी ‘गु्रप इंटरव्यू’ का हिस्सा बनने के लिए किस हद तक गिर रहे हैं, उस की कहानी भी कम डरावनी नहीं है.

मीडिया से दूरी क्यों

जी हां, बौलीवुड के कलाकारों को पत्रकारों से बात करने का भी समय नहीं मिलता अथवा यह कहें कि ये अपने पीआर के कहने पर दूरी बना कर रखते हैं और एकसाथ 20 से 50 पत्रकारों को ‘गु्रप इंटरव्यू’ देते हैं और फिर उन का मजाक भी उड़ाते हैं.

एक बार जब मैं अक्षय कुमार से उन के घर पर ऐक्सक्लूसिव बात कर रहा था, तो उस बातचीत के दौरान उन्होंने गर्व से बताया कि एक दिन पहले उन्होंने 15 मिनट के गु्रप इंटरव्यू खत्म किया जिस में 57 पत्रकार थे.

हिंदी फिल्म बनाने वाले निर्माता, निर्देशक व कलाकार हिंदी में बात करना पसंद ही नहीं करते. वे तो 4 बड़े अंगरेजी अखबारों के पत्रकारों से बात करने के बाद बाकी लोगों से गु्रप में बात करना चाहते हैं. गु्रप इंटरव्यू में वे बातें कम करते हैं, पत्रकारों का मजाक ही उड़ाते हैं.

मशहूर अभिनेता, निर्माता व निर्देशक राज कपूर ने बतौर बाल कलाकार 1935 में फिल्म ‘इंकलाब’ में अभिनय किया था. उस के बाद जब वे कुछ बड़े हुए तो उन्होंने बतौर सहायक निर्देशक काम करना शुरू किया. लेकिन वे अपने पिता व अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के कहने पर बस व लोकल ट्रेन में यात्रा करते थे, जबकि उस वक्त पृथ्वीराज कपूर के पास सारे सुखसाधन उपलब्ध थे. राज कपूर ने तमाम उपलब्धियां हासिल कीं.

बताते हैं कि वे हर फिल्म के सैट पर हर छोटेबड़े इंसान के साथ गपशप किया करते थे. मगर जब भी उन्हें किसी नई फिल्म की विषयवस्तु पर काम करना होता था, तो वे मुंबई से 300 किलोमीटर दूर पुणे स्थित अपने फार्महाउस चले जाते थे. एक बार इस फार्महाउस से जुड़े कुछ लोगों से हमारी बात हुई, तो उन्होंने बताया कि वहां रहते हुए राज कपूर हर इंसान से लंबी बातचीत करते थे. सभी की जिंदगी के सुखदुख जाना करते थे.

जमीन से जुड़े कलाकार

मशहूर निर्मातानिर्देशक सुनील दर्शन के पिता अपने समय के मशहूर निर्माता व फिल्म वितरक थे. अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जब सुनील दर्शन ने फिल्म निर्माण में उतरना चाहा, तो उन के पिता ने उन्हें 6 वर्ष के इंदौर के अपने फिल्म वितरण औफिस में काम करने के लिए भेज दिया. 6 वर्ष तक इंदौर में रहते हुए सुनील दर्शन आसपास के गांवों में जा कर लोगों से मिलते रहे.

एक बार मु झ से कहा था कि सिनेमा की सम झ विकसित करने में मेरा 6 वर्ष का इंदौर का प्रवास काफी कारगर रहा. वहां पर गांवों व छोटे कसबों में जा कर लोगों से मिलने, उन से बातचीत करते हुए सही मानों में मेरे अंदर भारतीय सिनेमा की सम झ विकसित हुई.

उस के बाद सुनील दर्शन ने ‘जानवर,’ ‘एक रिश्ता,’ ‘बरसात,’ ‘अंदाज,’ ‘दोस्ती,’ ‘अजय,’ ‘लुटेरा,’ ‘मेरे जीवनसाथी’ व ‘इंतकाम’ जैसी सफलतम फिल्में बनाईं.

आम लोगों की तरह काम

2010 में करीना कपूर, काजोल व अर्जुन रामपाल को ले कर फिल्म ‘वी आर फैमिली’ का निर्देशन करने वाले सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा की परवरिश फिल्मी माहौल में ही हुई. वे सुपरडुपर हिट फिल्म ‘दुल्हन वह जो पिया मन भाए’ के हीरो प्रेम किशन के बेटे हैं. प्रेम किशन चाहते तो सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा को निर्देशन की बागडोर थमा सकते थे, लेकिन सिद्धार्थ को अपने पिता द्वारा निर्मित किए जा रहे सीरियलों के सैट पर आम लोगों की तरह काम करना पड़ा.

लगभग 15 वर्ष तक कई जिम्मेदारियां निभाने और बहुत कुछ अनुभव हासिल करने के बाद उन्हें 2010 में करण जौहर द्वारा निर्मित फिल्म ‘वी आर फैमिली’ को निर्देशित करने का अवसर मिला.

बलदेव राज चोपड़ा उर्फ बीआर चोपड़ा किसी परिचय के मुहताज नहीं हैं. उन्होंने ‘नया दौर,’ ‘कानून,’ ‘साधना,’ ‘गुमराह,’ ‘इंसाफ का तराजू,’ ‘निकाह,’ ‘बाबुल,’ ‘भूतनाथ’ सहित लगभग 60 फिल्में और ‘महाभारत’ जैसा सफलतम धारावाहिक बनाया. वे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव तक न सिर्फ आम लोगों से जुड़े रहे बल्कि हमेशा जमीन से भी जुड़े रहे. मु झे आज भी याद है कि 2002 में मैं ने उन का इंटरव्यू किया था, जोकि एक पत्रिका में छपा था. तब बीआर चोपड़ा ने मु झे स्वहस्ताक्षर युक्त पत्र कूरियर से भेज कर धन्यवाद ज्ञापन करते हुए पत्र में लिखा था कि वे भी पत्रकार रहे हैं और जिस पत्रिका में उन का इंटरव्यू छपा है, उस पत्रिका की प्रिंटिंग प्रैस में लाहौर में उन्होंने कुछ दिन काम किया था.

समाज से जुड़ी हुई फिल्में

आज हर इंसान संगीत व फिल्म निर्माण कंपनी ‘टी सीरीज’ से भलीभांति परिचित है. इस कंपनी की शुरुआत गुलशन कुमार ने की थी, जो हमेशा जमीन से जुड़े रहे. गुलशन कुमार ने अपने औफिस की इमारत में एक फ्लोर पर कैफेटेरिया बना रखा था, जहां दोपहर के भोजन अवकाश के दौरान सभी कर्मचारी एकसाथ बैठ कर भोजन करते थे. उन्हीं के बीच बैठ कर गुलशन कुमार भी भोजन करते थे.

मशहूर फिल्मकार यश चोपड़ा ने हमेशा आम इंसानों जैसी जिंदगी जी. वे अपने जीवन के अंतिम दिनों तक पत्रकारों से ही नहीं बल्कि आम इंसानों, प्रोडक्शन से जुड़े हर छोटेबड़े कर्मचारी से मिलते थे. परिणामस्वरूप उनकी फिल्मों ‘धूल का फूल,’ ‘धर्मपुत्र,’ ‘वक्त,’ ‘दाग,’ ‘दीवार,’ ‘त्रिशूल,’ ‘चांदनी,’ ‘लम्हे,’ ‘परंपरा,’ ‘डर’ व ‘वीर जारा’ की फिल्मों को लोग आज भी बारबार देखना पसंद करते हैं.

बौलीवुड: कहां से चला था, कहां पहुंचा

राजेश खन्ना की फिल्म ‘आनंद’ का एक संवाद है- ‘यह भी एक दौर है, वह भी एक दौर था.’ फिल्म में यह संवाद किसी दूसरे संदर्भ में था, मगर यह संवाद बौलीवुड पर भी एकदम सटीक बैठता है.

बौलीवुड में एक वह दौर था जब ‘आलमआरा,’ ‘दो बीघा जमीन,’ ‘मदर इंडिया,’ ‘बंदिनी,’ ‘शोले,’ ‘मुगले आजम’ के अलावा राज कपूर जैसे फिल्मकार फिल्में बनाया करते थे. वे सभी फिल्में आज भी एवरग्रीन हैं क्योंकि इन में समाज की सचाई थी.

अमिताभ बच्चन की 80 के दशक की फिल्में भी आम लोगों से जुड़ी हुई थीं. ऐंग्री यंग मैन के रूप में अमिताभ बच्चन द्वारा अभिनीत फिल्मों में गरीब तबके के मन की बात की गई थी. यानी फिल्में आम लोगों को उन्हीं की दुनिया में ले जाती थीं. बड़ी मुसीबतों का सामना करते हुए इंसान को जीतते हुए देखना इंसानी मन की कमजोरी है. तभी तो बौलीवुड की फिल्में सब से अधिक देखी जाती थीं.

बेसिरपैर की कहानी

लेकिन पिछले 15-20 सालों से बौलीवुड में दक्षिण भाषी सिनेमा की सफलतम फिल्मों के हिंदी रीमेक, ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर, लव टैंगल, सैक्स व हिंसा से सराबोर फिल्मों के अलावा बायोपिक फिल्मों का ही चलन हो गया है. बौलीवुड का सिनेमा जमीनी सचाई से कोसों दूर जा चुका है. बौलीवुड के सर्जक यह भूल चुके हैं कि जिस सिनेमा को मुंबई में कोलाबा से अंधेरी तक देखा जाता है, वही सिनेमा मुंबई के इतर इलाकों में पसंद नहीं किया जाता.

‘यशराज फिल्म’ के आदित्य चोपड़ा आम इंसानों से मिलना तो दूर पत्रकारों से भी नहीं मिलते. वे सदैव अपनी चारदीवारी के अंदर कैद रहते हैं. यदि यह कहा जाए कि वे अपनी जमीन या जड़ों से बहुत दूर जा चुके हैं, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी.

आम इंसान उस सिनेमा को देखना पसंद करता है, जिस के संग वह रिलेट कर सके. मगर इस कसौटी पर ये फिल्में खरी नहीं उतरीं.

रणवीर सिंह की फिल्म ‘जयेशभाई जोरदार’ सिर्फ भारत को 2200 स्क्रीन्स से महज 3 करोड़ 25 लाख की ही ओपनिंग मिली थी.

गुजरात की पृष्ठभूमि की कहानी वाली इस फिल्म के साथ मुंबई या गुजरात के छोटे शहरों या गांवों के लोग भी रिलेट नहीं कर पा रहे हैं.

स्टूडियो में बैठे हैं एमबीए पास

2001 में नितिन केणी ने सिनेमा के विकास व सबकुछ पारदर्शी तरीके से हो सके, इसलिए जी स्टूडियो के साथ मिल कर हौलीवुड स्टाइल में स्टूडियो संस्कृति की शुरुआत की थी और पहली फिल्म ‘लगान’ का निर्माण हुआ था, जिस के हर कलाकार व तकनीशियन को उन की पारिश्रमिक राशि चैक से दी गई थी.

इस फिल्म ने सफलता का ऐसा परचम लहराया कि देखते ही देखते कुकुरमुत्ते की तरह अनगिनत स्टूडियोज मैदान में आ गए. रिलायंस सहित कई औद्योगिक घराने भी कूद पड़े. पहली बार इन सभी स्टूडियो में किस कहानी पर फिल्म का निर्माण किया जाएगा, इस की जिम्मेदारी नईनई एमबीए की युवा पीढ़ी के हाथों में सौंपा गया था.

जी हां, एमबीए पढ़ कर आए लोग, जिन्हें सिनेमा की सम झ नहीं, जिन्होंने साहित्य नहीं पढ़ा, जिन्हें संगीत या नृत्य की कोई सम झ नहीं, वे फिल्म निर्माण को ले कर निर्णय लेने लगे, जबकि फिल्म निर्माण के लिए साहित्य गीतसंगीत व नृत्य का गहराई से ज्ञान होना आवश्यक है. ये सभी कागज पर फिल्म की सफलता का गणित लिखने लगे और इन स्टूडियोज बिना कहानी वगैरह तय किए सिर्फ स्टार कलाकारों को अपने स्टूडियो के साथ मनमानी कीमत दे कर अनुबंधित करने लगा था.

उस वक्त कलाकारों ने अचानक अपनी कीमत 400-500 गुना बढ़ा दी थी. उस वक्त खबर आई थी कि रिलायंस ने 1500 करोड़ का ऐग्रीमैंट अमिताभ बच्चन के साथ किया है. एक स्टूडियो द्वारा अक्षय कुमार के साथ प्रति फिल्म 135 करोड़ का ऐग्रीमैंट करने की भी खबरें थीं.

बौलीवुड दक्षिण फिल्मों का मुहताज

बौलीवुड हमेशा दक्षिण के सिनेमा का मुहताज रहा है. बौलीवुड के जितेंद्र व अनिल कपूर सहित तमाम स्टार कलाकारों ने दक्षिण के फिल्म सर्जकों के साथ हिंदी फिल्में कर के स्टारडम पाया. इतना ही नहीं, यदि बौलीवुड के  पिछले 20-25 सालों के इतिहास पर गौर किया जाए, तो एक ही बात उभर कर आती है कि बौलीवुड केवल दक्षिण या विदेशी फिल्मों का हिंदी रीमेक बनाते हुए अपनी सफलता का परचम लहरा कर अपनी पीठ थपथपाते आ रहा है.

बौलीवुड बायोपिक बना रहा है या एलजीबीटी समुदाय पर फिल्में बना रहा है यानी बौलीवुड मौलिक काम करने के बजाय नकल के सहारे बादशाह बनने की सोचता रहा है.

कहानियों का अकाल

प्राप्त जानकारी के अनुसार आज की तारीख में बौलीवुड करीब 40 फिल्मों का रीमेक बना रहा है. यहां तक कि अजय देवगन के पास भी कहानियों का अकाल है, इसलिए वे बायोपिक फिल्में बना रहे हैं. इस की मूल वजह यह है कि अजय देवगन का आम इंसानों के संग कोई संपर्क ही नहीं रहा.

हम बहुत दूर क्यों जाएं ‘वांटेड,’ ‘किक,’ ‘राउडी राठौर’ जैसी सफल बौलीवुड फिल्में दक्षिण की फिल्मों का रीमेक ही हैं. दक्षिण की जिन फिल्मों का हिंदी रीमेक किया गया, उन में सलमान खान की फिल्म ‘जुड़वां’ भी शामिल है. यह तेलुगु फिल्म ‘हेल्लो ब्रदर’ का हिंदी रीमेक है, जिस में नागार्जुन लीड रोल में थे. इस फिल्म ने बौक्स औफिस पर जम कर कमाई की थी. महज 6 करोड़ में बनी इस फिल्म का बौक्स औफिस कलैक्शन 24 करोड़ रुपए है.

इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दक्षिण की हिंदी रीमेक फिल्मों का हिंदी बौक्स औफिस पर कैसा रिस्पौंस था. इसी तरह मलयालम फिल्म ‘रामजी राव स्पीकिंग’ का हिंदी रीमेक ‘हेराफेरी’ बना. यह फिल्म भी बहुत ज्यादा लोकप्रिय हुई थी. इस के बाद ‘हेराफेरी’ फिल्म के निर्देशक प्रियदर्शन ने कौमेडी फिल्मों की लाइन ही लगा दी.

उन्होंने ‘हलचल,’ ‘हंगामा,’ ‘ये तेरा घर ये मेरा घर,’ ‘गरम मसाला,’ ‘क्योंकि,’ ‘छुपछुप के,’ ‘भागमभाग,’ ‘दे दनादन,’ ‘ढोल,’ ‘बिल्लू’ जैसी फिल्में बनाई हैं. इन में ज्यादातर फिल्में कौमेडी, रोमांस और ड्रामा जोनर की हैं.

बौलीवुड पर हावी

इसी तरह ऐक्शन जोनर की फिल्मों का रीमेक दौर भी शुरू हुआ, जिस ने हिंदी प्रदेशों में तहलका मचा दिया. तमिल फिल्म इंडस्ट्री के मशहूर निर्देशक ए.आर. मुरुगदास 2008 में हिंदी फिल्म ‘गजनी’ ले कर आए, जो इसी नाम से तमिल में सफलता दर्ज करा चुकी थी. आमिर खान, जोया खान और आसिन स्टारर इस फिल्म ने खलबली मचा दी. फिल्म के लिए बनाए गए आमिर खान के सिक्स पैक एब के साथ धांसू ऐक्शन सीन खूब चर्चा में रहे.

जी हां, वास्तव में दक्षिण सिनेमा के बौलीवुड पर हावी होने की मूल वजह यह है कि पिछले 15-20 सालों से बौलीवुड दक्षिण सिनेमा की फिल्मों को हिंदी में रीमेक कर अपने अस्तित्व को बचाए हुए था. दक्षिण सिनेमा की नई पीढ़ी ने इस सच को सम झते हुए अपने ‘बेहतरीन’ सिनेमा को विस्तार देते हुए ‘पैन सिनेमा’ का नाम देने की मंशा से खुद ही अपनी फिल्में हिंदी में डब कर के दर्शकों तक पहुंचाने लगा.

इतना ही नहीं कोविड के वक्त हिंदी भाषी दर्शक अपने घर के अंदर टीवी पर दक्षिण में बनी व हिंदी में डब हुई फिल्में देख कर दक्षिण के कलाकारों को पहचानने भी लगे हैं.

आने वाले वक्त में प्रभास की फिल्म ‘आदिपुरुष,’ विजय देवरकोंडा की फिल्म ‘लीगर,’ वरुण तेज की फिल्म ‘घनी’ पैन इंडिया में रिलीज होने वाली हैं.

सफलता का परचम लहराती दक्षिण की फिल्में

कोरोना आपदा के बाद जब फिल्म इंडस्ट्री एक बार फिर शुरू हुई, देशभर के सिनेमाघर खुले, तब से बौलीवुड की ‘अंतिम,’ ‘83,’ ‘सत्यमेव जयते 2,’ ‘बच्चन पांडे,’ ‘जर्सी,’ ‘रनवे 34्र’ ‘अटैक,’ ‘हीरोपंती 2,’ ‘औपरेशन रोमिया,’ ‘जलसा,’ ‘ झुंड,’ ‘धाकड़’ सहित एक भी फिल्म सफलता दर्ज नहीं करा पाई है. अक्षय कुमार की फिल्म ‘बच्चन पांडे’ भी घटिया फिल्म थी. यह फिल्म 18 मार्च को रिलीज हुई और फिल्म बुरी तरह से पिट गई.

वहीं दक्षिण के सिनेमा की ‘पुष्पा,’ ‘जय भीम,’ ‘आरआरआर,’ ‘वकील साहब’ व ‘केजीएफ चैप्टर 2’ सहित हर फिल्म हिंदी में डब हो कर सफलता दर्ज करा रही है. ‘केजीएफ चैप्टर 2’ ने तो महज हिंदी में हर हिंदी फिल्म को पछाड़ दिया है. अब आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ भी सर्वाधिक  कमाई वाली पहली फिल्म नहीं रही. ऐसे में अब बौलीवुड में एक नया जुमला बन गया है कि ‘दक्षिण का सिनेमा बौलीवुड को खा जाएगा.’ मगर एक भी शख्त दक्षिण में रहे सिनेमा की तर्ज पर हिंदी सिनेमा में मौलिक व दर्शकों को पसंद आने वाला सिनेमा बनाने की बात नहीं कर रहा.

बरबादी की ओर बौलीवुड

दक्षिण के फिल्मकारों ने इन हिंदी फिल्मों के कलाकारों की इस कमजोरी को सम झ कर इन्हें अपनी फिल्मों में छोटे किरदार दे कर अपनी फिल्मों को पैन इंडिया पहुंचाने का काम किया.

किसी ने महेश भट्ट की बेटी आलिया भट्ट को सम झा दिया कि उन क ी वजह से दक्षिण की फिल्म ‘आरआरआर’ ने सफलता दर्ज की है और उसी वक्त आलिया को हौलीवुड फिल्म ‘हार्ट औफ स्टोन’ मिल गई.

टौम हार्पर द्वारा निर्देशित फिल्म ‘हार्ट औफ  स्टोन’ अमेरिकी जासूसी फिल्म है, जिस की पटकथा ग्रेग रुका और एलीसन श्रोएडर ने लिखी है. इस फिल्म में आलिया भट्ट के साथ गैल गैडोट, जेमी डोनर्न, सोफी ओकोनेडो, मैथियास श्वेघोफर, जिंग लुसी जैसी हौलीवुड कलाकारों का जमावड़ा है. जो बस आलिया को ऐसा जोश आया कि उन्होंने ऐलान कर दिया कि वे अब दक्षिण की किसी फिल्म में काम नहीं करेंगी.

उत्तर में ‘बाहुबली’ और ‘आरआरआर’ के निर्देशक एस राजामौली कहां चुप बैठने वाले थे. उन्होंने भी ऐलान कर दिया कि अब अपनी फिल्मों में बौलीवुड के किसी भी कलाकार को नहीं लेंगे.

बौलीवुड के अहंकारी स्टार

बौलीवुड के सुपर स्टार अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, सलमान खान आदि तो अपने जन्मदिन पर अपने प्रशंसकों को कई घंटे तक  अपने घर के सामने धूप में खड़े रखने के बाद घर की बालकनी में आ कर हाथ हिला कर उन का अभिवादन कर इतिश्री सम झ लेते हैं.

बैंगलुरु में एक फिल्म की शूटिंग चल रही थी. लंच के समय अभिनेता दुलकेर सलमान भोजन कर रहे थे. उन की नजर बाहर खड़े कुछ लोगों पर पड़ी. पता चला कि वह उन के प्रशंसक हैं जोकि उन के साथ फोटो खिंचवाना चाहते हैं. दुलकेर सलमान भोजना करना बीच में ही छोड़ कर हाथ धो कर पहले अपने प्रशंसकों से मिले. उन से बातें कीं, उन के साथ फोटो खिंचवाए उस के बाद भोजन किया.

बौलीवुड में कला की बनिस्बत पैसे को ही महत्त्व दिया जाता है. हर कलाकार मेहनताने के रूप में मोटी रकम वसूलता है. उस के बदले में उस से कुछ भी करवा लो. वह  झूठा दावा करता है कि वह चुनौतीपूर्ण किरदार और रिलेट करने वाली कहानियां चुनना पसंद करता है.

इस के ठीक विपरीत दक्षिण भारत के कलाकार कहानी व किरदार की बात करते हैं. वहां पर कहानी में हीरो को ग्लोरीफाई किया जाता है, जबकि बौलीवुड में किरदार या कहानी के बजाय कलाकार को ग्लोरीफाई किया जाता है.

वैसे आज जो हालात बन चुके हैं, उन की तरफ अपरोक्ष रूप से इशारा करते हुए 2013 में फिल्म ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ के प्रमोशनल इंटरव्यू के दौरान फिल्म के निर्देशक राजकुमार संतोषी ने बौलीवुड के संदर्भ में मु झ से कहा था, ‘‘जल्द वह वक्त आने वाला है, जब कलाकार खुद दर्शकों के दरवाजे पर जा कर उन से अपनी फिल्म की टिकट खरीदने के लिए कहेगा.’’

9 वर्ष पहले कही गई बात आज सच नजर आ रही है. लगभग यही हालात हो गए हैं. कलाकार अच्छी कहानियां चुनने के बजाय अपनी फिल्म के प्रचार इवेंट में अपने फैंस को बुला कर नौटंकी करता नजर आता है या अपने फैंस को प्रैस शो के वक्त मुफ्त में फिल्में दिखा रहा है.

GHKKPM: सई के लिए फैंस ने चुना जगताप, विराट को किया ट्रोल

बौलीवुड हो या टीवी सीरियल, सेलेब्स सोशलमीडिया पर ट्रोलिंग का शिकार होते रहते हैं. हालांकि कई बार उनके किरदार को लेकर भी एक्टर्स को हेटिंग का सामना करना पड़ता है. इन्हीं में से एक एक्टर नील भट्ट (Neil Bhatt) हैं, जो अपने सीरियल  ‘गुम है किसी के प्यार में’ (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) में विराट के किरदार के कारण सोशलमीडिया पर अक्सर चर्चा में रहते हैं. वहीं अब एक्टर की तुलना जगताप से होने लगी है, जिसके चलते वह सुर्खियों में हैं. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

फैंस को पसंद आई सई और जगताप की कैमेस्ट्री

 

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सीरियल  ‘गुम है किसी के प्यार में’ (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin Latest Episode)  की कहानी में इन दिनों विराट और चौह्वाण परिवार में सई के लिए नफरत देखने को मिल रही है. वहीं जगताप और सवि की दोस्ती की दोस्ती भी फैंस को पसंद आ रही है. इसी बीच सीरियल में सई और जगताप की कैमेस्ट्री देख फैंस विराट को भूलने की सलाह दे रहे हैं. दरअसल, हाल ही के एपिसोड्स में जगताप, सई को समझाता और उसका मुश्किल वक्त में साथ देता हुआ नजर आ रहा है, जिसे देखकर फैंस काफी खुश हैं.

 

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एक्टर की हो रही तारीफ

जहां एक तरफ फैंस जगताप और सई की बौंडिंग से खुश हैं तो वहीं जगताप के रोल में नजर आने वाले एक्टर सिद्धार्थ बोडके (Sidharth Bodke) को मेन लीड के तौर पर देखने की फैंस ख्वाहिश जाहिर कर रहे हैं. इतना ही नहीं फैंस विराट यानी नील भट्ट की एक्टिंग की तुलना सिद्धार्थ बोडके से कर रहे हैं और एक्टर की तारीफ कर रहे हैं. इसी को लेकर एक फैन ने सोशलमीडिया पर लिखा, ‘इस बात में कोई शक नहीं है कि सिद्धार्थ बोडके, विराट यानी नील भट्ट से बेहतरीन एक्टिंग कर रहे हैं. सिद्धार्थ बोडके सच में एक प्रोफेशनल एक्टर हैं. नील भट्ट को सिद्धार्थ बोडके से एक्टिंग सीखनी चाहिए.’

बता दें, एक्टर नील भट्ट, विराट के किरदार को लेकर काफी ट्रोलिंग का सामना कर चुके हैं. वहीं लीप के बाद से पाखी संग शादी के फैसले पर विराट के किरदार और मेकर्स को काफी हेटर्स का शिकार होना पड़ा है. हालांकि सीरियल की कहानी दिलचस्प मोड़ लेती दिख रही है.

सैक्स लाइफ में इनकी नो ऐंट्री

दिलीप ने जब रुही से यह कहा कि वह बिस्तर पर अब पहले जैसा साथ नहीं देती, तो वह यह सुन कर परेशान हो उठी. फिर रुही ने सैक्स ऐक्सपर्ट डा. चंद्रकिशोर कुंदरा से संपर्क किया.

डा. कुंदरा के मुताबिक, सैक्स सफल दांपत्य जीवन का महत्त्वपूर्ण आधार है. इस की कमी पतिपत्नी के रिश्ते को प्रभावित करती है. पतिपत्नी की एकदूसरे के प्रति चाहत, लगाव, आकर्षण खत्म होने के कई कारण होते हैं जैसे शारीरिक, मानसिक, लाइफस्टाइल. ये सैक्स ड्राइव को कमजोर बनाते हैं.

तनाव: औफिस, घर का वर्कलोड, आर्थिक समस्या, असमय खानपान आदि का सीधा असर तनाव के रूप में नजर आता है, जो हैल्थ के साथसाथ सैक्स लाइफ को भी प्रभावित करता है.

डिप्रैशन: यह सैक्स का सब से बड़ा दुश्मन है. यह पतिपत्नी के संबंधों को प्रभावित करने के साथसाथ परिवार में कलह को भी जन्म देता है. डिप्रैशन के कारण वैसे ही सैक्स की इच्छा में कमी आ जाती है. ऊपर से डिप्रैशन की दवा का सेवन भी कामेच्छा को खत्म करने लगता है.

नींद पूरी न होना: 4-5 घंटे की नींद से हम फ्रैश फील नहीं कर पाते, जिस से धीरेधीरे हमारा स्टैमिना कम होने लगता है. इतना ही नहीं सैक्स में भी हमारा इंट्रैस्ट नहीं रहता है.

गलत खानपान: वक्तबेवक्त खाना और जंक फूड व प्रोसैस्ड फूड का सेवन भी सैक्स ड्राइव को खत्म करता है.

टेस्टोस्टेरौन की कमी: शरीर में मौजूद यह हारमोन हमारी सैक्स इच्छा को कंट्रोल करता है. इस की कमी से पतिपत्नी दोनों ही प्रभावित होते हैं.

बर्थ कंट्रोल पिल्स: बर्थ पिल्स महिलाओं में टेस्टोस्टेरौन लैवल को कम करती हैं, जिस से महिलाओं में सैक्स संबंधों को ले कर विरक्ति हो जाती है. पतिपत्नी का दांपत्य जीवन तभी सफल होता है, जब सैक्स में दोनों एकदूसरे को सहयोग करें. सैक्स एक दोस्त की तरह भी जीवन में रंग भर देता है. शादीशुदा जिंदगी से प्यार की कशिश और इश्क का रोमांच खत्म होने लगा है तो सावधान हो जाएं.

यदि आप की सैक्स लाइफ अच्छी है तो इस का सकारात्मक प्रभाव आप की सेहत पर भी पड़ता है.

जानिए, सैक्स के सेहत से जुड़े कुछ फायदे:

शारीरिक तथा मानसिक पीड़ा में राहत दिलाता है: सैक्स के समय शरीर में हारमोन पैदा होते हैं, जो दर्द की अनुभूति कम करते हैं. भले ही कुछ समय के लिए.

सर्दीजुकाम के असर को कम करता है: सैक्स गरमी, सर्दीजुकाम के प्रभाव को काफी हद तक कम कर देता है. अमेरिका स्थित ओहियो यूनिवर्सिटी के अध्ययन बताते हैं कि चुंबन एवं प्यारदुलार करने से रक्त में बीमारियों से लड़ने वाले टी सैल्स की तादाद बढ़ जाती है.

मानसिक तनाव को कम करता है: सैक्स मन को शांति देने के साथसाथ मूड को भी बढि़या बनाने वाले हारमोन ऐंडोर्फिंस के उत्पादन में वृद्धि करता है. इस के मानसिक तनाव कम हो जाता है.

मासिकधर्म के पूर्व की कमी को कम करता है: सैक्स में लगातार गरमी के चलते ऐस्ट्रोजन स्तर काफी हद तक कम होता है. इस दौरान शरीर में थकान कम महसूस होती है.

दिल के रोग और दौरों की आशंका कम होती है: अकसर दिल के मरीजों को सैक्स संबंध बनाने से दूर रहने की सलाह दी जाती है. मगर अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ हृदयरोग विशेषज्ञ,  डा. के.के. सक्सेना के अनुसार, पत्नी के साथ सैक्स संबंध बनाने से पूरे शरीर का समुचित व्यायाम होता है, जिस से दिमाग तनावरहित हो जाता है. दिल के दौरों की आशंका कम हो जाती है. सैक्स संबंध बनाने से धमनियों में रक्त का प्रवाह और हृदय की मांसपेशियों की क्षमता बढ़ती है.

दूर ही रहो: लौकडाउन में प्यार की हुई नई शुरुआत

‘फूल तुम्हें भेजा है खत में, फूल नहीं मेरा दिल है…’ गौरवी ने सुबह से ही ‘कारवां’ चला रखा था. 5,000 गाने हैं उस में. लौकडाउन के कारण आजकल इन्हीं गानों के सहारे तो उस का दिन कटता है, नहीं तो समझ नहीं आता कि करे तो क्या करे.

इतना पुराना यह गाना सुन कर गौरवी को फिर से करण की याद आ गई. खत कौन लिखता है भला अब. व्हाट्सऐप से झट से अपने दिल का हाल पहुंचा देते हैं अपनों को. यही तो जरिया है अपना दिल बहलाने का.

लेकिन करण मैसेज भी कहां करता है. कहता है कि उस की आदत नहीं ज्यादा लिखनेपढ़ने की. वीडियो भेजा करूं उसे. अब भला अपने मन की बात कहने के लिए मैं वीडियो भेजूंगी.

अच्छा लौकडाउन हुआ है. पता नहीं अब कब मिलना होगा. 15 दिन में एक बार मिल लेते थे, तो दिल को चैन पड़ जाता था. अब लगता है 4-5 महीने तक मिलना नहीं हो पाएगा.

ओफ, करण कितना मिस कर रही हूं तुम्हें. एक साल ही तो हुआ है करण को उस की जिंदगी में आए. विकास के बाद कोई और उस की जिंदगी में आएगा, कल्पना भी नहीं की थी उस ने. विकास को कितना प्यार करती थी वह. वह भी दिलोजान से चाहता था उसे. बेशक अरेंज्ड मैरिज थी उन की लेकिन दोनों की चुहलबाजी, प्यार करने का अंदाज बौयफ्रैंडगर्लफैं्रड जैसा था. विकास अकसर कहता था उस से, ‘गौरवी, मैं ने अच्छा किया कि जल्दी शादी नहीं की वरना तुम मुझे कैसे मिलती.’

दोनों की पसंद भी एकजैसी थी. विकास शौकीनमिजाज था. पढ़ाई में अव्वल तो नहीं कहेंगे लेकिन स्कूलकालेज की बाकी सब ऐक्टिविटीज में सब से आगे रहता. पर्सनैलिटी ऐसी थी कि लड़कियां मरती थीं. लेकिन विकास अपनी ही धुन में रहता था. ऐसा नहीं था कि लड़कियों में उसे इंट्रैस्ट नहीं था, लेकिन पता नहीं क्यों तेजतर्रार, ज्यादा बोलने वाली लड़कियां उसे भाती नहीं थीं.

गौरवी एक ही नजर में दिल में उतर गई थी. उस की बड़ीबड़ी आंखें, सलोना मुखड़ा, धीरेधीरे बोलना उसे इतना भाया कि झट शादी के लिए हां बोल दी. कहां तो शादी की बात भी करना नहीं चाहता था और अब हालत यह थी कि चाहता था महीने के अंदर ही शादी हो जाए. अपने लिए विकास का यह उतावलापन गौरवी को भी भा गया था. एक तरह से गुमान हुआ था अपनेआप पर कि जिस पर इतनी लड़कियां मरती हैं उस ने उसे पसंद किया है. फिर वही हुआ, जैसा विकास चाहता था. महीने के भीतर ही सगाई हुई और फिर शादी. हनीमून के लिए मनाली गए थे वे दोनों.

आज भी सोचती हूं तो वे दिन एक सपने से लगते हैं. कितने रंगीन दिन थे. घूमनाफिरना, खानापीना, एकदूसरे को रिझाना, लुभाना और प्यारभरी बातें, मदभरी रातें. अब भी कभी वे दिन याद आते हैं तो आंखें गीली हो जाती हैं. काश, पुराने दिन वापस आ पाते.

ओफ, क्यों याद आती है पुराने दिनों की. खुशियों से भरे दिन थे, तब ही तो मन में याद कर कसक सी उठती है. शादी के बाद बहुत जल्द ही वह 2 बच्चों की मां बन गई थी. खुद को डूबो दिया था उस ने उन की देखभाल में. वह तो नौकरी भी नहीं करना चाहती थी. उस की सोच हमेशा से यही रही थी कि बच्चों की जिम्मेदारी ली है तो उन्हें अच्छी परवरिश दो. लेकिन विकास को उस का घर में सिर्फ बच्चों के लिए नौकरी छोड़ कर बैठ जाना गवारा न था. वे बोलते, ‘गौरवी, मम्मी हैं न बच्चों की देखरेख के लिए. फिर फुलटाइम मेड भी रख ली है, क्या जरूरत है नौकरी छोड़ने की. घर में रहने से औरत की सारी स्मार्टनैस खत्म हो जाती है. मुझे घरेलू टाइप औरतें बिलकुल पसंद नहीं हैं.’

विकास की अच्छीखासी जौब थी. नौकरी करने की मुझे कोई जरूरत नहीं थी, फिर भी विकास की खुशी के लिए करती रही.जिंदगी मजे से गुजर रही थी. दोनों बच्चे स्कूल जाने लगे थे. बच्चों को खूब लाड़ करते थे विकास. कहते थे मेरे

3 बच्चे हैं. हंसी आ जाती है यह बात सोच कर. वाकई बच्चों की तरह लाड़ करते थे मुझ से. रात में जब मैं विकास की बांहों में होती थी तो बोलते थे, ‘गौरवी, तुम में मुझे रोज नयापन नजर आता है. बहुत प्यार करता हूं तुम से. मेरे सिवा किसी और के बारे में सोचना भी मत कभी.’

कहां सोचा था मैं ने 8 साल तक किसी और के बारे में. सुध ही कहां रह गई थी अपनी, विकास के जाने के बाद. ब्रेन हेमरेज के बाद विकास की मौत ने जैसे सबकुछ बदल दिया था. बच्चे तो समझ ही नहीं पा रहे थे क्या हो रहा है घर में यह सब. मुझे समझ ही नहीं थी दुनियादारी की. न शादी से पहले न कभी कोई जिम्मेदारी ली थी और न शादी के बाद विकास ने मुझे कोई जिम्मेदारी दी. हमेशा यही कहते, ‘मेरे राज में तू ऐश कर, माई डियर. बस, तेरा काम है मुझे खुश रखना, समझी न.’

नौकरी जो मेरा पैशन थी, जरूरत बन गई. फिर हालात इंसान को सब सिखा देते हैं. फिर मेरे मायकेवालों और ससुरालवालों दोनों तरफ से सहारा था मुझे. आर्थिक रूप से कोई कमी न थी मुझे.

जब पिता का साया सिर पर न हो तो बच्चे भी जल्दी समझदार हो जाते हैं. मेरे दोनों बच्चे कभी जिद न करते. स्कूल में जब पेरैंट मीटिंग में जाती, हमेशा बच्चों की तारीफ ही सुन कर आती. बच्चे और घर व नौकरी बस यही जिंदगी रह गई थी.

जिंदगी किसी के जाने से रुकती नहीं है. 8 साल हो गए हैं विकास को गुजरे. तीजत्योहार, खुशी के मौके आते हैं. शादीब्याह नातेरिश्तेदारी में होते रहते हैं. सब क्रियाकलाप होते हैं लेकिन सब ऊपरी तौर पर. मन की खुशी तो सब विकास के जाने के बाद उन्हीं के साथ चली गई थी.

उस दिन को कैसे भूल सकती हूं जिस ने एक बार फिर मेरी जिंदगी का नया अध्याय शुरू किया था. औफिस से मैं ने छुट्टी ली थी. बड़ा बेटा अनुज कालेज गया हुआ था और मनु स्कूल. सासुमां अपने कमरे में आराम कर रही थीं. उन का सारा दिन अपने कमरे में ही गुजरता है. मैं नहाधो कर नाश्ता कर के आराम से अपना मोबाइल ले कर बैठी थी. व्हाट्सऐप हमारी जिंदगी का अब एक जरूरी हिस्सा बन गया है. एकदूसरे का हाल इसी से पता चल जाता है.

‘हाय,’ व्हाट्सऐप पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया.

‘हू आर यू?’ मैं ने सवाल किया.

‘ब्यूटीफुल डीपी,’ जवाब आया.

‘मेरा नबंर कहां से आया आप के पास?’ मैं ने फिर सवाल किया. ‘पता नहीं,’ जवाब आया. और फिर ‘सौरी’ मैसेज कर वह व्यक्ति औफलाइन हो गया.

बात वहीं खत्म हो गई. दोपहर हो गई थी. अनुज कालेज से आ गया था. मैं उसे खाना परोस ही रही थी कि मनु भी स्कूल से आ गया. वह भी झटपट कपड़े बदल कर खाने के लिए बैठ गया.

सब ने साथ ही लंच किया. फिर अनुज सोने के लिए अपने कमरे में और मनु ट्यूशन क्लास के लिए चला गया. मैं भी अपने कमरे में जा कर लेट गई. तभी मोबाइल में मैसेज बीप आई.

‘क्या आप की उम्र जान सकता हूं?’ उसी अनजान नंबर से मैसेज आया.‘आए एम 48,’ मैं ने जवाब दिया.

‘ओह, लेकिन 35 की लगती हैं. अच्छा मेंटेन कर रखा है आप ने अपने को. खैर, उम्र का क्या है. दिल जवान होना चाहिए.’ ‘आप अपने बारे में बताइए,’ मुझे उस के बारे में जानने की उत्सुकता हुई.

‘रोहित नाम है मेरा, देहरादून में रहता हूं, उम्र 32 वर्ष.’‘करते क्या हो?’ मैं ने और जानना चाहा.

‘फादर का बिल्ंिडग कंस्ट्रक्शन का बिजनैस है. मुझे उस में कोई इंट्रैस्ट नहीं. फिर भी इकलौता बेटा हूं, सो उन का कहना मान कर, अपना मन मार कर उन के साथ बिजनैस में ही हूं.’

‘हूं… अच्छा, प्रोफाइल फोटो क्यों नहीं लगाई अपनी, ज्यादा हैंडसम हो क्या?’ मैं ने उस की टांग खींचने की कोशिश की. वैसे भी उम्र में मुझ से काफी छोटा था, इसलिए बात करने में कोई हिचक नहीं हो रही थी.

‘मैडम, क्या आप मुझे देखना चाहती हैं. हां, हैंडसम तो हूं मैं. आएदिन रिश्ते आ जाते हैं. मम्मीपापा पीछे पड़े हैं शादी के लिए. अच्छा खैर छोड़ो, पहले मेरी डीपी देखो.’

‘हूं, गुड लुकिंग. तुम शादी क्यों नहीं करना चाहते?’ डीपी देख कर मैं ने पूछा.

‘शादी में मैं विश्वास नहीं रखता. अपनेआप को एक बंधन में बांधना भला कहां की समझदारी है. शादी के बिना भी जब सब हसरतें पूरी हो सकती हैं तो फिर क्यों यह फंदा गले में डालें.’

‘अपनीअपनी सोच है, ओके. गुड बाय,’ और मैं ने मोबाइल चैट बंद कर दी और मोबाइल चार्जिंग में लगा दिया.

2-3 दिन बीत गए. मैं घर और औफिस दोनों जगह काम में बिजी थी. बुरी तरह थक जाती और रात में बिस्तर पर लेटते ही नींद मुझ पर हावी हो जाती. रोहित से हुई चैट दिमाग से निकल चुकी थी कि एक हफ्ते बाद उस का एक मैसेज आया, ‘आप को बुरा लगेगा लेकिन कहे बिना नहीं रह सकता. आप से प्यार हो गया है मुझे. एक हफ्ते तक अपने दिल को बहुत समझाया मैं ने, लेकिन आप का चेहरा आंखों के सामने से हटता ही नहीं. आज रहा नहीं गया और मैं ने अपने दिल की बात कह डाली.’

‘पागल हो गए हो तुम क्या. मेरे बारे में जानते ही क्या हो. और अपनी उम्र देखी है. कुछ सोचसमझ कर तो

बात करो.’ उस की बात अच्छी नहीं लगी मुझे, ‘तुम ने पूछा नहीं, इसलिए बताया नहीं, सिंगल मदर हूं मैं. 2 बच्चे हैं मेरे और तुम्हें मुझ से प्यार हो गया है. मजाक समझते हो प्यार को,’ मैं ने अपना गुस्सा जताया.

‘उम्र से क्या होता है. लेकिन अफसोस हुआ जान कर. तलाकशुदा हैं या फिर आप के हसबैंड…’

‘हां, माई हसबैंड इज नो मोर. 8 साल हो चुके हैं.’ मैं पता नहीं क्यों अपने बारे में उसे बताती गई.

‘क्या आप को फिर से खुशी पाने का कोई हक नहीं. बहुत प्यार करती हैं अपने पति से आप. लेकिन जिंदगी सिर्फ यादों के सहारे तो नहीं चलती.’ रोहित की बातें न जाने क्यों मुझे अपने बारे में सोचने पर मजबूर करने लगी थीं.

अब अकसर हमारे बीच चैट होने लगी. उस की रोमांटिक बातें मुझे अच्छी लगने लगी थीं. दोबारा से मन में खुशी की उमंग करवटें लेने लगी थीं. खुद को सजानेसवांरने लगी थी.

एक दिन रोहित का मैसेज आया, ‘दिल्ली आ रहा हूं, तुम से मिलना चाहता हूं. जगह और टाइम रात में मैसेज कर दूंगा.’ मैसेज पढ़ कर दिमाग में एक झटका सा लगा.

‘ओफ, क्या कर रही हूं मैं. नहींनहीं, बिलकुल सही नहीं है यह सब. नहीं मिलना मुझे किसी से,’ और उसी वक्त मोबाइल ले रोहित का नंबर ब्लौक कर दिया.

मैं ने मोबाइल से तो रोहित को ब्लौक कर दिया था लेकिन उस ने मेरे मन में प्यार की जो सुगबुगाहट जगा दी थी उस का क्या. रोहित की बातों ने ही मुझे दोबारा अपने बारे में सोचने पर मजबूर किया था.

अब मन चाहने लगा कि कोई हो जिस से अपने दिल की बात कही जाए. समान मानसिक स्तर, हमउम्र हो. जो मेरे दिल की बात समझे. दोनों एकदूसरे से अपनी फीलिंग्स शेयर कर सकें.

पता नहीं एक दिन मुझे क्या सूझी, मैट्रिमोनियल साइट पर अपना प्रोफाइल बना डाला. बस, फिर क्या था, दिन में ढेरों रिप्लाई आ जाते. उन में से एक करण का भी रिप्लाई आया था. न जाने क्यों करण का प्रोफाइल स्ट्राइक कर गया था. डिर्वोस हो चुका था उस का. कहते हैं न कि जब जिस से मिलना होता है तो रास्ते अपनेआप बनते जाते हैं. पहली ही मुलाकात में करण की बातें, उस की सचाई, उस की पर्सनैलिटी पसंद आ गई थी. वह अंदर से कितना टूटा हुआ है, कितना गुस्सा अपनी टूटी हुई शादी को ले कर उस के भीतर भरा हुआ है, यह भी मुझ से छिपा नहीं था.

प्यार से शायद विश्वास उठ चुका था उस का. लेकिन मैं वाकई दिल से चाहने लगी थी उसे. और जब मैं ने उस से कहा, ‘आई लव यू’ और जवाब में जब वह बोला, ‘नहीं यार, हम दोनों के रिश्ते के बीच में प्यारव्यार मत लाओ. जब दिल टूटता है तो बहुत दर्द होता है.’

कहने को कह दिया था करण ने लेकिन मुझे सुन कर कितना दर्द हुआ था, उस का अंदाजा न हुआ उसे.

एक बार सोचा, नहीं रखना  रिश्ता ऐसे इंसान से जिसे मेरी फीलिंग्स की कद्र ही नहीं. सालों बाद जिंदगी को नया मोड़ क्या मैं करण के साथ दे पाऊंगी? औरों से कितना अलग है. लेकिन शायद उस के सोचने का, समझने का यह तरीका ही उस की क्वालिटी है.

जितना मैं करण को समझती जा रही थी, मिल रही थी, उतना ही पसंद करती जा रही थी. मैं ने सोच लिया था कि करण के मुंह से बुलवा कर ही रहूंगी कि वह मुझ से प्यार करता है.

एक साल हो रहा था, करण और मुझे मिलते हुए. बर्थडे आने वाला था करण का. उस के बर्थडे से 4 महीने पहले मेरे बर्थडे को मुझे काफी स्पैशल फील कराया था उस ने. खुश थी बहुत मैं. उस वक्त तो और भी मजा आया जब लंच कर हम दोनों कार में बैठे और पीछे की सीट पर मैं ने 2 बड़ेबड़े पैकेट रखे देखे.

मैं पूछने ही वाली थी कि करण बोला, ‘गौरवी, मुझे पसंद नहीं बर्थडे पर चौकलेट, फूल वगैरह देना, इन पैकेट में खानेपीने का सामान है तुम्हारे लिए. मुझे जो समझ में आया, ले आया.’

‘अरेअरे, इतना सबकुछ मैं नहीं ले जाती. घर में क्या कहूंगी, किस ने दिया यह सब,’ मैं ने मना किया.

‘मुझे नहीं पता, कुछ भी बता देना. तुम्हें ले कर जाना ही पड़ेगा.’ और आखिरकार मुझे वह सब घर ले जाना ही पड़ा था. बच्चों ने पूछा तो बहाना बना दिया कि फ्रैंड से मंगवाया है, उस की वहां की शौप से. टेस्ट अच्छा होता है, खा कर देखना.

तो ऐसा तो है करण. यह था मेरा गिफ्ट. दिखावा नहीं करता. उस का ऐसा करना मुझे एक तरह से अच्छा ही लगा था. शोशेबाजी मुझे भी पसंद नहीं. हां, लेकिन उस के मुंह से अपने लिए तारीफ न करना, यह कभीकभी अखरता है मुझे. मेरी ड्रैसिंग सैंस के लिए दूसरे लोग कितने अच्छे कंप्लीमेंट देते हैं लेकिन मजाल है कि वह कभी तारीफ कर दे. शिकायत भी करती हूं तो कहता है, ‘बहुत गंदी तारीफ करता हूं मैं. सुनना पसंद करोगी?’ क्या जवाब दूं उस की इस बात का, इसलिए चुप रह जाती हूं.

साल 2020 आया. मन में आया था इस साल सब अच्छा होगा. लेकिन यह क्या, कोविड-19 की पूरे विश्व में छाए खतरे की घंटी ने सब को हिला दिया. देशभर में लौकडाउन हो गया. मिलने को तरस गए थे हम दोनों. फोन पर भी अब ज्यादा बात नहीं कर सकते थे. सब घर पर ही होते थे. करण के बर्थडे के बारे में सोची मेरी सारी प्लानिंग धरी की धरी रह गई थी.

मौका देख कर एक दिन फोन किया तो करण ने झट से कौल पिक कर ली, नहीं तो अकसर जब मैं फोन करती, रिंग जाती रहती. उठता नहीं था फोन और फिर उस के 1 घंटे बाद कौलबैक करता था.

‘कैसी हो, गौरवी,’ करण की आवाज में बेचैनी थी.‘ठीक हूं, बस, इंतजार है कब लौकडाउन खत्म हो और सब ठीक हो जाए. ऐसा लग रहा है बरसों हो गए हैं तुम से मिले.’

‘आई लव यू गौरवी,’ करण के ये शब्द कानों में गूंज गए.‘ओह करण, आखिरकार तुम ने बोल ही दिया जो मैं सुनने के लिए तरस गई थी. लौकडाउन ने तुम्हें एहसास करा दिया कि तुम मुझ से प्यार करते हो,’ मैं खुशी से बोली.

‘हां, ऐसा ही समझ लो. नहीं रह पा रहा हूं तुम्हारे बिना. आई मिस यू मैडली,’ आज लग रहा था करण के दिल में वही चाहत है जो मेरे दिल में उस के लिए.

‘चलो, लौकडाउन ने हमारे बीच के प्यार को और बढ़ा दिया. अब जब मिलेंगे, वो मिलना कुछ और ही होगा.’ फोन रख दिया था मैं ने. अपनों के लिए, अपने लिए जरूरी था कि हम दूर ही रहें. कैसी मजबूरी थी यह. अपने दिल का हाल बयां करती भी तो किस से. कुछ रिश्ते बताए नहीं जाते और न दूसरा कोई समझ सकता है. करण तुम ठीक कहते हो हमारी फीलिंग्स कोई नहीं समझ सकता क्योंकि अधूरापन, अकेलापन हम जी रहे हैं, दूसरे नहीं. हम एकदूसरे को समझ रहे हैं, यही काफी है.

एक बार फिर मन को समझाया, ‘कल की खुशी के लिए तुम दूर ही रहो.’ और बेमन से मेज पर रखे रिमोट से टैलीविजन औन किया. सभी न्यूज चैनलों पर लौकडाउन कोविड-19 की खबरें आ रही थीं और स्क्रीन पर नीचे लगातार लिखा आ रहा था, ‘घर पर रहो, सुरक्षित रहो.’

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