हनी ट्रैप बिजनैस और कानून

यौन संबंधों को ले कर बने कानूनों का लाभ उठाने के लिए अपराधियों ने एक नया व्यवसाय खड़ा कर लिया है, हनी ट्रैप का. इस में बड़ी आसानी से सेक्स के भूखे पुरुषों को फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप आदि से पहले दोस्ती की जाती है और फिर फोन नंबर ले कर मिलने का न्यौता दिया जाता है.

यहां तक बात स्वाभाविक और 2 व्यस्कों का मामला है. हर पुरुष की चाहत होती है कि पत्नी हो या न हों, उस की गर्लफ्रैंड जरूर हो जिस से वह अपने सुखदुख बांट सके और संभव हो तो सेक्स संबंध बना सके. सिर्फ सेक्स संबंध बनाने के लिए यूं तो वेश्याओं का बड़ा बाजार है पर उस में जोखिम बहुत हैं और लोग कतराते है. हनी ट्रैप में वे फंसते हैं जो कोई झमेला नहीं चाहते और केवल बदलाव, उत्सुकता या श्रमिक आनंद की खातिर कुछ रोमांचक करने को तैयार हो जाते हैं.

हनी ट्रैप में आने पर लडक़ी पुरुष के साथ अपनी सैक्सी अदाएं दिखाती हैं और कभी सैल्फी से तो कभी छिपे कैमरे से फोटो खींच ली जाती है. कई बार ऐन क्रिटिवल समय पर दरवाजा खोल कर 3-4 लोग घुस जाते है जो लडक़ी के साथी होते है जो ब्लैकमेल, लूट, मारापीटी करने लगते हैं.

हाल के बने कानूनों ने हनी ट्रैप बिजनैस को खूब बढ़ावा दिया है. आजकल हनी ट्रैप के शातिर पुरुष पर किसी भी तरह का आरोप लगा सकती है और अगर मामला पुलिस में चला जाए तो न केवल पुरुष की जगहंसाई, जग प्रतारणा होती ही है और घर में भीषण गृहयुद्ध भी छिड़ जाता है, जेल भी हो सकती है. यदि पुरुष इस जिद पर अड़ जाए कि जो हुआ वह सहमति से हुआ और अपराध नहीं हुआ. पुलिस और अदालत उसे जेल पहले भेज देंगे और सफाई देने का मौका महीनों बाद मिलेगा और लंबी अदालती लड़ाई के बाद ही छुटकारा मिलेगा. यही ब्लैकमेल का अवसर पैदा करता है.

स्त्री पुरुष संबंध व्यस्क संबंध है और इन पर बनाए गए कानून असल में स्त्री को अधिकार नहीं देते, उसे और गुलामी की जंजीरों में बांध रहे हैं. जैसे जून में दिल्ली के एक मामले में हुआ जिस में 3 पुरुषों और एक युवती ने एक पुरुष को फंसाया.

उन पुरुषों को लूटा तो गया पर वह पुलिस में  चला गया और जो पता लगा उस से यह स्पष्ट है कि यह युवती जो अपराधियों के साथ है, खुद एक पीडि़त ही है. वह इस तरह के अपराध में किसी लालच या भय के कारण शामिल हुई होगी. उसे जबरन चुग्गा बना कर फेंका गया. जो कानून उसे बचाने के लिए बनाया गया था, उसी कानून के अनुसार वह सिर्फ एक अपराध का हथियार थी.

वेश्यावृत्ति समाप्त करने वाले ज्यादातर कानूनों में वेश्याओं को अपराधी नहीं माना गया पर पुलिस उन्हीं को सब से ज्यादा लूटती है. इन कानूनों के बावजूद कोठों में रह रहीं या स्वतंत्र रूप से देह बेचने वाली दोनों समाज व पुरुषों की शिकार हैं और कानूनों ने उन्हें और जकड़ दिया है.

कार्यक्षेत्र में यौन प्रतारण कानून ने औरतों की आजादी छीन ली है. वे पुरुषों की तरह हंसबोल भी नहीं सकती. क्योंकि पुरुष उन से डरते रहते हैं. उन्हें जोखिम का काम नहीं दिए जाते. उन की युवावस्था की अपील पर कोई विवाद न खड़ा हो जाए इसलिए कंपनियां उन्हें जिम्मेदारी वाले पद देने से कतराती हैं. जो कंपनियां उन्हें आगे रखने का जोखिम लेती हैं, वे उन का केबल सजावटी उपयोग करती है और सब कोशिश करते है कि उन्हें दूरदूर रखा जाए. अच्छे से अच्छे दफ्तर या कारखाने में औरतों के अलग गुट बन जाते हैं, जिन कानूनों से अपेक्षा थी कि वे ङ्क्षलग भेद समाप्त करके बराबर के अवसर देंगे, वे अब फिर उन्हें पुरातन औरतों के अलग बाड़ों में बंद कर रहे हैं.

औरतों का नहीं, समाज के विकास के लिए जरूरी है कि औरत का इस्तेमाल पुरुष के क्षणिक सुख के लिए नहीं हो, उसे समाज का बराबर का यूनिट समझा जाए. जो एक तरफा कानून बने हैं, वे ङ्क्षलग भेद को पहले से स्पष्ट कर देते है और औरतों के विकास के रास्ते बंद कर देते हैं. औरत साथी को पुरुष साथी की तरह सहजता से लिया जाए, यह भावना वहीं से पैदा नहीं करते.

मामला एम जे अकबर और तरुण तेजपाल जैसे पत्रकारों का हो या जौनी डैप और एंकर हस्र्ट का हो सैक्सटौर्थन के मामलों में औरतें विक्टिम ही बनी रहती हैं. ये मामले दिखाते हैं कि औरतें आज भी वीकर सैक्स हैं और नए कानूनों या नई कानूनी परिभाषाओं ने वीकर सैक्स के बल देेने के नाम पर उन के पैरों में ब्रेसख बांध दिए हैं जो उन्हें कमजोर ही दर्शाते हैं.

वर्किंग वुमन के लिए परफेक्ट हैं ये 8 ब्यूटी टिप्स

अधिकांश कामकाजी महिलाओं को सही से तैयार होने का समय नहीं मिल पाता है, जो उनके मेकअप को प्रभावित करता है. ड्राई शैम्पू और पेट्रोलियम जेली जैसे उत्पाद कामकाजी महिलाओं के जीवन को आसान बना सकते हैं.

इन टिप्स को अपनाकर कामकाजी महिलाएं अपना रुप निखारने के साथ साथ आकर्षक लुक भी पा सकती हैं.

1. अगर आपके पास शैम्पू करने का समय नहीं है और आपको काम के बाद पार्टी में जाना है तो फिर आप ड्राई शैम्पू का इस्तेमाल कर सकती हैं. अगर यह स्प्रे के रूप में है तो इसे बालों की जड़ों पर स्प्रे कर कंघी कर लें और इससे बालों की गंदगी और तैलीयपन दूर हो जाएगी.

2. सुबह बाल धुलने के बाद अगर आपके पास हेयर ड्रायर इस्तेमाल करने का समय नहीं है तो तौलिए का इस्तेमाल करें और सूती टी-शर्ट से बांध लें. सूती टी-शर्ट बालों की नमी को तुरंत सोख लेगा और बालों में नैचुरल मॉइश्चराइजर छोड़ देगा, जो नैचुरल कर्ल बनाए रखेगा. आप सीरम का भी इस्तेमाल कर सकती हैं.

3. व्यस्तता के चलते अगर आप मैनीक्योर और पैडीक्योर के लिए सैलून नहीं जा पा रही हैं तो फिर रात में सोने से पहले हाथों और पैरों पर पेट्रोलियम जेली लगाएं. पैरों पर लगाकर मोजे पहन लें. यह त्वचा में नैचुरल मॉइश्चराइजर बनाता है.

4. देर रात पार्टी से आने के बाद किसी की भी नींद मुश्किल से ही पूरी हो पाती है और सुबह ऑफिस जाते समय आपका चेहरा उदास व बेजान दिख सकता है. आंखों की निचले किनारे पर स्किन या सफेद रंग का पेंसिल लगाएं और फिर आंखों पर लाइनर लगाएं.

5. ऑफिस के बाद पार्टी जाने के लिए कामकाजी महिलाएं अपने पास बनाना बैंड्स या फंकी एक्सेसरीज रख सकती हैं. उनके लिए फ्रंट पफ हेयर स्टाइल करना आसान होगा. आप चाहे तो पफ के साथ हाईपोनीटेल भी बना सकती हैं.

6. कभी-कभी किसी खास शेड की लिपस्टिक लगाने का मन करता है लेकिन उस समय अगर यह आपके पास नहीं है तो होठों पर आप अच्छी कंपनी का मॉइश्चराइजर या जेली लगाएं और फिर उस पर आप जिस रंग की लिपस्टिक लगाना चाहती थी तो उस रंग का आईशैडो लगाएं.

7. चेहरे की त्वचा में नमी व निखरा बरकरार रखने के लिए गुलाब जल का स्प्रे करना नहीं भूलें.

8. आंखों की बरौनी को उभार देने के लिए रूई का फाहा लेकर उस पर थोड़ा सा बेबी पाउडर डालें और मस्कारा लगाने के बाद इसे हल्के हाथों से बरौनियों पर लगाएं और फिर दोबारा मस्कारा लगाएं, इससे आपकी आंखें बेहद खूबसूरत लगेंगी.

Monsoon Special: नाश्ते में बनाएं चिली चीज टोस्ट

नाश्ते में अगर आप आसान रेसिपी ट्राय करना चाहते हैं तो ये चिली चीज टोस्ट आपके लिए अच्छा औप्शन है.

सामग्री

40 ग्राम पनीर

40 ग्राम मोजरेला पनीर

10 ग्राम हरीमिर्च

5 पार्सले

1 ब्रैडस्लाइस.

विधि

ब्रैडस्लाइस को टोस्टर में एकतरफ रखें. फिर ब्रैडस्लाइस के ऊपर सारी सामग्री रखें. अब ब्रैड को ओवन में तब तक बेक करें जब तक पनीर सुनहरा भूरा न हो जाए. अब इस टोस्ट के 4 टुकड़े करें और टोमैटो कैचअप के साथ सर्व करें.

Monsoon Special: मॉनसून में ऐसे दिखें अट्रैक्टिव और स्टाइलिश

मॉनसून के दौरान ऑफिस में पेशेवर और सहज दिखना थोड़ा कठिन हो जाता है. लेकिन इन सलाहों को मानकर आप मॉनसून में भी स्टाइलिश नजर आ सकती हैं. मॉनसून को देखते हुए कुछ ऐसे ही उपयोगी टिप्स.

चटक रंगों का प्रयोग

मॉनसून के दौरान रहने वाले अनमने से मौसम को नीले, लाल और संतरी रंग के परिधानों के जरिए मात दी जा सकती है. इस मौसम में सफेद कपड़े न पहनें. बारिश में भीगने पर उनमें से आरपार नजर आता है और उन पर दाग भी आसानी से लगते हैं.

पतलून और स्कर्ट

लंबी पतलून न पहनें क्योंकि वे जल्दी गंदी होती हैं. आप चाहें तो अपनी सुविधा और माहौल अनुसार, उन्हें नीचे से मोड़ सकती हैं. इस मौसम के हिसाब से स्मार्ट फॉर्मल स्कर्ट बढ़िया हैं.

कोट और जैकेट

आप पश्चिमी परिधानों को बरसाती कोट या जैकेट के साथ पहन सकती हैं.

भारतीय परिधान

अगर आप मॉनसून के दौरान पारंपरिक भारतीय परिधान को प्राथमिकता देती हैं तो सलवार और पटियाला की बजाय शॉर्ट कुर्ती के साथ लैगिंग या चूड़ीदार आजमाएं. इस मौसम में बड़े-बड़े दुपट्टों की जगह स्कार्फ या स्टॉल डालें. बारिश में ऐसे प्रिंट और रंगों वाले कपड़े कतई न पहनें, जो भीगने पर रंग छोड़ें.

जूते-चप्पल

इस मौसम में चमड़े के जूते या सैंडिल न पहनें क्योंकि ये जल्दी गीले होते हैं और सूखने में बहुत वक्त लेते हैं. जेली शूज, बिना हील वाली चप्पल-जूते और अन्य मजबूत, बिना फिसलने वाले फुटवियर पहनें.

मेकअप

वाटरप्रूफ काजल और आई-लाइनर लगाएं. बारिश के मौसम में फाउंडेशन का प्रयोग न करें और अगर लगाना ज्यादा ही जरूरी है, तो हल्का लगाएं.

बाल

मॉनसून में वातावरण में मौजूद नमी आपके बालों को उलझा सकती है. बालों का जूड़ा या चोटी बनाना बेहतर होगा.

डेनिम

मॉनसून में डेनिम को भूल जाएं. इन्हें सूखने में बहुत वक्त लगता है.

छाता

कपड़ों से मेल खाता छाता चुनें.

आप डैमीसैक्सुअल तो नहीं, अगर हां तो पढ़ें ये खबर

आप ने अब तक सैक्सुअलिटी को ले कर कई शब्द सुने होंगे जैसे बाईसैक्सुअल, पैनसैक्सुअल, पौलिसैक्सुअल, असैक्सुअल, सेपोसैक्सुअल और भी कई तरह के शब्द. पर अब एक और नया शब्द सैक्सुअलिटी को ले कर एक नए रूप में आ रहा है और वह है डैमीसैक्सुअल. ये वे लोग हैं जो असैक्सुअलिटी के कगार पर हो सकते हैं पर पूरी तरह से अलैंगिक नहीं हैं. यदि आप किसी से सैक्सुअली आकर्षित होने से पहले अच्छे दोस्त होना पसंद करते हैं तो आप निश्चित रूप से डैमीसैक्सुअल हैं.

सैक्सुअलिटी की पहचान

यह जानने के कई तरीके हैं कि आप डैमीसैक्सुअल हैं या नहीं. सब से मुख्य तरीका यह है कि जब तक आप किसी से भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ते, आप सैक्सुअल फीलिंग्स महसूस नहीं करते. आप के लिए भावनाएं महत्त्वपूर्ण हैं. आप सारी उम्र एक ही व्यक्ति से संबंध बना कर रह सकते हैं. आप प्रयोग से डरते हैं.

आप सैक्सुअल इंसान नहीं हैं, इस में कोई बुराई नहीं है. सैक्स के पीछे भागने से ज्यादा आप को जीवंत, वास्तविक बातचीत करना ज्यादा अच्छा लगता है. यदि आप किसी से रिलेशनशिप में हैं और उस से इमोशनली जुड़ हुए हैं तभी आप अपने पार्टनर के प्रति सैक्सुअली आकर्षित होते हैं. यदि आप सिंगल हैं, तो आप निश्चित रूप से सैक्स से ज्यादा पार्क में एक अच्छी सैर या अपनी पसंद की कोई चीज खाना पसंद करेंगे.

जिसे आप पसंद करती हैं, उस से मिलने के बाद आप उस के व्यक्तित्व से प्रभावित होंगी, उस के लुक्स से नहीं, इसलिए किसी भी चीज से पहले आप की उस से दोस्ती होगी. आप किसी से मिलने पर सैक्सुअल होने या फ्लर्टिंग में विश्वास नहीं रखते. यदि एक व्यक्ति ने आप को अपने व्यक्तित्व से प्रभावित किया है तो आप पहले दोस्ती में अपना हाथ बढ़ाएंगे. घंटों, हफ्तों, महीनों में ही डेटिंग शुरू करने की आप सोच भी नहीं सकते, फ्लर्टिंग आप के दिमाग में आती ही नहीं है.

आकर्षण के प्रकार

आकर्षण 2 तरह का होता है-प्राइमरी और सैकेंडरी. प्राइमरी आकर्षण में आप किसी के लुक्स से आकर्षित होते हैं और सैकेंडरी आकर्षण में आप किसी के व्यक्तित्व से प्रभावित होते हैं. यदि आप डैमीसैक्सुअल हैं तो आप निश्चित रूप से सैकेंडरी पर्सनैलिटी टाइप में फिट बैठते हैं. अब इस का मतलब यह नहीं है कि आप को कोई आकर्षित नहीं करता. बहुत लोग आप को आकर्षक लगे होंगे पर आप लुक्स पर ही संबंध नहीं बना सकते. आप तभी आगे बढ़ते हैं जब किसी का व्यक्तित्व आप को प्रभावित करता है.

जब आप के दिल में किसी के लिए फीलिंग्स पैदा होने लगती हैं, विशेषरूप से सैक्सुअल फीलिंग, तो आप दुविधा में पड़ जाते हैं, क्योंकि आप उतने सैक्सुअल पर्सन नहीं हैं. आप नहीं जानते कि इन फीलिंग्स पर क्या प्रतिक्रिया दें या उस व्यक्ति से कैसे शारीरिक कनैक्शन बनाएं. एक बार आप घबराहट और दुविधा की स्थिति से बाहर निकल गए, तो आप अपने पार्टनर से ही सैक्स करना चाहेंगे और किसी से भी नहीं. किसी से सैक्सुअली खुलने के लिए उसे बताएं कि आप उसे कितना प्यार करते हैं, क्योंकि आप बहुत भावुक हैं और फिर सैक्स आप दोनों के लिए बहुत कंफर्टेबल हो जाएगा.

लोगों का आप के प्रति नजरिया

क्योंकि आप सैक्स को ले कर ज्यादा नहीं सोचते, लोग सोच सकते हैं कि आप विवाह होने का इंतजार कर रहे हैं. वे आप को घमंडी और पुराने विचारों का समझ सकते हैं पर इस से आप विचलित न हों. जैसे हैं वैसे ही रहें. आप किसी स्विच को औनऔफ करने की तरह किसी से भी सैक्स नहीं कर सकते. लोगों को अपने मनोभावों पर स्पष्टीकरण देने की चिंता में पड़ें ही नहीं. आप को अपने आसपास हाइली सैक्सुअल लोगों से कोई समस्या भी नहीं होती है. बस आप स्वयं इस स्थिति से खुद को दूर रखते हैं, क्योंकि आप वैसे नहीं हैं. आप सही इंसान का इंतजार कर रहे हैं और अपना जीवन उस के साथ ही सैक्स कर के बिताना चाहते हैं. इस में कुछ भी गलत नहीं है.

डैमीसैक्सुअल होने का मतलब यह नहीं है कि आप को सैक्स पसंद नहीं है. आप को सैक्स पसंद है, सब को सैक्स पसंद होता है पर आप उसी के साथ सैक्स करना चाहते हैं जिस से आप का भावनात्मक जुड़ाव हो. जब सही इंसान आप को मिलता है, आप सैक्सुअली उस से जुड़ जाते हैं. बातचीत और बौंडिंग दोनों आप के लिए ज्यादा महत्त्व रखते हैं.

आप डैमीसैक्सुअल हैं तो आप को यह नहीं सोचना है कि यह कुछ गलत है. आप भावुक हैं, मन के मिले बिना तन से न जुड़ पाएं, तो इस में बुरा क्या है और मन मिलने पर तो आप खुल कर जीते ही हैं. यह बहुत अच्छा है. तो अपनी पसंद का व्यक्ति मिलने पर जीवन का आनंद उठाएं, प्रसन्न रहें.

बेटी के घुटनों में दर्द रहता है, इसकी क्या वजह है?

सवाल-

मेरी 35 साल की बेटी के घुटनों में दर्द है, तो उस के औफिस में किसी को सर्वाइकल की तो किसी को कमर दर्द की समस्या है. इस की क्या वजह है? 

जवाब-

पहले आर्थ्राइटिस की समस्या केवल बुजुर्गों में ही देखने को मिलती थी, लेकिन अब युवाओं को भी इस समस्या से जूझना पड़ रहा है. आजकल युवावर्ग टैक्नोलौजी और सुविधाओं पर इतना ज्यादा निर्भर हो गया है कि शारीरिक परिश्रम करना कहीं पीछे छूट गया है. बच्चों का भी यही हाल है. वे इंटरनैट और टीवी के सामने ही समय बिताना पसंद करते हैं. खेलनाकूदना, पसीना बहाना या शारीरिक मेहनत करना बहुत कम देखने को मिलता है. पहले लोग शारीरिक काम बहुत करते थे, इसलिए स्वस्थ व फिट रहते थे. इस के अलावा युवाओं की अनियमित दिनचर्या, दिन भर डैस्क जौब, टैक्नोलौजी व मशीनों पर बढ़ती निर्भरता, शारीरिक व्यायाम न करने और पोषक खानपान न होने की वजह से आर्थ्राइटिस होने का रिस्क बढ़ जाता है. गौरतलब है कि व्यायाम या शारीरिक गतिविधियां न करने से मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं, जिस से हड्डियों पर वजन पड़ने से जोड़ प्रभावित होने लगते हैं. इसलिए नियमित व्यायाम करने के साथसाथ, खानपान भी पोषक तत्त्वों से युक्त हो.

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रह्यूमेटाइड आर्थ्राइटिस एक जटिल बीमारी है, जिस में जोड़ों में सूजन और जलन की समस्या हो जाती है. यह सूजन और जलन इतनी ज्यादा हो सकती है कि इस से हाथों और शरीर के अन्य अंगों के काम और बाह्य आकृति भी प्रभावित हो सकती है. रह्यूमेटाइड आर्थ्राइटिस पैरों को भी प्रभावित कर सकती है और यह पंजों के जोड़ों को विकृत कर सकती है.

इस बीमारी के लक्षण का पता लगाना थोड़ा मुश्किल होता है. रह्यूमेटाइड आर्थ्राइटिस में सूजन, जोड़ों में तेज दर्द जैसे लक्षण होते हैं. पुरुषों की तुलना में यह बीमारी महिलाओं को अधिक देखने को मिलती है. वैसे तो यह समस्या बढ़ती उम्र के साथसाथ होती है, लेकिन अनियमित दिनचर्या और गलत खानपान के कारण कम उम्र की महिलाओं में भी यह बीमारी देखने को मिल रही है.

रोग के लक्षण

वास्तव में रह्यूमेटाइड आर्थ्राइटिस से पीडि़त 90% लोगों के पैरों और टखनों में रोग के लक्षण सब से पहले दिखाई देने लगते हैं. इस स्थिति का आसानी से उपचार किया जा सकता है, क्योंकि मैडिकल साइंस ने अब काफी प्रगति कर ली है और विकलांगता से आसानी से बचा जा सकता है.

रह्यूमेटाइड आर्थ्राइटिस से ज्यादातर हाथों, कलाइयों, पैरों, टखनों, घुटनों, कंधों और कुहनियों के जोड़ प्रभावित होते हैं. इस रोग में शरीर के दोनों तरफ के एकजैसे हिस्सों में सूजन व जलन हो सकती है. रह्यूमेटाइड आर्थ्राइटिस के लक्षण समय के साथ अचानक या फिर धीरेधीरे नजर आ सकते हैं. पैरों और हाथों में विकृति आना रह्यूमेटाइड आर्थ्राइटिस का सब से सामान्य लक्षण है.

पूरी खबर पढ़ने के लिए- महिलाओं में बढ़ती रह्यूमेटाइड आर्थ्राइटिस की समस्या

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

अहंकार के दायरे: क्या बेटे की खुशियां लौटा सके पिताजी

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शिकस्त- भाग 1: क्या दोबारा रिश्तों पर भरोसा कर पाई रेहाना

ट्रेन के एयरकंडीशंड कोच में मैं ने मुंह धो कर सिर उठाया. बेसिन पर  लगे आईने में एक चेहरा और नजर आया जो कभी मेरा बहुत अपना था. बहुत प्यारा था. आज वक्त की दूरी बीच में बाधक थी. एक पल में मैं ने सोच लिया था कि मुझे क्या करना है. ब्रश उठा टौवल से मुंह पोंछते हुए अजनबियों की तरह उस के करीब से गुजरते हुए अपनी सीट पर आ कर बैठ गई. नाश्ता आ चुका था.

मैं ने ट्रे सामने रख कर नाश्ता करना शुरू कर दिया. कान उस की तरफ लगे हुए थे पर मिलने की या देखने की ख्वाहिश न थी.

कुछ देर बाद मुझे महसूस हुआ कि वह मेरी सीट के करीब रुकी है, मुझे देख रही है. मैं ने उचटती सी नजर उस पर डाली. उस के चेहरे पर उम्र की लकीरें, एक अजब सी थकन, सबकुछ हार जाने का गम साफ नजर आ रहा था. मैं नाश्ता करती रही. कुछ लमहे वह खड़ी रही, फिर अपनी सीट की तरफ बढ़ गई.

मैं ने चाय पी कर अधूरा नौवेल निकाला और खिड़की से टेक लगा कर पढ़ना शुरू कर दिया. पर किताब के शब्द गायब हो रहे थे. उन की जगह यादों की परछाइयां हाथ थामे खड़ी थीं. मेरा अतीत किसी जिद्दी बच्चे की तरह मेरी उंगली खींच रहा था, ‘चलो एक बार फिर वही हसीन लमहे जी लें,’ और न चाहते हुए भी मेरे कदम जानीपहचानी डगर पर चल पड़े…

हम 2 ही बहनें थीं. मैं बड़ी और मुझ से 12 साल छोटी आबिया. मम्मीपापा ने बड़े प्यार से हमारी परवरिश की थी. बेटा न होने का उन्हें कोई गम न था. मेरी पढ़ाई की हर जरूरत पूरी करना उन दोनों की खुशी थी. पढ़ने में मैं काफी अच्छी थी. शहर के मशहूर कौन्वैंट में पढ़ रही थी. जब मैं 8वीं में थी तो आबिया का जन्म हुआ था. उस की पैदाइश के बाद से मम्मी की कमर और घुटने में दर्द रहने लगा. धीरेधीरे आबी की सारी जिम्मेदारियां मुझ पर आती गईं.

वक्त हंसीखुशी गुजर रहा था. सोहा, जो पड़ोस में रहती थी, से मेरी खूब बनती थी. वह मेरी दोस्त थी. कभी मैं उस के घर पढ़ने चली जाती, कभी वह मेरे घर आ जाती. हम दोनों साथ पढ़ते और आबी को भी साथ रखते. वह सोहा से भी खूब घुलीमिली हुई थी.

दिन गुजरते रहे. मैं ने और सोहा ने फर्स्ट क्लास से बीएससी पास कर लिया. मम्मी का इरादा पोस्टग्रेजुएशन कराने का नहीं था क्योंकि उस की पढ़ाई के लिए बहुत दूर जाना पड़ता. सोहा के कहने पर मैं ने उस के साथ बीएड कोर्स जौइन कर लिया.

बीएड का रिजल्ट अभी आया भी नहीं था कि मेरे लिए एक बहुत अच्छा रिश्ता आ गया. लड़का एक अच्छी मल्टीनैशनल कंपनी में काम करता था. पापा के दोस्त का लड़का था. खानदान अच्छा था, देखेभाले लोग थे. रेहान ने किसी शादी में मुझे देख कर वहीं पर पसंद कर लिया था. इकलौता बेटा, पढ़ालिखा खानदान, इसलिए ज्यादा पूछपरख की जरूरत न थी.

पहला रिश्ता ही अच्छा आ जाए तो इनकार करना अच्छा नहीं माना जाता. सो, शादी की तैयारी शुरू हो गई. एमएससी करने की ख्वाहिश शादी की चमकदमक में कहीं नीचे दब गई.

मेरी विदाई के वक्त 7 वर्षीया आबिया का रोना मुझ से देखा नहीं जा रहा था क्योंकि वह मुझ से इतनी घुलीमिली थी कि उस की जुदाई के खयाल से मैं खुद रो पड़ती थी. सोहा ने उस का खूब खयाल रखने का वादा किया.

भीगी आंखों के साथ विदा हो कर मैं ससुराल आ गई. मेरी सास थीं, ससुर का देहांत कुछ महीने पहले ही हुआ था. रेहान का घर बहुत शानदार था. सास का मिजाज भी बहुत अच्छा था. वे खानेपीने की खूब शौकीन थीं. अच्छे खाने का शौक रेहान को भी था.

मम्मी की बीमारी की वजह से काफी छोटी उम्र में ही मैं किचन के काम करने में लग गई थी, इसलिए खाना बनाने में ऐक्सपर्ट हो चुकी थी. मेरी शादी के बाद मम्मी ने फुलटाइम कामवाली रख ली थी, जो खाना भी पकाती थी और आबिया के काम भी करती थी.

शादी के बाद 3-4 महीने तो जैसे पंख लगा कर उड़ गए, घूमनाफिरना, दावतें आदि. फिर जिंदगी अपने रूटीन पर आ गई. मेरी सास यों तो बहुत अच्छी थीं पर घर के कामों में उन की कोई दिलचस्पी न थी. कभीकभार कुछ मदद कर देतीं वरना उन का ज्यादा वक्त टीवी देखने और किताबें पढ़ने में गुजरता. मुझे कोई मलाल न था, मुझे काम करने की आदत थी. ऊपर का काम करने के लिए एक कामवाली भी थी.

शादी के 2 वर्षों बाद बेटा हो गया. घर में खुशी के संगीत बज उठे. मेरा भी खूब खयाल किया जाता. बेटे का नाम असद रखा गया. असद के आने के बाद मेरा मायके जाना काफी कम हो गया. छोटे बच्चे के साथसाथ घर का काम और मसरूफियत बढ़ती जा रही थी. वैसे, असद को तैयार कर के मैं सासुमां को थमा देती और सारे काम संभाल लेती थी.

असद 3 साल का था कि शीरी पैदा हो गई. अब तो जैसे मैं घनचक्कर बन गई. 2 बच्चे संभालना, घर का काम करना मुश्किल होने लगा. रेहान ने मेरी परेशानी देख कर एक कुक का इंतजाम कर दिया. जैसेतैसे 3-4 महीने सब ने

उस के हाथ का खाना बरदाश्त किया. फिर उसे हटा दिया. सास ने बच्चों की जिम्मेदारी ले ली, मैं ने किचन संभाल लिया.

रेहान मेरा बहुत खयाल रखते थे. जन्मदिन, एनिवर्सिरी सब याद रखते, बाकायदा तोहफे लाते, बाहर ले जाते. बस, घर के काम से बेहद जी चुराते. उन के औफिस जाने के बाद कमरे का हाल यों होता जैसे वहां घमासान हुआ हो. बिखरे कपड़े, जूते, टाइयां. जब कोई चीज नहीं मिलती तो अलमारी का सारा सामान बाहर आ जाता और मैं समेटतेसमेटते परेशान हो जाती. पर धीरेधीरे मैं इस की आदी हो गई. मगर इन सब के बीच मेरा वजूद, मेरे शौक, मेरी ख्वाहिशें सब पीछे छूट गईं. महीनों ब्यूटीपार्लर जाना न होता. कपड़े जो हाथ लग गए, पहन लिए. कुछ इंतजाम करने की मुझे फुरसत ही नहीं मिलती थी.

जिंदगी ठीक गुजर रही थी. मैं ने खुद को रेहान के हिसाब से ढाल लिया था. एक दिन सासुमां को घबराहट होने लगी, बेचैनी भी थी. उन्हें अस्पताल ले गई. दिल का दौरा पड़ा था. 2 दिनों तक ही इलाज चला, तीसरे दिन वे दुनिया छोड़ गईं.

सासुमां ने हमेशा मेरा बेटी की तरह खयाल रखा. मेरे बच्चों को वे बेहद प्यार करती थीं.

शिकस्त- भाग 2: क्या दोबारा रिश्तों पर भरोसा कर पाई रेहाना

रेहान को भी मां की मौत का बड़ा शौक लगा. काफी चुप से हो गए. हर गम वक्त के साथ भरने लगता है. हम लोग भी धीरेधीरे संभलने लगे. हालात बेहतर होने लगे कि मेरे पापामम्मी का अचानक एक कार ऐक्सीडैंट में देहांत हो गया. मैं रोतीबिलखती घर पहुंची. सारे रिश्तेदार जमा हुए. 10 दिन रह कर सब चले गए. रेहान की भी जौब थी, वे भी चले गए.

अब घर में मैं, बूआ और 15 साल की आबिया रह गए. कुछ समझ में नहीं आता था क्या करूं. रिश्ते के मेरे एक चाचा, जो पड़ोस में रहते थे, ने मुझे समझाया, ‘देखो बेटी, तुम जवान बहन को किसी के सहारे नहीं छोड़ सकतीं. तुम्हारी बूआ या मामा, किसी की भी आबिया की जिम्मेदारी लेने की मंशा नहीं है. उसे अकेले छोड़ा नहीं जा सकता, सो, तुम आबिया को अपने साथ ले जाओ. मैं तुम्हारा घर बेचने की कोशिश करता हूं. पैसे आधेआधे तुम दोनों के नाम पर जमा करा देंगे.’ मुझे उन की बात ठीक लगी. मैं ने रेहान को बताया और आबिया को ले कर घर आ गई. बूआ को एक अच्छा अमाउंट दिया, उन्होंने बहुत साथ दिया था.

वक्त बड़े से बड़े गम का मरहम है. मैं ने आबी का ऐडमिशन अच्छे स्कूल में करवा दिया. वैसे, पढ़ाई में उस का ज्यादा ध्यान नहीं लगता था. टीवी, फिल्म और फैशन उस के खास शौक थे. बचपन में मैं ने लाड़प्यार में बिगाड़ा था. फिर मम्मी भी उस की नजाकत व हुस्न देख कर उसे कुछ काम न करने देती थीं.

आबी के मेरे घर आने के बाद उस की जिम्मेदारी भी मेरे सिर पड़ गई. कहां तो मैं सोच रही थी कि आबी के आने से मेरा काम कुछ हलका हो जाएगा, यहां तो उलटा हुआ. उस के काम भी मुझे करने पड़ते. असद और शीरी के साथसाथ आबी की पढ़ाई, स्कूल की तैयारी में मैं बेहद थक जाती. कभी आबी को कुछ काम करने के लिए डांटती तो रेहान उस का पक्ष लेने लगते, ‘इतनी नाजुक सी गुडि़या है, थक जाएगी. उस के हाथ खराब हो जाएंगे.’ मैं हमेशा की तरह खामोश हो जाती और अपने काम में लग जाती.

वक्त इसी तरह गुजरता रहा. आबिया अब कालेज में आ गई, बेइंतहा हसीन, स्मार्ट और फैशनेबल.

एक सुबह मेरे लिए बड़ी खूबसूरत साबित हुई, अचानक मेरी दोस्त सोहा आ गई. वह कालेज में लैक्चरार थी. एक सैमिनार में शिरकत करने यहां आई थी. वह पूरा एक हफ्ता यहां रुकने वाली थी. उस दिन इतवार था, सोहा ने आते ही ऐलान कर दिया, ‘आज मैं और शाफिया सिर्फ बातें करेंगे, घर का सारा काम आबिया, रेहान और असद करेंगे.’ सब ने बात मान ली.

हम दोनों ऊपर के कमरे में आ गए और बातों में मगन हो गए. सोहा एक हफ्ता रही. वह रोज सुबह किचन में मेरी मदद करवाती. जाते वक्त बड़ी उदास थी, तनहाई में मुझे गले लगा कर बोली, ‘शाफिया, तुम बहुत सीधी और मासूम हो. हर कोई तुम्हारे जैसा फेयर नहीं होता.’

मैं नासमझी से उसे देखने लगी. उस ने धीरे से कहा, ‘पता नहीं क्यों तुम्हें महसूस नहीं हुआ वरना एक औरत की छठी इंद्रिय इन सब बातों से बड़ी जल्दी आगाह हो जाती है. शायद आबिया तुम्हारी बहन है, इसलिए तुम सोच नहीं सकीं. मुझे आबिया और रेहान के बीच कुछ गलत लगता है. घर में शाम से ले कर रात तक का वक्त दोनों साथ बिताते हैं. वे हंसते हैं, बतियाते हैं, शरारतें करते हैं और तुम किचन में घुसी, मसाले और पसीने में गंधाती, अच्छाअच्छा पका कर उन की खातिर करती रहती हो. वह एक बार भी उठ कर किचन में नहीं झांकती. पूरे वक्त रेहान के साथ, कभी उस के गले में झूल जाती है, कभी कंधे पर सिर रख कर बैठ जाती है. वह कोई बच्ची नहीं है, 18-19 साल की जवान लड़की है.

‘शाफिया, मैं ने उन दोनों की आंखों में मोहब्बत के शोले चमकते देखे हैं. रेहान घर में घुसते ही आबिया को आवाज देता है. तुम्हें खाना पकाने में मसरूफ कर वे दोनों बच्चों को ले कर कभी गार्डन चल देते हैं, कभी पिक्चर चले जाते हैं. तुम जरा याद करो, तुम कब रेहान के साथ घूमने गईर् थीं?’

सोहा की बातें सुन कर मेरे हाथपांव ठंडे पड़ गए. ऐसा लगा जैसे दिल गम की गहराइयों में उतर रहा है. मैं ने ध्यान से सोचा तो मुझे सोहा की बातों में सचाई नजर आने लगी. अब मुझे याद आ रहा था कैसे दोनों मुझे नजअंदाज करते थे. खानों की तारीफें कर के मुझे किचन में बिजी रखते और आबी और रेहान खूब मस्ती करते. दिखाने को बच्चों को शामिल कर लेते. बच्चों को भी अपने मजे व स्वार्थ की खातिर जिद्दी और मूडी बना दिया था. जब देखो तब टीवी, घूमनाफिरना और नएनए खानों की फरमाइशें. और मैं बेवकूफों की तरह उन की फरमाइशें पूरी करती रहती. मेरी आंखों से आबी के लिए अंधी मोहब्बत की पट्टी उतर रही थी. दिल में अजब सी तकलीफ होने लगी, समझ में नहीं आया किस से गिला करूं.

सोहा ने मुझे रोने दिया. जब जरा संभली तो उस ने पीठ सहलाते हुए कहा, ‘शाफी, इस के लिए तुम भी जिम्मेदार हो. तुम्हें आबी को इतनी छूट देनी ही नहीं चाहिए थी. तुम ने अपना हाल क्या बना रखा है. तुम्हारे खूबसूरत व चमकीले बाल कितने बेरंग और रूखे हो रहे हैं. स्किन देखो कैसी रफ हो रही है. तुम ने अपनेआप को काम और किचन में झोंक दिया. तुम्हारे पास अपने लिए एक घंटा भी नहीं है जो कभी ब्यूटीपार्लर जाओ या खुद को संवारो.’

मुझे अपनी लापरवाही और नादानी पर गुस्सा आ रहा था पर मैं कैसे अपनी बेटी जैसी बहन पर शक कर सकती थी? पर अब आंखें नहीं बंद की जा सकती थीं.

सोहा ने कहा, ‘शाफी, तुम पढ़ीलिखी हो, हिम्मत करो, बाहर निकलो और मामले की तहकीकात करो. अभी तक तुम भी मोहब्बत व यकीन के सहर में डूबी हुई थीं. उस से बाहर निकलो और देखो, दुनिया कितनी जालिम है. एक छोटी बहन अपनी मां जैसी बहन का घर उजाड़ सकती है. और रोने की जरूरत नहीं है ऐसे बेहिस लोगों पर. कीमती आंसू बहाने से कुछ हासिल न होगा. सचाई अगर वही है जो मैं कह रही हूं तो पूरे साहस और मजबूती से फैसला करो. अपनी इज्जत और अहं को मोहब्बत के पैरों तले कुचलने मत देना.’

सोहा चली गई और मुझे जैसे जलते अंगारों पर छोड़ गई. न मैं रो रही थी न बहुत गमजदा थी. बस, एक गुस्सा था, यकीन टूटने की तकलीफ थी. 2-3 दिन मैं बड़ी खामोशी व होशियारी से सारा खेल देखती रही. मुझे सोहा की बात पर यकीन आने लगा. चौथे दिन रेहान ने बताया कि वे 2 दिनों के लिए औफिस के काम से बाहर जा रहे हैं. उन के जाने के बाद आबी खामोश सी थी. वह ज्यादातर अपने ही कमरे में बंद रही. दूसरे दिन आबी कालेज, बच्चे स्कूल चले गए. मैं ने रेहान के औफिस के सीनियर कलीग रहीम साहब को फोन किया. वे मेरे ससुर के रिश्ते के भाई थे. शादी के बाद 2-3 बार मिलने आए थे. बहुत ही नेक इंसान हैं. मैं ने कहा, ‘आप से कुछ काम है, जरा घर आ जाइए.’ एक घंटे बाद वे मेरे सामने बैठे थे.

शिकस्त- भाग 3: क्या दोबारा रिश्तों पर भरोसा कर पाई रेहाना

मैं ने सारे लिहाज छोड़ कर कहा, ‘चाचा, मैं रेहान को ले कर परेशान हूं. मुझे लगता है रेहान की कहीं और इन्वौल्वमैंट है. आप साथ रहते हैं, आप को कुछ पता होगा?’ रहीम साहब कुछ देर सोचते रहे, फिर बोले, ‘बेटी, मैं खुद असमंजस में था कि तुम्हें बताऊं या नहीं. अच्छा हुआ, तुम ने ही पूछ लिया. एक बड़ी खूबसूरत, नाजुक सी लड़की रेहान से मिलने औफिस आती है. फिर दोनों साथ चले जाते हैं. कई बार उन दोनों को रैस्टोरैंट और सिनेमाहौल में देखा है. मैं ने बहुत सोचा रेहान को टोक दूं पर अब वह मुझ से पहले जैसे संबंध नहीं रखता, इसलिए मैं खामोश रहा.’ मैं ने रहीम साहब से कहा, ‘आप मुझ से मिले हैं, यह बात रेहान को न बताना.’ वे लौट गए. अब शक यकीन में बदल गया.

रेहान के लौटने पर मैं ने उन से कुछ नहीं कहा. मैं बहुत सोचसमझ कर कोई कदम उठाना चाहती थी. एक तरफ खाई थी तो दूसरी तरफ कुआं. मैं ने अपने व्यवहार में कोई फर्क नहीं आने दिया बल्कि पहले से ज्यादा अच्छे खाने बना कर खिलाती, खूब खयाल रखती. उस दिन छुट्टी थी, सभी घर पर थे.

शाम को मैं अपनी दोस्त की शादी की एनिवर्सरी का कह कर घर से निकल गई और कह दिया खाना खा कर लेट आऊंगी. वह मुझे छुड़वा देगी. वह हमारी कालोनी में ही रहती है.

मैं कुछ देर अपनी सहेली के पास बैठ कर वापसी के लिए निकल गई. अंधेरा फैल रहा था. निकलने से पहले मैं ड्राइंगरूम व बैडरूम की खिड़कियां थोड़ी खुली छोड़ आई थी. दबेपांव मैं गार्डन में दाखिल हुई. धीमेधीमे चल कर ड्राइंगरूम की खिड़की के पास गई. दोनों बच्चे जोरशोर से गेम खेल रहे थे. बैडरूम की तरफ गई, अंदर झांका, आबी बैड से टेक लगाए बैठी थी, रेहान उस की गोद में सिर रखे लेटे थे. वह उन के बालों से खेल रही थी और मीठी आवाज में कह रही थी, ‘रेहान, अब इस तरह रहना मुश्किल है. हम कब तक छिपछिप कर मिलते रहेंगे. अब तुम्हें फाइनल डिसीजन लेना होगा.’

रेहान ने उसे दिलासा दिया, ‘मैं खुद यही सोच रहा हूं. मैं तुम से दूर नहीं रह सकता. एकएक पल भारी है. मैं जल्द ही कुछ करता हूं.’

मुझे लगा जैसे पिघला हुआ सीसा किसी ने मेरे कानों में उड़ेल दिया है. इतने सालों की मोहब्बत, खिदमत, वफादारी सब बेकार गई. मैं रेहान के 2 बच्चों की मां थी. आबी मेरी जान से प्यारी बहन थी. रिश्तों ने यह कैसा फरेब किया था? सब पर हवस ने कालिख मल दी थी. कुछ देर मैं बाहर ही टहलती रही, खुद को समझाती रही. सबकुछ खो देने का एहसास जानलेवा था.

मैं ने घंटी बजाई. रेहान ने दरवाजा खोला. मुझे देख कर हड़बड़ा गए, ‘अरे, तुम तो देर से आने वाली थीं न.’ मैं ने उन की आंखों में देखते हुए कहा, ‘सिर में तेज दर्द हो रहा था, इसलिए जल्दी आ गई.’ आबी भी परेशान हो गई. मैं ने कुछ जाहिर नहीं किया. एक कप दूध पी कर लेट गई.

दिन गुजर रहे थे. मैं ने खामोशी ओढ़ ली. फिर एक दिन रात के खाने के बाद जब सब टीवी देख रहे थे, मैं ने टीवी बंद कर दिया और रेहान से कहा, ‘रेहान, तुम ने रिश्तों को शर्मसार किया है. मैं ने कभी सोचा भी न था आप मेरी बेटी जैसी बहन के इश्क में पागल हो जाएंगे. एक पल को आप को अपने बच्चे, अपने खानदान का खयाल नहीं आया. आप को यह तो मालूम होगा कि बीवी के जिंदा रहते हुए उस की बहन से निकाह हराम है. आप आबिया से शादी कैसे कर सकते हैं?’

दोनों बदहवास से मुंह खोले मुझे देख रहे थे. उन्हें उम्मीद नहीं थी कि मैं इस तरह एकदम सीधा वार करूंगी.

‘बोलिए, आप का निकाह आबिया से कैसे जायज होगा?’

आबिया ने जवाब दिया, ‘जब रेहान आप को तलाक दे देंगे तो निकाह जायज होगा?’

मेरी मांजाई कितने आराम से मुझे मेरी बरबादी की खबर दे रही थी. मैं ने उसे कोई जवाब नहीं दिया. रेहान से मैं ने कहा, ‘आप मुझे तलाक नहीं देंगे.’ रेहान परेशान से लहजे में बोले, ‘शाफी, मैं तुम्हें तलाक नहीं देना चाहता पर तलाक के बिना शादी हो ही नहीं सकती. मैं मजबूर हूं. तलाक के बाद भी मैं तुम्हारा पूरा खयाल रखूंगा. तुम अलग ऊपर गेस्टरूम में रहना, खर्चा पूरा मिलेगा. तुम फिक्र न करो.’

मैं ने तीखे लहजे में कहा, ‘रेहान, मुझे तुम्हारी हमदर्दी की जरूरत नहीं है. तुम को तलाक देने की भी जरूरत नहीं है. मैं कोर्ट में खुला (जब औरत खुद शौहर से अलग होना चाहती है और खर्चा व मेहर मांगने का हक नहीं रहता) की अर्जी दे चुकी हूं. आप के औफिस लैटर आ चुका होगा. 2 दिनों बाद पहली पेशी है. आप को कोर्ट चलना होगा.’

आबी और रेहान के चेहरे सफेद पड़ गए. उन लोगों ने सोचा भी नहीं होगा कि मैं इतना बड़ा कदम इतनी जल्दी उठा लूंगी. मैं ने बच्चों की तरफ देखा. दोनों कुछ परेशान से थे. मैं वहां से उठ कर ऊपर आ गई. घर में सन्नाटा पसर गया.

2 दिनों बाद मैं वक्त पर तैयार हो कर बाहर निकली. रेहान को लैटर मिल चुका था. उन्होंने कार का दरवाजा खोला. मैं ने कहा, ‘रेहान, जब रास्ते अलग हो रहे हैं तो फिर साथ जाने का कोई मतलब नहीं है. आप जाइए, मेरी टैक्सी आ रही है, मैं कोर्ट पहुंच जाऊंगी.’

कोर्ट में जज ने हम दोनों की बात ध्यान से सुनी. ‘खुला’ की वजह मेरे मुंह से जान कर जज ने हिकारतभरी नजर रेहान पर डाली और कहा, ‘रेहान साहब, जो कुछ आप कह रहे हैं वह ठीक नहीं है. 11-12 साल की खुशगवार जिंदगी को एक गलत ख्वाहिश के पीछे बरबाद कर रहे हैं. मैं आप दोनों को सोचने के लिए एक हफ्ते का टाइम देता हूं. दूसरी पेशी पर फैसला हो जाएगा.’ रेहान ने सिर झुका लिया.

कोर्ट से आ कर मैं ने टेबल पर बेहतरीन खाना लगाया जो मैं पका कर गई थी. मैं बच्चों से बातें करती रही, फिर गेस्टरूम में आई. पूरे वक्त हमारे बीच खामोशी रही. आबी कुछ कहना चाहती, तो मैं वहां से हट जाती. हफ्ताभर मैं एक से बढ़ कर एक मजेदार खाने बना कर खिलाती रही. रेहान के चेहरे पर फिक्र की लकीरें गहरी हो रही थीं. आखिरी दिन मुझे रोक कर बोले, ‘शाफी, मुझे तुम से कुछ बात करनी है.’ रेहान ठहरे हुए गंभीर लहजे मेें आगे बोले, ‘देखो शाफी, हमारा इतना दिनों का साथ है, मैं तुम्हें तनहा नहीं छोड़ना चाहता. तुम गेस्टरूम में रहो या मैं अलग घर का इंतजाम करवा दूंगा. बच्चों पर मेरा हक है पर तुम चाहो तो अपने साथ रखना. पर हम लोगों से दूर मत जाओ, करीब रहो.’

मैं ने दिल में सोचा, बच्चों की जिम्मेदारी मुझ पर डाल कर तुम दोनों ऐश करो. मैं ने गंभीर लहजे में कहा, ‘रेहान, मैं पहले भी कह चुकी हूं, मुझे आप के किसी एहसान की जरूरत नहीं है. और मैं आप का हक भी नहीं छीनना चाहती. आप के बच्चे आप के पास रहेंगे क्योंकि मैं उन्हें वह ऐशोआराम नहीं दे सकती जो आप के पास मिलेगा. मैं सिर्फ आप के घर, आप की जिंदगी से दूर हो जाऊंगी. मैं क्या करूंगी, कहां रहूंगी, इस की आप फिक्र न करें. यह मेरा सिरदर्द है.’

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