भूल किसकी- भाग 1

जैसेही चाय में उबाल आया सुचित्रा ने आंच धीमी कर दी. ‘चाय के उबाल को तो कम या बंद किया जा सकता है पर मन के उबाल पर कैसे काबू पाया जाए? चाय में तो शक्कर डाल कर मिठास बढ़ाई जा सकती है पर जबान की मिठास बढ़ाने की काश कोई शक्कर होती,’ सोचते हुए वे चाय ले कर लौन में शेखर के पास पहुंचीं.

दोनों की आधी चाय खत्म हो चुकी थी. बाहर अभी भी खामोशी पसरी थी, जबकि भीतर सवालों का द्वंद्व चल रहा था. चाय खत्म हो कर कप रखे जा चुके थे.

‘‘शेखर, हम से कहां और क्या गलती हुई.’’

‘‘सुचित्रा अपनेआप को दोष देना बंद करो. तुम से कहीं कोई गलती नहीं हुई.’’

‘‘शायद कुदरत की मरजी यही हो.’’

एक बार बाहर फिर खामोशी छा गई. जब हमें कुछ सम झ नहीं आता या हमारी सम झ के बाहर हो तो कुदरत पर ही डाल दिया जाता है. मानव स्वभाव ऐसा ही है.

शेखर और सुचित्रा की 2 बेटियां हैं- रीता और रीमा. रीता रीमा से डेढ़ साल बड़ी है. पर लगती दोनों जुड़वां. नैननक्श भी काफी मिलते हैं. बस रीमा का रंग रीता से साफ है. भारतीयों की अवधारणा है कि गोरा रंग सुंदरता का प्रतीक होता है. जिस का रंग जितना साफ होगा वह उतना ही सुंदर माना जाएगा, जबकि दोनों की परवरिश समान माहौल में हुई, फिर भी स्वभाव में दोनों एकदूसरे के विपरीत थीं. एक शांत तो दूसरी उतनी ही जिद्दी और उग्र स्वभाव की.

वैसे भी ज्यादातर देखा जाता है कि बड़ी संतान चाहे वह लड़का हो या लड़की शांत स्वभाव की होती है. उस की वजह शायद यही है तुम बड़े/बड़ी हो, उसे यह दे दो, तुम बड़े हो उसे मत मारो, तुम बड़े हो, सम झदार हो भले ही दोनों में अंतर बहुत कम हो और छोटा अपनी अनजाने में ही हर इच्छापूर्ति के कारण जिद्दी हो जाता है. यही रीता और रीमा के साथ हुआ. आर्थिक संपन्नता के कारण बचपन से ही रीमा की हर इच्छा पर होती रही. मगर उस का परिणाम यह होगा, किसी ने सोचा नहीं था.

रीता सम झदार थी. यदि उसे ठीक से सम झाया जाए तो वह सम झ जाती थी पर रीमा वही करती थी जो मन में ठान लेती थी. किसी के सम झाने का उस पर कोई असर नहीं होता था. शेखर यह कह कर सुचित्रा को दिलासा देते कि अभी छोटी है बड़ी होने पर सब सम झ जाएगी. अब तो वह बड़ी भी हो गई पर उस की आदत नहीं बदली, बल्कि पहले से ज्यादा जिद्दी हो गई.

रीता के लिए तुषार का रिश्ता आया है पर सुचित्रा इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि उस घर में कोई भी महिला सदस्य नहीं है. केवल तुषार और उस के बीमार पिता हैं. हर मां को अपनी बच्ची हमेशा छोटी ही लगती है. वह परिवार की इतनी बड़ी जिम्मेदारी निभा भी पाएगी इस में हमेशा संशय रहता.

शेखर के सम झाने और तुषार की अच्छी जौब के कारण अंत में सुचित्रा शादी के लिए मान गईं. रीता ने भी तुषार से मिल कर अपनी रजामंदी दे दी. शादी की तैयारियां जोरशोर से शुरू हुईं. रीमा भी खुश थी. तैयारियों में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रही थी. वह इस बात से ज्यादा खुश थी कि अब पूरे घर में उस का राज रहेगा और बातबात में मां द्वारा रीता से उस की तुलना भी नहीं होगी.

खैर, बिना किसी परेशानी के शादी हो गई. शेखर ने बहुत कोशिश की आंसुओं को रोकने की पर नाकाम रहे. बेटी की विदाई सभी की आंखें गीली करती है. अपने दिल का टुकड़ा किसी और को सौंपना वाकई कठिन होता है. पर तसल्ली थी कि रीता इसी शहर में है और 4 दिन बाद आ जाएगी. लड़की की विदाई के बाद घर का सूनापन असहज होता है. सुचित्रा तो बिखरे घर को समेटने में व्यस्त हो गईं.

ससुराल के नाम से ही हर लड़की के मन में डर समाया रहता है. रीता भी सहमी हुई ससुराल पहुंची. एक अनजाना सा भय था कि पता नहीं कैसे लोग होंगे. पर उस का स्वागत जिस आत्मीयता और धूमधाम से हुआ उस से डर कुछ कम हो गया.

‘‘वाह, तुषार बहू तो छांट कर लाया है… कितनी सुंदर है,’’ चाची ने मुंहदिखाई देते हुए तारीफ की.

‘‘भाभी, आप की मेहंदी का रंग तो बड़ा गाढ़ा है.’’

‘‘भैया की प्यारी जो है,’’ सुनते ही उस का चेहरा शर्म से लाल हो गया.

चुहल और हंसीखुशी के माहौल ने उस के डर को लगभग खत्म कर दिया. तुषार का साथ पा कर बहुत खुश थी. हनीमून पर जाने के लिए तुषार पहले ही मना कर चुका था. वह पापा को अकेला छोड़ कर नहीं जाना चाहता था. अपने पिता के प्रति प्रेम और परवाह देख रीता को बहुत अच्छा लगा. 4 दिन पता ही नहीं चला कैसे बीत गए.

पापा उसे लेने आ गए थे. घर पहुंचने पर उस ने देखा उस की सभी चीजों पर रीमा ने अपना हक जमा लिया है.

उसे बहुत गुस्सा आया पर शांत रही. बोली, ‘‘रीमा ये सारी चीजें मेरी हैं.’’

‘‘पर अब यह घर तो तुम्हारा है नहीं, तो ये सब चीजें मेरी हुईं न? ’’

‘‘रीता उदास होते हुए बोली, मम्मा, क्या सचमुच अब इस घर से मेरा कोई नाता नहीं?’’

‘‘यह घर हमेशा तेरा है पर अब एक और घर तेरा हो गया है, जिस की जिम्मेदारी तु झे निभानी है,’’ मां ने कहा.

अभी आए 2 ही दिन हुए थे पर पता नहीं जिस घर में पलीबढ़ी थी वह अपना सा क्यों नहीं लग रहा… तुषार की कमी खल रही थी जबकि दिन में 2-3 बार फोन पर बातें होती रहती थीं.

मेहमानों के जाने के बाद घर खाली हो गया था. तुषार उसे लेने आ गया. घर पर छोड़ कर जल्दी आने की कह तुषार औफिस चला गया. उस ने चारों ओर नजर घुमाई. उसे घर कम कबाड़खाना ज्यादा लगा. पूरा घर अस्तव्यस्त. उसे सम झ नहीं आ रहा था कि शुरुआत कहां से करे.

‘‘पारो.’’

‘‘जी, बहूरानी.’’

‘‘ झाड़ू कहां है? इस कमरे की सफाई करनी है. देखो कितना गंदा है… तुम ठीक से सफाई नहीं करती लगता.’’

‘‘अभी कर देती हूं.’’

दोनों ने मिल कर कमरा व्यवस्थित किया. बैडसीट बदली. तुषार की अलमारी में कपड़ों को व्यवस्थित किया. सारे सामान को यथास्थान रखा.

‘‘बहुरानी, इस कमरे की तो रंगत ही बदल गई. लग ही नहीं रहा कि यह वही कमरा है.’’

‘‘चलो अब पापाजी के कमरे की सफाई करते हैं.’’

‘‘पापाजी, आप ड्राइंगरूम में आराम कीजिए. हमें आप के कमरे की सफाई करनी है.’’

पापाजी ने अचरज से सिर उठा कर रीता की ओर देखा पर बोले कुछ नहीं, चुपचाप जा कर दीवान पर लेट गए.

कमरे में दवाइयों की खाली शीशियां, रैपर बिखरे पड़े थे. चादर, परदे भी कितने गंदे… पता नहीं कब से नहीं बदले गए. कमरे में सीलन की बदबू से रीता को खड़े रहना भी मुश्किल लग रहा था… इस बीमार कमरे में पापाजी कैसे स्वस्थ रह सकते हैं?

सब से पहले उस ने सारी खिड़कियां खोलीं. न जाने कब से बंद थीं. उन के खोलते ही लगा जैसे मृतप्राय कमरा सांस लेने लगा है.

मेरी जीवनसाथी- भाग 3: नवीन का क्या था सच

नवीन की मीठी बातें और मोहित की प्यारी बातें भी मेरा मन न बहला सकीं. नवीन का सारा प्रयास व्यर्थ गया और मोहित भी मुझे उदासीन पा कर अपने में सिमट गया. मैं ने अनेक प्रयास किए कि मोहित को अपने वक्ष से लगा कर दिल का बोझ हलका कर लूं, पर सफल न हो सकी.

तभी अपनी कोख में पलते अंश का मु झे एहसास हुआ. मैं समझ गई कि यह अंश उस बेवफा चंदन का है. लेकिन भोलेभाले नवीन को मैं कैसे बताती कि शादी से पहले ही मैं गर्भवती हो चुकी हूं.

कभीकभी जी होता, आत्महत्या कर लूं या कहीं चली जाऊं पर नवीन का निश्छल प्यार, मातापिता की इज्जत, सबकुछ सामने आ कर मेरे पांव जकड़ लेते.

फिर धीरेधीरे सबकुछ सामान्य होता गया. मोहित बीच में जब भी छात्रावास से घर आता, मु झ से खिंचा रहता. मैं लाख प्रयास करती कि वह मेरे पास आए, तब भी शांत स्वभाव का मोहित मेरे पास ज्यादा देर न टिकता.

तेज प्रसवपीड़ा के बीच एक रात मैं ने एक स्वस्थ पुत्र को जन्म दिया. नवीन फूले न समाए. अम्माबाबूजी को तो मानो बरसों की संजोई दौलत हाथ लग गई हो. पर मेरा मन खुश नहीं था. चंदन के बेटे को जन्म देने के बाद मैं स्वयं की नजरों से गिर गई थी.

शीलू के होने के बाद मोहित कुछकुछ मु झ से खुलने लगा था. दोनों में 7 वर्ष का अंतर था. मोहित एवं शीलू की खूब पटती थी. मेरे ही कहने पर नवीन ने उसे भी छात्रावास में डाल दिया था.

समय धीरेधीरे सरकता गया. मैं और नवीन पूरे घर में 2 प्राणी रह गए. 2 वर्ष पूर्व अम्मा का देहांत हो गया. बाबूजी तो पहले ही गुजर चुके थे. लाख कहने पर भी अम्मा हमारे साथ रहने नहीं आईं.

अब नवीन के सिवा मेरा कोई नहीं था. नवीन की सेवा कर के मु झे आत्मिक संतोष मिलता था. लेकिन एक सच था कि नवीन और अपने बीच मैं ने हमेशा एक फासला महसूस किया. अपने अंदर इतना बड़ा  झूठ रख कर मैं हमेशा स्वयं को हेय सम झती रही.

‘टिकटिक…’ घड़ी की तेज आवाज ने मु झे अतीत से खींच कर वर्तमान में ला खड़ा किया…

सुबह होने को थी. नवीन को 8 बजे ओटी में जाना था. उन के लिए नाश्ता भी तैयार करना था. नवीन जाग चुके थे. मु झे काम करता देख वे सम झ गए कि फिर पूरी रात मैं जगी हूं.

मेरा हाथ पकड़ उन्होंने मु झे पलंग पर लिटा दिया और कहा, ‘‘एक गोली देता हूं. खा कर आराम से सो जाओ. बाई आ कर सब कर देगी. भोलू से कह जाऊंगा कि बाहर से कोई आए या फोन आए तो वह देख ले. तुम बस आराम करो.’’

‘‘लेकिन आप?’’

‘‘मेरी चिंता छोड़ो संगीता. तुम अपने लिए भी तो जीना सीखो. तुम्हारा नवीन तुम्हारे बगैर अधूरा रह जाएगा,’’ कहतेकहते नवीन की आवाज रुंध गई. आज पहली बार मैं ने उन्हें अतिशय भावुक होते देखा था.

ऐसा अकसर हुआ था जब मैं पूरीपूरी रात जगी थी और दूसरे दिन नवीन ने मु झे दवा दे कर सुला दिया था.

दोनों बेटे बाहर ही शिक्षा पा रहे थे. बीचबीच में आते भी तो मेरे और उन के बीच हमेशा एक दूरी बनी रहती. मोहित तो मुझ से कतराता था और शीलू से मैं. लेकिन नवीन का ढेर सारा प्यार बच्चों को मेरी कमी महसूस ही न होने देता. पढ़ने में दोनों ही होशियार थे. शीलू अभी पढ़ ही रहा था. मोहित का नेवी में चयन हो गया था.

पूरे 5 वर्ष और बीत गए हैं. आज नवीन भी इस दुनिया में नहीं हैं. बड़ा बेटा मोहित अकसर विदेश में ही रहता है, जहाजों पर. दूसरा शीलू भी पायलट बन चुका है. वह दिल्ली में रहता है. मैं घर में अकेली हूं, बाई के साथ.

बेटों ने औपचारिकतावश पूछा था. शीलू ने तो साथ ले जाना भी चाहा, पर मैं ने इनकार कर दिया. मोहित ने विवाह भी कर लिया है. बहू को ले कर आशीर्वाद लेने आया था. जी चाहा था, पूछूं कि क्या यह शादी मु झ से बता कर करता तो मैं मना कर देती. नवीन होते तब भी यही करते. पर पूछ न सकी.

अचानक बैंक से एक दिन नवीन द्वारा करवाया हुआ फिक्स्ड डिपौजिट का कागज आया जिस में रकम की मियाद पूरी होने की बात थी. इस विषय में मु झे कुछ भी मालूम नहीं था. उस पत्रक में अनुरोध था कि या तो ज कर पैसे ले आऊं या पुन: जमा करवा दूं.

अब वह फिक्स्ड डिपौजिट का कागज मुझे ढूंढ़ना था. मैं ने पूरा घर छान मारा पर वह कहीं नहीं मिला. शायद मेरे विवाह के पूर्व का किया हो या नवीन बताना भूल गए हों.

तभी मुझे ध्यान आया कि नवीन की एक खास अलमारी थी जिसे खोलने की मैं ने कभी जरूरत महसूस नहीं की. वह नवीन ही खोलते थे. शायद पूर्व पत्नी की यादें उस में संजोई हों, यही सोच कर मैं ने कभी पूछा भी नहीं. फिर जिस के अंदर खुद चोर हो वह दूसरे की छानबीन क्या करता.

कागज ढूंढ़ने की गरज से मैं ने अलमारी खोल दी, मेरी दृष्टि एक डायरी पर पड़ी जो अधखुली अवस्था में जाने कब से पड़ी थी. बीच में खुला पैन भी था. सर्वत्र धूल जमी हुई थी. उत्सुकतावश मैं ने उसे उठा लिया. डायरी, वह भी नवीन की लिखावट में. किस पल वे डायरी लिखते रहे, मैं जान भी न सकी.

उजाले में आंखों पर चश्मा चढ़ा कर पढ़ने लगी. उस वक्त वह कागज ढूंढ़ना भी भूल गई. शुरू में नवीन ने अपनी पूर्व पत्नी का जिक्र किया था. फिर उस की मृत्यु एवं मोहित के छात्रावास में जाने के बाद घर के एकाकीपन का, फिर हमारे परिवार के मिलने की घटना का वर्णन था.

एक जगह लिखा था, ‘अच्छी बच्ची है, संगीता. सोचता हूं इस का कालेज में दाखिला करवा दूं. फिर कोई अच्छा लड़का देख कर इस की शादी कर दूं. अभी अल्हड़ और नादान है. कैसा टूट गया है यह परिवार. सांप्रदायिकता की भयंकर आग ने कितने ही ऐसे परिवारों को उजाड़ दिया है, तबाह कर दिया है.’

आगे जिक्र था… ‘इस भोली लड़की ने यह क्या किया? चंदन के प्रेमजाल में कैसे फंस गई? कितनों को बरबाद किया है चंदन ने? काश, मैं कुछ देर पहले पहुंचा होता तो चंदन घर से निकलता नहीं, जाते देखता और जो हुआ, उसे रोक लेता. अब कौन करेगा उस से शादी? कहीं कुछ उलटासीधा कदम न उठा ले यह अल्हड़ लड़की. मुझे ही इस से शादी करनी होगी.’

आगे लिखा था… ‘इस लड़की के अंदर पलते अंश को मेरी नजरें अनदेखा नहीं कर सकतीं. यह शादी शीघ्र होनी चाहिए. लेकिन भविष्य में मु झे इस से कुछ नहीं पूछना या बताना है वरना यह जीवित नहीं रहेगी.’

आगे बहुत कुछ था, पर मेरी पढ़ने की सामर्थ्य समाप्त हो चुकी थी.

मैं सोचने लगी, ‘ओह नवीन, तुम मुझे सजा देते, मुझे एहसास कराते कि मुझे अपनाकर तुम ने मुझ पर एहसान किया है. शीलू को पाल कर मुझे मेरी गलती का एहसास कराते. सहारा देने की सजा दे कर तो तुम ने मुझे बिलकुल ही अपनी नजरों से गिरा दिया.

‘काश, आज तुम होते और मैं पूछ सकती कि मैं ने तुम्हें न बता कर ठीक किया या तुम ने मुझे बिना बताए क्षमा कर के. लेकिन तुम तो मुझे पछतावे की आग में जलता छोड़ इतनी दूर जा चुके हो, जहां से वापस नहीं आ सकते.’

घड़ी की टिकटिक हर पल अपने अस्तित्व का, इस सन्नाटे में मुझे मेरे अकेलेपन का आभास करा रही थी.

चुनौती- भाग 2: शर्वरी मौसी ने कौनसी तरकीब निकाली

‘‘शर्वरी दीदी अपना समझ कर ही तो मदद कर रही हैं. कितनी आशा ले कर आएंगी वे. जब उन्हें पता चलेगा कि यह महारानी तो विवाह के लिए तैयार ही नहीं हैं तो क्या बीतेगी उन पर. मैं तो सोच रही हूं कि उन्हें फोन कर के मना कर दूं,’’ ललिता देवी अब भी अपनी ही धुन में थीं.

‘‘नहीं मां, ऐसा मत करो, मौसी बुरा मान जाएंगी,’’ नीरजा बोली.

‘‘ठीक कह रही है, नीरजा. पहले से ही यह सोच कर बैठ जाना कि हम तो किसी से मिलेंगे ही नहीं, कहां की बुद्धिमानी है. शर्वरी दीदी किसी को ले कर आ रही हैं तो कुछ सोचसमझ कर ही ला रही होंगी. सुप्रिया, इस बारे में मैं तुम्हारी एक नहीं सुनूंगा. तुम्हारी मां जो कह रही हैं तुम्हारे भले के लिए ही कह रही हैं. तुम्हें उन की बात का सम्मान करना चाहिए,’’ अपूर्व ने पत्नी का पक्ष लेते हुए कहा.

‘‘ठीक है. मैं आप के अतिथियों से मिल लूंगी. बस, इतना ही आश्वासन दे सकती हूं. क्या करूं, न आप को नाराज कर सकती हूं न शर्वरी मौसी को,’’ सुप्रिया ने हथियार डाल दिए. वह नहीं चाहती थी कि यह बहस और लंबी खिंचे. परिवार का आश्वासन पा कर ललिता तैयारियों में जुट गईं. घर को सजानेसंवारने का काम वे रात में ही पूरा कर लेना चाहती थीं. अगला दिन तो खानेपीने की तैयारियों में ही बीत जाएगा. लगभग 1 बजे जब सुप्रिया अपना लैपटौप बंद कर सोने चली तो पाया कि ललिता देवी अब भी नए कुशन कवर लगाने में जुटी थीं.

‘‘मां, कब तक लगी रहोगी. रात का 1 बजा है. पता नहीं क्यों दिनरात काम में जुटी रहती हो. कभी अपने स्वास्थ्य की भी चिंता कर लिया करो,’’ सुप्रिया बड़े प्यार से उन्हें पकड़ कर शयनकक्ष में ले गई. ललिता मुसकरा कर रह गईं. बात तो सच थी. 3 युवा संतानों की मां होते हुए भी घर के काम में वही जुटी रहती थीं. कभीकभी अपूर्व उन का हाथ बंटा लेते थे. अन्यथा उन्हें अपनी काम वाली बाई आशा का ही सहारा था. उस के नाजनखरे वे केवल इसलिए सह लेती थीं कि वह कामधंधे में उन का हाथ बंटाने में कभी आनाकानी नहीं करती थी. पर आज सुप्रिया ने उन के प्रति चिंता जताई तो उन्हें अच्छा लगा. कम से कम उन के बारे में सोचती तो है सुप्रिया. क्या पता घर के अन्य सदस्य भी उन की चिंता करते हों या शायद न करते हों, कौन जाने. बचपन में सुप्रिया दौड़दौड़ कर उन का हाथ बंटाती थी पर उन्होंने ही पढ़ाई में ध्यान देने का हवाला दे कर उसे ऐसा करने से रोक दिया.

अगले दिन औफिस जाते समय ललिता ने सुप्रिया को समझा दिया था, समय रहते ही घर लौट आए. फिर भी उन का दिल धड़क रहा था. क्या पता कहीं कुछ गड़बड़ हो गई तो. नीरजा को उन्होंने सुप्रिया को समय से घर लाने और तैयार करने का काम सौंप रखा था. अपूर्व अपने औफिस चले गए थे और तीनों बच्चे अपनेअपने काम पर. सभी लगभग तभी घर लौटने वाले थे जब मेहमान के आने का कार्यक्रम था. जरा सी फुरसत मिली तो शर्वरी को फोन मिला लिया. उन्हें सुप्रिया के संबंध में सूचना देना तो आवश्यक था.

‘‘बोल ललिता, कैसा चल रहा है सबकुछ? सारी तैयारी हो गई न?’’ शर्वरी ने ललिता का स्वर सुनते ही प्रश्न किया.

‘‘कहां दीदी, कुछ भी ठीक नहीं है. सुप्रिया ने तो साफ कह दिया है कि

वह प्रेम विवाह में विश्वास करती है. ऐसे में सारे तामझाम का क्या अर्थ है, दीदी.’’

‘‘तू छोटीछोटी बातों से परेशान मत हुआ कर. सुप्रिया जैसा चाहती है वैसा ही होगा. शर्वरी ने कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं. मैं सब संभाल लूंगी,’’ शर्वरी ने आश्वासन दिया.

‘‘ठीक है, दीदी, पर मुझे बहुत डर लग रहा है. सुप्रिया आजकल की लड़कियों जैसी नहीं है. आप तो उसे अच्छी तरह जानती हैं. वह तो आसानी से किसी से मिलतीजुलती भी नहीं.’’

‘‘चिंता मत कर. सुप्रिया बहुत समझदार है. अपना भलाबुरा भली प्रकार समझती है. वह जो भी निर्णय लेगी सोचसमझ कर ही लेगी. चल, ठीक है. फिर मिलते हैं शाम को,’’ शर्वरी ने उन्हें धीरज बंधाया. सुप्रिया के घर लौटते ही गतिविधियां तेज हो गईं. नीरजा अपने साथ अपनी 2 ब्यूटीशियन सहेलियों को भी लाई थी. तीनों ने मिल कर सुप्रिया को तैयार किया.

‘‘मेरी बेटी को किसी की नजर न लग जाए,’’ ललिता सुप्रिया को देखते ही खिल उठीं.

‘‘काला टीका लगा दो मां. दीदी हैं ही इतनी सुंदर कि जो देखे, देखता ही रह जाए,’’ नीरजा हंसी.

‘‘तुम लोगों को भी मुझे बनाने का अच्छा अवसर मिला है,’’ सुप्रिया हंस दी थी. अपूर्व और प्रताप मेज सजाने में ललिता की सहायता कर रहे थे.

‘‘हमारे समय में विवाह संबंध इसी तरह पक्के किए जाते थे. कई दिनों तक घर में उत्सव का सा वातावरण रहता था.’’

अपूर्व प्रताप को समझा रहे थे कि तभी सब को हैलोहाय कहते हुए शर्वरी का आगमन हुआ. उन के साथ ही एक युवक और उस के मातापिता भी थे. अपूर्व, प्रताप और ललिता ने आगे बढ़ कर उन का स्वागत किया. पहले औपचारिक और फिर अनौपचारिक बातचीत होने लगी. दोनों ही पक्ष बढ़चढ़ कर अपनी संतानों का गुणगान करने लगे. शीघ्र ही ठंडे पेय प्रस्तुत किए गए. उधर, शर्वरी ललिता का हाथ बंटाने उस के साथ चली गई.

‘‘अब बता, क्यों इतनी चिंता कर रही थी तू?’’ शर्वरी ने प्रश्न किया.

‘‘दीदी, सुप्रिया ने तो सुनते ही कह दिया कि वह तो प्रेम विवाह ही करेगी, मातापिता द्वारा तय किए विवाह में उस की कोई रुचि नहीं है.’’

‘‘उस ने कहा और तू ने मान लिया. ये बच्चे हमें बताएंगे कि वे किस प्रकार का विवाह करेंगे. हम ने क्या बिना प्रेम के ही विवाह कर लिया था. सच कहूं तो मुझे तेरे जीजाजी से पहली नजर में ही प्यार हो गया था. हमारा विवाह तो 6 माह बाद हुआ था.’’

‘‘ठीक कह रही हो, दीदी. मैं और अपूर्व तो मांपापा से छिपछिप कर मिलते थे. आप को तो सब पता है. मां को पता लगा तो कितना नाराज हुई थीं. उस मिलन में भी कितना रोमांच था. आधे घंटे की भेंट के लिए मैं दिनभर तैयार होती थी.’’

‘‘वही तो, हमारे प्यार में शालीनता थी, जिसे आज की पीढ़ी चाह कर भी समझ नहीं सकती.’’

‘‘वह सब छोड़ो न दीदी. इस बारे में कभी बाद में बात करेंगे. सुप्रिया का क्या करें, अभी तो यह बताइए?’’

‘‘तू क्यों चिंता करती है, सब ठीक हो जाएगा. मैं अभीष्ट और उस के मातापिता को ले कर आई हूं. अभीष्ट और सुप्रिया एकदूसरे को भली प्रकार जानते हैं. याद है 3 वर्ष पहले सुप्रिया मेरे पास छुट्टियां मनाने आई थी.’’

‘‘हां, याद है.’’

‘‘वहीं दोनों की मित्रता हुई थी जो बाद में घनिष्ठता में बदल गई. तुम चाहो तो इसे प्यार का नाम दे सकती हो.

एक मौका और दीजिए- भाग 1: बहकने लगे सुलेखा के कदम

नीलेश शहर के उस प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट में अपनी पत्नी नेहा के साथ अपने विवाह की दूसरी सालगिरह मनाने आया था. वह आर्डर देने ही वाला था कि सामने से एक युगल आता दिखा. लड़की पर नजर टिकी तो पाया वह उस के प्रिय दोस्त मनीष की पत्नी सुलेखा है. उस के साथ वाले युवक को उस ने पहले कभी नहीं देखा था.

मनीष के सभी मित्रों और रिश्तेदारों से नीलेश परिचित था. पड़ोसी होने के कारण वे बचपन से एकसाथ खेलेकूदे और पढ़े थे. यह भी एक संयोग ही था कि उन्हें नौकरी भी एक ही शहर में मिली. कार्यक्षेत्र अलग होने के बावजूद उन्हें जब भी मौका मिलता वे अपने परिवार के साथ कभी डिनर पर चले जाते तो कभी किसी छुट्टी के दिन पिकनिक पर. उन के कारण उन दोनों की पत्नियां भी अच्छी मित्र बन गई थीं.

मनीष का टूरिंग जाब था. वह अपने काम के सिलसिले में महीने में लगभग 10-12 दिन टूर पर रहा करता था. इस बार भी उसे गए लगभग 10 दिन हो गए थे. यद्यपि उस ने फोन द्वारा शादी की सालगिरह पर उन्हें शुभकामनाएं दे दी थीं किंतु फिर भी आज उसे उस की कमी बेहद खल रही थी. दरअसल, मनीष को ऐसे आयोजनों में भाग लेना न केवल पसंद था बल्कि समय पूर्व ही योजना बना कर वह छोटे अवसरों को भी विशेष बना दिया करता था.

मनीष के न रहने पर नीलेश का मन कोई खास आयोजन करने का नहीं था किंतु जब नेहा ने रात का खाना बाहर खाने का आग्रह किया तो वह मना नहीं कर पाया. कार्यक्रम बनते ही नेहा ने सुलेखा को आमंत्रित किया तो उस ने यह कह कर मना कर दिया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है पर उसे इस समय देख कर तो ऐसा नहीं लग रहा है कि उस की तबीयत खराब है. वह उस युवक के साथ खूब खुश नजर आ रही है.

नीलेश को सोच में पड़ा देख नेहा ने पूछा तो उस ने सुलेखा और उस युवक की तरफ इशारा करते हुए अपने मन का संशय उगल दिया.

‘‘तुम पुरुष भी…किसी औरत को किसी मर्द के साथ देखा नहीं कि मन में शक का कीड़ा कुलबुला उठा…होगा कोई उस का रिश्तेदार या सगा संबंधी या फिर कोई मित्र. आखिर इतनेइतने दिन अकेली रहती है, हमेशा घर में बंद हो कर तो रहा नहीं जा सकता, कभी न कभी तो उसे किसी के साथ की, सहयोग की जरूरत पड़ेगी ही,’’ वह प्रतिरोध करते हुए बोली, ‘‘न जाने क्यों मुझे पुरुषों की यही मानसिकता बेहद बुरी लगती है. विवाह हुआ नहीं कि वे स्त्री को अपनी जागीर समझने लगते हैं.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है नेहा, तुम ही तो कह रही थीं कि जब तुम ने डिनर का निमंत्रण दिया था तब सुलेखा ने कह दिया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है और अब वह इस के साथ यहां…यही बात मन में संदेह पैदा कर रही है…और तुम ने देखा नहीं, वह कैसे उस के हाथ में हाथ डाल कर अंदर आई है तथा उस से हंसहंस कर बातें कर रही है,’’ मन का संदेह चेहरे पर झलक ही आया.

‘‘वह समझदार है, हो सकता है वह दालभात में मूसलचंद न बनना चाहती हो, इसलिए झूठ बोल दिया हो. वैसे भी किसी स्त्री का किसी पुरुष का हाथ पकड़ना या किसी से हंस कर बात करना सदा संदेहास्पद क्यों हो जाता है? फिर भी अगर तुम्हारे मन में संशय है तो चलो उन्हें भी अपने साथ डिनर में शामिल होने का फिर से निमंत्रण दे देते हैं…दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.’’

नेहा ने नीलेश का मूड खराब होने के डर से बीच का मार्ग अपना लेना ही श्रेयस्कर समझा.

‘‘हां, यही ठीक रहेगा,’’ किसी के अंदरूनी मामले में दखल न देने के अपने सिद्धांत के विपरीत नीलेश, नेहा की बात से सहमत हो गया. दरअसल, वह उस उलझन से मुक्ति पाना चाहता था जो उस के दिल और दिमाग को मथ रही थी. वैसे भी सुलेखा कोई गैर नहीं, उस के अभिन्न मित्र की पत्नी है.

वे दोनों उठ कर उन के पास गए. उन्हें इस तरह अपने सामने पा कर सुलेखा चौंक गई, मानो वह समझ नहीं पा रही हो कि क्या कहे.

‘‘दरअसल सुलेखा, हम लोग यहां डिनर के लिए आए हैं. वैसे मैं ने सुबह तुम से कहा भी था पर उस समय तुम ने कह दिया कि तबीयत ठीक नहीं है पर अब जब तुम यहां आ ही गई हो तो हम चाहेंगे कि तुम हमारे साथ ही डिनर कर लो. इस से हमें बेहद प्रसन्नता होगी,’’ नेहा उसे अपनी ओर आश्चर्य से देखते हुए भी सहजता से बोली.

‘‘पर…’’ सुलेखा ने झिझकते हुए कुछ कहना चाहा.

‘‘पर वर कुछ नहीं, सुलेखाजी, मनीष नहीं है तो क्या हुआ, आप को हमेंकंपनी देनी ही होगी…आप भी चलिए मि…आप शायद सुलेखाजी के मित्र हैं,’’ नीलेश ने उस अजनबी की ओर देखते हुए कहा.

‘‘यह मेरा ममेरा भाई सुयश है,’’ एकाएक सुलेखा बोली.

‘‘वेरी ग्लैड टू मीट यू सुयश, मैं नीलेश, मनीष का लंगोटिया यार, पर भाभी, आप ने कभी इन के बारे में नहीं बताया,’’ कहते हुए नीलेश ने बडे़ गर्मजोशी से हाथ मिलाया.

‘‘यह अभी कुछ दिन पूर्व ही यहां आए हैं,’’ सुलेखा ने कहा.

‘‘ओह, तभी हम अभी तक नहीं मिले हैं, पर कोई बात नहीं, अब तो अकसर ही मुलाकात होती रहेगी,’’ नीलेश ने कहा.

अजीब पसोपेश की स्थिति में सुलेखा साथ आ तो गई पर थोड़ी देर पहले चहकने वाली उस सुलेखा तथा इस सुलेखा में जमीनआसमान का अंतर लग रहा था…जितनी देर भी साथ रही चुप ही रही, बस जो पूछते उस का जवाब दे देती. अंत में नेहा ने कह भी दिया, ‘‘लगता है, तुम को हमारा साथ पसंद नहीं आया.’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है. दरअसल, तबीयत अभी भी ठीक नहीं लग रही है,’’ झिझकते हुए सुलेखा ने कहा.

बात आईगई हो गई. एक दिन नीलेश शौपिंग मौल के सामने गाड़ी पार्क कर रहा था कि वे दोनों फिर दिखे. उन के हाथ में कुछ पैकेट थे. शायद शौपिंग करने आए थे. आजकल तो मनीष भी यही हैं, फिर वे दोनों अकेले क्यों आए…मन में फिर संदेह उपजा, फिर यह सोच कर उसे दबा दिया कि वह उस का ममेरा भाई है, भला उस के साथ घूमने में क्या बुराई है.

मनीष के घर आने पर एक दिन बातोंबातों में नीलेश ने कहा, ‘‘भई, तुम्हारा ममेरा साला आया है तो क्यों न इस संडे को कहीं पिकनिक का प्रोग्राम बना लें. बहुत दिनों से दोनों परिवार मिल कर कहीं बाहर गए भी नहीं हैं.’’

‘‘ममेरा साला, सुलेखा का तो कोई ममेरा भाई नहीं है,’’ चौंक कर मनीष ने कहा.

‘‘पर सुलेखा भाभी ने तो उस युवक को अपना ममेरा भाई बता कर ही हम से परिचय करवाया था, उसे सुलेखा भाभी के साथ मैं ने अभी पिछले हफ्ते भी शौपिंग मौल से खरीदारी कर के निकलते हुए देखा था. क्या नाम बताया था उन्होंने…हां सुयश,’’ नीलेश ने दिमाग पर जोर डालते हुए उस का नाम बताते हुए पिछली सारी बातें भी उसे बता दीं.

‘‘हो सकता है, कोई कजिन हो,’’ कहते हुए मनीष ने बात संभालने की कोशिश की.

‘‘हां, हो सकता है पर पिकनिक के बारे में तुम्हारी क्या राय है?’’ नीलेश ने फिर पूछा.

‘‘मैं बाद में बताऊंगा…शायद मुझे फिर बाहर जाना पडे़,’’ मनीष ने कहा.

छंटनी- भाग 1: क्या थी रीता की असलियत

शादी से पहले सुधा के मन में हजार डर बैठे थे, सास का आतंक, ससुर का खौफ, ननदों का डर और देवर, जेठ से घबराहट, पर शादी के बाद लगा बेकार ही तो वह डरतीघबराती थी. ससुराल में सामंजस्य बनाना इतना मुश्किल तो नहीं.

वैसे सुधा बचपन से ही मेहनती थी, शादी हुई तो जैसे सब को खुश करने का उस में एक जुनून सा सवार हो गया. सब से पहले जागना और सब के बाद सोना. सासननदों के हिस्से के काम भी उस ने खुशीखुशी अपने सिर ले लिए थे. जब रोजमर्रा की जिंदगी में यह हाल था तो रीतानीता की शादी का क्या आलम होता. रातरात जाग कर उन की चुनरियां सजाने से मेहंदी रचाने तक का काम भी सुधा ने ही किया.

औरों के लिए रीतानीता की शादी 2-4 दिन की दौड़धूप भले ही हो पर सुधा के लिए महीनों की मेहनत थी. एकएक साड़ी का फाल टांकने से ले कर पेटीकोट और ब्लाउज तक उसी ने सिले. चादरें, तकिया, गिलाफ और मेजपोश जो उस ने भेंट में दिए उन को भी जोड़ लें तो सालों की मेहनत हो गई, पर सुधा को देखिए तो चेहरे पर कहीं शिकन नहीं. सहजता से अपनापन बांटना, सरलता से देना, सुंदरता से हर काम करना आदि सुधा के बिलकुल अपने मौलिक गुण थे.

रीता, सुधा की हमउम्र थी इसलिए उस से ज्यादा दोस्ती हो गई. सुधा की आड़ में रीता खूब मटरगश्ती करती. सहेलियों के साथ गप्पें लड़ाती फिल्में देखती और सुधा उसे डांट पड़ने से बचा लेती. सुधा जब मैले कपड़ों के ढेर से जूझ रही होती तो कभीकभी रीता उस के पास मचिया डाल कर बैठ जाती और उसे देखी हुई फिल्म की कहानी सुनाती. यह सुधा के मनोरंजन का एकमात्र साधन था.

रीता की शादी के समय सुधा के ससुर भी जीवित थे. पर इस शादी की लगभग सारी ही जिम्मेदारी सुधा और उस के पति अजीत के ऊपर रही. अजीत को फैक्टरी में नौकरी मिलते ही पिता अपनी दुकान से यों पीछा छुड़ाने लगे जैसे अब उन के ऊपर कोई जिम्मेदारी ही न हो. जब मन होता दुकान पर बैठते, जब मन होता ताला डाल कर घूमने निकल जाते. रिश्तेदारों के यहां आनाजाना भी वह बहुत रखते.

कभीकभी अजीत कहता भी,  ‘पिताजी, रिश्तेदारों के यहां ज्यादा नहीं जाना चाहिए,’ तो उन को डांट पड़ती कि तुम मुझ से ज्यादा दुनियादारी समझते हो क्या? और जाता हूं तो उन पर बोझ नहीं बनता, जितना खाता हूं उस से ज्यादा उन पर खर्च करता हूं, समझे.

अजीत को चुप होना पड़ता. पिता ने बाहर हाथ खोल कर खर्च किया और बेटी की शादी में पूजा, पंडितजी और अपने रिश्तेदारों की विदाई के खर्च के अलावा सारा खर्च अजीत पर डाल दिया. अजीत और सुधा ने मां से बात की तो उन्होंने तटस्थता दिखा दी, ‘‘मुझे कोई मतलब नहीं. अजीत जाने अजीत का बाप जाने. मैं कमाती तो हूं नहीं कि मुझ से पूछते हो,’’ कहतेकहते मां ने अपनी मोटी करधनी अजीत को सौंप दी.

करधनी से रीता के कुछ गहने तो बन गए पर उस का मुंह सूज गया. उस के चेहरे की सूजन तभी उतरी जब सुधा ने अपना इकलौता गले का हार उस के गले में पहना दिया. इस शादी में रीता की मांग पूरी करतेकरते ही अजीत की जमा पूंजी खत्म हो गई. बाकी सबकुछ कर्ज ले कर किया गया. कर्ज चुकाने की जिम्मेदारी से बचतेबचते पिता तो दुनिया से ही चले गए और मां ने अपना मंगलसूत्र अजीत के हाथों में रख दिया. वह मंगलसूत्र सुधा ने नीता के गले में डाला, बेचा नहीं.

अजीत एक दक्ष तकनीशियन था.  आय अच्छी थी. कर्ज चुकाने में वह चूकता नहीं था लेकिन घर के लिए उसे बहुत सी कटौतियां करनी पड़तीं. गौरव व सौरभ के जन्म पर सुधा को ठीक से पोषण नहीं मिल पाया लेकिन उस ने कभी इस की कोई शिकायत नहीं की.

अजीत की मां जैसी तटस्थ थीं अंत तक वैसी ही बनी रहीं. नीता की शादी तय भी नहीं हुई थी और मां दुनिया से चली गईं. अब तो सुधा और अजीत को ही सब करना था. रीता की शादी का कर्ज चुका ही था कि नीता की शादी के लिए कर्ज लेना पड़ा और नीता को विदा कर के कमर सीधी भी न की थी कि फैक्टरी में कर्मचारियों की छंटनी होने लगी.

अजीत को भरोसा था अपने काम पर, अपनी मेहनत पर. उसे विश्वास था, छंटनी की सूची में उस का नाम कभी नहीं होगा. पर एक दिन वह भी आया जब अजीत को भी घर बैठना पड़ा. तमाम खींचतान और प्रयासों के बाद आखिर फैक्टरी बंद हो गई तो फिर कैसा ही कर्मचारी क्यों न हो उस की नौकरी बचती कैसे.

नौकरी जाने का सदमा अजीत के अंदर इस कदर बैठा कि उस ने बिस्तर पकड़ लिया. सुधा के तो मानो पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई. उस के सामने स्कूल जाते सौरभ, गौरव थे तो बिस्तर पर पड़े अजीत को भी उसे ही खड़ा करना था. रातदिन जुट कर उस ने अजीत को अवसाद के कुएं से निकालने के प्रयास किए. इसी बीच नीता को सरकारी नौकरी मिल गई थी. सुधा के लिए यह डूबते को तिनके का सहारा था.

कर्ज की एक किस्त और सौरभगौरव की फीस उस ने अपने कंगन बेच कर भरी थी. नीता मिलने आई तो सुधा ने उस के आगे सारी बातें रख दीं. नीता 4 दिन रही थी और जाते हुए बोली, ‘‘ठीक है, भाभी, तुम्हारी हालत सही नहीं है इसलिए विदाई की साड़ी और मिठाई मैं अपने पैसों से खरीद लूंगी और यह 100 रुपए भी रखो सौरभ, गौरव के लिए, मेरी ओर से कुछ ले लेना.’’

सुधा ने रुलाई रोकते हुए 100 का नोट ले लिया और आशा भरे स्वर में कहा, ‘‘नीता, इस बार के वेतन से हो सके तो कुछ भेज देना. तुम तो जानती हो हम कर्ज में डूबे हैं. तुम्हारे भैया संभलें तो ही कुछ कर सकेंगे ना.’’

‘‘देखूंगी भाभी,’’ नीता ने अनमनी सी हो कर कहा.

उस कठिन समय में सुधा ने अपनी अंगूठियां और झुमके भी बेचे और एक रेडीमेड कपड़ों की दुकान से घर पर काम लाना भी शुरू कर दिया. फैक्टरी से बकाया पैसा मिलतेमिलते 6 महीने लग गए. इस बीच सुधा ने एक कमरा किराए पर उठा दिया और अपनी सारी गृहस्थी डेढ़ कमरों में ही समेट ली. इन सारे प्रयासों से जैसेतैसे दो समय पेट भर रहा था और बच्चे स्कूल से निकाले नहीं गए थे.

नया सवेरा- भाग 3: बड़े भैया के लिए पिताजी का क्या था फैसला

छोटे भैया भी तब तक वहां भाभी को खोजते आ पहुंचे थे. मुझे इस हालत में देख सब को हंसाने के लिए बोले, ‘‘क्यों बीनू, कल की शादी देख मन मचल गया क्या? खूब भाभी को मसका लग रहा है.’’

उन की बात सुन मैं और जोर से रो पड़ी. छोटी भाभी ने उन्हें इशारे से बुलाया व सारी बात समझाई. सुनते ही भैया बड़ी भाभी के कमरे में पहुंचे. यह तो अच्छा था कि मां पूजा पर बैठ चुकी थीं और डेढ़ घंटे तक उन के उठने की कोई संभावना न थी. छोटी भाभी के साथ मैं भी भैया के पीछेपीछे बड़ी भाभी के कमरे में पहुंची.

नैकलैस ढूंढ़तेढूंढ़ते भाभी को अपने लौकर की चाबी मिल गई. मुझे देख उन्होंने कहा, ‘‘बीनू, यदि तुम्हारा नैकलैस नहीं मिला तो मैं अपना नैकलैस तुम्हें दे दूंगी, तुम चिंता मत करो,’’ उन की आवाज बता रही थी कि उन्हें भी नैकलैस न मिलने का गहरा दुख है.

उन्होंने सब के सामने लौकर खोला तो चक्कर खा कर गिर पड़ीं. भैया ने उन्हें बिस्तर पर लिटाया. छोटी भाभी मुझे छोड़ उन की तरफ लपकीं और मैं पानी लेने दौड़ पड़ी. यह सब इतनी जल्दी हुआ कि कुछ सोचने का होश ही नहीं रहा.

छोटे भैया ने देखा कि लौकर खाली पड़ा है. तब तक भाभी को भी होश आ गया. वे जोरजोर से रोने लगीं. छोटे भैया इस मौके को कहां छोड़ने वाले थे. बड़ी भाभी को आड़े हाथों लिया.अंत में यह फैसला हुआ कि मां और पिताजी को कुछ न बताया जाए. पिताजी दिल के मरीज हैं, शायद इस सदमे को बरदाश्त न कर सकें. सभी आगे की योजना बनाने लगे कि तभी बड़े भैया मजे से सीटी बजाते कमरे में दाखिल हुए.

भाभी को बिस्तर पर लेटे और हम सब को पास बैठे देख वे दौड़ कर उन के पास पहुंचे व घबरा कर बोले, ‘‘सुमन, क्या हुआ, तुम ठीक तो हो?’’

‘‘खबरदार, जो मुझे हाथ लगाया. अब और नाटक मत करो,’’ इस तेज आवाज ने हम सब को सकते में डाल दिया. उन्होंने भैया को खूब झिड़का, ‘‘तुम पति बनने के योग्य नहीं हो. सिर्फ शराब पीने के लिए तुम ने इतनी घिनौनी हरकत कर डाली. मुझे मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा.’’

भैया ‘सुमन सुनो तो’ कहते रहे किंतु भाभी पर तो जैसे भूत सवार था. तब भैया फौरन बाहर जाने को पलटे.

‘‘खबरदार, जो एक कदम भी आगे बढ़ाया,’’ इस आवाज ने भैया के पैरों में जैसे जंजीर डाल दी. बड़े भैया आश्चर्य से पत्नी को देख रहे थे. उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि जो पत्नी उन के आगेपीछे गऊ की तरह दुम हिलाती थी, आज शेरनी कैसे बन गई.तब तक भाभी के कहने पर छोटे भैया ने बड़े भैया की तलाशी ले डाली. उन की जेब से रुपयों की गड्डी तथा एक रसीद मिली. यह देख भाभी सिर पकड़ कर वहीं बैठ गईं.

छोटे भैया रसीद व रुपए ले कर तुरंत बाहर निकल गए. बड़े भैया भी पीछेपीछे पता नहीं कहां चल पड़े.

करीब आधे घंटे में छोटे भैया नैकलैस व भाभी की बालियां ले कर लौट आए. उन्होंने बताया कि भैया ने भाभी के सारे गहने उसी सुनार के यहां गिरवी रख छोड़े हैं जहां नैकलैस दिया था.

भाभी के तो आंसू ही नहीं रुक रहे थे. अचानक छोटी भाभी कमरे से चली गईं. कुछ देर बाद लौटीं तो उन के हाथों में कुछ रुपए थे. उन्होंने रुपए पति को दे कर कहा, ‘‘जितने भी गहने आ सकते हैं, ले आइए.’’

तब तक मैं भी अपनी जमाराशि ले आई थी. बड़ी भाभी ने हम दोनों को लिपटा लिया और जोर से रो पड़ीं. हम सब को भी रोना आ गया.छोटे भैया ने बात संभाली, उन्होंने फिर से सब को सचेत किया कि मां को भनक तक नहीं लगनी चाहिए.

बड़ी भाभी दिनभर कमरे से बाहर न निकलीं. मां 2-3 बार देखने भी आईं पर उन्होंने बीमारी का बहाना बना दिया. उन के 1 वर्ष के बेटे को छोटी भाभी ही संभाले रहीं.

छोटे भैया ने बड़ी भाभी के व अपने खाते से रुपए निकाल कर भाभी के सारे गहने शाम तक ला दिए. बड़े भैया का रातभर कुछ पता न चला.

सुबहसुबह उन के दोस्त अजय ने आ कर खबर दी कि वे भैया को अस्पताल में दाखिल करा कर आ रहे हैं. उन्होंने बताया कि बड़े भैया अपने किए पर इतना शर्मिंदा थे कि सुबह से ही शराब पी रहे थे. रात बेहोशी की हालत में उन्हें अस्पताल में दाखिल करवाया. ज्यादा पीने से उन के एक गुरदे ने काम करना बंद कर दिया है. रातभर वे वहीं थे. डाक्टरों ने औपरेशन कर दिया है. वे खतरे से बाहर हैं.

अभी हम सब यह बुरी खबर सुन ही रहे थे कि नौकर ने आ कर खबर दी कि पिताजी ने छोटे भैया को अपने कमरे में बुलाया है. सुन कर सभी घबरा गए.

छोटे भैया ने सब को शांत किया और ऊपर गए. हम सब से रहा न गया. सभी दबेपांव पिताजी के कमरे के बाहर जा पहुंचे. मां भी वहीं थीं.

पिताजी ने शांत स्वर में पूछा, ‘‘पैसों की इतनी जरूरत आन पड़ी थी कि इतने सारे रुपए एकसाथ तुम ने व बहू ने निकाले?’’

सब का खाता उसी बैंक में था जहां वे मैनेजर थे. कैशियर छोटे भैया को पहचानता था. चापलूसी के लिए शायद उस ने सारी बात पिताजी को बता दी थी.

छोटे भैया ने सारी बातें पिताजी को बता दीं. बस, नैकलैस की बात छिपा गए. मां तो सुन कर ‘हायहाय’ करने लगीं किंतु पिताजी ने उन्हें डांट कर चुप करा दिया. फिर बोले, ‘‘मुझे खुशी है कि छोटे ने इस विपत्ति में हिम्मत और समझदारी से काम लिया. चलो, अस्पताल चलते हैं. शायद उस नालायक को भी सद्बुद्धि आ जाए.’’

हम सभी अस्पताल पहुंचे. पहले भैया हम सब से मिलने को तैयार ही न हुए. किंतु उन के दोस्त अजय के बहुत समझाने पर मिलने को राजी हो गए. वे किसी से आंखें नहीं मिला पा रहे थे. दोनों हाथों से मुंह ढक कर रो पड़े. उन्हें रोते देख हम सब रो

पड़े. पिताजी उन के सिर पर हाथ फेरते रहे. मां उन के आंसुओं को पोंछती हुई चेहरा भिगो रही थीं.

आखिर बड़े भैया बोले, ‘‘मुझे जीने का कोई हक नहीं है. मैं ने सब के विश्वास को धोखा दिया है.’’

‘‘नहीं बेटे, ऐसा नहीं कहते. जब आंख खुले, तभी सवेरा. देखो, यह क्या करिश्मा है कि समय रहते तुम्हें सद्बुद्धि आ गई,’’ पिताजी ने उन्हें धीरज बंधाया.

हम सभी की आंखें भरी थीं, पर आंसू अब गम के नहीं, खुशी के थे.

नाराजगी- भाग 1: बहू को स्वीकार क्यों नहीं करना चाहती थी आशा

सुमित पिछले 2 सालों से मुंबई के एक सैल्फ फाइनैंस कालेज में पढ़ा रहा था. पढ़नेलिखने में वह बचपन से ही अच्छा था. लखनऊ से पढ़ाई करने के बाद वह नौकरी के लिए मुंबई जैसे बड़े शहर आ गया था. उस की मम्मी स्कूल टीचर थीं और वे लखनऊ में ही जौब कर रही थीं.

मम्मी के मना करने के बावजूद सुमित ने मुंबई का रुख कर लिया था.यहां के जानेमाने मैनेजमैंट कालेज में वह अर्थशास्त्र पढ़ा रहा था. वहीं उसी विभाग में उस के साथ संध्या पढ़ाती थी. स्वभाव से अंतर्मुखी और मृदुभाषी संध्या बहुत कम बोलने वाली थी. सुमित को उस का सौम्य व्यवहार बहुत अच्छा लगा. सुमित की पहल पर संध्या उस से थोड़ीबहुत बातें करने लगी और जल्दी ही उन में अच्छी दोस्ती हो गई. धीरेधीरे यह दोस्ती प्यार में बदलने लगा था. संध्या को इस बात का एहसास होने लगा था. सुमित जबतब यह बात उसे जता भी देता. संध्या अपनी ओर से उसे जरा भी बढ़ावा न देती. वह जानती थी कि वह एक विधवा है. उस के पति की 7 साल पहले एक ऐक्सिडैंट में मौत हो गई थी.

उस का 8 साल का एक बेटा भी था. सुमित को उस ने सबकुछ पहले ही बता दिया था. इतना सबकुछ जानते हुए भी उस ने इन बातों को नजरअंदाज कर दिया. एक दिन उस ने संध्या के सामने अपने दिल की बात कह दी.‘‘संध्या, मु झे तुम बहुत अच्छी लगती हो और तुम से प्यार करता हूं. मैं तुम से शादी करना चाहता हूं. क्या तुम्हें मैं पसंद हूं?’’ उस की बात सुन कर संध्या को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ. वह चेतनाशून्य सी हो गई. उसे सम झ नहीं आ रहा था कि वह सुमित से क्या कहे. किसी तरह से अपनेआप को संयत कर वह बोली, ‘‘आप ने अपनी और मेरी उम्र देखी है?’’ ‘‘हां, देखी है. उम्र से क्या होता है? बात तो दिल मिलने की होती है. दिल कभी उम्र नहीं देखता.’’ ‘‘यह सब आप ने किताबों में पढ़ा होगा.’’ ‘‘मैं मजाक नहीं कर रहा संध्या. मैं सच में तुम्हें अपना लाइफ पार्टनर बनाना चाहता हूं.’’ ‘‘प्लीज, फिर कभी ऐसी बात मत कहना. सबकुछ जान कर भी मु झ से यह सब कहने से पहले आप को अपने घरवालों की रजामंदी लेनी चाहिए थी.’’‘‘

उन से तो मैं बात कर ही लूंगा, पहले मैं तुम्हारे विचार जानना चाहता हूं.’’ ‘‘मैं इस बारे में क्या कहूं? आप ने तो मु झे कुछ कहने लायक नहीं छोड़ा,’’ संध्या बोली. उस की बातों से सुमित इतना तो सम झ गया था कि संध्या भी उसे पसंद करती है लेकिन वह उस की मम्मी को आहत नहीं करना चाहती. उसे पता है, एक मां अपने बेटे के लिए कितनी सजग रहती है. सुमित के पापा की मौत तब हो गई थी जब वह मात्र 2 साल का था. उस के पिता भी टीचर थे और उस की मम्मी उस के पिता की जगह अब स्कूल में पढ़ा रही थीं.सुमित की मम्मी आशा की दुनिया केवल सुमित तक सीमित थी. वह खुद भी यह बात अच्छी तरह से जानता था कि मम्मी इस सदमे को आसानी से बरदाश्त नहीं कर पाएंगी, फिर भी वह संध्या को अपनाना चाहता था.

संध्या सोच रही थी कि वह भी तो अर्श की मां है और अपने बच्चे का भला सोचती है. भला कौन मां यह बात स्वीकार कर पाएगी कि उस का बेटा अपने से 7 साल बड़ी एक बच्चे की मां से शादी करे.यही सोच कर वह कुछ कह नहीं पा रही थी. दिल और दिमाग आपस में उल झे हुए थे. अगर वह दिल के हाथों मजबूर होती है तो एक मां का दिल टूटता है और अगर दिमाग से काम लेती है तो सुमित के प्यार को ठुकराना उस के बस में नहीं था. इसीलिए उस ने चुप्पी साध ली. सुमित उस की मनोदशा को अच्छी तरह से सम झ रहा था. संध्या की चुप्पी देख कर वह सम झ गया था कि वह भी उसे उतना उसे पसंद करती है जितना कि वह. 

संध्या के लिए इतनी बड़ी बात अपने तक सीमित रखना बहुत मुश्किल हो रहा था. घर आ कर उस ने अपनी मम्मी सीमा को यह बात बताई. सीमा बोली, ‘‘यह क्या कह रही हो संध्या? लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे?’’मम्मी, मु झे दुनिया वालों की परवा नहीं. आखिर दुनिया ने मेरी कितनी परवा की है? मु झे तो केवल सुमित की मम्मी की चिंता है. वे इस रिश्ते को कैसे स्वीकार कर पाएंगी?‘‘संध्या, तुम्हें अब सम झदारी से काम लेना चाहिए.’’‘‘तभी मम्मी, मैं ने उस से कुछ नहीं कहा. मैं चाहती हूं कि पहले वह अपनी मम्मी को मना ले.’’ ‘‘तुम ठीक कह रही हो. ऐसे मामले में बहुत सोचसम झ कर कदम आगे बढ़ाने चाहिए.’’

संध्या की मम्मी सीमा ने उसे  नसीहत दी.कुछ दिनों बाद सुमित ने फिर संध्या से वही प्रश्न दोहराया-‘‘तुम मु झ से कब शादी करोगी?’’ ‘प्लीज सुमित, आप यह बात मु झ से दूसरी बार पूछ रहे हो. यह कोई छोटी बात नहीं है.’’ ‘‘इतनी बड़ी भी तो नहीं है जितना तुम सोच रही हो. मैं इस पर जल्दी निर्णय लेना चाहता हूं.’’ ‘‘शादी के निर्णय जल्दबाजी में नहीं, अपनों के साथ सोचसम झ कर लिए जाते हैं. आप की मम्मी इस के लिए राजी हो जाती हैं तो मु झे कोई एतराज नहीं होगा.’’उस की बात सुन कर सुमित चुप हो गया. उस ने भी सोच लिया था अब वह इस बारे में मम्मी से खुल कर बात कर के ही रहेगा. सुमित ने अपनी और संध्या की दोस्ती के बारे में मम्मी को बहुत पहले बता दिया था.‘‘मम्मी, मु झे संध्या बहुत पसंद है.’’‘‘कौन संध्या?’’‘‘मेरे साथ कालेज में पढ़ाती है.’’‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है. तुम्हें कोई लड़की पसंद तो आई.’’‘‘मम्मी. वह कुंआरी लड़की नहीं है. एक विधवा महिला है. मु झ से उम्र में बड़ी है.’’‘‘यह क्या कह रहे हो तुम?’’‘‘मैं सच कह रहा हूं.’’‘‘और कोई सचाई रह गई हो तो वह भी बता दो.’’‘‘हां, उस का एक 8 साल का बेटा भी है.’

’ सुमित की बात सुन कर आशा का सिर घूम गया. उसे सम झ नहीं आ रहा था उस के बेटे को क्या हो गया जो अपने से उम्र में बड़ी और एक बच्चे की मां से शादी करने के लिए इतना उतावला हो रहा है. उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे संध्या ने सुमित  पर जादू कर दिया हो जो उस के प्यार में इस कदर पागल हो रहा है. उसे दुनिया की ऊंचनीच कुछ नहीं दिखाई दे रही थी.‘‘बेटा, इतनी बड़ी दुनिया में तुम्हें वही विधवा पसंद आई.’’‘‘मम्मी, वह बहुत अच्छी है.’’‘‘तुम्हारे मुंह से यह सब तारीफें मु झे अच्छी नहीं लगतीं,’’ आशा बोलीं.वे इस रिश्ते के लिए बिलकुल राजी न थीं. उन्हें सुमित का संध्या से मेलजोल जरा सा पसंद नहीं था. इसी बात को ले कर कई बार मम्मी और बेटे में तकरार हो जाती थी.

मेरी जीवनसाथी- भाग 1: नवीन का क्या था सच

घड़ी ने टिकटिक कर के 2 का घंटा बजाया. आरामकुरसी पर पसरी मैं शून्य में देखती ही रहती यदि घड़ी की आवाज ने मुझे चौंकाया न होता. उठ कर नवीन के पास आई. बरसों पुराना वही तरीका, पुस्तक अधखुली सीने पर पड़ी हुई और चश्मा आंखों पर लगा हुआ.

चश्मा उतार कर सिरहाने रखा. पुस्तक बंद कर के रैक में लगाई और लैंप बुझा कर बाहर आ गई. अब तो यह प्रतिदिन की आदत सी हो गई है. जिस दिन बिना दवा खाए नींद आ जाती, वह चमत्कारिक दिन होता.

बालकनी में खड़ी मैं अपने बगीचे और लौन को देखती रही. अंदर आ कर फिर कुरसी पर पसर गई. घड़ी की टिकटिक हर बार मुझे एहसास करा रही थी कि इस पूरे घर में इस समय वही एकमात्र मेरी सहचरी और संगिनी है.

बड़ी सी कोठी, 2-2 गाडि़यां, भौतिक सुविधाओं से भरापूरा घर, समझदार पति और 2 खूबसूरत होनहार बेटे, एक नेवी में इंजीनियर, दूसरा पायलट. ऐसे में मु झे बेहद सुखी होना चाहिए लेकिन स्थिति इस के बिलकुल विपरीत है.

घड़ी की टिकटिक मेरी सहचरी है और मेरे अतीत की साक्षी भी. मेरा अतीत, जो समय की चादर से लिपटा था, आज फिर खुलता गया.

तब पूरा शहर ही नहीं, समूचा देश हिंसा की आग में जल रहा था. 2 संप्रदायों के लोग एकदूसरे के खून के प्यासे हो गए थे. बहूबेटियों की इज्जत लूट कर उन्हें गाजरमूली की तरह काटा जा रहा था. चारों तरफ सांप्रदायिकता की आग नफरत और हिंसा की चिनगारियां उगल रही थी.

हमारा घर मुसलमानों के महल्ले के बीच अकेला था. सांप्रदायिक हिंसा की लपटें फैलते ही लोगों की आंखें हमारे घर की तरफ उठ गई थीं.

एक रात मैं, अम्मा और बाबूजी ठंडे चूल्हे के पास बैठे सांस रोके बाहर का शोरशराबा सुन रहे थे. अचानक पीछे का दरवाजा किसी ने खटखटाया. अम्मा ने मुझे अपने सीने से चिपटा कर बाबूजी से कहा था, ‘नहीं, मत खोलना. पहले मैं इसे जहर दे दूं.’

तभी बाहर से रहीम चाचा की आवाज आई थी, ‘संपत भैया, मैं हूं रहीम. दरवाजा खोलो.’ सांस रोके हम खड़े रहे. बाबूजी ने दरवाजा खोला तो रहीम चाचा ने  झटपट मेरा और अम्मा का हाथ थामा, ‘चलो भाभी, मेरे घर. अब यहां रहना खतरे से खाली नहीं है. इंसानियत पर हैवानियत का कब्जा हो गया है. चलो.’

जेवर, पैसा, कपड़े सब छोड़ कर हम रहीम चाचा के घर आ गए. पूरा दिन हम वहां एक कमरे में छिप कर बैठे रहे. लोग पूछपूछ कर लौट गए पर रहीम चाचाजी और फरजाना ने जबान नहीं खोली.

तीसरे दिन रहीम चाचा ने बाबूजी को 3 टिकट दिल्ली के पकड़ाए थे, ‘सुबह 4 बजे टे्रन जाती है. बाहर गाड़ी खड़ी है. तुम लोग चले जाओ, रात का सन्नाटा है. बड़ी मुश्किल से टिकट और गाड़ी का इंतजाम हो सका है.’

एक अटैची पकड़ाते हुए चाची ने कहा था, ‘इस में थोड़े पैसे और कपड़े हैं. माहौल ठंडा पड़ते ही तुम वापस आ जाना. हम हैं न.’

उस समय मैं फरजाना से, अम्मा चाची से और बाबूजी रहीम चाचा से मिल कर कितना रोए थे. होली, ईद संगसंग मनाने वाला महल्ला कितना बेगाना हो गया था हमारे लिए.

टे्रन में बैठने के बाद अम्मा ने राहत की सांस ली थी. बाबूजी ने बेबसी से शहर को निहारा था.

टे्रन अभी जालंधर ही पहुंची थी कि अचानक बाबूजी को दिल का दौरा पड़ा. खामोशी से सबकुछ सहते बाबूजी को देख मैं ने सोचा था, सबकुछ सामान्य है पर यह हादसा उन्हें घुन की तरह खा रहा था. लगीलगाई दुकान, मकान और जोड़ा हुआ बेटी के लिए ढेरों दहेज…सब छोड़ कर आना उन्हें तोड़ कर रख गया.

चलती हुई ट्रेन में हम करते भी क्या? तभी सामने बैठे एक सज्जन ने हमें ढाढ़स बंधाया था, ‘देखिए, मैं डाक्टर हूं. आप इन्हें यहीं उतार लें, आगे तक जाना इन की जान के लिए खतरनाक हो सकता है.’

‘आप…’

‘हां, मैं, यहीं सैनिक अस्पताल में डाक्टर हूं.’

मैं ने अम्मा की तरफ देखा और उन्होंने मेरी तरफ. उस समय 17 वर्षीया मैं अपने को बहुत बड़ी समझने लगी थी.

अस्पताल में नवीन नाम के उस डाक्टर ने हमारी बड़ी मदद की. बाबूजी को सघन चिकित्सा कक्ष में रखा. हमें भी वहीं रहने का स्थान मिल गया. मां ने उन्हें सबकुछ बता दिया.

एक हफ्ते के अंदर ही नवीन ने एक कमरा दिलवा दिया जिस में एक अटैची के साथ हम सब को गृहस्थी शुरू करनी थी. थोड़े से बरतन, चूल्हा और राशन नवीन ने भिजवाए थे. मना करने पर कहा था उन्होंने, ‘मुफ्त में नहीं दे रहा हूं. बाबूजी ठीक हो जाएंगे तो उन्हें नौकरी दिलवा दूंगा.’

एक दिन बाबूजी को मैं देखने गई. वे ठीक लगे. मैं उन्हें घर ले जाना चाहती थी पर डा. नवीन उस समय ड्यूटी पर नहीं थे. घर पास ही था, पता पूछ कर जब मैं उन के घर पहुंची तो वहां गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था.

नौकर ने बताया था, ‘डाक्टर साहब स्टेशन गए हैं, अपने बेटे को लेने. वह शिमला में पढ़ता है. छुट्टियों में आ रहा है.’

डाक्टर साहब की पत्नी कहां हैं, पूछने से पूर्व मेरी दृष्टि फ्रेम में जड़ी एक तसवीर पर चली गई. सुहागन स्त्री की तसवीर जिस पर फूलों की माला पड़ी थी. बगल में ही डा. नवीन की भी फोटो रखी थी.

नौकर की खामोशी मुझे नवीन की उदासी समझा गई. उस दिन पहली बार नवीन के प्रति एक सहानुभूति की लहर ने मेरे अंदर जन्म लिया था.

2-4 दिनों के बाद ही बाबूजी घर आ गए. मैं ने 2 बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया. खुद 11वीं तक पढ़ी थी. कुछ पैसे आने लगे. मां ने अचार, बडि़यां, पापड़ और मसाले बनाने का काम शुरू किया.

बाबूजी दुकानदारी के साथ प्रैस के काम का भी अनुभव रखते थे. इसलिए नवीन ने उन्हें एक प्रैस में छपाई का काम दिलवा दिया. फिर तो डुगडुग करती हमारी गृहस्थी चल निकली.

एक दिन एक खूबसूरत युवक हमारे घर का पता पूछता आ गया. उसे बाबूजी से काम था, लेकिन मु झे देखते ही बोला, ‘आप संगीता हैं न?’

‘हां, पर आप?’

‘मैं चंदन हूं, नवीन भैया का छोटा भाई.’

‘ओह, नमस्ते,’ मैं ने नजरें नीची कर के कहा तो वह मुसकरा दिया. उस की वह मुसकराहट मुझे अंदर तक छू गई. नवीन के लिए एक बार मेरे मन में सहानुभूति की लहर उठी थी, पर दिल कभी नहीं धड़का था. किंतु आज चंदन की काली आंखों के आकर्षण से न केवल मेरा दिल धड़कने लगा, बल्कि मैं स्वयं मोम सी पिघलने लगी.

नवीन दूसरे दिन आ कर हमें निमंत्रणपत्र दे गए थे. चंदन ने डाक्टरी पूरी कर ली थी. उन के बेटे मोहित का जन्मदिन भी था. उन दोनों की खुशी में वे एक पार्टी दे रहे थे.

फरजाना का सितारों से जड़ा गुलाबी सूट, जो अच्छे लिबास के नाम पर एकमात्र पहनावा था, पहन कर और नकली मोतियों का सैट गले में डाल कर मैं तैयार हो गई थी. मां ने मु झे गर्व से ऊपर से नीचे तक निहारा था. मैं लजा गई थी. बाबूजी के साथ मैं नवीन के घर पहुंची.

दरवाजे पर ही चंदन अपने दोस्तों के बीच खड़ा दिख गया. मेरी तरफ उस की पीठ थी लेकिन मैं चाहती थी कि वह मेरी तरफ देखे. मेरी सुंदरता उस पर असर करे.

Anupama-अनुज के सामने बरखा के भाई को थप्पड़ मारेगा वनराज, पाखी बनेगी वजह

रुपाली गांगुली स्टारर सीरियल अनुपमा (Anupama) की कहानी फैंस को बेहद पसंद आ रही है, जिसके चलते मेकर्स भी नए-नए दिलचस्प मोड़ लाते हुए नजर आ रहे हैं. इसी बीच किंजल के गोदभराई सेलिब्रेशन में जहां शाह परिवार मस्ती करता हुआ दिख रहा है तो वहीं अपकमिंग एपिसोड में पाखी के कारण बड़ा हंगामा होता हुआ दिखेगा. आइए आपको बताते हैं क्या होगा शो में आगे (Anupama Upcoming Update) …

बरखा को भड़काती है राखी

 

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अब तक आपने देखा कि किंजल की मां राखी, बरखा को अनुपमा के खिलाफ भड़काती है. हालांकि बरखा उसकी बातों में आने से इंकार कर देती है. लेकिन राखी दवे और बरखा की बात अनुपमा सुन लेती है और उसे करारा जवाब देती हुई नजर आती है.

किंजल देगी अनुपमा को मां का दर्जा

 

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अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि शाह और कपाड़िया परिवार गोदभराई में गेम खेलेंगे, जिसमें किंजल अपनी मां राखी की बजाय अनुपमा को अपने बच्चे की गॉडमदर का दर्जा देने की बात कहेगी. हालांकि अनुपमा कहेगी कि बच्चे को नाना और नानी दोनों का प्यार मिलना चाहिए. लेकिन किंजल कहेगी कि बिजनेस वूमन होने के कारण राखी ने किंजल के साथ समय नहीं दे पाई. लेकिन अनुपमा से मिलने के बाद उसने मां का प्यार जाना. किंजल की बात सुनकर जहां राखी इमोशनल हो जाती है. वहीं इस बात पर बरखा उसे ताना देगी, जिसे सुनकर राखी उससे कहेगी कि वह एक ही कश्ती में हैं तो उन्हें हाथ मिला लेना चाहिए. राखी दवे और बरखा को साथ देखकर अनुपमा घबरा जाती है.

अधिक को पीटेगा वनराज

 

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इसके अलावा आप देखेंगे कि अनुपमा पूरी परिवार के साथ मिलकर डांस करती दिखेगी. वहीं इस दौरान वनराज की एंट्री होगी, जो बरखा के भाई अधिक को घसीटता हुआ और थप्पड़ मारते हुए परिवार के सामने लाएगा. वहीं वनराज की हरकत देख अनुज को गुस्सा आ जाएगा. दरअसल, वनराज, अधिक और पाखी को साथ में देख लेगा, जिसके चलते वह घर में बवाल करेगा.

REVIEW: आर माधवन का नया आयाम है ‘रॉकेट्रीः द नाम्बी इफेक्ट’

रेटिंगः साढ़े तीन स्टार

निर्माताः सरिता माधवन, आर माधवन, वर्गीस मूलन और विजय मूलन

लेखक व निर्देशकः आर माधवन

कलाकारःआर माधवन,  सिमरन,  रजित कपूर, राजीव रवींद्रनाथन,  कार्तिक कुमार,  शाहरुख खान,  गुलशन ग्रोवर व अन्य

अवधिः दो घटे 37 मिनट

एनसीसी कैडेट के रूप में अच्छी प्रतिभा दिखाने के चलते चार वर्ष तक ब्रिटिश आर्मी से ट्रेनिंग लेकर फौजी बनकर लौटे आर माधवन को चार माह उम्र ज्यादा हो जाने के कारण भारतीय सेना का हिस्सा बनने से वंचित रह जाने के बाद आर माधन ने इंजीनियरिंरग की पढऋाई की. फिर वह स्पीकिंग स्किल व पर्सनालिटी डेवलवपेंट के प्रोफेसर बने. फिर टीवी सीरियलों में उन्हे अभिनय करने का अवसर मिला. टीवी पर 1800  एपीसोडों में अभिनय करने के बाद आर माधवन को मणि रत्नम ने तमिल फिल्म में रोमांटिक हीरो बना दिया और वह तमिल फिल्मों के सुपर स्टार बन गए. फिर कई तरह के किरदार निभाए. आनंद एल राय के निर्देशन में ‘तनु वेड्स मनु’ में अभिनय कर सिनेमा को एक नई दिशा देने का भी काम किया. फिर ‘साला खडूस’ का निर्माण किया और अब बतौर लेखक, निर्देशक व अभिनेता आर माधवन फिल्म ‘‘रॉकेट्रीः द नाम्बी इफेक्ट’’ लेकर आए हैं. आर माधवन हमेशा उन फिल्मों को हिस्सा बनने का प्रयास करते आए हैं, जो कि आम जीवन का प्रतिबिंब बने. आर माधवन की नई फिल्म ‘‘रॉकेट्रीः द नांबी इफेक्ट’ बहुत ही अलग तरह की फिल्म है. बौलीवुड के फिल्मकार इस तरह की फिल्में बनाने से दूर रहना पसंद करते हैं. यह एक विज्ञान व इसरो वैज्ञानिक फिल्म होते हुए भी भावनाओ से ओतप्रोत है.  इसकी कहानी भावपूर्ण है. दर्शक फिल्म के माध्यम से त्रिवेंद्रम निवासी इसरो वैज्ञानिक नंबी नारायण के जीवन व कृतित्व से रूबरू होते हुए उनके साथ हुए अन्याय को भी महसूस करते हैं. फिल्म ‘रॉकेट्रीः द नांबी इफेक्ट’ न जुनूनी लोगों की दास्तां है, जो अपने घर व परिवार को हाशिए पर ढकेल कर काम में ही अपनी जिंदगी लगा देते हैं. मगर उनके अपने ही उनकी पीठ पर छूरा घोंप देते हैं.

इस फिल्म की गुणवत्ता का अहसास इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस फिल्म को देखते हुए स्वयं महान वैज्ञानिक नंबी नारायण रो रहे थे.

कहानीः

फिल्म की कहानी इसरो के मशहूर वैज्ञानिक रहे नंबी नारायण की कहानी है. लिक्विड इंजन व क्रायजनिक इंजन बनाने में उनकी अहम भूमिका रही है. वह विक्रम साराभाई के शिष्य रहे. बाद मंे अब्दुल कलाम आजाद व सतीश धवन के साथ भी काम किया. नारायणन ने नासा फैलोशिप अर्जित कर 1969 में प्रिंसटन विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया. वहां पर अपनी प्रतिभा के बल पर महज दस माह के रिकॉर्ड समय में प्रोफेसर लुइगी क्रोको के तहत रासायनिक रॉकेट प्रणोदन में अपनी थीसिस पूरी की. उसके बाद उन्हे नासा में नौकरी करने का आफर भी मिला था. मगर वह क्रायजिनक इंजन पर भारत में ही काम करने के मकसद से नासा का आफर ठुकरा कर भारत आ गए. यहां  इसरो की नौकरी करते हुए नम्बी नारायण ने विज्ञान जगत में कई अनोखे प्रयोग किए. उन्हेाने ‘विकास’ रॉकेट का इजाद किया. यह विकास इंजन ही इसरो से भेजे जाने वाले सभी उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जा रहा है. 1992 में भारत ने क्रायोजेनिक ईंधन-आधारित इंजन विकसित करने के मकसद से चार इंजनों की खरीद का सौदा रूस के साथ किया था. मगर अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्लू बुश के दबाव में रूस ऐसा नही कर पा रहा था. तब नंबी नारायण के प्रयासों से  भारत ने दो मॉकअप के साथ चार क्रायोजेनिक इंजन बनाने के लिए रूस के साथ एक नए समझौते पर हस्ताक्षर किए. और अमरीकी सैनिकों की नजरों से बचाकर इन्हे भारत लाने में सफल हुए थे. मगर तभी 1994 में नंबी नारायण पर पाकिस्तान को रॉकेट साइंस तकनीक बेचने का आरोप लगा. उन्हे काफी यातनाएं दी गयीं. अंततः साल की अदालती लड़ाई के बाद उन्हे सारे आरोपों से बरी कर दिया गया. 2019 में नरेंद्र मोदी सरकार ने नंबी नारायण को पद्मभू षण से सम्मानित किया. 24 वर्षों बाद उनकी गरिमा वापस लौटी, लेकिन अगर उन्हें इसरो में यह समय काम करने को मिला होता, तो शायद भारत रॉकेट साइंस में किसी अन्य मुकाम पर होता.

मगर हमारे भारत देश में अक्सर जीनियस या यूं कहें कि अति बुद्धिमान लोगों के साथ राजनीति के तहत या अन्य वजहों से ऐसी बदसलूकी हो जाती है और ऐसे लोगों के बारे में कहीं कोई सुध नही लेता है और उन्हे लंबे वक्त तक निर्दोष होते हुए भी तमाम पीड़ाओं से गुजरना पड़ता है. फिल्म के अंत में शाहरुख खान राष्ट् की तरफ से नंबी से माफी मांगते है, मगर माफी देने से इंकार करते हुए नंबी कहतेहैं-‘अगर मैं निर्दोष था, तो कोई तो दोषी था. आखिर वह दोषी कौन था. ’’

लेखन व निर्देशनः

आर माधवन एक बेहतरीन अभिनेता होने के साथ ही अच्छे लेखक भी हैं. वह पहले भी कुछ फिल्में लिख चुके हैं. कुछ फिल्मों के संवाद लिख चुके हैं. मगर निर्देशन में उनका यह पहला कदम है. उनकी माने तो पहले कोई दूसरा निर्देशक था, मगर ऐन वक्त पर उसके छोड़ देने पर आर माधवन को खुद ही निर्देशन की बागडोर भी संभालनी पड़ी. परिणामतः कुछ निर्देशकीय कमियां भी नजर आती हैं. आर माधवन ने इस कहानी को बयां करने के लिए एक अलग तरीका अपनाया है. बौलीवुड अभिनेता शाहरुख खान नंबी नारायण का इंटरव्यू लेते हैं और तब नंबी के मंुह से शाहरुख खान उनकी कहानी सुनते हैं. पर मूल कहानी शुरू होने से पहले नंबी नारायण की गिरफ्तारी व उनके परिवार के साथ पहले दिन जो कुछ हुआ था, उसके दृश्य आते हैं, इसकी जरुरत नही थी. इसके अलावा फिल्म में कई दृश्य अंग्रेजी भाषा में हैं. आर माधवन ने ऐसा फिल्म को पूरी तरह से वास्तविक बनाए रखने के लिए किया है. मगर वह उन दृश्यों में ‘हिंदी’ में ‘सब टाइटल्स’दे सकते थे. इससे दर्शक के लिए फिल्म से जुड़ना आसान हो जाता. इसके बावजूद इस विज्ञान फिल्म को जिस तरह से आर माधवन ने परदे पर उतारा है, वह एक भावनात्मक फिल्म के रूप मंे दर्शको के दिलो तक पहुंचती है. इंटरवल से पहले के हिस्से में वैज्ञानिक शब्दों का उपयोग जरुर दर्शकों को थोड़ा परेशान करता है. मगर इंटरवल के बाद कहानी काफी इमोशनल है और दर्शक नंबी के उस इमोशन को मकसूस करता है. फिल्म को वास्तविक बनाए रखने के लिए पूरी फिल्म वास्तविक लोकेशनों पर ही फिल्मायी गयी है. फिल्म का वीएफएक्स भी कमाल का है. 1969 से लेकर अब के माहौल को जीवंत करना एक निर्देशक के तौर पर उनकी सबसे बड़ी चुनौती रही है, जिसे  सफलता पूर्वक अंजाम देने में वह सफल रहे हैं. फिल्म में कई ऐसे दृश्य है जो कि बिना संवादों के भी काफी कुछ कह जाते हें. मसलन एक दृश्य है. अदालत से जमानत पर रिहा होने के बाद जब  नंबी अपनी पत्नी मीरा संग उसे अस्पातल में दिखाकर वापस लौट रहे होते हैं, तब भीषण बारिश हो रही है और पानी में भीग रहे तिरंगे के नीचे यह दंपति बेबस खड़ा है. क्योंकि कोई भी रिक्शावाला या गाड़ी वाला उन्हे बैठाने को तैयार नही है.

पता नही क्यों वास्तविकता गढ़ते हुए भी आर माधवन ने हाल ही में गिरफ्तार किए गए पूर्व आई बी अधिकारी आर बी श्रीकुमार का नाम नहीं लिया, जो कि 1994 में केरला में ही तैनात थे.

अभिनयः

नंबी नारायण के किरदार में आर माधवन ने शानदार अभिनय किया है.  आर माधवन ने अपने अभिनय के बल पर 29 वर्ष से लेकर 70 वर्ष तक की उम्र के नंबी नारायण को परदे पर जीवंतता प्रदान की है. इसके लिए आर माधवन ने प्रोस्थेटिक मेकअप का उपयोग नहीं किया है. उन्होने नंबी नारायण की ही तरह अपने दंातों को दिखाने के निए अपना जबड़ा तक टुड़वाया. बाल भी रंगे और बालो को असली नजर आने के ेलिए 18 घ्ंाटे कुर्सी पर बैठकर रंगवाते थे. पूरी फिल्म को अपने कंधो पर उठाकर आर माधवन ने अपनी अभिनय प्रतिभा के नए आयाम पेश किए हैं. नंबी नारायण की पत्नी मीरा के किरदार में तमिल अदाकारा सिमरन ने भी बेहतरीन अभिनय किया है. उन्होने पति का घर में समय न दे पाने से लेकर देशभक्त पति के उपर झूठा इल्जाम लगने की पीड़ा को बाखूबी परदे पर दिखाया है.

नंबी नारायण से इंटरव्यू लेने वाले अभिनेता शाहरुख खान अपनी पहचान के साथ ही है. उन्होंने इंटरव्यू लेने वाले के किरदार को बहुत बेहतरीन तरीके से न सिर्फ निभाया है बल्कि अपने अभिनय से नंबी की पीड़ा का अहसास करते हुए भी नजर आते हैं. लंबे समय बाद शाहरुख खान ने छोटे किरदार में ही सही मगर बेहतरीन परफार्म किया है.

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