अनुज का होगा एक्सीडेंट! आखिरी बार Anupama से कहेगा ये बात

सीरियल अनुपमा में इन दिनों पाखी के कारण शाह परिवार में हंगामा देखने को मिल रहा है. जहां एक तरफ अधिक, पाखी को बहकाते हुए दिख रहा है तो वहीं अनुपमा और वनराज के बीच झगड़े बढ़ रहे हैं. इसी बीच शो में अनुज के साथ कुछ ऐसा होने वाला है, जिससे फैंस को झटका लगेगा. आइए आपको बताते हैं क्या होगा शो में आगे…

अनुपमा कहेगी ये बात

अब तक आपने देखा कि अधिक और पाखी एक-दूसरे से चोरी छिपे मिलते हैं, जिसे अनुपमा देख लेती है और उनका पीछा करते हुए रेस्टोरेंट पहुंचती है. जहां दोनों को समझाती है और दोनों के साथ बैठती है. जहां वनराज आकर गुस्सा करता है. लेकिन अनुपमा उसे घर में जाकर बात करने के लिए कहती है. वहीं अधिक का प्लान फेल होने से वह गुस्से में दिखता है.

सारा खोलेगी अधिक का राज

 

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अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि पाखी के साथ अधिक के रिश्ते को लेकर सारा अपनी मां बरखा को समझाएगी और उसे वार्निंग देगी कि अगर अधिक ने पाखी के साथ कोई भी नाटक या कुछ गलत किया तो वह अनुपमा और अनुज को उसके अमेरिका वाले लाइफस्टाइल के बारे में बता देगी. दूसरी तरफ, वनराज, शाह हाउस पहुंचकर एक बार फिर अनुपमा पर गुस्सा करेगा. वहीं तोषू भी उसपर भड़केगा. लेकिन अनुपमा दोनों को करारा जवाब देती हुई नजर आएगी.

 

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अनुज लेगा ये वादा

इसके अलावा, आप देखेंगे कि अनुज को किसी का फोन आएगा और वह जल्दी में बिना बताए अनुपमा से मिलने पहुंचेगा और घबराते हुए अनुपमा से कहेगा कि कपाड़िया परिवार की जायदाद और साइनिंग अथॉरिटी उसके नाम पर है और उससे वादा लेगा कि अगर किसी भी पल उसे कुछ हो जाता है तो कभी भी वह किसी को बिजनेस राइट नहीं देगी और न ही किसी को बिजनेस के लिए साइनिंग अथौरिटी का अधिकार किसी को भी देगी. इसी दौरान अनुज पर एक शीशा टूट कर गिर जाता है और अनुपमा की डर के कारण चीख निकल जाएगी.

मृगतृष्णा- भाग 3: मंजरी ने क्या किया जीजाजी की सच्चाई जानकर

सच में मृदुला का फोन बंद आ रहा था और राजन का भी. कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं? मां की घबराहट देख कर मैं ने उस के घर जाने का मन बना लिया, ‘‘मां, मैं उस के घर जा कर देखती हूं, आप चिंता मत करो.’’

लेकिन अब मुझे भी घबराहट होने लगी थी, क्योंकि फिर मैं ने उसे कई बार फोन लगाया, पर बंद ही मिलता. किशोर को जब मैं ने सारी बात बताई, तो कहने लगे कि मैं चिंता न करूं. चल कर देखते हैं.

‘‘पर आप का औफिस?’’ जब मैं ने पूछा, तो किशोर बोले कि वे मुझे मृदुला के घर छोड़ कर उधर से ही औफिस निकल जाएंगे और आते वक्त लेते आएंगे.

‘‘हां, यह सही रहेगा,’’ मैं बोली.

वहां पहुंचने पर जो मैं ने देखा, उसे देख स्तब्ध रह गई. मृदुला बिस्तर पर पड़ी कराह रही थी और उस के शरीर पर जगहजगह चोट के निशान थे. चेहरा भी नीला पड़ गया था.

बहन को इस हालत में देख कर मेरी आंखें भर आईं, ‘‘मृदुला, ये सब क्या हुआ? ये चोटें कैसे और राजन जीजाजी कहां हैं?’’ मैं ने पूछा.

वह रो पड़ी. फिर जो बताया उसे सुन कर मुझे अपने कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था.

उस ने रोतेरोते बताया, ‘‘अगर मेरा पति बदसूरत होता, गरीब होता, लेकिन अगर वह मुझे प्यार करता, तो मैं खुद को दुनिया की सब से खुशहाल औरत समझती. मगर राजन का सुंदर होना मेरे लिए अभिशाप बन गया…

‘‘रोज नईनई लड़कियों के साथ रातें बीतती हैं. उन पर दिल खोल कर पैसे लुटाते

हैं. कभीकभी तो लड़की को घर भी ले आते हैं और जब मैं कुछ बोलती हूं तो उस के सामने ही मुझ पर थप्पड़ बरसाने लगते हैं. वह तो अच्छा है कि बच्चे होस्टल में रहते हैं, नहीं तो उन पर क्या असर पड़ता राजन की हरकतों का? जब से ब्याह हुआ है, एक दिन भी ऐसा नहीं गया, जब राजन ने मेरे रूपरंग को ले कर ताने न कसे हों.

‘‘कहते हैं कि उन्हें तो गोरी लड़की चाहिए थी… कैसे कालीकलूटी उन के मत्थे मढ़ दी गई… जानती है मंजरी, हमारा फोटो देख कर राजन को लगा था, उन की शादी तुम्हारे साथ होने वाली है, इसलिए उन्होंने शादी के लिए हां बोल दी थी. लेकिन जब पत्नी के रूप में मुझे देखा, तो आगबबूला हो गए. पतिपत्नी के बीच की बात है, यह सोच कर अब परिवार वालों ने भी मेरा पक्ष लेना छोड़ दिया. लेकिन समाज में अपनी इज्जत के डर के कारण वे मुझे ढो रहे हैं. कहने को तो मैं उन के साथ गोवा, मलयेशिया घूमती हूं, पर वहां होती तो उन के साथ उन की मासूका ही. मैं तो बस पिछली सीट पर बैठे तमाशा देखती हूं.’’

राजन के जो सारे दोष आज तक दबेढके थे उन सभी को मृदुला 1-1 कर मेरे सामने खोलने लगी. आज तक मैं किशोर को संकीर्ण विचारों वाला और खराब इंसान समझती थी, लेकिन आज मुझे पता चला कि किशोर कितने अच्छे और सच्चे इंसान हैं.

एक लंबी सांस छोड़ते हुए फिर मृदुला कहने लगी, ‘‘जरा भी चिंता नहीं है उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की. मौजमस्ती में सारे पैसे लुटा रहे हैं. 2 महीनों से मकान का किराया बाकी है. मकानमालिक झिड़क जाता है. कहता है कि आप का मुंह देख कर चुप रह जाता हूं. बहन मानता है वह मुझे. लेकिन घोड़ा कब तक घास से दोस्ती कर सकता है मंजरी? अगर मकानमालिक ने निकाल दिया तो हम कहां जाएंगे? सही कहती हूं, तुम्हारे पति के पैर के धोवन भी नहीं हैं राजन. वे तुम सब के लिए कितना सोचते हैं, देखती नहीं क्या मैं. एकदम सीधेसच्चे इंसान.’’

विश्वास नहीं हो रहा था कि मृदुला जो कह रही है वह सच है. जिस इंसान के लिए मेरे दिल में ढेरों सम्मान था, वह एक पल में खत्म हो गया. कितना अच्छा इंसान समझती थी मैं राजन को. सोचने लगी थी कि काश, इस से मेरा ब्याह हो गया होता तो मैं कितनी सुखी होती. लेकिन मैं कितनी गलत थी. खुद को कोसती रहती थी यह कह कर कि क्यों मेरा किशोर जैसे इंसान से पाला पड़ा. मगर आज उसी किशोर पर मुझे नाज हो रहा है. दिखाते नहीं, पर मुझे प्यार बहुत करते हैं. यह मुझे अब समझ आया.

‘‘लेकिन तुम ये सब क्यों सहती रही अकेली? बताया क्यों नहीं हमें?’’ मैं ने पूछा.

‘‘तो क्या करती और क्या बताती तुम सब से? क्या हालत बदल देते तुम सब? तुम्हें हमेशा लगता था न मंजरी कि मैं बहुत सुखी हूं, तेरे इसी भ्रम को मैं जिंदा रखना चाहती थी. दिखाना चाहती थी उन लोगों को, जो कहते थे, इस कलूटी को कौन पूछेगा. झूठा ही सही, पर लोग तो सही मान रहे हैं न कि मैं बहुत सुखी हूं और मेरे पति मुझे बहुत प्यार करते हैं. मांपापा भी खुश हैं, तो रहने दो. मैं अपना दुख सुन कर उन्हें जीतेजी मौत के मुंह में नहीं धकेलना चाहती. इसलिए जो जैसा चल रहा चलने दे… तू यह बात कभी अपने मुंह से मत निकालना वरना तू मेरा मरा मुंह देखेगी.’’

अब जब उस ने इतनी बड़ी धमकी दे दी, तो फिर कैसे किसी से मैं कुछ कहती. लेकिन लगा, क्या सोचती रही थी मैं मृदुला के बारे में और क्या निकला. शाम को किशोर आ कर मुझे ले गए. रातभर मैं मृदुला के बारे में ही सोचसोच कर रोती रही. मेरा सूजा चेहरा देख कर किशोर को यही लगा कि मैं मृदुला की तबीयत को ले कर परेशान हूं, पर बात तो उस से भी बढ़ कर थी, पर बता नहीं सकती थी किसी को.

सुबह उठ कर रोज की तरह मैं ने एक तरफ चाय और दूसरी तरफ सब्जी बनाने

को कड़ाही चढ़ाई ही था कि पीछे से किशोर ने मुझे अपनी बांहों में घेर लिया और पूछा, ‘‘क्या बना रही हो?’’

‘‘नाश्ता और क्या,’’ मैं ने कहा.

‘‘मत बनाओ.’’

‘‘पर क्यों, मैं ने प्रश्नवाचक नजरों से देखा.’’

ये कहने लगे, ‘‘आज छुट्टी ली है ‘केसरी’ फिल्म देखने चलेंगे.’’

‘‘ज्यादा बातें न बनाओ. कल तक तो तुम्हें फिल्में अच्छी नहीं लगती थीं, फिर आज कैसे…’’

वे मेरे मुंह पर हाथ रख कर बोले, ‘‘तुम्हें अच्छी लगती हैं न अक्षय कुमार की फिल्में? और मुझे तुम,’’ मुसकराते हुए किशोर बोले.

मगर मैं मुंह बनाते हुए बोली, ‘‘अगर छुट्टी ले रखी थी, तो पहले बता देते, जरा देर और सो लेती. बेकार में जल्दी उठना पड़ा.’’

‘‘अच्छा, छोड़ो ये सब. यह बताओ, हमारी शादी की सालगिरह आने वाली है. कहां चलना है सैलिब्रेट करने? किशोर ने पूछा.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब कि गोवा चलें?’’ मेरे गाल पर चुंबन देते हुए किशोर बोले, तो मेरा मन गुदगुदा गया, ‘‘नहीं, कोई जरूरत नहीं फुजूलखर्ची करने की. गांव चलेंगे मांपिता का आशीर्वाद भी मिल जाएगा,’’ कह कर मैं अपनी भी चाय ले कर बालकनी में आ गई और चुसकियां लेने लगी.

पहले कभी सुबह इतनी सुहानी नहीं लगी थी जितनी आज लग रही थी. सोचने लगी, सबकुछ तो है मेरे पास. प्यार करने वाला पति, 2 प्यारेप्यारे बच्चे, अपना घर, जरूरत के सारे सुख. तो फिर किस मृगतृष्णा के पीछे भाग रही थी मैं? देखा, तो किशोर मुझे ही निहार रहे थे. जब मेरी नजरें उन से मिलीं, तो वे मुसकरा पड़े और मैं भी.

उलझे रिश्ते- भाग 2: क्या प्रेमी से बिछड़कर खुश रह पाई रश्मि

रश्मि कुछ नहीं बोल पाई. उसी दिन दिल्ली से लड़का संभव अपने छोटे भाई राजीव और एक रिश्तेदार के साथ रश्मि को देखने आया. रश्मि को देखते ही सब ने पसंद कर लिया. रिश्ता फाइनल हो गया. जब यह बात सुधीर को रश्मि की एक सहेली से पता चली तो उस ने पूरी गली में कुहराम मचा दिया,  ‘‘देखता हूं कैसे शादी करते हैं. रश्मि की शादी होगी तो सिर्फ मेरे साथ. रश्मि मेरी है.’’ पागल सा हो गया सुधीर. इधरउधर बेतहाशा दौड़ा गली में. पत्थर मारमार कर रश्मि के घर की खिड़कियों के शीशे तोड़ डाले. रश्मि के पिता के मन में डर बैठ गया कि कहीं ऐसा न हो कि लड़के वालों को इस बात का पता चल जाए. तब तो इज्जत चली जाएगी. सब हालात देख कर तय हुआ कि रश्मि की शादी किसी दूसरे शहर में जा कर करेंगे. किसी को कानोंकान खबर भी नहीं होगी. अब एक तरफ प्यार, दूसरी तरफ मांबाप के प्रति जिम्मेदारी. बहुत तड़पी, बहुत रोई रश्मि और एक दिन उस ने अपनी भाभी से कहा, ‘‘मैं अपने प्यार का बलिदान देने को तैयार हूं. परंतु मेरी एक शर्त है. मुझे एक बार सुधीर से मिलने की इजाजत दी जाए. मैं उसे समझाऊंगी. मुझे पूरी उम्मीद है वह मान जाएगा.’’

भाभी ने घर वालों से छिपा कर रश्मि को सुधीर से आखिरी बार मिलने की इजाजत दे दी. रश्मि को अपने करीब पा कर फूटफूट कर रोया सुधीर. उस के पांवों में गिर पड़ा. लिपट गया किसी नादान छोटे बच्चे की तरह,  ‘‘मुझे छोड़ कर मत जाओ रश्मि. मैं नहीं जी  पाऊंगा, तुम्हारे बिना. मर जाऊंगा.’’ यंत्रवत खड़ी रह गई रश्मि. सुधीर की यह हालत देख कर वह खुद को नहीं रोक पाई. लिपट गई सुधीर से और फफक पड़ी, ‘‘नहीं सुधीर, तुम ऐसा मत कहो, तुम बच्चे नहीं हो,’’ रोतेरोते रश्मि ने कहा.

‘‘नहीं रश्मि मैं नहीं रह पाऊंगा, तुम बिन,’’ सुबकते हुए सुधीर ने कहा.

‘‘अगर तुम ने मुझ से सच्चा प्यार किया है तो तुम्हें मुझ से दूर जाना होगा. मुझे भुलाना होगा,’’ यह सब कह कर काफी देर समझाती रही रश्मि और आखिर अपने दिल पर पत्थर रख कर सुधीर को समझाने में सफल रही. सुधीर ने उस से वादा किया कि वह कोई बखेड़ा नहीं करेगा. ‘‘जब भी मायके आऊंगी तुम से मिलूंगी जरूर, यह मेरा भी वादा है,’’ रश्मि यह वादा कर घर लौट आई. पापा किसी तरह का खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे, इसलिए एक दिन रात को घर के सब लोग चले गए एक अनजान शहर में. रश्मि की शादी दिल्ली के एक जानेमाने खानदान में हो गई. ससुराल आ कर रश्मि को पता चला कि उस के पति संभव ने शादी तो उस से कर ली पर असली शादी तो उस ने अपने कारोबार से कर रखी है. देर रात तक कारोबार का काम निबटाना संभव की प्राथमिकता थी. रश्मि देर रात तक सीढि़यों में बैठ कर संभव का इंतजार करती. कभीकभी वहीं बैठेबैठे सो जाती. एक तरफ प्यार की टीस, दूसरी तरफ पति की उपेक्षा से रश्मि टूट कर रह गई. ससुराल में पासपड़ोस की हमउम्र लड़कियां आतीं तो रश्मि से मजाक करतीं  ‘‘आज तो भाभी के गालों पर निशान पड़ गए. भइया ने लगता है सारी रात सोने नहीं दिया.’’ रश्मि मुसकरा कर रह जाती. करती भी क्या, अपना दर्द किस से बयां करती? पड़ोस में ही महेशजी का परिवार था. उन के एक कमरे की खिड़की रश्मि के कमरे की तरफ खुलती थी. यदाकदा रात को वह खिड़की खुली रहती तो महेशजी के नवविवाहित पुत्र की प्रणयलीला रश्मि को देखने को मिल जाती. तब सिसक कर रह जाने के सिवा और कोई चारा नहीं रह जाता था रश्मि के पास.

संभव जब कभी रात में अपने कामकाज से जल्दी फ्री हो जाता तो रश्मि के पास चला आता. लेकिन तब तक संभव इतना थक चुका होता कि बिस्तर पर आते ही खर्राटे भरने लगता. एक दिन संभव कारोबार के सिलसिले में बाहर गया था और रश्मि तपती दोपहर में  फर्स्ट फ्लोर पर बने अपने कमरे में सो रही थी. अचानक उसे एहसास हुआ कोई उस के बगल में आ कर लेट गया है. रश्मि को अपनी पीठ पर किसी मर्दाना हाथ का स्पर्श महसूस हुआ. वह आंखें मूंदे पड़ी रही. वह स्पर्श उसे अच्छा लगा. उस की धड़कनें तेज हो गईं. सांसें धौंकनी की तरह चलने लगीं. उसे लगा शायद संभव है, लेकिन यह उस का देवर राजीव था. उसे कोई एतराज न करता देख राजीव का हौसला बढ़ गया तो रश्मि को कुछ अजीब लगा. उस ने पलट कर देखा तो एक झटके से बिस्तर पर उठ बैठी और कड़े स्वर में राजीव से कहा कि जाओ अपने रूम में, नहीं तो तुम्हारे भैया को सारी बात बता दूंगी, तो वह तुरंत उठा और चला गया. उधर सुधीर ने एक दिन कहीं से रश्मि की ससुराल का फोन नंबर ले कर रश्मि को फोन किया तो उस ने उस से कहा कि सुधीर, तुम्हें मैं ने मना किया था न कि अब कभी मुझ से संपर्क नहीं करना. मैं ने तुम से प्यार किया था. मैं उन यादों को खत्म नहीं करना चाहती. प्लीज, अब फिर कभी मुझ से संपर्क न करना. तब उम्मीद के विपरीत रश्मि के इस तरह के बरताव के बाद सुधीर ने फिर कभी रश्मि से संपर्क नहीं किया.

रश्मि अपने पति के रूखे और ठंडे व्यवहार से तो परेशान थी ही उस की सास भी कम नहीं थीं. रश्मि ने फिल्मों में ललिता पंवार को सास के रूप में देखा था. उसे लगा वही फिल्मी चरित्र उस की लाइफ में आ गया है. हसीन ख्वाबों को लिए उड़ने वाली रश्मि धरातल पर आ गई. संभव के साथ जैसेतैसे ऐडजस्ट किया उस ने परंतु सास से उस की पटरी नहीं बैठ पाई. संभव को भी लगा अब सासबहू का एकसाथ रहना मुश्किल है. तब सब ने मिल कर तय किया कि संभव रश्मि को ले कर अलग घर में रहेगा. कुछ ही दूरी पर किराए का मकान तलाशा गया और रश्मि नए घर में आ गई. अब तक उस के 2 प्यारेप्यारे बच्चे भी हो चुके थे. शादी के 12 साल कब बीत गए पता ही नहीं चला. नए घर में आ कर रश्मि के सपने फिर से जाग उठे. उमंगें जवां हो गईं. उस ने कार चलाना सीख लिया. पेंटिंग का उसे शौक था. उस ने एक से बढ़ कर एक पोट्रेट तैयार किए. जो देखता वह देखता ही रह जाता. अपने बेटे साहिल को पढ़ाने के लिए रश्मि ने हिमेश को ट्यूटर रख लिया. वह साहिल को पढ़ाने के लिए अकसर दोपहर बाद आता था जब संभव घर होता था. 28-30 वर्षीय हिमेश बहुत आकर्षक और तहजीब वाला अध्यापक था. रश्मि को उस का व्यक्तित्व बेहद आकर्षक लगता था. खुले विचारों की रश्मि हिमेश से हंसबोल लेती. हिमेश अविवाहित था. उस ने रश्मि के हंसीमजाक को अलग रूप में देखा. उसे लगा कि रश्मि उसे पसंद करती है. लेकिन रश्मि के मन में ऐसा दूरदूर तक न था. वह उसे एक शिक्षक के रूप में देखती और इज्जत देती. एक दिन रश्मि घर पर अकेली थी. साहिल अपने दोस्त के घर गया था. हिमेश आया तो रश्मि ने कहा कि कोई बात नहीं, आप बैठिए. हम बातें करते हैं. कुछ देर में साहिल आ जाएगा.

सैलिब्रेशन- भाग 3: क्या सही था रसिका का प्यार

कालेज में आने के बाद मान्या की समझ में आ गया कि रोने से कुछ नहीं होगा. अब उसे बिंदास हो कर जीना होगा.

मान्या को कुकिंग का शौक हो गया था. एक दिन खाने के शौकीन वैभव अंकल के लिए यूट्यूब पर देख कर मलाईकोफ्ते बनाए. अंकल ने खुश हो कर उस की जरूरत को समझते हुए उसे स्कूटी दिलवा दी.

वैभव ने उसे अपना एटीएम कार्ड भी दे दिया. अब तो उस के पंख निकल आए थे. कालेज कैंटीन और लड़कों के साथ दोस्ती के कारण उस का तो लाइफस्टाइल ही बदल गया था. एटीएम कार्ड से औनलाइन शौपिंग, फैशनेबल ड्रैसेज, नएनए हेयर कट में उस की दुनिया बदल गई.

वैभव को खुश रखने में उस का फायदा था. इसलिए वह उस के लिए हर संडे

कुछ स्पैशल बनाती और वह प्यार से उस के सिर पर हाथ फेर कर अपने पास बैठा लेता और फिर खुश हो कर खाता. लेकिन मां को यह पसंद नहीं आता.

वह उसे कोई काम बता कर वहां से उठा देती.

कालेज में ढेरों दोस्त बन गए थे. वह सब को कैफेटेरिया में अकसर ट्रीट देती. उस की कुंठा पैसों के रास्ते बह गई थी.

वंश की बड़ी सी गाड़ी और उस के आकर्षक व्यक्तित्व में वह खो गई. उस का फाइनल ईयर था.

उधर काव्या इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने बैंगलुरु चली गई थी.

अब मान्या वैभव का काम आगे बढ़ कर देती. फिर चाहे वह सुबह की बैड टी हो या ब्रेकफास्ट. वह प्यार से उसे अपनी बांहों में भर लेता. रसिका ये सब देख कर सुलग उठती. लेकिन वैभव के सामने कुछ बोल नहीं पाती. दोनों के बीच वैभव का काम करने के लिए कंपीटिशन सा रहता.

रसिका मान्या को घूर कर देखती और फिर बोलती, ‘‘क्यों, किचन में घुसी रहती है? अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे. काम करने के लिए विमला है तो?’’

मान्या वैभव की प्लेट में प्यार से पिज्जा रखते हुए बोली, ‘‘अंकल खा कर बताइए कैसा बना है? मैं ने यूट्यूब से देख कर टौपिंग करी है.’’

पिज्जा का एक टुकड़ा खुद खाने से पहले वैभव ने मान्या को खिलाया. फिर रसिका की घूरती आंखों से डर कर उस के मुंह में भी रखा और फिर खुश हो कर बोला, ‘‘लाजवाब, वैरी टेस्टी. मान्या कमाल है.’’

जबकि रसिका को पिज्जा स्वादहीन लग रहा था.

कुछ दिनों से रसिका देख रही थी कि वैभव औफिस में रोशनी को अपने कैबिन में बारबार बुलाता था कई बार उस ने झांक कर भी देखा. दोनों ठहाके लगाते हुए कौफी की चुसकियां ले रहे होते.

रसिका ने महसूस किया कि वैभव उस के हाथ से फिसलता जा रहा है. एक क्षण को उस के हाथपैर ठंडे हो गए. अब वह हैरानपरेशान रहने लगी थी. डिप्रैशन होने लगता था… आत्मविश्वास कम होता जा रहा था.

उन की मेड विमला अपने गुरूजी की महिमा का दिनभर बखान करती थी.

रसिका पति से तलाक लेने के बाद उसे पूरी तरह भूल चुका थी, क्योंकि वैभव ने उस के जीवन में रंग भर दिए थे. उसे पति जैसा ही सहारा मिल गया था.

रसिका ने जीजान से वैभव को खुश करने के लिए, उस के बेटे को भी अपने पास रखा, उसे पढ़ायालिखाया, उस की सारी सुखसुविधाओं का खयाल रखा. बीमार पड़ने पर पूरी देखभाल की. फिर भी वैभव उस से निगाहें फेर कर कभी रोशनी, तो कभी पूर्वा को प्यार भरी निगाहों से देखते हुए कौफी पीता, लौंग ड्राइव पर जाता है. रसिका के लिए ये सब जीतेजी मरने वाली बात हो गई थी, इसलिए वह गुरू की शरण में जाने के बारे में बारबार सोचती रहती.

विमला अपनी मालकिन से संवेदना रखती थी. वह उस की कशमकश को देखसमझ रही थी.

रोजरोज उस का महिमामंडन सुनतेसुनते वह विमला के साथ उस के

गुरू के पास जाने को तैयार हो गई.

विमला अपनी मालकिन को अपने गुरू के पास ले जाने से पहले ही उस की पूरी कहानी सुना चुकी थी.

गुरू ने विमला को आशीर्वाद दिया था कि इस साल यकीनन उस के बेटा पैदा होगा. वह खुशी से कल्पनालोक में बेटे को गोद में खिलाती हुई महसूस कर रही थी.

रसिका के पहुंचने की खबर मिलते ही गुरू ने आंखें बंद कर ध्यान में लीन होने का नाटक किया.

आधे घंटे के इंतजार के बाद रसिका को अंदर बुलाया गया. वह कुछ कहती, उस से पहले ही गुरू ने उस की जन्मपत्रिका पढ़ कर सुना डाली.

गुरूजी पर अंधभक्ति के लिए उस का एक नाटक ही काफी था. रसिका की आंखों से धाराप्रवाह अश्रु बह निकले थे और उस ने आगे बढ़ कर गुरू के चरणों पर झुकना चाहा.

‘‘नहीं… नहीं… बेटी मेरा ब्रह्मचर्य मत भंग करो. मैं तो बालब्रह्मचारी हूं. मैं तो इस दुनिया में लोगों को कष्ट और संकट दूर करने के लिए ही आया हूं.

‘‘मैं तो हिमालय की कंदरा में जाने कितने बरसों से तपस्या करता रहा हूं. न ही मेरा कोई नाम है, न ही मुझे अपने जन्म का पता है.’’

रसिका नतमस्तक थी. बोली, ‘‘गुरूजी, अब आप ही मुझे बचाइए… वैभव दूसरी स्त्री के चक्कर में न पड़े.’’

‘‘बच्चा, मैं ने दिव्य दृष्टि से देख लिया है. वह रोशनी तुम्हारी जिंदगी में अंधेरा करना चाहती है.

‘‘यह भभूत ले जाओ… वैभव को खिलाती रहना. वह रोशनी की ओर अपनी नजरें भी नहीं उठाएगा.’’

रसिका खुशीखुशी क्व4 हजार का नोट उस के चरणों में रख कर ऐसा महसूस कर रही थी जैसे सारा जहां उस की मुट्ठी में आ गया हो.

फिर तो कभी कलावा, कभी ताबीज तो कभी हवनपूजा. धीरेधीरे उस का विश्वास गुरूजी पर बढ़ता गया क्योंकि रोशनी यह कंपनी छोड़ दूसरी में चली गई थी और वैभव फिर से उस के पास लौट आया था.

रसिका खुश हो कर गुरू की सेवा में अपनी तनख्वाह का 40वां भाग तो निश्चित रूप से देने लगी थी. उस के अतिरिक्त समयसमय पर अलग से चढ़ावा चढ़ाती.

रसिका अपना भविष्य सुधारने में व्यस्त थी. उधर बेटी मान्या और वंश की दोस्ती प्यार में बदल गई थी.

वंश रईस परिवार का इकलौता चिराग था. वह रंगबिरंगी तितलियों की खोज में रहता था. वह देखने में स्मार्ट था. उस के पिता का लंबाचौड़ा डायमंड का बिजनैस था. कनाट प्लेस में बड़ा शोरूम था. इसलिए उस के डिगरी का कोई खास माने नहीं था. कालेज तो लिए मौजमस्ती की जगह थी. वह फाइनल ईयर में थी और कैंपस भी हो गया था.

हाउसवाइफ नहीं हाउस हसबैंड

आप एक सिचुऐशन इमेजिन कीजिए जहां एक पत्नी एक वैलइस्टैबलिश्ड कंपनी में हायर पोस्ट पर है और उस का पति घर पर रह कर घर के सभी कामकाज उसी तरह संभाल रहा है, जिस तरह एक घरेलू पत्नी यानी हाउसवाइफ संभालती है. सुबह उठ कर बैड टी बनाता है. पत्नी के लिए ब्रेकफास्ट बनाता है, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करता है और उन्हें बस स्टौप तक छोड़ने जाता है. पत्नी के औफिस जाने के बाद पीछे से घर की सारी जिम्मेदारी संभालता है. बाजार से सब्जी लाता है, मेड से काम कराता है यानी वह पूरी तरह हाउस हसबैंड बन जाता है.

आप कहेंगे यह तो पिछले दिनों रिलीज हुई आर बाल्की की फिल्म ‘की एंड का’ जैसी स्थिति है. जी हां, यह सिचुऐशन बिलकुल वैसी ही है और इस में हैरानी वाली कोई बात नहीं है. जब एक महिला घर से निकल कर कौरपोरेट जगत में अपनी पहचान बना सकती है, तो पुरुष हाउस हसबैंड क्यों नहीं बन सकता?

दरअसल, हमारी सामाजिक व्यवस्था ही कुछ ऐसी है, जिस में बचपन से लड़कियों को ही घर के काम जैसे खाना बनाना, कपड़े धोना, साफसफाई करना, सिलाईकढ़ाई करना आदि सिखाया जाता है और लड़कों को घर के बाहर के काम कराए जाते हैं. इस चक्कर में लड़कों को घरेलू कार्यों से कोई वास्ता नहीं रहता. उन्हें यह तक नहीं पता होता कि रसोई में कौन से डब्बे में चीनी और कौन से में नमक रखा है. इसलिए ऐसे लड़कों का जब विवाह हो जाता है, तो उन्हें घरेलू कार्यों की कोई समझ नहीं होती और वे पूरी तरह से अपनी पत्नी पर निर्भर रहते हैं. उस की गैरमौजूदगी में वे एक कप चाय भी न बना कर पी पाते. ऐसे में अगर पत्नी कामकाजी है, तो जब वह औफिस से घर पहुंचती है, तो रसोई और घर के काम उस का इंतजार कर रहे होते हैं. थकीहारी पत्नी को ही रसोई का सारा काम करना पड़ता है.

ऐसे में अगर पति यानी लड़के को बचपन से घर व रसोई का काम करना सिखाया गया होता, तो वह आज अपनी पत्नी का हाथ बंटा सकता था. खुद चाय बना कर पी लेता, औफिस से थकीहारी पत्नी को भी चाय बना कर दे देता और फिर दोनों मिल कर रसोई का काम संभाल लेते.

नहीं खानी पड़ती रोजरोज घिया या मूंग की दाल: वे लड़के जिन्हें बचपन से रसोई के कामों से दूर रखा जाता है ऐसे लड़के शादी के बाद पूरी तरह अपनी पत्नी पर निर्भर रहते हैं. आप ही सोचिए औफिस से थकीहारी आई पत्नी पति को छप्पन भोग बना कर तो खिलाएगी नहीं. मजबूरीवश पति को वही बोरिंग घिया और उबली मूंग की दाल खानी पड़ेगी. बेचारा पति ऐसे में उस के बनाए खाने में कोई नुक्स भी नहीं निकाल पाएगा, क्योंकि उसे तो खाना बनाना आता नहीं तो वह किस मुंह से खाने में वैरायटी की मांग कर पाएगा. अरे भई, अगर बचपन में रसोई में झांक लिए होते, दालमसालों से वाकिफ हो लिए होते तो अपनी पसंद का खाना बना कर खा सकते थे और पत्नी के लिए बना कर उसे भी खुश कर सकते थे. अगर लड़कों को भी बचपन से घर के कामकाज सिखाए जाएं तो वे भी हाउस हसबैंड की भूमिका अदा कर सकते हैं और लड़कियों यानी पत्नियों को घरबाहर दोनों की जिम्मेदारी अकेले नहीं संभालनी पड़ेगी. अगर पति को घर के काम आते होंगे तो वह अपनी कैरियर औरिऐंटेड पत्नी की घरेलू कामों में मदद करवाएगा और पत्नी कैरियर पर अपेक्षाकृत ज्यादा ध्यान दे सकेगी, साथ ही उस की पर्सनैलिटी में भी निखार आएगा.

घर का काम करना कमजोरी नहीं:

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में घरेलू कार्यों को कमतर माना जाता रहा है और लड़कियों को कमजोर मानते हुए उन्हें घर के और लड़कों को बाहर के काम सौपें जाते रहे हैं. लेकिन यह सोच सर्वथा गलत है कि घर के कार्यों में कम मेहनत लगती है या घर के काम कमजोरी के संकेत हैं. फिटनैस ऐक्सपर्ट भी मानते हैं कि औफिस में 8 घंटे कुरसी पर बैठ कर कार्य करने के बजाय घर के कामों में ज्यादा मेहनत लगती है और अधिक कैलोरी खर्च होती है. तभी वे डैस्क जौब करने वालों को हर आधे घंटे में सीट से उठ कर चहलकदमी करने की सलाह देते हैं. रसोई में आटा गूंधना, सब्जियां काटना, घर की साफसफाई करना, कपड़े धोना अपनेआप में पूर्ण ऐक्सरसाइज है, इसलिए यह काम कमजोरी का नहीं ताकत का प्रतीक है.

लड़के सीखें घर के काम करना:

अगर लड़के जो आगे चल कर पति की पदवी हासिल करेंगे अगर उन्हें आने वाले समय में अपनी जिंदगी सुधारनी है, तो उन्हें बचपन से ही घर का हर काम सीखना चाहिए फिर चाहे वह खाना बनाना हो, कपड़े धोना हो या छोटीमोटी सिलाई करना हो, क्योंकि आने वाले समय में जब अधिक से अधिक लड़कियां घर से बाहर औफिस की जिम्मेदारी संभालेंगी तो आप को (लड़कों को) हाउस हसबैंड की भूमिका निभानी पड़ेगी. अगर उन्हें घर के काम नहीं आते होंगे तो या तो उन्हें भूखा रहना पड़ेगा या फिर रोजरोज बाहर का खाना खाना पड़ेगा, जो उन के स्वास्थ्य के लिए ठीक न होगा.

ऐसा नहीं है कि आज के पतियों को घर के काम नहीं आते, आते हैं लेकिन ऐसे पतियों की संख्या बहुत कम है. लेकिन जिन्हें घरेलू काम आते हैं, वे आप के इस हुनर के चलते आत्मनिर्भर हैं और अपनी कामकाजी पत्नी के साथ मिल कर जीवन की गाड़ी खींच रहे हैं और अपने इस नए रोल में वे बेहद खुश भी हैं, क्योंकि उन्हें घर के सारे काम आते हैं और वे अपनी रोजबरोज की घरेलू जरूरतों के लिए पत्नी पर निर्भर नहीं हैं. वे न केवल रोज नईनई डिशेज ट्राई करते रहते हैं, बल्कि पत्नी को खिला कर उसे भी खुश रखते हैं. वे घर की साफसफाई से ले कर बच्चों को स्कूल ड्रौप करने, उन का होमवर्क कराने तक में मदद करते हैं.

फिल्म क्रिटिक व फिल्म जर्नलिस्ट दीपक दुआ इसी श्रेणी में आते हैं. उन की वाइफ एक सरकारी अस्पताल में हैड नर्स हैं. उन की जौब शिफ्ट वाली है. जब उन की वाइफ की ड्यूटी नाइट शिफ्ट वाली होती है, तो वे अपनी ‘पापाज किचन’ खोल लेते हैं और बच्चों को नईनई डिशेज बना कर खिलाते हैं यानी पत्नी को रसोई की जिम्मेदारी से मुक्त रखते हैं. उन का कहना है कि वे कुकिंग को ऐंजौय करते हैं और रोज नईनई डिशेज ट्राई करना अच्छा लगता है. बच्चे भी उन के हाथ की बनी रैसिपीज को रैलिश करते हैं.

उन के अनुसार जब पत्नी घर से बाहर रह कर घर के फाइनैंशियल मैटर में पति का हाथ बंटाती है, तो पति को घरेलू कामों को कर के उस की जिम्मेदारी बांट लेनी चाहिए न कि उसे बाहर के साथसाथ घरेलू कार्यों में भी उलझा कर रखना चाहिए. जब पत्नी घर की जिम्मेदारी के साथ बाहर की जिम्मेदारी संभालती है, तो पति को भी हाउस हसबैंड बन कर घर की जिम्मेदारियां बांटने में कोई शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए.

मगर यह बदलाव तभी संभव हो सकेगा, जब बचपन से लड़के और लड़की दोनों को हर काम बराबरी से सिखाया जाएगा न कि इस आधार पर कि यह काम लड़के का नहीं है या यह काम लड़के करते अच्छे नहीं लगते.

जरूरी है बदलाव:

अरे भई, यह किस किताब में लिखा है कि लड़कियां हवाईजहाज नहीं उड़ा सकतीं और लड़के रसोई में गोल रोटी नहीं बना सकते? आप बचपन से जैसा सिखाओगे वैसा लड़कालड़की दोनों सीख जाएंगे. शैफ राकेश सेठी, संजीव कपूर, रिपू दमन हांडा देश के बेहतरीन कुक हैं और लड़कियां और महिलाएं इन के हाथों की बनी डिशेज खा कर उंगलियां चाटती रह जाती हैं.

ठीक इसी तरह कौरपोरेट जगत जहां अब तक पुरुषों का दबदबा था, नैना लाल किदवई, मुक्केबाज मैरी कौम, बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा, साइना नेहवाल, भारोत्तोलक कर्नक मल्लेश्वरी ने साबित कर दिया है कि अब पुरुषों व महिलाओं के कार्यक्षेत्र के बीच की सीमा रेखा खत्म होती नजर आ रही है. कमाई वाले क्षेत्र पुरुषों के और घर की जिम्मेदारी महिलाओं की वाली सोच धीरेधीरे बदल रही है. आज की

व्यस्त दिनचर्या में महिलाएं घरबारह दोनों की जिम्मेदारी बखूबी निभा रही हैं. पुरुष भी आगे बढ़ कर अपनी बेटरहाफ की मदद हाउस हसबैंड की भूमिका अपना कर निभा रहे हैं. महिलाएं भी उन्हें इस रोल में खुशी से ऐक्सैप्ट कर रही हैं, क्योंकि पति की भूमिका बदलने से उन्हें भी चूल्हेचौके से छुटकारा मिलने लगा है. अब उन्हें पति के हाथों का बना खाना चखने का मौका मिल रहा है.

जोरू का गुलाम नहीं बराबर की पार्टनरशिप:

आज से पहले अगर कोई पुरुष घर की रसोई में काम करता या पत्नी के कामों में हाथ बंटाता दिख जाता था, तो उसे जोरू का गुलाम कह कर उस का मजाक उड़ाया जाता था, उस की मर्दानगी पर शक किया जाता था, लेकिन अब स्थितियां बदल रही हैं. आज पत्नी की घरेलू जिम्मेदारियों में हाथ बंटाने वाले पति को ट्रू लाइफपार्टनर कहा जाने लगा है. सही भी तो है जब दोनों जीवनरूपी गाड़ी के 2 पहिए हैं, तो जिम्मेदारी भी तो बांटनी होगी. अगर एक पहिए पर दोहरा बोझ होगा तो गाड़ी ज्यादा लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ पाएगी. जब घर दोनों का है तो जिम्मेदारी भी दोनों की बराबरी की बनती है. इस में गुलाम और मालिक वाली बात कहां से आ गई? दरअसल, यह पुरुषों की चाल थी कि वे महिलाओं को घर की चारदीवारी में कैद कर के रखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने घरेलू कार्यों, बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी महिलाओं के हिस्से बांट दी ताकि वे घर की चारदीवारी में रहें, बाहर की दुनिया में क्या हो रहा इस की उन्हें कोई खबर न लगे.

भूमिकाएं बदलने के फायदे

– जब पतिपत्नी एकदूसरे की भूमिकाएं निभाते हैं, मिल कर जिम्मेदारियां बांटते हैं, तो घर की गाड़ी व्यवस्थित ढंग से चलती है. किसी एक पर घरबाहर की जिम्मेदारी पूरी तहर से नहीं होती. जो जिस काम में परफैक्ट होता है वह उस जिम्मेदारी को संभाल लेता है. फिर चाहे वह हाउस हसबैंड हो या हाउस वाइफ, अर्निंग हसबैंड हो या अर्निंग वाइफ.

– भूमिकाएं बदलने से एक ही ढर्रे पर चल रही जिंदगी से बोरियत खत्म हो जाती है. जिंदगी में रोचकता व रोमांच बना रहता है और पतिपत्नी के रिश्ते में मजबूती आती है. जानेमाने लेखक चेतन भगत ने नौकरी छोड़ने के बाद हाउस हसबैंड की भूमिका न केवल बखूबी निभाई, बल्कि उसे ऐंजौय भी किया.

– जिम्मेदारियां बांटने से या भूमिकाएं बदलने से दोनों लाइफ पार्टनर में से एक के ही ऊपर घर या बाहर की पूरी जिम्मेदारी नहीं होगी, जिस से उसे अपना काम बोझ नहीं लगेगा और दोनों मिल कर घरबाहर दोनों की जिम्मेदारी उठाएंगे.

– जब पुरुष महिलाओं की जिम्मेदारियां मसलन रसोई, बच्चों को संभालने का कार्य करने लगते हैं, तो वे एकदूसरे की समस्याओं व परेशानियों को भी समझने लगते हैं. पुरुषों को एहसास होता है कि महिलाएं किस तरह अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए बच्चों की फिजिकल व मैंटल ग्रोथ में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.

– बच्चों की देखभाल करते हुए पुरुषों की बच्चों के साथ अच्छी बौंडिंग व भावनात्मक रिश्ता जुड़ता है.

– घर की जिम्मेदारियां निभाते समय पुरुषों का धैर्य व स्तर बढ़ता है. वे महिलाओं के वर्किंग प्रैशर को समझ पाते हैं.

– महिलापुरुष दोनों अपनीअपनी रुचियों व खूबियों का बेहतर ढंग से प्रयोग कर पाते हैं. मसलन, पति की रुचि व टैलेंट कुकिंग में है और पत्नी का बिजनैस में तो दोनों उस में बेहतर प्रदर्शन कर पाते हैं.

‘महिलाओं, बच्चों और यूथ के विकास जरुरी’ क्या कहती हैं सोशल वर्कर डॉ. किरण मोदी

जब कोई प्रियजन आपके जीवन से अचानक चला जाता है, जिससे आपकी जिंदगी पूरी तरह से बदल जाती है, आपकी जिंदगी उसके यादों के इर्द-गिर्द घूमती है,तब केवल एक ही रास्ता आपके जीवन में थोड़ी तसल्ली देती है, वह है गुजरे व्यक्ति की इच्छाओं को पूरा करना. दिल्ली की संस्था ‘उदयन केयर’ की सामाजिक कार्यकर्त्ता और फाउंडर मैनेजिंग ट्रस्टी डॉ. किरण मोदी ऐसी ही एक माँ है, जिन्होंने केवल 21 वर्ष के बेटे को एक दुर्घटना में खो दिया औरअपनी संस्था का नाम उन्होंने खोये हुए बेटे उदयन के नाम पर रखा. डॉ. किरण ने इसमें ‘मेकिंग यंग लाइफ शाइन’ कैम्पेन के द्वारा अनाथ, किसी बीमारी से पीड़ित बच्चों की देखभाल, महिला सशक्तिकरण को बढ़ाना आदि को ध्यान में रखते हुए हर बच्चे को आत्मनिर्भर बना रही है. शांत और स्पष्टभाषी 67 वर्षीय डॉ.किरण को इस काम के लिए शुरू में बहुत कठिनाई आई, पर वे घबराई नहीं और अपने काम को अंतिम रूप दिया. उनके साथ तीन ट्रस्टी जुड़े है, जो उन्हें पूरी तरह से सहयोग देते है.

किया संस्था का निर्माण

डॉ. किरण कहती है कि आज से 28 साल पहले मेरे जीवन में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने मुझे हिला कर रख दिया. फिर मैंने महसूस किया किमुझे कुछ ऐसा करना है, जिससे मेरा दुःख कुछ समय के लिए कम कर सकूँ. मैंने बच्चों के लिए कुछ करने की योजना बनाईऔरयही से मैंने अपनी संस्था बनाई. धीरे-धीरे मेरे साथ अच्छे लोग जुड़ते गए और मेरा काम आसान होता गया. मेरे बेटे का नाम उद्यन था, वह अमेरिका में अकेले रहकर पढ़ाई कर रहा था और वहां उसकी मृत्यु एक दुर्घटना की वजह से हो गयी. जब मैं वहां उसके कमरे में गयी, तो वहां मुझे एक कागज मिला, जिसमे मैंने पाया कि वह किसी को बिना बताएं अफ्रीका और गरीब देशों की बच्चों के लिए अनुदान देता था, ऐसे में मैंने उसके काम को आगे बढ़ने की सोची और अपनी संस्था उदयन केयर बनाई.

मुश्किल था आगे बढ़ना

इसके आगे डॉ. किरण कहती है कि शुरू में संस्था में काम करना मुश्किल था, क्योंकि कहाँ से फंड आयेगे, कैसे काम करना है, क्या कार्यक्रम करने है आदि विषयों पर जानकारी कम थी. पहले एक साल तक तो मुझे कई संस्थाओं में जाना पड़ा. वहां उनके काम को समझने की कोशिश की.नॉन और डेवलपमेंट सेक्टर के बारें में जानकारी हासिल की. तब मुझे समझ में आने लगा कि बच्चों के लिए कैसे क्या करना है. उसी दौरान मैं एक संस्था में गई, वहां एक छोटी लड़की मेरी पल्लू पकड़ कर कहने लगी कि मुझे घर ले चलो. मुझे यहाँ मत छोड़ो. मैंने देखा है कि तब बच्चों को एक अनाथ की तरह पाला जाता था और वहां से निकलने के बाद भी वे फिर अनाथ ही रह जाते है. उनकी बोन्डिंग नहीं होती थी और वे 18 साल के बाद निकल जाते थे. इसे देखकर मैंने अपनी संस्था को एक परिवार की तरह बनाई, ताकि बच्चों को अनाथ महसूस न हो. यही से उदयन संस्था की रचना की गयी, जिसमे मैंने एक घर में 10 से 12 बच्चों के रहने का इंतजाम किया था. जिसमे आसपास के समुदाय के साथ उनका जुड़ाव अच्छा हो इसकी कोशिश किया जाने लगा, ताकि बड़े होने पर उन्हें समाज के साथ जुड़ने में आसानी हो. इसके अलावा हर बच्चों के लिए एक मेंटर की व्यवस्था की गई ताकि वे उन्हें आगे बढ़ने में उन्हें सही गाइडेंस दे सके. इसमें मैंने उन लोगों को चुना , जो अच्छे पढ़े-लिखे, जॉब करने वाले, बच्चों को सही दिशा में गाइडेंस देने वाले आदि को अपने पैनल पर रखा .

डॉ. किरण ने पहले दिल्ली में काम की शुरुआत की इसके बाद लोग जुड़ते चले गए और अब 16 होम सेंटर पूरे देश में है, जिसमे 18 साल के बाद बच्चे आते है. इसमें 29 मेंटर पेरेंट्स है . सभी बच्चों को पेरेंट्स की तरह मानते है, लेकिन वे वहां रहते नहीं, बच्चों को गाइड कर घर चले जाते है. बच्चो की देखभाल के लिए कुछ सर्वेन्ट्स है. सभी तरह के लोग हमारे साथ होते है, जो बच्चों की किसी समस्या का समाधान कर सकते है.

मानसिक विकास पर अधिक ध्यान

बच्चों को संस्था तक पहुँचने के बारें में पूछने पर वह कहती है हर जिले में चाइल्ड प्रोटेक्शन कमेटी होती है. उनके पास अपने बच्चों को सही पालन-पोषण न दे पाने वाले पेरेंट्स के बच्चे आते है, फिर कमिटी निश्चित करती है कि बच्चा किस संस्था में जाएगा. बच्चा आने पर उनके पेरेंट्स को बुलाकर उन्हें बच्चे को ले जाने के लिए कहा जाता है, ताकि पेरेंट्स बच्चे को सही तरह से पाल सकें, जिन्हें पैरेंटल सपोर्ट नहीं है,उन्हें सहयोग देते है. 16 होम्स में बच्चे 18 साल के उपर वाले आते है. इन बच्चों को ‘आफ्टर केयर’ दी जाती है. ऐसी सुविधा 3 जगह पर है. वहां बच्चे 18 साल के बाद रहकर, कॉलेज की पढाई करते है और जॉब की कोशिश करते है, जॉब मिल जाने के बाद वे निकल जाते है. बच्चे और युवा के तहत काम करने वाली 4संस्थाएं 4 राज्यों में है. इसके बाद मैंने इसे अधिक कारगर बनाने के लिए दो नए प्रोग्राम शुरू किये, जिसका काम परिवार को मजबूत बनाना था, ताकि बच्चे परिवार के साथ रहे . जिसमे पहला ‘उदयन शालीनी फेलोशिप’कार्यक्रम है, इसमें गरीब परिवार से आने वाली लड़कियां पढना चाहती है, लेकिन पेरेंट्स पैसे की कमी और सामजिक दबाव की वजह से उन्हें पढ़ाना नहीं चाहते, ऐसी लड़कियों को सरकारी स्कूल से लेकर स्नातक की पूरी पढाई करवाई जाती है. इसमें उस लड़की का पूरा खर्चा देने के साथ-साथ एक मेंटर भी दी जाती है, ताकि उसका मानसिक विकास अच्छी तरह से हो सकें, जिसमे लाइफस्टाइल, कैरियर काउंसलिंग, महिलाओं के अधिकार आदि होते है, जो किसी व्यक्ति की पूरी ग्रोथ को निर्धारित करती है और बाद में उन्हें जॉब दिलवाया जाता है. ये प्रोग्राम 26 शहरों में होती है. इस संस्था के साथ अधिकतर वोलेंटीयर्स काम करते है. इस प्रोग्राम में अभी मेरे पास 11 हजार बच्चियां है,जिनका ख्याल रखा जाता है.

बच्चों के घर को बसाना है मकसद

इसके आगे डॉ. किरण का कहना है कि तीसरा प्रोग्राम Information Technology and vocational Training  Centres (आईटी वीटी ) का है, जिसमें 19 आईटी सेंटर्स पूरे भारत में है, इसमें 2 वोकेशनल ट्रेनिंग सेंटर्स है. बहुत सारे बच्चे घर से बाहर मुंबई काम करने आ जाते है, उन्हें भी चाइल्ड वेलफेयर कमिटी के द्वारा ही मेरे पास भेजा जाता है. मेरी ये कोशिश होती है कि घर छोड़कर भागने वाले बच्चों के माता-पिता को खोजा जाय. घर प्रोग्राम में अनाथ तो कुछ भागकर या कुछ को पेरेंट्स गरीबी के कारण जान-बुझकर खो देते है. इन्हें पुलिस उठाकर ले जाती है और ऐसे ही संस्थाओं में छोड़ देती है, इसलिए मेरे पास भी हर तरह के बच्चे है. पहले हर जगह से बच्चे आ जाते थे, लेकिन अब इन बच्चों को उस राज्य के संस्थाओं में ही रखकर बड़ा किया जाता है. ऐसी संस्था दिल्ली में गाजियाबाद, गुडगांव, कुरुक्षेत्र आदि कई जगहों में है, जहाँ उस जिले के आसपास के बच्चे आते है.

हो जाती है गलती 

यहाँ से निकलकर 4 बच्चे विश्व की अलग-अलग युनिवर्सिटी में आगे पढने चले गए है. इसके अलावा उनकी संस्था से निकलकर कुछ बच्चे इंजिनियर तो कुछ वकील बन चुके है. इस काम में डॉ. मोदी के साथ मेंटर्स का काफी योगदान रहा. एक मेंटर कैंसर की कीमोथेरेपी के बाद काम करने आ गयी. इस तरह की डिवोशन सभी में है. हर बच्चा उनके लिए प्रिय होता है, उनका कहना है कि कोई भी बच्चा गलत नहीं हो सकता, उससे गलती हो जाती है. बच्चे ने गलती क्यों की, वजह क्या रही, इसे जानने पर उसे ठीक किया जा सकता है. एक 10 साल की लड़की को मैंने एक बार कहा था कि मैं तुमसे इतना प्यार करती हूँ, पर तुम मुझे नहीं करती. जाते समय उसने मुझे एक चिट्ठी दी और मुझे घर जाकर खोलने को कहा. मैने घर पहुंचकर जब उसे खोला तो उसमे लिखा था कि जब मैं खुद को प्यार नहीं करती तो आपको क्या प्यार करुँगी. इससे मुझे उनकी मानसिक दशा के बारें में जानकारी मिली, ये बच्चे बहुत दुखी होते है, क्योंकि घर से निकलने के बाद रास्ते में न जाने क्या-क्या होता होगा, घर में भी क्या हुआ होगा,फिर पुलिस के गंदे बर्ताव से होकर संस्था में आती है, ऐसे में बच्चा किसी को विश्वास नहीं कर पाता. दो साल बाद जब मैं उससे मिली, तो उसने दूसरी पत्र दी, इसे भी मैंने घर जाकर खोला, तो उस पर अब लिखा था, ‘आई लव यू’. इस तरह बच्चों से मैंने मनोवैज्ञानिक बहुत सारी बातें सीखी है. बाल सुरक्षा पर भी बहुत सारा काम बिहार और मध्यप्रदेश में यूनिसेफ, सरकार के साथ मिलकर किया जा रहा है. इस काम में फाइनेंस की व्यवस्था हो जाती है,डोनेशन मिलते है. बच्चों की उपलब्धि को देखकर वे भी खुश होते है और अच्छा डोनेशन देते है. अभी बहुत सारा काम आगे करने की इच्छा है.

वजन न बढ़ने के कारण परेशान हो गई हूं, मैं क्या करुं?

सवाल-

मेरी उम्र 62 साल है. मैं बहुत दुबलीपतली हूं. दूध, घी, हरी सब्जियां, फल, जूस सभी कुछ खातीपीती हूं, पर चेहरे पर रौनक नहीं आती. नींद न आने की भी थोड़ी समस्या है, जिस के लिए मुझे नींद की गोली लेनी पड़ती है. रोजाना सुबह 2 किलोमीटर की सैर भी करती हूं, 1 घंटा व्यायाम करती हूं. फिर भी न तो वजन बढ़ता है, न ही चेहरे पर चमक आती है. सोशल गैटटुगैदर और पार्टी वगैरह में जाते समय सोचती हूं कि काश मेरा शरीर थोड़ा अधिक भरा होता. कृपया समाधान बताएं?

जवाब-

सब से पहले यह बात जान लें कि हर किसी के शरीर की संरचना दूसरे से भिन्न होती है. यह संरचना हमारी आनुवंशिकी, हमारे बचपन, हमारे शारीरिक विकास, हमारी मानसिक प्रवृत्तियों और अगर वर्तमान के नए आयुर्विज्ञान सिद्धांतों को समझें तो हमारी आंतों में जी रही बैक्टीरिया की बस्ती, जिसे वैज्ञानिक माइक्रोबायोम कहते हैं, इन तमाम चीजों पर निर्भर करती है.

आप जिस उम्र में आ पहुंची हैं, उस में इन चीजों को बदलना नामुमकिन है. बस खुश रहिए, चिंता कम करें और जीवन का पूरा आनंद लें. वजन कम होना स्वास्थ्य के लिए अच्छा ही है. उस से शरीर के जोड़ों और रीढ़ पर कम भार रहता है और व्यक्ति आर्थ्राइटिस तथा दूसरी बहुत सी बीमारियों से बचा रहता है.

चेहरे की रौनक शारीरिक वजन से अधिक मन की अवस्था पर निर्भर करती है. आप का भरापूरा परिवार है, आप के पास सुख के सभी साधन हैं, उन का आनंद लेने से ही जीवन में खुशियों का वसंत खिला रह सकता है.

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जिस तरह वजन का बढ़ना एक बीमारी है, उसी तरह से वजन का जरुरत से ज्यादा कम होना भी एक बीमारी ही है. अगर शरीर बहुत कमजोर और दुबला-पतला हो तो आपका हर कोई मजाक उड़ाता है और आप हर जगह हंसी का पात्र बनते हैं.

वजन की कमी को दूर करने के लिए आपको कुछ खास खाद्य पदार्थ को अपने रोज के भोजन में शामिल करना चाहिए. हम आपको बताएंगे कि किन चीजों को खाने से आप आसानी से अपने आपको चुस्त-दुरुस्त और हष्ट-पुष्ट बना सकते हैं.

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अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

ऐसे पाएं सफलता

दुनिया में कामवाली हर औरत का जीवन बड़ा संघर्षमय होता है, जो घर से दूर रह कर काम करती हैं, उन के लिए तो चुनौतियां और ज्यादा होती हैं. जो कभी हार नहीं मानतीं, आमतौर पर स्वभाव से हंसमुख होती हैं, उन्हें पार्टी करना, पार्टी में जाना और घूमना बहुत पसंद होता है. उन्हें सब के दिलों पर छा जाने की कला सीखनी होती है.

कई औरतों को चुनौतीपूर्ण काम मिलता है और साथ ही मातापिता की देखभाल का जिम्मा भी. अगर जौब ऐसी है जिस में अकेले ट्रैवल करना भी जरूरी हो तो कुछ और चैलेंज आ जाते हैं.

अनिता को अपनी जौब के सिलसिले में दिल्ली से मुंबई आनाजाना करना होता था क्योंकि वह मार्केटिंग और मैनेजमैंट का दोहरा काम संभाल रही थी.

वह हिमाचल की निवासी थी और जब दिल्ली आई तो मांबाप से मिलने भी जाती. उसे कालेज में डांस करने का शौक था और किसी भी अवसर पर वह अवश्य नृत्य करती थी. अब भी किसी पार्टी में वह घंटों नाच सकती है. पहले वह दिल्ली में काम करती थी पर बाद में उसे मुंबई में एक कंपनी ने बुलाया.

पहले वह वहां 1 हफ्ता काम करती और फिर वापस दिल्ली चली आती थी. फिर वह मुंबई आ गईर् और यहीं रहने लगी. तब तक काम इतना बढ़ गया था कि बारबार आनाजाना संभव नहीं था.

जीवन एक संघर्ष है

इस तरह की चुनौतियां हर सफल औरत को कई बार ?ोलनी पड़ती हैं. शादी तो हो जाती है पर अगर काम के बोझ में जीवनसाथी के कारण तो चैलेंज बढ़ जाते हैं, खासतौर पर जब बच्चे भी हो जाएं. डिवोर्स का समय काफी संघर्षपूर्ण रहता है क्योंकि लोग इस अलगाव को समझ नहीं पाते हैं. इस में सब से बड़ी सहायता अकसर उन की मां करती है क्योंकि उन्हें पता होता है कि ऊंचनीच क्या होती है.

आमतौर पर सफल तलाकशुदा औरतें अपने पति के बारे में अधिक बताना नहीं चाहतीं और यह सही भी है क्योंकि वह एक बीता हुआ कल था जिसे उसे याद करना अच्छा नहीं लगता है. लेकिन इतना जरूर है कि जो लोग इस तरह की स्थिति से न गुजरे हों उन्हें उस की बात समझ में नहीं आती और फिर यह भी चुनौतियों की लिस्ट में जुड़ जाता है. शादी टूटने को हमेशा एक सकारात्मक रूप में लें कि झगड़े वाले विवाह से चुनौती वाला एकाकीपन ज्यादा अच्छा है.

अगर परिवार की कोई लड़की ऊंचे पद पर न हो तो वह भी इसी तरह की सफल महिला को नहीं समझ पाती. काम कर के अपने पैरों पर खड़ा होना एक ऐसा जनून है जिसे रोकना नहीं चाहिए. एक औरत को चैन तभी आने लगेगा जब वह काम में सफल होने लगेगी. यही बात बच्चों में भी आ जाती है अगर बच्चे हों तो.

आसान बनाएं काम

आज भी किसी भी अकेली महिला का काम करना मुश्किल है. आज हर दिन, हर पल सिस्टम बदलते हैं. प्रैक्टिस के चक्कर में कंपनी के रोज नए प्रयोग करती है, दखलंदाजी करती है. इसलिए काम शुरू कहीं से होता है और हो आगे कुछ और रहा होता है, जिस का आगापीछा समझना और समझना चैलेंजिंग होता है. आप जिस जौब के लिए रखी जाती हैं उस का प्रोफाइल बदल जाता है. मैनेजर की निजी जिंदगी नहीं रहती.

बच्चों के पीटीए को अटैंड करना, फिर उन के साथ घूमना, उन का खयाल रखना, मातापिता का ध्यान रखना सब सही तरीके से करना होता है. काम 9 से 6 बजे तक हो या 9 से रात के 12 बजे तक सहना पड़ता है. काम की गुणवत्ता अधिक बनी रहे यह लगातार चैलेंज होता है.

बढ़ते जाना है

हां हर सफल महिला को अपने पहरावे पर पूरा ध्यान रखना चाहिए. हर तरह के कपड़े अच्छे नहीं होते. वही पहनें जो कंफर्टेबल रखे. पार्टियों में जाएं, प्रकृति से प्यार करें.

काम में ऐक्सप्लायटेशन हो तो हल्ला न मचाएं. यह हमेशा से होता रहा है. अगर आप को किसी से कुछ खास उम्मीद है तो आप को कुछ देना होगा. खुशीखुशी दें या रोधो कर यह आप पर है. यह गारंटी भी नहीं कि आप जो चाहें वह आप को मिलेगा पर छुईमुई न बनें.

काम का चैलेंज वह क्षेत्र है जहां मरना भी पड़ता है. अगर आप का कोई गौडफादर है तो आप कामयाब. आप की सफलता आप की बहुत सी खामियों को छिपा देगी. पीछे की फुसफुसाहट को इग्नोर करना भी चैलेंज है.

वार्डरोब में जरूर शामिल करें ये 5 चीजें, कभी भी नहीं होते आउट ऑफ स्टाइल

आप कितना भी शॉपिंग कर लें लेकिन जब कहीं जाना हो तो आपको अपने वार्डरोब में हमेशा कम ही विकल्प नजर आता है. जब गर्मी के मौसम में स्टाइल की बात आती है तो सब एकदम हल्के-फुल्के कपड़ों को ही पसंद करते हैं और वहीं कई ऐसे आउटफिट हैं जो आप सर्दी में भी स्टाइल कर सकती हैं. लेकिन आपको यह बता दें कि अपने वार्डरोब में कुछ ऐसे कपड़े और चीजें शामिल करनी चाहिए, जिन्हें आप किसी भी मौके पर स्टाइल कर सकती हैं. हम आपको आज ऐसे ही कुछ चीजों के बारे में बता रहे हैं.

1. व्हाइट शर्ट

आम तौर पर गर्मी में महिलाएं पेस्टल आउटफिट और प्रिंटेड वियर से लेकर मैक्सी ड्रेस ऑप्‍शन है जो गर्मी  में कुल लुक देता है. लेकिन व्हाइट शर्ट की बात ही कुछ और है और सफेद रंग गर्मियों के लिए ही बना है. व्हाइट शर्ट को शॉर्ट्स, रिप्ड डेनिम या शर्ट ड्रेस के साथ पहना जा सकता है. जो आपको बेहद स्टाइलिश लुक देगा. तो देर किस बात की आप अपने समर  वॉर्डरोब में इसे जरूर शामिल करें.

2. टोट बैग

टोट बैग आप हर समय कैरी कर सकती हैं, महिलाओं के सभी कैरी-ऑन आइटम में यह फिट बैठता है, और गर्मियों में आप हमेशा अपने साथ कई चिजे लेकर चलती हैं, ऐसे में समर बैग में सनब्लॉक क्रीम, धूप का चश्मा, हाइड्रेट होने के लिए कोई ड्रिंक, स्कार्फ रखती हैं, इसके लिए आपके पास एक क्लासिक टोट बैग होना जरूरी है जिसमें आप इन सभी आइटम को आसानी से रख सकते हैं.

3. वाइट ड्रेस या मैक्सी ड्रेस

गर्मियों में अगर आप बाहर जा रहे हैं तो सबसे सुविधाजनक होता है वाइट ड्रेस या मैक्सी ड्रेस पहनना. गर्मी में यह ड्रेस हल्का, सुंदर और किसी भी आउटिंग के लिए एकदम परफेक्ट होता है. इसके लिए आप मिनी, मैक्सी किसी भी तरह का ड्रेस ले सकती है जो बेहद आकर्षक दिखते हैं. इसके लिए आप  लिनेन और कॉटन का विकल्प चुन सकती हैं. इस मौसम में आसान हवादार कपड़े निश्चित रूप से आपके वार्डरोब में आने चाहिए.

4. धूप का चश्मा

गर्मी में कुछ लें ना लें बाहर जाते समय धूप से बचने के लिए धूप का चश्मा जरूर अपने पास रखें. धूप का चश्मा लगाने से आप स्टाइलिश दिखने के साथ ही  ये हमें तेज धूप में आराम महसूस करने में भी मदद करते हैं. साथ ही यह हमारी आंखों को हानिकारक किरणों से बचाने में मदद करते हैं. धूप का चश्मा लंबे समय में आंखों को नुकसान से बचाने के लिए अच्छा होता है. ऐसे में आप ट्रेंडी सनग्लासेस, कैट आइड, रिफ्लेक्टर, एविएटर, वेफेयरर्स या रेट्रो राउंड फ्रेम का अपनी पसंद और चेहरे के प्रकार के अनुसार चुन सकती हैं और अपने वॉर्डरोब में इस जरूर शामिल करें.

5. कॉटन साड़ी

समर में महिलाओं के लिए साड़ी पहनना थोड़ा मुश्किल हो जाता है. लेकिन इसका भी हल हम ढुंढ लाएं हैं. गर्मी की वजह से गर्ल्स लाइटवेट और ढीले कपड़े पहनने के बारे में सोचती हैं, इसके लिए बेस्ट ऑप्शन है कॉटन की साड़ियां है. हालांकि आप ऑर्गेंजा साड़ी को भी चुन सकती हैं क्योंकि यह साड़ी वजन में बहुत ही हल्की होती है और आपको रॉयल लुक कैरी कर सकती हैं. तो आप गर्मियों में अपने वार्डरोब में इन साड़ियों का कलेक्शन जरूर रखें.

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