मुझे खुद को मां के रूप में अंदर से तैयार करना पड़ा- शिवालिका ओबेराय

अब बौलीवुड का तरीका बदल गया है. अब हर कलाकार अपनी तरफ से पूरी तैयारी करके ही बौलीवुड में कदम रखता है. तभी तो शिवालिका ओबेराय ने अभिनय की टेनिंग लेने के बाद बतौर सहायक निर्देशक काम करते हुए फिल्म माध्यम को अच्छी तरह से समझा. उसके बाद उन्होने फिल्म ‘साली ये आशिकी’ से अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा. यह फिल्म खास नही चली. लेकिन फिल्म‘खुदा हाफिज’से शिवालिका ओबेराय को अच्छी पहचान मिली और अब वह फिल्म ‘खुदा हाफिजः चैप्टर 2’ को लेकर एक्साइटेड हैं.

हाल ही में शिवालिका ओबेराय से लंबी बातचीत हुई. प्रस्तुत है उसका अंश. . .

आपके दादा जी फिल्म निर्माता थे. क्या इसी के चलते आपने भी फिल्मों से जुड़ने का फैसला लिया?

-पहली बात तो मैंने अपने दादाजी को देखा ही नही. सच यह है कि जब मेरे पिता जी सोलह वर्ष के थे, तभी मेरे दादा जी का देहांत हो गया था. मैने सिर्फ सुना है कि मेरे दादा जी ने एक फिल्म का निर्माण किया था. मेरे माता पिता फिल्म इंडस्ट्री से नहीं जुड़े हुए हैं. मेरी मां शिक्षक है. मेरी बहन कुछ और काम करती है. हुआ यह था कि स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही मेरी नजर एक्टिंग स्कूल पर पड़ गयी थी, जो कि मेरे स्कूल के पास में ही था. वहां से मैने मम्मी से कहना शुरू किया था कि मुझे एक्टिंग स्कूल में जाकर देखना है कि क्या सिखाया जाता है.  फिर यह इच्छा कालेज पहुॅचते पहुॅचते बढ़ गयी. उस वक्त तक मुझे नही पता था कि मेरे दादाजी ने फिल्म बनायी थी. वैसे अलबम में मैने दादा जी निर्मित फिल्म ‘शीबा और हरक्यूलिस’ की फोटो एक बार देखी जरुर थी,  जिस पर लिखा था निर्माता महावीर ओबेराय. कालेज में पहुॅचने के बाद मैने अपनी मम्मी से कहा कि जब मेरे दादा जी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हुए थे? तो फिर आप मुझे क्यों रोक रही हैं? तब मेरी मम्मी ने मुझे बैठकर समझाया था कि फिल्म इंडस्ट्री बहुत ही ज्यादा इनप्रैडिक्टेबल है. इंसान का कैरियर स्थायी होना चाहिए, जो कि फिल्म इंडस्ट्री में नहीं होता. इसलिए पहले पढ़ाई पूरी करो. उसके बाद सोचना. आम बच्चों की तरह मेरे दिमाग में भी आया कि माता पिता को सब कुछ कठिन लगता है. पर मुझे कुछ करके दिखाना है. मैने अंग्रेजी और मनोविज्ञान विषय के साथ स्नातक की पढ़ाई पूरी की. उसी दौरान मैने अनुपम खेर के एक्टिंग स्कूल से तीन माह का अभिनय में डिप्लोमा कोर्स किया. फिर मैने अनुभव लेने के लिए सहायक निर्देशक बनी. तब मुझे मम्मी की बात याद आ गयी कि फिल्म इंडस्ट्री में कैरियर बनाना कितना कठिन है. मम्मी कहती थी कि ऐसे तो सुबह दस बजे से पहले सोकर नहीं उठती,  देखती हूं कि छह बजे सेट पर कैसे पहुॅचेगी? सच कहूं तो मेरी मम्मी ने मुझे बदलते हुए देखा ओर उन्हे अहसास हुआ कि यह अपने कैरियर को लेकर गंभीर है, इसलिए कर लेगी.

आपकी मम्मी शिक्षक हैं. शिक्षक बच्चों पर अपनी बात न सिर्फ थोपने का प्रयास करता है, बल्कि वैसा ही बच्चे से करवा लेता है?

-आपने एकदम सही कहा. मेरी मम्मी के अंदर भी बच्चांे को अपनी बात समझा लेने का अद्भुत गुण है. पर मैं खुद को बदलने के लिए जो मेहनत कर रही थी, उसे मेरी मम्मी देख रही थीं. बतौर सहायक निर्देशक काम करने के दौरान मैं अपने माता पिता से एक वर्ष तक दूर रही हूं. सोलह वर्ष से मैं काम कर रही हूं, पर मम्मी ने मुझसे स्नातक तक की पढ़ाई करवायी है. तो जो वह चाहती थीं, वह भी उन्होने मुझसे करवाया.

सीधे अभिनय की बजाय सहायक निर्देशक के रूप में कैरियर शुरू करने के पीछे आपकी क्या सोच थी?

-किताबी ज्ञान की बजाय सेट पर जाकर  प्रैक्टिकल ज्ञान अर्जित करना ही मकसद था. सेट पर छोटी छोटी बरतें जब अलग होती हैं,  तो उसका क्या असर होता है, वह समझ मंे आया. कैमरा रेडी नही है. इस तरह की सौ समस्याएं होती है. कैमरे के सामने कलाकार के अभिनय करने मात्र से फिल्म नही बनती. फिल्म निर्माण में सौ से अधिक लोग होेते हैं, उतनी ही चीजे होती है. एक चीज गड़बड़ हो जाए, तो उसका किस तरह से कलाकार की अभिनय क्षमता पर असर हो सकता है, वह समझना और उससे कैसे उबरा जाए यह सब भी सीखना था. बतौर सहायक निर्देशक मैने जो कुछ सीखा, उसी के चलते‘ये साली आशिकी’ और ‘खुदा हाफिज’ फिल्मों में मैं बतौर अभिनेत्री अपना सर्वश्रेष्ठ दे पायी थी.

बतौर सहायक निर्देशक काम करते हुए आपने ऐसी कौन सी बात सीखी, जो अभिनय में सबसे ज्यादा काम आ रही है?

-पैशंस. . जिंदगी में धैर्य रखना बहुत कठिन काम है, बतौर सहायक निर्देशक काम करते हुए मैने धैर्य रखना सीखा. अब मेरे अंदर उतावलापन नही है. ‘हाउसफुल 3’ में बतौर सहायक निर्देशक काम करने के बाद मेरे पास जो दो वर्ष थे, जब तक मुझे मेरी पहली फिल्म बतौर अभिनेत्री नही मिली, तब तक बहुत कठिन समय था. हर दिन आॅडीशन देना, रिजेक्शन होना, तो यह सब सहन करती रही. इसी बीच मैने खुद को व्यस्त रखने के एड भी किए. जो हम चाहते हैं, वह मिलने तक खुद का धैर्य बनाए रखना सबसे मुश्किल चीज है.

ऑडीशन में रिजेक्शन होने पर परेशान होती होंगी?

-रिजेक्शन की वजह से परेशान होना स्वाभाविक है. पर मैं हर आॅडीशन में बेहतर होती गयी. क्योंकि मेरे अंदर एक जिद रही है कि जिसकी कमी बताई जाए, उसे दूर करने के लिए जुट जाना. तो मैं हर आॅडीशन के बाद अपनी कमी को दूर करती रही. मैं हर रिजेक्शन के बाद ठान लेती थी कि मुझे अब इससे बेहतर परफार्मेंस देनी है. मुझसे कई लोगों ने कहा कि आप फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा नही है, इसलिए अभिनेत्री नही बन सकती. तो मैने ठान लिया था कि मैं अभिनेत्री बनकर दिखाउंगी. मैने लोगों को गलत साबित करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी.

आपकी पहली फिल्म ‘ये साली आशिकी’ को बाक्स आफिस पर सफलता नही मिली थी. जबकि यहां सब कुछ सफलता पर निर्भर करता है?

-आपने एकदम सही कहा. फिल्म में मै और वर्धन पुरी के अलावा निर्देशक नए थे. इसलिए बाक्स आफिस पर इसने ठीक ठाक बिजनेस नहीं किया था. जबकि फिल्म क्रिटिक्स ने हमारे अभिनय की तारीफ की थी. फिल्म का ठीक से प्रचार भी नही हुआ. लोगों को फिल्म के बारे में पता ही नही चला. लेकिन मेरे कैरियर की दूसरी फिल्म ‘खुदा हाफिज’के सफल होने के बाद लोगो ने ‘ये साली आशिकी’ देखी. मुझे ‘ये साली आशिकी’ के लिए फिल्मफेअर अवार्ड के लिए नोमीनेट किया गया था, पर पुरस्कार नही मिला था. तो बुरा लगा था कि मैने इतनी मेहनत की और नतीजा शून्य रहा. लेकिन मैने ठान लिया था कि मैं अपनी पहचान अपनी खूबसूरती के बल पर नही बल्कि अभिनय क्षमता क बल पर बनाउंगी. मैं चाहती हूं कि लोग मुझे उत्कृष्ट अदाकारा के रूप में पहचानें.

तो पहली फिल्म की असफलता के बाद खुद को किस तरह बदलने की बात सोची?

-मुझे लोगों ने बताया था कि मैने अपनी तरफ से अच्छा अभिनय किया है. पर इस फिल्म की असफलता के बाद मैने निर्णय लिया कि अब मैं दूसरी फिल्म अलग तरह के जॉनर की करुंगी. वैसे भी पहली फिल्म में हल्का सा ‘ग्रे’ शेड वाला किरदार निभाते हुए कैरियर शुरू करना रिस्क था, जिसे मैने उठाया. मैने दूसरी हीरोईनों की तरह रोमांटिक फिल्म से कैरियर की शुरूआत नहीं की थी. इस फिल्म न करने की सलाह मुझे कई लोगों ने दी थी. फिर भी बिना प्रचार के कुछ लोगों ने इस फिल्म को महज अलग तरह की होने के चलते देखा. मेरा मानना है कि अगर हम हर फिल्म में एक जैसा करते रहेंगंे, तो फिर दूसरी अभिनेत्रियों और मेेरी अभिनय यात्रा में कोई अंतर नहीं रह जाएगा. ‘ये साली आशिकी’ के प्रदर्शन से पहले ही मैने फिल्म ‘खुदा हाफिज’ अनुबंधित कर ली थी। ‘ये साली आशिकी’ की शूटिंग पूरी होने के बाद से मेरे पास फिल्मों के आफर आ रहे थे. मैं आॅडीशन देने के साथ ही फिल्म की पटकथाएं भी पढ़ रही थी. पर मुझे समझ मंे नही आ रही थी. जब फिल्म ‘खुदा हाफिज’ की पटकथा मुझे मिली, तो मैने पाया कि यह एक रियालिस्टिक कहानी है. इसके साथ ही इसमें प्यार व ढेर सारा इमोशंस भी है. किरदार मेरी शख्सियत से एकदम विपरीत है. मुझे अहसास हुआ कि इसमें एक कलाकार के तौर पर मेरी अभिनय क्षमता की रेंज लोगों की समझ में आएगी. तो मैने ‘खुदा हाफिज’ की और मेरा यह निर्णय सही रहा.

‘खुदा हाफिज’ और ‘खुदा हाफिज 2’’ में कितना अंतर है?

-यह कहानी भी रियालिस्टिक ही है. पहले भाग में मेरा नरगिस का किरदार इन्नोसेंट,  संकोची, शर्मीली, शहर से बाहर ज्यादा न निकलने वाली लड़की थी. सीधी सादी, नेक्स्ट डोर गर्ल थी. लेकिन उसके साथ जो हादसा होता है, उससे उसके अंदर जो बदलाव आता है, वह बदलाव अब आपको ‘खुदा हाफिज 2’ में नरगिस के अंदर नजर आएगा. उसके साथ तो कुछ बीता, वह उसी को पता है कि उसने उससे कैसे डील किया. तो आपको ‘खुदा हाफिज 2’ में नजर आएगा कि नरगिस क्या डील कर रही है. एक लड़की को एक कमरे के अंदर क्या अहसास होता है. इसमें पहले भाग की अपेक्षा इस भाग मंे इमोश्ंास का ग्राफ भी नजर आएगा. इन्नोेसेंस भी नजर आएगा. उसके अंदर की ताकत नजर आएगी. यहां पर नरगिस  एक एडॉप्टेड बच्चे की मां है. तो मां के जो इमोशंस हैं और वह भी एडौप्टेड बच्चे के साथ, उसके लिए मुझे काफी काम करना पड़ा. मैने इस फिल्म की लखनउ में एक माह तक शूटिंग के दौरान अपनी मां से बात नहीं की थी और मेरी मां ने मुझे को फोन करके बताया था कि मेरी बहन ने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया है. उस दिन मै यात्रा कर रही थी. मतलब मैं अपने किरदार में इस कदर इंवालब थी.

आप स्वाभाविक तौर पर जब मां बनती हैं, तो उसके इमोशंस व अहसास बहुत अलग होते हैं. पर एडॉप्टेड बच्चे की मां के अहसास व इमोशंस अलग होते हैं. इन्हे लाने के लिए आपको किस तरह की तैयारी करनी पड़ी?

-आपके एकदम सही कहा. दोनों अवस्था में अहसास अलग अलग ही होते हैं. इतनी छोटी उम्र और कैरियर की शुरूआत में ही मां का किरदार न निभाने की सलाह मुझे कई लोगों ने दी थी. जब निर्देशक फारुख सर ने मुझसे ऐसा करने के लिए कहा तो मेरी आंखों में आंसू थे. देश में बहुत कम लोगो को एडॉप्शन के बारे में पता है. ऐसे लोग एडॉप्टेड बच्चे को लेकर मां के इमोशंस को भी नही समझ सकते. देखिए, एडॉप्टेशन एक सामाजिक मुद्दा है. लोगों को लगता है कि अपना बच्चा ही अपना होता है, एडॉप्टेड बच्चा अपना नही होता. जबकि यह गलत है. तो इस तरह के कई सामाजिक मुद्दे इस फिल्म में उठाए गए हैं. मुझे तो यॅूं भी बच्चे बहुत पसंद हैं. लेकिन मुझे खुद को मां के रूप में अंदर से तैयार करना पड़ा था.

आपकी फिल्म ‘खुदा हाफिज’ ओटीटी पर स्ट्रीम हुई थी. अब ‘ये साली आशिकी’ के बाद ‘‘खुदा हाफिज 2’ भी सिनेमाघरों में प्रदर्शित होगी. आपको नही लगता कि ओटीटी पर की बजाय सिनेमाघर में फिल्म के रिलीज होने पर जो रिस्पांस मिलता है, वह एक कलाकार के लिए बहुत अलग होता है?

-देखिए, कोविड के वक्त जब लोगो के पास मनोरंजन के सारे साधन बंद थे, तब ओटीटी पर ‘खुदा हाफिज’ आयी और लोगों ने इसे काफी देखा. उस वक्त लोग आॅन लाइन ही ढेर सारा कांटेंट देख रहे थे. एक कलाकार के तौर पर मैं ओटीटी और थिएटर हर जगह प्रदर्शित होने वाली फिल्म में अभिनय करना चाहती हूं. लेकिन जब हम खुद को बड़े परदे पर देखते हैं, तो बहुत ही अलग तरह के अहसास होते हैं. लेकिन जब लोग मोबाइल पर हमारी फिल्म देख रहे होते हैं, तो यह देखकर अलग तरह का अहसास होता है. कोविड के वक्त ओटीटी पर आने वाली हमारी फिल्म ‘खुदा हाफिज’ बहुत बड़ी बन गयी थी. हर कोई इसके बारे में बात कर रहा था. मैं तो खुश हूं. लेकिन ‘खुदा हाफिज 2’ पूरी तरह से सिनेमाघरों के लिए बनी है. इसमें उसी स्तर का एक्शन है. ग्रैंजर है.

Imlie को अपना मोहरा बनाएगी मालिनी, प्रोमो में दिखी झलक

स्टार प्लस सीरियल इमली (Imlie) की टीआरपी इन दिनों गिरती जा रही है, जिसके चलते मेकर्स सीरियल के पुराने चेहरे वापस लाते नजर आ रहे हैं. दरअसल, हाल ही में खबरें थीं कि मालिनी यानी एक्ट्रेस मयूरी देशमुख (Malini aka Mayuri Deshmukh) की शो में वापसी होने वाली है. वहीं अब मेकर्स ने शो का नया प्रोमो भी रिलीज कर दिया है. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

इमली के साथ खेल खेलेगी मालिनी

 

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अब तक आपने देखा कि ज्योति के प्लान के कारण आर्यन किडनैप हो जाता है, जिसके कारण इमली कैरी बनकर आर्यन को बचाने की कोशिश करती हुई दिखती है. वहीं अब इस ट्रैक में मालिनी (Mayuri Deshmukh) और उसकी मां अनु की एंट्री होने वाली है. दरअसल, प्रोमो में मालिनी ढेर सारे खिलौने के सामने खड़ी होती है और कहती है कि भले ही इमली और उसने बचपन में साथ खिलौनों से नहीं खेला लेकिन इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि अब वह वापस आ गई है. इसके बाद वह इमली से यह पूछती है कि क्या वह अपनी दीदी के साथ नहीं खेलेगी. इसी के साथ वह खिलौनों को जलाते हुए कहती है कि अब इमली उसका खिलौना बनेगी, जिसके साथ वह खेल सके.

 

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ज्योति का होगा पत्ता साफ

 

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अपकमिंग एपिसोड की बात करें तो मालिनी की एंट्री से पहले ही आर्यन की दोस्त ज्योति की छुट्टी होने वाली है. दरअसल, खबरों की मानें तो ज्योति का सच आर्यन के सामने आ जाएगा और वह उसे जेल भेज देगा. वहीं इसी के साथ इमली की लाइफ में मालिनी और उसकी मां की एंट्री होगी. हालांकि जहां मालिनी की एंट्री से फैंस खुश हैं तो वहीं मालिनी के रोल में मयूरी देशमुख को सेट पर पाकर इमली यानी सुंबुल तौकीर खान भी बेहद एक्साइटेड हैं, जिसका खुलासा एक्ट्रेस ने हाल ही में एक इंटरव्यू में किया है.

 

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जल्द शादी करेंगे ‘कसौटी जिंदगी के’ के ‘अनुराग’, इंटरव्यू में कही ये बात

सीज़ैन खान का नाम आज एक बड़े टीवी कलाकारों में जोड़ा जाता है. उन्होंने अपना कैरियर मॉडलिंग से शुरू किया था. हालाँकि उन्हें पायलट बनना था, लेकिन उन्हें लगातार मॉडलिंग से टीवी शो के ऑफर आने लगे. उन्हें ड्रामा सीरीज ‘कसौटी जिंदगी की’ में अनुराग बासु की भूमिका निभाने के लिए जाने जाते है.वर्ष 2001 से वर्ष 2008 तक चलने के दौरान वे हर परिवार में पहचाने जाने लगे. उनके इस अभिनय के लिए आलोचकों की प्रशंसा मिली और उन्होंने कई पुरस्कार भी जीते. हालाँकि स्वेता तिवारी और सीज़ैन खान की जोड़ी छोटे पर्दे पर बहुत हिट थी, लेकिन रियल लाइफ में दोनों के बीच शीत युद्ध चलता रहा.

टेलीविजन उद्योग का हिस्सा होने के साथ-साथसीज़ैन ने पाकिस्तानी और मध्य पूर्व एशियाई टेलीविजन शो में भी अभिनय किया है. उनके पिता उस्ताद रईस खान एक तबला वादक थे, जिनका जन्म भारत में हुआ, लेकिन वे बाद में पाकिस्तान में बस गए थे. सीजैन जब तीन साल के थे, तब उनके पिता ने माँ से डिवोर्स ले लिया.उनकी माँ ने ही उनका पालन-पोषण किया है. उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली है. पिता की कमी उन्हें जीवन में कभी नहीं हुई.सीज़ैन खान 3 साल से आफशीन को डेट कर रहे है और जल्दी ही शादी करने वाले है.

अभी सीज़ैन खान सोनी टीवी पर अपनापन – बदलते रिश्तों की बंधन’ में मुख्य भूमिका निखिल जयसिंह की निभा रहे है, इसे दर्शक काफी पसंद कर रहे है. आइये जाने उनके सफ़र की कहानी उनकी जुबानी.

सवाल – अभिनय में आने की प्रेरणा कहाँ से मिली? क्या ये एक इत्तफाक रहा?

जवाब – इत्तफाक नहीं कहूंगा, मुझे रूचि थी. मैं मॉडलिंग बहुत करता था, लेकिन मुझे पायलट बनने की इच्छा थी. उसमे सफल नहीं हो पाया, लेकिन मॉडलिंग से मुझे कुछ फिल्में मिलनी शुरू हो गयी थी और मैंने साथ में एमबीए का कोर्स करना भी शुरू कर दिया था. पढाई और फिल्मों में काम करते हुए मुझे परेशानी हो रही थी, इसलिए मैंने पढाई छोड़कर फिल्मों में काम करने लगे, लेकिन फिल्में नहीं चली. मैने फिर से मॉडलिंग करनी शुरू की और उससे अपना खर्चा चला लिया करता था.

सवाल – किसी प्रोडक्शन हाउस का फेवोरिट होना कैसे संभव होता है?

जवाब – इस इंडस्ट्री में दोस्ती से अधिक उस चरित्र में कलाकार का फिट होना है. मेरा पहला चर्चित शो ‘कसौटी जिंदगी की’ में भी एकता कपूर ने मुझे फिट पाया और मौका दिया. इससे मुझे दर्शक जानने लगे और मुझे आगे काम मिलना आसान हो गया.

सवाल – इस शो में आपको खास क्या लगा?

जवाब –ये चरित्र बाकी सभी से अलग है, इसमें मुझे चुनौतियाँ भी बहुत अधिक है. एक कलाकार के रूप में नई भूमिका मुझे सबसे अधिक ख़ुशी देती है.

सवाल – इसमें आपको कुछ तैयारियां करनी पड़ी?

जवाब – इसमें तैयारियां निर्देशक के अनुसारकरना पड़ा. रोजमर्रा की जिंदगी में जिसे आप आसपास देखते है, उसमें थोड़े खुद की अनुभव को जोड़कर निभाना आसान होता है, लेकिन जब आपने उसे देखा ही नहीं, तो मुश्किलें आती है, जैसे मैं मैरिड नहीं हूं, लेकिन मुझे मैरिड व्यक्ति की भूमिका निभानी पड़ रही है.

सवाल – धारावाहिकों में एक सी भूमिका सालों करनी पड़ती है, उस चरित्र से निकलकर दूसरे में काम करना कितना मुश्किल होता है? इसे कैसे कर पाते है?

जवाब – ये सही है कि किसी भी चरित्र में एक बार घुस जाने पर उससे निकलना मुश्किल होता है, लेकिन मुझे नहीं होता, क्योंकि मैं सेट से निकलने से पहले ही खुद को सीज़ैन खानसमझा देता हूं. इसलिए आसानी से स्विच ऑन और स्विच ऑफ़ कर लेता हूं.

सवाल – आप मुंबई के है और पायलट बनना चाहते थे, लेकिन इंडस्ट्री में काम निश्चित नहीं होता, ऐसे में परिवार ने कैसे सहयोग दिया?

जवाब – मेरी माँ चाहती थी कि मैं कुछ अच्छा काम करूँ, उसने मुझे कभी किसी काम को करने से रोका नहीं, उन्हें ख़ुशी हुई कि मैं अभिनेता बनना चाहता हूं.

सवाल – आप शादी कब करने वाले है?

जवाब – मैं जल्दी ही अपनी प्रेमिका अफशीन से शादी करने वाला हूं. पिछले 3 सालों से मैं उनसे जुड़ा हूं. वह बहुत बढ़िया बिरयानी बनाती है. मैने उसके हाथ की बिरयानी खाने के बाद ही उन्हें प्रपोज किया था.

सवाल – बिना गॉडफादर के इंडस्ट्री में सफल होना कितना मुश्किल होता है?

जवाब – प्रतिभा, मेहनत और लगन से काम करने पर सफलता अवश्य मिलती है. साथ ही खुद की प्रतिभा को जांच लेना जरुरी है, कमी अगर है तो उसे ठीक करने के लिए प्रशिक्षण लेना आवश्यक है.

छंटनी- भाग 3: क्या थी रीता की असलियत

विशाल को उठ कर जाना पड़ा. उस  के जाते ही अजीत सुधा के पास आ बैठा और बोला, ‘‘सुधा, मुझे तुम से यह उम्मीद न थी.’’

‘‘पर यह जरूरी था, अजीत. हम सौरभ, गौरव की रूखी रोटी में से क्या कटौती कर सकते हैं. क्या बूआ हमारी स्थिति नहीं जानतीं? मैं ने उन्हें पत्र लिखा था, उन्होंने उत्तर तक नहीं दिया. तुम्हें भी समझना चाहिए कि मौके पर सब कैसे बच रहे हैं. मदद को कोई नहीं आया, और न ही कोई आएगा. तुम नाराज क्यों होते हो?’’

‘‘नाराज नहीं हूं. मैं तो यह कह रहा हूं कि तुम ने कितनी सरलता से सुलझा दिया मामला. वरना हम पर नए सिरे से कर्ज चढ़ना शुरू हो गया होता.’’

‘‘नहीं, अजीत, अब ऐसा नहीं होगा  कि जो चाहे जब चाहे चला आए और पैर पसार कर पड़ा रहे.’’

‘‘अच्छा, अगर बूआ लड़ने आ गईं तो क्या करोगी?’’

‘‘जो मुझे करना चाहिए वही करूंगी. पहले प्यार से समझाने की कोशिश करूंगी, नहीं समझेंगी तो अपनी बात कहूंगी. अपने बच्चों की मां हूं, उन का भलाबुरा तो मैं ही देखूंगी. अजीत हमें छंटनी करनी होगी…अपनेपरायों की छंटनी. दूर के रिश्तेदार ही नहीं पास वालों को भी तो आजमा कर देखा. बूआ क्या दूर की रिश्तेदार होती है? या चाची या मामी? ऐसे लोगों से आगे अब मैं नहीं निभा पाऊंगी.’’

‘‘तुम ने जितनी कठिन परिस्थितियों में मेरा साथ निभाया है इस के बाद तो मैं यही कहूंगा कि तुम लाखों में एक हो, क्योंकि मेरे गार्ड बन जाने पर भी तुम ने कोई खराब प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की.’’

‘‘यह थोड़े दिन की बात है, अजीत. वहां गेट पर खड़ेखड़े ही तुम निराश न होना. सोचना क्याक्या संभव है. कहांकहां तुम्हारी योग्यता का उपयोग हो सकता है. उस के अनुसार प्रयास करना. देखना, एक दिन तुम जरूर सफल होगे और हमारी गाड़ी फिर से पटरी पर आ जाएगी.’’

अजीत गार्ड की ड्यूटी देने के बाद बचे समय में उपयुक्त नौकरी के लिए भागदौड़ भी करता रहता. सुधा और बच्चों का पूरा सहयोग उसे मिल रहा था. अजीत और सुधा की कमाई के साथ किराए का पैसा जोड़ कर फैक्टरी के वेतन का आधा भी मुश्किल से हो पाता पर बच्चों की दुर्दशा नहीं होगी, उन्हें इतना विश्वास हो गया था. तभी एक दिन घर के आगे एक चमचमाती कार दिखी और उस से लकदक रीता उतरी. सुधा ने लपक कर रीता को गले लगाया और पूछा, ‘‘कार कब खरीदी?’’

रीता का मुंह फूला हुआ था. अंदर जाते ही वह भैया पर बरस पड़ी, ‘‘तुम ने मेरी भी नाक कटा कर रख दी, अपनी तो खैर कटाई ही कटाई.’’

‘‘कैसे कट गई तुम्हारी नाक?’’ अजीत ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘अरे, क्या जरूरत थी तुम्हें उस स्कूल में गार्ड बनने की? जानते हो वहां मेरे चाचाससुर का पोता पढ़ता है. उस ने हमारी शादी के फोटोग्राफ देखते हुए तुम्हें पहचान लिया. सब के बीच में वह बोला, ‘यह तो अपने स्कूल का गार्ड है.’ तुम्हें गार्ड ही बनना था तो कहीं और बनते. स्कूलों की कमी है क्या?’’

‘‘तो तुम भी कह देतीं कि यह फोटो वाला भाई तो मर चुका है. वह गार्ड कैसे बन सकता है? उस का भूत गार्ड बन गया हो तो बन गया हो,’’ रीता का गुस्सा और तिरस्कार भरा चेहरा देख अजीत भी उबल पड़ा था.

‘‘बुरी बातें न बोलो, अजीत,’’ सुधा ने डांटा.

‘‘मेरा खून खौल रहा है, सुधा. मुझे बोलने दो. यही बहन है जिस की फरमाइशें पूरी करने में मैं ने अपनी सारी जमापूंजी लुटा दी. आज मेरा पैसा मेरे पास होता तो काम आता कि नहीं? पिताजी ने अपनी जिम्मेदारी मेरे सिर डाल दी और इसे भी शर्म नहीं आई. रीता, तुम बड़ी इज्जतदार हो तो अपने घर में रहो, मुझ गरीब के घर क्यों आती हो. अब जा कर कह देना अपने रिश्तेदारों से कि मेरा भाई मर गया.’’

रीता भाई को आंखें तरेर कर देख रही थी.

‘‘भाभी, समझा लो भैया को,’’ आंखें तरेर कर रीता बोली, ‘‘अब मुझे ज्यादा गुस्सा न दिलाएं.’’

‘‘अब भी तुम गुस्सा दिखाने की बेशर्मी करोगी, रीता,’’ सुधा ने आश्चर्य से कहा, ‘‘सब रिश्तेदार आजमाएपरखे मैं ने, कठिन समय में सब झूठे निकले. पर तुम से मेरा मन इतना अंधा मोह रखता था कि तुम्हारी सारी बेरुखी के बावजूद भी मैं तुम से कभी नाराज नहीं हो पाई. इतने लंबे संघर्ष और कष्ट के बावजूद तुम्हारे भैया ने कभी तुम्हें नहीं कोसा और तुम ही यह भाषा बोल रही हो. अभी तो तुम्हारे भैया ने ही कहा था, अब मैं भी कह रही हूं कि समझ लो हम मर गए तुम्हारे लिए, समझी? जितना तुम अपनी विदाई में फुंकवाओगी उतने में हम अपने बच्चों के लिए नए कपड़ेजूते खरीद लाएंगे. सारी कटौती मेरे बच्चों के लिए ही क्यों हो? अब बैठीबैठी मुंहबाए क्या देख रही हो. यहां से उठो और अपनी कार में बैठो. अपने घर जाओ और इज्जतदारों की तरह रहो. हम गरीबों को अपना रिश्तेदार समझो ही मत.’’

रीता पैर पटक बड़बड़ाती चली गई, ‘‘मेरी बला से, भाड़ में जाओ सब. भीख मांगो दरवाजेदरवाजे जा कर, यही बाकी रह गया है.’’

‘‘निश्ंिचत रहो, तुम्हारे दरवाजे पर मांगने नहीं आएंगे,’’ अजीत अंदर से चीखा.

‘‘शांत हो जाओ, अजीत. अच्छा हुआ कि हमारा अंधा मोह टूट गया. देख लिया अपनों को. अपनी प्रतिष्ठा के आगे उन्हें हमारे पेट का भी कोई महत्त्व नहीं दिखता. हम भूखे मर जाएं पर उन की इज्जत न घटे. अच्छा है कि अपनेपरायों की छंटनी हो रही है. उठो, तुम्हें आज इंटरव्यू देने जाना है. नहाधो कर तरोताजा हो जाओ. अगर यह नौकरी तुम्हें मिल गई तो साथ ही रूठी हुई बहन भी मिल जाएगी.’’

‘‘टूटे हुए रिश्तों की डोरियां अगर जुड़ती भी हैं तो उन में गांठ पड़ जाती है. तुम ने इतने लंबे समय तक मुझ में कुंठा की गांठ नहीं पड़ने दी, अब दूसरी गांठों की भी बात मत करो.’’

‘‘नहीं करूंगी, मेरे लिए तुम से बढ़ कर कोई नहीं है. तुम खुश रहो मेरे बच्चे सुखी रहें, मैं बस यही चाहती हूं, और मैं हमेशा इसी कोशिश में लगी रहूंगी.’’

‘‘तुम ने इस गार्ड का मन सुकून से भर दिया है और अब इस का मन बोलता है कि यह कल के दिन से फिर नई जगह पर नए सिरे से तकनीशियन होगा. अपने हुनर और मेहनत के बलबूते, आत्म- विश्वास और आत्मसम्मान से भरापूरा.’’

‘‘तथास्तु’’, सुधा ने वरद मुद्रा बनाई और अजीत मुसकराता हुआ इंटरव्यू के लिए तैयार होने लगा.

सिंगल लाइफ बेहतर या मैरिड लाइफ

अकेलेपन और सिंगल लाइफ को अकसर लोग एकदूसरे से जोड़ कर देखते हैं. व्यक्ति सिंगल है, इस का मतलब उस की जिंदगी बेहद नीरस, एकाकी और बेचारगीपूर्ण होगी. लोग उसे दया की दृष्टि से देखने लगते हैं. शादी हो जाना यानी जिंदगी की एक बड़ी उपलब्धि या फिर यों कहें कि जिंदगी वास्तव में संपूर्ण होने की पहली शर्त.

सिंगल व्यक्तियों को लोग अधूरा मानते हैं, भले ही शादी किसी ऐसे शख्स से ही क्यों न हो जाए जो किसी भी तरह उस के लायक न हो. शादीशुदा हो जाना ही एक अचीवमैंट माना जाता है.

मगर आप को यह जान कर आश्चर्य होगा कि बहुत से लोग ऐसे हैं, जो स्वयं अपनी इच्छा से कुंआरा रहना पसंद करते हैं. उन के लिए शादी से कहीं और बड़े मकसद जिंदगी में होते हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं, जो गलत व्यक्ति के साथ जीने के बजाय सिंगल लाइफ जीना ज्यादा पसंद करते हैं.

एक टीवी चैनल में ऐसोसिएट ऐडिटर, 35 वर्षीय निकिता राज कहती हैं, ‘‘मुझ से अकसर लोग पूछते हैं कि अब तक शादी क्यों नहीं हुई तुम्हारी? तो मैं जवाब देती हूं कि दरअसल अभी मैं ने शादी करने के बारे में सोचा ही नहीं.’’

सामान्य रूप से देखा जाए तो इन 2 वाक्यों में कोई खास अंतर नहीं दिखता. मगर जब आप इन में छिपे अर्थ पर गौर करेंगे तो काफी अंतर दिखेगा. शादी नहीं हुई यानी बेचारगी. कोशिश तो की पर कहीं बात बन नहीं पाई, किसी ने आप को पसंद नहीं किया. वहीं दूसरी तरफ शादी नहीं की यानी अभी वक्त ही नहीं मिला इस बारे में सोचने का.

इस संदर्भ में कोलंबिया एशिया हौस्पिटल और अपोलो क्लीनिक के कंसलटैंट व द रिट्रीट रिहैबिलिएशन सैंटर, मानेसर के निदेशक व मुख्य मनोरोग चिकित्सक, डा. आशीष कुमार मित्तल कहते हैं, ‘‘कई वजहों से आजकल लोग काफी समय तक अविवाहित रहते हैं, जिन में प्रमुख वजहें हैं, व्यक्तिगत मरजी, कैरियर को अधिक तरजीह देना, अतीत में प्रेम का कटु अनुभव, चिकित्सीय या मनोवैज्ञानिक समस्याएं वगैरह.’’

ऐसा जरूरी नहीं कि जो अविवाहित हैं, वे खुश नहीं रह सकते. डा. आशीष कहते हैं, ‘‘पश्चिमी देशों में करीब आधी शादियों का अंत तलाक में ही होता है. इसलिए शादी करना सामाजिक जीवन में सफल होने का एकमात्र तरीका नहीं. दोनों ही विकल्पों में जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह ही अलगअलग जोखिम हैं. बहुत से लोग हैं जो भावनात्मक रूप से शादीशुदा युवक या युवती की अपेक्षा कहीं ज्यादा मजबूत होते हैं. कुछ लोग कहते हैं कि परिवार का वंश बढ़ाने के लिए हमें शादी करनी चाहिए, एक बच्चे को जन्म देना चाहिए. जबकि कुछ लोग बच्चे को गोद लेना पसंद करते हैं ताकि इस दुनिया में वे कम से कम एक अनाथ बच्चे का जीवन सुधार सकें.’’

सिंगल लाइफ की वकालत करने वाली और इसी विषय पर किताब लिख चुकीं सोशल साइकोलौजिस्ट बेला डी पाउलो के मुताबिक, ‘‘यदि इसी तरह का अध्ययन विवाहित जिंदगी की तारीफ में छपा होता तो इसे काफी लंबीचौड़ी मीडिया कवरेज मिलती. मगर चूंकि यह अध्ययन सिंगल लाइफ के समर्थन में छपा था, इसलिए इसे कोई मीडिया अटैंशन नहीं मिला.’’

विशेषज्ञों ने यह भी पाया कि विवाहित जिंदगी में कार्डियोवैस्क्युलर डिजीज का रिस्क स्त्रीपुरुष दोनों के लिए 2% तक बढ़ जाता है.

अधिक लंबी शादी के साथ कम हैल्दी बिहैवियर जुड़ा हुआ है, जो हाइपरटैंशन, डायबिटीज और हाई कोलैस्ट्रौल आदि के लिए जिम्मेदार है.

फायदे और भी

तनाव की कमी: एक विवाहित की जिंदगी में तनाव की कमी नहीं रहती. बच्चों के जन्म से ले कर लालनपालन, शिक्षा और फिर रिश्तों को निभाने की जंग उन्हें मुश्किल में डाले रखती है. जबकि सिंगल लाइफ इन समस्याओं से दूर होती है.

– अविवाहित ज्यादा स्वस्थ रहते हैं. अध्ययनों के मुताबिक, सिंगल व्यक्ति अधिक ऐक्सरसाइज करते हैं. वे स्वयं को ज्यादा फिट रख पाते हैं.

– अध्ययनों में यह पाया गया कि शादी के बाद महिलाएं मोटी हो जाती हैं. जबकि अविवाहित महिलाएं बेहतर ढंग से अपनी फिगर और हैल्थ मैंटेन कर पाती हैं.

– महिलाएं जो सदैव अविवाहित रही हैं उन की ओवरऔल हैल्थ ज्यादा बेहतर रहती है. नैशनल हैल्थ इंटरव्यू की स्टडी में पाए गए निष्कर्षों के मुताबिक, अविवाहित महिलाएं बुखार या दूसरी आम बीमारियों के कारण बैड पर कम समय रहती हैं.

ज्यादा सामाजिक: शादी के बाद इनसान अपने दोस्तों और अभिभावकों से कम कनैक्टेड रह जाता है. यह सिर्फ तुरंत शादी के बाद ही नहीं वरन इस के कई सालों बाद भी यह स्थिति बनी रहती है.

– वे लोग जो सदैव अविवाहित रहे हैं, वे अपने दोस्तों, परिवार और पड़ोसियों से ज्यादा विनीत और उदार पाए गए, उन के बजाय जो विवाहित हैं.

– सिंगल लोगों के सिविक और्गनाइजेशंस के लिए वौलंटियर करने की संभावना ज्यादा होती है.

– पुरुषों पर की गई एक स्टडी के मुताबिक, विवाहित पुरुष वैसे काम कम करते हैं, जिन में मौद्रिक लाभ न छिपा हो.

– फ्रिन कौर्नवैल द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि सिंगल व्यक्ति विवाहितों की तुलना में अपने दोस्तों व रिश्तेदारों के साथ कम समय बिताते हैं. 2000 से 2008 के बीच 35 से ऊपर की आयु पर किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि पार्टनर के साथ रहने वाले लोग दोस्तों के साथ अपनी शामें नहीं बिता पाते.

– लोग सिंगल लोगों की कंपनी ज्यादा पसंद करते हैं, क्योंकि वे ज्यादा इंट्रैस्टिंग और फन लविंग होते हैं जबकि विवाहित अपनी पारिवारिक समस्याओं से त्रस्त नजर आते हैं. इसलिए उन की बातों में समस्याएं ज्यादा नजर आती हैं.

– सिंगल व्यक्ति अकेले ज्यादा वक्त बिता पाते हैं, इसलिए उन्हें अकेले में सोचने और खुद का साक्षात्कार करने का वक्त ज्यादा मिलता है. सिंगल लोगों को अकेलापन हासिल होता है, जो क्रिएटिविटी के लिए बहुत जरूरी है. हमारे बहुत से महान कलाकार और लेखकों ने इस एकाकीपन के फायदे पर काफी कुछ लिखा है.

– सिंगल व्यक्ति दुनिया को बदल रहे हैं. यूरोप, जापान, अमेरिका में अकेले रहने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. 50 सालों में यह बहुत बड़ा सामाजिक परिवर्तन है. यूएस सैंसस ब्यूरो के मुताबिक, 2012 में वहां की ऐडल्ट पौपुलेशन का करीब 47% अविवाहित था.

कुछ बातें, जिन्हें करने से सिंगल महिलाओं को बचना चाहिए :

टाइमटेबल फ्रेम कर के जीना

जिंदगी में कभी हम स्वयं तो कभी हमारे हितैषी हमारे लिए एक टाइमटेबल सैट कर देते हैं. इस उम्र में पढ़ाई, इस उम्र में शादी तो इस उम्र में बच्चे. वैसे तो जिंदगी में सब कुछ समय पर होना जरूरी है, मगर कई दफा इस तरह की अपेक्षाएं जिंदगी को बहुत ही रोबोटिक बना डालती हैं और यदि समय पर कुछ करने में सफल न हो पाएं तो मानसिक तनाव पैदा हो जाता है.

क्या करना चाहिए: स्वस्थ या पौजिटिव अपेक्षाएं तो स्वीकार कीजिए, मगर जिन पर हमारा वश नहीं उन की वजह से नैगेटिव सोच डैवलप करने से बचें. अपनी मैंटल अलार्म क्लौक को बंद कर दीजिए और वर्तमान में जीने का प्रयास कीजिए, जो हालात मिले हैं उन्हीं में बेहतरीन जिंदगी जीने का प्रयास करें. भविष्य की योजना तो बनाएं पर अपने आज को नजरअंदाज न करें. प्यार और शादी होनी है तो किसी भी उम्र में हो जाएगी, इन मामलों में स्वयं को स्वतंत्र छोड़ दें. फिर देखिए, जिंदगी खूबसूरत रूप में सामने आएगी.

साथ का इंतजार

कई महिलाएं जो स्काई डाइविंग, ट्रैवलिंग या दूसरे रोमांचक ट्रिप्स में रुचि रखती है, मगर सिर्फ इस वजह से निकलने में हिचकिचाती हैं, क्योंकि उन के साथ कोई नहीं. यह सच है कि प्रेमी या पति और बच्चों के साथ घूमने का मजा कुछ और होता है, मगर सिर्फ इस वजह से कि आप को अकेला घूमता देख कोई क्या सोचेगा, अपनी इच्छाओं को होल्ड पर रखना कतई समझदारी नहीं. जिंदगी बहुत छोटी है.

क्या करना चाहिए: आप सुरक्षाचक्र के बंधन से बाहर निकलें. कभीकभी सब से बेहतर अनुभव अपने हिसाब से कुछ करने से होता है. जब आप 10 लोगों के बीच होते हैं, तो आप एक घिसेपिटे अंदाज से व्यवहार करने को बाध्य होते हैं, मगर जब आप अपनी इच्छा से अकेले, अपने हिसाब से निकलती हैं तो आप वह सब कर पाती हैं, जो कभी न करतीं. ऐसा करना जरूरी भी है, क्योंकि इस से आप को अपनी क्षमताओं के बारे में पता चलता है.

स्वयं को पहचानें

प्रत्येक शख्स किसी खास मकसद के साथ इस दुनिया में आया है. यदि आप सिंगल हैं तो इस का तात्पर्य यह है कि संभवतया अकेले रह कर ही आप अपना मकसद पा सकती हैं. तभी आप की सोच और परिस्थितियां इस के अनुरूप हैं, यह भी हो सकता है कि आने वाले समय में आप स्वयं शादी के बंधन में बंध जाएं, मगर जब तक सिंगल हैं, अपने इस स्टेटस का पौजिटिव यूज करें. नैगेटिव न सोचें. ऐसी स्थिति में आप के पास सलाहों का अंबार लग सकता है. यह आप को सोचना होगा कि आप को सलाहों के हिसाब से अपनी जिंदगी जीनी है या अपनी शर्तों पर.

सपोर्ट नैटवर्क मजबूत बनाएं

हम सब की जिंदगी में दोस्त बहुत बड़े सपोर्ट सिस्टम का काम करते हैं. अपने सामाजिक दायरे को बढ़ाएं. पासपड़ोस, रिश्तेदार, कुलीग्स और दोस्तों के साथ मजबूत नैटवर्क कायम करें. फिर देखिए, आप को कभी अकेलेपन का एहसास नहीं होगा.

मस्ती भी करें

आप अकेली महिला हैं, तो इस का मतलब यह नहीं कि आप जिंदगी ऐंजौय न करें. उन कामों के लिए समय निकालें जो आप को खुशी देते हैं. रोमांटिक नौवल्स पढ़ें, मूवी देखें, लड़कियों के साथ मिल कर नाइट पार्टी करें, अपनी हौबी को समय दें, नियमित ऐक्सरसाइज करें, स्वयं को पैंपर करें, हर सप्ताह एक नए व्यक्ति से मिलने और परिचय बढ़ाने का नियम बनाएं. ग्रुप में ट्रैवलिंग के लिए निकलें, वूमंस कौन्फ्रैंस अटैंड करें. ग्रुप ट्रैवलिंग आप के लिए अच्छा जरीया हो सकता है, क्योंकि जब आप ग्रुप में ट्रैवल करती हैं तो नई जगहों के बारे में जानने के साथसाथ नए लोगों के बारे में भी जानती हैं.

हम ऐसा कतई नहीं कह रहे कि सिंगल लाइफ मैरिड लाइफ की तुलना में ज्यादा बेहतर है. वस्तुत: शादी करना गलत नहीं, मगर उस के साथ करना सही है, जिस के साथ आप कंफर्टेबल महसूस करती हों,  जो आप की भावनाओं को समझता हो, आप जैसी सोच रखता हो, जिस से आप प्यार करती हों.

जिंदगी ने हमें जो भी परिस्थिति दी है, उसे सकारात्मक रूप में देखें. क्योंकि जो वर्तमान में आप को मिला है, वह आप के लिए सब से अच्छा है. ये लमहे फिर लौट कर नहीं आएंगे. इन्हें लाइक कीजिए.

सास के साथ

आप जल्दीजल्दी नहाधो कर किचन में घुसती हैं और सब की पसंद की डिशेज बनाने लगती हैं, मगर पीछे से सास की चिकचिक भी आप लगातार सुन रही हैं. वे न तो आप के बनाने के सलीके से खुश हैं और न ही तैयार खाने से.

– सास का तीखा स्वर आप के कानों में पड़ता है कि कैसा जमाना आ गया है, अब तक बहू सो रही है और मुझे चाय बनानी पड़ रही है.

– आप औफिस जा कर भी अपनी सास की बातों को नहीं भूल पातीं. उन की बातें आप के कानों में गूंजती रहती हैं.

– घर जा कर आप को सास का भड़का चेहरा देखने को मिलता है. किचन जैसे की तैसी पड़ी है. आप सफाई और खाना बनाने में जुट जाती हैं. उधर बच्चा पूरा वक्त आप को डिस्टर्ब करता रहता है.

बिना सास के

आप आराम से उठ कर चाय बना कर पीती हैं. फिर अपना मनपसंद नाश्ता बनाती हैं. घर में मां हैं तो शानदार नाश्ता तैयार मिल जाता है.

– आप की अभी उठने की इच्छा नहीं है. अत: आप करवट बदल कर फिर से सो जाती हैं.

– औफिस जा कर आप सुकून के साथ अपना काम करती हैं.

– आप घर जाती हैं तो मम्मी ने खाना बना कर रखा है. होस्टल में हैं या फ्रैंड के साथ रूम ले कर रह रही हैं तो भी नजारा बहुत अलग होगा.

2010 में प्रकाशित, प्यू रिसर्च रिपोर्ट के निष्कर्ष काफी रोचक हैं. इस नैशनल सर्वे में सिंगल लोगों से की गई बातचीत के आधार पर पाया गया कि इन में से केवल 46% लोग ही शादी करने के इच्छुक थे. 25% लोगों ने कहा कि वे शादी करना ही नहीं चाहते, क्योंकि उन्होंने अपनी इच्छा से अकेले रहने का निर्णय लिया है. बाकी के 29% लोग इस बारे में दुविधा में थे कि वे मौका मिलने पर शादी करेंगे या नहीं.एक नजर विवाहित और अविवाहित महिला की जिंदगी पर

विवाहिता की दिनचर्या

सुबह 6.00 बजे

बच्चे को चुप कराने के चक्कर में आप सो नहीं पाईं. बच्चे ने बिस्तर गंदा कर रखा है. न चाहते हुए भी आप को उठना पड़ता है.

सुबह 6.30 बजे

– आप बच्चे को थोड़ी देर और सुलाना चाहती हैं, मगर वह सोने को तैयार नहीं. जाहिर है, आप भी बिस्तर छोड़ कर फ्रैश होने चली जाती हैं.

सुबह 7.00 बजे

– आप ने आज नाश्ते में आलू के परांठे बनाए हैं. मगर बड़ी बेटी परांठे खाने को तैयार नहीं. वह चाउमिन की रट लगाए बैठी थी.

सुबह 8.00 बजे

आप नहाने जा रही हैं और टब में पानी भर कर आती हैं. कपड़े ले कर अंदर घुसती हैं तब तक छोटू टब में साबुन डाल देता है.

सुबह 9.00 बजे

– आप तेजी से सीढि़यां चढ़ कर जा रही हैं. मगर आप ने यह नहीं देखा कि बच्चे ने वहां तेल गिरा रखा है. आप फिसल कर गिर पड़ती हैं.

सुबह 10.00 बजे

बच्चे को चुप करा कर आप मेकअपरूम में आती हैं. मगर वहां सारा मेकअप का सामान इधरउधर बिखरा पड़ा है.

पूरा दिन

– आप पूरा दिन बच्चे और घर के टैंशन में हैं कि कैसे जल्दी घर पहुंचें और बच्चे को संभालें.

शाम 6.30 बजे

– आप जल्दी से किचन में घुस जाती हैं. आप सब्जी काट रही हैं और बच्चा कटी सब्जी फेंक रहा है, बरतन इधरउधर फेंक रहा है. आधे घंटे के काम में 1 घंटा लग जाता है.

संडे

आप ने कहीं घूमने का प्रोग्राम तय किया, मगर बच्चा वहां जाने को तैयार नहीं. वह जू में जाने की जिद कर रहा है.

 

अविवाहिता की दिनचर्या

सुबह 6.00 बजे

सुबह उठ कर आप ने घड़ी देखी और करवट ले कर फिर सो गईं. उठने की कोई हड़बड़ी नहीं है.

सुबह 6.30 बजे

– अभी आप ने अपनी नींद तोड़ी है. उठ कर फिर सोने का जो मजा है, उसे कैसे छोड़ सकती हैं.

सुबह 7.00 बजे

– आप आराम से सो कर उठीं और तकिया दूर फेंका. फिर रात को देखा हुआ सपना याद कर मुसकराने लगीं.

सुबह 8.00 बजे

आप अपना बिस्तर और कमरा ठीक करने के बाद नहाने चली जाती हैं. इस बीच मां ने गीजर औन कर दिया है.

सुबह 9.00 बजे

– आप जब तक नहा कर निकलती हैं, तब तक मम्मी या रसोइए ने नाश्ता तैयार कर रखा होता है.

सुबह 10.00 बजे

आप अपनी स्कूटी निकालती हैं और अपनी सहेली को साथ ले कर औफिस के लिए निकल जाती हैं.

पूरा दिन

– पूरी तत्परता के साथ दिन भर औफिस का काम करती हैं और दोस्तों के साथ हंसीमजाक में भी शरीक होती रहती हैं.

शाम 6.30 बजे

– आप आराम से शाम को अपनी सहेली के घर से खा कर लौटती हैं या घर जा कर चायनाश्ते के बाद किचन में मां की सहायता करती हैं, फिर टीवी पर मनचाहा प्रोग्राम देखने लगती हैं.

संडे

आप अपनी इच्छानुसार दोस्तों के साथ मूवी और शौपिंग का प्रोग्राम बनाती हैं. फिर डिनर कर के घर लौटती हैं.

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बहुत जरूरी है प्रोफैशनल होना

सफल प्रोफैशनल वह है जो अपनी जौब के प्रति वफादार हो और अपने सहयोगियों की टीम को साथ ले कर चले. जौब हासिल करने व कैरियर में कामयाब होने के लिए सिर्फ अच्छी एजुकेशन ही काफी नहीं है, बल्कि इस के लिए आप का प्रोफैशनल होना भी बहुत जरूरी है, ताकि आप खुद को अपनी जौब के लिए योग्य साबित कर सकें.

महेश और सुरेश दोनों एक ही कंपनी में, एक ही पद पर कार्यरत थे. महेश जहां प्रगति की सीढि़यां चढ़ता गया वहीं सुरेश की पदोन्नति नहीं हुई. उसे अपने पुराने पद पर ही बना रहना पड़ा. महेश की कामयाबी के पीछे उस का बेहतर प्रोफैशनल होना था. किसे कहते हैं बेहतर प्रोफैशनल? आइए जानते हैं.

– बेहतर प्रोफैशनल वही हो सकता है जिस में सभी क्लालिटीज हों. समय पर औफिस आना और समय पर काम पूरा करना एक अच्छे प्रोफैशनल की निशानी है.

– जो विषम परिस्थितियों में भी घबराता न हो. अपना काम सही ढंग से करता हो. हर परिस्थिति में दूसरों की बातें सुनता हो और किसी को नीचा दिखाए बिना अपनी बात सामने रखता हो.

– प्रोफैशनल वह है जो भारत में फैल रही धर्म और जाति के चक्कर में हेट कौंसपिरैंसी का हिस्सा न बने और हरेक को बराबर की जगह दे, बराबर का मौका दे.

– अच्छा प्रोफैशनल वह है जो चुनावों में तो भाग ले पर न अंधपूजन में लगे और न पूजा पर्यटन का शिकार बने.

– जो अपने कार्यों को सूचीबद्ध तरीके से करता हो. औफिस में अपना समय ठीक तरह से मैनेज करता हो और दूसरों को भी इस ओर प्रेरित करता हो.

– जो दबाव में भी अपना मानसिक संतुलन न खोता हो. साथ ही, अपने काम की समयसीमा का भी ध्यान रखता हो तथा टालमटोल की आदत से बचता हो.

– जो अपनी जिम्मेदारियां और कंपनी के नियमकायदे की जानकारी रखता हो. अनुशासन में रह कर खुद भी व अपने सहयोगियों को भी अनुशासन की सीख देता हो. कंपनी व अपनी प्रगति के लिए प्रयत्नशील हो.

– जो अच्छे या बुरे दोनों हालात में काम करना जानता हो. अपनी जिम्मेदारियां सम?ाता हो.

– जो अच्छेबुरे सभी को साथ ले कर चलता हो. सभी के हितों की बात करते हुए आगे बढ़ता हो. अपना गुस्सा दूसरों पर न निकालता हो और सभी के कामों में सा?ोदारी करता हो.

– जो दूसरों की समस्याएं सुनता हो और उन्हें निबटाने में विशेष रुचि लेता हो. सभी की बातों को तवज्जुह देता हो. एक प्रोफैशनल द्वारा दूसरे सहयोगियों की बात सुनने का मतलब है कि अगर दूसरों से अच्छा आइडिया मिलता है, तो वह उसे स्वीकार करते हुए अमल में लाए.

– प्रोफैशनल के लिए प्रगति का मार्ग सदैव खुला रहता है. वह अपने मकसद में कामयाब होता है. कभी भी काम की कठिनाइयों से घबराता नहीं. वह काम को सरल करने की कोशिश में रहता है.

– जो अपनी कार्यकुशलता व व्यवहार से दूसरों को भी आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता हो. नएनए विचार सब को देता हो और उन्हें काम करने के लिए प्रेरित करता हो.

आप भी यदि अपनी जौब में कामयाब होना चाहते हैं तो एक अच्छे प्रोफैशनल की तरह काम करने की आदत डालें क्योंकि बिना इस के प्रगति संभव नहीं है.    –

पूरी बौडी का मेकअप भी जरूरी

खूबसूरती तभी पूर्ण कहलाती है जब यह नख से शिख तक हो, यानी आप सिर से ले कर पैरों के नाखून तक सुंदर हों. आप के बौडी का हर हिस्सा आकर्षक हो. चेहरे की सुंदरता पर तो हर कोई ध्यान देता है. हमारे पास चेहरे का मेकअप करने के लिए तरहतरह के सौंदर्य प्रसाधन भी उपलब्ध हैं. लेकिन क्या यह जरूरी नहीं कि चेहरे के साथसाथ शरीर के उन अंगों को भी निखारें जो आप के चेहरे की खूबसूरती में चारचांद लगाते हैं. यानी आप पूरी बौडी के मेकअप का खयाल रखें. इस से आप का पूरा व्यक्तित्व आकर्षक दिखेगा.

इस के लिए आप को 2 स्टैप्स में आगे बढ़ना होगा. पहले स्टैप में पूरी बौडी के अलगअलग हिस्सों की साफसफाई और सेहत का खयाल रखना होगा और दूसरे स्टैप में अपने हर अंग के शृंगार पर ध्यान देना होगा.

पहला स्टैप – पूरी बौडी की सफाई जरूरी

1. अंडरआर्म्स

चेहरे की सुंदरता के साथ अंडरआर्म्स को निखारना भी बेहद जरूरी है. आप के संपूर्ण व्यक्तित्व की खूबसूरती में इस का योगदान आप नकार नहीं सकते. मान लीजिए, आप ने एक खूबसूरत सी स्लीवलैस ड्रैस खरीदी है, मगर यदि आप के अंडरआर्म्स ब्लैक हैं तो इस ड्रैस की खूबसूरती उस कालेपन की भेंट चढ़ जाएगी. इसलिए सावधान रहें और अंडरआर्म्स की खूबसूरती का भी ध्यान रखें.

आप को एक अच्छे स्क्रबर का इस्तेमाल कर समयसमय पर उस जगह की सफाई करनी चाहिए. इस से न सिर्फ आप के अंडरआर्म्स में निखार आएगा बल्कि आप गरमी में भी स्लीवलैस ड्रैस पहन कर अपनी ओवरआल खूबसूरती में इजाफा कर सकती हैं.

2. गरदन और पीठ

ठीक तरह से साफसफाई न होने की वजह से अकसर गरदन काली होने लगती है जो आप के चेहरे की खूबसूरती को खराब कर सकती है. इसलिए चेहरे के साथसाथ गरदन और पीठ की सफाई एवं खूबसूरती पर भी ध्यान देना चाहिए.
कम से कम हफ्ते में एक बार गरदन और पीठ पर स्क्रबिंग करना चाहिए. आप घर पर मौजूद संतरे के छिलके का पाउडर, चोकर, मोटा बेसन, चीनी, नारियल का तेल और गुलाबजल जैसी चीजों को मिला कर स्क्रब तैयार कर सकते हैं. गरदन के ऊपर की त्वचा चेहरे की त्वचा की तरह ही कोमल और नाजुक होती है. इस के लिए आप को वही क्रीम लगानी चाहिए जो आप अपने चेहरे पर प्रतिदिन लगाती हैं.

3. पैर और हाथ

अपने पैरों की सफाई पर ध्यान दें. इस के लिए फुट स्पा एक बेहतरीन उपाय है. इस में आप के पैरों को बबलिंग स्पा मशीन में डाल कर पैरों की धुलाई और ब्रशिंग की जाती है. फुट स्पा से आप के पैरों की मृत त्वचा हट जाती है और आप के पैर मुलायम व कोमल हो जाते हैं. बाद में पैरों की मसाज भी की जाती है.
अगर आप के पैरों के नाखून बड़े हैं तो उन्हें क्लिपर से काट कर फौइल के जरिए सही और खूबसूरत आकार दें. कभीकभी पैरों की त्वचा रूखी और पपड़ीदार होने के कारण नाखूनों के आसपास अतिरिक्त पपड़ी जमा हो जाती है. इस रूखी त्वचा को नेलनिपर की सहायता से नाखूनों के आसपास से काट लें ताकि आप के नाखून भद्दे और काले न दिखाई पड़ें. क्लीनिंग के बाद अपने पैरों की त्वचा और नाखूनों पर किसी अच्छी कंपनी का मौइस्चराइजर व फुट क्रीम लगा कर उन्हें मुलायम और चमकदार बना लें.
अपनी एडि़यों का भी खयाल रखें. इस के लिए सोने से पहले एक टब में गुनगुना पानी ले कर उस में एसैंशियल औयल डाल दें. अब इस पानी में अपने पैरों को 15 मिनट तक डुबोए रखें. इस से आप के पैरों की त्वचा कोमल हो जाएगी. प्यूमिकसटोन से एडि़यों को रगड़ कर साफ करें. ऐसा करने से पैरों की बेजान त्वचा निकल जाएगी और आप के पैर साफ व सुंदर नजर आएंगे.

4. कुहनी और घुटने

आप का चेहरा कितना भी खूबसूरत क्यों न लगे लेकिन अगर आप के हाथों की कुहनियां और घुटने काले नजर आएंगे तो फिर चेहरे की चमक फीकी पड़ जाएगी. इसलिए चेहरे की तरह ही अपनी कुहनियों और घुटनों पर भी स्क्रब करना चाहिए.
इस के लिए आप नीबू का भी इस्तेमाल कर सकती हैं. इस के बाद क्रीम या फाउंडेशन का इस्तेमाल कर इन्हें और भी खूबसूरत बना सकती हैं. काली हो चुकी कुहनियों पर व्हाइटनिंग क्रीम लगाएं.

5. पेट

इस पार्ट को हमेशा साफ व नम रखें. एक गीली रुई की सहायता से आप अपनी नाभि को साफ कर सकती हैं. साथ ही, एक माइल्ड क्रीम ले कर अपने पेट पर लगाएं जिस से उस पार्ट की नमी बनी रहे.

6. उंगलियां

पतली, मुलायम, नाजुक उंगलियां भला किसे अच्छी नहीं लगतीं. इस के लिए आप को थोड़ा समय देना होगा. बादाम के तेल में समान मात्रा में शहद मिला कर नाखून और क्यूटिकल्स पर मालिश करें.
इसे 15 मिनट के लिए छोड़ दें और एक नम तौलिए से पोंछ लें. 3 बड़े चम्मच गुलाबजल में एक चम्मच ग्लिसरीन मिलाएं. हाथों और पैरों पर लगाएं और आधे घंटे के लिए छोड़ दें. फिर सादे पानी से धो लें.

दूसरा स्टेप – पूरी बौडी का मेकअप

कुछ यों करें

शरीर के दूसरे हिस्सों, जैसे पेट, कमर, बैक, बाजू, टांगें आदि का खयाल रखना और मेकअप करना भी जरूरी है. शरीर के पूरे खुले पार्ट्स पर आप बेस के रूप में वही लगाते हैं जो चेहरे पर लगाते हैं. यानी आप फाउंडेशन या क्रीम का प्रयोग कर सकती हैं ताकि आप के पूरे शरीर का रंग एकसार और आकर्षक दिखे.
शरीर के सभी खुले हिस्सों पर फाउंडेशन के अलावा टू वे केक भी लगा सकती हैं. टू वे केक से स्पंज को गीला कर के पूरी बौडी पर प्रयोग करें. इसी तरह सारी बौडी के लिए आप बौडी शिमर का इस्तेमाल कर सकती हैं जिस से टांगें वगैरह भी चमक उठती हैं. यह शाइनी होता है और सुंदर लगता है.

1. टैटू से सजाएं बौडी

इस संदर्भ में मेकअप एंड ब्यूटी एक्सपर्ट भारती तनेजा बताती हैं, ‘‘नैक, लैग्स, बैक, पेट, कमर, बाजू इत्यादि पर टैटू बनवा सकती हैं. टैटू प्रिंट भी करा सकती हैं या पेंट भी करा सकती हैं. टैटू चेंज भी कर सकती हैं. आप टैंपरेरी टैटू बनवाती हैं तो अपने हिसाब से इसे रोज नया रूप दिलवा सकती हैं. सैमी परमानैंट इंक से आप 5-7 दिनों के लिए टैटू बनवा सकती हैं.’’

टैटू 3 तरह के होते हैं. एक परमानैंट टैटू होता है जो सारी उम्र के लिए होता है. सैमी परमानैंट टैटू 5-7 दिनों के लिए बनते हैं और टैंपरेरी एक दिन में ही क्लीन हो सकते हैं. इस पर फिक्ंिसग करा ली जाए तो यह टैपररी टैटू भी फिर लंबा चलते हैं. टैटू बनवाने का खर्च 4-5 हजार से लाखों रुपए तक भी हो सकता है.
आजकल लोग अपने शरीर पर तरहतरह की पेंटिंग भी कराते हैं. कुछ लोग पूरे शरीर को पेंट करा लेते हैं. इस से इंसान काफी हौट और सैक्सी लगता है. बौडी पेंटिंग एयरब्रश से बहुत अच्छी होती है. कलर अच्छे से उभरते हैं.

2. पियर्सिंग एक अनोखा औप्शन

जीभ, मुंह, चिन, नैक, नाभि, कान, गरदन, आईब्रोज, नाक के सैंटर में या फिर लिप्स पर भी पियर्सिंग कराई जा सकती है. यह सालों चलता है. देखने में स्टाइलिश और यूनीक सा लगता है.
पियर्सिंग का खर्च मैटेरियल पर भी निर्भर करता है. गोल्ड, सिल्वर या प्लैटिनम में पियर्सिंग कराना अच्छा रहता है क्योंकि यह बौडी और स्किन के साथ रिऐक्शन नहीं करता. मगर ये महंगे होते हैं. जबकि आर्टिफिशियल पियर्सिंग सस्ते होते हैं मगर ये स्किन के साथ रिऐक्ट कर सकते हैं.

3. क्लीवेज के लिए कलर

अगर किसी लड़की का क्लीवेज बहुत हलका है या नहीं है तो ब्राउन कलर से पेंट कर हैवी क्लीवेज भी दिखाया जा सकता है. ब्रश से कंटूर या आईशैडो लगाने से आप क्लीवेज का आभास दिला सकती हैं. इस से आप का लुक ज्यादा आकर्षक नजर आता है.

4. मेहंदी

पुराने जमाने में मेहंदी का प्रयोग कर स्त्रियां अपना शृंगार करती थीं जो आज तक कायम है. हाथों से ले कर ऊपर बाजू तक और फिर कमर से ले कर नीचे पैरों तक मेहंदी लगाई जाती है.

5. फूलों से मेकअप

पुराने समय में महिलाएं फूलों से अपने बौडी का शृंगार किया करती थीं. फूलों की महक माहौल को नशीला बना देती थी. महिलाएं जहां से गुजरती थीं, एक आकर्षक महक उठती थी. आज भी भारत में कई इलाकों में खासकर दक्षिण भारत में फूलों से शृंगार करने का रिवाज है. ये सस्ते भी होते हैं और खूबसूरत भी लगते हैं.

6. नेल पेंट

महिलाओं के हाथों को और अधिक खूबसूरत बनाने में नेल पौलिश या नेल पेंट महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. अपने हाथपैरों के नाखूनों को सजाने का सब से खूबसूरत तरीका नेल पेंट लगाना ही है. आजकल स्पार्कल और शिमर वाले नेल पेंट भी आ गए हैं जो अलग सा पार्टी लुक देते हैं. आजकल नेलआर्ट का भी काफी चलन है.

भारत में टिपिंग सिस्टम 

देश भर के रेस्तरां भी अपनेआप को खास कहते हैं, खाने के बिल के साथ 10′ सॢवस चार्र्ज भी जोड़ते हैं. जीएसटी से पहले यह चार्ज बिना सेल्स टैक्स के होता था पर जीएसटी के बाद उस पर टैक्स भी देना होता है. जीएसटी वाले इसे खाने की कीमत मानते है. सरकार का कंज्यूमर मंत्रालय कहता है कि यह अनावश्यक है क्योंकि सॢवस कैसी भी हो, उस पर चार्ज जबरन वसूलना गलत है.

सरकार ने आदेश दिया है कि रेस्तरां यह चार्ज लगाना बंद  करें पर रेस्तरां मालिकों में से कुछ ठीठ हैं और उन्होंने बाहर ही बोर्ड लगा दिया है कि सॢवस चार्ज तो लगेगा. सॢवस चार्र्ज के बाद टिव न देनी होती तो बात दूसरी होती पर इन रेस्तरांओं में वेटर इस मुद्रा में खड़े हो जाते हैं कि मोटी रकम खर्च कर के जाने वाला काफी कुछ छोड़ जाता है.

असल में टिपिंग  का सिस्टम ही गलत है चाहे यह टैक्सी में हो, जोमाटो या स्वीगी में हो या एयरपोर्ट पर व्हीलचेयर चलाने वाले के हो. अगर एंपलायर नौकरी का वेतन दे रहा हो तो टिपिंग  अपनेआप में गलत ही नहीं जुलह है. यह देनी और लेने वालों दोनों के लिए गलत है. देने वाला अपनेआप को राजा समझने लगता है और लेने वाले को भिखारी. दूसरी तरफ लेने वाला की सैल्फ एस्टीक कम होती है जब वह आशा से अधिक टिप्प पा कर ज्यादा जोर से सलाम मारता है.

टिपिंग  असल में राजाओं रजवाड़ों की छोड़ी गई प्रेक्टिस है. टिप लेने वाला खुशीखुशी जाए घर भावना ही गलत है. उसे तो खुशी इस बात की होनी चाहिए उस ने अच्छी सेवा दी. उस की असली टिप तो ग्राहक की संतुष्टि है. बहुत बार टिप देने के बाद भी लेने वाले के माथे पर बल पड़े रहते हैं और देने वाले को लगता है कि नाहक ही खर्च किया.

जहां सॢवस अच्छी न हो, वहां िटिपिंग  का फर्क नहीं पड़ता. अगर न ही जाए तो भी तो तय हुआ है या जो रेट है वह पैसा तो देना ही होगा ही. रेस्तरां में चम्मच गंदे थे, चाय प्लेट में छलकी थी, खाना देर से आया था, टैक्सी में ड्राइवर किसी से रास्ते भर मोबाइल पर झगड़ता रहा या अपने म्यूजिक का वैल्यूम तेज रखे रखा, टिप न देने से भी जो खीख है वापिस नहीं मिलेगा. यह भी कोई गारंटी नहीं कि सेवा देने वाला अगले ग्राहक को टिप न देने या अच्छी सेवा देगा क्योंकि यह तो उस की आदत बन चुकी है.

जापान में टिपिंग बिलकुल नहीं दी ली जाती. अब अच्छे रेस्तरां होटल ‘नो टिपिंग  प्लीज’ बोर्ड लगाने वाले है. वे नहीं चाहते कि टिप के बंटबारे पर वर्कस में झगड़ा है. मंत्रालय जो वहा वह सही है पर सरकार की सलाह गलत है क्योंकि सरकार तो वैसे ही बिना सेवा दिए मोटी कीमत वसूलने की आदी है और उस के कर्मचारी रिश्वत के तौर पर मोटी टिप जबरन ले लेते हैं.

दोहरा चरित्र- भाग 2

वह अनजान बनने की कोशिश करने लगा.

‘‘मासूम बन कर सुनीता को बरगलाओ, मुझे नहीं. मैं पुरुषों की नसनस से वाकिफ हूं. पिछले एक हफ्ते से नैपकिन लाने के लिए कह रही हूं, लाए?’’

‘‘मैं भूल गया था.’’

‘‘आजकल तो सिर्फ सुनीता की जरूरतों के अलावा कुछ याद नहीं रहता है तुम को.’’

‘‘बारबार उस का नाम मत लो. वरना…’’ सुधीर ने दांत पीसे. बात बढ़ती देख वह कमरे से बाहर निकल गया.

कायर पुरुषों की यही पहचान होती है. वे मुंह छिपा कर भागने में ही भलाई समझते हैं. सुधीर अपनी मां के कमरे में आया.

‘‘बहुत बदतमीज है,’’ मेरी सास बोलीं, ‘‘चार दिन के लिए आई है उसे भी चैन से रहने नहीं देती. वह क्या सोचेगी,’’ सिर पर हाथ रख कर वे बैठ गईं. न जाने क्या सोच कर वे थोड़ी देर बाद मेरे कमरे में आईं.

‘‘क्यों बहू, तुम्हारे संस्कार यही सिखाते हैं कि अतिथियों के साथ बुरा सलूक करो?’’

‘‘आप का बेटा अपनी पत्नी के साथ क्या कर रहा है, क्या आप ने जानने की कोशिश की?’’

‘‘क्या कर रहा है?’’

‘‘क्या नहीं कर रहा है. कुछ भी तो नहीं छिपा है आप से. सुनीता को सिरमाथे पर बिठाया जा रहा है. वहीं मेरी तरफ ताकने तक की फुरसत नहीं है किसी के पास.’’

‘‘यह तुम्हारा वहम है.’’

‘‘हकीकत है, मांजी.’’

‘‘हकीकत ही सही. इस के लिए तुम जिम्मेदार हो.’’

‘‘सुनीता को मैं यहां लाई?’’

‘‘बेवजह उसे बीच में मत घसीटो. तुम अच्छी तरह जानती हो कि पतिपत्नी के बीच रिश्तों की डोर औलाद से मजबूत होती है.’’

‘‘तो क्या यह संभावना सुनीता में देखी जा रही है?’’

‘‘बेशर्मी कोई तुम से सीखे.’’

‘‘बेशर्म तो आप हैं जो अपने बेटे को शह दे रही हैं,’’ मैं भी कुछ छिपाने के मूड में नहीं थी.

‘‘ऐसा ही सही. तुम्हें रहना हो तो रहो.’’

‘‘रहूंगी तो मैं यहीं. देखती हूं मुझे कोई मेरे हक से कैसे वंचित करता है,’’ अतिभावुकता के चलते मेरी रुलाई फूट गई. बिस्तर पर लेटेलेटे सोचने लगी, एक मैं थी जो यह जानते हुए भी कि सुधीर विकलांग है उसे अपनाना अपना धर्म समझा. वहीं सुधीर, मेरे बांझपन को इतनी बड़ी विकलांगता समझ रहा है कि मुझ से छुटकारा पाने तक की सोचने लगा है. इतनी जल्दी बदल सकता है सुधीर. यह वही सुधीर है जिस ने सुहागरात वाले दिन मेरे माथे को चूम कर कहा था, ‘यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे तुम जैसे विशाल हृदय वाली जीवनसंगिनी मिली. मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूं कि कभी अपनी तरफ से तुम्हें शिकायत का मौका नहीं दूंगा,’ आज सुधीर इतना गिर गया है कि उसे रिश्तों की मर्यादाओं का भी खयाल नहीं रहा. माना कि दूर के रिश्ते की मामी की लड़की है सुनीता, पर जब नाम दे दिया तो उसे निभाने का भी संस्कार हर मांबाप अपने बच्चों को देते हैं. पता नहीं, मेरी सास को क्या हो गया है कि सब  जानते हुए भी अनजान बनी हैं.

पापा की तबीयत ठीक नहीं थी. भैया ने बुलाया तो मायके जाना पड़ा. एक बार सोचा अपनी पीड़ा कह कर मन हलका कर लूं पर हिम्मत न पड़ी. पापा तनावग्रस्त होंगे. पर भाभी की नजरों से मेरी पीड़ा छिप न सकी. वे एकांत पा कर मुझ से पूछ बैठीं. पहले तो मैं ने टालमटोल किया. आखिर कब तक? मेरी हकीकत मेरे आंसुओं ने बेपरदा कर दी.

रात भैया से उन्होंने खुलासा किया. वे क्रोध से भर गए. उन का क्रोध करना वाजिब था. कोई भाई अपनी बहन का दुख नहीं देख सकता. रात ही वे मेरे कमरे में आने वाले थे पर भाभी ने मना कर दिया.

सुबह नाश्ते में उन्होंने सुधीर का जिक्र छेड़ा.

‘‘तू अब उस के पास नहीं जाएगी. फोन लगा मैं उस बेहूदे से अभी बात करता हूं.’’

मैं ने किसी तरह उन्हें मनाया.

1 महीना रह कर मैं जब वापस भरे मन से ससुराल जाने लगी तो भाभी मुझे सीने से लगाते हुए बोलीं, ‘‘दीदी, चिंता की कोई जरूरत नहीं. आप के लिए इस घर के दरवाजे हमेशा के लिए खुले हैं. भाभी को मां का दरजा यों ही नहीं दिया गया है. मैं खुद नहीं खाऊंगी पर आप को भूखा नहीं रखूंगी. यह मेरा वादा है. नहीं पटे तो निसंकोच चली आइएगा.’’

‘‘मैं कोशिश करूंगी भाभी कि मैं उसे सही रास्ते पर ले आऊं,’’ भरे कंठ से मैं बोली.

ससुराल में आ कर जो दृश्य मैं ने देखा तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई. सुनीता की मांग में सिंदूर भरा था. तो क्या सुधीर ने सुनीता से शादी कर ली? सोच कर मैं सिहर गई. मैं तेजी से चल कर अपने कमरे में आई. देखा सुधीर लेटा हुआ था. उसे झकझोर कर उठाया.

‘‘यह मैं क्या देख रही हूं. सुनीता की शादी कब हुई? कौन है उस का पति?’’ पहले तो सुधीर ने नजरें चुराने की कोशिश की पर ज्यादा देर तक हकीकत पर परदा न डाल सका. बेशर्मों की तरह बोला, ‘‘तुम जो समझ रही हो वह सच है.’’

‘‘सुनीता से तुम ने शादी कर ली?’’

‘‘हां.’’

‘‘मेरे रहते हुए तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?’’

‘‘तुम इसे चाहे जिस रूप में लो पर यह अच्छी तरह जानती हो कि मुझे अपना बच्चा चाहिए.’’

‘‘मेरी सहमति लेना तुम ने मुनासिब नहीं समझा.’’

‘‘क्या तुम देतीं?’’

‘‘हो सकता था मैं दे देती.’’

सुन कर सुधीर खुश हो गया, ‘‘मुझे तुम से यही उम्मीद थी,’’ कह कर जैसे ही सुधीर ने मेरे करीब आ मुझे अपनी बांहों में भर कर प्यार जताने का नाटक दिखाना चाहा, मैं ने उसे झटक दिया. मेरे क्रोध की सीमा न रही. मुझ से न रोते बन रहा था न हंसते. किसी तरह खुद को संभाला. अब जो हुआ उसे बदला तो नहीं जा सकता था. वैसे भी हमेशा पुरुषों की चली है. लिहाजा, मैं ने परिस्थिति से समझौता करना मुनासिब समझा. फिर भी सुधीर को औकात बताने से न चूकी.

‘‘सुधीर, तुम अच्छी तरह जानते हो कि बांझ शब्द एक स्त्री के लिए गाली से कम नहीं होता. फिर उस स्त्री के लिए तो और ज्यादा जो इस कलंक के साथ अभिशापित जीवन जीने के लिए मजबूर हो. मुझे दुख इस बात का नहीं है कि तुम ने सुनीता से शादी की, दुख इस बात का है कि तुम ने मेरी पीठ में छुरा भोंका. मेरे विश्वास का कत्ल किया. यही काम तुम मुझे विश्वास में ले कर कर सकते थे.

‘‘सुधीर, अगर तुम्हारी विकलांगता को खामी समझ कर मैं ने तुम से शादी से इनकार कर दिया होता तो तुम मुझे किस रूप में लेते?’’

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