दोहरा चरित्र- भाग 3

सुधीर ने कोई जवाब नहीं दिया. मुझे लगा मैं ने व्यर्थ का सवाल उठा दिया. जिस का चरित्र दोगला हो वह भला यह सब सोचविचार क्यों करेगा? खैर, यह समाचार मेरे मायके तक पहुंचा. भैया मेरी ससुराल आते ही गरजे, ‘‘कहां है सुधीर, मैं उसे बरबाद कर के छोड़ूंगा. सरकारी कर्मचारी हो कर भी उस की हिम्मत कैसे हुई दूसरी शादी करने की?’’

मैं ने भैया को किसी तरह शांत करने की कोशिश की.

‘‘मैं चुप रहने वाला नहीं. पुलिस में रिपोर्ट करूंगा. इस के अफसरों से शिकायत करूंगा. दरदर की ठोकर न खिलवाई तो मेरा नाम नहीं.’’

सुधीर चुपके से निकल कर बाहर चला गया. मेरी सास आईं, ‘‘भड़ास निकाल ली. अब मेरी भी सुनिए. सुनीता बिन बाप की बेटी थी. सुधीर ने सिर्फ सहारा दिया है,’’ वे बोलीं.

‘‘अपनी बेशर्मी को सहारे का नाम मत दीजिए. एक को सहारा दिया और दूसरे को बेसहारा किया,’’ भैया ने व्यंग्य किया.

‘‘आरती को क्या किसी ने घर से जाने के लिए कहा है?’’ सास बोलीं.

‘‘निकल ही जाएगी,’’ भैया बोले.

‘‘उस की मरजी. पर न मैं चाहूंगी न ही सुधीर कि वह इस घर से जाए. उस का जो दरजा है वह बना रहेगा.’’

‘‘मुझे बहलाने की कोशिश मत कीजिए,’’ भैया मेरी तरफ मुखातिब हुए, ‘‘आरती, तुम सामान बांधो. अब मैं तुम्हें यहां एक पल भी न रहने दूंगा.’’

‘‘नहीं भैया, मैं ससुराल छोड़ने वाली नहीं. आज भी हमारा समाज किसी ब्याहता को मायके में स्वीकार नहीं करता,’’ मैं कहतेकहते भावुक हो गई, ‘‘मैं ससुराल की चौखट पर ही दम तोड़ना पसंद करूंगी मगर मायके नहीं जाऊंगी.’’

भैया की भी आंखें भर आईं. रूढि़वादी समाज से क्या लड़ना आसान है? गोत्र के नाम पर पतिपत्नी को भाईबहन बता दिया जाता है. ऐसे जड़ समाज से परिवर्तन की उम्मीद करना रेगिस्तान में पानी तलाशने जैसा है.

भैया की चरणधूलि लेते समय मैं ने उन्हें वचन दिया कि मैं कमजोर औरत नहीं हूं. अपने अस्तित्व के लिए कमजोर नहीं पड़ूंगी. फिर भी उन्होंने मुझे इस के लिए आश्वस्त किया कि जब चाहोगी तुम्हारे लिए मायके के दरवाजे हमेशा के लिए खुले रहेंगे.

भैया के जाने के 2 घंटे बाद सुधीर आया. आते ही हेकड़ी दिखाने लगा. मैं ने भी जता दिया कि वह अपनी औकात में रहे. सुधीर ने मुझे अलग रहने के लिए एक फ्लैट खरीद कर दिया. पहले तो मैं ने सोचा कि यहीं रह कर अपने हक के लिए लड़ती रहूंगी. कभी उस के खिलाफ कोर्ट भी जाने की इच्छा हुई पर यह सोच कर कदम पीछे कर लेती कि उस से फायदा क्या होगा? बहुत हुआ उस की नौकरी जाएगी. जेल जाएगा. वह हर महीने मुझे इतने रुपए दे जाता था कि मेरा खर्च आसानी से चल जाता. सुनीता पर दया आती, सो अलग. उसे मेरी सास और सुधीर ने बरगलाया. बहरहाल, जो हुआ उसे मैं ने नियति का चक्र मान कर स्वीकार कर लिया. मैं ने समय काटने के लिए एक स्कूल में नौकरी कर ली.

समय धीरेधीरे सरकने लगा. सुधीर से मेरा संबंध सिर्फ महीने के खर्च लेने के अलावा कुछ नहीं रहा. सुनीता के मोहपाश में बंधे सुधीर को मेरी कोई फिक्र न थी, न ही मुझे ऐसे आदमी से कोई ताल्लुक रखना था. एक दिन उस ने बड़े भरे मन से खुलासा किया, ‘मेरे जीवन में बाप बनना ही नहीं लिखा है.’ जिस स्वर में उस ने कहा मुझे उस से सहानुभूति हो गई. जो भी हो वह मेरा पति है. चाहती तो व्यंग्यबाण से उस का हृदय छलनी कर सकती थी पर पीछे लौट कर मैं अपने ही जख्मों को कुरेदना नहीं चाहती थी. मेरे जीवन में नियति ने जो कुछ दिया वह मिला. अब मैं क्यों बेवजह किसी को कोसूं. फिर भी पूछ बैठी, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘सुनीता के खून में इन्फैक्शन है. डाक्टर का कहना है कि अगर वह मां बनेगी तो निश्चय ही उसे विकलांग बच्चा पैदा होगा.’’

सुन कर मुझे अफसोस हुआ. सुधीर से ज्यादा दुख सुनीता के लिए हुआ. उस बेचारी का जीवन खराब हुआ. सुधीर ने 2-2 जिंदगियां बरबाद कीं. काश, वह मेरी बात मान कर किसी अनाथ बच्चे को गोद ले लेता तो हमें बुढ़ापे का सहारा मिल जाता और उस बच्चे का जीवन सुधर जाता. क्षणांश चुप्पी के बाद सुधीर आगे बोला, ‘‘आरती, किस मुंह से कहूं. कहने के लिए बचा ही क्या है.’’

मैं संशय में पड़ गई. सुधीर आखिर कहना क्या चाहता है. सुधीर के दोहरे चरित्र से तो मैं वाकिफ हो चुकी थी. इसलिए सजग थी. मैं ने ज्यादा जोर नहीं डाला. आखिरकार उसे ही कहना पड़ा, ‘‘क्या हम फिर से एकसाथ नहीं रह सकते?’’

सुनते ही मेरा पारा सातवें आसमान पर चला गया. जी में आया कि अभी धक्के मार कर बाहर निकाल दूं. मेरा अनुमान सही निकला. सुधीर का दोहरा चरित्र एक बार फिर से जाहिर हो गया. किसी तरह अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए मैं ने उस से सवाल किया, ‘‘इस हमदर्दी की वजह?’’

‘‘हमदर्दी नहीं हक,’’ यह सुधीर की बेशर्मी की पराकाष्ठा थी. स्त्री व पुरुष के मूल स्वभाव में यही तो फर्क होता है. तभी तो सारे व्रत जैसे करवाचौथ, तीज सिर्फ औरतों से करवाए जाते रहे. हमारे धर्म के ठेकेदारों ने पुरुषों को खुला सांड़ बना दिया, वहीं औरतों की ममता को हजार बंधनों में बांध कर उन्हें पंगु कर दिया. पर मैं भावुकता में नहीं बही.

‘‘जब सुनीता को ले आए तब हक का खयाल नहीं आया?’’

‘‘मैं भटक गया था,’’ बड़ी मासूमियत से वह बोला.

‘‘अब गलती सुधारना चाहते हो.’’

वह चुप रहा. मैं उस के चेहरे के पलपल बदलते भावों को बखूबी पढ़ रही थी. व्यर्थ बहस में पड़ने से अच्छा मुझे सबकुछ जानना उचित लगा. वह बोला, ‘‘मैं चाहता हूं कि तुम टैस्ट ट्यूब तकनीक से मां बन जाओ.’’

मुझे हंसी सूझी, साथ में रंज भी हुआ. वह हतप्रभ मुझे देखने लगा.

‘‘तीसरी शादी कर लो. मेरी राय में यही ठीक रहेगा.’’

‘‘आरती, मुझे माफ कर दो. मैं ने तुम्हारे साथ बहुत नाइंसाफी की है.’’

‘‘माफ कर दिया.’’

‘‘तो क्या तुम…’’ उस का चेहरा खिल गया.

‘‘जैसा तुम सोच रहे हो वैसा कुछ नहीं होने वाला. अच्छा होगा तुम मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो.’’

तमाम कोशिशों के बाद भी जब उस की दाल नहीं गली तो भरे कदमों से चल कर फाटक की तरफ बढ़ा. मुझ से रहा न गया, अपने मन की बात कह दी.

‘‘सुधीर, सौतन ला कर तुम ने पत्नी के अस्तित्व को गाली दी है. तुम्हारे बाप बनने की हसरत कभी पूरी नहीं होगी.’’

उस के जाते ही बिस्तर पर पड़ कर मैं फूटफूट कर रोने लगी.

दोहरा चरित्र- भाग 1

सचमुच पुरुष को बदलते देर नहीं लगती. यह वही सुधीर था जिसे मैं ने हर हाल में स्वीकारा. चाहती तो शादी से इनकार कर सकती थी पर मेरे अंतर्मन को गवारा न था. इंगेजमैंट के 1 महीने बाद सुधीर का पैर एक ऐक्सिडैंट में कट गया. भावी ससुर ने संदेश भिजवाया कि क्या मैं सुधीर से इस स्थिति में भी शादी करने के लिए तैयार हूं?

पापा दुविधा में थे. लड़के की सरकारी नौकरी थी. देखनेसुनने में खूबसूरत था. अब नियति को क्या कहें? पैर कटने को लिखा था, सो कट गया. फिर भी मुझ पर उन्होंने जोर नहीं डाला. मुझे अपने तरीके से फैसला लेने की छूट दे रखी थी. दुविधा में तो मैं भी थी. जिस से मेरी शादी होनी थी कल तक तो वह ठीक था. आज उस में ऐब आ गया तो क्या उस का साथ छोड़ना उचित होगा? कल मुझ में भी शादी के बाद कोई ऐब आ जाए और सुधीर मुझे छोड़ दे तब?

मैं दुविधा से उबरी और मन को पक्का कर सुधीर से शादी के लिए हां कर दी. शादी के कुछ साल आराम से कटे. सुधीर ने कृत्रिम पैर लगवा लिया था. इस तरह वह कहीं भी आनेजाने में समर्थ हो गया. मुझे अच्छा लगा कि चलो, सुधीर के मन से हीनभावना निकल जाएगी कि वह अक्षम हैं.

5 साल गुजर गए. काफी इलाज के बाद भी मैं मां न बन सकी तो मैं गहरे अवसाद में डूब गई. कहने को भले ही सुधीर ने कह दिया कि उसे बाप न बन पाने का जरा भी मलाल नहीं है लेकिन मैं ने उस के चेहरे पर उस पीड़ा का एहसास किया जो बातोंबातों में अकसर उभर कर सामने आ जाती. एक दिन मुझ से रहा न गया, कह बैठी, ‘‘अगर एतराज न हो तो मैं एक सलाह दूं.’’

‘‘क्या?’’

‘‘क्यों न हम एक बच्चा गोद ले लें?’’ यह सुन कर सुधीर उखड़ गया, ‘‘मुझे अपना बच्चा ही चाहिए.’’

‘‘वह शायद ही संभव हो,’’ मैं ने दबी जबान में कहा. बिना कोई जवाब दिए सुधीर वहां से चला गया. मेरा मन तिक्त हो गया. यह भी कोई तरीका है अपना नजरिया रखने का. सुधीर की यही बात मुझे अच्छी नहीं लगती कि मिलबैठ कर कोई सार्थक हल निकालने की जगह वह दकियानूसी व्यवस्था से चिपके रहना चाहता था. मैं ने महसूस किया कि सुधीर में पहले वाली बात नहीं रही. वह मुझ से कम ही बोलता. देर रात टीवी देखता या फिर रात देर से घर लौटता.

मैं पूछती तो यही कहता, ‘अकेला घर काटने को दौड़ता है.’

‘‘अकेले कहां हो तुम. क्या मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं रही?’’ सुधीर टाल जाता. मेरी त्योरियां चढ़ जातीं.

‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती जो पत्नी को अकेला छोड़ कर देर रात घर आते हो.’’

‘‘शर्म तुम्हें आनी चाहिए जो मुझे वंश चलाने के लिए एक बच्चा भी न दे सकीं.’’

सुन कर मैं रोंआसी हो गई. एक औरत सिर्फ बच्चा जनने के लिए ब्याह कर लाई जाती है? क्या वह सिर्फ जरूरत की वस्तु होती है? जरूरतों की कसौटी पर खरी उतरी तो ठीक है नहीं तो फेर लिया मुंह. बहरहाल, अपने आंसुओं पर मैं ने नियंत्रण रखा और कोशिश की कि अपनी कमजोरियों को न जाहिर होने दूं.

‘‘मैं तुम्हारी बीवी हूं. मुझे पूरा हक है यह जानने का कि तुम देर रात तक क्या करते हो.’’

‘‘अच्छा तो अब समझा,’’ सुधीर के चेहरे पर व्यंग्य के भाव तिर आए, ‘‘तुम्हें जलन हो रही है न कि मैं ने कहीं दूसरी न रख ली हो?’’

‘‘रख सकते हैं आप. यह कोई नई बात नहीं होगी मेरे लिए.’’

‘‘तो क्यों पूछताछ करती हो. सोच लो कि मैं ने रख ली.’’

भले ही यह कथन झूठा हो तो भी इस से सुधीर की मंशा समझ में तो आ ही गई. वह चला गया पर एक ऐसा दंश दे कर गया जिस की पीड़ा का शूल मेरे अंतस को देर तक भेदता रहा. अकेले में सुबकने लगी. कैसे कोई पुरुष इतना बदल सकता है. 5 साल जिस के साथ सुखदुख साझा किया वह एकाएक कैसे निर्मोही हो सकता है. लाख कोशिशों के बाद भी मैं इस सवाल का जवाब न ढूंढ़ सकी. किसी तरह मैं ने अपनेआप को संभाला.

आज सुधीर के एक दूर के रिश्ते की मामी की लड़की सुनीता आने वाली थी. बिन बाप की लड़की थी. उसे बीएड करना था. इस लिहाज से तो वह एक साल रहेगी ही रहेगी. हालांकि सुधीर के मांबाप नाकभौं सिकोड़ रहे थे.

‘‘दीदी, बिन बाप की बेटी है. तुम लोग चाहोगे तो अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी. वरना मेरे पास तो कुछ भी नहीं है जिस के बल पर उस का ब्याह कर सकूं. पढ़ाईलिखाई का ही भरोसा है. पढ़लिख कर कम से कम अपना पेट पाल तो सकेगी,’’ कह कर मामी रोंआसी हो गईं.

मेरी सास ने उन्हें ढाढ़स बंधाया. मेरी सास सुधीर की तरफ मुखातिब हुईं, ‘‘सुधीर, तुम सुनीता को उस का स्कूल दिखा दो.’’

‘‘बेटा, यहां आनेजाने के लिए रिकशा तो मिल जाता होगा?’’ मामीजी मुंह बना कर बोलीं.

‘‘नहीं मिलेगा तो मैं छोड़ आया करूंगा,’’ सुधीर ने एक नजर सुनीता पर डाली तो वह मुसकरा दी.

‘‘यही सब सोच कर आई थी कि यहां सुनीता को कोई परेशानी नहीं होगी. तुम सब लोग उसे संभाल लोगे,’’ मामीजी भावुक हो उठीं. वे आगे बोलीं, ‘‘सुनीता के पापा के जाने के बाद तुम लोगों के सिवा मेरा है ही कौन. रिश्तेदारों ने सहारा न दिया होता तो मैं कब की टूट चुकी होती,’’ यह कह कर वे सुबकने लगीं.

सुनीता ने उन्हें डांटा, ‘‘हर जगह अपना रोना ले कर बैठ जाती हैं.’’

‘‘क्या करूं, मैं अपनेआप को रोक नहीं पाती. आज तेरे पापा जिंदा होते तो मुझे इतनी भागदौड़ न करनी होती.’’

‘‘आप कोई गैर थोड़े ही हैं, जीजी. हम सब सुनीता का वैसा ही खयाल रखेंगे जैसे आप उस का घर पर रखती हैं,’’ मेरी सास ने तसल्ली दी. वे आंसू पोंछने लगीं.

2 दिन रह कर मामीजी बरेली चली गईं. सुधीर ने सुनीता को उस का कालेज दिखलाया और दाखिला करवा दिया. उस की जरूरतों का सामान खरीदा. निश्चय ही रुपए सुधीर ने खर्च किए होंगे, मुझे कोई एतराज न था मगर इस बहाने वह सुनीता का कुछ ज्यादा ही खयाल रखने लगा. उस के खानेपीने से ले कर छोटीछोटी जरूरतों के लिए भी वह हमेशा मोटरसाइकिल स्टार्ट किए रहता.

पत्नी से ज्यादा गैर को तवज्जुह देना मेरे लिए असहनीय था. मेरी सास भी उसी की हो कर रह गई थीं. न जाने मांबेटे के बीच क्या चल रहा था. एक दिन मुझ से रहा न गया तो मैं बोल पड़ी, ‘‘सुनीता क्या मुझ से ज्यादा अहमियत रखने लगी है तुम्हारे लिए?’’

‘‘तुम अच्छी तरह जानती हो कि वह बिन बाप की बेटी है,’’ सुधीर बोला.

‘‘तो क्या बाप की भूमिका निभा रहे हो?’’ मैं ने व्यंग्य किया.

‘‘तमीज से बात करो,’’ वह उखड़ गया.

‘‘चिल्लाओ मत,’’ मैं ने भी अपना स्वर ऊंचा कर लिया.

वह संभल गया.

‘‘आहिस्ता बोलो.’’

‘‘अब आए रास्ते पर. यह मत समझना कि तुम कुछ भी करोगे और मैं चुपचाप तमाशा देखती रहूंगी.’’

‘‘क्या किया है मैं ने?’’

‘‘अपने दिल से पूछो.’’

Debina-Gurmeet ने पहली बार दिखाया बेटी का चेहरा, फोटोज वायरल

टीवी एक्ट्रेस देबिना बनर्जी (Debina Bonnerjee) डिलीवरी के बाद से ही ट्रोलिंग का शिकार होती रही हैं. हालांकि वह ट्रोलर्स को वीडियो और रील्स के जरिए करारा जवाब देती नजर आई हैं. हालांकि इन वीडियोज में अपनी और गुरमीत चौधरी (Gurmeet Chaudhary) की बेटी (Debina-Gurmeet Daughter) का चेहरा छिपाती दिखीं. लेकिन अब उन्होंने फैंस के साथ अपनी बेटी की पहली फोटो शेयर कर दी है, जो सोशलमीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है. आइए आपको दिखाते हैं देबीना-गुरमीत की बेटी की पहली झलक…

बेटी की दिखाई पहली झलक

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Debina Bonnerjee (@debinabon)

देबीना बनर्जी अपने फैंस के साथ अपडेट शेयर करना नहीं भूलतीं. इसी बीच एक्ट्रेस ने अपने पति गुरमीत चौधरी संग बेटी लियाना (Lianna Chaudhary) की फोटोज शेयर की हैं. दरअसल, फोटो में कपल अपनी बेटी को किस करते हुए नजर आ रहा है. वहीं इस फोटो के साथ एक्ट्रेस ने कैप्शन  में लिखा, ‘लियाना का इंट्रोडक्शन… हमारा दिल एक हो गया. हमारे दिल इतने भरे हुए हैं – यह जानकर कि हम ऐसे सच्चे लोगों के एक खूबसूरत साथ का हिस्सा हैं .. जिन्होंने उसके लिए प्रार्थना की और इंतजार किया. उसका चेहरा देखने के लिए तरस गए. @lianna_चौधरी #हमारी बेटी #gurmeetdebina.’

फैंस ने लुटाया प्यार

सेलेब्रिटी कपल की बेटी की पहली झलक देखते ही जहां सेलेब्स ने दोनों को बधाई दी तो वहीं फैंस हार्ट और स्माइली इमोजी से लियाना पर प्यार लुटाते नजर आ रहे हैं. इसके अलावा कपल की दूसरी वीडियो और फोटोज भी बेटी के साथ सोशलमीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं.

बता दें, 3 अप्रैल 2022 को एक्टर गुरमीत चौधरी और देबीना बनर्जी बेटी लियाना के पेरेंट्स बने थे, जिसके बाद एक्ट्रेस देबीना कई बार ट्रोलर्स के बेटी के साथ लापरवाही के इल्जामों के चलते ट्रोलिंग का शिकार हो चुकी हैं. हालांकि वह ट्रोलर्स को करारा जवाब भी दे चुकी हैं. वहीं साथ ही वह ट्रोलर्स की बातों को अनदेखा करने की भी सलाह देती नजर आती हैं.

Anupama-वनराज के रिश्तों पर सवाल उठाएगी पाखी, देखें नया प्रोमो

टीवी के पौपुलर सीरियल अनुपमा (Anupama) में जल्द ही नया ट्विस्ट आने वाला है, जिसका मेकर्स ने प्रोमो भी रिलीज कर दिया है. नए प्रोमो में जहां वनराज का बरखा के भाई अधिक पर गुस्सा देखने को मिल रहा है तो वहीं पाखी का माता-पिता के खिलाफ होना नजर आ रहा है. आइए आपको दिखाते हैं प्रोमो की झलक…

प्रोमो में दिखा वनराज का गुस्सा

 

View this post on Instagram

 

A post shared by StarPlus (@starplus)

हाल ही में सीरियल के मेकर्स ने अनुपमा का नया प्रोमो रिलीज किया है, जिसमें वनराज अपनी बेटी पाखी और अधिक को क्लोज होते हुए रंगे हाथों पकड़ लेता है और पूरे परिवार के सामने बरखा के भाई को जोरदार तमाचा मारता नजर आ रहा है. वहीं अधिक के बारे में पूरे परिवार को बताता है, जिस पर पाखी भड़कते हुए दिख रही है. दरअसल, वनराज (Sudhanshu Pandey) की बात को सुनते ही पाखी जवाब में कहती दिख रही है कि अधिक और वह एक-दूसरे को पसंद करते हैं और वनराज और अनुपमा को ताना मारते हुए कहती है कि उसके घर में एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर चल सकता है या 50 साल में दूसरी शादी हो सकती है तो वह अपनी पसंद के साथ क्यों नहीं रह सकती है. पाखी की यह सब सुनते ही अनुपमा और वनराज समेत पूरा परिवार हैरान नजर आता है.

गोदभराई में अनुपमा को हुआ शक

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Tv serials (@tvser123)

अब तक आपने देखा कि किंजल के गोदभराई सेलिब्रेशन में बा, राखी, बरखा के बीच तानों का सिलसिला चलता है. हालांकि अनुपमा पूरी बात संभालने के कोशिश करती नजर आती है. वहीं पाखी और बरखा के भाई अधिक के बीच नजदीकियां देखने को मिल रही है. लेकिन अनुपमा और समर को दोनों पर शक हो चुका है. वहीं फैंस के रिएक्शन की बात की जाए तो जहां फैंस पाखी को बद्तमीज कह रहे हैं तो वहीं वनराज को आईना दिखाने की बात कहते दिख रहे हैं.

चुनौती- भाग 1: शर्वरी मौसी ने कौनसी तरकीब निकाली

‘‘सुप्रिया कहां हो तुम?’’ ललिता देवी फोन रखते ही  बेचैनी से चिल्लाईं.

‘‘घर में ही हूं, मां. क्या हो गया? इस तरह क्यों चीख रही हो?’’ सुप्रिया ने उत्तर दिया.

‘‘यही तो समस्या है कि तुम घर में रह कर भी नहीं रहतीं. पता नहीं कौन सी नई दुनिया बसा ली है तुम ने.’’

‘‘मां, मुझे बहुत काम है. प्लीज, थोड़ा धीरज रखो. एक घंटे में आऊंगी. अभी तो मुझे सांस लेने तक की भी फुरसत नहीं है,’’ सुप्रिया ने अपनी व्यस्तता का हवाला दिया.

‘‘देखा, मैं कहती थी न, सुप्रिया तो घर में रह कर भी नहीं रहती. कई सप्ताह बीत जाते हैं, हमें एकदूजे से बात किए बगैर,’’ ललिता ने टीवी देखने में व्यस्त अपने पति, पुत्र व दूसरी पुत्री नीरजा से शिकायत की पर किसी ने उन की बात पर ध्यान नहीं दिया.

‘‘मैं भी कुछ कह रही हूं न. कोई मेरी भी सुन ले,’’ झुंझला कर उन्होंने टीवी बंद कर दिया. टीवी बंद करते ही भूचाल आ गया.

‘‘क्या कर रही हो, ललिता? मैं इतना महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम देख रहा हूं और तुम ने आ कर टीवी बंद कर दिया. मुश्किल से 10-15 मिनट के लिए टीवी देखता हूं मैं. तुम से वह भी सहन नहीं होता,’’ उन के पति अपूर्व भड़क उठे.

‘‘और भी गम हैं जमाने में…’’ ललिता बड़ी अदा से बोलीं.

‘‘मैं शेर सुनने के मूड में नहीं हूं. पहेलियां मत बुझाओ. रिमोट मुझे दो और जल्दी बताओ, समस्या क्या है?’’ वे बोले. उन के पुत्र प्रताप और पुत्री नीरजा ने जोरशोर से पिता की बात का समर्थन किया.

‘‘तो पहले मेरी समस्या सुन लो, बाद में टीवी देख लेना.’’

‘‘जल्दी कहो न, मां. हमारे सीरियल की नायिका एक नए षड्यंत्र की तैयारी कर रही है. वह निकल जाएगा,’’ नीरजा अधीरता से बोली.

‘‘कभी अपने घर के सीरियल की भी चिंता कर लिया करो. पता है अभी किस का फोन था?’’ ललिता ने नीरजा को आंख दिखाई.

‘‘नहीं.’’

‘‘तेरी शर्वरी मौसी का.’’

‘‘यही बताने के लिए आप ने टीवी बंद कर दिया.’’

‘‘यह बताने के लिए नहीं बुद्धू, यह बताने के लिए कि उन्होंने क्या कहा. और टीवी तेरी मौसी से अधिक आवश्यक हो गया?’’ ललिता देवी कुछ और बोलतीं उस से पहले ही सुप्रिया आ पहुंची, ‘‘बोलो मां, क्या हुआ जो आप ने पूरा घर सिर पर उठा रखा है? मेरा कल आवश्यक प्रेजेंटेशन है उसी की तैयारी कर रही थी. पर आप ने बुलाया तो अपना काम छोड़ कर आई हूं.’’

‘‘आ, मेरे पास बैठ. तू ही मेरी रानी बेटी है और किसी को तो मेरी चिंता ही नहीं है. तेरी शर्वरी मौसी का फोन आया था. वे कल अपने किसी परिचित को साथ ले कर यहां आ रही हैं. वे उन के बेटे से तुझे मिलवाना चाहती हैं. कह रही थीं कि रूप और गुण का ऐसा संयोग शायद ही कहीं मिले. वह तुझे अवश्य पसंद आएगा.’’

‘‘क्या हो गया है आप लोगों को? यदि आप यह सोचती हैं कि मैं चाय की टे्र ले कर सिर पर पल्लू रखे शरमाती, सकुचाती स्वयं को वर पक्ष के सम्मुख प्रस्तुत करूंगी तो भूल जाइए. मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाली. मैं प्रेमरहित विवाह में विश्वास ही नहीं करती.’’

सुप्रिया ने अपना निर्णय कुछ इस अंदाज में सुनाया कि सब के कान खड़े हो गए. किसी को न टीवी की चिंता रही न अपने पसंद के कार्यक्रम की. सुप्रिया और प्रेम विवाह? किसी को विश्वास ही नहीं हुआ. सदा  अपनी पढ़ाईलिखाई में व्यस्त रहने वाली और सदैव हर परीक्षा में प्रथम रहने वाली सुप्रिया प्रेम विवाह की बात भी करेगी, ऐसा तो उन में से किसी ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था.

‘‘कोई है क्या?’’ अपूर्व, नीरजा और प्रताप ने समवेत स्वर में पूछा.

‘‘कोई है, क्या मतलब है?’’ सुप्रिया ने प्रश्न के उत्तर में प्रश्न ही पूछ डाला.

‘‘मतलब यह है दीदी कि प्रेम विवाह के लिए एक अदद प्रेमी की भी आवश्यकता पड़ती है. हम सब यही जानने का यत्न कर रहे थे कि आप ने किसी को चुन रखा है क्या? या शायद आप किसी के प्रेम में आकंठ डूबी हुई हैं और हमें पता तक नहीं,’’ नीरजा हर एक शब्द पर जोर दे कर बोली.

‘‘जी नहीं, किसी को नहीं चुना है अभी तक. समय ही नहीं मिला. पर जब विवाह करना होगा तो समय भी निकाल लूंगी,’’ सुप्रिया का उत्तर था.

‘‘मुझे यही आशा थी. सुप्रिया, प्यार के लिए समय निकाला नहीं जाता, अपनेआप निकल आता है. 26 की हो गई हो तुम. समय रेत की तरह हाथ से फिसलता जा रहा है. तुम सब से बड़ी हो. इसलिए नीरजा और प्रताप का विवाह भी रुका हुआ है,’’ ललिता बेचैन स्वर में बोलीं.

‘‘मां, मेरे लिए इन दोनों का विवाह रोकने की क्या आवश्यकता है. दोनों ने अपने जीवनसाथी चुन रखे हैं. वे भला कब तक प्रतीक्षा करेंगे. मुझे जब विवाह करना होगा, कर लूंगी. कोई मेरी पसंद का नहीं मिला तो शायद मैं विवाह ही न करूं,’’ सुप्रिया ने चुटकियों में ललिता की समस्या हल कर दी.

‘‘यह तो मैं पहले भी कई बार सुन चुकी हूं पर तुम भी कान खोल कर सुन लो. हमारे संस्कार ऐसे नहीं हैं कि बड़ी बहन बैठी रहे और छोटे भाईबहनों का विवाह हो जाए.’’

‘‘पापा, आप कुछ कहिए न. मां तो जिद पकड़ कर बैठी हैं. मेरे कारण प्रताप और नीरजा का विवाह रोक कर रखने की क्या तुक है?’’

‘‘वे क्या बोलेंगे. उन्हें तो यह समझ  ही नहीं आता कि विवाह भी जीवन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है. यों भी हर चीज का एक समय होता है. वे तो तुम्हारी उपलब्धियों का बखान करते नहीं थकते. बस, एक बात इन की समझ में नहीं आती कि अच्छा सा वर देख कर तुम्हारे हाथ पीले कर दें…’’

‘‘ललिता, प्लीज, क्यों बैठेबिठाए घर में तनाव पैदा कर देती हो. हां, मुझे गर्व है कि सुप्रिया मेरी बेटी है. कभी 90 प्रतिशत से कम अंक नहीं आए हैं इस के. इतनी सी आयु में अपनी कंपनी की वाइस प्रैसिडैंट है. यहां तक पहुंचने के लिए कड़ी मेहनत की है इस ने.

चार लोग इस की प्रशंसा करते हैं तो अच्छा लगता है,’’ अपूर्व ने बीच में ही टोक दिया.

‘‘वह सब तो ठीक है, पर पिता होने के नाते आप का भी कुछ फर्ज है या नहीं? सुप्रिया से पहले प्रताप और नीरजा का विवाह हो गया तो ये लोग ही बातें बनाएंगे.’’

‘‘मां, समय बदल चुका है. सब अपने जीवन में इतने व्यस्त हैं कि दूसरों के लिए समय ही नहीं है? कोई कुछ नहीं कहेगा. आप निश्ंिचत हो कर इन दोनों के विवाह की तैयारी कीजिए.

मुझे भी तो कुछ आनंद उठाने दीजिए. मेरे बाद इन का विवाह हुआ तो मैं भला जी खोल कर खुशियां कैसे मना पाऊंगी. अच्छा, मैं चली, बहुत काम पड़ा है,’’ सुप्रिया उठ खड़ी हुई.

‘‘रुक जा. खाना खा कर जा, नहीं तो फिर परेशान करेगी,’’ ललिता अनमने स्वर में बोलीं. खाने की मेज पर भी यही वादविवाद चलता रहा.

छंटनी- भाग 2: क्या थी रीता की असलियत

सत्र पूरा होते ही सुधा ने सौरभ, गौरव को पास के एक सस्ते स्कूल में डाल दिया. बच्चों के लिए यह एक बड़ा झटका था पर वे समझदार थे और अपने मातापिता के कष्ट को देखतेसमझते पैदल स्कूल आतेजाते और नए वातावरण में सामंजस्य बनाने की भरपूर कोशिश करते.

नौकरी छूटने के 6 महीने के बाद जो रकम फैक्टरी की ओर से अजीत को मिली वह नीता की शादी का कर्ज चुकाने में चली गई. नीता के पास अच्छा घरवर था. सरकारी नौकरी थी पर उस ने 100 रुपए खर्च करने के बाद 6 महीने में पीछे पलट कर भी नहीं देखा.

रीता सर्दियों में 2 दिन के लिए आई थी. सुधा को फटापुराना कार्डिगन पहना देख कर अपना एक कार्डिगन उस के लिए छोड़ गई थी और सौरभगौरव के लिए कुछ स्केच पेन और पेंसिलरबड़ खरीद कर दे गई थी.

रीता के पति पहले अकसर अपने व्यापार के सिलसिले में आते और कईकई दिनों तक अजीत, सुधा के घर में बेहिचक बिना एक पैसा खर्च किए डटे रहते थे. वह भी इन 6 महीनों में घर के दरवाजे पर पूछने नहीं आए. सुधा मन ही मन सोचती रहती, क्या रीता के पति इस बीच एक बार भी यहां नहीं आए होंगे? आए होंगे जरूर और 1-2 दिन होटल में रुक कर अपना काम जल्दीजल्दी पूरा कर के लौट गए होंगे. यहां आने पर हमारे कुछ मांग बैठने का खतरा जो था.

अजीत से छिपा कर सुधा ने हर उस रिश्तेदार को पत्र डाला जो किसी प्रभावशाली पद पर था या जिन के पास मदद करने लायक संपन्नता थी. ससुर अकसर बड़प्पन दिखाने के सिलसिले में जिन पर खूब पैसा लुटाया करते थे वे संबंधी न कभी पूछने आए और न ही उन्होंने पत्र का उत्तर देने का कष्ट उठाया.

सुधा को अपनी ठस्केदार चाची सास याद आईं जो नीता की शादी के बाद 2 महीने रुक कर गई थीं. सुधा से खूब सेवा ली, खूब पैर दबवाए उन्होंने और सौरभ, गौरव का परीक्षाफल देख कर बोली थीं, ‘‘मेरे होनहारो, बहुत बड़े आदमी बनोगे एक दिन पर इस दादी को भूल न जाना.’’

सुधा ने उन्हें भी पत्र लिखा था कि चाचीजी, अपने बड़े बेटे से कह कर सौरभ के पापा को अपनी आयुर्वेदिक दवाओं की फैक्टरी में ही फिलहाल कुछ काम दे दें. कुछ तो काम करेंगे, कुछ तो डूबने से हम बचेंगे. पर पत्र का उत्तर नहीं आया.

अजीत की बूआ तीसरेचौथे साल भतीजे के घर आतीं और कम से कम महीना भर रह कर जाती थीं. जाते समय अच्छीखासी विदाई की आशा भी रखतीं और फिर आदेश दे जातीं, ‘‘अब की जाड़ों में मेरे लिए अंगूर गुच्छा बुनाई के स्वेटर बुन कर भेज देना. इस बार सुधा, आंवले का अचार जरा बढ़ा कर डालना  और एक डब्बा मेरे लिए भिजवा देना.’’

इन बूआजी को सुधा ने पत्र भेजा कि अपने कंपनी सेक्रेटरी दामाद और आफीसर बेटे से हमारे लिए कुछ सिफारिश कर दें. इस समय हमें हर तरह से मदद की जरूरत है. बूआ का पोस्ट कार्ड आया था. अपनी कुशलता के अलावा बेटे और दामाद की व्यस्तता की बात थी पर न किसी का पता दिया था न फोन नंबर और न उन तक संदेश पहुंचाने का आश्वासन.

6 महीने में सब की परीक्षा हो गई. कितने खोखले निकले सारे रिश्ते. कितने स्वार्थी, कितने संवेदनहीन. सुधा सूरज निकलने तक घर के काम निबटा कर सिलाई मशीन की खड़खड़ में डूब जाती. जब घर पर वह अकेली होती तभी पत्र लिखती और चुपके से डाल आती.

कई महीने के बाद अजीत ने काम करना शुरू किया. मनोस्थिति और आर्थिक स्थिति के दबाव में उसे जो पहला विकल्प मिला उस ने स्वीकार कर लिया. घर आ कर जब उस ने सुधा को बताया कि वह रायल इंटर कालिज का गार्ड बन गया है तो सुधा को बड़ा धक्का लगा. चेहरे पर उस ने शिकन न आने दी लेकिन मन में इतनी बेचैनी थी कि वह रात भर सिलाई मशीन पर काम करती रही और सुबह निढाल हो कर सो गई.

नींद किसी अपरिचित स्वर को सुन कर खुली. कोठरी से निकल कर कमरे में आई तो कुरसी पर एक लड़के को बैठा देखा. तखत पर बैठे अजीत के चेहरे पर चिंता की रेखाएं गहराई हुई थीं.

‘‘सुधा, यह विशाल है. छोटी बूआ की ननद की देवरानी का बेटा. बी.ए. की प्राइवेट परीक्षा देगा यहीं से.’’

सुधा चौंकी, ‘‘यहीं से मतलब?’’

‘‘मतलब आप के घर से,’’ वह लड़का यानी विशाल बिना हिचकिचाहट के बोला.

सुधा पर रात की थकान हावी थी. उस पर सारे रिश्तेदारों द्वारा दिल खट्टा किया जाना वह भूली नहीं थी. उस का पति 2 हजार रुपए के लिए गार्ड बना सारे दिन खड़ा रहे और रिश्तेदारों के रिश्तेदार तक हमारे घर को मुफ्तखोरी का अड्डा बना लें. पहली बार उस ने महसूस किया कि खून खौलना किसे कहते हैं.

‘‘तुम्हारी परीक्षा में तो लंबा समय लगेगा, क्यों?’’ सुधा ने तीखी दृष्टि से विशाल की ओर देखा.

‘‘हां, 1 महीना रहूंगा.’’

‘‘तुम्हें हमारा पता किस ने दिया?’’

‘‘आप की बूआ सासजी ने,’’ लड़का रौब से बोला, ‘‘उन्होंने कहा कि मेरे मायके में आराम से रहना, पढ़ना, परीक्षा देना, तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी.’’

‘‘उन्होंने हम से तो कुछ नहीं पूछा था. भला महीने भर कोई मेरे घर में रहेगा तो मुझे परेशानी कैसे न होगी? डेढ़ कमरे में हम 4 लोग रहते हैं और बूआजी ने तो तुम से यह भी नहीं कहा होगा कि मेरा भतीजा और उस का परिवार भूखों मरने की हालत में हैं. वह क्यों कहेंगी? उन के लिए भतीजे का घर एक आराम फरमाने की जगह है, बस.’’

लड़का अवाक् सा सुधा को देख रहा था. अजीत भी विस्मित था. उस ने सुधा का यह रूप पहले कभी नहीं देखा था. वह सोच ही रहा था कि सुधा उठ कर अंदर चली गई. थोड़ी देर में सुधा चाय ले कर आई और विशाल के चाय खत्म करते ही बोली, ‘‘सुनो विशाल, हम खुद बहुत परेशानी में हैं. हम तुम्हें अपने साथ 1 महीने तो क्या 1 दिन भी नहीं रख सकते.’’

अजीत उठ कर अंदर चला गया. विशाल उलझन में भरा हुआ सुधा को देख रहा था. सुधा उसे इस तरह अपनी तरफ देखते थोड़ी पिघल उठी, ‘‘बेटा, तुम पढ़नेलिखने वाले बच्चे हो. अभी हमारी परेशानियों और कष्टों को क्या समझोगे, पर मैं हाथ जोड़ती हूं, तुम अपने रहनेखाने की व्यवस्था कहीं और कर लो.’’

अपना अपना मापदंड- भाग 1: क्या था शुभा का रिश्तों का नजरिया

अजय कुछ दिन से चुपचुप सा है. समझ नहीं पा रही हूं कि क्या वजह है. मैं मानती हूं कि 18-20 साल की उम्र संवेदनशील होती है, मगर यही संवेदनशीलता अजय की चुप्पी का कारण होगी यह मानने को मेरा दिल नहीं मान रहा. अजय हंसमुख है, सदा मस्त रहता है फिर उस के मन में ऐसा क्या है, जो उसे गुपचुप सा बनाता जा रहा है.

‘‘क्या अकेला बच्चा स्वार्थी हो जाता है, मां?’’

‘‘क्या मतलब…मैं समझी नहीं?’’

सब्जी काटतेकाटते मेरे हाथ रुक से गए. अजय हमारी इकलौती संतान है, क्या वह अपने ही बारे में पूछ रहा है?

‘‘मैं ने मनोविज्ञान की एक किताब में पढ़ा है कि जो इनसान अपने मांबाप की इकलौती संतान होता है वह बेहद स्वार्थी होता है. उस की सोच सिर्फ अपने आसपास घूमती है. वह किसी के साथ न अपनी चीजें बांटना चाहता है न अधिकार. उस की सोच का दायरा इतना संकुचित होता है कि वह सिर्फ अपने सुखदुख के बारे में ही सोचता है…’’ कहताकहता अजय तनिक रुक गया. उस ने गौर से मेरा चेहरा देखा तो मुझे लगा मानो वह कुछ याद करने की कोशिश कर रहा हो.

‘‘मां, आप भी तो उस दिन कह रही थीं न कि आज का इनसान इसीलिए इतना स्वार्थी होता जा रहा है क्योंकि वह अकेला है. घर में 2 बच्चों में अकसर 1 बहन 1 भाई होने लगा है और बहन के ससुराल जाने के बाद बेटा मांबाप की हर चीज का एकमात्र अधिकारी बन जाता है.’’

‘‘बड़ी गहरी बातें करने लगा है मेरा बच्चा,’’ हंस पड़ी मैं, ‘‘हां, यह भी सत्य है, हर संस्कार बच्चा घर से ही तो ग्रहण करता है. लेनादेना भी तभी आएगा उसे जब वह इस प्रक्रिया से गुजरेगा. देने का सुख क्या होता है, यह वह कैसे जान सकता है जिस ने कभी किसी को कुछ दिया ही नहीं.’’

‘‘तो फिर दादी आप से इतनी घृणा क्यों करती हैं? क्या आप उन का अपमान करती रही हैं? जिस का फल वह आप से नफरत कर के आप को देना चाहती हैं?’’

अवाक् रह गई मैं. अजय का सवाल कहां से कहां चला आया था. कुछ दिन पहले वह अपनी दादी के साथ रहने गया था. मैं चाहती तो बेटे को वहां जाने से रोक सकती थी क्योंकि जिस औरत ने कभी मुझ से प्यार नहीं किया वह मेरे खून से प्यार कैसे करेगी? फिर भी भेज दिया था. मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा मेरे कहने पर अपना व्यवहार निर्धारित करे.

20 साल का बच्चा इतना भी छोटा या नासमझ नहीं होता कि उसे रिश्तों के बारे में उंगली पकड़ कर चलाया जाए. रिश्तों की समझ उसे उन रिश्तों के साथ जी कर ही आए तो वही ज्यादा अच्छा है. अजय जितना मेरा है उतना ही वह अपनी दादी का भी है न.

‘‘मां, दादी तुम से इतनी नफरत क्यों करती हैं?’’ अजय ने अपना प्रश्न दोहराया.

‘‘तुम दादी से ही पूछ लेते, यह सवाल मुझ से क्यों पूछ रहे हो?’’

हंस पड़ी मैं, यह सोच कर कि 3-4 दिन अपनी दादी के साथ रह कर मेरा बेटा यही बटोर पाया था. अब समझी मैं कि अजय इतना चुप क्यों है.

‘‘4 दिन मैं वहां रहा था मां. दादी ने जब भी आप से संबंधित कोई बात की उन की जबान की मिठास कड़वाहट में बदलती रही. एक बार भी उन के मुंह से आप का नाम नहीं सुना मैं ने. बूआ आईं तो उन्होंने भी आप के बारे में कुछ नहीं पूछा. पिछले दिनों आप अस्पताल में रहीं, आप का इतना बड़ा आपरेशन हुआ था. आप का हालचाल ही पूछ लेतीं एक बार.’’

‘‘तुम पूछते न उन से… पूछा क्यों नहीं…तुम्हारे पापा से भी मैं अकसर पूछती हूं पर वह भी कोई उत्तर नहीं देते. मुझे तो इतना ही समझ में आता है कि तुम्हारे पापा की पत्नी होना ही मेरा सब से बड़ा दोष है.’’

‘‘क्यों? क्या तुम्हारी शादी दादी की इच्छा के खिलाफ हुई थी?’’

‘‘नहीं तो. तुम्हारी दादी खुद गई थीं मेरा रिश्ता मांगने क्योंकि तुम्हारे पापा को मैं बहुत पसंद थी.’’

‘‘क्या पापा ने अपनी मां और बहन को मजबूर किया था इस शादी के लिए?’’

‘‘यह बात तुम अपने पापा से पूछना क्योेंकि कुछ सवालों का उत्तर मेरे पास है ही नहीं. लेकिन यह सच है कि तुम्हारी दादी ने हमारे 22 साल के विवाहित जीवन में कभी मुझ से प्यार के दो मीठे बोल नहीं बोले.’’

‘‘तुम तो उन के साथ भी नहीं रहती हो जो गिलेशिकवे की गुंजाइश उठती हो. जब भी हम घर जाते हैं या दादी यहां आती हैं वह आप से ज्यादा बात नहीं करतीं. हां, इतना जरूर है कि उन के आने से पापा का व्यवहार  बहुत अटपटा सा हो जाता है…अच्छा नहीं लगता मुझे… इसीलिए इस बार मैं उन के साथ रहने चला गया था यह सोच कर कि शायद मैं अकेला जाऊं तो उन्हें अच्छा लगे.’’

‘‘तो कैसा लगा उन्हें? क्या अच्छा लगा तुम्हें उन का व्यवहार?’’

‘‘मां, उन्हें तो मैं भी अच्छा नहीं लगा. एक दिन मैं ने इतना कह दिया था कि मां आलू की सब्जी बहुत अच्छी बनाती हैं. आप भी आज वैसी ही सब्जी बना कर खिलाएं. मेरा इतना कहना था कि दादी को गुस्सा आ गया. डोंगे में पड़ी सब्जी उठा कर बाहर डस्टबिन में गिरा दी. भूखा ही उठना पड़ा मुझे. रोेटियां भी उठा कर फेंक दीं. कहने लगीं कि इतनी अच्छी लगती है मां के हाथ की रोटी तो यहां क्या लेने आया है, जा, चला जा अपनी मां के पास…’’

अवाक् रह गई थी मैं. एक 80 साल की वृद्धा में इतनी जिद. बुरा तो लगा था मुझे लेकिन मेरे लिए यह नई बात नहीं थी.

‘‘क्या मैं अपनी मां के हाथ के खाने की तारीफ भी नहीं कर सकता हूं… आप का नाम लिया उस का फल यह मिला कि मुझे पूरी रात भूखा रहना पड़ा, ऐसा क्यों, मां?’’

मैं अपने बच्चे को उस क्यों का क्या उत्तर देती. मन भर आया मेरा. मेरा बच्चा पूरी रात भूखा रहा इस बात का अफसोस हुआ मुझे, मगर इतना संतोष भी हुआ कि मेरे सिवा कोई और भी है जिसे मेरी ही तरह अपमानित कर उस वृद्धा ने घर से बाहर निकलने पर मजबूर कर दिया. इस का मतलब अजय इसी वजह से जल्दी वापस चला आया होगा.

भूल किसकी- भाग 2

खिड़कियों से आती हवा और धूप ने जैसे कमरे को नया जीवन दिया. सफाई होते ही कमरा जीवंत हो उठा. रीता ने एक लंबी सांस ली. बदबू अभी भी थी. उसे उस ने रूम फ्रैशनर से दूर करने की कोशिश की.

कमरे में आते ही पापाजी ने मुआयना किया. खुली खिड़कियों से आती हवा और रोशनी से जैसे उन के अंदर की भी खिड़की खुल गई. चेहरे पर एक मुसकराहट उभर आई. पलट कर रीता की ओर देखा और फिर धीरे से बोले, ‘‘थैंक्स.’’

पापाजी को कोई बीमारी नहीं थी. वे मम्मीजी के जाने के बाद चुपचाप से हो गए थे. खुद को एक कमरे तक सीमित कर लिया था.

तुषार भी दिनभर घर पर नहीं रहता था और नौकरों से ज्यादा बात नहीं करता था. उस के चेहरे पर अवसाद साफ दिखाई देता था. ये सब बातें तुषार उसे पहले ही बता चुका था.

कमरे की तो सफाई हो गई, अब एक काम जो बहुत जरूरी था या वह था पापाजी को अवसाद से बाहर निकालना. वह थक गई थी पर इस थकावट में भी आनंद की अनुभूति हो रही थी. भूख लगने लगी थी. फटाफट नहाधो कर लंच के लिए डाइनिंगटेबल पर पहुंची.

‘‘उफ, कितनी धूल है इस टेबल पर,’’ रीता खीज उठी.

‘‘बहूरानी इस टेबल पर कोई खाना नहीं खाता इसलिए…’’

‘‘अरे रुको पारो… यह थाली किस के लिए ले जा रही हो?’’

‘‘पापाजी के लिए… वे अपने कमरे में ही खाते हैं न… हम वहां खाना रख देते हैं जब उन की इच्छा होती है खा लेते हैं.’’

‘‘लेकिन तब तक तो खाना ठंडा हो जाता होगा? 2 रोटियां और थोड़े से चावल… इतना कम खाना?’’

‘‘पापाजी बस इतना ही खाते हैं.’’

रीता की सम झ में आ गया था कि कोई भी अकेले और ठंडा बेस्वाद खाना कैसे खा सकता है. इसलिए पापाजी की खुराक कम हो गई है. उन की कमजोरी की यह भी एक वजह हो सकती है.

‘‘तुम टेबल साफ करो, पापाजी आज से यहीं खाना खाएंगे.’’

‘‘बहुरानी, कमरे से बाहर नहीं जाएंगे.’’

‘‘आएंगे, मैं उन्हें ले कर आती हूं.’’

पापाजी बिस्तर पर लेटे छत की ओर एकटक देख रहे थे. रीता के आने का उन्हें पता ही नहीं चला.

पापाजी, ‘‘चलिए, खाना खाते हैं.’’

‘‘मेरा खाना यहीं भिजवा दो,’’ वे धीरे से बोले.

‘‘पापाजी मैं तो हमेशा मांपापा और रीमा के साथ खाना खाती थी. यहां अकेले मु झ से न खाया जाएगा,’’ रीता ने उन के पलंग के पास जा कर कहा.

पापाजी चुपचाप आ कर बैठ गए. सभी आश्चर्य से कभी रीता को तो कभी पापाजी को देख रहे थे.

खाने खाते हुए रीता बातें भी कर रही थी पर पापाजी हां और हूं में ही जवाब दे रहे थे. रीता देख रही थी खाना खाते हुए पापाजी के चेहरे पर तृप्ति का भाव था. पता नहीं कितने दिनों बाद गरम खाना खा रहे थे. खाना भी रोज के मुकाबले ज्यादा खाया.

फिर रीता ने थोड़ी देर आराम किया. शाम के 6 बजे थे. फटाफट तैयार हुई. कमरे के इस बदलाव पर तुषार की प्रतिक्रिया जो देखना चाहती थी. बारबार नजर घड़ी पर जा रही थी. तुषार का इंतजार करना उसे भारी लग रहा था.

डोरबैल बजते ही मुसकराते हुए दरवाजा खोला. तुषार का मन खिल उठा. कौन नहीं चाहता घर पर उस का स्वागत मुसकराहटों से हो.

‘‘सौरी, देर हो गई.’’

‘‘कोई बात नहीं.’’

कमरे में पैर रखते हुए चारों ओर नजर घुमाई और फिर एक कदम पीछे हट गया.

‘‘क्या हुआ?’’ रीता ने पूछा.

‘‘शायद मैं गलत घर में आ गया हूं.’’

रीता ने हाथ पकड़ कर खींचते हुए कहा, ‘‘हां, आप मेरे घर में आ गए हो,’’ और फिर दोनों की सम्मिलित हंसी से कमरा भी मुसकरा उठा. रीता को अपने काम की प्रशंसा मिल चुकी थी.

पलंग पर बैठ कर तुषार जूते उतार कर हमेशा की तरह जैसे ही उन्हें पलंग के नीचे खिसकाने लगा रीता बोल पड़ी, ‘‘प्लीज, जूते रैक पर रखें.’’

‘‘सौरी, आगे से ध्यान रखूंगा,’’ कहते हुए उस ने जूते रैक पर रख दिए.

आदतें एकदम से नहीं बदलतीं. उन्हें समय तो लगता ही है. जैसे ही तुषार ने कपड़े उतार कर बिस्तर पर रखे रीता ने उठा कर हैंगर पर टांग दिए. बारबार टोकना व्यक्ति में खीज पैदा करता है, यह बात रीता बहुत अच्छी तरह सम झती थी. आदतन बाथरूम से निकल कर तौलिया फिर बिस्तर पर… जब मुसकराते हुए रीता उसे बाथरूम में टांगने गई तो तुषार को अपनी इस हरकत पर शर्म महसूस हुई. तभी उस ने तय कर लिया कि वह भी कोशिश करेगा चीजें व्यवस्थित रखने की.

‘‘अच्छा बताओ ससुराल में आज का दिन कैसे बिताया? मैं भी न… मु झे दिखाई दे रहा है दिनभर तुम ने बहुत मेहनत की.’’

‘‘पहली बात तो यह है यह ससुराल नहीं मेरा अपना घर है. इसे व्यवस्थित करना भी तो मेरा ही काम है.

फिर रीता ने पापाजी के कमरे की सफाई, पापाजी का डाइनिंग टेबल पर खाना खाना सारी बातें विस्तार से बताईं. तुषार को खुद पर नाज हो रहा था कि इतनी सुघड़ पत्नी मिली.

‘‘अरे, 9 बज गए. समय का पता ही नहीं चला. डिनर का भी समय हो गया. आप पहुंचिए मैं पापाजी को ले कर आती हूं.’’

फिर उन के कमरे में जा कर बोली, ‘‘पापाजी, चलिए खाना तैयार है.’’

इस बार पापाजी बिना कुछ कहे डाइनिंगटेबल पर आ गए.

‘‘पापाजी, मु झे अभी आप की और तुषार की पसंद नहीं मालूम, इसलिए आज अपनी पसंद से खाना बनवाया है.’’

‘‘तुम्हारी पसंद भी तुम्हारी तरह अच्छी ही होगी. क्यों पापाजी?’’

तुषार की इस बात का जवाब पापाजी ने मुसकराहट में दिया.

रीमा को घर के कामों से कोई मतलब नहीं था. रीता की शादी के बाद पापा को सारे काम अकेले ही करने पड़ते थे.

शादी को 1 साल होने वाला था. पापाजी अवसाद से बाहर आ गए थे. उन की दवाइयां भी बहुत कम हो गई थीं. अब वे कमरे में सिर्फ सोने जाते थे.

जैसे एक छोटा बच्चा दिनभर मां के आगेपीछे घूमता है वही हाल पापाजी का भी था. थोड़ी भी देर यदि रीता दिखाई न दे तो पूछने लग जाते. 1 साल में मुश्किल से 1-2 बार ही मायके गई थी. पापाजी जाने ही नहीं देते थे. वह स्वयं भी पापाजी को छोड़ कर नहीं जाना चाहती थी. मायका लोकल होने के कारण मम्मीपापा खुद ही मिलने आ जाते थे.

पापाजी अस्वस्थ होने के कारण अपने बेटे की शादी ऐंजौय नहीं कर पाए थे, इसलिए वे शादी की पहली सालगिरह धूमधाम से मनाना चाहते थे. इस के लिए वे बहुत उत्साहित भी थे. सारे कार्यक्रम की रूपरेखा भी वही बना रहे थे. आखिर जिस दिन का इंतजार था वह भी आ गया.

सुबह से ही तुषार और रीता के मोबाइल सांस नहीं ले पा रहे थे. हाथ में ऐसे चिपके थे जैसे फैविकोल का जोड़ हो. एक के बाद एक बधाइयां जो आ रही थीं. घर में चहलपहल शुरू हो गई थी. मेहमानों का आना शुरू था. कुछ तो रात में ही आ गए थे.

एक मौका और दीजिए- भाग 2: बहकने लगे सुलेखा के कदम

नीलेश भी चुप लगा गया. वैसे नीलेश की पारखी नजरों से यह बात छिप नहीं पाई कि उस की बात सुन कर मनीष परेशान हो गया है. ज्यादा कुछ न कह कर मनीष कुछ काम है, कह कर उस के पास से हट गया. उस दिन उसे पहली बार महसूस हुआ कि दोस्ती चाहे कितनी भी गहरी क्यों न हो पर कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें व्यक्ति किसी के साथ शेयर नहीं करना चाहता.

उधर मनीष, नीलेश के प्रति अपने व्यवहार के लिए स्वयं को धिक्कार रहा था. पहली बार ऐसा हुआ था कि कोई प्रोग्राम बनने से पूर्व ही अधर में लटक गया था पर वह करता भी तो क्या करता. नीलेश की बातें सुन कर उस के दिल में  शक का कीड़ा कुलबुला कर नागफनी की तरह डंक मारते हुए उसे दंशित करने लगा था.

वह जानता था कि उसे महीने में 10-12 दिन घर से बाहर रहना पड़ता है. ऐसे में हो सकता है सुलेखा की किसी के साथ घनिष्ठता हो गई हो. इस में  कुछ बुरा भी नहीं है पर उसे यही विचार परेशान कर रहा था कि सुलेखा ने उस सुयश नामक व्यक्ति से उसे क्यों नहीं मिलवाया, जबकि नीलेश के अनुसार वह उस से मिलती रहती है. और तो और उस ने उस का नीलेश से अपना ममेरा भाई बता कर परिचय भी करवाया…जबकि उस की जानकारी में उस का कोई ममेरा भाई है ही नहीं…उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे पर सिर्फ अनुमान के आधार पर किसी पर दोषारोपण करना उचित भी तो नहीं है.

एक दिन जब सुलेखा बाथरूम में थी तो वह उस का सैलफोन सर्च करने लगा. एक नंबर  उसे संशय में डालने लगा क्योंकि उसे बारबार डायल किया गया था. नाम था सुश…सुश. नीलेश की जानकारी में सुलेखा का कोई दोस्त नहीं है फिर उस से बारबार बातें क्यों किया करती है और अगर उस का कोई दोस्त है तो उस ने उसे बताया क्यों नहीं. मन ही मन मनीष ने सोचा तो उस के अंतर्मन ने कहा कि यह तो कोई बात नहीं कि वह हर बात तुम्हें बताए या अपने हर मित्र से तुम्हें मिलवाए.

पर जीवन में पारदर्शिता होना, सफल वैवाहिक जीवन का मूलमंत्र है. अपने अंदर उठे सवाल का वह खुद जवाब देता है कि वह तुम्हारा हर तरह से तो खयाल रखती है, फिर मन में शंका क्यों?

‘शायद जिसे हम हद से ज्यादा प्यार करते हैं, उसे खो देने का विचार ही मन में असुरक्षा  पैदा कर देता है.’

‘अगर ऐसा है तो पता लगा सकते हो, पर कैसे?’

मन तर्कवितर्क में उलझा हुआ था. अचानक सुश और सुयश में उसे कुछ संबंध नजर आने लगा और उस ने वही नंबर डायल कर दिया.

‘‘बोलो सुलेखा,’’ उधर से किसी पुरुष की आवाज आई.

पुरुष स्वर सुन कर उसे लगा कि कहीं गलत नंबर तो नहीं लग गया अत: आफ कर के पुन: लगाया, पुन: वही आवाज आई…

‘‘बोलो सुलेखा…पहले फोन क्यों काट दिया, कुछ गड़बड़ है क्या?’’

उसे लगा नीलेश ठीक ही कह रहा था. सुलेखा उस से जरूर कुछ छिपा रही है… पर क्यों, कहीं सच में तो उस के पीछे उन दोनों में… अभी वह यह सोच ही रहा था कि सुलेखा नहा कर आ गई. उस के हाथ में अपना मोबाइल देख कर बोली, ‘‘कितनी बार कहा है, मेरा मोबाइल मत छूआ करो.’’

‘‘मेरे मोबाइल से कुछ नंबर डिलीट हो गए थे, उन्हीं को तुम्हारे मोबाइल से अपने में फीड कर रहा था,’’ न जाने कैसे ये शब्द उस की जबान से फिसल गए.

अपनी बात को सिद्ध करने के लिए वह ऐसा ही करने लगा जैसा उस ने कहा था. इसी बीच उस ने 2 आउटगोइंग काल, जो सुश को करे थे उन्हें भी डिलीट कर दिया, जिस से अगर वह सर्च करे तो उसे पता न चले.

अब संदेह बढ़ गया था पर जब तक सचाई की तह में नहीं पहुंच जाए तब तक वह उस से कुछ भी कह कर संबंध बिगाड़ना नहीं चाहता था. उस की पत्नी का किसी के साथ गलत संबंध है तथा वह उस से चोरीछिपे मिला करती है, यह बात भी वह सह नहीं पा रहा था. न जाने उसे ऐसा क्यों लगने लगा कि वह नामर्द तो नहीं, तभी उस की पत्नी को उस के अलावा भी किसी अन्य के साथ की आवश्यकता पड़ने लगी है.

‘तुम इतने दिन बाहर टूर पर रहते हो, अपने एकाकीपन को भरने के लिए सुलेखा किसी के साथ की चाह करने लगे तो इस में क्या बुराई है?’ अंतर्मन ने पुन: प्रश्न किया.

‘बुराई, संबंध बनाने में नहीं बल्कि छिपाने में है, अगर संबंध पाकसाफ है तो छिपाना क्यों और किस लिए?’

‘शायद इसलिए कि तुम ऐसे संबंध को स्वीकार न कर पाओ…सदा संदेह से देखते रहो.’

‘क्या मैं तुम्हें ऐसा लगता हूं…नए जमाने का हूं…स्वस्थ दोस्ती में कोई बुराई नहीं है.’

‘सब कहने की बात है, अगर ऐसा होता तो तुम इतने परेशान न होते… सीधेसीधे उस से पूछ नहीं लेते?’

‘पूछने पर मन का शक सच निकल गया तो सह नहीं पाऊंगा और अगर गलत निकला तो क्या मैं उस की नजरों में गिर नहीं जाऊंगा.’

‘जल्दबाजी क्यों करते हो, शायद समय के साथ कोई रास्ता निकल ही आए.’

‘हां, यही ठीक रहेगा.’

इस सोच ने तर्कवितर्क में डूबे मन को ढाढ़स बंधाया…उन के विवाह को 10 महीने हो चले थे. वह अपने पी.एफ. में उसे नामिनी बनाना चाहता था, उस के लिए सारी औपचारिकता पूरी कर ली थी. बस, सुलेखा के साइन करवाने बाकी थे. एक एल.आई.सी. भी खुलवाने वाला था, पर इस एपीसोड ने उसे बुरी तरह हिला कर रख दिया. अब उस ने सोचसमझ कर कदम उठाने का फैसला कर लिया.

यद्यपि सुलेखा पहले की तरह सहज, सरल थी पर मनीष के मन में पिछली घटनाओं के कारण हलचल मची हुई थी. एक बार सोचा कि किसी प्राइवेट डिटेक्टर को तैनात कर सुलेखा की जासूसी करवाए, जिस से पता चल सके कि वह कहां, कब और किस से मिलती है पर जितना वह इस के बारे में सोचता, बारबार उसे यही लगता कि ऐसा कर के वह अपनी निजी जिंदगी को सार्वजनिक कर देगा…आखिर ऐसी संदेहास्पद जिंदगी कोई कब तक बिता सकता है. अत: पता तो लगाना ही पड़ेगा, पर कैसे, समझ नहीं पा रहा था.

हफ्ते भर में ही ऐसा लगने लगा कि वह न जाने कितने दिनों से बीमार है. सुलेखा पूछती तो कह देता कि काम की अधिकता के कारण तबीयत ढीली हो रही है…वैसे भी सुलेखा का उस की चिंता करना दिखावा लगने लगा था. आखिर, जो स्त्री उस से छिप कर अपने मित्र से मिलती रही है वह भला उस के लिए चिंता क्यों करेगी?

उस दिन मनीष का मन बेहद अशांत था. आफिस से छुट्टी ले ली थी. सुलेखा ने पूछा तो कह दिया, ‘‘तबीयत ठीक नहीं लग रही है, अत: छुट्टी ले ली.’’

बिचौलिए- भाग 3: क्यों मिला वंदना को धोखा

‘‘सर, घबराइए मत. आप को ऐसा दर्शाने का सिर्फ अभिनय करना है. वंदना के साथ कुछ नहीं करना पड़ेगा आप को. बस, समीर को दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत होना चाहिए जैसे वंदना और आप दिनप्रतिदिन एकदूसरे के ज्यादा नजदीक आते जा रहे हो. उस के दिल में ईर्ष्याग्नि भड़काने की जिम्मेदारी मेरी होगी.’’

‘‘कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए?’’

‘‘कुछ नहीं होगा, सर. मैं ने इस योजना पर खूब सोचविचार कर लिया है.’’

‘‘वंदना और समीर की जोड़ी को सलामत रखने को तुम बिचौलिए की भूमिका बखूबी निभा रही हो, सीमा.’’

‘‘बिचौलिए के इस कार्य में आप मेरे बराबर के साथी हैं, यह मत भूलिए, सर,’’ सीमा की इस बात पर उन दोनों का सम्मिलित ठहाका कक्ष में गूंज उठा.

‘‘चाय पियोगी न?’’ एकाएक उन्होंने पूछा तो सीमा से हां या न कुछ भी कहते नहीं बना.

दिनेश साहब के कक्ष में उस ने पहले कभी चाय इसलिए नहीं पी थी क्योंकि कभी उन्होंने ऐसा प्रस्ताव उस के सामने रखा ही नहीं. उस के मौन को स्वीकृति समझ उन्होंने चपरासी को बुला कर 2 कप चाय लाने को कहा. सीमा और वे फिर काफी देर तक एकदूसरे की व्यक्तिगत, घरेलू जिंदगी के बारे में वार्त्तालाप करते रहे. इस पूरे सप्ताह समीर ने वंदना के साथ खुल कर बातें करने के कई प्रयास किए, पर हर बार वह असफल रहा. वंदना उस से कुछ कहनेसुनने को तैयार नहीं थी. समीर की बेचैन नजरें बारबार वंदना के कक्ष की तरफ उठती देख कर सीमा मन ही मन मुसकरा उठती थी. दिनेश साहब की पीठ को गुस्सेभरे अंदाज में समीर को घूरता देख कर तो उस का दिल खिलखिला कर हंसने को करता था. अपनी योजना को आगे बढ़ाने के इरादे से उस ने दूसरे शनिवार को मिलने वाली आधे दिन की छुट्टी का फायदा उठाने का कार्यक्रम बनाया.

‘‘वंदना, कल शनिवार है और तुझे दिनेश साहब के साथ फिल्म देखने जाना है. मैं आज शाम 2 टिकट लेती जाऊंगी,’’ सीमा का यह प्रस्ताव सुन कर वंदना घबरा उठी.

‘‘यह मुझ से नहीं होगा, दीदी,’’ वंदना ने परेशान लहजे में कहा.

‘‘देख, समीर से तेरे दूर रहने के कारण वह अब पूरा दिन तेरे बारे में ही सोचता रहता है. दिनेश साहब और तेरे बीच कुछ चक्कर चल रहा है, इस वहम ने उसे परेशान कर रखा है. अब अगर तू दिनेश साहब के साथ फिल्म देखने चली जाती है तो वह बिलकुल ही बौखला उठेगा. तू ऐसे ही मेरे कहने पर चलती रही, तो वह बहुत जल्दी ही तेरे सामने शादी का प्रस्ताव रखने को मजबूर हो जाएगा,’’ सीमा ने उसे समझाया.

कुछ देर सोच में डूबी रह कर वंदना ने कहा, ‘‘दीदी, आप की बात में दम है, पर मैं अकेली उन के साथ फिल्म देखने नहीं जाऊंगी. मुझे शर्म आएगी. हां, एक बात जरूर हो सकती है.’’

‘‘कौन सी बात?’’

‘‘आप भी हमारे साथ चलना. आप की उपस्थिति से मैं सहज रहूंगी और समीर को जलाने की हमारी योजना भी कामयाब रहेगी.’’ सीमा ने कुछ सोचविचार कर इस प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी. दिनेश साहब की रजामंदी हासिल करना उस के लिए कोई कठिन नहीं था. वे तीनों फिल्म देखने जा रहे हैं, यह जानकारी सीमा द्वारा समीर को तब मिली जब उस ने बड़े बाबू को ऊंचे स्वर में यह बात शनिवार की सुबह बताई. समीर के चेहरे का पहले गुस्से से तमतमाना और फिर उस के चेहरे पर उड़ती नजर आती हवाइयां, ये दोनों बातें ही सीमा की नजरों से छिपी नहीं रही थीं. उन तीनों का इकट्ठा फिल्म देखने का कार्यक्रम सफल नहीं हुआ, पर यह बात समीर नहीं जान सका था. वह तो आंखों से भालेबरछियां बरसाता उन्हें तब तक कुछ दूरी पर खड़ा घूरता रहा था, जब तक सीमा और वंदना को ले कर तिपहिया स्कूटर व दिनेश साहब का स्कूटर औफिस के कंपाउंड से चल नहीं पड़े थे.

हाल में प्रवेश करने से कुछ ही मिनट पूर्व वंदना का छोटा भाई दीपक उसे बुला कर घर ले गया था. वंदना की मां की तबीयत अचानक खराब हो जाने के कारण उस का बुलावा आया था. फिल्म सीमा और दिनेश साहब को ही देखने को मिली. सीमा झिझकते हुए अंदर घुसी थी उन के साथ. उन के शालीन व सभ्य व्यवहार के कारण वह जल्दी ही सामान्य हो गई थी. लोग उन्हें यों साथसाथ देख कर क्या कहेंगे व क्या सोचेंगे, इस बात की चिंता करना भी उसे तब मूर्खतापूर्ण कार्य लगा था. फिल्म की समाप्ति के बाद दोनों एक रेस्तरां में कौफी पीने भी गए. वार्त्तालाप वंदना और समीर के आपसी संबंधों के विश्लेषण से जुड़ा रहा था. दोनों ही इस बात से काफी उत्साहित व उत्तेजित नजर आते थे कि समीर अब वंदना का प्यार व विश्वास फिर से हासिल करने को काफी बेचैन नजर आने लगा था.

‘‘मैं समझती हूं कि अगले सप्ताह के अंत तक समीर और वंदना के केस में सफलता मिल जाएगी,’’ सीमा ने विश्वासभरे स्वर में आशा व्यक्त की.

‘‘तुम्हारा मतलब है समीर वंदना के साथ शादी का प्रस्ताव रख देगा?’’

‘‘हां.’’

‘‘तब तो हम बिचौलियोें का काम भी समाप्त हो जाएगा?’’

‘‘वह तो हो ही जाएगा.’’

‘‘पर इस का मुझे कुछ अफसोस रहेगा. मजा आ रहा था मुझे तुम्हारे निर्देशन में काम करने में, सीमा. तुम्हारा दिल सोने का बना है.’’

‘‘प्रशंसा के लायक मैं नहीं, आप हैं. आप के सहयोग के बिना कुछ भी होना संभव नहीं होता, सर.’’ ‘‘मेरी एक बात मानोगी, सीमा?’’ सीमा ने प्रश्नसूचक निगाहों से उन की तरफ देखा, ‘‘औफिस के बाहर मुझे ‘सर’ मत कहा करो. मेरा नाम ले सकती हो तुम.’’ सीमा से कोई जवाब देते नहीं बना. अचानक उस की दिल की धड़कनें तेज हो गईं.

‘‘तुम मुझे औफिस के बाहर दिनेश बुलाओगी, तो मुझे अच्छा लगेगा,’’ यह कहते हुए उन का गला सूख गया.

‘‘मैं…मैं कोशिश करूंगी, सर,’’ कह कर सीमा हंस पड़ी तो उन के बीच का माहौल फिर सहज हो गया था. रेस्तरां से निकल कर वे कुछ देर बाजार में घूमे. फिर उन के स्कूटर पर बैठ कर सीमा घर लौटी.

‘‘आप, अंदर आइए न.’’

उस के इस निमंत्रण पर दिनेश साहब का सिर इनकार में हिला, ‘‘मैं फिर कभी आऊंगा सीमा, और जब आऊंगा, खाना खा कर जाऊंगा.’’

‘‘अवश्य स…नहीं, दिनेश,’’ सीमा मुसकराई, ‘‘मेरी आज की शाम बहुत अच्छी गुजरी है, इस के लिए धन्यवाद, दिनेश. अच्छा, शुभरात्रि.’’

सीमा जिस अंदाज में लजा कर तेज चाल से अपने घर के मुख्यद्वार की तरफ गई, उस ने दिनेश साहब के बदन में झनझनाहट पैदा कर दी. दरवाजे पर पहुंच सीमा मुड़ी और एक हाथ हिलाने के बाद मुसकराती हुई घर में प्रवेश कर गई.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें