family story in hindi
family story in hindi
उम्र का एक ऐसा पड़ाव आता है जब महिलाएं प्रजनन की उम्र को पार कर रजोनिवृत्ति की ओर कदम बढ़ाती हैं. यह उम्र का नाजुक दौर होता है, जब शरीर कई बदलावों से गुजरता है. इस में ऐस्ट्रोजन हारमोन का लैवल कम होने से हड्डियों की कमजोरी, टेस्टोस्टेरौन हारमोन के कम होने के कारण मांसपेशियों की कमजोरी तथा वजन बढ़ने से मधुमेह व उच्च रक्तचाप होने की संभावना बढ़ जाती है.
ऐसे में चालीस पार महिलाएं कैसे अपने शरीर का ध्यान रखें? अपनी नियमित दिनचर्या में क्या बदलाव लाएं ताकि स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सकें? ऐसे ही और कई प्रश्नों के उत्तरों के लिए स्त्रीरोग विशेषज्ञ डा. निर्मला से मुलाकात की:
40+ की उम्र में महिलाओं के अंदर क्या क्या बदलाव आते हैं?
40+ उम्र में शारीरिक बदलाव में प्रमुख है वजन का बढ़ना. महिलाओं के कूल्हों, जांघों के ऊपरी हिस्सों और पेट के आसपास चरबी जमा होने लगती है. वजन बढ़ने के कारण उच्च रक्तचाप व मधुमेह का खतरा भी बढ़ जाता है. इस के अलावा ऐस्ट्रोजन हारमोन का लैवल घटने से हड्डियां कमजोर होने लगती हैं, जिस से बचाव के लिए स्वस्थ आहार (कम कैलोरी का भोजन, प्रोटीन भोजन में शामिल करना, फल, सब्जियां, अंकुरित व साबूत अनाज) अपनाना चाहिए.
वजन पर नियंत्रण रखने के लिए कम से कम 30 मिनट तक नियमित व्यायाम जरूर करना चाहिए. व्यायाम कार्डियो ऐक्सरसाइज, ऐरोबिक्स आदि रूप में हो सकता है. टेस्टोस्टेरौन हारमोन स्राव की कमी मांसपेशियों पर असर डालती है, जिस के कारण फ्रोजन शोल्डर (कंधों में तेज दर्द होना व जाम की स्थिति) की परेशानी भी हो सकती है.
व्यायाम के द्वारा ही इस पर काबू पाया जा सकता है.
दूसरा बदलाव मानसिक तौर पर होता है, जिस में हारमोन की गतिविधियों के कारण मूड स्विंग होता है. कभीकभी चिड़चिड़ापन बढ़ने लगता है, गुस्से पर काबू खोने लगता है. ऐसे में यदि उन के साथ सहानुभूति, प्रेम का वातावरण स्थापित न हो तो कई महिलाएं डिप्रैशन की शिकार भी हो जाती हैं.
आजकल ब्रैस्ट कैंसर व गर्भाशयमुख कैंसर के केस बहुत आम हो गए हैं. इस से बचाव व स्वयं सतर्कता जांच कैसे करें?
स्तन कैंसर का इलाज मौजूद है, बशर्ते महिलाएं इस की शुरुआत होते ही इलाज शुरू कर दें. सर्वप्रथम स्नान के समय अपने एक हाथ को ऊपर उठा कर दूसरे हाथ से स्तन की जांच स्वयं करनी चाहिए. किसी भी प्रकार की गांठ या स्राव निकलने पर तुरंत डाक्टर से संपर्क करना चाहिए.
इसी प्रकार योनि से किसी भी प्रकार का स्राव, मासिकचक्र के अतिरिक्त समय पर होने पर सजग हो जाना चाहिए. इसकी जानकारी डाक्टर को जरूर देनी चाहिए. जिन के परिवार में कैंसर के मरीज पूर्व में रहे हों जैसे नानी या मां को कैंसर हुआ हो, उन्हें नियमित तौर पर वीआईए टैस्ट, पीएपी टैस्ट जरूर करवाना चाहिए.
ऐनीमिया यानी महिलाओं में खून की कमी भी हो जाती है. इसके बचाव के क्या उपाय हैं?
हमारे देश में यह परेशानी बहुत आम हो गई है. इसके प्रमुख लक्षण हैं कमजोरी, शरीर पीला पड़ना, सांस फूलना. गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली महिलाओं में यह कमी ज्यादा देखने को मिलती है. सरकारी अस्पतालों में आयरन की गोलियां मुफ्त उपलब्ध कराई जाती हैं, अत: इनका सेवन कर आयरन की कमी पर काबू पाया जा सकता है, इस के अतिरिक्त हरी पत्तेदार सब्जियां, गुड़, काले चने, खजूर, सेब, अनार, अमरूद इत्यादि में आयरन की प्रचुर मात्रा होती है. लोहे के बरतनों में खाना पकाने से भी शरीर को आयरन की पूर्ति होती है. इसके अलावा 6 माह के अंतराल में कीड़ों की दवा जरूर लेनी चाहिए.
40+ महिलाओं में कैल्सियम की कमी क्यों बढ़ जाती है?
हां, स्तनपान कराने वाली महिलाओं, गर्भवती महिलाओं के अलावा यह कमी 40+ महिलाओं में ऐस्ट्रोजन हारमोन घटने के कारण भी होने लगती है. इसे दूर करने के लिए दूध, पनीर और दूध से बने पदार्थों का नियमित सेवन करना चाहिए. गर्भवती महिला को 3 माह के गर्भ के बाद से ही कैल्सियम की गोली रोज खानी शुरू कर देनी चाहिए. शिशु को स्तनपान कराने वाली मांएं 3-4 गिलास दूध का नियमित सेवन करें. 40+ महिलाओं को विटामिन डी युक्त कैल्सियम खाना चाहिए. धूप का सेवन भी लाभदायक रहता है. समयसमय पर कैल्सियम व विटामिन डी का टैस्ट भी करवाना चाहिए.
शुगर यानी डायबिटीज भी महामारी का रूप लेती जा रही है. इस से बचाव के क्या उपाय हैं?
गर्भावस्था में उन महिलाओं को मधुमेह होने की संभावना बढ़ जाती है, जिनके माता या पिता को यह पहले से हो या महिलाओं को पौलिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम की बीमारी हो. 40+ में भी यह उन महिलाओं को होती हैं, जिनके परिवार में यह बीमारी पहले से हो. इस के अलावा खानपान में लापरवाही और शारीरिक निष्क्रियता भी इस बीमारी के होने के प्रमुख कारणों में हैं. इस के लक्षणों में प्रमुख हैं- वजन बढ़ना, अधिक भूख व प्यास लगना और बारबार पेशाब जाना.
इस के बचाव के लिए 40+ होने पर वर्ष में एक बार अपना रूटीन चैकअप कराना चाहिए और खून की जांच (ब्लड शुगर फास्टिंग) और (ब्लड शुगर पीपी) खाना खाने के डेढ़ घंटे के बाद करवानी चाहिए.
इस समस्या के प्रकट होने पर अपने आहार एवं दिनचर्या में बदलाव ला कर इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है. नियमित व्यायाम व खाने में मीठी चीजों, शकरकंद, आलू, केला, आम, अरबी, चावल आदि का परहेज करना चाहिए. समस्या बढ़ने पर दवा व इंसुलिन के इंजैक्शन भी उपलब्ध हैं, जिन्हें डाक्टर की सलाह एवं निगरानी में लेना चाहिए.
थायराइड की समस्या उत्पन्न होने के क्या कारण हैं?
अकसर किशोरावस्था व गर्भवती महिलाओं में जो थायराइड की समस्या देखने को मिलती है उसे हाइपोथाइरोडिज्म कहते हैं. इसके लक्षणों में प्रमुख हैं गले में सूजन, वजन का बढ़ना, मासिकधर्म की अनियमितता आदि.
किशोर युवतियों को शारीरिक विकास के लिए आयोडीन की जरूरत होती है, जिसकी कमी होने से प्यूबर्टी गोइटर हो जाता है. इसके अलावा किसी विशेष क्षेत्रवासियों में भी यह कमी देखने को मिलती है. इसका कारण वहां की जमीन में ही आयोडीन की कमी होना है.
खून की जांच कराने पर इसकी कमी पता चल जाती है. आयोडीन नमक का प्रयोग एवं अपने डाक्टर की सलाह लेकर नियमित दवा का सेवन करना चाहिए. अकसर लड़कियों में यह कमी 20-21 वर्ष के बाद ठीक हो जाती है तो गर्भवती महिलाओं में प्रसव के बाद इस के लक्षण समाप्त हो जाते हैं.
मेनोपौज की शुरुआत किस उम्र से शुरू होती है?
मेनोपौज महिलाओं की उस अवस्था को कहते हैं जब अंडाशय में अंडाणुओं के बनने की क्रिया समाप्त होने लगती है और मासिक धर्म बंद हो जाता है. जब लगातार 12 महीने मासिकधर्म न आए तो इसे हम रजोनिवृत्ति कहते हैं. मेनोपौज होने का मतलब है प्रजनन क्षमता का खत्म हो जाना. यह 40 से 50 वर्ष के बीच की उम्र में हो सकती है.
सभी महिलाओं में अंडाणु के निर्माण होने और फिर इस चक्र के बंद हो जाने का एक अलग समय होता है. महिला के गर्भधारण करने के लिए प्रोजेस्टेरौन और ऐस्ट्रोजन हारमोन का बनना जरूरी होता है. जब ये दोनों हारमोन बनने बंद होने लगते हैं तो महिलाओं के मासिक धर्म और डिंबोत्सर्जन से नियंत्रण हट जाता है और मासिक धर्म अनियमितता व मासिक धर्म बंद होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. महिला की 40 से 50 वर्ष की उम्र भी एक कारक है.
मेनोपौज के कारण शरीर में निम्न परिवर्तन आते हैं जैसे गर्भाशय का आकार छोटा होना, शरीर में थकावट, अचानक तीव्र गरमी लगना, जोड़ों में दर्द होना, शरीर में अतिरिक्त वसा का जमाव, नींद में खलल बढ़ जाना आदि. इन लक्षणों के कारण व्यग्रता या अवसाद की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है.
मेनोपौज एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिस के लिए किसी प्रकार की दवा की जरूरत नहीं होती है, किंतु योनि के सूखेपन या बारबार होने वाली तीव्र गरमी को कम करने के लिए डाक्टर से परामर्श ले सकती हैं.
शाम का धुंधलका सूर्य की कम होती लालिमा को अपने अंक में समेटने का प्रयास कर रहा था. घाट की सीढि़यों पर कुछ देर बैठ अस्त हो रहे सूर्य के सौंदर्य को निहार कर कुसुम खड़ी हुईं और अपने घर की ओर चलने लगीं. आज उन के कदम स्वयं गति पकड़ रहे थे…जब फूलती सांसें साथ देने से इनकार करतीं तो वह कुछ पल को संभलतीं मगर व्याकुल मन कदमों में फिर गति भर देता. बात ही कुछ ऐसी थी. कल सुबह की टे्रन से वह अपनी इकलौती बेटी नेहा के घर जा रही थीं. वह भी पूरे 2 साल बाद.
यद्यपि नेहा के विवाह को 2 साल से ऊपर हो चले थे मगर कुसुम को लगता था जैसे कल की बात हो. कुसुम के पति नेहा के जन्म के कुछ सालों के बाद ही चल बसे थे. उन के निधन के बाद कुसुम नन्ही नेहा को गोद में ले कर प्राकृतिक छटा से भरपूर उत्तराखंड के एक छोटे से कसबे में आ गईं. इस जगह ने कुसुम को वह सबकुछ दिया जो वह खो चुकी थीं. मानप्रतिष्ठा, नौकरी, घर और नेहा की परवरिश में हरसंभव सहायता.
कुसुम ने भी इन एहसानों को उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने छोटा सा स्कूल खोला, जो धीरेधीरे कालिज के स्तर तक पहुंच गया. उन्हीं की वजह से कसबे में सर्वशिक्षा अभियान को सफलता मिली.
कुसुम के पड़ोसी घनश्यामजी जब भी नेहा को देखते कुसुम से यही कहते, ‘बहनजी, इस प्यारी सी बच्ची को तो मैं अपने परिवार में ही लाऊंगा,’ और समय आने पर उन्होंने अपनी बात रखते हुए अपने भतीजे अनुज के लिए नेहा का हाथ मांग लिया.
अनुज एक संस्कारी और होनहार लड़का था. वह उत्तर प्रदेश सरकार के बिजली विभाग में इंजीनियर था. कुसुम ने नेहा को विवाह में देने के लिए कुछ रुपए जोड़ कर रखे थे, मगर अनुज ने स्पष्ट रूप से कह दिया था कि मुझे आप के आशीर्वाद के सिवा और कुछ नहीं चाहिए. मेरी पत्नी को मेरी कमाई से ही गृहस्थी चलानी होगी, अपने मायके से लाई हुई चीजों से नहीं. और उस की इस बात को सुन कर पल भर के लिए कुसुम अतीत में खो गई थीं.
उन के अपने विवाह के समय उन के पति ने भी ऐसा ही कुछ कह कर दहेज लेने से साफ मना कर दिया था. अपने दामाद में अपने दिवंगत पति के आदर्श देख कर कुसुम अभिभूत हो उठी थीं.
नेहा के विवाह के 2 महीने बाद कुसुम को कालिज के किसी काम से दिल्ली जाना था. लौटते हुए वह कुछ समय के लिए मेरठ में बेटीदामाद के घर रुकी थीं. बड़ा आत्मिक सुख मिला था कुसुम को नेहा का सुखी घरसंसार देख कर. हालांकि देखने में उन का घर किसी भी दृष्टि से सरकारी इंजीनियर का घर नहीं लग रहा था, फर्नीचर के नाम पर कुल 4 बेंत की कुरसियां थीं, 1 मेज और पुराना दीवान था. सामने स्टूल पर रखा छोटा ब्लैक एंड वाइट टीवी रखा था जो शायद अनुज के होस्टल के दिनों का साथी था. उन का घर महंगे इलेक्ट्रोनिक उपकरणों और फर्नीचर से सजाधजा नहीं था मगर उन के प्रेम की जिस भीनीभीनी सुगंध ने उन के घर को महका रखा था उसे कुसुम ने भी महसूस किया था और वह बेटी की तरफ से पूरी तरह संतुष्ट हो खुशीखुशी अपने घर लौट आई थीं. आज वह एक बार फिर अपनी बेटी के घर की उसी सुगंध को महसूस करने जा रही थीं.
स्टेशन पर उतरने के बाद कुसुम की बेचैन आंखें बेटीदामाद को खोज रही थीं कि तभी पीछे से नेहा ने उन की आंखों पर हाथ रखरख कर उन्हें चौंका दिया. अनुज तो नहीं आ पाया था मगर नेहा अपनी मां को लेने ठीक समय पर पहुंच गई थी.
कुसुम ने बेटी को देखा तो वह कुछ बदलीबदली सी नजर आई थी, गाढ़े मेकअप की परत चढ़ा चेहरा, कीमती परिधान, हाथों और गले में रत्नजडि़त आभूषण. इन 2 सालों में तो जैसे उस का पूरा व्यक्तित्व ही बदल गया था. कुसुम सामान उठाने लगीं तो नेहा ने यह कहते रोक दिया, ‘‘रहने दो, मम्मी, ड्राइवर उठा लेगा.’’
नेहा, मां को लेने सरकारी जीप में आई थी. जीप में बैठ नेहा मां को बताने लगी, ‘‘मम्मी, अनुज आजकल बड़े व्यस्त रहते हैं इसलिए मेरे साथ नहीं आ सके. हां, आप को लेने के लिए इन्होंने सरकारी जीप भेज दी है…हाल ही में इन का प्रमोशन हुआ है, बड़ी अच्छी जगह पोस्टिंग हुई है…उस जगह पर पोस्टिंग पाने के लिए इंजीनियर तरसते रहते हैं मगर इन को मिली…खूब कमाई वाला एरिया है…’’ इस के आगे के शब्द कुसुम नहीं सुन सकीं. नेहा के बदले व्यक्तित्व से वह पहले ही विचलित थीं. उन के मुंह से निकला, ‘कमाई वाला एरिया.’
नेहा की हर एक हरकत…हर एक बात उस की सोच में आए बदलाव का संकेत दे रही थी. उस की आंखों में बसी सादगी और संतुष्टि की जगह कुसुम को पैसे की चमक और अपने स्टेटस का प्रदर्शन करने की चाह नजर आ रही थी.
घर पहुंच कर कुसुम ने पाया कि घर भी नेहा की तरह उन के बढ़े हुए स्टेटस का खुल कर प्रदर्शन कर रहा है. आधुनिक साजसज्जा से युक्त घर में ऐशोआराम की हर एक चीज मौजूद थी.
‘‘लगता है, अनुज ने इन 2 सालों में काफी तरक्की कर ली है,’’ कुसुम ने चारों ओर दृष्टि घुमाते हुए पूछा.
‘‘अनुज ने कहां की है मम्मी, मैं ने जबरन इन के पीछे पड़ कर करवाई है… जब मैं ने देखा कि कभी इन के नीचे काम करने वाले कहां के कहां पहुंच गए और यह वहीं अटके पड़े हैं तो मुझ से रहा न गया…वैसे इन का बस चलता तो अभी तक हम उसी कबूतरखाने में पड़े रहते…’’
कुसुमजी समझ गईं कि उन की बेटी, शहर आ कर काफी सयानी हो गई है और पैसे बनाने की अंधी दौड़ में शामिल हो चुकी है. इस बात को ले कर वह गहन चिंता में डूब गईं.
‘‘अरे, मम्मी, आप अभी तक यों ही बैठी हैं, जल्दी से हाथमुंह धो कर फे्रश हो जाइए…खाना तैयार है…आप थकी होंगी, सो जल्दी खा कर सो जाइए…कल आराम से बातें करेंगे.’’
‘‘अनुज को आने दे…साथ ही डिनर करेंगे…वैसे बहुत देर हो गई है, कब तक आता है?’’
‘‘उन का तो कुछ भरोसा नहीं है, मम्मी, जब से प्रमोशन हुआ है अकसर देर से ही आते हैं…मैं तो समय पर खाना खा कर सो जाती हूं, क्योंकि ज्यादा देर से सोने से मेरी नींद उचट जाती है. वह जब आते हैं तो उन्हें नौकर खिला देता है.’’
‘‘मैं अनुज के साथ ही खाऊंगी, वैसे भी मुझे अभी भूख नहीं है, तुम चाहो तो खा कर सो जाओ…’’ कुसुम ने जवाब दिया.
थोड़ी ही देर में अनुज घर आया और आते ही कुसुम के चरण स्पर्श कर अभिवादन करते हुए बोला, ‘‘क्षमा करें, मम्मीजी, कुछ जरूरी काम आ गया था सो आप को लेने स्टेशन नहीं पहुंच सका.’’
‘‘कोई बात नहीं, बेटा,’’ कुसुमजी बोलीं, ‘‘मगर यह तुम्हें क्या हो गया है… तुम्हारी तो सूरत ही बदल गई है…माना काम जरूरी है पर अपना ध्यान भी तो रखना चाहिए…’’
सचमुच इस अनुज की सूरत 2 साल पहले वाले अनुज से बिलकुल मेल नहीं खाती थी…निस्तेज आंखें, बुझा चेहरा, झुके कंधे, निष्प्राण सा शरीर…उस का पूरा व्यक्तित्व ही बदल गया था.
‘‘बस, मम्मीजी, क्या कहूं…काम कुछ ज्यादा ही रहता है,’’ इतना कह कर वह नजरें झुकाए अपने कमरे में चला गया और वहां जा कर नेहा को आवाज लगाई, ‘‘नेहा, ये 20 हजार रुपए अलमारी में रख दो, ये घर पर ही रहेेंगे…बैंक में जमा मत कराना.’’
अनुज के कमरे से आ रही पतिपत्नी की धीमी आवाज ने कुसुम पर वज्रपात कर दिया. 20 हजार रुपए, वह भी महीने के आखिर में…कहीं ये रिश्वत की कमाई तो नहीं…नेहा कह भी रही थी कि खूब कमाई वाले एरिया में पोस्टिंग हुई है…तो इस का अर्थ है कि इन दोनों को पैसे की भूख ने इतना अंधा बना दिया है कि इन्होंने अपने संस्कार, नैतिकता और ईमानदारी को ताक पर रख दिया. नहीं…मैं ऐसा हरगिज नहीं होने दूंगी…कुछ भी हो इन्हें सही राह पर लाना ही होगा. मन में यह दृढ़ निश्चय कर वह सोने चली गईं.
आज रविवार था. अनुज घर पर ही था. उस के व्यवहार से कुसुमजी को लग रहा था जैसे वह घरपरिवार की तरफ से उदासीन हो कर अपने में ही खोया…गुमसुम सा…भीतर ही भीतर घुट रहा है…घर की हवा बता रही थी कि उन दोनों का प्यार मात्र औपचारिकताओं पर आ कर सिमट गया है, मगर नेहा इस माहौल में भी बेहद सुखी और संतुष्ट नजर आ रही थी और यही बात कुसुम को बुरी तरह कचोट रही थी.
‘‘मम्मी, आज इन की छुट्टी है. चलो, कहीं बाहर घूम कर आते हैं और आज लंच भी फाइव स्टार होटल में करेंगे,’’ नेहा ने चहकते हुए प्रस्ताव रखा.
‘‘नहीं…आज हम तीनों कहीं नहीं जाएंगे बल्कि घर पर ही रह कर ढेर सारी बात करेंगे…और हां, आज खाना मैं बनाऊंगी,’’ कुसुमजी ने नेहा के प्रस्ताव को नामंजूर करते हुए कहा.
‘‘वाह, मम्मीजी, मजा आ जाएगा, नौकरों के हाथ का खाना खाखा कर तो मेरी भूख ही मर गई,’’ अनुज ने नेहा पर कटाक्ष किया.
‘‘हां…हां, जब घर में नौकरचाकर हैं तो मैं क्यों रसोई का धुआं खाऊं,’’ नेहा ने प्रतिवाद किया.
‘‘तुम्हें मसालेदार छोले और भरवां भिंडी बहुत पसंद हैं न…वही बनाऊंगी,’’ कुसुमजी ने बात संभाली.
‘‘अरे, मम्मीजी, आप को मेरी पसंद अभी तक याद है…नेहा तो शायद भूल ही गई,’’ अनुज के एक और कटाक्ष से नेहा मुंह बनाते हुए वहां से उठ कर चली गई.
‘‘चलो, बाहर लौन में बैठ कर कुछ देर धूप सेंकी जाए. मुझे तुम दोनों से कुछ जरूरी बातें भी करनी हैं,’’ लंच से निबट कर कुसुम ने सुझाव रखा.
बाहर आ कर बैठते ही कुसुम की भावमुद्रा बेहद गंभीर हो गई. उन की नजरें शून्य में ऐसे ठहर गईं जैसे अतीत के कुछ खोए हुए लमहे तलाश कर रही हों. कुछ देर खुद को संयत कर उन्होंने बोलना शुरू किया, ‘‘आज मैं तुम दोनों के साथ अपनी कुछ ऐसी बातें शेयर करना चाहती हूं जिन का जानना तुम्हारे लिए बेहद जरूरी है. बात उन दिनों की है जब मैं नेहा के पापा से पहली बार मिली थी. वह भी अनुज की तरह ही सरकारी विभाग में इंजीनियर थे. बेहद ईमानदार और उसूलों के पक्के. वह ऐसे महकमे में थे जहां रिश्वत का लेनदेन एक आम बात थी मगर वह उस कीचड़ में भी कमल की तरह निर्मल थे. हम ने एकदूसरे को पसंद किया और शादी कर ली. उन की जिद के चलते हमारी शादी भी बड़ी सादगी से और बिना किसी दानदहेज के हुई थी. पहले उन की पोस्टिंग उत्तरकाशी में थी.
‘‘साल भर बाद उन का तबादला गाजियाबाद हो गया. वह एक औद्योगिक शहर है, जो ऊपरी कमाई की दृष्टि से बहुत अच्छा था. वहां हमें विभाग की सरकारी कालोनी में घर मिल गया. उन्होंने मुझे शुरू से ही हिदायत दी थी कि मैं वहां सरकारी कालोनी में रह रहे बाकी इंजीनियरों की बीवियों और उन के रहनसहन की खुद से तुलना न करूं क्योंकि उन का उच्च स्तरीय जीवन उन के काले धन के कारण है, जो हमारे पास कभी नहीं होगा.
‘‘धीरेधीरे मेरा पासपड़ोस में मेलजोल बढ़ने लगा और न चाहते हुए भी मैं उन के ठाटबाट से प्रभावित होने लगी. मेरे मन में भी उन सब की देखादेखी ऐशोआराम से रहने की इच्छा जागने लगी. मुझे लगने लगा कि यह लेनदेन तो जगत व्यवहार का हिस्सा है, जब इस दुनिया में हर कोई पैसे बटोर कर अपना और अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर रहा है तो हम ही क्यों पीछे रहें…
‘‘बस, मैं ने अपनी सहेलियों के बहकावे में आ कर उन पर दबाव डालना शुरू कर दिया मगर उन्होंने अपने आदर्शों के साथ समझौता करना नहीं स्वीकारा. मैं उन्हें ताने देती, उन के सहकर्मियों की तरक्की का हवाला देती, यहां तक कि मैं ने उन्हें एक असफल पति भी करार दिया, मगर वह नहीं झुके.
‘‘इन्हीं उलझनों के बीच मैं गर्भवती हुई तो वह तमाम मतभेदों को भूल कर बेहद खुश थे. मैं ने उन से स्पष्ट कह दिया कि मैं इस हीनता भरे दमघोंटू माहौल में किसी बच्चे को जन्म नहीं दूंगी. हमारे घर संतान तभी होगी जब तुम अपने खोखले आदर्शों का चोगा उतार कर बाकी लोगों की तरह ही घर में हमारे और बच्चे के लिए तमाम सुखसुविधाओं को जुटाने का वचन दोगे. मुझे गर्भपात कराने पर उतारू देख तुम्हारे पिता टूट गए और धीरेधीरे धन पानी की तरह बरसने लगा…घर सुखसुविधाओं की चीजों से भरता चला गया.
‘‘मैं ने जो चाहा सो पा लिया, मगर तुम्हारे पिता का प्यार खो दिया. उस समय मेरी आंखों पर माया का ऐसा परदा पड़ा था कि मुझे इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ा कि वह किसी मशीन की भांति काम करते जा रहे थे और मैं अपने ऊंचे स्टेटस के मद में पागल थी.
‘‘फिर तुम्हारा जन्म हुआ, तुम्हारे आने के बाद तुम्हारे भविष्य के लिए धन जमा करने की तृष्णा भी बढ़ गई. सबकुछ मेरी इच्छानुसार ही चल रहा था कि एक दिन अचानक…’’
कुसुमजी की वाणी कुछ पल के लिए थम गई और उन की आंखें नम हो गईं….
‘‘एक दिन क्या हुआ, मम्मी?’’ नेहा ने विस्मित स्वर से पूछा.
‘‘…आफिस से खबर आई कि तुम्हारे पिता को भ्रष्टाचार विरोधी दस्ते ने धर दबोचा. अखबार में नाम आया…खूब फजीहत हुई और फिर मुकदमे के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया…जेल जाते हुए उन्होंने मुझ को जिस हिकारत की नजर से देखा था वह मैं कभी भूल नहीं सकती…वह चुप थे, मगर उन की चमकती संतुष्ट नजरें जैसे कह रही थीं कि वह मुझे यों असहाय, भयभीत और अपमानित देख कर बेहद खुश थे.
‘‘बाद में पता चला कि उन्होंने अपनी इच्छा से ही खुद को गिरफ्तार करवाया था और अपना सब कच्चा चिट्ठा अदालत में खोल कर रख दिया था…मुझे दंडित करने का यही तरीका चुना था उन्होंने…जेल में वह कभी मुझ से नहीं मिले और एक दिन पता चला कि वहां उन का देहांत हो गया है…’’
इतना बता कर कुसुमजी फूटफूट कर रो पड़ीं…बरसों से बह रहे पश्चाताप के आंसू अभी भी सूखे नहीं थे…
‘‘मम्मी, इतनी तीक्ष्ण पीड़ा आप ने इतने साल कैसे छिपा कर रखी…मुझे तो कभी आभास भी नहीं होने दिया.’’
‘‘मन में अपार ग्लानि थी. बस, यही साध थी मन में कि बाकी जीवन उन के आदर्शों पर चल कर ही बिताऊं और तुम्हें भी तुम्हारे पिता के संस्कार दूं. मैं अब बूढ़ी हो चली हूं, पता नहीं कितने दिनों की मेहमान हूं…और कुछ तो नहीं है मेरे पास, बस यह आपबीती तुम दोनों को धरोहर के रूप में दे रही हूं…
‘‘वैसे, मैं ने देखा है कि जो रिश्वत लेते हैं वे शराबीकबाबी हो जाते हैं और रातरात भर गायब रहते हैं. उन पर काम का भरोसा नहीं किया जा सकता है. और उन्हें छोटेमोटे प्रमोशन ही मिल पाते हैं. बेटी, इंजीनियरिंग ऐसा काम नहीं कि दोचार घंटे गए और हो गया. घंटों किताबों में मगजमारी करनी होती है और जिस को रिश्वत मिलती है, वह किताबों में नहीं पार्टियों में समय बिताता है, हो सकता है तुम्हें ये बातें बुरी लग जाएं पर मेरा अनुभव है. तुम्हारे पिता के जाने के बाद मैं यही तो देखती रही कि मैं गलत थी या तुम्हारे पिता,’’ कुसुम ने बात खत्म करते हुए कहा.
‘‘जरूर काम आएंगी मम्मी,… तुम्हारी यह धरोहर अब कभी मेरे कदम लड़खड़ाने नहीं देगी,’’ नेहा अपनी मां से लिपट गई. उस की आंखों से झरझर आंसू बह रहे थे जिन के साथ उस के भीतर छिपी न जाने कितनी तृष्णाएं भी बही जा रही थीं.
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिले देवरिया की रहने वाली स्मिता मिश्रा के पिता पेशे से टीचर थे. वह चाहते थे कि उनकी बेटी पढलिख कर आगे बढे. स्मिता बचपन से ही बेहद समझदार थी. उन्हें बचपन से ही ज़रूरतमंद और बेसहारा लोगों की सहायता करना अच्छा लगता है. बचपन में जो भी पैसा मिलता था उसे गुल्लक में रखती थी और दीपावली के त्यौहार मॆ इकट्ठा किए गए पैसों को गरीब बच्चों में बांट देती थी. 12 वीं की पढाई के बाद स्मिता मिश्रा ने वाराणसी और इलाहाबाद से आगे की पढाई पूरी की. वह अपने पिता की तरह ही टीचर बनकर समाज की सेवा करना चाहती थी. अपनी शिक्षा पूर्ण कर प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से उच्च शिक्षा में अर्थशास्त्र विषय मे असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में चयनित होकर वर्तमान में आजमगढ जिले के श्री अग्रसेन महिला महाविद्यालय में लडकियों को पढाने का काम कर रही है. लडकियों की शिक्षा और समाज की हालत पर पेश है स्मिता मिश्रा के साथ एक खास बातचीत:-
सवाल- आमतौर पर लडकियां अर्थशास्त्र जैसे विषय में पढाई कम ही करती है. आपको यह शौक़ कैसे हुआ ?
0 – मेरे पिता टीचर से रिटायर हुये है. उनका मेरे जीवन पर बहुत प्रभाव रहा है. उनका मानना था कि लडकियों को अपनी शिक्षा पूरी करने के साथ ही साथ आत्मनिर्भर होना चाहिये. लडकियां जब खुद आत्मनिर्भर होगी तो उनको कोई आगे बढने से रोक नहीं पायेगा. वह अपने पसंद के फैसले खुद कर सकती है।मेरा भी यही मानना है.हर लड़की को शिक्षित होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना बहुत आवश्यक है.
सवाल- लड़कियों को अर्थशास्त्र विषय पढ़ने के क्या फ़ायदे हैं ?
0 – लड़कियाँ बीए (ऑनर्स) इकनॉमिक्स के बाद इसी विषय में मास्टर्स भी करती हैं तो बैंकिंग, फाइनैंशल और इन्वेस्टमेंट सेक्टर, इंश्योरेंस, टीचिंग, मैनेजमेंट, आदि क्षेत्रों में जॉब के अवसर हो सकते हैं। इसके अलावा
घर को चलाने का सबसे बडा जिम्मा महिलाओं पर ही होता है. बैंक के काम हो या होम लोन या और भी जरूरी काम. जब फाइनेंस में महिलाओं की रूचि होगी तो वह बेहतर तरह से अपनी जिम्मेदारी संभाल सकती है. इससे पति की भी मदद हो सकेगी. गणित विषय में रूचि कम होने के कारण महिलाओं को फाइनेंस और अर्थशास्त्र जैसे विषय पसंद नहीं आते है. पर महिलाओं को इनमें रूचि लेनी चाहिये।
सवाल- गांव और पिछडे जिलों में लडकियों की शिक्षा की क्या स्थिति है ?
0 – पहले के मुकाबले आज लडकियों की शिक्षा काफी बेहतर हालत में है.लेकिन आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में हायर एजूकेशन में लडकियां पीछे है. इसके लिये सरकार बेहतर प्रयास कर रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी सरकार में लडकियों की पढाई को प्रोत्साहित करने के लिये अनेकों योजनाएँ चलाई हैं.लडकियों को टैबलेट, स्मार्टफोन और लैपटाप देने का काम किया है ताकि उन्हें ऑनलाइन पढ़ाई करने में मदद मिल सके. उन्हें कॉलेज आने में किसी तरह की परेशानी न हो इसके लिये कानून व्यवस्था का मजबूत किया गया है. इसका प्रभाव दिख रहा है. स्कूल कालेज में लडकियों की तादाद बढती दिखने लगी है.
सवाल- सोशल मीडिया का लडकियों पर क्या प्रभाव पड रहा है ?
0 – सोशल मीडिया ने लडकियो को आजादी दी है. इसके जरीये वह तमाम जानकारियां घर बैठे हासिल कर सकती है. जो उनके कैरियर को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है. साथ ही वह अपने हुनर को लोगो तक पहुँचा सकती है
जिन लडकियां की रूचि गाना और डांस में होती है उनको भी सोशल मीडिया से मदद मिलती है. जरूरी यह है कि लडकियां इसका सही तरह से प्रयोग करें.
सवाल- – आपकी हौबीज क्या है ?
0 – मुझे गाडर्निग, फ़ोटोग्राफ़ी , गजल सुनने और किताबे पढने का शौक है. मैं लडकियों से कहती हॅू कि वह अपने कोर्स की किताबों के साथ ही साथ समाचारपत्र और पत्रिकाएं ज़रूर पढे.बाग़वानी करें.
सवाल- आप कालेज में पढाती है, दो छोटे बच्चे है एक साथ घर परिवार सब कैसे मैनेज कर लेती है. ?
0 – पौजिटिव सोच और टाइम मैनेजमेंट के जरीये ही यह सब मैनेज हो रहा है. मेरा मानना है कि महिलाएँ अत्यंत क्षमतावान एवं ऊर्जावान होती हैं जिसका सदुपयोग करके वह कठिन से कठिन राह को भी सरल बना सकतीं हैं.
रात के 11 बज रहे होते, मैं मां की इन गपोरी सहेलियों के बीच कहीं अकेला पड़ा मां के इंतजार में थका सा, ऊबा सा सो गया होता. तब अचानक किसी के झ्ंिझोड़ने से मेरी नींद खुलती तो उन्हीं में से किसी एक सहेली को कहते सुनता, ‘जाओजाओ, मां दरवाजे पर है.’ मैं गिरतापड़ता मां का आंचल पकड़ता. साथ चल देता, नींद से बोझिल आंखों को मसलते. घर पहुंच कर मेरे न खाने और उन की खिलाने की जिद के बीच कब मैं नींद की गुमनामी में ढुलक जाता, मुझे पता न चलता. नींद अचानक खुलती कुछ शोरशराबे से.
भोर के 3 बज रहे होते, मेरी मां पिताजी पर चीखतीं, अपना सिर पीटतीं और पिताजी चुपचाप अपना बिस्तर ले कर बाहर वाले कमरे में चले जाते. मां बड़बड़ाती, रोती मेरे पास सोई मेरी नींद के उचट जाने की फिक्र किए बिना अपनी नींद खराब करती रहतीं.
मैं जैसेजैसे बड़ा हो रहा था, दोस्तों की एक अलग दुनिया गढ़ रहा था. विद्रोह का बीज मन के कोने में पेड़ बन रहा था. हर छोटीबड़ी बातों के बीच अहं का टकराव उन के हर पल झगड़े का मुख्य कारण था. धीरेधीरे सारी बूआओं की शादी के बाद मेरी दादी भी अपने दूसरे बेटे के पास रहने चली गईं. मां का अकेलापन हाहाकार बन कर प्रतिपल अहंतुष्टि का रूप लेता गया. पिताजी भी पुरुष अहं को इतना पस्त होते देख गुस्सैल और जिद्दी होते गए. तीनों भाइयों की दुनिया में उन का घर यथावत था, लेकिन मुझे हर पल अपना घर ग्लेशियर सा पिघलता नजर आता था.
मैं एक ऐसा प्यारभरा कोना चाहता था जहां मैं निश्ंिचत हो कर सुख की नींद ले सकूं, अपनी बातें अपनों के साथ साझा करने का समय पा सकूं. मैं खो रहा था विद्रोह के बीहड़ में.
मैं इस वक्त 10वीं की परीक्षा देने वाला था और अब जल्दी ही इस माहौल से मुक्त होना चाहता था. सभी बड़े भाई अपनीअपनी पढ़ाई के साथ दूसरे शहरों में चले गए थे. मैं ने भी होस्टल में रहने की ठानी. उन दोनों की जिद भले ही पत्थर की लकीर थी लेकिन मेरी जिद के आगे बेबस हो ही गए वे. मेरे मन की करने की यह पहली शुरुआत थी जिस ने अचानक मेरे विद्रोही मन को काफी सुकून दिया. मुझे यह एहसास हुआ कि मैं इसी तरह अपने को खुश करने की कोशिश कर सकता हूं.
बस, जिस मां को मैं इतना चाहता था, जिसे अपनी पलकों में बिठाए रखना चाहता था, जिस की गोद में हर पल दुबक कर उन की लटों से खेलना चाहता था, उन की नासमझी की वजह से दिल पर पत्थर रख कर मारे गुस्से और नफरत के मैं उन से दूर भाग आया.
मेरी जिंदगी में अकेलेपन का सफर काफी लंबा हो गया था. होस्टल की पढ़ाई के बीच दोस्तों के साथ मनमानी मौज अकेलेपन को भुलाने की या उस दर्द को फटेचिथड़ों में लपेट कर दबा देने की नाकाम कोशिश भले ही रही लेकिन मेरा नया मैं, हर वक्त मेरे पुरातन मैं से नजरें चुराए ही रहना पसंद करता था.
जीवनयुद्ध में अब कामयाब होने की बारी थी क्योंकि मैं अकेले जीतेजीते इतना परिपक्व हो गया था कि समझ सकता था कि इस के बिना मैं डूब जाऊंगा. मैं अपनेआप को खुश रखने वाली स्थायी चीजों की तलाश में था. मैं ने अपनी पढ़ाई पूरी की और पिताजी की कृपा से मुक्त होने को एक अदद नौकरी की तलाश में प्रतियोगी परीक्षाएं देने लगा. ऐसा नहीं था कि इस उम्र में लड़कियों ने मेरी जिंदगी में आने की कोशिश न की हो. मैं रूप की दृष्टि से अपनी मां पर गया था, इसलिए भी दूसरों की नजरों में जल्दी पड़ जाना या विपरीत सैक्स का मेरे प्रति सहज मोह स्वाभाविक ही था. और इस मामले में मुझ में गजब का आत्मविश्वास था जिस के चलते मैं स्वयं कभी सम्मोहित नहीं होता था. इन सब के बावजूद शादी को ले कर जो धारणाएं मेरे दिल में थीं उस लिहाज से वे मात्र शरीर सुख के अलावा कुछ नहीं थीं. मगर क्या कहूं इन अच्छे घरों की मासूम लड़कियों को. आएदिन लड़के दिखे नहीं कि थाल में दिल सजा कर आ गईं समर्पण करने.
इस मामले में लड़के भी कम दिलदार नहीं थे. लेकिन मैं इस मामले में पक्का था. जवानी की दहलीज पर दहकती कामनाओं को दिल में पल रहे रोष और विद्रोह का रूप दे कर बस तत्पर था स्थायी सुख की तलाश में.
समय की धार में बह कर एक दिन मैं सरकारी नौकरी के ऊंचे ओहदे की बदौलत क्वार्टर, औफिस सबकुछ पा गया. एक खोखली सी, जैसा कि मेरा पुरातन मैं सोचता, जिंदगी बाहरी दुनिया के लिए बहारों सी खिल गई थी.
कुछ साल और गुजरे. मांपिताजी कभीकभी मेरे बंगले में आ कर रहते. लेकिन बदलते हुए भी बदलना जैसे मुझे आता ही नहीं था.
अब भी मां हर वक्त पिताजी को लगातार कुछ न कुछ सुनाती रहती थीं. शायद अब यह फोबिया की शक्ल ले चुका था. पिताजी ने सोचसमझ कर अपने होंठ सिल रखे थे. ‘हर बात अनसुनी कर दो ताकि सामने वाले को यह एहसास हो कि वह दीवारों से बातें कर रहा है’ की मानसिकता के बूते पर रिश्ते घिसट रहे थे. इन सब के बीच मैं दिनोंदिन ऊबा सा, चिढ़ा सा महसूस करता था, जिस से अब भी उन दोनों को कोई लेनादेना नहीं था.
आखिर मैं ने इस अकेलेपन से उबरने का और थोड़ा मनोरंजन का तरीका ढूंढ़ निकाला, जैसे कि यह कोई जड़ीबूटी या जादू हो. मैं ने दूर प्रदेश की एक रूमानी सूरत वाली गेहुंए रंग की धीर, स्थिर, उच्च शिक्षिता से विवाह कर लिया. तरहतरह की कलाओं में पारंगत, सुंदर, रूमानी और विदुषी बिलकुल मेरी मां की तरह.
नौकरी के शुरुआती साल थे. सुंदर और समझदार पत्नी पा कर मैं घर की ओर से बेफिक्र हो गया था. मैं उसे चाहता था और मेरे चाहने भर से ही वह मुझ पर बिछबिछ जाती थी और यह एहसास जब मेरे लिए काफी था तो उसे पाने की जद्दोजहद कहीं बाकी ही नहीं रही.
इधर, नौकरी में मैं ऊंचे ओहदे पर था. अधीनस्थ मानते थे, सलाह लेते थे, मैं अपने अधिकार का भरपूर प्रयोग कर रहा था. अब तक का जीवन जो अकेलेपन की मायूसी में डूबा था, मेरे काम और तकनीकी बुद्धि की प्रखरता से प्रतिष्ठा की रोशनी से भर गया था. मेरा शारीरिक आकर्षण 30 की उम्र में उफान पर था, आत्मविश्वास चरम पर था, इसलिए मेरा सारा ध्यान बाहरी दुनिया पर केंद्रित था.
मैं एक रौबभरी दमदार जिंदगी का मालिक था, जिस में धीरेधीरे अतीत की हताशाओं पर जीत हासिल करने का दंभ भर रहा था. अतीत का एकांत मेरे पुरातन ‘मैं’ के साथ चमकदमक वाली दुनिया के किसी एक अंधेरे कोने में दुबक कर शिद्दत के साथ मेरा इंतजार कर रहा होता, लेकिन मैं उसे अनदेखा कर के अपनी दुनिया में व्यस्त होता जा रहा था. इसी बीच हमारी जिंदगी में बेटी कुक्कू आ गई. उस के आने के बाद मेरे अंतस्थल में ऐसी और कई परतें उभरीं जिन्हें अब तक मैं नहीं जानता था.
मेरे पिता ने हम बच्चों से दूरी बना कर हमारी नजरों में अपनेआप को जितना बुरा बनाया था और मेरी मां के पिताजी पर चीखनेचिल्लाने से उन की जो छवि हमारी नजरों में बनी थी, मैं अपनी कुक्कू के लिए कतई वह नहीं बनना चाहता था. मैं कुक्कू को पूरी तरह हासिल करने और उस की मां की तरफ झुकाव को बरदाश्त न कर पाने की ज्वाला से कब भरता जा रहा था, न तो मुझे ही पता चला और न ही कुक्कू को.
जब भी मुझे फुरसत मिलती, हम आपस में खेलते, बातें करते, लेकिन प्रतीति हमारे बीच आ जाती तो मैं मायूस हो जाता, कहीं कुक्कू का झुकाव उस की मां की तरफ हो जाए तो मैं अकेला रह जाऊंगा, मैं अपने पिता की तरह परिवार से दूर हो जाऊंगा. यह मेरे परिवार की बेटी है, मेरी बेटी है, मेरी अमानत. आखिर कुछ तो हो जो पूरी तरह से मेरा हो.
मैं अपनी मां को चाह कर भी हरदम अपने करीब न पा सका, जब देखो तब वे बस पिताजी को ले कर व्यस्त रहतीं. नहीं, मुझे सख्ती से प्रतीति को कुक्कू से दूर रखना होगा, उस का हर वक्त मेरे बच्चे को सहीगलत बताना, निर्देश देना मैं बरदाश्त नहीं कर पा रहा था.
कुछ ही देर में नव्या और नैवेद्य रिवर वौक जाने के लिए घर से निकल पड़े. शाम का धुंधलका गहराता जा रहा था.
दोनों नदी किनारे उगी घास पर लगी
कुरसियों को एक कोने में खींच उन पर बैठ गए.
नदी के सामने आसमान छूती अट्टालिकाओं पर जलतीबुझती इंद्रधनुषी
लाइटें, नीले पानी में तैरते पानी के जहाज, सामने आकाश में ढलता हुआ सिंदूरी सूरज, समां बेहद खूबसूरत थी.
तभी नव्या ने कहना शुरू किया, ‘‘नैवेद्य,
मैं एक
विधवा हूं. मेरे पिता ने मेरी शादी महज
16 साल की उम्र में कर दी थी. शादी के मात्र एक साल बाद मेरे पति की मौत हो गई.’’
‘‘ओह, आई ऐम सो सौरी.
बसबस नव्या, मुझे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं तुम्हें शिद्दत से चाहता हूं और मेरी चाहत में ऐसी किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.’’
‘‘उफ नैवेद्य,
पहले मेरी पूरी बात तो सुन लो. मैं एक बेहद गरीब परिवार से हूं. मेरे फादर यूपी के एक छोटे से कसबे में रिकशा चलाते हैं. मेरी 2 छोटी बहनें और 1 भाई है. दोनों
बहनें एमबीबीएस के दूसरे ईयर में और भाई फर्स्ट ईयर में है. पूरे घर की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है. तीनों की मोटी फीस और घर खर्चे में मेरी आधी से ज्यादा तनख्वाह खर्च हो जाती है. तो अपने पास्ट और अपनी जिम्मेदारियों की वजह से मैं ताजिंदगी किसी रिलेशनशिप में बंधना नहीं चाहती. मैं नहीं सोचती कि कोई भी लड़का इन
सब के साथ मुझ से रिश्ता बनाना चाहेगा.
‘‘साथ ही मेरी और तुम्हारी दुनिया में जमीनआसमान का फासला है. तुम एक रईस खानदान से हो और मैं महज एक गरीब रिकशा चलाने वाले की बेटी. हम दोनों का कोई साझा भविष्य नहीं.’’
‘‘तुम गलत हो नव्या. प्यार में ये बातें कोई माने नहीं रखतीं.’’
‘‘बहुत माने रखती
हैं नैवेद्य. क्या तुम्हारे पेरैंट्स एक रिकशे वाले की विधवा बेटी को अपनी बहू के रूप में ऐक्सैप्ट कर लेंगे? कभी नहीं.’’
तभी नैवेद्य ने मंदमंद मुसकराते हुए नव्या
के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा, ‘‘नव्या, मेरे पापा नहीं है. वे आर्मी में ब्रिगेडियर की पोस्ट से रिटायर हुए थे. पिछले साल ही उन की डैथ हुई. बस मम्मा
हैं. मम्मा बेहद ब्रौड माइंडेड हैं. वे मेरी खुशी के लिए कुछ भी कर सकती हैं. एक बार बस तुम्हें देखने भर की देर है, वे तुम्हें भी पूरे मन से अपना लेंगी.’’
‘ ‘नहींनहीं नैवेद्य मेरातुम्हारा कोई मेल नहीं. कहां ब्रिगेडियर कहां एक गरीब रिकशा चलाने वाला.’’
‘‘अरे नव्या मैं तुम्हें कैसे विश्वास दिलाऊं? मैं अब तुम्हें छोड़
कर किसी और लड़की के बारे में सोच तक नहीं सकता. प्लीज नव्या, माई लव, मान जाओ, प्लीज…’’ और यह कहतेकहते नैवेद्य ने उस का हाथ अपने हाथ में
लेते हुए उस की हथेली चूम भावविह्वल होते हुए कहा, ‘‘नव्या प्लीज, प्लीज मेरी जिंदगी को पूरा कर दो. तुम्हारे बिना मैं बिलकुल अधूरा हूं.’’
मगर नव्या पर उस की इन बातों का कोई असर नहीं हुआ और वह आखिर तक उस के इस प्रस्ताव को न… न… करती रही.’’
ये सब बातें करतेकराते एक रेस्तरां में खाते हुए रात
का 1 बजने को आया था. नैवेद्य उसे उस के अपार्टमैंट के दरवाजे तक छोड़ने आया.
‘‘नव्या यार, मेरा तो घर जाने का बिलकुल मन नहीं कर रहा. तुम से चिटचैट
करने का मन कर रहा है.’’
‘‘आर यू क्रेजी नैवेद्य? 1 बज रहा है. चलो, अब तुम जाओ.’’
नव्या ने उस के सामने ही दरवाजा बंद कर दिया और फिर अंदर से
बोली, ‘‘बस नैवेद्य आज के लिए बहुत हुआ. गुड नाइट.’’
विवश हो उसे घर जाना ही पड़ा. वह पूरी तरह से नव्या के प्यार मैं दिल के हाथों हार गया था. जब भी वह उस के घर आता वह उसे लाख समझाता, न तो उस का पास्ट, न ही उस की जिम्मेदारियों से उस के लिए उस के प्यार में कोई कमी आएगी, लेकिन अपनी
जमीनी हकीकत से जुड़ी नव्या कुछ ज्यादा ही समझदार थी.
नैवेद्य के लाख इसरार करने पर भी उस ने उस का प्रेम प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया.
तभी उन्हीं दिनों
नैवेद्य औफिस से एक पखवाड़े की छुट्टी ले कर अपनी मां से मिलने इंडिया गया.
उस अवधि में नव्या को नैवेद्य और अपने रिश्ते के बारे में सोचने का मौका
मिला.
पिछले कुछ महीनों में वह नैवेद्य के बेहद करीब आ गई थी. अब उस से जुदा हो कर उस की मासूमियत भरी बातें, उस की शैतानी भरी छेड़छाड़, नौनस्टौप
गपियाना उसे रहरह कर याद आता. कभीकभी कमजोर क्षणों में वह सोचती
कि उसे नैवेद्य का प्रस्ताव स्वीकार कर लेना चाहिए. उस के साथ जिंदगी कितनी खुशनुमा
हो जाएगी, लेकिन अगले ही पल उस की वास्तविकता उसे डराने लगती और वह वापस अपने खोल में सिमट जाती.
उस दिन शनिवार था. घर के काम निबटा कर वह
आराम कर रही थी कि तभी इंडिया से नैवेद्य की वीडियो कौल आ गई. उस ने पूछा, ‘‘नव्या कुछ सोचा मेरे बारे में?’’
‘‘क्या सोचना है नैवेद्य? कितनी बार
तुम्हें कह चुकी हूं, मेरीतुम्हारी दुनिया बिलकुल अलग है. मेरे पीछे टाइम जाया मत करो नैवेद्य. इस पर वह उस से बोला ‘‘लो मम्मा से बात करो. तुम्हारी दुविधा
खत्म हो जाएगी.’’
स्क्रीन पर नैवेद्य की मां आ गईं, ‘‘हैलो नव्या बेटा. यह तुम क्या कह रही हो.
हमारीतुम्हारी दुनिया में कोई फर्क नहीं बेटा. तुम मेरे बेटे से
किसी माने में कमतर नहीं. तुम ने मेरे बेटे का दिल चुरा लिया है, मेरे लिए बस यही अहम है. खुशीखुशी मेरे बेटे की जिंदगी में आ जाओ बेटा, उसे ऐक्सैप्ट कर लो.
प्लीज बेटा
मान जाओ.’’
इस के बाद और कुछ बोलनेसुनने को शेष न रहा था.
उस दिन औफिस की छुट्टी थी. वैलेंटाइनडे भी था. नव्या ने वह पूरा दिन अलकसाते
हुए, आराम करते हुए घर पर ही बिताया. शाम को वह रिवर वौक पर 1 घंटा जौगिंग करने के बाद नदी के सामने घास पर बेमनी सी बैठी हुई पानी में तैरते जहाजों
को देख रही थी. सामने मिशीगन नदी के पार स्काई स्क्रैपर्स पर रंगबिरंगी जलतीबुझती लाइटिंग, नीले पानी में तैरते लाललाल दिलों, गुब्बारों और रंगीन रोशनी से
सजे जहाज, अपने इर्दगिर्द हर ओर प्रेमी जोड़ों की खुशनुमा चहक से रिवर वौक गुलजार था.
उस के सामने नदी में तैरते जहाजों पर तेज म्यूजिक बज रहा था और
कई जहाजों के डैक पर संगीत की धुन पर कई जोड़े थिरक रहे थे.
तभी एक जहाज उस के सामने किनारे के बेहद नजदीक आ गया. उस ने देखा,
उस जहाज पर एक
जोड़ा बांहों में बांहें डाले मदहोश हो नृत्य कर रहा था.
बेहद खूबसूरत पिंक गाउन में सजीधजी युवती की आंखों में आंखें डाले उस युवक को देख नजरों के सामने
नैवेद्य का मुसकराता भोलाभाला चेहरा कौंध उठा.
कलेजे में हूक सी उठी कि तभी अचानक उस के कानों में नैवेद्य के अल्फाज पड़े.
उस ने चौंक कर नजरें घुमाईं,
उस के सामने नैवेद्य अपने एक घुटने पर बैठा मुसकराता हुआ भावविह्वल स्वरों में बुदबुदा रहा था, ‘‘लव यू नव्या, विल यू बी माई वैलेंटाइन?’’
वह सोच नहीं पा रही थी कि यह सपना या हकीकत. तभी अनायास अपूर्व खुशी से खिलखिला पड़ी और उस ने नैवेद्य का हाथ अपने हाथ में ले उसे हौले से चूम लिया.
एक और मुहब्बत की मीठी दास्तान का आगाज हो गया था.
बीते दिनों अपनी पर्सनल लाइफ को सुर्खियों में रहने वाली बॉलीवुड एक्ट्रेस दीया मिर्जा (Dia Mirza) मां बन गई हैं, जिसकी अपडेट वह फैंस के साथ शेयर करती रहती हैं. हालांकि कुछ दिनों से वह सोशलमीडिया से दूर थीं. लेकिन अब एक्ट्रेस ने अपनी एक अपडेट शेयर की है, जिसके बाद फैंस पोस्ट पर अपना रिएक्शन देते दिख रहे हैं. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…
भतीजी की फोटो की शेयर
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एक्ट्रेस दीया मिर्जा ने सोशलमीडिया पोस्ट के जरिए फैंस को बताया है कि उनकी भतीजी का निधन हो गया है. दरअसल, एक्ट्रेस ने अपने पोस्ट में लिखा, ‘मेरी भतीजी.. मेरी बच्ची.. मेरी जान…अब इस दुनिया में नहीं हो. मेरी कामना है कि तुम जहां भी रहो, तुम्हें शांति और प्यार मिले. तुम हमेशा मेरे दिल में रहोगी ओम शांति.’ वहीं इस पोस्ट के साथ एक्ट्रेस दिया मिर्जा ने अपनी भतीजी की फोटो भी शेयर की है, जिसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह उम्र में काफी कम थीं.
फैंस और सेलेब्स ने किया कमेंट
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एक्ट्रेस दीया मिर्जा का ये इमोशनल पोस्ट देखने के बाद जहां फैंस भी इमोशनल हो गए हैं तो वहीं सेलेब्स एक्ट्रेस की पोस्ट पर कमेंट करते हुए उन्हें सांत्वना दे रहे हैं. वहीं इन सितारों में ईशा गुप्ता जैसे कई सेलेब्स का नाम शामिल है.
बता दें, एक्ट्रेस दिया मिर्जा अपनी शादी और प्रैग्नेंसी को लेकर काफी सुर्खियों में रही हैं. दरअसल, शादी के कुछ महीने बाद ही एक्ट्रेस ने अपनी प्रैग्नेंसी की खबर सुनाकर फैंस को हैरान कर दिया था. हालांकि कई लोगों ने उन्हें सपोर्ट भी किया था. वहीं फिल्मी करियर की बात करें तो एक्ट्रेस दिया मिर्जा काफी समय से सिल्वर स्क्रीन से दूर हैं. हालांकि वह सोशलमीडिया के जरिए फैंस के साथ जुड़ी हुई रहती हैं.
स्टार प्लस के सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) के मेकर्स अपनी कहानी के चलते कई बार ट्रोलर्स के निशाने पर आए हैं. हालांकि मेकर्स सीरियल को दिलचस्प बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. इसी बीच हाल ही में सई की प्रैग्नेंसी की खबर से एक बार फिर मेकर्स ट्रोल हो रहे हैं और मेकर्स की क्लास लगाते दिख रहे हैं. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…
प्रैग्नेंसी ट्रैक हुआ वायरल
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हाल ही में सीरियल के अपकमिंग प्रोमो में सई के प्रैग्नेंसी की तरफ इशारे होते हुए दिख रहे थे. दरअसल, पाखी का ख्याल रखते हुए सई को चक्कर और उल्टी हो रही थी, जिसके चलते चौह्वाण परिवार के सदस्य सई को प्रैग्नेंसी टेस्ट के लिए कहते दिखे थे. हालांकि पाखी इस बात पर गुस्से में नजर आई थी. इसी के चलते अब फैंस का भी इस प्रोमो के देखकर रिएक्शन सामने आया है.
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ट्रोलर्स ने किया सवाल
People arguing if Sai is pregnant or having tumor.
Bhai, Kuch bhi ho,
Bewakoof Virat will
remain the same 😂
He will be seen jumping between Pakhi’s bedroom and his bedroom 😂#GhumHaiKisikeyPyaarMeiin pic.twitter.com/b0MrtLhGzF
— Love Life ♥️✨ (@Shivikaislove) August 1, 2022
सरोगेसी के ट्रैक के बाद सई की प्रैग्नेंसी पर फैंस मेकर्स को ट्रोल करते दिख रहे हैं. प्रोमो और लेटेस्ट एपिसोड देखने के बाद फैंस को यकीन ही गया है कि सई मां बनने वाली है, जिसके बाद फैंस मेकर्स से सवाल करते दिखाई दे रहे हैं. दरअसल, फैंस का कहना है कि कुछ वक्त पहले ही डॉक्टर का सई को प्रैग्नेंट ना होने का सीन दिखाया गया था और अब अचानक सई का बनना ट्रोलर्स को रास नहीं आ रहा है. इतना ही नहीं फैंस सई के मां नहीं बल्कि कैंसर होने की बात कहते हुए दिख रहे हैं.
#GhumHaiKisiKeyPyaarMeiin
How fascinating Virat’s farz is 🥹But this time I’m wondering what farz of his kept him silent when Dr. referred to Pakhi as the child’s mother and him as her husband🤔
what kind pressure he was facing that he couldn’t say that he is not her husband🤦♂️ pic.twitter.com/M8zkKtqHA6— Suvam (@fictionaccount_) August 2, 2022
मां बनेगी पाखी
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सीरियल की बात करें तो अपकमिंग एपिसोड में सीरियल में कुछ महीने बाद पाखी की प्रैग्नेंसी के नोवें महीने की बात दिखाई जाएगी. जहां पर पाखी, विराट को फोन करके कहेगी कि उसकी डिलीवरी का समय आ गया है. हालांकि विराट उसे कहेगा कि सई उसके पास पहुंचती ही होगी.
एक रिपोर्ट के मुताबिक, जो पुरुष घर के कामों में सहयोग करते हैं, वे अन्य पुरुषों की तुलना में ज्यादा खुश रहते हैं. यह रिपोर्ट उन मर्दों के लिए खुशखबरी भरी है, जो घरेलू काम करने को अपनी तौहीन समझते हैं. ऐसे पुरुष यह मानते हैं कि घरेलू काम सिर्फ औरतों को ही करना चाहिए.
शुरू से ही एक औरत न सिर्फ घर का, बल्कि बाहर का कामकाज भी करती आ रही है. वह दोनों भूमिकाएं बखूबी निभाती है. एक समय था जब वह घर से निकल कर खेत भी जाती थी. पशुओं को चराना, नहलाना, बोझा ढोना, लकडि़यां इकट्ठा करना और फिर घर आ कर गृहस्थी के कामों में जुट जाना. बच्चों को दूध पिलाना, खाना बनाना व परोसना सहित घर के तमाम काम उस के ही सिर पर थे. पुरुष केवल तब तक ही हाथपैर चलाता था जब तक घर से बाहर होता था. घर की चौखट के भीतर आते ही वह पानी पी कर गिलास भी स्वयं नहीं रखता था. घर में उस का काम केवल आराम करना व पत्नी को गर्भवती बनाना मात्र ही था.
आज भी यों तो अधिकांश घरों में इसी परंपरा का पालन होता आ रहा है, मगर बदलते जमाने में जब नई जैनरेशन के पति यह देख रहे हैं कि पत्नियां घर से बाहर निकल कर घर की आर्थिक स्थिति में सहयोग दे रही है, तो वे घर के कामकाज में हाथ बटाने लगे हैं. यह एक अच्छी शुरुआत है.
औरत नहीं मशीन
ऐसा देखा गया है कि पतिपत्नी अथवा सासबहू के बीच होने वाले ज्यादातर कलह घरेलू कामों को ले कर ही होते हैं. यह तो अच्छा है कि किचन व अन्य इलैक्ट्रौनिक होम ऐप्लायंसेज की वजह से महिलाओं के लिए काम करना थोड़ा सुलभ हुआ है. इस से उन के काम कुछ जल्दी निबट जाते हैं.
मगर कपड़े धोने की मशीन, वैक्यूम क्लीनर, मिक्सर, ग्राइंडर आदि अपनेआप काम नहीं करते. इन्हें चलाने के लिए एक आदमी की जरूरत तो पड़ती ही है. क्या कोई ऐसी मशीन है, जो बच्चों के डायपर्स बदल सकती है? बच्चों को होमवर्क करा सकती है? क्या कोई ऐसी मशीन है, जो सुबह उठे और बच्चों को जगाए, उन्हें नहलाए, यूनिफौर्म, जूतेमोजे, टाईबैल्ट पहनाए और फिर नाश्ता करा कर उन का लंच बौक्स पैक कर के उन्हें स्कूल छोड़ आए? फिर दोपहर में बच्चों को ले कर आए. बरतन धोए और पोंछा लगाए, लंच व डिनर बनाए और फिर सब को परोसने का काम भी करे?
निश्चित तौर पर ऐसी मशीन सिर्फ एक औरत ही हो सकती है. अगर इन अनगिनत घरेलू कामों में से कुछ काम पति अपने कंधों पर ले ले तो औरत को थोड़ी राहत तो अवश्य मिलेगी.
ऐक्सपर्ट्स का मानना है कि आजकल की व्यस्त लाइफ में घर का काम पतिपत्नी को मिल कर ही करना चाहिए. इस से न सिर्फ तनाव दूर रहता है, पार्टनर के सहयोग करने पर मन व शरीर में ऊर्जा भी बनी रहती है. एकदूसरे को लगता है कि कोई है, जो जरूरत के समय उस के साथ काम करने को तैयार रहता है. इस से घर में हर रोज होने वाली किचकिच भी नहीं होती.
इस पुरुष प्रधान समाज में लोगों की मानसिकता ऐसी बनी हुई है कि केवल औफिस जाते हुए व हाथ में सिगरेट थामे हुए लोग ही मर्द कहलाते हैं. किचन में ऐप्रिन पहने आटा गूंधता कोई व्यक्ति मर्द की श्रेणी में नहीं गिना जाता. यही वजह है कि जो पति घर के कामों में पत्नी का सहयोग करते हैं वे दोस्तों व रिश्तेदारों से इसे छिपा कर रखना चाहते हैं.
60-70 के दशक में आई एक फिल्म में नायक संजीव कुमार ने नायिका मौसमी चटर्जी के पति की भूमिका निभाई थी. दोनों ही एकदूसरे के कामों को बेहद महत्त्वहीन व आसान समझते थे. ऐसे में दोनों ने अपनी भूमिकाएं बदलने का फैसला किया. यानी जो भूमिका नायिका निभा रही थी उसे नायक को निभाना था और नायक वाली भूमिका नायिका को निभानी थी. फिल्म का संदेश यह था कि एक औरत घर संभालने के अलावा बाहर जा कर कमा भी सकती है, मगर घर में गृहस्थी व बच्चे संभालने की जिम्मेदारी जितनी आसान दिखती है, उतनी होती नहीं.
हाउस हसबैंड
आज ढेरों पति ऐसे हैं, जो हाउस हसबैंड हैं. बैंकर से लेखक बने चेतन भगत उस का उदाहरण हैं. उन की पत्नी भी बैंकर हैं. वे तो औफिस चली जाती हैं, चेतन अपना लेखन का सारा काम घर से ही करते हैं और अपने 2 जुड़वां बेटों की देखभाल भी. हां यह बात जरूर है कि वे घर बैठ कर अच्छी कमाई भी करते हैं.
वहीं कई टीवी कलाकार ऐसे हैं, जो पतिपत्नी हैं. दोनों ही ऐक्टिंग करते हैं, तो कई बार ऐसे मौके आते हैं जब कोई एक धारावाहिक अथवा किसी शो में काम कर रहा होता है और दूसरा घर बैठा होता है. ऐसे में क्या होता है? टीवी कलाकार वरुण वडोला साफसाफ कहते हैं, ‘‘जब मेरे पास काम नहीं होता और पत्नी राजेश्वरी के पास ढेर सारा काम होता है तो घर मैं संभाल रहा होता हूं और वह बाहर.’’
और भी कई कवि, लेखक और साहित्यकार हाउस हसबैंड हैं. हालांकि अभी यह बदलाव इतना कौमन नहीं हुआ है, पर इस की शुरुआत हो गई है. इस से दोनों एकदूसरे के कामों की कद्र करना सीख गए हैं, मगर यह बदलाव केवल शहरों अथवा शिक्षित तबके में ही देखा जा सकता है. अगर हम सिक्के के दूसरे पहलू को देखें तो भारतीय गांवों में जहां देश की कुल आबादी का 70% हिस्सा बसता है, वहां मर्दों को शान से हुक्का गुड़गुड़ाते या फिर खेती करते ही देखा जा सकता है. फिलहाल वहां की परंपराएं बदलने में शायद थोड़ा वक्त लगेगा.
शादीशुदा डिप्रैशन फ्री
घर में हाथ बंटाने का यह अर्थ नहीं कि आप हाउस हसबैंड बन गए हैं. आखिर घरपरिवार, बच्चों की देखभाल आदि पतिपत्नी दोनों की साझा जिम्मेदारी है, तो इस में शर्म कैसी? अगर आप ऐसे हैं तो बच्चों की नैपी बदलने की बात को दोस्तों को बता कर उन्हें शर्मिंदा करें कि वे बैठेबिठाए खाने के आदी हो चुके हैं. उन्हें बताएं कि अब उन का वह दौर खत्म हो चुका है, जिस में औरत को भोग्या और पुरुष को भोगी कहा जाता था.
यदि आप संयुक्त परिवार में हैं तो आप की मां उस समय आपत्ति जता सकती हैं, जब आप पत्नी द्वारा धोए कपड़ों की बालटी ले कर छत पर कपड़े सुखाने जाएं अथवा फ्रिज में गिरे दूध अथवा जैम को साफ करें. दरअसल, सास अपनी बहू के साथ अपने बेटे को घरेलू काम करते नहीं देखना चाहती. पुरानी सोच के चलते उसे लगता है कि उस के बेटे की छवि खराब होगी या उस का पुरुषत्व कम होगा. ऐसा होने पर मां को यह समझाएं कि बदले जमाने में यह सब कितना जरूरी हो गया है.
वैसे शादी व्यक्ति पर सकारात्मक प्रभाव डालती है. एक स्टडी के अनुसार, शादीशुदा लोग कुंआरों के मुकाबले टैंशन और डिप्रैशनफ्री रहते हैं. इस स्टडी में 15 देशों के 34,493 लोगों से बात की गई और पूछा गया कि शादी और मानसिक शांति का क्या संबंध है.
पहले की गई स्टडीज में यह माना गया था कि शादी से सिर्फ महिलाओं को ही मानसिक शांति मिलती है, लेकिन इस स्टडी ने इसे दोनों के लिए फायदेमंद बताया गया. शादी के बाद खुश रहने के लिए दोनों के बीच कम्युनिकेशन और समझदारी होना बेहद जरूरी है. इस के लिए सिर्फ शादी करना ही काफी नहीं, बल्कि मैं और तुम छोड़ कर हम बनना पड़ेगा और हर खुशी, गम व काम की जिम्मेदारी हम बन कर उठानी होगी.