सुबह की किरण- भाग 3: क्या पूरी हुई प्रीति और समीर की कहानी

यह प्रश्न उस के जेहन में कौंध रहा था और वह बहुत देर तक समीर के साथ बिताए गए उन पलों को याद कर रही थी जो 5 वर्ष बाद भी अभी तक वैसे ही तरोताजा थे जैसे यह बस कुछ पलों पहले की बात हो.

यही पता लगाने के लिए एक दिन वह उस के औफिस पहुंची तो पता लगा कि साहब अभी मीटिंग में व्यस्त हैं. दूसरे दिन समीर से मिलने के लिए उस के चैंबर में जाना चाहा तो, दरवाजे पर खड़े चपरासी ने उसे रोक दिया और उस से स्लिप मांगी. उस ने सोचा, पता नहीं वही समीर है या कोई और, इसलिए उस ने चैंबर में उस से मिलने का विचार त्याग दिया. वह सोचने लगी वैसे तो जिलाधिकारी आम आदमी के हितों के लिए जिला में पदस्थापित होता है और उस से मिलने के लिए कोई भी व्यक्ति स्वतंत्र है लेकिन अफसरशाही ने आम आदमी से जिलाधिकारी को कितना दूर कर दिया है.

वैसे जिलाधिकारी से उस के द्वारा समयसमय पर लगाए जाने वाले जनता दरबार में भी आसानी से भेंट हो सकती थी किंतु उस के बारे में जानने की तीव्र जिज्ञासा इतनी थी कि वह बहुत समय तक इस के लिए इंतजार नहीं कर सकती थी. सो, जिलाधिकारी द्वारा राजस्व से संबंधित मुकदमों की सुनवाई के लिए किए जाने वाले कोर्ट के दौरान उस ने उसे देखने का मन बनाया.

उसे किसी ने बताया था कि उस दिन जिलाधिकारी न्यायालय में मुकदमे की सुनवाई करेंगे. जब वह उस के न्यायालय में पहुंची तो समीर मुकदमे की कोई फाइल देख रहा था. वह न्यायालय में खड़ी थी किंतु समीर ने उसे नहीं देखा और वह झट न्यायालय के कमरे से बाहर आ गई. फिर अपने घर पहुंची. अब उस ने सोचा कि वह उस के आवास में जा कर मिलेगी. जब वह उस के आवास पहुंची तो फिर चपरासी ने स्लिप मांगी. उसे लगा, वह तो लड़की है, लोग जाने उस के बारे में क्याक्या सोचने लगें, इसलिए उस से बिना मिले ही वापस घर लौट आई.

समीर को जिला में पदस्थापित हुए 4 महीने से अधिक हो गए थे, किंतु उन दोनों की मुलाकात नहीं हुई थी. अब तक मनोविज्ञान पर प्रीति की लिखी पुस्तक ‘आने वाली पीढि़यां और मनोविज्ञान’ को छापने के लिए दिल्ली का पाठ्यपुस्तकों से संबंधित एक प्रकाशक तैयार हो गया था. पुस्तक की पांडुलिपि उस ने प्रकाशक को सौंप दी थी जो अब मुद्रण के लिए भेजी जा चुकी थी.

अगले महीने उस की प्रतियां तैयार हो कर आ जाने वाली थीं और पुस्तक का विमोचन उस के कालेज के हौल में होना तय हुआ था. प्रिंसिपल के आग्रह पर जिलाधिकारी समीर ने भी विमोचन समारोह में आना स्वीकार कर लिया था और उसी के हाथों उस की पुस्तक का विमोचन होना था.

काम की बहुत ज्यादा व्यस्तता के कारण समीर का ध्यान इस ओर नहीं गया था कि इस की लेखिका वही प्रीति है जो कभी दिल्ली में उस के साथ मनोविज्ञान में एमए कर रही थी. पिं्रसिपल साहब खुद इन्विटेशन ले कर गए थे और प्रीति ने उन से कभी समीर की चर्चा नहीं की थी.

प्रीति यह सोच कर काफी उत्सुक और रोमांचित थी कि उस की पुस्तक का विमोचन समीर के हाथों होगा और उसी के द्वारा वह सम्मानित की जाएगी. वह सोच रही थी कि वह क्षण कैसा होगा जब वह पहली बार इतने दिनों के बाद समीर के सामने जाएगी. आज वह दिन आ ही गया था.

रात में उसे नींद ठीक से नहीं आई थी. बारबार उसे समीर की बातें, उस के साथ घंटों मनोविज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर हुई चर्चाएं याद आ रही थीं. उस समय समीर उस से बारबार कहता था कि वह आईएएस बन कर समाज की सेवा करना चाहता है और अब उस की मनोकामना पूरी हो गईर् थी. उस ने जो सोचा था उसे वह मिल गया था.

क्या समीर की शादी हो गई है या अभी भी वह कुंआरा है, यह प्रश्न भी उस के मन में बारबार कौंध रहा था. वह सोच रही थी कि यदि समीर की शादी हो गई है तो उस की पत्नी कैसी होगी. यदि समीर ने उसे देख कर पुरानी बातों को कुरेदना शुरू किया तो उस की पत्नी की प्रतिक्रिया क्या होगी? कहीं वह उस के संबंधों को ले कर आशंकित तो न हो जाएगी.

उस के मन में पहली बार इतना उत्साह था. दिल में हलचल थी. वहीं, अंदर से समीर से मिलने का एक मधुर एहसास भी था. उस ने अपनी सब से अच्छी साड़ी निकाली और पहली बार अपना इतनी देर तक शृंगार किया. आज सच में वह काफी सुंदर लग रही थी.

पुस्तक विमोचन समारोह के लिए कालेज के हौल को काफी सजाया गया था. शहर के कई गणमान्य व्यक्तियों को भी बुलाया गया था. दूसरे कालेजों के शिक्षक और कई विद्वानों को भी आमंत्रित किया गया था. सब के खानेपीने का इंतजाम पुस्तक के प्रकाशक की ओर से था.

वह कालेज रिकशा से जाती थी, किंतु आज प्रिंसिपल ने उसे लाने के लिए अपनी गाड़ी ड्राइवर के साथ भेजी थी और कालेज के एक जूनियर लैक्चरर को भी साथ लगा दिया था.

जब वह कालेज के हौल में पहुंची तो अधिकतर मेहमान आ चुके थे. लाउडस्पीकर पर कोई पुराना संगीत काफी कम आवाज में बज रहा था. पुस्तक विमोचन की सारी आवश्यक तैयारियां कर ली गई थीं. अब जिलाधिकारी के आने की प्रतीक्षा थी.

तभी जिलाधिकारी समीर के आने का माइक पर अनाउंसमैंट हुआ. समीर के स्टेज पर पहुंचते ही सभी उपस्थित मेहमान उस के सम्मान में खड़े हो गए.  प्रिंसिपल ने समीर का स्टेज पर स्वागत किय??ा और उन्हें अपनी बगल में विशेष अतिथि के रूप में बैठाया. ठीक उस के बगल में प्रीति भी बैठी हुई थी. प्रीति ने समीर को देख कर हाथ जोड़े तो वह अप्रत्याशित रूप से उस को स्टेज पर देख कर विस्मित होते हुए बोला, ‘‘अरे तुम, प्रीति?…यहां?’’

‘‘क्या आप एकदूसरे को पहचानते हैं?’’ प्रिंसिपल ने पूछा.

‘‘हम दोनों ने एक ही साथ दिल्ली में एक ही कालेज से साइकोलौजी में एमए किया है.’’

‘‘लेकिन प्रीति ने यह कभी नहीं बताया,’’ प्रिंसिपल ने अब प्रीति की ओर मुखातिब होते हुए कहा, ‘‘क्यों प्रीति, इतना बड़ा राज तुम छिपाए हुए हो. मुझे तो कम से कम बताया होता.’’

प्रीति प्रिंसिपल को क्या बताती कि उस ने कई बार समीर से मिलने की कोशिश की थी लेकिन कुछ संकोच, कुछ झिझक और परिस्थितियों ने उसे उस से नहीं मिलने दिया और चाह कर भी वह समीर से अपने संबंधों को अपने सहकर्मियों के साथ साझा न कर पाई.

‘‘समीर तुम से मिलने की मैं ने बहुत बार कोशिश की, लेकिन मिल नहीं पाई,’’ वह सकुचाते हुए धीरे से बोली.

‘‘अब यह बहानेबाजी न चलेगी प्रीति. फंक्शन के बाद मैं तुम्हारे घर पर आऊंगा. मां कैसी हैं?’’

सुनते ही प्रीति की आंखें नम होने लगीं और वह इस का कोई जवाब नहीं दे पाई तो प्रिंसिपल ने मामले की नाजुकता को समझते हुए, बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा, ‘‘इत्मीनान से इस संबंध में बातें होंगी. अभी हम लोग पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम शुरू करते हैं.’’

पुस्तक का विमोचन करते हुए समीर ने प्रीति की सादगी, नम्रता और उस के कोमल भावों की विस्तृत चर्चा करते हुए अपने कालेज के दिनों की यादों को सब के साथ साझा करते हुए कहा कि प्रीति कालेज में एक ऐसी लड़की थी जिस से हमारे प्रोफैसर भी बहुत प्रभावित थे. प्रीति को साइकोलौजी पर जितनी पकड़ है उतनी बहुत कम लोगों को होती है. हमें गर्व है कि इस शहर में हमारे बीच प्रीति जैसी एक विदुषी हैं.’’

समीर की बातों से पूरा हौल तालियों से गड़गड़ाने लगा तब प्रीति ने महसूस किया कि समीर, जिस के बारे में उस ने सोचा था कि वह उसे भूल गया है, बिलकुल उस की थोथी समझ थी. उस के दिल में उस के प्रति अभी भी उतना ही लगाव और प्रेम है जितना कालेज के दिनों में हुआ करता था.

फंक्शन के बाद समीर ने उस से उस का फोन नंबर लिया और उस के घर की लोकेशन नोट करते हुए कहा कि इस रविवार को वह उस के साथ ही लंच करेगा. अपना विजिटिंग कार्ड उसे थमाते हुए उस ने रविवार को इंतजार करने के लिए कहा.

फंक्शन के बाद उस के सभी सहकर्मी उस को आंखें फाड़ कर देख रहे थे. समीर ने सभी लोगों के बीच जिस प्रकार प्रीति की प्रशंसा की थी और सम्मान दिया था उस का किसी को भी अनुमान नहीं था. प्रीति ने घर आ कर पूरे घर को साफ किया, ड्राइंगरूम में सोफे को करीने से लगाया और घर के बाहर पड़े हुए गमलों को ठीक से लगाया और उन में पानी दिया.

मां के गुजर जाने के बाद प्रीति अंदर से काफी टूट गई थी. घर में कोई नहीं था और उस का जीवन अकेलेपन के दौर से गुजर रहा था, इसलिए पूरा घर ही अस्तव्यस्त पड़ा हुआ था. किंतु समीर ने जब से कहा था कि रविवार को उस के घर आ कर उस के साथ लंच करेगा उस के शरीर में एक नया ही उत्साह पैदा हो गया था, मनमयूर नाचने लगा था और जीवन के प्रति एक नया नजरिया पैदा हो गया था.

खुशियों के पल- भाग 5: कौन थी नीरजा

अजनबी होते हुए भी कभीकभी किसी के साथ ऐसी आत्मीयता बढ़ जाती है मानो बरसों से जानते हैं. विशाल और नीरजा कुछ इसी तरह मिले और साथ बढ़ता गया.

वे अब 5-7 दिनों पर लाइब्रेरी जाते. उन का लाइब्रेरी जाने का समय साढ़े 4 बजे होता. किताब जमा करते व नई किताब लेते 5 बज जाते.

5 बजे नीरजा अपना सामान समेट लेती. फिर वे अकसर ही बाहर कौफी पीने चले जाते. अब नीरजा उन से खूब खुल कर बात करती थी. वे भी उसे चिढ़ा देते थे. जब वे चिढ़ाते तो वह झूठे गुस्से में मुंह फुला लेती. फिर वे उसे मनाते. उस की सुंदरता के पुल बांधते. वह खिलखिला कर हंस देती. वह उन्हें अपना स्मार्ट बौयफ्रैंड कहती. वे अकसर कहते, उन की उम्र उस के बौयफ्रैंड बनने की नहीं है, तब वह नाराज हो जाती. वह कहती, यह बात दोबारा नहीं कहना. उम्र से क्या होता है. उस के स्मार्ट बौयफ्रैंड जैसा स्मार्ट कोई और हो तो बताएं.

उस ने कई बार साफ कहा था कि वे उसे बहुत अच्छे लगते हैं. वह अकसर ही उन के कंधे पर अपना सिर टिका कर आंखें मूंद लेती थी. वे मना करते, कहते, ‘लोग देख रहे हैं.’ तो वह कहती, ‘देखने दो. मुझे अच्छा लगता है.’

वे एक हाथ से ड्राइविंग करते व दूसरे हाथ से उस के बालों को हलकेहलके सहलाते रहते. उन्होंने एकाध बार उसे कोई गिफ्ट दिलाने की कोशिश की थी, पर उस ने सख्ती से मना कर दिया था. वह कहती थी, ‘‘कौफी, पैस्ट्री पकौड़ा तक ठीक है पर गिफ्ट वगैरह नो, बिग नो.’’

उन को भी शिद्दत से लगता था कि वे नीरजा के प्यार में आकंठ डूब चुके थे. जब भी उस से मिल कर आते, बेचैन हो जाते. 5-7 दिनों का इंतजार उन के लिए मुश्किल हो जाता था. पर रोज तो वे जा नहीं सकते थे. पर

यह कैसा प्यार था. अगर यह लगाव था तो यह कैसा लगाव था, भई. उन की उम्र 24 साल की लड़की से प्यार करने की नहीं थी. पत्नी थी, बेटे थे, बहुएं थीं, पोती भी थी.

प्यार तो कोई बंधन नहीं मानता. उम्र का भी नहीं शायद. पर समाज तो था. सामाजिक स्थिति तो थी. उन का एक कदम उन की सामाजिक स्थिति को खत्म कर सकता था. वे परिपक्व थे, जानते थे.

देखतेदेखते 3 महीने और गुजर गए. लाइब्रेरी का इंटरव्यू हो गया. अभिमन्यू ने इंटरव्यू संभाल लिया था. पर अपौइंटमैंट फंस गया. किसी ने कोर्ट केस कर दिया था. नीरजा के साथसाथ वे भी बहुत दुखी हुए. पर क्या किया जा सकता था. इंतजार करना था.

उस दिन वे कई दिनों बाद लाइब्रेरी गए थे. शायद 15 दिनों बाद. नीरजा इश्यू व डिपौजिट काउंटर पर बैठी थी. पर शायद उस की तबीयत ठीक नहीं थी, चेहरा कुम्हलाया हुआ था. अपना काम खत्म करतेकरते भी उसे 6 बज गए थे. वे कुरसी पर बैठे किताब पढ़ते रहे. 6 बजे वह अपना बैग ले करआ गई. उन्होंने सवालिया निगाहों से उसे देखा.

‘‘काम अधिक था,’’ उस ने धीरेधीरे कहा, ‘‘तबीयत भी ठीक नहीं लग रही थी. इसीलिए देरी हो गई, चलिए.’’

दोनों बाहर आ गए.‘‘चलो, तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है, मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूं.’’

‘‘नहीं, मुझे कौफी पीनी है.’’

‘‘श्योर, आर यू औलराइट?’’

‘‘बिलकुल. गाड़ी बढ़ाओ मिस्टर विशाल, लोग देख रहे हैं.’’

रास्तेभर वह अपना सिर उन के कंधों पर टिकाए आंखें मूंदे चुपचाप बैठी रही. हां, हूं के अलावा कोई बात नहीं की. अंबर कैफे आ गया. वेटर आ गया. तब उस ने सिर उठाया व आंखें खोलीं.

‘‘क्या लोगी, कोल्ड या हौट कौफी?’’

‘‘हौट कौफी, तुम्हारे जैसी हौट.’’

उन्होंने हौट कौफी व प्याज के पकौड़ों का और्डर दिया.‘‘अगली बार हम यहां नहीं आएंगे,’’ नीरजा ने कहा.

‘‘हां, अगली बार हम एल चाइको में चलेंगे. आराम से बैठ कर चाइनीज खाएंगे.’’

‘‘तुम अपनी बीवी से डरते हो न?’’ अचानक उस ने कहा.

‘‘वैसे तो कौन नहीं डरता. पर, मेरी बीवी ऐसी नहीं है.’’

‘‘वो तो मैं जानती हूं. वह तुम्हें खूब खुश रखती होगी. अच्छा एक बात बताओ, अगर तुम 20 साल बाद पैदा हुए होते तो?’’

‘‘तो मेरी उम्र 90 साल होती अगर मैं जिंदा होता तो.’’

‘‘नहींनहीं, अगर मैं 20 साल पहले पैदा हुई होती तो?’’

‘‘तो तुम्हारी उम्र 54 साल की होती.’’

‘‘अरे नहीं यार, उम्र का सही कौम्बिनेशन मिलाओ न.’’

‘‘मतलब, अगर हम दोनों एकाध साल के अंतर से पैदा हुए होते तो क्या होेता, यही न?’’

‘‘हां, हां. मेरा यही मतलब था. तो क्या होता?’’

‘‘होता क्या, तब हमारी मुलाकात लाइब्रेरी में नहीं होती. शायद हौस्पिटल में हो जाती.’’

वह खिलखिला कर हंस पड़ी, पर हंस न पाई. उस ने अपना पेट कस कर पकड़ लिया जैसे दर्द हो रहा हो.

‘‘तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है, तुम्हें क्या हुआ है नीरजा?’’

‘‘कुछ नहीं. थोड़ा फीवर है. कमजोरी लग रही है?’’

‘‘चलो, आज मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूं,’’ उन्होंने इशारे से वेटर को बुलाया. आज नीरजा कौफी भी आधा कप ही पी पाई थी. पकौड़े तो छुए भी न थे. लड़का बरतन ले गया.

‘‘नहीं, मैं आप को घर नहीं ले जा सकती,’’ उस ने सख्ती से कहा, ‘‘आगे ले लीजिए, अगले चौराहे से मैं औटो ले लूंगी.’’

उन्होंने बहस नहीं की व गाड़ी आगे बढ़ा ली. आगे एक पार्क का पिछला हिस्सा था जो ऊंची बाउंड्री से घिरा हुआ था. वहां कुछ अंधेरा था.

‘‘उस पेड़ के पास गाड़ी रोकिए न, प्लीज.’’

उन्होंने पार्क के पीछे स्थित पेड़ के पास गाड़ी रोक दी. वह एकटक उन के चेहरे की तरफ देख रही थी.

‘‘क्या हुआ,’’ उन्होंने धीरे से पूछा.

वह कुछ न बोली. सिर्फ उन के चेहरे पर देखती रही.

‘‘आर यू औलराइट, तुम ठीक तो हो न.’’

‘‘यू वांट टू किस मी,’’ उस ने अचानक कहा.

‘‘व्हाट?’’ उन का चेहरा भक से उड़ गया, ‘‘व्हाट रबिश यू आर टौकिंग?’’

‘‘आई नो. यू वांट टू. क्या मुझे किस करना चाहते हो?’’

‘‘नो, नैवर, हाऊ कैन यू…’’

‘‘बट, आईर् वांट टू,’’ उस ने घूम कर अपनी दोनों बांहें उन के गले में डाल दीं व अपने होंठ उन के होंठों पर रख दिए.

‘‘किस मी, किस मी, प्लीज, होल्ड मी.’’

उस ने उन्हें जोर से पकड़ रखा था. उन के हाथ अपनेआप उस की पीठ पर पहुंच गए. नीरजा ने उन का एक लंबा सा किस लिया. गाड़ी के अंदर अंधेरा था पर इंजन स्टार्ट था.

गाड़ी के बैक पर ठकठक खटखटाने की आवाज आई.

‘‘कौन है अंदर, बाहर निकलो.’’

नीरजा छिटक कर उन से अलग हो गई. उन्होंने घूम कर पीछे देखा. एक पुलिसवाला अपने डंडे से बैक पोर्शन खटखटा रहा था, ‘‘बाहर निकलो.’’

उन्होंने तुरंत गाड़ी बढ़ा दी व स्पीड ले ली. पुलिसवाला पीछे चिल्लाता ही रह गया. चौराहा पार हो गया.

‘‘यह तुम ने क्या किया?’’ आगे आ कर उन्होंने कहा, ‘‘अभी तो हम शायद बच गए. पर कितनी बड़ी मुसीबत हो जाती हम दोनों के लिए.’’

‘‘आप मैनेज कर लेते. आप पावरफुल हैं. पर आप को अच्छा नहीं लगा क्या. मुझे तो बड़ा अच्छा लगा.’’

‘‘मुझे भी अच्छा लगा, नीरजा,’’ वे यह कहने से अपने को न रोक सके, ‘‘यू आर रियली ब्यूटीफुल.’’

खुशियों के पल- भाग 7: कौन थी नीरजा

बाहर निकल कर किस तरह से वे अपनी कार तक पहुंचे, उन्हें नहीं मालूम. कार में बैठते ही स्टियरिंग पर सिर टिका कर वे बेआवाज फफक पड़े. उन की नीरजा खो गई थी. इन बीते दिनों की उन की गैरहाजिरी ने उन से उन की नीरजा छीन ली थी. पर वे ऐसे हार नहीं मानेंगे. शहर के बड़े से बड़े डाक्टर को ला कर खड़ा कर देंगे. वे नीरजा को ऐसे नहीं मरने देंगे. डाक्टर मित्रा शहर के सब से बड़े कैंसर स्पैशलिस्ट हैं. उन को ले कर आएंगे. कोई तो रास्ता होगा, कोई तो रास्ता निकलेगा.

उन्होंने झटके से सिर उठाया व आंसुओं को पोंछ डाला. दूसरे दिन वे पहले बैंक गए, 50 हजार रुपए निकाले. फिर वे डाक्टर मित्रा के पास खुद गए. उन्होंने दिन में एक बजे विजिट का वादा किया. उस के बाद वे 144, मीरा?पट्टी रोड चले गए.

घर पर ताला लटक रहा था. वे सन्न रह गए. अगलबगल से पता करने पर पता चला कि सब नीरजा को ले कर ज्यूड हौस्पिटल गए हुए हैं. वे बदहवास गाड़ी चला कर ज्यूड हौस्पिटल पहुंचे. काउंटर पर पता चला नीरजा आईसीयू में है. आईसीयू के बाहर ही नीरजा की मां बैठी धीरेधीरे रो रही थीं. उन की बगल में ही एक 13-14 वर्ष का नीरजा की शक्ल जैसा लड़का बैठा था. वह नीरजा का भाई होगा. वे जा कर नीरजा की मां की बगल में खड़े हो गए. उन्हें देखते ही नीरजा की मां जोर से रो पड़ीं.

‘‘आप के जाने के बाद जब नीरजा जागी तो मैं ने उसे बताया कि विशाल आए थे. आप का नाम सुनते ही जैसे वह खिल गई, मुसकराई भी थी. मुझे लगा कि वह कुछ ठीक हो रही है. पर उस के बाद उस की तबीयत बिगड़ गई. थोड़ीथोड़ी देर में 2 उलटियां हुईं. उलटी में खून था साहब. बगल के डाक्टर प्रकाश को मेरा बेटा बुला लाया. नीरजा बेहोश हो गई थी. उन्होंने उसे तुरंत अस्पताल ले जाने को कहा. उन्होंने ही एंबुलैंस भी बुला दिया. यहां डाक्टरों ने जवाब दे दिया है.’’

तभी अंदर से नर्स आई, ‘‘यहां मिस्टर विशाल कौन हैं?’’

‘‘जी, मैं हूं,’’ उन्होंने कहा.

‘‘पेशेंट को होश आ गया है. बट शी इज वैरी क्रिटिकल ऐंड वीक. कई बार आप का नाम ले चुकी है. आइए, पर ज्यादा बात नहीं कीजिएगा. शी विल नौट होल्ड. आइए, इधर से आ जाइए.’’

वे आईसीयू के अंदर आ गए. नर्स उन्हें नीरजा के बैड तक ले गई. नीरजा गले तक सफेद चादर ओढ़े लेटी थी. उस की हिरनी जैसी बड़ीबड़ी आंखें पूरी खुली थीं. उन्हें देखते ही उस के होंठों पर मुसकराइट व आंखों में चमक आ गई. नर्स ने अपने होेंठों पर उंगली रख कर उन्हें इशारा किया.

‘‘हैलो स्मार्टी,’’ उस ने चादर से अपना हाथ निकाल कर उन का हाथ पकड़ लिया. उस की आवाज साफ थी, ‘‘बड़ी देर कर दी आतेआते?’’

वे खड़े, उसे चुपचाप देखते रहे.

‘‘मुझ से बेहद नाराज हैं न मेरे दोस्त. इसीलिए न कि मैं ने पहले क्यों नहीं बताया. पर अगर मैं पहले बता देती तो मुझे मेरा स्मार्टी बौयफ्रैंड शायद नहीं मिलता. सही है न.’’

इतना बोलने में ही उस के माथे पर पसीने की एकदो बूंदें आ गईं. उन्होंने पास पड़ा स्टूल खींच लिया व उस के पास ही बैठ गए, जिस से उसे बोलने में जोर न लगाना पड़े.

‘‘नहीं,’’ मैं तुम से नाराज नहीं हूं,’’ उन्होंने धीरे से कहा, ‘‘पर मैं तुम से बहुतबहुत नाराज हूं. अगर तुम समय से मुझे बता देतीं तो मैं हिंदुस्तान के बडे़ से बड़े डाक्टर से तुम्हारा इलाज करा कर तुम्हें बचा लेता.’’

‘‘नहीं विशाल, मैं जानती थी इस का कोई इलाज नहीं था. आप नाराज मत होइए, मैं जानती हूं मैं आप को

मना लूंगी माई डियर फ्रैंड. पर मुझे आप से माफी मांगनी है, मुझे माफ कर दीजिए प्लीज.’’

‘‘पर किसलिए? तुम किसलिए माफी मांग रही हो नीरजा?’’

‘‘मैं जीना चाहती थी. इसलिए मेरे पास जितना भी वक्त था मैं उसे जीना चाहती थी. खुशीखुशी जीना चाहतीथी. इसीलिए मैं ने आप का कुछ चुरा लिया था.’’

‘‘चुरा लिया था, पर तुम ने मेरा क्या चुरा लिया था?’’

‘‘मैं ने आप के शांत जीवन से अपने लिए कुछ खुशियों के पल चुरा लिए थे, मिस्टर विशाल. आप के पूरे जीवन के लिए एक बड़ा सा शून्य छोड़ दिया है. आई एम सौरी सर. मुझे माफ कर दीजिए सर.’’

‘‘माफी की कोई बात है ही नहीं नीरजा, क्योंकि मैं कभी भी तुम से नाराज हो ही नहीं सकता. अब मैं समझ गया. मेरी नीरजा बहुतबहुत बहादुर है, वैरी ब्रेव.’’

‘‘इसीलिए मैं आप को अपने घर नहीं ले जा सकती थी. अगर आप मम्मी से मिलते, तो मम्मी आप को सबकुछ सचसच बता देतीं. अच्छा, एक बात बताइए?’’

‘‘पूछो नीरजा, कुछ भी पूछो?’’

‘‘मैं ने बीसियों बार आप को माई स्मार्ट बौयफ्रैंड कहा है. कहा है न, बताइए?’’

‘‘बिलकुल कहा है.’’

‘‘पर आप ने एक बार भी मुझे माई गर्लफ्रैंड नहीं कहा है. कहा है?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो कहिए न प्लीज. मैं सुन रही हूं. मैं इस पल को भी जीना चाहती हूं.’’

उन्होंने उस की हथेली अपने हाथों में ले ली व भरे गले से कहा, ‘‘दिस इज फैक्ट नीरजा. यू आर माई

स्वीट लिटिल गर्लफ्रैंड ऐंड आई लव यू वैरीवैरी मच.’’उस ने उन की हथेली को चूम लिया.

नीरजा की आंखें मुंदने लगीं. जबान लड़खड़ाने लगी. नर्स जो नर्सिंग काउंटर से देख रही थी, तुरंत आई.‘‘आप प्लीज तुरंत बाहर जाइए. सिस्टर डाक्टर को कौल करो, अर्जेंट.’’

वे धीरेधीरे बाहर आ कर किनारे पड़ी बैंच पर बैठ गए.

डाक्टर मित्रा के आने की नौबत नहीं आने पाई. उस के पहले ही नीरजा ने आखिरी सांस ले ली.

नीरजा का जिस्म पहले घर लाया गया. वे अंतिम संस्कार तक रुके. गाड़ी घर की तरफ मोड़ते समय उन के कानों में नीरजा के आखिरी शब्द गूंजते रहे, ‘मैं ने आप के शांत जीवन से अपने लिए खुशियों के कुछ पल चुरा लिए हैं.’

‘तुम ने मेरे जीवन में शून्य नहीं छोड़ा है नीरजा,’ वे बुदबुदा पड़े, ‘मेरे जीवन के किसी खाली कोने में अपनी मुसकराहटों व खिलखिलाहटों के रंग भी भरे हैं. मैं तुम्हें माफ नहीं कर सकता, कभी नहीं.

खुशियों के पल- भाग 4: कौन थी नीरजा

2-3 लोग और थे. पार्टी जोरशोर से चल रही थी. उन्होंने भी एक सौफ्ट डिं्रक ले लिया. वह उन से 2 साल जूनियर था. उन्हें सर कहता था. मौका देख कर उन्होंने चर्चा छेड़ी.

‘‘यार दोस्त, तुम से एक छोटा सा काम था?’’

‘‘हुक्म कीजिए, सर. आज तक तो कोई काम कहा नहीं आप ने?’’

‘‘कभी जरूरत ही नहीं पड़ी. दरअसल, तुम्हारे विभाग के यानी फिशरीज के हैड औफिस में लाइब्रेरी है. उस में वैकेंसी आई है. तुम्हें पता है क्या?’’

‘‘मुझे तो लाइब्रेरी है, यह भी नहीं मालूम. बहरहाल, होगी लाइब्रेरी. आप का कोई कैंडीडेट है क्या?’’

‘‘हां, एक लड़की है. मेरे परिचित हैं, उन की लड़की है.’’

‘‘तो प्रौब्लम क्या है. जब इंटरव्यू होगा तो मुझे याद दिला दीजिएगा. डिटेल ले कर अपने पास रख लीजिए.’’

‘‘देख लेना भाई जरा. बड़ी नीडी लड़की है. वैसे, डिजर्विंग भी है. एमलिब कर रही है.’’

‘‘देखना क्या है, वैसे तो सुपरिटैंडैंट लेवल के लोग ऐसा इंटरव्यू लेते हैं पर मैं कह दूंगा. समझ लीजिए, हो गया सर. और अगर लड़की ज्यादा खूबसूरत हो तो कहिएगा मुझ से मिल लेगी,’’ जौइंट सैक्रेटरी अभिमन्यू ने बाईं आंख दबाई.

‘‘अरे नहीं यार, मेरे बड़े खास हैं. बड़ी सोबर फैमिली है. पर एक बात बताओ, तुम इतनी गर्लफ्रैंड्स मेनटेन कैसे कर लेते हो?’’

‘‘बस हो जाता है सब. हैल्थ सप्लीमैंट्स जिंदाबाद. सप्लीमैंट्स में बड़ी ताकत होती है. आप को मेरी किसी सलाह की जरूरत हो तो निसंकोच बताइएगा,’’ अभिमन्यू मुसकरा रहा था. फिर धीरे से बोला, ‘‘होटलवोटल की जरूरत हो, तो वह भी बताइगा. मेरे बहुत परिचित हैं.’’

‘‘क्या बात करते हो यार. मैं ग्रैंड फादर बन चुका हूं.’’

‘‘इस से क्या होता है सर. वैसे तो मैं भी बाबानाना बन चुका हूं.’’

‘‘अच्छा याद दिलाया. पंकज कहां है आजकल?’’

‘‘अलीगढ़ में डीएम है. और सावित्री सीनियर पैथोलौजिस्ट बन चुकी है.’’

‘‘बढि़या, बहुत बढि़या भाई अभिमन्यू.’’

चलते को समय भी उन्होंने अभिमन्यू को रिमाइंड करा दिया. इस बार वे 10 दिनों बाद लाइब्रेरी गए. काउंटर पर नीरजा ही बैठी थी. उस समय काउंटर पर मात्र एक लड़का ही किताब इश्यू करा रहा था. वह जब चला गया तो उन्होंने कहा, ‘‘बधाई हो नीरजा. तुम्हारा काम हो गया.’’

‘‘क्या…’’ उस का चेहरा चमक गया, ‘‘आप की बात हो गई क्या?’’

‘‘और क्या, तुम ने मुझे समझ क्या रखा है.’’

‘‘आप किताबें देखिए, तब तक मैं एकाध घंटे की छुट्टी ले लेती हूं. बाहर चलते हैं, वहीं ठीक से बात करते हैं.’’

‘‘ठीक है. ये लो, किताबें जमा कर लो.’’

उसे किताबें दे कर वे वापस हौल में आ गए व इश्यू कराने के लिए किताबें देखने लगे. नीरजा के चेहरे पर वैसी ही खुशी व चमक आई थी जैसी वे देखना चाहते थे. जल्द ही उन्होंने किताबें देख लीं.

‘‘आइए सर, लाइए आप की किताबें, मैं इश्यू करा दूं.’’

नीरजा आ गईर् थी. काउंटर पर दूसरी लड़की बैठ गई थी. नीरजा ने किताबें इश्यू कराईं व उन के साथ ही बाहर आ गई. उन्होंने गाड़ी का दरवाजा खोला व वह अपनी साइड का दरवाजा खोल कर अंदर बैठ गई.

‘‘चलिए, कोल्ड कौफी पीते हुए बताइगा क्या बात हुई है?’’

‘‘कोल्ड कौफी नहीं. आज तो मैं तुम्हें हौट कौफी के साथ प्याज के पकौड़े खिलाऊंगा. तुम्हें पसंद हैं.’’

‘‘प्याज के पकौड़े तो मुझे बेहद पसंद हैं. बिलकुल चलेगा.’’

वे फिर अंबर कैफे पर आ गए. उन्होंने गाड़ी वहीं पर लगाई. हौर्न के जवाब में तुरंत लड़का आ गया.

‘‘2 कौफी और 2 प्लेट पकौड़े प्याज के. पर एकदम गरम.’’

‘‘बिलकुल सर, अभी लाया,’’ लड़का चला गया.

‘‘जौइंट सैक्रेटरी कहां मिले आप को. क्या आप को उन के घर जाना पड़ा?’’

‘‘अरे नहीं, वह अभी 3-4 दिन पहले क्लब में ही मिल गया था. बस, मैं ने उस से कह दिया.’’

‘‘आप क्लब जाते हैं, क्या होता है वहां?’’

‘‘कुछ नहीं. लोग अपना टाइम पास करते हैं. थोड़ा रिलैक्स होते हैं. कुछ लोग बिलियर्ड्स, कार्ड या चैस खेलते हैं. आउटडोर में बैडमिंटन या टेबिल टैनिस खेलते हैं. बैठते हैं, खातेपीते हैं व फिर घर चले जाते हैं.’’

‘‘लोग पीते भी हैं क्या?’’

‘‘पीने वाले पीते भी हैं. वहां इंतजाम तो रहता ही है.’’

‘‘आप भी पीते हैं वहां?’’

‘‘नहीं, मैं नहीं पीता,’’ उन्होंने झूठ बोला.

‘‘फिर क्या हुआ?’’

‘‘फिर…फिर क्या. जौइंट सैक्रेटरी अभिमन्यू ने मुझे देखा तो मेरे पास चला आया. उस पर मेरा बड़ा एहसान है. समझो, एकदम मेरा चेला है. कहने लगा, इतने दिनों से मिला क्यों नहीं. वाइफ के बारे में पूछा. दोनों लड़कों के बारे में पूछा. फिर मैं ने तुम्हारे काम का जिक्र कर दिया.’’

‘‘क्या कहा उन से आप ने? ठीक से बताइए न.’’

‘‘मैं ने कहा एक सुंदर सी लड़की है. उस के बाल व उस की आंखें दुनिया में सब से सुंदर हैं. उस हिरनी जैसी आंखों वाली लड़की ने मछली वाले विभाग में लाइब्रेरियन की पोस्ट के लिए अप्लाई किया है.’’

‘‘आप मजाक कर रहे हैं न.’’ उस की बड़ीबड़ी आंखें उन के चेहरे पर टिकी हुई थीं, ‘‘आप ने यह सब नहीं कहा न?’’

‘‘हां, मैं मजाक कर रहा था. यह सब कोई कहने वाली बातें हैं क्या. मैं ने उसे बताया कि फिशरीज में वैकेंसी है. उस में मेरी एक करीबी लड़की ने अप्लाई किया है. मैं ने उसे इंटरव्यू में देख लेने को कहा. उस ने मुझे निश्ंिचत किया है कि वह देख लेगा. उस के लिए यह कोई बड़ा काम नहीं है.’’

‘‘मैं आप की करीबी वाली लड़की हूं?’’ उस ने गुस्से से आंखें चढ़ाईं.

‘‘अरे भाई, कुछ तो कहना पड़ता है न. फिर इतनी करीब तो बैठी हो आज भी. करीबी वाली हुई कि नहीं.’’

‘‘जाइए. ऐसे होता है क्या. करीब बैठने का मतलब करीबी लड़की नहीं होता है. पर अब तो मैं आप की करीबी लड़की हूं ही. कहिए तो एक बार मैं भी उन से मिल लूं?’’

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं,’’ उन्होंने जोर से कहा व उत्तेजनावश उस का हाथ जोर से पकड़ लिया, ‘‘तुम उस से बिलकुल नहीं मिलोगी.’’

‘‘नहीं मिलूंगी बाबा.’’ उस ने अपना हाथ न छुड़ाया, ‘‘पर इस में ऐसा क्या हुआ जो आप इतना गुस्सा हो गए?’’

‘‘तुम अभिमन्यू जैसे लोगों को जानती नहीं हो. जहां कोई सुंदर लड़की देखी नहीं, कि डोरे डालने लगते हैं. वह तुम्हें फंसाने की कोशिश करेगा. वह कुछ भी कर सकता है,’’ उन्होंने खुद ही उस का हाथ छोड़ दिया.

‘‘डोरे तो आप भी डाल रहे हैं मिस्टर विशाल. आप भी तो फंसाने की कोशिश ही कर रहे हैं न?’’ उस के चेहरे पर गाढ़ी मुसकान थी, ‘‘क्यों? सही है न?’’

‘‘एकदम गलत है. मैं तो सिर्फ तुम्हारी मदद कर रहा हूं.’’

‘‘क्यों कर रहे हैं मेरी मदद?’’

‘‘इंसानियत के नाते. तुम तो वकील की तरह जिरह कर रही हो.’’

‘‘ठीक है. करिए मदद इंसानियत के नाते. मुझे अच्छा लगता है. अब कब कहिएगा उस अभिमन्यू, उस बदमाश से?’’

‘‘इंटरव्यू से 1-2 दिन पहले कह दूंगा उस से. वह करा देगा. तुम बेफिक्र रहो. तुम्हारा सेलैक्शन हो जाएगा.’’

‘‘इंटरव्यू तो डेढ़दो महीने बाद ही होगा. तब तक तो वे भूल भी जाएंगे?’’

‘‘भूल तो जाएंगे ही. पर मैं याद जो दिला दूंगा.’’

‘‘आप ने मेरे लिए बड़ी तकलीफ की है,’’ अब उस ने उन का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘थैक्यू सर.’’

‘‘कोई बात नहीं,’’ उन्होंने उस का हाथ दबा दिया, ‘‘इंसानियत के नाते.’’ दोनों जोर से हंस पड़े.

‘‘अब मैं चलूं सर,’’ उस ने हाथ खींच लिया.

‘‘हां चलो,’’ उन्होंने वेटर को इशारा किया, ‘‘तुम ने अपने मातापिता के बारे में नहीं बताया?’’

‘‘मेरे फादर नहीं हैं. 2 साल पहले एक ऐक्सिडैंट में वे नहीं रहे. मां व छोटा भाई हैं. मां बीमार रहती हैं. उन्हें गठिया है. छोटा भाई हाईस्कूल में है. रुपएपैसे पिताजी ठीकठाक छोड़ गए हैं. पर हम पूंजी ही खा रहे हैं. मकान अपना नहीं है, किराए पर हैं. मेरी नौकरी लग जाती, तो अच्छा रहता,’’ नीरजा ने बताया.

‘‘नौकरी तो अब लग ही जाएगी. पिताजी के बारे में जान कर दुख हुआ. आई एम सौरी, नीरजा.’’

वह कुछ न बोली. वेटर बिल के रुपए व बरतन उठा कर ले गया. उन्होंने गाड़ी रिवर्स की व नीरजा को लाइब्रेरी के थोड़ा पहले उतार दिया.

खुशियों के पल- भाग 3: कौन थी नीरजा

घर पहुंच कर उन्होंने मुहर ढूंढ़ ली. उन के औफिस वाले बैग में ही मिल गई. अपनी स्टडी वाले छोटे रूम में आ कर उन्होंने सभी टैस्टिमोनियल्स पर मुहर लगा कर साइन भी कर दिए. ऊपर अटैस्ट भी लिख दिया. फिर पता नहीं क्या मन में आया कि उस की अप्लीकेशन स्कैन कर ली. कलर पिं्रटर व स्कैनर उन के पास था ही. अप्लीकेशन का स्कैन आ गया व नीरजा की फोटो भी बढि़या स्कैन हो गई. उन्होंने कैंची से फोटो काट ली व उलटी कर के पर्स में रख ली. अप्लीकेशन में साइन भी वैरीफाई कर दिए.

दूसरे दिन कुछ समय पहले ही लगभग साढ़े 4 बजे वे लाइब्रेरी पहुंच गए. बाहर सड़क पर ही गाड़ी पार्क कर दी. आज भी उन्होंने टीशर्ट व पैंट पहनी थी पर कलर अलग था. वे रोज सुबह नहाने से पहले दाढ़ी बनाते थे पर आज 2 बार बनाई थी. निकलने से पहले भी दाढ़ी बनाई थी.

ठीक 5 बजे नीरजा लाइब्रेरी से बाहर निकलती दिखाई दी. बाहर निकल कर वह ठिठकी, चारों तरफ देखा. उन की गाड़ी देख कर सीधे उन की तरफ आई. वे गाड़ी में बैठे रहे.

‘‘मेरा काम हुआ?’’ उस ने सीधे पूछा.

‘‘हो गया, आओ बैठो,’’ उन्होंने कहा.

‘‘नहीं, आप फाइल दे दीजिए सर. मुझे देर हो रही है.’’

‘‘लोग देख रहे हैं नीरजा. यह सड़क है. फिर तुम चैक भी तो कर लो न. कहीं छूटा न हो. आओ बैठो.’’ उन्होंने पैसेंजर साइड का दरवाजा खोल दिया. नीरजा वहां 2 क्षण खड़ी रही, फिर घूम कर आ कर बैठ गई व दरवाजा बंद कर लिया. आज उस ने ऊंची एड़ी की सैंडिल पहन रखी थी. उन्होंने इंजन स्टार्ट कर दिया.

उन्हें इंजन स्टार्ट करते देख उस ने नजरें उठाईं, ‘‘कहां ले जा रहे हैं मुझे?’’

‘‘कहीं नहीं, गाड़ी खड़ी रखना ठीक नहीं लगता. अगले चौराहे पर उतर जाना.’’

‘‘मुझे भगा कर तो नहीं ले जा रहे हैं?’’ वह हंस पड़ी.

‘‘मन तो यही कर रहा है,’’ वे भी हंस पड़े, ‘‘पर ऐसा है नहीं. तुम पेपर तो चैक कर लो.’’

‘‘करती हूं,’’ उस ने फाइल खोल ली व एकएक पेपर चैक करने लगी.

‘‘ठीक हैं. बस, एक जगह अटैस्ट लिखना रह गया है. पर कोई बात नहीं है, मैं खुद लिख लूंगी. थैंक्यू सर, आप ने मेरा बड़ा काम कर दिया.’’

‘‘यह अप्लीकेशन तुम फिशरीज डिपार्टमैंट में दे रही हो न?’’

‘‘हां, उन के हैडऔफिस में काफी बड़ी लाइब्रेरी है. उसी की वैकेंसी आई है. 2 पोस्ट हैं. बहुत लोग अप्लाई कर रहे हैं. मेरे साथ के तो सभी कर रहे हैं. सैंट्रल गवर्नमैंट जौब है न. देखिए, क्या होता है.’’

‘‘फिशरीज के जौइंट सैक्रेटरी मेरे अच्छे दोस्त हैं.’’

‘‘अच्छा, वे तो बड़े ऊंचे अफसर हुए.’’

‘‘हां, तुम कहो तो मैं उन से कह सकता हूं.’’

वह कई क्षणों तक उन के चेहरे की तरफ देखती रही. फिर अचानक उन के घुटनों पर हाथ रख कर बोली, ‘‘मेरा यह काम तुम्हें कराना होगा. जौइंट सैक्रेटरी चाहेगा तो यह जौब मुझे जरूर मिल जाएगा. सिर्फ इंटरव्यू ही है. प्लीज, मेरा यह काम करा दो न. मुझे इस जौब की बड़ी जरूरत है.’’ फिर वह जैसे अपने इस आवेग पर झेंप कर सिकुड़ कर बैठ गई. उन के पांव ऐक्सिलरेटर पर थरथरा रहे थे.

‘‘मैं देख लूंगा, डोंट वरी. मैं ने उस के कई काम किए हैं. चौराहा आ गया. तुम्हें उतरना है या आगे चलना है.’’

‘‘चलते रहिए. आई एम सौरी सर. मैं ने आप को तुम कह दिया. माफ कर दीजिए. मैं जोश में आ गई थी.’’

‘‘कोई बात नहीं, नीरजा. अगर तुम्हें अच्छा लगे, तो कह सकती हो. इस में क्या है?’’

‘‘मुझे बहुत अच्छा लगा.’’

‘‘कौफी पियोगी.’’

‘‘क्या?’’

‘‘मैं ने कहा कौफी पीने का मन है क्या. कोल्ड कौफी. आगे अंबर की कौफी शौप है. मुझे उस की कोल्ड कौफी पसंद है.’’

‘‘कोल्ड कौफी तो मुझे भी बहुत पसंद है.’’

‘‘उतरना भी नहीं पड़ेगा, लड़का गाड़ी में ही कौफी वगैरह दे देता है. तो चलते हैं कौफी पीते हैं.’’ वह चुप रही.

अंबर कैफे सड़क पर ही था. सड़क के पीछे सड़क व पटरी के बीच लोहे की रेलिंग लगी थी. उन्होंने गाड़ी लोहे की रेलिंग के साथ लगा दी व हलके से हौर्न बजाया. एक लड़का तुरंत आया.

‘‘यस सर.’’

‘‘2 कोल्ड कौफी. 2 पेस्ट्री भी लाना.’’ लड़का चला गया.

‘‘आप ने पेस्ट्री क्यों मंगवाई है, बात तो कौफी की हुई थी.’’

‘‘कोल्ड कौफी के साथ इन की पेस्ट्री का अलग मजा है.’’

‘‘मैं पेस्ट्री नहीं खाऊंगी, तुम्हीं खाना.’’

‘‘पेस्ट्री तो तुम जरूर खाओगी. पेस्ट्री तुम्हें पसंद जो है.’’

‘‘तुम्हें…आप को, कैसे पता चला?’’

‘‘मैं जानता हूं. तुम जब न कहती हो तो मतलब होता है हां.’’

‘‘इस खयाल में मत रहिएगा मिस्टर विशाल, ऐसा नहीं है.’’ वे मुसकराते रहे.

वेटर कौफी व पेस्ट्री दे गया. नीरजा ने बड़े मन से कौफी पी व पेस्ट्री खाई.

‘‘अच्छा, एक बात तो बताइए,’’ नीरजा ने पेस्ट्री खाते हुए पूछा, ‘‘आप की तो बहुत सी गर्लफ्रैंड्स रही होंगी न?’’

‘‘बहुत सी तो नहीं थीं.’’

‘‘फिर भी?’’

‘‘एकाध तो सभी की होती हैं.’’

‘‘तो हमारा अफेयर चल रहा है क्या?’’

‘‘क्या, यह क्या कह रही हो तुम?’’ वे अचकचा गए.

‘‘नहीं, ऐसे ही तो होता है न. मुलाकात हो गई, बात हो गई, बाहर भी मुलाकात हो गई, गाड़ी पर अकेले घूमवूम भी लिए. कौफीपेस्ट्री भी हो गई. ऐसे ही तो होता है न फिल्मों में.’’

‘‘फिल्मों में होता होगा. ऐसे होता नहीं है. तुम्हें देर हो रही होगी. क्या मैं तुम्हें घर तक छोड़ दूं.’’

‘‘नहीं, मैं औटो पकड़ूगी.’’

‘‘चलो, मैं तुम्हें औटो तक छोड़ दूं,’’ वे बाहर निकल आए. उन्होंने बिल पेमैंट किया. वे सड़क तक आ गए. तुरंत एक औटो वाला आ गया.

‘‘साहब, चलना है क्या?’’

‘‘हां, जाना है. तुम्हें कहां जाना है नीरजा.’’

‘‘मीरापट्टी रोड.’’

‘‘बैठो.’’

‘‘सर, आप को मेरा वह काम कराना ही होगा. कब बात करेंगे आप जौइंट सैक्रेटरी साहब से. कल ही कर लीजिए न.’’

‘‘अरे, इतनी जल्दी नहीं, अभी तो तुम अप्लीकेशन भेजो. 2-3 दिन तो अप्लीकेशन पहुंचने में ही लग जाएंगे. इसी हफ्ते में बात कर लूंगा.’’

‘‘आप कब लाइब्रेरी आइएगा, सर? बात करते ही आ जाइएगा न.’’

‘‘हां, ठीक है. मैं जल्दी ही आऊंगा. वैसे भी लाइब्रेरी तो आना ही है.’’

‘‘मेरी डिटेल तो आप के पास होगी नहीं, अच्छा होता मैं अप्लीकेशन की एक कौपी आप को दे देती.’’

‘‘मैं ने स्कैन कर लिया है, डिटेल है मेरे पास.’’

‘‘पर फोटो तो अच्छी नहीं आई होगी न.’’

‘‘बहुत अच्छी आई है,’’ वे बेध्यानी में कह गए. वह खिलखिला कर हंस पड़ी.

‘‘कहिए तो अपनी एक फोटो दे ही दूं, मेरे बैग में ही है.’’

‘‘अरे नहीं. मैं क्या करूंगा तुम्हारी फोटो का. फिर स्क्रीन कौपी तो है ही.’’

‘‘करिएगा क्या, देखिएगा,’’ वह तेज मुसकराहट के साथ औटो में जा कर बैठ गई, ‘‘फिर आप के साथ तो ओरिजिनल मैं हूं. हां, मुझे देखिए. फोटो से क्या होगा.’’

औटो आगे बढ़ गया.

वे आ कर कार में बैठ गए. बाप रे, न सिर्फ तेज लड़की है, बल्कि वाचाल भी है. थोड़ा बचपना भी है. अल्हड़ तो है ही. उन्होंने गाड़ी घर की तरफ मोड़ दी.

जौइंट सैक्रेटरी से उन की मुलाकात तीसरे दिन ही क्लब में हो गई. वह बड़ा खुश था. उस का प्रमोशन हो गया था.

खुशियों के पल- भाग 2: कौन थी नीरजा

‘‘गुडमौर्निंग सर,’’ वे चौंक कर पीछे मुड़े.

वही लड़की पीछे खड़ी मुसकरा रही थी. वे एक क्षण के लिए ताज्जुब में पड़ गए. वह आज और भी सुंदर, और भी दिलकश लग रही थी. हरे रंग के सूट में उस की खूबसूरती और भी खिल रही थी. काउंटर पर बैठी हुई वह आधा ही दिखाई देती थी पर इस समय वह पूर्णरूप से उन के सामने थी. उस के पैरों में पतली मैचिंग चप्पलें थीं.

‘‘गुडमौर्निंग, बल्कि वैरी गुडमौर्निंग,’’ उन्होंने अपने को संभाल लिया. वे वाकई चौंक गए थे.

‘‘आय एम सौरी सर, मुझे पीछे से आवाज नहीं देनी चाहिए थी. आय एम रियली सौरी.’’

‘‘नहीं, कोई बात नहीं. आज आप की ड्यूटी काउंटर पर नहीं है क्या?’’

‘‘नहीं, यहां का कैटलौग बड़ा अव्यवस्थित है. वही ठीक करने के लिए कहा गया है. आप किस तरह की किताबें पढ़ते हैं सर?’’

‘‘नौरमली, मैं हर विषय पर पुस्तकें पढ़ लेता हूं. पर मेरी खास पसंद सोशल राइटिंग है.’’

‘‘आज लगता है अभी तक आप को कोई किताब पसंद नहीं आई है. क्या मैं आप की कोई मदद करूं?’’

‘‘नहींनहीं, मैं कर लूंगा. फिर तुम्हें अपना भी तो काम करना है, डिस्टर्ब होगा. माफ करना, मैं आप को तुम्हें कह गया.’’

‘‘ठीक तो है. आप को मुझे तुम ही कहना चाहिए. और मुझे क्या डिस्टर्ब होगा. कैटलौग का एक दिन का काम तो है नहीं. दसियों हजार किताबें हैं. पूरे कैटलौग को चैक करना व फिर मिसिंग को चढ़ाना एक आदमी का काम नहीं है. लाइब्रेरियन भी सिर्फ खानापूर्ति करते हैं. कहने को हो गया कि किसी को कैटलौग के काम में लगाया है.’’

उस का चेहरा थोड़ा तमतमा गया था. उस का तमतमाया चेहरा और भी अच्छा लग रहा था. वे किनारे की शैल्फ के पास खड़े हो कर बातें कर रहे थे व धीरेधीरे बोल रहे थे जिस से दूसरे लोगों को असुविधा न हो.

‘‘मैं तो कैटलौग के पास कभी गया ही नहीं. सीधे शैल्फ से ही किताबें सिलैक्ट कर लेता हूं.’’

‘‘आप क्या किसी सरकारी विभाग में हैं?’’

‘‘हां.’’

‘‘गजेटैड अफसर होंगे आप तो?’’

‘‘कह सकती हो, बात क्या है?’’

‘‘मुझे आप से एक काम है. इसीलिए आप को देखा तो आप के पास आ गई. क्या आप मेरा एक काम कर देंगे?’’ उस ने अपनी मुसकराहट बिखेरी.

‘‘बोलो, क्या काम है? जरूर कर दूंगा.’’ उन को अंदर से उतावलापन महसूस हुआ.

‘‘मुझे अपने कुछ टैस्टिमोनियल्स अटैस्ट कराने हैं. मुझे एक अच्छी जगह अप्लाई करना है. क्या आप अटैस्ट

कर देंगे.’’

‘‘और कहीं क्यों अप्लाई कर रही हो? यहां तो जौब कर ही रही हो न?’’

‘‘नहीं, मैं यहां जौब नहीं कर रही हूं. मैं यहां ट्रेनिंग कर रही हूं. मैं एमलिब कर रही हूं. हमें एक साल लाइब्रेरी में काम करना पड़ता है. तो आप अटैस्ट कर देंगे न.’’

‘‘अटैस्ट तो कर देता, पर एक प्रौब्लम है.’’

‘‘क्या प्रौब्लम है? क्या आप गजेटैड अफसर नहीं हैं?’’

‘‘नहीं, गजेटैड अफसर तो था पर, पर…अच्छा तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘मेरा नाम नीरजा है. नीरजा टंडन. आप का नाम क्या है?’’

‘‘तुम मुझे विशाल अंकल कह सकती हो.’’

‘‘अंकल, तो मैं कभी न कहूं आप को.’’

‘‘तो तुम विशाल कह सकती हो,’’ उन्हें अंदर से खुशी महसूस हुई.

‘‘पर प्रौब्लम क्या है, यह तो बताइए.’’

‘‘देखो नीरजा, मैं रिटायर हो चुका हूं.’’

‘‘रिटायर…आप…हो ही नहीं सकता. रिटायर तो 60 साल की उम्र में होते

हैं न? क्या आप को जल्दी रिटायर कर दिया गया?’’

‘‘नहीं, मैं समय पर ही रिटायर हुआ हूं. अभी पिछले साल ही रिटायर हुआ हूं.’’

‘‘पर आप की उम्र तो 60 की लगती ही नहीं.’’

‘‘कितनी लगती है?’’ अब वे मुसकरा पड़े. नीरजा ने उन्हें ध्यान से देखा, ऊपर से नीचे तक देखा. फिर बोली, ‘‘50, बस, इस से ज्यादा नहीं.’’

‘‘पर मैं तो समझता था कि तुम यहां नौकरी करती हो. क्या ट्रेनिंग में कुछ पैसा भी देते हैं?’’

‘‘हां, स्टाइपैंड देते हैं. पर ज्यादा नहीं. मैं तो सोच रही थी कि आप से मेरा काम हो जाएगा.’’

‘‘अरे, मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूं.’’

‘‘सच कह रहे हैं,’’ उस ने धीरेधीरे अपनी निगाह ऊपर उठाई व उन के चेहरे की तरफ देखा, ‘‘क्या सच ही.’’

‘‘बिलकुल सच. मेरे कई साथी हैं. मैं किसी से भी अटैस्ट करा दूंगा. देखूं, कौन से पेपर हैं.’’

‘‘अभी लाई. मेरे बैग में औफिस में हैं. आप पूरी फाइल ही ले लीजिएगा. यहां किसी को पता नहीं चलना चाहिए.’’

वह जल्दी से औफिस की ओर चल दी. उन को अंदर से बड़ा अच्छा लग रहा था. उन्होंने जल्दी से किताबें देखीं व उसी शैल्फ  से 3 किताबें फाइनल कर लीं. तभी नीरजा वापस आ गई. उस के हाथ में एक औफिस फाइल थी.

‘‘इसी में सारे टैस्टिमोनियल्स हैं. जिन्हें अटैस्ट करना है उन में फ्लैग लगे हैं. इस में मेरी अप्लीकेशन भी है. प्लीज मेरा साइन भी वैरीफाई करा दीजिएगा.’’

‘‘ठीक है, ओरिजिनल कहां हैं.’’

‘‘ओरिजिनल तो यहां नहीं हैं. क्या नहीं हो पाएगा? ये सभी ओरिजिनल की फोटोकौपीज हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं. मैं कह दूंगा ओरिजिनल मैं ने देख लिए हैं. फिर फोटोकौपी भी तो ओरिजिनल से ही होती है न.’’

‘‘थैंक्यू सर, आप का बड़ा एहसान होगा. लगता है आप ने बुक्स फाइनल कर ली हैं. आप बैठिए, मैं बुक्स इश्यू करा लाती हूं. कार्ड भी दे दीजिए.’’

उन्होंने कार्ड व पुस्तकें उसे दे दीं. वह इश्यू कराने के लिए चली गई. वे फाइल हाथ में लिए बुकशैल्फ के पास खड़े किताबें देखते रहे. उन के मन में नीरजा का कहा गूंजता रहा. उस ने क्यों कहा कि अंकल तो मैं कभी न कहूं आप को. चलो अगर वह उसे 50 का भी मानती है तो अंकल लायक बड़ा तो उसे मानना ही चाहिए. उन्हें थोड़ा गर्व भी महसूस हुआ. ऐसे ही नहीं, उन के दोस्त पहले उन्हें देवानंद कह कर बुलाया करते थे. नीरजा ने कहा था, फाइल में उस की अप्लीकेशन भी है. उन्होंने फाइल खोल कर देखी. उन का मन खुश हो गया. अप्लीकेशन में उस का प्यारा सा फोटो लगा हुआ था.

‘‘क्या देख रहे हैं?’’

उन्होंने ध्यान नहीं दिया था, नीरजा वापस आ चुकी थी, ‘‘मेरा फोटो देख रहे हैं न. देखिए, जीभर कर देखिए. बल्कि कहिएगा तो अपना एक फोटो अलग से दे दूंगी.’’

‘‘अप्लीकेशन में छोटा फोटो लगाते हैं, तुम ने पासपोर्ट साइज लगा रखा है. वही देख रहा था.’’

‘‘पासपोर्ट साइज ही मांगा है. ये लीजिए अपनी किताबें व टोकन. तो कब आऊं, मैं आप के घर?’’

‘‘घर…वो किस…किसलिए?’’

‘‘अरे, पेपर लेने के लिए.’’ नीरजा शरारत से मुसकरा पड़ी, ‘‘आप तो घबरा गए. अप्लाई भी तो करना है. कब अटैस्ट कराएंगे?’’

‘‘अटैस्ट तो मैं आज ही करा लूंगा. पर मेरा घर तो बहुत दूर है. ऐसा है, मुझे

2-3 दिनों में इधर आना है. मैं ही ला कर दे दूंगा.’’

‘‘आप के पास कार है न. मैं ने देखी है. किसी दिन उस में मुझे भी घुमाइए न.’’

‘‘जब कहो. पर आज मैं चलता हूं. तुम तो शाम को ही निकल पाती होगी?’’

‘‘मैं ठीक 5 बजे निकल जाती हूं. आप ऐसा कीजिएगा, आप परसों 5 बजे ही आइएगा. गाड़ी सड़क पर ही पार्क कर दीजिएगा. मैं वहीं आप से पेपर ले लूंगी. परसों जरूर आइएगा.’’

‘‘पक्का,’’ कह कर उन्होंने किताबें उठा लीं व हाथ हिला कर बाहर आ गए. गाड़ी का दरवाजा खोल कर किताबें व फाइल पीछे की सीट पर रख कर ड्राइविंग सीट पर बैठे व रूमाल निकाल कर पसीना पोंछा. नीरजा एक तेज नशे की तरह उन के व्यक्तित्व पर छाती चली जा रही थी. अटैस्ट करने का क्या है, उन्होंने गाड़ी स्टार्ट करते हुए  सोचा. एडीशनल सैक्रेटरी की मुहरें घर पर पड़ी ही रहती थीं. अभी भी पड़ी हैं. मुहर लगा कर अटैस्ट कर साइन कर देंगे. बस, हो गया काम. किसी को क्या मालूम कब किया था.

बच्चे को कोरोना- भाग 4: निशानिका ने क्या कदम उठाया था

वेकाश को अचानक सूझ कि अगर जेवन के बारे में उसे ऐसी कोई बात पता चल जाती है जिसे वह उस के खिलाफ उपयोग कर सके, ऐसी कोई बात जो जेवन नहीं चाहता हो कि किसी को पता चले, तो इस भयानक परिणाम वाले प्रकरण से उसे मुक्ति मिल सकती है. जब तक वेकाश और निशानिका अपना मुंह बंद रखेंगे, तब तक जेवन भी अपना मुंह नहीं खोल पाएगा. परंतु इतनी जल्दी कैसे इस आदमी का कोई राज पता चल सकेगा क्योंकि जल्द ही सब लोगों की नजर में आ जाएगा कि जेवन गायब है और फिर उस की तलाश शुरू हो जाएगी.

शांतलू और उस की पत्नी से पूछने पर वे लोग बता देंगे कि जेवन ने निशानिका की गिफ्ट शौप का पता उन से मांगा था और उसी के बाद से वह गायब है. फिर पूछताछ करने के लिए पुलिस यहां इस दुकान तक आ पहुंचेगी. जैसे भी हो उसे और निशानिका को अपनेआप को बनाए रखना होगा, सबकुछ सामान्य रूप से चलने देना होगा. फिर भी यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि अंदर कमरे में बंद व्यक्ति शोरशराबा न कर सके और छूट कर बाहर न भाग सके?

वेकाश ने अपना मोबाइल निकाला और सारी सोशल मीडिया साइटों पर जेवन का नाम खंगाला. यूट्यूब पर भी देखा. लिंक्ड इन पर जेवन का बायोडेटा देखा. ध्यान से तारीखों का निरीक्षण किया. उसे यह देख कर अचरज हुआ कि स्नातक डिगरी के लिए पहले जेवन ने जिस महाविद्यालय में दाखिला लिया था 2 साल के कोर्स के बाद उसे छोड़ कर किसी और महाविद्यालय में फिर से उस ने दाखिला लिया और अंतत: डिगरी इस दूसरे महाविद्यालय से प्राप्त की. वैसे तो इस महाविद्यालय परिवर्तन के कई कारण हो सकते थे. अत: उस ने इस का उत्तर जेवन के मुंह से ही जानना उचित समझ.

वेकाश कमरे का दरवाजा खोल कर भीतर दाखिल हुआ. उस ने जेवन को कुरसी पर चुपचाप बैठे हुए पाया. जैसे ही वेकाश ने जेवन के मुंह से कपड़ा हटाया, जेवन ने प्रश्न किया, ‘‘तुम तो कह रहे थे कि जो बीत गई सो बात गई?’’

वेकाश ने उसे गौर से देखा जैसे पता करने की कोशिश कर रहा हो कि यह आदमी किस हद तक जा सकता है.

जेवन ने जैसे विनती करते हुए कहा, ‘‘तुम मुझे यहां किसी जानवर की तरह कैद नहीं रख सकते हो.’’

वेकाश की ओर से कोई प्रत्युत्तर न पा कर उस ने खीज कर कहा, ‘‘लोगों को

मालूम है कि मैं यहां इस गिफ्ट शौप में आ रहा था. इसीलिए या तो तुम मुझे यहां से बाहर जाने दो या फिर पुलिस मुझे यहां से बाहर निकालेगी.’’

जेवन के मुंह से पुलिस का नाम सुनते ही वेकाश समझ गया कि जेवन इतनी आसानी से नहीं मानेगा.

जेवन ने कहना जारी रखा, ‘‘जब वे लोग मुझे खोजते हुए यहां आएंगे…’’

वेकाश ने उस की बात काट दी, ‘‘कोई तुम्हें बचाने के लिए नहीं आएगा. तुम्हारी ओर से पहले ही निशानिका ने सब को मैसेज कर दिया है.’’

बात सही थी. जेवन के मोबाइल में कोई कोड नहीं था. इस का फायदा उठा कर  निशानिका ने सभी को जेवन की ओर से संदेश भेज दिए थे. यह सुन कर जेवन हत्प्रभ रह गया. किसी शातिर अपराधी से ही उम्मीद की जा सकती है कि वह ऐसा कदम उठाएगा. कोई उसे ढूंढ़ते हुए यहां तक आ पहुंचेगा, यह बात अब बेदम होती नजर आ रही थी.

वेकाश ने उसे हैरतअंगेज होते देखा तो

उसे समझया, ‘‘मैं तो आप को रिहा करने के पक्ष में हूं.’’

जेवन की आंखों में आंसू आ गए, ‘‘मैं किसी को भी नहीं बताऊंगा. मेरा विश्वास करो. मैं वादा करता हूं कि यह बात हम तक ही सीमित रहेगी.’’

वेकाश को जाने क्यों जेवन की बातों का यकीन नहीं था. उस ने कुछ सोचते हुए जेवन से पूछा, ‘‘अपनी स्नातक डिगरी में आप ने एक महाविद्यालय छोड़ कर दूसरे में क्यों दाखिला लिया?’’

अचानक ऐसे प्रश्न से जेवन, वेकाश को आंखें फाड़ कर देखने लगा. ऐसे किसी भी प्रश्न की उस ने उम्मीद नहीं की थी. हकला कर कहा, ‘‘मतलब? बस यों ही… शायद पिताजी का तबादला…’’

वेकाश, ‘‘आप की बेटियों के साथ दादाजी की तसवीर है. तसवीर में दिख रही तारीखों से महाविद्यालय बदलने के 2 वर्ष पूर्व ही पिताजी का देहांत हो गया है ऐसा प्रतीत होता है,’’ वेकाश ने इंटरनैट पर रखी तसवीर जेवन को दिखा दी.

जेवन हतोत्साहित हो गया. उस ने निराशा में कहा, ‘‘मां के कहने पर…’’

वेकाश ने वही तसवीर दिखा कर कहा, ‘‘गौर से देखो. मां के भी देहांत की तिथि लिखी हुई है. पिताजी के चल बसने के 1 वर्ष बाद ही आप की मां भी गुजर गईं.’’

जेवन को सूझ नहीं रहा था कि वह क्या कहे. बोला, ‘‘तुम कहना क्या चाहते हो, साफसाफ कहो. इन सब बेबुनियाद भूलीबिसरी बातों का क्या तात्पर्य है?’’

वेकाश ने सांस भरते हुए कहा, ‘‘आप की ही जान बचाने की कोशिश कर रहा हूं मैं.’’

जेवन की ओर से कोई उत्तर नहीं मिला, तो वेकाश कमरे से बाहर निकल कर

वापस अपनी पत्नी के पास आ कर बैठ गया. निशानिका ने सुझया, ‘‘गूगल में वह वर्ष डालो जब इस ने महाविद्यालय बदला है और इस के पहले वाले महाविद्यालय का नाम डालो. देखो कोई न्यूज रिपोर्ट मिलती है क्या.’’

वेकाश ने ऐसा ही किया. गूगल के नतीजे देख कर अचरज और खुशी के साथ उस ने निशानिका से कहा, ‘‘समस्या का समाधान हो गया.’’

वेकाश फौरन कमरे में गया और उस ने मोबाइल पर गूगल द्वारा खोजी गई किसी समाचारपत्र की खबर दिखाते हुए जेवन से पूछा, ‘‘इस रिपोर्ट में लिखा है कि रैगिंग के जुर्म में आप के महाविद्यालय ने उस साल किसी छात्र को महाविद्यालय से निष्कासित कर दिया.’’

जेवन सहम गया, ‘‘तो? वह मैं नहीं हूं.’’

वेकाश ने रिपोर्ट देखी. न तो रैगिंग पीडि़त का नाम था, न ही रैगिंग करने वाले का. दोनों के नाम उन के युवा होने की वजह से समाचारों से दूर रखे गए थे ताकि दोनों की ही जिंदगी न बरबाद हो. हां, इतना जरूर लिखा था कि रैगिंग के समय पीडि़त को इतनी बुरी तरह से पीटा गया था कि उसे अस्पताल में भरती करवाना पड़ा था. अगर छोटीमोटी रैगिंग होती तो कोई भी सहन कर लेता. लेकिन बात इतनी बड़ जाने पर महाविद्यालय प्रशासन को अपनी तरफ से कदम लेना ही पड़ा.

वेकाश ने मोबाइल अपनी जेब में डालते हुए कहा, ‘‘ठीक है, मैं महाविद्यालय जाता हूं. वहां से पता लगाने की कोशिश करता हूं. फिर पीडि़त का पता लगाता हूं. चाहे जिस शहर में हो, उस के घर जा कर सूचित करता हूं कि तुम अब कहां हो.’’

जेवन फूटफूट कर रोने लगा, ‘‘नहीं, ऐसा मत करना. कहीं जाने की जरूरत नहीं है. मैं ही हूं जिस ने रैगिंग की थी, मैं ही हूं जिसे बाहर निकाल दिया गया था… पिताजी चल बसे, फिर मां का भी देहांत हो गया, तो पता नहीं उस समय कैसी मानसिक स्थिति हो गई थी, सबकुछ अपने खिलाफ होते लग रहा था. ऐसी ही हालत में एक दिन गुस्से में यह सब हो गया.’’

पश्चात्ताप के आंसुओं की अलग ही पहचान होती है. जेवन का

अनुताप उस की निष्कपट भावना से जाहिर था.

वेकाश को यह सुन कर जिस राहत की अनुभूति हुई, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता जैसे संपूर्ण जीवन की उत्कंठा एक ही पल में कंधों से नीचे गिर कर छूमंतर हो गई वरना उसे जेल की सलाखें ही अपनी आंखों के आगे दिख रही थीं. अब एक शक्तिशाली सुरक्षा कवच उस के हाथ लग गया था. पूरे प्रकरण की अप्रियता ने उसे ऐसे घेर लिया था जैसे चक्रव्यूह, जिस से बच कर बाहर निकलना असंभव कार्य नजर आ रहा था. गोया जीवन को आगे बढ़ाने की अनुमति मिल गई हो. जिस भारी वजन के तले वह बेमतलब दब गया था, वह सिर पर से किसी ने उठा लिया हो.

वेकाश ने जेवन के बंधन खोल दिए. उसे कमरे से वापस दुकान के दरवाजे की ओर ले गया और उसे विदा करते हुए कहा, ‘‘याद रखना कि अगर इस का जिक्र आप ने किसी से किया, तो सब से पहले आप की बेटियों को यह राज पता चलेगा.’’

जेवन ने गमगीन आंखों से उसे धन्यवाद दिया और वादा दे कर चला गया. निशानिका से आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं हुई उस की.

2 ही दिनों में निशांधेता का बुखार उतर गया और संक्रमण भी ठीक हो गया. उसे स्वस्थ अवस्था में घर ले जाया गया. जेवन की ओर से कोई खबर नहीं आई. उस ने कोई कदम नहीं उठाया. वेकाश और निशानिका, निशांधेता के साथ अब वापस अपने जीवन की कड़ी को वहीं से जोड़ कर आगे जा सकते थे, जहां से निशानिका की क्षणभर की भूल ने बेरहमी से उस कड़ी को तोड़ दिया था.

बच्चे को कोरोना- भाग 3: निशानिका ने क्या कदम उठाया था

निशानिका ठीक उस के पीछे खडी थी. निशानिका की मानसिक हालत यह थी कि वह खुद नहीं जानती थी कि कब वह बक्से से उठ कर, पीतल की मूर्ति ले कर जेवन के पीछे आ खड़ी हुई है. जैसे ही जेवन ने पलट कर उसे देखा, निशानिका को पता ही नहीं चला कि कब उस का मूर्ति वाला हाथ जोर से घूम गया. उस ने पीतल की मूर्ति से जोर से जेवन के सिर पर प्रहार किया. जेवन के सिर पर घाव हो गया, खून बहने लगा और वह बेहोश हो कर वहीं गिर पड़ा.

वेकाश ने अपने बजते मोबाइल पर अपनी पत्नी का नंबर देखा और तुरंत फोन अटैंड किया. उस ने चिंतित स्वर में पूछा, ‘‘अस्पताल से खबर आई है क्या?’’

मगर दूसरे छोर पर पत्नी के बिलखते अस्पष्ट शब्दों से उस की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. अपना काम छोड़ वह दौड़ाभागा अपनी पत्नी की गिफ्ट शौप पर पहुंचा. निशानिका को बहोश पा कर उस ने उसे झकझोरा जैसी गहरी निद्रा से उसे उठाने की चेष्टा कर रहा हो.

एक ही सांस में बड़बड़ाते हुए निशानिका ने किस्सा बयान कर दिया. वेकाश

अविश्वसनीय मुद्रा में बस सुनता रह गया. जब थोड़ी देर बाद उस की स्थिति स्थिर हुई, तो उस ने निशानिका की बांहें कस कर पकड़ उस से पूछा, ‘‘अभी वह कहां है?’’

निशानिका ने अंदर वाले कमरे की ओर इशारा किया.

वेकाश ने अंदर वाले कमरे का दरवाजा खोले. अंदर का नजारा देख कर वह स्तब्ध रह गया. निशानिका ने जेवन के हाथपांव अच्छे से रस्सी से बांध दिए थे. उस के मुंह पर एक बड़ा कपड़ा बांध दिया था ताकि वह चिल्ला न सके. वेकाश ने निरिक्षण किया. जेवन की सांसें अभी भी सुचारु रूप से चल रही थीं. किंतु वह बेहोश पड़ा था. सिर पर गहरी चोट थी. उस की पत्नी ने जो भी किया, क्या वह सही था? अपने आवेग को क्यों वह नियंत्रण में न रख सकी? अपनी पत्नी की इस अप्रत्याशित हरकत से उसे बड़ी निराशा हुई. क्या निशानिका को यह दिखाना महत्त्वपूर्ण था कि वह उस की इस हरकत से कितना निराश था या फिर उलटे उस की मानसिक दशा के चलते उस की सराहना करे और उस से कहे कि जो कुछ उस ने किया वह ठीक था. इस वक्त अपनी पत्नी की सराहना करना तो बिलकुल गलत होगा, लेकिन उस की नाजुक दशा के मद्देनजर डांटफटकार से विपरीत ही असर होगा और फिर न जाने क्या हो जाए.

वेकाश दूसरे कमरे में रखे फ्रिज से बर्फ लाया और जेवन के सिर के घाव पर रखी. बर्फ की ठंडाई ने रक्तवाहिकाओं को संकुचित किया और दर्द तथा सूजन को कम कर सिर में परिसंचरण किया. फलस्वरूप जेवन को होश आने लगा. कराहते हुए उस ने आंखें खोलीं और आसपास के नजारे की टोह ली. अच्छी तरह से रस्सी से जकड़े होने की वजह से वह जमीन पर अपने स्थान से हिल भी न पाया. वेकाश उस के बगल में ही बैठा था.

तड़पते हुए जेवन ने पीड़ा से कहना चाहा, ‘‘उस ने मुझे मारा…,’’ लेकिन मुंह पर बंधे कपडे़ से उस की आवाज दब गई.

एक बार के लिए तो वेकाश के मन में आया कि जेवन से कहे, ‘‘आप फिसल कर गिर गए जिस से आप को सिर पर चोट लग गई है,’’ परंतु उस के बंधे हाथपांव और उसे पूरे होशहवास में आते देख उस के मुंह से निकल गया, ‘‘मुझे माफ कर दो.’’

जेवन ने दर्द से अपने हाथों से अपना सिर सहलाना चाहा, ‘‘तुम्हारी पत्नी…’’ जब उस ने महसूस किया कि न केवल उस के हाथपांव बंधे हैं, बल्कि मुंह पर भी कपड़ा लगा है ताकि वह चीख न सके, तो वह भनक उठा.

वेकाश समझ गया कि जेवन क्या कहना चाहता है, ‘‘मेरी पत्नी की इस हरकत से मुझे भी गहरा झटका लगा है. मैं ने उस से पूछा कि जेवन जैसे भले आदमी के साथ तुम ऐसा कैसे कर सकती हो?’’

वेकाश उठ खड़ा हुआ, ‘‘उस ने मुझे पूरा किस्सा बताया है. उस ने जो कुछ भी किया है, उसे जायज नहीं ठहराया जा सकता है. लेकिन अगर आप देख सकते कि उसे अस्पताल में हमारे छोटे से बच्चे को ले कर किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा…’’

वेकाश ने फ्रिज में से लाई हुई पानी की बोतल का ढक्कन खोला, जेवन के मुंह से कपड़ा हटाया और उसे बोतल से ही पानी पिलाया. जेवन के बंधन खोल देना अपनी पत्नी के खिलाफ जाने वाली बात हो जाती और इस वक्त वह ऐसा नहीं करना चाहता था. लेकिन जेवन को सांत्वना देने के लिए उस ने कहा, ‘‘यह बात पक्की है कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था.’’

जेवन के मस्तिष्क पर दोनों भौंहों के बीच 3 गहरी रेखाएं बन गई थीं. ये तीनों रेखाएं उस के दर्द, तनाव और चिंता की स्थिति का विवरण दे रही थीं. पानी पी कर उस ने वेकाश से कहा, ‘‘मेरी दोनों बच्चियां मेरा इंतजार कर रही होंगी.’’

वेकाश ने अनैच्छिक रूप से उसे मैत्रीपूर्ण तरीके से तर्क देते सुना तो कहा, ‘‘मैं और मेरी पत्नी इस वाकेआ को ले कर बेहद शर्मिंदा हैं. क्या ऐसा हो सकता है कि यह बात हम तीनों लोग अपने बीच ही रखें?’’

जेवन को आश्चर्य से घूरते देख वेकाश ने दलील दी, ‘‘हम दोनों किसी को भी

नहीं बताएंगे कि आप ने कितनी लापरवाही से हमारे नन्हे बच्चे की जान को जोखिम में डाल दिया है और…’’

वेकाश की बात जेवन ने बीच में ही काटते हुए कहा, ‘‘मुझे नहीं लगता है कि आप लोगों को वैसे भी इस तरह से कहना चाहिए. इस में लापरवाही का प्रश्न कहां से आ गया?’’

वेकाश को जेवन के इस कथन से आगे कठिन परिस्थिति आती दिखी, ‘‘तो फिर कैसे?’’

जेवन ने सकारात्मक पहलू प्रस्तुत किया, ‘‘अब जब आप का बच्चा ठीक हो कर घर आएगा और वह जरूर पूरी तरह से ठीक हो जाएगा तो उस की प्रतिरक्षा प्रणाली स्वाभाविक रूप से ही वायरस के खिलाफ लड़ने में सक्षम होगी. जिन लोगों को कोरोना हुआ है, वे एक बार हो जाने के बाद निर्भीक हो जाते हैं और बिंदास जीवन व्यतीत करते हैं. मैं तो कहता हूं कि वायरस के प्रति इतनी सारी चिंताएं लेने की जगह तो उन के लिए कोरोना संक्रमण एक प्रकार से लाभदायक ही रहा है.’’

वेकाश अपनी उंगलियां चटखाने लगा. उसे ऐसा लगा कि अपने सामने लेटे इस व्यक्ति की गरदन दबोच कर उस का सिर दीवार से पीट दे. अपने और अपने शिशु के बीच के गहरे संबंध को सामने वाला व्यक्ति समझने में कतई असमर्थ था. इसीलिए ऐसी असंवेदनशील बात कह रहा था. शायद निशानिका ने एकदम सही किया है.

वेकाश को सोच में पड़ता देख जेवन को अपनी भूल का एहसास हुआ, ‘‘मैं आपे से बाहर चला गया था.’’

वेकाश ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘नहीं… नहीं… शायद आप सही कह रहे हों. मेरा बच्चा तो बिलकुल ठीक हो ही जाएगा,’’ उस ने जेवन को सहारा दे कर उठाया और बगल में रखी कुरसी पर बैठाया और फिर कहा, ‘‘जो बीत गई सो बात गई?’’

जेवन के शरीर में जैसे खुशी की लहर दौड़ गई, ‘‘निश्चित रूप से.’’

वेकाश ने कमरे का दरवाजा बंद किया और बाहर आ कर निशानिका से कहा, ‘‘यह आदमी झठ बोल रहा है… मैं पूरे यकीन के साथ कह सकता हूं.’’

अंदर से जेवन की आवाज आई,

‘‘मेरा विश्वास करो. मैं किसी से कुछ नहीं कहूंगा. कृपया मुझे जाने दीजिए.’’

वेकाश ने अपनी पत्नी से कहा, ‘‘अगर अब इसे जाने दिया तो यह सीधे पुलिस के पास चला जाएगा और हमारे खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा देगा.’’

फिर से कमरे के अंदर से जेवन ने गुहार की, ‘‘समझदारी से काम लो.’’

वेकाश हाथ बांध कर निशानिका के सामने खड़ा हो गया, ‘‘अब क्या करें?’’

जेवन कमरे के अंदर कुरसी पर बैठने के बावजूद हिल नहीं पा रहा था.

बच्चे को कोरोना- भाग 2: निशानिका ने क्या कदम उठाया था

मातापिता के ऊपर गाज गिर पड़ी. निशानिका की मां ने आश्चर्य में पूछा, ‘‘लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? हम लोग तो पूरा समय बच्चे के साथ रहते हैं. हमें तो संक्रमण न था जो बच्चे को हम से हुआ हो और न ही हमें बच्चे से हुआ है.’’

नर्स का प्रत्युत्तर सुन वे हैरान रह गए, ‘‘आप लोगों ने वैक्सीन लगाई हुई है. आप ने बच्चे को वैक्सीन लगाना उचित नहीं समझ.’’

मांबाप दोनों अपनाअपना सिर पकड़ कर वहीं अस्पताल की बैंच पर बैठ गए.

नर्स ने तुरंत कहा, ‘‘आप लोगों को फौरन उन सभी व्यक्तियों को सूचित करना होगा जिन के संपर्क में यह बच्चा आया है.’’

बच्चे की आगे की जिंदगी के लिए यह कितना घातक साबित होगा, यह बात तीनों को ही पता थी. क्या उस नन्ही सी जान के फेफड़े वायरस के इस आतंकी हमले को झेल पाएंगे?

वेकाश ने नर्स से पूछा, ‘‘दवाई कौन सी दे रहे हैं?’’

नर्स ने कहा, ‘‘सिर्फ बुखार की वरना संक्रमण जब तक पूरा अपनेआप ही नहीं चला जाता तब तक जबरदस्ती दवा देते रहने से कोई लाभ नहीं है.’’

शायद यह सुन कर दोनों को थोड़ी राहत मिली कि बच्चे पर दवा की बमबारी नहीं होगी.

नर्स ने आगे कहा, ‘‘संक्रमण की प्रगति देखने के लिए बच्चे को कुछ दिनों के लिए औब्जर्वेशन में रखना पड़ेगा.’’

शाम को बुझे हुए चेहरों से जब दोनों अपने घर पहुंचे, तो निशानिका ने सभी को व्हाट्सऐप पर सूचित कर दिया कि निशांधेता को कोरोना टैस्टिंग में पौजिटिव पाया गया है. उस ने विशेष कर उन सभी मेहमानों को सूचित करना उचित समझ जो फैंसी ड्रैस पार्टी में आए थे. तुरंत सांत्वना के संदेशों की भरमार लग गई, ‘सुन कर बहुत दुख हुआ,’ ‘बड़े अफसोस की बात है,’ ‘इतने नन्हे से बच्चे को ऐसे कैसे हो गया?,’ ‘तुम लोग तो ठीक हो?’

निशानिका की मां ने सटीक टिप्पणी की, ‘‘ये सभी लोग घबरा रहे होंगे कि उन के बच्चों का क्या होगा? सभी को अपने बच्चों की टैस्टिंग कराने की पड़ी होगी. उन के लिए भी कितने झंझट की बात हो गई.’’

निशानिका ने गुमसुम हो कर कहा, ‘‘हमीं को दोष देंगे… ये लोग हमें ही भलाबुरा कहेंगे.’’

वेकाश ने रात को अपने बेटे के याद करते हुए मन ही मन प्रार्थना की मेरा बेटा जल्दी ठीक हो जाए. उसे कुछ भी न हो. वह सोच कर ही कांप उठ रहा था कि अगर उस के बच्चे का संक्रमण उतरा नहीं और वह कभी ठीक नहीं हुआ तो क्या होगा? क्या उस के पापों की सजा उस के बच्चे को मिल रही है? अपने बच्चे को मिली सजा में उसे खुद के किए हुए पाप नजर आ रहे थे. उसे इतना पसीना छूट रहा था कि समझना मुश्किल हो गया था कि यह पसीना तनाव और चिंता से निकला है या उसे भी संक्रमण का बुखार चढ़ रहा है. वैक्सीन लगाने के बाद जितना आश्वस्त उस ने अपनेआप को अब तक महसूस किया था, अब सारा कुछ धूमिल हो रहा था.

अगले दिन दोनों ने अपनेअपने काम पर जाना उचित समझ. घर पर रह कर या अस्पताल में जा कर बैठने से कोई लाभ नहीं था. बच्चे को अलग वार्ड में रखा गया था, जहां दूरदूर तक किसी की भी आवाजाही निषेध थी. निशानिका वहां पहुंची जहां उसे अपनी गिफ्टशौप खोलनी थी. दुकान छोटी नहीं थी, अंदर भी सामान रखने के लिए 2 कमरे थे. ऊपर जीना था, जिस पर सीढ़ी लगा कर चढ़ा जा सकता था. कुल मिला कर बहुत गिफ्ट आइटम्स रखे जा सकते थे. निशानिका ने आइटम मंगाने शुरू भी कर दिए थे. अपने पुश्तैनी मकान में उस के मामाजी यही व्यापार करते थे और उन्हें पता था कि राजस्थानी आर्ट, केरल की पेंटिंग्स, ओडिशा की मूर्तियां और पश्चिम बंगाल के डोकरा मुखौटे कहां से मंगाए जाते हैं. इसी ज्ञान के बल पर निशानिका ने इतनी जल्दी सबकुछ सैट कर लिया था. लेकिन अभी गिफ्टशौप शुरू करने में और वक्त था, जब तक कि पूरी दुकान सुसज्जित तरीके से सज नहीं जाती.

निशानिका अपने बेटे के बारे में सोचती हुई अपने सामान की सूची पर निशान लगा रही थी कि तभी दुकान में किसी आगंतुक के आने की आहट हुई. उस ने मुंह उठा कर दरवाजे की ओर देखा. एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति को देख कर वह चौंक उठी. व्यक्ति जानापहचाना था. फैंसी ड्रैस पार्टी में उस की मुलाकात इस व्यक्ति से हुई थी.

व्यक्ति ने कहा, ‘‘मेरा नाम जेवन है…’’

निशानिका ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘मुझे पता है. आप से और

आप की दोनों प्यारीप्यारी बच्चियों से पार्टी में मुलाकात हुई थी. आप की दोनों बच्चियों ने

ही मेरे बेटे निश का खयाल रखा था. बच्चियां कहां हैं?’’

जेवन ने दुखभरी आवाज में कहा, ‘‘अभी तक तो दोनों ऊपर के मकान में अलग रह रही थीं.’’

निशानिका को यह जान कर अचरज हुआ, ‘‘अरे, क्यों?’’

जेवन को जैसे कहने में कष्ट हो रहा हो, ‘‘रिकवरी फेज में थीं.’’

निशानिका ने सामान की सूची को टेबल पर रख दिया और अपना पूरा ध्यान जेवन के चेहरे पर केंद्रित किया, ‘‘दोनों बीमार हैं?’’

जेवन ने सहमते हुए बताया, ‘‘नहीं, अब नहीं. अब ठीक हो गई हैं. लेकिन दोनों को कोरोना था.’’

निशानिका के होश उड़ गए.

जेवन ने ग्लानिपूर्ण शब्दों में कहा, ‘‘1 हफ्ता पहले पार्टी के समय दोनों कोरोना संक्रमित हो चुकी थीं. लेकिन हलका संक्रमण होने से कोई लक्षण नहीं दिखा. पार्टी के बाद जब हमें पता चला तो डाक्टर की सलाह पर दोनों को घर पर ही क्वारंटाइन किया. अस्पताल ले जाने की जरूरत नहीं पड़ी.’’

निशानिका चुपचाप खड़ी सुनती रही.

जेवन मानो निशानिका की पीड़ा समझ गया हो. उस ने अफसोस जाहिर करते हुए कहा, ‘‘जब मुझे पता चला कि आप का बेटा संक्रमित हुआ है, तो मुझे बेहद दुख हुआ. मेरी बच्चियों की वजह से ही वह वायरस से संक्रमित हो गया.’’

निशानिका के पेट में अजीब सी लहरों का उत्थान होने लगा. उसे पता ही नहीं चला कि कब और क्यों उस ने जेवन से पूछ लिया, ‘‘दोनों बच्चियां कोरोना संक्रमित थीं?’’

जेवन ने निशानिका को तकलीफ में देखा तो विषादपूर्ण हो कर उसे सूचित किया, ‘‘व्हाट्सऐप पर लिख कर बताने के बजाय मैं ने व्यक्तिगत रूप से आ कर बात करना दुरुस्त समझ. इसीलिए शांतलू और उस की पत्नी से आप की दुकान का पता लिया. वेकाश तो अपने काम पर गया होगा,’’ एक क्षण और रुक कर उस ने खेद व्यक्त किया, ‘‘घर पर भी नहीं, सीधे अस्पताल में इतने छोटे से बच्चे को भरती कर दिया… मैं तो अवाक ही रह गया था…’’

निशानिका हक्काबक्का हो कर यहांवहां ताकने लगी. उस से जेवन से नजरें मिलाते न बना.

जेवन ने उसे अपने से दूर होते देख कर जैसे फरियाद की, ‘‘मेरी दोनों बच्चियां छोटी हैं. वे भी नाजुक हैं. फूल सी हैं. आशा है कि आप इस प्रकरण को ले कर उन दोनों के खिलाफ नहीं हो जाएंगे.’’

निशानिका के दिमाग में पता नहीं कौन सी बातें घूम रही थीं कि एकाएक ही उस ने पूछ लिया, ‘‘आप ने दोनों का वैक्सीनेशन नहीं करवाया था क्या?’’

जेवन ने तत्परता से इस का जवाब दिया, ‘‘मैं बच्चों को ऐसे जहरीले इंजैक्शन लगाने में विश्वास नहीं करता हूं जिन की उन्हें कोई आवश्यकता नहीं है. जिन चीजों से लड़ने के लिए उन के शरीर को बनाया गया है, उस के लिए बाहरी रसायनों को जबरदस्ती शरीर में डालने की क्या तुक है? लेकिन जिस को लगवाना है, वे जा कर भले लगवाए.’’

निशानिका नीचे एक बड़े भारी बक्से पर बैठ गई जैसे अभी चक्कर खा कर गिर जाएगी. उस की ऐसी अवस्था देख कर जेवन भी डर गया. शायद वह यह सोच कर आया था कि निशानिका को वह अच्छे से समझ लेगा या फिर उस के पति का सामना करने में उसे भय महसूस हुआ हो, इसलिए पत्नी की गिफ्टशौप पर चला आया.

जेवन वापस जाने लगा. जाने से पहले उस ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘उम्मीद है कि आप का बच्चा भी मेरी बच्चियों की तरह जल्द ही वापस स्वस्थ हो जाएगा.’’

निशानिका के हाथ में कब बक्से में रखी पीतल की बनी मूर्ति आ गई, उसे पता ही न चला और न ही अपने मुंह से निकले हुए ये शब्द, ‘‘जेवनजी…’’

अपना नाम सुन कर जेवन पीछे पलटा.

बच्चे को कोरोना- भाग 1: निशानिका ने क्या कदम उठाया था

जब निशानिका दंपती ने पार्टी में प्रवेश किया, तो पार्टी के मेजबान शांतलू ने खुशी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘समय से पहले ही आ गए तुम लोग.’’

निशानिका ने अनायास कहने की कोशिश की, ‘‘हम लोगों ने सोचा कि …’’

शांतलू ने उसे बीच में ही काट दिया, ‘‘ठीक है, कोई बात नहीं. बिलकुल सही किया तुम ने. सभी दोस्त मदद करने में लगे हैं.’’

पार्टी शांतलू के घर के पिछवाड़े के आंगन में थी, जो बहुत बड़ा था. घर से आंगन में प्रवेश करने के दरवाजे पर नीले रंग के गुब्बारों का झंड लगा था. ऐसे ही नीले रंग के गुब्बारों के सैट

2-3 और जगहों पर लगे थे. बच्चों के खेलने के लिए कृत्रिम फिसल पट्टी रखी हुई थी. शांतलू के 2 दोस्त स्टेज बना रहे थे, जिन पर उन्होंने माइक्रोफोन रखने का इंतजाम किया था. शायद कोई गीत गाएगा या फिर पार्टी में तरहतरह की घोषणाएं की जाएंगी. बीचबीच में प्लास्टिक की मेजें और कुरसियां रखी हुई थीं. एक जगह पर भोजन की बडी टेबल व्यवस्थित की जा रही थी. पानी का बड़ा पारदर्शी कनस्तर इस टेबल के एक कोने पर रखा था.

शांतलू का एक मित्र, जेवन अपनी एक बच्ची के बाल ठीक कर रहा था. उस की दूसरी बच्ची आंगन में टेबलों के चारों ओर दौड़दौड़ कर चक्कर लगा रही थी. इक्कादुक्का और बच्चे दिख रहे थे. वे शायद स्टेज सजाने वाले मित्रों के बच्चे थे.

शांतलू स्वयं डैकोरेशन की ?िल्लियां लगा रहा था. उस ने ?िल्लियों को नीचे रखते हुए वेकाश सुमेरा से कहा, ‘‘अब वेकाश आ ही गया है तो वही इन ?िल्लियों को लगाएगा.’’

निशानिका ने एक क्षण के लिए अपने पति वेकाश को देखा, फिर अपने साथ लाए बड़े टिफिन को उठा कर दिखाते हुए शांतलू से कहा, ‘‘मैं इस टिफिन को अंदर किचन में रख कर आती हूं.’’

निशानिका के घर के अंदर जाने के बाद शांतलू ने स्टेज सजाते हुए अपने मित्रों को जोर से आवाज दी, ‘‘देखो कौन आया है.’’

स्टेज की व्यवस्था करते रोमकेश और भार्तेंदभ ने दूर से ही हाथ हिलाते हुए वेकाश का स्वागत किया और वहीं से चिल्लाते हुए कहा, ‘‘आज पार्टी में बहुत मजा आएगा.’’

वेकाश ने अपने हाथ में अपने साथ लाए गिफ्ट के बक्से को उन्हें दिखाते हुए जवाब दिया, ‘‘बिलकुल.’’

घर के अंदर शांतलू की पत्नी ने निशानिका का स्वागत किया, ‘‘अच्छा हो गया जो तुम लोग थोड़ा जल्दी आ गए. छुटका कहां है?’’

निशानिका ने थके हुए स्वर में कहा, ‘‘पहले तो मैं ने सोचा कि अपनी मां को ही बुला लेती हूं कि घर पर निशांधेता का ध्यान रखे. फिर सोचा कि पार्टी में उस को मजा आएगा, इसलिए ले कर आ गई.’’

निशांधेता का जन्म हुए कुछ ही महीने हुए थे. लेकिन उस के लिए नर्म गद्दों वाली ट्रौली आ चुकी थी, जिस के अंदर रह कर अपनी बोतल चूसते हुए मजे से बाहरी संसार को अपने अंदर ग्रहण करने की उस ने शुरुआत कर दी थी.

शांतलू की पत्नी ने चिंता व्यक्त करते हुए निशानिका से उस की मां के बारे में पूछा, ‘‘माताजी की तबीयत कैसी है? दवा दी जा रही थी उन को?’’

निशानिका ने दुखी स्वर में जवाब दिया, ‘‘बहुत भुगतना पड़ रहा है उस को. लेकिन अभी तो ठीक है. मैं भी अपनी छोटी सी गिफ्ट शौप खोलने के चक्कर में हूं.’’

शांतलू की पत्नी ने घड़ी देखते हुए कहा, ‘‘जल्द ही सभी लोग आने शुरू हो जाएंगे. मुझे बच्चों को फैंसी ड्रैस पहनानी है,’’ और फिर हड़बड़ी में बच्चों को पोशाक पहनाने निकल गई.

बाहर आंगन में वेकाश ?िल्लियां लगाते हुए अपने चारों ओर महिमामंडित उत्पादकता को निहार रहा था. इस शहर के अमीरों के घरों में बच्चों की फैंसी ड्रैस पार्टी ऐसी विलासिता के साथ होती है, इस बात का उसे पता नहीं था.

कुछ ही महीने हुए थे उसे और निशानिका को इस शहर में आए हुए. निशांधेता का जन्म इसी शहर में हुआ था. 2 नई शुरुआतें एकसाथ, नया शहर, नया रूप, पिता का रूप. नई प्रकार की जिम्मेदारियां. जब बच्चे का जन्म हुआ था, तो निशानिका ने बहुत जोर किया कि बच्चे का नाम उन दोनों के नाम को मिला कर ‘निशाकाश’ रखा जाए. उस ने दलील भी दी कि चूंकि निशा का अर्थ ‘रात्रि’ होता है, इसीलिए ‘निशाकाश’ का अर्थ हो जाएगा ‘रात्रि का आकाश’ जो बच्चे के लिए बेहद उपयुक्त साबित होगा क्योंकि उस का जन्म भी रात के 9 बजे हुआ था. लेकिन वेकाश दृश्य था कि ‘निशा’ नाम से स्त्रीलिंग का बोध होता है, अत: ‘निशांधेता’ अधिक उपयुक्त होगा. वेकाश हिंदी साहित्य का विशेषग्य नहीं था अन्यथा उसे पता होता कि ‘अंधेता’ का अंधे होने से संबंध है.

आज निशांधेता अपनी घूमने वाली घुमक्कड़ गाड़ी में फैंसी ड्रैस पहने हुए किलकारियां मारते हुए डोल रहा था. जेवन अपनी एक बच्ची के बाल ठीक कर, टेबल पर रखा जूस पी रहा था

कि आंगन में बेतहाशा दौड़ती हुई पीले रंग की ड्रैस पहने, चश्मा लगाए उस की दूसरी बच्ची तेज गति से चिल्लाते हुए उस के पास आ पहुंची, ‘‘पापा… पापा…’’

जेवन ने अपना जूस का गिलास वापस रख दिया और अपनी दूसरी बच्ची को वेकाश की घुमक्कड़ गाड़ी की तरफ इशारा कर के कहा, ‘‘इस का नाम निशांधेता है. इस के साथ खेलो.’’

निशानिका ने घर के अंदर से ही अपने पति को आवाज दी, ‘‘वेकाश, एक मिनट सुनो.’’

वेकाश ने अपने नन्हे को देखा तो जेवन ने उस से कहा, ‘‘तुम जाओ अंदर. मैं इस को देख लूंगा.’’

वेकाश ने जेवन को धन्यवाद दिया और

घर के अंदर चला गया. जेवन ने निशांधेता को अपनी बच्चियों को सौंप दिया कि उस के साथ खेलें और उस का मन बहलाएं. बच्चियां और खुश हो गईं. उन्हें खेलने के लिए एक और खिलौना मिल गया. वे दोनों आपस में निर्णय लेने लगीं कि सब से पहले कौन सा गीत निशांधेता को सुनाना चाहिए.

कुछ दिनों के बाद जब वेकाश अपने काम पर था तो दोपहर करीब 12 बजे अचानक उस का मोबाइल बजा. दूसरी ओर से बिलखती हुई आवाज में निशानिका ने कहा, ‘‘मैं अस्पताल में हूं. निश को बुखार आ रहा था, इसलिए ले कर आई थी. लेकिन अब वे लोग कोरोना टैस्ट कराने को कह रहे हैं.’’

वेकाश के पैरों तले की जमीन खिसक गई. वह दौड़ादौड़ा अस्पताल पहुंचा, जहां उसे अपने पूरे बदन को ढकने के लिए प्लास्टिक के रेनकोट की तरह का आवरण दिया गया. निशानिका भी उसी तरह के आवरण में थी. अपनी पूरी जिंदगी में इस तरह का डर वेकाश ने कभी महसूस नहीं किया था जैसा इस वक्त उसे लग रहा था.

निशानिका की मां भी मौजूद थी और नर्स से कह रही थी, ‘‘अब तो बहुत समय हो गया बच्चे को ले गए हुए. इतनी देर क्यों लग रही है?’’

नर्स ने शांति से उत्तर दिया, ‘‘आजकल तुरंत टैस्टिंग हो जाती है. बस अभी आते ही होंगे.’’

नर्स का इतना कहना ही था कि उस का मोबाइल बजा और टैस्टिंग के स्थान से किसी ने उसे स्थिति से अवगत कराया. नर्स ने धैर्यपूर्वक सुना और बच्चे के मातापिता को जानकारी दी, ‘‘टैस्टिंग हो गई है और खून जांच का भी प्रारंभिक विश्लेषण हो चुका है.’’

निशानिका ने डर और आतुरता के मिश्रण से पूछा, ‘‘क्या नतीजा निकला है?’’

नर्स ने चिंतित स्वर में बताया, ‘‘ऐसा लगता है कि करीब 1 हफ्ता पहले इन्फैक्शन हुआ है.’’

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