Monsoon Special: ब्रैकफास्ट में परोसें राइस सोया परांठा

बच्चों के लिए अगर हेल्दी नाश्ता ट्राय करना चाहती हैं तो राइस सोया परांठा आपके लिए परफेक्ट औप्शन है. आइए आपको बताते हैं इस आसान रेसिपी को बनाने का तरीका…

सामग्री

1 कप चावल उबले

1/2 कप सोयाबीन का आटा

1/3 कप गेहूं का आटा

2 बड़े चम्मच ओट्स का आटा

1/4 छोटा चम्मच हलदी पाउडर

1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर

1 छोटा चम्मच सौंफ पाउडर

1 बड़ा चम्मच अदरक व लहसुन का पेस्ट

3 बड़े चम्मच दही

2 छोटे चम्मच घी मोयन के लिए

1 बड़ा चम्मच धनियापत्ती बारीक कटी

परांठे सेंकने के लिए पर्याप्त रिफाइंड औयल

नमक स्वादानुसार.

विधि

उबले चावलों में सारी सामग्री मिला कर आटा गूंध लें. जरूरत हो तो 1 बड़ा चम्मच पानी डाल लें. आटे को 15 मिनट ढक कर रखें. फिर मीडियम आकार के टमाटर के बराबर की लोइयां बना कर परथन की सहायता से परांठे बेलें और मीडियम आंच पर दोनों तरफ तेल लगा कर उलटपलट कर सेंक लें. परांठों को अचार या दही के साथ सर्व करें.

हिंदी: शर्म नहीं गर्व कीजिए

हिंदी मीडियम से भी लहराया जा सकता है परचम

ऐसे बहुत से बच्चे हैं जो सरकारी स्कूलों में पढ़ कर अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं और नाम कमाते हैं. अरुण एस नायर एक ऐसे ही शख्स हैं जिन्होंने सरकारी स्कूल से पढ़ाई की और अपने दम पर डाक्टर और फिर यूपीएससी पास कर आईएएस अधिकारी बना. वह 55वीं रैंक ला कर आईएएस बने. वे केरल से संबंध रखते हैं. उन्होंने सरकारी स्कूल से पढ़ाई की और एक के बाद एक उपलब्धियां हासिल कीं.

महाराष्ट्र कैडर से आईपीएस मनोज शर्मा की कहानी भी इस देश के हर युवा के लिए मिसाल है. 12वीं कक्षा फेल मनोज शर्मा की परिस्थिति ऐसी थी कि पढ़ाई जारी रखने के लिए औटो चलाया, भिखारियों के साथ सोया. उन्होंने गांव में शुरुआती पढ़ाईलिखाई हिंदी मीडियम से की थी, जिस की वजह से अंगरेजी बहुत कमजोर थी. हिंदी मीडियम से पढ़ने वाले मनोज शर्मा से यूपीएससी के इंटरव्यू के दौरान पूछा गया कि आप को अंगरेजी नहीं आती तो फिर शासन कैसे चलाएंगे? मगर आज वे महाराष्ट्र के सफल और तेजतर्रार आईपीएस अधिकारियों में से एक हैं.

उत्तराखंड के देहरादून शहर के एक परिवार की बेटी गुलिस्तां अंजुम ने सरकारी व हिंदी मीडियम स्कूलों से परहेज करने वाले तमाम लोगों की तब बोलती बंद कर दी जब उन्होंने उत्तराखंड न्यायिक सेवा परीक्षा में सफलता हासिल की. उन्होंने 2017 में भी पीसीएस-जे की परीक्षा दी थी पर कुछ अंकों से रह गईं. लेकिन दूसररी बार फिर पूरी शिद्दत से परीक्षा की तैयारी की और सफल हुईं.

निशांत जैन ने सिविल सेवा परीक्षा 2014 में दी थी, जिस में उन्होंने 13वीं रैंक हासिल की थी. वे यूपीएससी परीक्षा में हिंदी के टौपर थे. निशांत बेहद साधारण बैकग्राउंड में पलेबढ़े. वे अपना खुद का खर्चा उठाने में यकीन रखते थे. ऐसे में उन्होंने 10वीं कक्षा के बाद कोई न कोई नौकरी करने का फैसला किया. एमए के बाद निशांत जैन ने यूपीएससी की तैयारी करने का फैसला लिया. उन की पोस्ट ग्रैजुएशन तक की पढ़ाई हिंदी मीडियम से हुई थी. इसलिए उन्होंने यूपीएससी का सफर भी हिंदी मीडियम के साथ जारी रखने का प्लान बनाया. निशांत की हिंदी पर शुरू से ही कमांड रही. ऐसे में उन्होंने सोचा कि अगर यूपीएससी में भी अपने सवालों के जवाब प्रभावशाली तरीके से देने हैं तो हिंदी भाषा को ही मजबूत करना होगा. यूपीएससी 2014 की परीक्षा में उन्होंने 13 रैंक प्राप्त की. इस तरह एक हिंदी माध्यम का युवा आईएएस अफसर बन गया.

इसी तरह विस्थापित एक परिवार के बेटे अमन जुयाल ने सरकारी व हिंदी मीडियम स्कूलों से परहेज करने वाले तमाम लोगों को आईना दिखते हुए नीट व जीबी पंत विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा के बाद एम्स एमबीबीएस प्रवेश रीक्षा में भी प्रदेश में दूसरा स्थान हासिल किया.

‘‘कौ शिक मुझे नहीं लगता कि मैं इस इंटरव्यू में सफल हो पाऊंगा. सारे इंग्लिश मीडियम के कैंडिडेट्स भरे पड़े हैं जो फर्राटेदार इंग्लिश में बातें कर रहे हैं,’’ अमर ने थोड़ी घबराई हुई आवाज में कौशिक से कहा.

‘‘अगर तू ऐसा सोच रहा है तो मुझे यकीन है तू वाकई इंटरव्यू में फेल हो जाएगा,’’ कौशिक ने सहजता से जवाब दिया.

‘‘यह क्या यार तू तो मेरा मनोबल और गिरा रहा है.’’

‘‘तो क्या करूं, जब तूने खुद ही यह कहना शुरू कर दिया है कि तू सफल नहीं होगा तो यकीन मान कोई तुझे नहीं जिता सकता. अगर सफल होना है तो अपने मन और दिमाग को बता कि तुझे बस जीतना है. तब तुझे कोई नहीं हरा सकता. मगर जब पहले से ही तू घबराया हुआ अंदर जाएगा तो जाहिर है तुझ से छोटीछोटी गलतियां होंगी. तू याद की हुई बातें भी भूल जाएगा. इतना भ्रमित दिखेगा कि वे चाह कर भी तुझे अपौइंट नहीं कर पाएंगे. ऐसे में तू असफल होगा, मगर हिंदी मीडियम की वजह से नहीं बल्कि कौन्फिडैंस की कमी की वजह से,’’ कौशिक ने समझया.

‘‘सच यार तूने तो मेरी आंखें खोल दीं. अब देखना तेरा दोस्त कैसे जीत कर आता है,’’ अमर ने उत्साह से कहा. उस की आंखों में विश्वास भरी चमक खिल आई थी.

यह एक सच्चा वाकेआ है और अकसर हमारे आसपास हिंदी मीडियम में पढ़े ऐसे बहुत से अमर दिख जाएंगे जो जीतने के पहले ही हार जाते हैं, इंटरव्यू बोर्ड के सामने जाने से पहले ही असफल हो जाते हैं. दरअसल, वे घबरा जाते हैं और सब जानते हुए भी सही जवाब नहीं दे पाते. आत्मविश्वास की कमी की वजह से उन की जबान लड़खड़ाने लगती है. कई ऐसे भी मिलेंगे जो हिंदी मीडियम वाले होने के बावजूद इंग्लिश में जवाब देने का फैसला करते हैं ताकि सामने वालों पर अच्छा प्रभाव पड़े. मगर होता उलटा है. उन्हें इंग्लिश के सही शब्द नहीं मिल पाते और सब जानते हुए भी सैटिस्फैक्टरी रिस्पौंस नहीं दे पाते.

दरअसल, हिंदी मीडियम के युवाओं को हमेशा ऐसा लगता है कि इंग्लिश मीडियम में पढ़ने वाले लोग बेहतर होते हैं. इस से उन के अंदर हीनभावना भर जाती है, आत्मविश्वास कमजोर हो जाता है. लेकिन सच यह है कि कोई हिंदी भाषा में बेहतर होता है तो कोई इंग्लिश भाषा में. कोई फर्राटेदार अंगरेजी बोल लेता है तो कोई धाराप्रवाह हिंदी. भाषा तो दोनों ही हैं. जरूरत होती है सामने वाले के आगे अपनी बात सही तरह से प्रस्तुत करने की. माना कि किसी एक भाषा पर कमांड हासिल करना आवश्यक है, पर इस का मतलब यह तो नहीं कि हिंदी जानने वाले कमजोर हैं और इंग्लिश जानने वाले ज्ञानी हैं.

कुछ लोग यह सोचते हैं कि इंग्लिश मीडियम में पढ़ने से अच्छा रुतबा, कैरियर, ओहदा, पैसा और नौकरी मिलती है. पर ऐसे लोगों की कमी नहीं जिन्होंने भाषा को अहमियत न देते हुए कड़ी मेहनत से शोहरत के उस मुकाम को हासिल किया जहां तक पहुंचने की ज्यादातर लोग कल्पना भी नहीं कर पाते. इंसान के भीतर काबिलीयत होनी चाहिए, ज्ञान और आत्मविश्वास होना चाहिए. भले ही भाषा हिंदी ही क्यों न हो.

डिजिटल दुनिया में हिंदी सब से बड़ी भाषा

अगर हम आंकड़ों में हिंदी की बात करें तो 260 से ज्यादा विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है. 1 अरब, 30 करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी बोलने और समझने में सक्षम हैं. 2030 तक दुनिया का हर 5वां व्यक्ति हिंदी बोलेगा. सब से बड़ी बात यह कि जो कुछ साल पहले इंग्लिश इंटरनैट की सब से बड़ी भाषा थी अब हिंदी ने उसे बहुत पीछे छोड़ दिया है. गूगल सर्वेक्षण बताता है कि इंटरनैट पर डिजिटल दुनिया में हिंदी सब से बड़ी भाषा है.

हिंदी बोलने पर शर्म नहीं गर्व कीजिए

अगर आप इंग्लिश में कंफर्टेबल महसूस करते हैं तो आप इंग्लिश में ही बात करिए. इसे ही अपनी बातचीत की प्राथमिक भाषा रहने दीजिए. लेकिन जब कभी आप को हिंदी बोलने का मौका मिले या आप को इंग्लिश में बात करना न आता हो तो इस में शर्म न करें.

अब जरा भारत के कुछ नेताओं की ही बात कर लें. बहुत से नेता हिंदी मीडियम से पढ़ाई कर के आए हैं. देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हों या वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बिहार के नीतीश कुमार हों, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव हों या फिर यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ, ये सभी हिंदी मीडियम से पढ़ कर आए हैं पर देश की बागडोर संभाली. इन सभी नेताओं ने हर काम हिंदी भाषा में किया और हिंदी को ही तरजीह दी.

याद कीजिए 4 अक्तूबर, 1977 का वह दिन जब विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी पहुंचे थे. उन्होंने अपना भाषण हिंदी में दिया था. वैसे यह भाषण पहले इंग्लिश में लिखा गया था. लेकिन अटल ने उस का हिंदी अनुवाद पढ़ा था. उन के भाषण के बाद यूएन तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. हिंदी की वजह से ही उन का यह भाषण ऐतिहासिक हो गया था.

इसी तरह मोदीजी भी अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर धाराप्रवाह हिंदी में भाषण देते हैं और विदेशी नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिला कर शिरकत करते हैं.

ज्ञान भाषा पर आधारित नहीं होता

कोई भी भाषा अपनी भावना व्यक्त करने का एक माध्यम भर है. यह किसी को अमीरगरीब नहीं बनाती. अरे यह तो आप के घर की भाषा है, आप के शहर और गांव की भाषा है. इसे बोलने में शर्म नहीं अपनापन महसूस होना चाहिए. हिंदी भाषा आप का स्टेटस छोटा नहीं दिखाती बल्कि आप के विद्वान होने का ऐलान करती है.

आप अपने आसपास नजर डालें तो यह महसूस करेंगे कि जो व्यक्ति इंग्लिश भाषा बोलने में सहज नहीं महसूस करता उसे कम पढ़ालिखा या कम समझदार माना जाता है. लेकिन याद रखें ज्ञान भाषा पर आधारित नहीं होता. ज्ञान तो आप की पढ़ाई, समझ और अनुभवों पर निर्भर करता है. हो सकता है कि कोई व्यक्ति इंग्लिश नहीं हिंदी में बोलता हो, लेकिन उस के पास बिजनैस, तकनीक या फिर किसी और क्षेत्र में ज्ञान का भंडार हो. यह भी हो सकता है कि कोई व्यक्ति इंग्लिश न बोल पाता हो पर हिंदी भाषा में फिलौसफी से जुड़ी ऐसी बातों का रहस्य खोल सकता हो जो शायद देशविदेश के विद्वानों ने भी न खोला हो. किसी को उस की भाषा के आधार पर कम समझदार आंकना हमारी अपनी कमअक्ली को दर्शाता है.

हम ने इंग्लिश को हिंदी में इतना ज्यादा मिला दिया है कि शुद्ध हिंदी लिखना ही भूल गए हैं. हम आजकल हिंगलिश बोलने लगे हैं. यह न इंग्लिश है और न हिंदी. यह हर तरह से कमजोर लोगों की निशानी है. ऐसे लोग जिन्हें न खुद पर विश्वास है और न अपनी भाषा पर वे ही ऐसा जोड़तोड़ का रास्ता अपनाते हैं. इसी तरह आजकल व्हाट्सऐप पर ऐसी हिंदी लिखी जा रही है कि बेचारी हिंदी को ही शर्म आती होगी.

मातृभाषा की अहमियत समझें

याद रखें इंसान की कल्पनाशक्ति का विकास मातृभाषा में ही हो सकता है. हम जब इमोशनल या गुस्से में होते हैं तो हम मातृभाषा में ही बोलते हैं. जब धाराप्रवाह बोलने की जरूरत हो तो मातृभाषा में ही हम सहजता से बोल पाते हैं. जहां तक बात हिंदी की है तो इंग्लिश की तुलना में हिंदी इंसान को ज्यादा समृद्ध बना सकती है. हिंदी भारत में सब से ज्यादा बोली जाने वाली यानी राजभाषा है.

हमारे देश के 77% से ज्यादा लोग हिंदी लिखते, पढ़ते, बोलते और समझते हैं. हिंदी उन के कामकाज का भी हिस्सा है. इसलिए 14 सितंबर, 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा घोषित किया और तब से संपूर्ण भारत में प्रतिवर्ष 14 सितंबर को ‘हिंदी दिवस’ मनाया जाता है.

किसी भी राष्ट्र की पहचान उस की भाषा और संस्कृति से होती है. हमें दूसरों की भाषा सीखने का मौका मिले यह अच्छी बात है, लेकिन दूसरों की भाषा के चलते हमें अपनी मातृभाषा को छोड़ना पड़े तो यह शर्म की बात है. हमें अपनी भाषा का सम्मान करना चाहिए.

शायद ही दुनिया में ‘हिंदी दिवस’ की तरह किसी और भाषा के नाम पर दिवस का आयोजन होती है क्योंकि पूरी दुनिया के लोगों को अपनी भाषा पर गर्व है. गर्व की बात है कि वे लोग सिर्फ बोलते ही नहीं बल्कि उसे व्यवहार में अपनाते भी हैं. लेकिन हम लोग हिंदी दिवस पर हिंदी हमारी मातृभाषा है, हमें हिंदी पर गर्व है जैसे रटेरटाए वाक्य बोल कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं. असलियत में हिंदी में बातचीत करने वालों को आज भी हेय दृष्टि से देखा जाता है. यदि कोई व्यक्ति 2-4 वाक्य फर्राटेदार अंगरेजी में बोलता है तो सब उसे बहुत होशियार समझते हैं.

आधुनिकता का भूत

हमारे यहां जब बच्चे का जन्म होता है तो घर के लोगों से हिंदी सुन कर बच्चा भी हिंदी बोलने और समझने लगता है. मगर आज की तथाकथित मौडर्न फैमिलीज में बच्चे को तुतलाना भी इंग्लिश में ही सिखाया जाता है. हर वक्त घर में पेरैंट्स उस के पीछे इंग्लिश के शब्द ले कर भागते रहते हैं ताकि गलती से भी वह हिंदी न सीख जाए. ऐसा लगता है जैसे हिंदी बोलने पर उस का भविष्य ही चौपट हो जाएगा.

जैसे ही बच्चे को स्कूल भेजने की बात आती हैं तो हिंदी मीडियम स्कूलों के हालात का रोना रोते हुए पेरैंट्स जल्दी से बच्चे को अंगरेजी स्कूल में भेजने के लिए हाथपैर मारने लगते हैं. इंग्लिश मीडियम वाले स्कूलों के बाहर इतनी लंबी लाइन रहती है कि लोग नर्सरी में एडमिशन के लिए भी लाखों खर्च करने से नहीं घबराते हैं. इतने रुपयों के सहारे इंग्लिश मीडियम में डाल कर वे बहुत खुश होते हैं. उन्हें लगता है जैसे बहुत बड़ी जंग जीत ली हो.

यहीं से बच्चे की रहीसही हिंदी भी कमजोर होने लगती है. यही वजह है कि इंग्लिश मीडियम में पढ़ालिखा नौजवान सब्जी वाले से हिसाबकिताब करते वक्त उन्यासी और नवासी का फर्क तक नहीं समझ पाता. आम बोलचाल के हिंदी के छोटेछोटे शब्द उस की समझ से परे होते हैं. भले ही अंगरेजी की तुलना में हिंदी इंसान को ज्यादा समृद्ध बना सकती है लेकिन जौब मार्केट में अंग्रेजी का दबदबा कायम होने की वजह से सब इंग्लिश के पीछे भागते हैं और जो नहीं भाग पाए वे खुद को बेकार समझते हैं. मगर हकीकत में बहुत से हिंदी मीडियम वाले ज्ञान के मामले में इंग्लिश मीडियम वालों से बहुत आगे रहते हैं. हिंदी भाषा में हर तरह की पाठ्यसामग्री या दूसरे विषयों पर जानकारी उपलब्ध है. इसलिए हिंदी भाषी होने की वजह से घबराना बेमानी है. हिंदी भाषा उच्च कोटि की भाषा है. इसे गंवारों की भाषा समझना बहुत बड़ी भूल है.

हिंदी में पढ़ कर छू ली बुलंदी

पेटीएम आज पूरे देश का सब से लोकप्रिय डिजिटल पेमैंट ऐप्लिकेशन बन चुका है. पर आप को जान कर आश्चर्य होगा कि पेटीएम के फाउंडर विजय शेखर भारत के एक छोटे से शहर के बहुत ही साधारण परिवार से संबंधित हैं. उन्हें अंगरेजी का थोड़ा भी ज्ञान नहीं था परंतु इस के बावजूद इन्होंने पेटीएम जैसे ऐप्लिकेशन की खोज कर डाली.

इन्होंने एक साधारण हिंदी मीडियम स्कूल में दाखिला लिया था. पढ़ने में तेज होने के कारण अपनी 12वीं कक्षा की पढ़ाई को मात्र 14 साल की उम्र में ही पूरा कर लिया था. पढ़ाई में तेज होने के कारण इन्हें दिल्ली कालेज औफ इंजीनियरिंग में दाखिला तो मिल गया था पर हिंदी मीडियम से अंगरेजी वातावरण में जाने के कारण पढ़ाई में बहुत दिक्कत आई. मगर इन्होंने हार नहीं मानी और अंगरेजी सीखने का प्रयत्न करते रहे. ये एक ही किताब को अंगरेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में खरीद लेते और फिर पढ़ने का प्रयास करते.

विजय शेखर शर्मा समय के अनुसार काम करते थे. उन्हें कब क्या करना है वे बखूबी जानते हैं. इसलिए जब स्मार्टफोन का प्रयोग बढ़ा और हर युवक के पास स्मार्टफोन पाया जाने लगा तो इन्होंने कैशलैस की सोची अर्थात मोबाइल से ही पैसे ट्रांसफर करना. ये पेटीएम यानी पे थ्र्रू मोबाइल के कांसैप्ट पर काम करना चाहते थे. मगर किसी ने इन का साथ नहीं दिया क्योंकि ये एकदम नया व्यापार था और बहुत मुश्किल लग रहा था.

फिर इन्होंने अपनी इक्विटी में से 1% यानी 2 मिलियन डौलर बेच कर पेटीएम की स्थापना की और आज पेटीएम की लोकप्रियता का कोई ठिकाना नहीं है. 2017 में इकौनोमिक टाइम्स द्वारा शेखर शर्मा को इंडिया के हौटैस्ट बिजनैस लीडर अंडर 40 के रूप में चुना.

विजय शेखर जैसे लोगों की जिंदगी से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है. हमें यह समझ आता है कि हिंदी या इंग्लिश माने नहीं रखता बल्कि आप की लगन, अलग सोच और कुछ करने का जज्बा सफलता के लिए जरूरी है.

ट्रेंड में है पैच वर्क

इन दिनों पैच वर्क बहुत ट्रेन्डिंग है यूं तो पैच वर्क हमेशा से ही चलन में रहा है परन्तु आजकल बहुत अधिक फैशन में होने का कारण है कि अब इसे युवाओं द्वारा बहुत पसंद किया जाने लगा है. पहले जहां घरों में पैचवर्क से बेडशीट, सोफे के कवर और छोटे बच्चों की फ्रॉक पर पैच वर्क से डिजाइन बनाई जाती थी वहीं अब जीन्स, फुटवियर, हैंड बैग्स और डायनिंग टेबल रनर, मैट्स वाल फोटोफ्रेम आदि बनाकर घरों के इंटीरियर में भी पैचवर्क का प्रयोग किया जा रहा है. आइये जानते हैं क्या है पैचवर्क-

पैच अर्थात जोड़ना, अलग अलग रंग के कपड़े के वर्गाकार या आयताकार टुकड़ों को परस्पर जोड़ने को पैच कहा जाता है और जब अनेक टुकड़ों को जोड़कर कोई डिजाइन तैयार हो जाती है तो उसे पैच वर्क कहा जाता है. पैच वर्क तैयार करने के लिए आप दो तीन रंग के अथवा अनेकों रंग बिरंगे कपड़े ले सकतीं हैं.

कैसे घर पर तैयार करें पैच वर्क के डिजाइन्स

बाजार में पैच वर्क के कपड़े अथवा होम डेकोर की चीजें बहुत महंगे दामों पर मिलती हैं जिन्हें खरीदना हर किसी के वश की बात नहीं होती. परन्तु आप स्वयं थोड़ी सी मेहनत करके आसानी से पैच वर्क से कोई भी कपड़ा बना सकतीं हैं क्योंकि इसे बनाना बहुत आसान होता है. पैच वर्क तैयार करने के लिए आप रंग बिरंगे कपड़ों को आयताकार अथवा वर्गाकार टुकड़ों में काट लें अब इसके किनारों को आधा इंच अंदर की तरफ मोड़ते हुए प्रेस कर लें इससे आपको सिलाई करने में बहुत आसानी रहेगी. अब इन्हें एक दूसरे के ऊपर रखकर सिलाई करते जाएं. कुछ ही टुकड़ों के जुड़ने के बाद कपड़ा अपना स्वरूप लेने लगेगा. जब सारे टुकड़े आपस में जुड़ जाएं तो अंदर की तरफ से कैंची से अतिरिक्त धागे और कपड़े को काट दें. अंदर की तरफ मनचाहे रंग का अस्तर लगाकर किनारे पर पाइपिंग लगा दें.

ध्यान रखने योग्य बातें

-पैच वर्क के लिए कपड़े सदैव पक्के रंग के ही लें यदि सम्भव हो तो काम शुरू करने से पहले कपड़े को अच्छी तरह धोकर प्रेस कर लें अन्यथा धुलने पर एक कपड़े का भी कच्चा रंग आपकी सारी मेहनत पर पानी फेर देगा.

-कपड़ों को परस्पर जोड़ने के लिए भी किसी अच्छी कम्पनी के पक्के रंग के धागों का प्रयोग करें.

-आपको जितना बड़ा टुकड़ा तैयार होकर चाहिए उससे आधा इंच बड़ा टुकड़ा ही काटें ताकि सिलाई के बाद वह छोटा न हो जाये.

-यदि आप सोफे के कवर और डायनिंग टेबल का रनर बना रहे हैं तो हल्के रंग की अपेक्षा गहरे रंग के टुकड़ों का प्रयोग करें.

-डायनिंग टेबल के रनर और मैट्स को तैयार करने के बाद लेमिनेट करवा लें इससे वे सालों साल तक नए से बने रहेंगे.

-पैच वर्क के क्विल्ट बनाते समय अस्तर को लगाकर खोली सी तैयार करें और फिर इसमें रूई भरवाकर प्रयोग करें.

-यदि आप पैच वर्क से फूल पत्ती जैसा कोई डिजाइन बना रहीं हैं तो कटे टुकड़ों को पहले बेस कपड़े पर फेविकोल से  चिपका लें फिर सिलाई करें इससे सिलते समय कपड़ा खिसकेगा नहीं.

-बैग्स, फुटवेयर, फोटोफ्रेम आदि पर बिना अस्तर लगाए डिजाइन तैयार करके सीधे फेविकोल से चिपकाएं.

-घर के पुराने कपड़ों को भी आप पैचवर्क से डिजाइन बनाने के लिए प्रयोग कर सकतीं हैं इसके लिए कपड़े के घिसे और बेकार भाग को अलग करके मनचाहे आकार के टुकड़ों में काटकर प्रयोग करें.

-पुराने कपड़ों के साथ नए कपड़ों का प्रयोग भूलकर भी न करें.

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कैसी हो बच्चे की इम्यूनिटी वाली डाइट

अन्नपूर्णा और प्रीति दोनों ही अपने बच्चों को ले कर पार्क में घुमाने लाई थीं. अन्नपूर्णा का बेटा मयंक जहां बच्चों की हर ऐक्टिविटीज और गेम्स में भाग ले रहा था और जीत भी रहा था वहीं उस से 1 साल बड़ा प्रीति का बेटा किंचित थोड़ा सा खेल कर ही थक चुका था और एक कोने में बैठा एक पप्पी को तंग करने में मशगूल था.

प्रीति ने उदास स्वर में अन्नपूर्णा को अपना दुखड़ा सुनाते हुए कहा, ‘‘यार अन्नू तेरा बेटा तो बड़ा स्ट्रौंग है. उसे जब भी देखती हूं हमेशा ऐक्टिव दिखता है और हर चीज में अव्वल रहता है पर मेरा बेटा कहीं मन ही नहीं लगाता. बहुत जल्दी थक जाता है और उस की ग्रोथ भी ठीक से नहीं हो रही. मुझे लगता है किंचित उम्र में बड़ा है, मगर लंबाई में भी मयंक ने ही बाजी मारी है.’’

‘‘हां यार यह तो सच है कि मेरा बेटा हर जगह अव्वल आता है और इस की एक वजह यह है कि मैं ने शुरू से ही उस के खानपान पर पूरा ध्यान दिया है. मैं उसे हमेशा अच्छी डाइट देती हूं.’’

‘‘मगर मेरा बेटा तो खाने में इतने नखरे करता है कि क्या बताऊं. मुश्किल से कुछ गिनीचुनी चीजें खाता है. हां जंक फूड्स जितने भी दे दो उन्हें खुशीखुशी खाता है. तभी मैं उसे पिज्जा, बर्गर, फ्रैंच फ्राइज ही दे देती हूं खाने को. आखिर उस का पेट तो भरना है न इसलिए जो खाता है वही खिला देती हूं,’’ प्रीति ने परेशान स्वर में कहा.

‘‘मगर यह तो बिलकुल सही नहीं है प्रीति. इस तरह तो उसे सही पोषण ही नहीं मिलेगा. पोषण का ध्यान नहीं रखोगी तो आगे जा कर उस के शारीरिकमानसिक विकास में अवरोध आएगा. कम उम्र में ही बीमारियां घेरने लगेंगी. बच्चे जो खाना चाहते हैं वह दे देना सही नहीं. उन्हें वे चीजें ही खिलाओ जो उन के लिए जरूरी हैं,’’ अन्नपूर्णा ने समझया.

‘‘और जो वह न खाए तो?’’

‘‘तो देने का तरीका बदलो. मान लो उसे दाल खाना पसंद नहीं, मगर दालें प्रोटीन का अच्छा स्रोत होती हैं. ऐसे में आप चीला बना कर दाल खिला सकती हो. मसलन, कभी बेसन का तो कभी मूंग दाल का स्वादिष्ठ चीला खिलाइए. वह इनकार कर ही नहीं पाएगा. इसी तरह वह दूध नहीं पी रहा तो उसे पनीर की सब्जी खिलाइए या दूध में चौकलेट फ्लेवर का बौर्नविटा या हौर्लिक्स मिला कर दीजिए. अगर वह हरी सब्जी नहीं खा रहा तो उन्हें बनाने का अंदाज बदल कर देखिए या सब्जी भर कर परांठा बना लीजिए.’’

‘‘यार तूने तो मेरी आंखें खोल दीं. कितने अच्छे तरीके बताए हैं तूने. मैं कल से ही ट्राई करती हूं,’’ खुश हो कर प्रीति ने अन्नपूर्णा का शुक्रिया किया.

यह सच है कि बच्चे अकसर खाने में आनाकानी करते हैं, पर आप को उन्हें हैल्दी खाना खाने की आदत डालनी होगी. बच्चों की सेहत का बचपन से ही खयाल रखने की जरूरत होती है ताकि उम्र के साथ उन की सेहत और इम्यूनिटी मजबूत हो और उन के शरीर को तमाम इन्फैक्शन और बीमारियों से लड़ने की ताकत मिले. बढ़ती उम्र में बच्चों को सही और भरपूर पोषण की जरूरत होती है जिस में प्रोटीन, विटामिन जैसे कई तरह के पोषक तत्त्व शामिल हैं.

अगर बच्चों की डाइट में इन का अभाव हो जाए तो उन्हें कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं घेर सकती हैं. पहले यह जानना होगा कि आप के बढ़ते बच्चे की डाइट में कौन से पोषक तत्त्व शामिल करने जरूरी हैं और इस के लिए कौन से चीजें खिलानी जरूरी हैं.

बढ़ते बच्चों के लिए जरूरी पोषक तत्त्व

प्रोटीन: अच्छे विकास और ताकत के लिए प्रोटीन बच्चों की डाइट में ज़रूर होना चाहिए. यह एक ऐसा तत्त्व है जिस की जरूरत सिर्फ बड़ों को ही नहीं बल्कि बच्चों को भी होती है. यह तत्त्व शरीर के सैल्स के निर्माण, भोजन को ऐनर्जी में बदलने, इन्फैक्शन से लड़ने और शरीर में औक्सीजन के लैवल को बनाए रखने में मदद करता है. प्रोटीन की पूर्ति के लिए सोयाबीन, दालें, अंडा, चिकन और डेयरी प्रोडक्ट्स का सेवन कराएं.

कैल्सियम: बच्चों के शरीर को कैल्सियम की बहुत आवश्यकता होती है क्योंकि उन की हड्डियां, दांत कैल्सियम से ही मजबूत होते हैं. 35 साल की उम्र तक पीक बोन मास बनता है, इसलिए मजबूत हड्डियों के निर्माण के लिए भी सही मात्रा में कैल्सियम का सेवन करना बहुत जरूरी है. आप उन्हें दूध, दही, पनीर सहित अन्य डेयरी प्रोडक्ट्स दें जिन में पर्याप्त मात्रा में कैल्सियम मौजूद होता है. उन्हें सुबह की धूप लेने की आदत भी डालनी चाहिए ताकि विटामिन डी शरीर को मिले.

फाइबर: फाइबर के सेवन से पाचनतंत्र स्वस्थ रहता है, पोषक तत्त्वों का अवशोषण ठीक से होता है. हर बच्चे के आहार में फाइबर को जरूर शामिल करना चाहिए. इसके लिए आप ब्रोकली, सेब, नट्स, ऐवोकाडो, नाशपाती आदि दे सकती हैं.

आयरन: इस के सेवन से बच्चे का विकास ठीक तरह से होता है क्योंकि आयरन रैड ब्लड सैल्स के निर्माण के लिए बहुत जरूरी है जो पूरे शरीर में औक्सीजन पहुंचाती हैं. खून की कमी से कई तरह के रोग पैदा होते हैं. इस के विपरीत जब शरीर में आयरन की पर्याप्त मात्रा होती है तो इस से खून तो तेजी से बनता ही है साथ ही ध्यान और एकाग्रता में भी सुधार आता है.

यही वजह है कि बढ़ते बच्चों के लिए आयरन बहुत जरूरी होता है. इस के लिए हरी पत्तेदार सब्जियां, मछली, अंडा, मांस, चुकंदर, साबुत अनाज, बींस, नट्स, ड्राई फू्रट आदि देने चाहिए.

विटामिन सी: विटामिन सी सर्दीजुकाम से लड़ने के साथसाथ और भी कई तरह से फायदेमंद होता है. यह रक्तवाहिकाओं की दीवारों को मजबूत करता है, घाव को सही करने के साथ ही दांतों और हड्डियों को भी मजबूती देता है. जब बच्चा बढ़ता है तो उस के शरीर को विटामिन सी की सख्त जरूरत होती है. इस तत्त्व की पूर्ति के लिए बच्चों को खट्टे फल, टमाटर, स्ट्राबेरी, आम, नाशपाती, ब्रोकली, पालक जैसी चीजें खिलाएं.

फौलेट: शायद बहुत कम लोगों को पता हो लेकिन फौलेट भी बढ़ते बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है. यह बच्चों के शरीर के सैल्स को मजबूत और हैल्दी रखता है. इस विटामिन की कमी से बच्चों को एनीमिया रोग यानी शरीर में खून की कमी हो सकती है. बच्चों की बौडी में फौलेट की मात्रा बनी रहे इसलिए उन्हें मिक्स अनाज का दलिया, पालक, चने, मसूर की दाल और स्प्राउट्स जैसी चीजें दें.

कार्बोहाइड्रेट: यह भी बच्चों के बेहतर विकास के लिए एक जरूरी तत्त्व है. यह ऊतक के निर्माण और मरम्मत करने में महत्त्वपूर्ण है. कार्बोहाइड्रेट कई अलगअलग रूपों (शर्करा, स्टार्च, फाइबर) में आते हैं. लेकिन बच्चों को स्टार्च और फाइबर अधिक और चीनी कम देनी चाहिए. ब्रैड, आलू, पास्ता, चावल और अनाज आदि में प्रचुर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट होता है.

बढ़ते बच्चों की डाइट में जरूर होनी चाहिए ये पौष्टिक चीजें:

दूध: दूध बढ़ती उम्र के बच्चों के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि इस में कैल्सियम की पर्याप्त मात्रा होती है जिस से हड्डियां मजबूत बनती है. साथ ही दूध में विटामिन ए,बी2 और बी12 भी होते हैं जो शारीरिक विकास के लिए जरूरी हैं.

ब्रोकली: ब्रोकली में भरपूर मात्रा में कैल्सियम पाया जाता है. इस से बच्चों की हड्डियां मजबूत होती हैं. आप अपने बच्चे को इस का सूप दे सकती हैं या फिर दूसरी सब्जियों के साथ मिला कर इसकी सब्जी तैयार कर सकती हैं.

बादाम: हर सुबह मुट्ठी भर बादाम बच्चों की याददाश्त, नजर और यहां तक कि मानसिक विकास में मदद कर सकते हैं. बादामों में कई प्रकार के खनिज, विटामिन और स्वस्थ वसा पाई जाती है जो शरीर के लिए भी काफी फायदेमंद मानी जाती है.

अध्ययनों के अनुसार बादाम, हड्डियों के बेहतर स्वास्थ्य को बनाए रखने में भी सहायक हैं. इन में मौजूद विटामिन ई बच्चों की लंबाई बढ़ाने में सहायक माना जाता है.

डेयरी उत्पाद: प्रोटीन के अलावा, हड्डियों की बेहतर संरचना और मजबूती के लिए कैल्सियम की आवश्यकता होती है. डेयरी उत्पाद जैसे दही, पनीर, दूध और मक्खन में भरपूर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है. दूध स्वस्थ वसा, फास्फोरस और मैग्नीशियम प्रदान करता है जो बच्चे की लंबाई को बढ़ाने में मदद करता है. 1 गिलास दूध में करीब 8 ग्राम तक प्रोटीन होता है जो मांसपेशियों के निर्माण में भी सहायक होता है.

अंडे: वसा और प्रोटीन का समृद्ध स्रोत अंडे सेहत के लिए काफी फायदेमंद होते हैं. 1 बड़े अंडे में करीब 6 ग्राम प्रोटीन होता है. इस में मौजूद अमीनो ऐसिड हड्डियों के निर्माण को बढ़ावा देता है और उन्हें मजबूत बनाता है. इस के अतिरिक्त अंडों से विटामिन डी भी प्राप्त किया जा सकता है जो हड्डियों को कैल्सियम ठीक से अवशोषित करने में मदद करता है. अंडों में कोलीन नामक पोषक तत्त्व भी भरपूर मात्रा में होता है जो मस्तिष्क के विकास के लिए जरूरी होता है. अंडों को बौयल, फ्राई या किसी भी अन्य रूप में बच्चे को दें.

बैरीज: ब्लूबेरी और स्ट्राबेरी में पोटैशियम, विटामिन सी, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर और ऐंटीऔक्सीडैंट होता है. इस में फैट और कोलैस्ट्रौल नहीं होता. इन का स्वाद मीठा होता है इसलिए बच्चे इन्हें पसंद करते हैं. इन्हें आप ओटमील, दही, दलिया आदि में मिक्स कर सकती हैं.

शकरकंद: यह आंखों के लिए बहुत ही फायदेमंद है. इस में विटामिन ए, सी, ई, कैल्सियम, पोटैशियम और आयरन होता है.

बेटा- भाग 1: क्या वक्त रहते समझ पाया सोम

‘‘सिया, सिया, जल्दी आओ. देखो, तुम्हारे पापा कुछ बोल ही नहीं रहे हैं. जाने क्या हो गया.’’

सिया और समीर दोनों अपने कमरे से भागते हुए आए.

सिया ने ‘पापा, पापा’ पुकार कर उन का हाथ उठाया. उसे उन का हाथ बेजान लगा.

समीर ने डाक्टर को फोन किया.

सुजाता फूटफूट कर रोने लगी.

‘‘मम्मी, पापा को कुछ नहीं हुआ. आप रोइए मत, प्लीज, वरना मुझे भी रोना आने लगेगा.’’

डा. अनुराग समीर के मित्र थे, इसलिए तुरंत आ गए थे. उन्होंने आंख की पुतली देखी और ‘ही इज नो मोर’ कह कर कमरे से बाहर चले गए.

सिया मां से चिपट कर सिसकने लगी. जब कुछ देर वह रो चुकी तो समीर बोले, ‘‘सिया, अपने को संभालो.’’

समीर भी घबराए हुए थे. दीप की हरकतों से परेशान हो कर सिया मम्मीपापा को अपने साथ ले आई थी. अभी महीना भी पूरा नहीं हुआ था कि पापा सब लोगों को छोड़ कर चले गए.

‘‘मम्मी, पापा शाम को तो एकदम ठीक थे. क्या आप से कुछ कहासुनी हुई थी?’’

‘‘नहीं, बेटी.’’

मम्मी को असमंजस में देख उस का शक पक्का हो गया था कि वे उस से कुछ छिपा रही हैं.

‘‘सच बताओ, मम्मी, रात में क्या हुआ था?’’

वे सिसकते हुए बोलीं, ‘‘दीप का फोन आया था. उस ने पापा के जाली दस्तखत बना कर मकान का सौदा तय कर लिया है और बयाना भी ले लिया है. इसी बात पर पापा नाराज हो उठे थे. जौइंट अकाउंट होने के कारण वह बैंक से रुपए पहले ही निकाल चुका था. 2 दिन पहले श्याम चाचा का भी फोन आया था. घर पर किसी लड़की को ले कर आया था उस के कारण उन से भी उस ने खूब गालीगलौज और हाथापाई की.

‘‘इसी बात को ले कर बापबेटे के बीच जोरजोर से बहस होती रही थी. मैं ने इन्हें सम झाने का प्रयास किया तो मु झे डांट दिया. फिर आधी रात में उठ कर कोई दवा खा कर बोले, ‘ऐसी औलाद से बिना औलाद होते तो ज्यादा सुखी होते.’’’

‘‘मम्मी, इतनी बात हो गई और आप ने मु झे कुछ भी नहीं बताया.’’

‘‘बेटा, तुम लोग रात में देर से थकेमांदे आए थे. यह सब तो मैं, जब से दीप जवान हुआ है तब से देखसुन रही हूं. मु झे क्या मालूम कि यह बात आज इन के दिल में ऐसी चुभ जाएगी.’’

समीर मम्मी और सिया से बोले, ‘‘बताओ, कहांकहां फोन करना है. मैं ने दिया और श्याम चाचा को फोन कर दिया है. कह दिया है आप जिन्हें ठीक सम िझए उन्हें सूचना दे दीजिए. आप के आने के बाद ही कुछ होगा.’’

समीर के मित्र और पड़ोसी एकत्र हो गए थे. उन सब की सहायता से शव को बरामदे में रख कर सब वहीं खड़े हो गए.

समीर ने बताया कि श्याम चाचा, दिया और सुचित्रा बूआ के आने में लगभग 5 घंटे लग जाएंगे, इसलिए उन लोगों के आने के बाद ही कुछ होगा. यह सुनते ही सब लोग तितरबितर हो गए.

वहां पर सिया, समीर और सुजाता ही रह गए. सुजाता की आंखों के सामने दीप के बचपन की बातें चलचित्र की तरह चलने लगीं.

सिया और दिया के बाद दीप के पैदा होने पर घर में खुशियां छा गई थीं. अम्मा, सोम और श्याम भैया को बेटे की खबर सुनते ही मानो कारूं का खजाना मिल गया था. परिवार में पहला बेटा था, इसलिए अतिरिक्त लाड़प्यार का हकदार था. सीमित आमदनी होने के कारण बेटियों की जरूरतों पर कटौती शुरू हो गई. ढाईतीन साल का दीप अपने मन का न होने पर तब तक रोता जब तक उस की जिद पूरी न हो जाती.

सोम ने दोनों बेटियों को तो सरकारी हिंदी स्कूलों में पढ़ाया था. चूंकि कौन्वैंट स्कूल महंगे होते थे इसलिए उन का बहाना होता था कि वहां पढ़ कर बच्चे बिगड़ जाते हैं. सिया, दिया दोनों मेहनती थीं. हमेशा अपनी कक्षा में प्रथम आतीं. इसलिए दोनों पढ़लिख कर डिगरी कालेज में लैक्चरर बन गईं.

परंतु जब दीप के ऐडमिशन का समय आया तो सोम ने उस का नाम कौन्वैंट स्कूल में 10 हजार रुपए डोनेशन दे कर लिखवाया था. सिया उस से 8 साल बड़ी थी, इसलिए उस से थोड़ा दबता था लेकिन दिया से तो उस की एक पल भी नहीं बनती थी.

दिया और दीप की आपसी मारपीट से परेशान हो कर मैं अकसर रो पड़ती थी. दोनों की गुत्थमगुत्था से खीज कर अकसर कहती, ‘ऐसा लगता है कि घर छोड़ कर कहीं चली जाऊं. लेकिन मेरा तो ठिकाना भी कहीं नहीं है.’

एक बार दोनों एक पैंसिल के लिए लड़ रहे थे. दीप ने दिया को गंदी सी गाली दी. सुनते ही मैं ने उसे एक जोरदार थप्पड़ लगा दिया था तो वह मुझ से ही चिपट गया और मेरी बांह में दांत गड़ा दिए थे. आज भी उस जख्म का निशान मेरी बांह पर बना हुआ है. जैसे ही दर्द से बिलबिला कर मैं ने उसे हलका सा धक्का दिया, वह जानबू झ कर मुंह के बल गिर पड़ा. होंठ में दांत चुभ जाने के कारण उस के खून छलक आया था. वह मुंह फाड़ कर जोरजोर से चिल्लाने लगा. अम्माजी खून देखते ही मुझ पर गरम हो उठी थीं.

‘मां हो कि दुश्मन, ऐसे धक्का दिया जाता है,’ वे दीप के आंसू पोंछ कर बोलीं, ‘मेरा राजकुमार है. अभी तुम्हारे लिए पैंसिल का पूरा डब्बा मंगवा कर दूंगी. तुम इस कलूटी को एक भी मत देना.’

अम्माजी दिया को लाड़ से कलूटी ही कहती थीं.

फिर दीप के कान में फुसफुसा कर बोलीं, ‘मेरे साथ आओ, मैं ने तुम्हारे लिए लड्डू छिपा कर रख रखे हैं,’ रोना तो महज उस का नाटक था.

मैं आंखों में आंसू भर कर रह गई थी. दीप ने एक लड्डू मुंह में रखा, दूसरा हाथ में और घर से फुर्र हो गया.

सोम बहुत गरममिजाज और कायदेकानून वाले थे. लेकिन बेटे की मोहममता में सारे कायदेकानून भूल जाते थे.

मैं सुबह से रात तक घर का काम करतीकरती थक जाती. मुंह अंधेरे ही उठ कर तीनों बच्चों का टिफिन पैक कर देती. खाना, कपड़ा, बरतन करतेकरते थक कर निढाल हो जाती थी.

तीनों बच्चों का दूध बना कर मेज पर रख देती थी. दीप चीखता हुआ कहता, ‘मु झे नहीं पीना सादा दूध, बौर्नविटा डालो तभी पीऊंगा.’

‘बौर्नविटा खत्म हो गया है, इसलिए चुपचाप दूध पियो, टिफिन बैग में रखो और स्कूल जाओ. वैन वाला कब से हौर्न बजा रहा है.’

मैं ने गिलास उठा कर दीप के मुंह में लगाने का प्रयास किया. आधा गिलास दूध देखते ही उस ने मेरे हाथ को  झटक दिया. हाथ से गिलास छूट कर दूध जमीन पर फैल गया. मैं चिल्ला कर बोली, ‘बहुत बदतमीज हो गया है. सिया, दिया को जितना देती हूं, चुपचाप पी कर चली जाती हैं. ये नालायक हर समय कोई न कोई बखेड़ा खड़ा कर देता है.’

सोम कमरे से भागते हुए आए, डांटते हुए बोले, ‘तुम्हारा कोई भी काम ढंग से नहीं होता. जब तुम्हें पता है कि वह गिलास भर कर दूध पीता है तो तुम ने उसे चिढ़ाने के लिए जानबू झ कर आधा गिलास दूध क्यों दिया?’

‘मेरे लिए तो तीनों बच्चे बराबर हैं. मैं तो तीनों को एक सा खिलाऊंगी, पहनाऊंगी. मेरे लिए बेटाबेटी दोनों एक समान हैं,’ मैं ने जवाब दिया.

‘ज्यादा जबान मत चलाओ. सिया, दिया एक दिन दूध नहीं पिएंगी तो मर थोड़े ही जाएंगी,’ अम्माजी ने सोम के सुर में सुर मिलाया.

सिया दीप को बुलाने के लिए बाहर से आई थी. दादी और पापा की सारी बातें उस ने सुन ली थीं. 14 वर्ष की सिया सम झदार हो चुकी थी. उस दिन के बाद से उस ने दूध को हाथ भी नहीं लगाया. दिया दीप को जिद करते देख खुद भी वैसा ही करने लग जाती थी.

37 की उम्र में दुल्हन बनेंगी Payal Rohatgi, लगाई संग्राम के नाम की मेहंदी

बौलीवुड और टीवी एक्ट्रेस पायल रोहतगी (Payal Rohatgi) अपने लौंग टाइम बौय्रफ्रेंड रेसलर संग्राम सिंह के साथ 9 जुलाई को शादी करने वाली हैं, जिसके चलते दोनों की मेहंदी सेरेमनी की फोटोज वायरल हो रही हैं. वहीं एक्ट्रेस अपनी मेहंदी में पति का नाम फ्लौंट करती दिख रही हैं. आइए आपको दिखाते हैं पायल रोहातगी के मेहंदी सेरेमनी की झलक…

मेंहदी सेरेमनी में दिखा सिंपल अंदाज

 

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परिवार और खास दोस्तों की मौजूदगी में पायल रोहतगी और संग्राम सिंह आगरा में सात फेरे लेने वाले हैं. वहीं शादी से पहले एक्ट्रेस की मेहंदी की फोटोज फैंस का दिल जीत रही हैं. पिंक सूट पहने एक्ट्रेस का सिंपल अंदाज फैंस को काफी पसंद आ रहा है. वहीं सोशलमीडिया पर फैंस उनकी फोटोज पर एक्ट्रेस के लुक की जमकर तारीफें करते दिख रहे हैं.

एक्ट्रेस ने मेहंदी की फ्लौंट

मेहंदी सेरेमनी में बौलीवुड की मशहूर मेहंदी डिजाइनर से मेहंदी लगवाने के बाद एक्ट्रेस अपनी मेंहदी फ्लौंट करती हुई नजर आईं. वहीं अपने पति का नाम भी दिखाती दिखीं. एक्ट्रेस के इस खास पल में उनके माता पिता ने उनका साथ दिया. वहीं फैंस कमेंट में उनकी मेहंदी को खूबसूरत बताते दिख रहे हैं.

शादी का है इंतजार

 

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मेहंदी सेरेमनी की फोटोज आने के बाद फैंस एक्ट्रेस पायल रोहतगी की वेडिंग फोटोज का इंतजार कर रहे हैं. हालांकि बीते दिनों एक्ट्रेस ने अपने प्री वेडिंग फोटोशूट की झलक फैंस को दिखाई थी, जिसे फैंस ने काफी पसंद किया था.

बता दें, बौलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत के शो लॉकअप में एक्ट्रेस पायल रोहातगी ने खुलासा किया था कि वह कभी मां नहीं बन सकती, जिसके कारण वह अपनी शादी का फैसला टाल रही हैं. हालांकि शो से निकलने के बाद एक्ट्रेस ने शादी करने का फैसला किया था, जिसे सुनकर उनके फैंस काफी खुश हुए थे.

मालिनी के आते ही इस विलेन की हुई शो से छुट्टी! Imlie में आएगा नया ट्विस्ट

सीरियल ‘इमली’ की गिरती टीआरपी के बीच मेकर्स ने मालिनी और उसकी मां अनु की शो में दोबारा एंट्री करवाने का फैसला लिया है, जिसका प्रोमो इन दिनों सोशलमीडिया पर धूम मचा रहा है. वहीं इमली (Sumbul Touqeer Khan) और आर्यन (Fahmaan Khan) के रिश्ते में दरार डालने के लिए मालिनी यानी एक्ट्रेस मयूरी देशमुख की एंट्री के बीच सीरियल की एक एक्ट्रेस ने शो को अलविदा कह दिया है. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर….

इस विलेन की हुई छुट्टी

 

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सीरियल की कहानी में हाल ही के ट्रैक में ज्योति के प्लान का पर्दाफाश होते हुए नजर आया था, जिसके बाद आर्यन को अपनी गलती का एहसास होते हुए दिखा था. वहीं अब खबरे हैं कि सच सामने आने के बाद ज्योति का ट्रैक खत्म करने का फैसला लिया है. दरअसल, कहा जा रहा है कि ज्योति के रोल में नजर आने वालीं एक्ट्रेस वैभवी कपूर जल्द ही ‘इमली’ को अलविदा कह दिया है. हालांकि अभी इस खबर पर मेकर्स का कहना है कि उनके किरदार की दोबारा वापसी हो सकती है. लेकिन आर्यन और इमली के फैंस इससे बेहद खुश होंगे.

 

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मालिनी की हुई एंट्री

हाल ही में प्रोमो में दिखाया गया था कि मालिनी की शो में वापसी होगी. वहीं इसके अलावा शो में मालिनी की मां अनु यानी एक्ट्रेस ज्योति गाबा की भी वापसी होती हुई नजर आएगी. वहीं अपकमिंग ट्रैक की बात करें तो जहां इमली और आर्यन को एक बच्चा मिलेगा तो वहीं इमली का बच्चा किडनैप हो जाएगा, जिसके बाद दोनों टूट जाएंगे.

 

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बता दें, सीरियल में मालिनी यानी एक्ट्रेस मयूरी देशमुख की एंट्री से बेहद खुश हैं. वहीं कहा जा रहा है कि मालिनी के ट्रैक से शो की टीआरपी पर भी असर पड़ेगा. हालांकि बीते दिनों शो टौप 5 से बाहर हो गया था, जिसके चलते मेकर्स ने कहानी में कई नए बदलाव किए हैं.

सैलिब्रेशन- भाग 1: क्या सही था रसिका का प्यार

कुहराभरीशाम के 6 बजे ही अंधेरा गहरा गया था. रसिका औफिस से थकी हुई घर में घुसी ही थी कि उस की छोटीछोटी दोनों बेटियां भागती हुई मम्मा… मम्मा कहती उस से लिपट गईं. छोटी काव्या सुबक रही थी.

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘मम्मा, यहां सब लोग मुझे बेचारी कहते हैं. आज नानी के पास एक आंटी आई थीं. वे मुझे प्यार करती जा रही थीं और रोरो कर कह रही थीं कि हायहाय बिन बाप की बेटियों का कौन अपने लड़के से ब्याह करेगा.

‘‘मम्मा, मेरे पापा तो हैं. वे ऐसे क्यों कह रही थीं?’’

8 साल की नन्ही काव्या के प्रश्न पर रसिका समझ नहीं पा रही थी कि इस मासूम को कैसे समझाए. फिर उसे प्यार से गले से लगाते हुए बोली, ‘‘इन बातों को मत सुना करो. तुम तो मेरी राजकुमारी हो,’’ और फिर पर्स से चौकलेट निकाल कर उस की हथेली पर रख दी. वह खुश हो कर उछलती हुई चली गईर्.

मान्या 10 साल की थी. वह कुछकुछ समझने लगी थी कि अब पापा से उन का रिश्ता खत्म हो गया है, इसलिए घर या बाहर कोई भी बेचारी या उस की मम्मा के लिए बुरा बोलता तो वह उस से लड़ने को तैयार हो जाती थी.

इस कारण सब उस की शिकायत करते, ‘‘रसिका, अपनी बेटी को कुछ अदबकायदा सिखाओ. सब से लड़ने पर आमादा हो जाती है.’’

रसिका अकसर मान्या को समझाती, ‘‘बेटी, इन लोगों से बेकार में क्यों बहस करती हो… तुम वहां से हट जाया करो.’’

मगर उस का रोज किसी न किसी से पंगा हो ही जाता. कभी घर में तो कभी स्कूल में.

रसिका जानती थी कि दोपहर में मां के पास महिलाओं का जमघट लगता है और वे दोनों बच्चियों को सुनासुना कर बातें करतीं, ‘‘हाय, बुढ़ापे में गायत्री बहनजी की मुसीबत आ गई है. रसिका तो सजधज कर औफिस चली जाती और इन बिटियों के लिए खाना बनाओ, टिफिन तैयार करो, कितना काम बढ़ गया है बहनजी के लिए.’’

‘‘चुप रहो मीरा. मान्या सुन लेगी तो आ कर लड़ने लगेगी,’’ गायत्रीजी ने कहा तो सब चुप हो गईं.

मीराजी को अपनी हेठी लगी तो वे उठ खड़ी हुईं. बोलीं, ‘‘गायत्री बहन,

?जरा सी लड़की से आप डरती क्यों हैं? हमारी नातिन ऐसा बोले तो मैं तो 2 थप्पड़ रसीद कर दूं.’’

फिर मान्या के घर में घुसते ही सब अपनेअपने घर चली गईं.

नानी के कराहने की आवाज सुन कर मान्या उन के पास आई, ‘‘नानी, आप रहते दो.मैं माइक्रोवेव में खाना गरम कर लूंगी. आप आराम करो.’’

‘‘रहने दे छोरी, अपनी अम्मां से कह देगी कि नानी ने खाना भी नहीं दिया.’’

मान्या का मूड खराब हो गया, लेकिन मम्मी की बात याद कर के चुपचाप खाने बैठ गई.

संडे का दिन था. रसिका अपने कपड़े धो रही थी. तभी रोती हुई काव्या घर में घुसी.

‘‘क्या हुआ? क्यों रो रही हो?’’

‘‘मम्मा, रिचा आंटी कह रही थीं कि तुम मेरे घर खेलने मत आया करो. तुम्हारी मम्मी तलाकशुदा हैं. तुम्हारे पापा से लड़ाई कर के आ गई हैं.’’

रसिका परेशान थी. सुबह मां से बहस हो चुकी थी. अत: गुस्से में बेटी को गाल पर थप्पड़ लगा चीख कर बोली, ‘‘क्यों जाती हो उन केघर खेलने?’’

‘‘मम्मा तलाकशुदा क्या होता है?’’

बेटी के मासूम प्रश्न पर रसिका की आंखें छलछला उठीं. आंसू नहीं रोक पाई. अपने कमरे में जा कर चुपचाप आंसू बहाती रही. मां की निगाहें भी अब बदल गई थीं. उन को भी शायद अब रसिका का यहां रहना अच्छा नहीं लग रहा था. हर समय मुंह फुलाए रहती हैं. बच्चों से भी ढंग से बात नहीं करतीं.

रसिका के किचन में घुसते ही कहने लगती हैं, ‘‘मैं कर तो रही हूं. यह यहां क्यों रख दिया?’’

यदि रसिका कुछ बना देती तो खुद उसे छूती भी नहीं. उस में मीनमेख निकालतीं. रसिका को उलटासीधा बोलतीं. बच्चों को डांटतीं.

मान्या स्कूल से कोई फार्म लाईर् थी भरने के लिए. उस में पापा का नाम सुरेश चंद्र लिखवाते हुए रसिका को हलक में कुछ अटकता महसूस हुआ. पति का नाम लेते ही उस की आंखें क्रोध से लाल हो उठीं.

पति के अत्याचारों की याद आते ही मुंह कसैला हो उठा. सुरेश के साथ रसिका ने अपने जीवन के कीमती पल बिताए थे. वह उसे प्यार तो करता था, परंतु गुस्सैल स्वभाव का होने के कारण किस पल नाराज हो कर गालीगलौज और मारपीट पर उतर आए, पता नहीं. इसलिए रसिका हर समय डरीसहमी सी रहती थी.

जब काव्या की डिलिवरी के वक्त रसिका मायके में थी तो अकेलेपन में सुरेश इमली के गदराए बदन पर आसक्त हो गया और उस ने उस के दिल में जगह बना ली. उसी की संगत में उसे पीने का शौक लग गया. बस वह इंसान से जानवर बन बैठा.

जब एक दिन अबोध काव्या को ज्यादा रोने पर उसे उठा कर जमीन पर पटकने को तैयार हो गया, तब रसिका दुर्गा बन कर उस से बेटी को छुड़ा पाईर् थी. उसी क्षण उस ने उस नर्क से निकल भागने का निश्चय कर लिया.

अगले दिन जब सुरेश का नशा उतर गया तो उस के रोने, माफी मांगने का रसिका पर कोई असर नहीं हुआ. फिर 2-4 दिन के अंदर ही मौका देख कर वह वहां से निकल ली.

रसिका ने केवल पति के खूनी पंजों से मुक्ति चाही थी. पैसे की कोई चाहत नहीं की थी. इसलिए आपसी सहमति से जल्दी तलाक हो गया था. उस के शरीर के जख्मों को देख कर ससुराल वालों के पास भी कहने को कुछ नहीं था एवं अपने बेटे के गुस्से के कारण वे लोग स्वयं ही परेशान थे.

रसिका अपनी मां के पास रहने लगी थी. उन्होंने भी दिल खोल कर उस का साथ दिया था.

पिता की प्रतिष्ठा के कारण उसे औफिस में परीक्षा देने का अवसर मिल गया और पास हो जाने पर नौकरी भी मिल गई.

जीवननैया सुचारु रूप से चल पड़ी थी. वे बेटियों को मां को सौंप कर निश्चिंत हो गई थी. मां को पैसे दे कर या घर का सामान ला कर अपना काम पूरा हो गया समझती थी.

रसिका को न ही बच्चों के टिफिन की कभी फिकर हुई न ही अपने टिफिन की. उसे भी मां के हाथों का खाना और नाश्ता मिलता रहा. व्यवस्था चल निकली थी.

रसिका औफिस में अपनी खुशियां तलाश कर ठहाके लगाती. वैभव उस का बौस था. दोनों के बीच दोस्ती धीरेधीरे प्यार में बदल गई. वह औफिस से अकसर ओवरटाइम कह कर देर से आने लगी थी. छुट्टी वाले दिन भी वैभव के पास किसी न किसी बहाने पहुंच जाती.

समस्या तब खड़ी हो गई जब उस के और वैभव के अफेयर के चर्चे मां के कानों तक पहुंचे. फिर तो उन की निगाहें और बोलचाल सब बदल गया.

मान्या 24 साल की हो गई थी और काव्या 22 की. रसिका औफिस से वैभव की बाइक पर लौट रही थी. गली के नुक्कड़ पर मां और मान्या दोनों ने वैभव को रसिका को किस करते हुए देख लिया. फिर तो घर में हंगामा होना स्वाभाविक था. मां को अपनी बेइज्जती बरदाश्त नहीं हुई. कहासुनी में बात इतनी बढ़ गई कि अगले 2 दिनों के अंदर ही वैभव ने उन के लिए 2 कमरों का फ्लैट ढूंढ़ लिया.

पराया कांच

‘‘कल देर से आऊंगा, विभा. 3 साल पहले चंडीगढ़ से अवस्थीजी आए थे, वे वापस जा रहे हैं ब्रांच मैनेजर बन कर. उन का विदाई समारोह है,’’ विपिन ने सोने से पहले बताया.

‘‘यह तो बड़ी खुशी की बात है. बहुत खुश होंगे अवस्थीजी.’’

‘‘हां, खुश भी और परेशान भी.’’ विभा ने भवें चढ़ाईं, ‘‘परेशान क्यों?’’

‘‘क्योंकि उन की बिटिया नन्ही का यह एमबीए का अंतिम वर्ष है. कैंपस सिलैक्शन में उस का चयन भी यहीं विजन इंफोटैक में हो चुका है. ऐसे में न तो नन्ही की पढ़ाई छुड़ा सकते हैं और न ही उसे यहां अकेले छोड़ कर जा सकते हैं. बीच सत्र के कारण न तो होस्टल में जगह मिल रही है और न ही पेइंग गैस्ट रखने वालों के यहां.’’

‘‘यह तो वाकई परेशानी की बात है. पत्नी को भी तो यहां छोड़ कर नहीं जा सकते क्योंकि अवस्थीजी का परहेजी खाना तो वही बना सकती हैं, दांतों की तकलीफ की वजह से कुछ ज्यादा खा ही नहीं सकते. यहां किसी से ज्यादा मिलनाजुलना भी तो नहीं बढ़ाया उन लोगों ने…’’

‘‘सिवा कभीकभार हमारे यहां आने के,’’ विपिन ने बात काटी, ‘‘हम क्यों न उन की मदद कर दें विभा, नन्ही को अपने पास रख कर? चंद महीनों की तो बात है, नौकरी मिलने पर तो वह कंपनी के ट्रेनीज होस्टल में रहने चली जाएगी. बच्चे तो यहां हैं नहीं, सो दोनों के कमरे भी खाली हैं, घर में रौनक भी हो जाएगी.’’

‘‘वह सब तो ठीक है लेकिन जवान लड़की की हिफाजत कांच की तरह करनी होती है. जरा सी लापरवाही से पराया कांच तड़क गया तो खरोंचें तो हमें ही लगेंगी न? न बाबा न, मैं बेकार में लहूलुहान नहीं होने वाली,’’ विभा ने सपाट स्वर में कहा. विपिन चुप हो गया लेकिन विभा सोचने लगी कि बात तो विपिन ने सही कही थी. निखिल रहता तो उन के साथ ही था मगर फिलहाल किसी ट्रेनिंग पर सालभर के लिए विदेश गया हुआ था. नेहा को ग्रेजुएशन के बाद वह मामामामी के पास दिल्ली घुमाने ले गई थी लेकिन नेहा को दिल्ली इतनी पसंद आई कि उस ने वहीं मार्केटिंग का कोर्स जौइन कर लिया फिर वहीं नौकरी भी करने लगी. पहले तो मामामामी ने उस की बहुत तरफदारी की थी लेकिन कुछ महीने पहले लगा कि वे लोग नेहा के वहां रहने से खुश नहीं हैं, फिर अचानक सब ठीक हो गया और फिलहाल तो नेहा के वापस आने के आसार नहीं थे. ऐसे में नन्ही के आने से सूने घर में रौनक तो जरूर हो जाएगी लेकिन बेकार में जिम्मेदारी की टैंशन बढ़ेगी.

‘‘तुम एक रोज नन्ही की तारीफ कर रही थीं न विभा कि वह सिवा अपनी पढ़ाई के कुछ और सोचती ही नहीं है तो फिर ऐसी बच्ची को कुछ अरसे के लिए अपने यहां आश्रय देने में तुम हिचक क्यों रही हो? उसे इंस्टिट्यूट ले जाने और वहां से लाने का इंतजाम अवस्थी कर देगा, तुम्हें बस उस के रहनेखाने का खयाल रखना है, बाहर वह क्या करती है, यह हमारी जिम्मेदारी नहीं होगी, यह मैं ने अवस्थी से साफ कह दिया है,’’ विपिन ने अगले रोज फिर बात छेड़ी, ‘‘मुझ से अवस्थी की परेशानी देखी नहीं गई.’’

‘‘अब जब आप ने कह ही दिया है तो मेरे कहने के लिए रह ही क्या गया?’’ विभा हंसी, ‘‘कल नेहा की एक अलमारी खाली कर दूंगी नन्ही के लिए.’’ विपिन को डर था कि नन्ही के आने पर घर का वातावरण असहज हो जाएगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. पहले रोज से ही नन्ही और विभा में अच्छा तालमेल हो गया. मना करने पर भी नन्ही रसोई में हाथ बंटाती थी, कुछ देर उन के साथ टीवी भी देखती थी. छुट्टी के रोज उन के साथ घूमने भी चली जाती थी लेकिन न तो कोई उस से मिलने आता था और न ही वह कहीं जाती थी. उस का मोबाइल जरूर जबतब बजता रहता था लेकिन नन्ही ज्यादा देर बात नहीं करती थी जिस से विभा को चिंता करनी पड़े. सब ठीक ही चल रहा था कि नन्ही की परीक्षा शुरू होने से कुछ रोज पहले अचानक नेहा आ गई.

‘‘मैं ने यहां अपना ट्रांसफर करवा लिया है,’’ नेहा ने उत्साह से बताया. ‘‘दिल भर गया दिल्ली से, अब यहीं रहूंगी आप के साथ. मगर आप खुश होने के बजाय इतनी सकपकाई सी क्यों लग रही हैं, मम्मी?’’

विभा ने धीरे से नन्ही के बारे में बताया. ‘‘उस का सामान निखिल के कमरे में रखवा कर तेरा कमरा खाली करवा देती हूं.’’

‘‘वह अब तक मेरे कमरे में ऐडजस्ट कर चुकी होगी मम्मी, उसे कमरा बदलवा कर डिस्टर्ब मत करो. मैं निखिल के कमरे में रह लूंगी, रात को आ कर सोना ही तो है.’’

‘‘रात को ही क्यों?’’ विभा ने चौंक कर पूछा. ‘‘क्योंकि मैं देर तक और छुट्टी के रोज भी काम करती हूं. अभी भी औफिस जाना है, शाम को कब तक लौटूंगी, कह नहीं सकती,’’ कह कर नेहा चली गई.

विभा को नेहा कुछ बदली सी तो लगी पर उस ने इसे नौकरी से जुड़ी व्यस्तता समझ कर टाल दिया. शाम को नेहा जल्दी ही लौट आई. तब तक नन्ही उस का कमरा खाली कर चुकी थी. ‘‘वह कहने लगी कि मुझे तो कुछ कपड़े और किताबें ही उठानी हैं, दीदी का तो पूरा सामान उन के कमरे में है, सो मैं ही दूसरे कमरे में चली जाती हूं,’’ विभा ने सफाई दी. परिचय के बाद कुछ बात तो करनी ही थी, सो नेहा ने नन्ही से उस की पढ़ाई के बारे में पूछा. यह सुन कर कि उस ने एमकौम तक की पढ़ाई चंडीगढ़ में की थी, नेहा चहकी, ‘‘तब तो तुम जगत सिंह चौधरी को जानती होगी?’’

‘‘ओह, जग्गी सिंह? बड़ी अच्छी तरह जानती हूं.’’

‘‘तुम्हारे क्लासफैलो थे?’’

‘‘हां, क्लासफैलो भी, सीनियर भी और फिर जूनियर भी,’’ नन्ही खिलखिला कर हंसी, ‘‘असल में उस ने बीकौम सेकंड ईयर में 3 साल लगाए थे.’’

‘‘लेकिन फिर फाइनल और मार्केटिंग डिप्लोमा में फर्स्ट क्लास ला कर पूरी कसर निकाल दी.’’

‘‘हां, सुना तो था. आप कैसे जानती हैं जग्गी को?’’ नन्ही ने पूछा.

‘‘जेएस चौधरी हमारी कंपनी में डिप्टी सेल्स मैनेजर हैं, मैनेजमैंट के ब्लू आईड बौय. जिस इलाके में बिक्री कम होती है, चौधरी साहब को भेज दिया जाता है. यहां की ब्रांच तो बंद ही होने वाली थी लेकिन चौधरी साहब की जिद पर उन्हें यहां भेजा गया और वे आज बड़ौदा में नया शोरूम खुलवाने गए हुए हैं,’’ नेहा के स्वर में गर्व था.

‘‘मार्केटिंग में लच्छेदार बातों वाला आदमी चाहिए और बातों की जलेबियां तलने में तो जग्गी लाजवाब है.’’

‘‘तुम इतनी अच्छी तरह कैसे जानती हो उन्हें?’’

‘‘चंडीगढ़ में हमारी और उस की कोठी एक ही सैक्टर में है, दोनों के परिवारों में तो मिलनाजुलना है लेकिन मम्मीपापा को हम भाईबहन का जग्गी से मेलजोल पसंद नहीं था.’’ ‘‘लेकिन अब तो तुम्हें उन से मिलना ही होगा, मेरी खातिर. मैं दिल्ली से आई ही उन के लिए हूं और सच बताऊं तो वे भी मेरे लिए ही यहां आए हैं क्योंकि दिल्ली में मामी को हमारा मिलनाजुलना खटकने लगा था, सो हम ने वहां से हटना ही बेहतर समझा,’’ कह कर नेहा ने विभा को पुकारा, ‘‘मम्मी, नन्ही मेरे बौस के परिवार को जानती है. सो, मैं सोच रही हूं कि इस से मिलने के बहाने चौधरी साहब को एक रोज घर बुला लूं. बौस से अच्छे ताल्लुकात बहुत काम आते हैं.’’

‘‘ठीक है, पापा से पूछ कर किसी छुट्टी के दिन बुला लेना,’’ विभा बोली. नेहा की नन्ही से खूब पटने लगी. एक रोज नेहा का फोन आया कि अधिक काम होने के कारण वह देर से आएगी, खाने पर उस का इंतजार न करें, न ही फिक्र. वह औफिस की गाड़ी में आ जाएगी.

नेहा 10 बजे के बाद आई.

‘‘चौधरी साहब ने कहा कि उन्हें नन्ही से मिलने तो आना ही है सो वे अपनी गाड़ी में मुझे छोड़ने आ गए,’’ नेहा ने विभा व विपिन के कमरे में आ कर कहा.

विपिन ने अपने कपड़े देखे.

‘‘ठीक हैं, या बदलूं?’’

‘‘आप लोगों को बाहर आने की जरूरत नहीं है, अभी तो वे नन्ही का हालचाल पूछ कर चले जाएंगे.’’ और फिर अकसर चौधरी साहब नेहा को छोड़ने और नन्ही को हैलो कहने आने लगे. विभा को यह सब ठीक तो नहीं लगा लेकिन नेहा ने उसे यह कह कर चुप कर दिया कि नन्ही के पड़ोसी हैं और उन के पापा चंडीगढ़ में अवस्थी अंकल की गैरहाजिरी में उन की कोठी और माली वगैरह पर नजर रखते हैं, हालांकि नन्ही ने उस से ऐसा कुछ नहीं कहा था. विभा ने नन्ही को कुछ दिन पहले फोन पर कहते सुना था कि उसे किसी चंडीगढ़ वाले से मिलने की फुरसत नहीं है. नन्ही आजकल पढ़ाई में बहुत व्यस्त रहती थी. सो, विभा ने उस से इस विषय में कुछ नहीं पूछा. वैसे भी चौधरी कुछ मिनट ही रुकता था. परीक्षा के दौरान नन्ही ने कहा कि वह रात का खाना 7 बजे खा कर कुछ घंटे लगातार पढ़ाई करेगी.

‘‘खाना तो 7 बजे ही खा लोगी लेकिन चौधरी जो ‘हैलो’ करने के बहाने खलल डालेगा उस का क्या करोगी?’’ विभा हंसी.

‘‘मैं कहना तो नहीं चाहती थी आंटी लेकिन चौधरी मुझे हैलो कहने के बहाने नेहा दीदी को छोड़ने आता है. मेरे कमरे में तो उस ने पहले दिन के बाद झांका भी नहीं. पहले रोज जब दीदी आप के कमरे में गई थीं तो मैं ने उस से कहा था कि तुम ही होने वाले सासससुर के कमरे में जा कर उन के पैर छू आओ तो उस ने बताया कि सासससुर तो मम्मी ही पसंद करेंगी, शादी तो उन की सुझाई लड़की से ही करनी है, यहां तो वह महज टाइमपास कर रहा है. मैं ने कहा कि अगर उस ने नेहा दीदी के साथ कुछ गलत किया तो मैं उस की मम्मी को ही नहीं, चंडीगढ़ में सारे पड़ोस को उस की करतूत बता दूंगी.

‘‘चौधरी ने कहा कि ऐसा कुछ नहीं होगा और वैसे भी नेहा की शर्त है कि जब तक मैं उस के पापा से शादी की बात नहीं करूंगा वह मुझे हाथ भी नहीं लगाने देगी. शाम गुजारने के लिए उस के साथ कहीं बैठ कर गपशप कर लेता हूं और कुछ नहीं…’’

‘‘और तुम ने उस की बात मान ली?’’ विभा ने बात काटी, ‘‘तुम्हारा फर्ज नहीं बनता था कि तुम मुझे बतातीं यह सब?’’

‘‘नेहा दीदी ने पहले दिन ही यह शर्त रख दी थी कि अगर घर में रहना है तो जैसा वे कहेंगी वैसा ही करना होगा, उन में और चौधरी में फिलहाल रिश्ता घूमनेफिरने तक ही सीमित है, सो मैं चुप ही रही,’’ नन्ही ने सिर झुका कर कहा, ‘‘मैं यह सोच कर चुप रह गई थी कि कुछ दिनों की ही तो बात है, जाने से पहले चौधरी की असलियत दीदी को जरूर बता दूंगी.’’

‘‘मगर तब तक बहुत देर हो जाएगी. विपिन के एक दोस्त का लड़का लंदन से आया हुआ है. उस ने नेहा का रिश्ता मांगा है लेकिन नेहा उस लड़के से मिलने को तैयार ही नहीं हो रही और वह तो कुछ रोज में वापस चला जाएगा,’’ विभा ने हताश स्वर में कहा.

‘‘ऐसी बात है आंटी तो मैं कल जग्गी से मिल कर कहूंगी कि वह फौरन नेहा दीदी को अपनी असलियत बता दे.’’

‘‘जैसे वह तेरी बात मान लेगा,’’ विभा के स्वर में व्यंग्य था.

‘‘माननी पड़ेगी, आंटी. जग्गी की शादी चंडीगढ़ के एक उद्योगपति की बेटी पिंकी से लगभग तय हो गई है, तगड़े दहेज के अलावा जग्गी को उन के बिजनैस में भागीदारी भी मिलेगी. पिंकी मेरी सहेली है, उसी ने मुझे फोन पर बताया यह सब. अब मैं जग्गी को धमकी दे सकती हूं कि तुरंत दीदी की जिंदगी से बाहर निकले वरना मैं पिंकी को बता दूंगी कि वह यहां क्या कर रहा है.’’

‘‘इस सब में तेरी पढ़ाई का हर्ज होगा, नन्ही.’’ ‘‘पढ़ाई तो जितनी हो सकती थी, हो चुकी है, आंटी. फिर इस सब में ज्यादा समय नहीं लगेगा. आप बेफिक्र रहिए, मैं सब संभाल लूंगी,’’ नन्ही ने आश्वासन दिया. नन्ही रोज दोपहर को घर आ जाती थी लेकिन उस दिन वह देर शाम तक नहीं लौटी. विभा ने उस के मोबाइल पर फोन किया.

‘‘मैं ठीक हूं, आंटी, आने में हो सकता है कुछ देर और हो जाए,’’ नन्ही ने थके स्वर में कहा.

‘‘तू है कहां?’’

‘‘मैं जग्गी यानी चौधरी के फ्लैट के बाहर बैठ कर उस का इंतजार कर रही हूं. वह बड़ी देर से ‘बस, अभी आया’ कह रहा है, अब मैं ने उस से कहा है कि आधे घंटे में नहीं आया तो मैं पिंकी को फोन पर जो जी चाहेगा, बता दूंगी.’’

‘‘तुझे उस के फ्लैट पर अकेले नहीं जाना चाहिए, नन्ही.’’

‘‘किसी कौफी शौप में मिलने से घर पर मिलना बेहतर है, आंटी. औफिस में मिलने पर नेहा दीदी को पता चल जाता. आप बेफिक्र रहिए, जग्गी मुझ से बदतमीजी करने की हिम्मत नहीं करेगा.’’

‘‘लेकिन तेरी पढ़ाई कितनी खराब हो रही है, नन्ही?’’

‘‘दीदी की जिंदगी खराब होने देने से थोड़ी पढ़ाई खराब करना बेहतर है, आंटी. रखती हूं, जग्गी आ रहा है शायद.’’ नन्ही नेहा के आने के बाद आई. सो, विभा उस से कुछ पूछ नहीं सकी. अगली सुबह उस का पेपर था, वह जल्दी चली गई. दोपहर को नन्ही के लौटने से पहले विपिन अचानक घर आ गया.

‘‘तुम्हारे लिए एक खुशखबरी है, विभा. नेहा अश्विन के बेटे से मिलने को तैयार हो गई है. उस ने मुझे औफिस में अभी फोन कर के यह बताया. तुम बताओ, कब बुलाऊं उन लोगों को?’’

‘‘कभी भी बुला लो, इस में पूछने की क्या बात है.’’

‘‘बहुत सहज और खुश लग रही हो, विभा,’’ विपिन ने हैरानी से उस की ओर देखा, ‘‘क्या इसलिए कि पराया कांच सही- सलामत लौटाने का समय आ गया है?’’

‘‘नन्ही को पराया कांच मत कहो, विपिन,’’ विभा ने विह्वल स्वर में कहा, ‘‘वह तो हीरा है, अनमोल हीरा, जिस ने हमारे अपने कांच को तड़कने से बचाया है और नन्ही अब पराई नहीं हमारी अपनी है. निखिल मुझे अपने लिए लड़की पसंद करने को कह ही चुका है, सो, मैं ने नन्ही को पसंद कर लिया है.’’ विपिन उसे क्या बताता कि वह और निखिल तो कब से नन्ही को पसंद कर चुके हैं, निखिल के कहने पर ही उस ने नन्ही को घर में रहने को बुलाया था.

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