माफी- भाग 3: क्या परिवार ने स्वीकार की राजीव-वंदना की शादी

सरला और सविता ने फौरन उन्हें शांत किया. वंदना ने खामोशी की चादर ओढ़ ली.

‘‘राजीव के मन में जो अपराधबोध का भाव बैठ गया है, उसे जल्दी से हटाना बेहद जरूरी है, जीजाजी. उस की उदासी की जड़े गहरी हो कर उस के व्यक्तित्व को बिगाड़ती जा रही है,’’ सविता ने चिंतित लहजे में अपनी राय प्रकट करी.

‘‘तुम्ही सलाह दो कि  हम क्या करें,’’ सरला ने अपनी छोटी बहन की तरफ आशा भरी नजरों से देखा.

‘‘मेरे खयाल से हमें राजीव और उस के मातापिता को आज शाम को यहां खाने पर आमंत्रित करना चाहिए. पार्टी के माहौल में आप दोनों उस के मन की परेशानी जरूर दूर कर सकेंगे.’’

‘‘हां, यह ठीक सलाह दी है, तुम ने,’’ राजेंद्रजी ने सविता के प्रस्ताव को फौरन मंजूरी

दे दी.

किसी से कुछ भी कहे बिना वंदना वहां से उठ कर अपने कमरे में चली गई.

उस के ऐसा करने से घर का माहौल कुछ भारी ही बना रहा.

राजेंद्रजी ने फोन पर कैलाशजी को सपरिवार अपने घर रात का खाना खाने का निमंत्रण दे दिया. उन की आवाज में राजीव को ले कर व्याप्त चिंता व दुख को राजेंद्रजी ने साफ महसूस किया.

राजेंद्र, मीना और राजीव रात 8 बजे के करीब उन के घर आ गए. राजीव का मुरझाया चेहरा किसी की आंखों से छिपा नहीं रहा.

राजेंद्रजी के सामने आ कर राजीव कुछ कहता, उस से पहले ही उन्होंने उस से कहा, ‘‘बरखुरदार, तुम आज ‘माफी’ शब्द को अपनी जबान पर लाओगे ही नहीं. मेरा मन बिलकुल साफ है. तुम मुझे उस दिन की सारी घटना सदा के लिए भूल जाने का आश्वासन दो, तो यह मेरे लिए सब से अच्छा उपहार होगा.’’

राजीव ने उन की बात का कोई जवाब देने के बजाय झक कर उन के पैर छू लिए. राजेंद्रजी ने भावुक हो कर उसे गले से लगाया, तो वंदना को छोड़ वहां उपस्थित तीनों महिलाओं की पलकें गीली हो उठीं.

‘‘आज खूब हंसतेमुसकराते हुए पार्टी का आनंद लो, राजीव,’’ सरला ने पास आ कर उस की पीठ को प्यार से थपथपाया.

‘‘जब वंदना मुझ से हंस कर नहीं बोलती है, तो मैं वैसा कैसे कर सकूंगा?’’ राजीव ने तनावग्रस्त लहजे में वंदना की तरफ देखते हुए सवाल पूछा.

सब की नजरों का केंद्र एकाएक वंदना

बन गई. उस ने खामोश रहते हुए अपनी नजरें झका लीं.

‘‘तुम वंदना की तरफ ध्यान ही मत दो, राजीव,’’ सविता ने उसे मुसकराते हुए सलाह दी.

‘‘मैं उस का दोस्त बने रहना चाहता हूं, आंटी.’’

‘‘वह धीरेधीरे सहज हो जाएगी, राजीव.’’

‘‘वह मुझे शायद कभी माफ नहीं करेगी, आंटी,’’ राजीव भावुक हो उठा.

‘‘क्या यह तुम्हारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है कि वह तुम्हें माफ करें?’’

‘‘वह मुझे माफ  करेगी, तभी तो मैं खुद को माफ कर पाऊंगा आंटी.’’

सविता ने वंदना की तरफ घूम कर कहा, ‘‘वंदना, तुम इसे दिल से माफ कर दो.’’

वंदना ने न अपनी खामोशी भंग करी और न ही नजरें उठाई.

‘‘यह मामला तो पेचीदा हो गया है, पर इस का एक हल मेरी समझ में आ रहा है,’’ सविता एकाएक गंभीर हो गई.

‘‘वह हल क्या है?’’ अपने बेटे के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति चिंतित मीना ने फौरन उत्सुकता जाहिर करी.

‘‘जीजाजी, सरला दीदी, क्या आप दोनों राजीव को अब नेकदिल इंसान मानते हो?’’ मीना को जवाब न दे कर सविता अपनी दीदी व जीजाजी की तरफ घूमी.

‘‘हां,’’ उन दोनों ने एक साथ जवाब दिया.

‘‘और आप दोनों राजीव को हंसीखुशी से भरा देखने के इच्छुक हैं न?’’ वह फिर मीना व कैलाशजी की तरफ घूमी.

‘‘अपने बेटे की हंसीखुशी से ज्यादा हमारे लिए कुछ भी महत्त्वपूर्ण नहीं है,’’ कैलाशजी ने भावुक हो कर जवाब दिया.

‘‘और राजीव की हंसीखुशी अब वंदना के हाथों में है. मुझे लगता है कि अगर हम इन दोनों को दोस्ती से कहीं ज्यादा मजबूत रिश्ते में बांध दें, तो सारी समस्या का समाधान खुदबखुद हो जाएगा.’’

सविता का इशारा किस तरफ है, इसे समझने में किसी को भी ज्यादा समय नहीं लगा.

‘‘मैं वंदना को अपनी बहू बनाने को बिलकुल तैयार हूं. सारी समस्या का इस से बढि़या समाधान हो ही नहीं सकता है,’’ मीना की ममता ने अपने बेटे की खुशियों की खातिर इस निर्णय पर पहुंचने में कैलाशजी से कोई सहायता नहीं ली.

कैलाशजी ने अपने बेटे राजीव को पिछले कई हफ्तों में पहली बार खुशी से मुसकराते देखा, तो वे भी खुश हो उठे.

‘‘आप के घर से रिश्ता जोड़ कर हमें बेहद प्रसन्नता होगी,’’ कैलाशजी ने आगे बढ़ कर राजेंद्रजी के कंधों पर दोस्ताना अंदाज में हाथ रखा.

‘‘भाई साहब, मैं दहेज में ज्यादा…’’

‘‘हमें दहेज नहीं अपने बेटे का अच्छा स्वास्थ्य व खुशियां चाहिए,’’ कैलाशजी ने उन के मुंह पर हाथ रख कर उन्हें खामोश कर दिया.

‘‘हम छोटी जाति के…’’ सरला को आगे बोलने से मीना ने रोका और अपने गले से लगा लिया.

‘‘राजीव की ‘हां’ तो उस की मुसकराहट से ही जाहिर हो रही थी. वंदना, अब तुम भी अपना जवाब सुना दो,’’ सविता की इस पेशकश ने वंदना को फिर से सब की नजरों का केंद्र बना दिया.

वंदना धीरेधीरे चल कर सविता के पास आईर् और उन के कान में बेहद धीमे

से फुसफुसा कर बोली, ‘‘मेरी प्यारी मौसी, बधाई. आप का मार्गदर्शन पा कर मैं अपना मनपसंद जीवनसाथी पा गई हूं. माना कि राजीव ने उदास दिखने का बढि़या अभिनय लंबे समय तक किया, पर सारी योजना तो आप की ही थी. दहेज व जातपांत के झंझट से बचा कर हमारी शादी पक्की कराने के लिए आप का फिर से धन्यवाद.’’

अपनी मौसी का गाल चूम कर वंदना अपने कमरे में भाग गई.

‘‘वह कह रही है कि अगर भविष्य में कभी ‘माफी’ न मांगने का वादा राजीव करे, तो वह इस शादी को हां करती है,’’ सविता की इस बात पर सब का सम्मिलित ठहाका ड्राइंगरूम में गूंज उठा और सब एकदूसरे को नए रिश्ते में बंधने की शुभकामनाएं देने लगे.

यह राज तो बाद में कई महीनों बाद खुला कि न राजीव के पिता तैयार होते कि यादव घर में शादी हो, न वंदना के मातापिता की हिम्मत होती कि वे उस घर में संबंध मांगने जाए जहां उन की बिरादरी को कम समझ जाता हो. वंदना के पिता हैड मास्टर ही थे पर वे अपने छात्रों में बेहद लोकप्रिय थे और उन से पढ़े बच्चे अब आईएएस, एमबीए, सीईओ बन गए थे. सब ने तय कर रखा था कि राजेंद्रजी के रिटायर होते ही एक बड़ा कोचिंग सैंटर खोला जाएगा जिस की सारे देश में ब्रांचें होंगी.

वंदना जानती थी कि उस के पिता के गुण क्या है और वह नहीं चाहती थी कि राजीव के पिता कभी उन्हें हीन समझें. तभी तो उन की मौसी की बात से बात बनी.                     द्य

माफी- भाग 2: क्या परिवार ने स्वीकार की राजीव-वंदना की शादी

राजीव को समझनेबुझने का एक नया दौर फिर से शुरू हुआ. वे सब की बातें सिर झका कर सुनता रहा, पर उदासी का कुहरा उस के चेहरे पर से आखिर तक नहीं हटा.

अचानक कार से निकल कर राजीव ने नए कुरतेपजामे का जोड़ा राजेंद्रजी के हाथों में पकड़ाते हुए सुस्त लहजे में कहा, ‘‘सर, आप ने इसे स्वीकार नहीं किया तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर सकूंगा.’’

‘‘इस की कोई जरूरत नहीं है, बेटा. माफी तो मैं ने तुम्हें वैसे ही दे दी है,’’ राजेंद्र जी को

यों उपहार स्वीकार करना बड़ा अटपटा सा लग रहा था.

उन का जवाब सुन कर राजीव का चेहरा एकदम से बुझ गया. तब सरला ने हस्तक्षेप कर के कुरतेपजामे का सैट अपने पति के हाथ में जबरदस्ती पकड़ा कर उन्हें राजीव का उपहार स्वीकार करने को बाध्य कर दिया.

विदा होने तक राजीव के चेहरे पर किसी तरह की मुसकान नहीं उभरी थी. वह बुझबुझ सा ही चला गया. कैलाश और मीना की आंखों में चिंता के भावों को बरकरार देख कर राजेंद्रजी व सरला का मन भी बेचैनी व तनाव का शिकार बने रहे.

राजेंद्रजी ने वंदना के कमरे में जाकर उसे भी समझया, ‘‘गलती इंसान से हो जाती है, बेटी. मेरे अनुमान के विपरीत यह राजीव भावुक और संवेदनशील इंसान निकला है. उस के मन को और दुखी करना ठीक नहीं है. तुम भी उस के साथ अपना व्यवहार सहज व सामान्य कर ले. उस का डिप्रैशन से जल्दी निकलना बेहद जरूरी है,’’ राजेंद्रजी की आवाज में चिंता के भाव साफ झलक रहे थे.

‘‘मैं उस से जबरदस्ती बात कभी नहीं करूंगी. उस की बदतमीजी के लिए मैं उसे कभी माफ करने वाली नहीं हूं,’’ वंदना को गुस्सा अपनी जगह कायम रहा.

‘‘इतना ज्यादा गुस्सा करना ठीक  नहीं है, बिटिया रानी. वह मेरा कुसूरवार था. अब मैं ने उसे माफ कर दिया है, तो तुम भी उस के साथ सहज व्यवहार करो.’’

‘‘यह मुझ से नहीं होगा, पापा.’’

‘‘बेटी, वह दिल का बुरा नहीं निकला. मुझे नया कुरतापजामा भी गिफ्ट कर गया है. अपनी जिद पर अड़ी रह कर तुम उस के दिल को और तकलीफ मत पहुंचाओ.’’

‘‘मुझे उस के दिल की तकलीफ की चिंता नहीं है, पापा.’’

वंदना का रूखा जवाब सुन कर राजेंद्रजी को गुस्सा आ गया. बेटी को समझने की बात भूल कर वो उसे डांटनेडपटने लगे.

वंदना जवाब में खामोश रही, पर उस का मुंह नाराजगी से सूज गया. राजीव को माफी देने का मामला इन के घर का माहौल तनावग्रस्त कर गया था.

राजीव अभी भी उदास और गुमसुम बना हुआ है, 2 दिन बाद कैलाशजी से फोन पर यह खबर सुन कर राजेंद्रजी परेशान हो उठे. इस विषय पर उन्होंने सरला से देर तक बातें कीं. उन दोनों की सहानुभूति अब राजीव व उस के मातापिता के साथ थी. सारे मामले की खलनायिका उन्हें अपनी बेटी प्रतीत हो रही थी जिस ने राजीव के साथ सीधे मुंह वार्त्तालाप करना अभी भी आरंभ नहीं किया था.

राजीव की उदास हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है, इस की खबर इन दोनों को योगेश साहब के द्वारा आगामी रविवार को मालूम पड़ी. वे राजीव और वंदना के बौस थे.

‘‘राजेंद्रजी, वंदना मेरी तो सुनती नहीं है… अब आप ही उसे समझइए कि वह राजीव से ठीक तरह से पेश आने लगे. बातबात पर उसे ताने देना… उसे बेइज्जत करना वंदना के लिए ठीक नहीं है,’’ योगेश साहब ने पिता से बेटी की शिकायत करी.

‘‘इस विषय पर मैं उसे कई बार डांट चुका हूं… कपूर साहब. पता नहीं क्यों वह सारी बात भूलने को तैयार नहीं है?’’ राजेंद्रजी परेशान हो उठे.

‘‘क्या आपने राजीव को माफ कर दिया

है, सर?’’

‘‘बिलकुल कर दिया है,  योगेश साहब.’’

‘‘दिल से?’’

‘‘जी, हां.’’

‘‘लेकिन न राजीव आप के माफ कर देने से संतुष्ट है, न वंदना. राजीव अपने को अब भी गुनहगार मानता है और वंदना उसे इस बात को भूलने नहीं देती.’’

‘‘राजीव अच्छा, समझदार और अपने काम में कुशल आदमी होता था. उस की अगली प्रमोशन का समय बिलकुल सिर पर आ पहुंचा है और वह है कि सारा दिल खोयाखोया सा रहता है. मैं उस की मनोदशा को ले कर सचमुच बेहद चिंतित हूं.’’

‘‘मैं वंदना को फिर से समझऊगा,’’ राजेंद्रजी ने योगेश साहब को आश्वासन दिया.

‘‘ये दोनों बड़े अच्छे दोस्त होते थे. अब वंदना उसे झिड़कती रहती है. दोनों की दोस्ती को किसी की नजर लग गई,’’ योगेश साहब का यह वाक्य राजेंद्र जी को बाद में भी बारबार याद आता रहा. उन्हें हैरानी इस बात की थी कि वंदना ने कभी पहले राजीव से अपनी अच्छी दोस्ती की चर्चा घर में नहीं करी थी.

‘‘कहीं राजीव और वंदना जरूरत से ज्यादा गहरे दोस्त तो नहीं थे? मेरा मतलब तुम समझ रही हो न?’’ रात को सोते समय राजेंद्रजी ने अपने मन की चिंता सरला से कही.

‘‘मुझे नहीं लगता उन के बीच प्रेम का कोई चक्कर चल रहा होगा. राजीव अमीर खानदान का बेटा है. वे लोग ब्राह्मण हैं और हम यादव. एक स्कूल हैंडमास्टर की बेटी में राजीव की क्यों दिलचस्पी होगी?’’ सरला की इस दलील ने राजेंद्रजी के मन में बनी बेचैनी को बड़ी हद तक शांत कर दिया.

अगले रविवार की सुबह वंदना की सविता  मौसी उन के घर आ पहुंची. उन के

हाथ में खूबसूरत गुलदस्ता देख इन तीनों को याद आया कि आज राजेंद्रजी और सरला की शादी की 26वीं सालगिरह है.

‘‘साली साहिबा, अब तक तो तुम आज के दिन कभी गुलदस्ता नहीं लाई थीं. आज क्या खास बात है जो इतना सुंदर गुलदस्ता भेंट कर रही हो?’’ राजेंद्रजी ने अपने साली को छेड़ते हुए सवाल पूछा.

‘‘जीजाजी, मैं तो इस बार भी आप के लिए स्वैटर ही लाई हूं. ये फूल तो राजीव ने भेजें हैं,’’ सविता ने रहस्यमयी अंदाज में मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘राजीव ने?’’ राजेंद्रजी चौंके, ‘‘तुम उसे कैसे जानती हो?’’

‘‘वह हमारी कालोनी में ही तो रहता है, जीजाजी.’’

‘‘अच्छा. पर तुम ने कभी जिक्र तो नहीं किया उस का?’’

‘‘उस का मौका ही नहीं पड़ा. अच्छा, यह बताइए कि आप उसे माफ क्यों नहीं कर देते हो? वह अपनी गलती मान तो चुका है जीजाजी.’’

राजेंद्रजी ने अपने माथे पर हाथ मारते हुए कहा, ‘‘अरे, मैं अपने उस चाचा को सैकड़ों बार माफ कर चुका हूं, अब कैसे समझऊं मैं उसे यह बात?’’

‘‘वह बेचारा बड़ा दुखी नजर आ रहा था. वंदना तुम उस से सीधे मुंह बात क्यों नहीं करती हो?’’ सविता ने उसे प्यार भरे गुस्से से घूरा.

‘‘मौसी, मैं तो उस से बात ही नहीं करती हूं,’’ वंदना ने मुंह बना कर

जवाब दिया.

‘‘मुझे अब राजीव से नहीं बल्कि अपनी बेटी से कहीं

ज्यादा शिकायत है. यहउस से कहीं ज्यादा बड़ी बदतमीज साबित हो रही है,’’ राजेंद्रजी को एकदम गुस्सा आ गया.

माफी- भाग 1: क्या परिवार ने स्वीकार की राजीव-वंदना की शादी

जब वंदना 5 मिनट पहले ब्रैडअंडे खरीदने दुकान में घुसी थी, तब उस के पिता राजेंद्रजी फुटपाथ पर अकेले खड़े थे. अब वह बाहर आईर् तो देखा उन के इर्दगिर्द 15-20 आदमियों की भीड़ इकट्ठी थी.

अपने पिता की ऊंची, गुस्से से भरी आवाज सुन कर उस ने समझ लिया कि वे किसी से झगड़ रहे हैं.

‘‘अंधा… बेवकूफ… गधा… इडियट… रास्कल…’’ राजेंद्रजी के मुंह से निकले ऐसे कई शब्द वंदना के कानों में पड़ गए थे.

उन से उलझ हुआ युवक मोटरसाइकिल पर बैठा था. वी हर वाक्य के बाद राजेंद्रजी के लिए बुड्ढे बुढ़ऊ और सठिया गया इंसान जैसे विशेषणों का प्रयोग कर उन के गुस्से को बारबार भड़का रहा था.

अपने पिता के सफेद कुरतेपजामे पर

कीचड़ के निशानों को देख वंदना झगड़े का कारण फौरन समझ गई, ‘‘राजीव,’’ वंदना ने मोटरसाइकिल पर बैठे युवक को पहचान कर जोर से डांटा, ‘‘इतनी बदतमीजी से बात करते हुए तुम्हें शर्म आनी चाहिए.’’

राजीव ने चौंक कर उस की तरफ देखा. एक सुंदर युवती को झगड़े में

हिस्सेदार बनते देख भीड़ की दिलचस्पी और ज्यादा बढ़ गई.

‘‘वंदना, तुम्हें इन के मुंह से निकलने वाली गालियों को भी सुनना चाहिए,’’ राजीव ने उत्तेजित लहजे में सफाई दी, ‘‘अरे, बारिश का मौसम है तो छींटें पड़ सकते हैं. ये बुढ़ऊ न हो कर कम उम्र के होते तो अब तक मैं ने इन के दांत तोड़ कर इन के हाथ में…’’

‘‘तुम जिन के दांत तोड़ने की बात कर रहे हो, वे मेरे पिता हैं.’’

‘‘अरे, नहीं,’’ राजीव का मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया.

‘‘मैं ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि तुम एक बुजुर्ग इंसान से इतनी गंदी तरह से बोल सकते हो.’’

‘‘सर, मुझे माफ कर दीजिए. गुस्से में मैं ने जो गलत शब्द…’’

‘‘माफी और तुम जैसे घटिया, बदतमीज इंसान को. कभी नहीं.’’ राजेंद्रजी ने गुस्से से लाल हो कर अपना फैसला सुना दिया.

‘‘सर, आप ने भी मुझे खूब डांटा है और अपशब्द…’’

‘‘मुझे तुम से एक शब्द भी नहीं बोलना है. तुम इस नालायक इंसान को कैसे जानती हो, बेटी?’’ राजेंद्रजी ने वंदना से पूछा.

‘‘पापा, ये मेरे साथ औफिस में काम करते हैं.’’

‘‘तुम इस बदमाश से अब कोई संबंध

नहीं रखोगी.’’

‘‘राजीव, तुम ने मेरे पापा के लिए जो अपशब्द मुंह से निकाले हैं, उन के लिए मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगी,’’ कह वंदना अपने पिता का हाथ थाम कर वहां से चलने लगी.

‘‘वंदना, मैं माफी मांग तो रह हूं,’’ राजीव अब परेशान व घबराया सा नजर आ रहा था.

‘‘मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगी,’’ वंदना मुंह फेर कर चल दी.

‘‘मैं तो चाहता हूं कि तुम्हारे जैसे बदतमीज इंसान का मुंह काला कर उसे सड़कों पर घुमाया जाए,’’ कह राजीव को कुछ पल गुस्से से घूरने के बाद राजेंद्रजी अपनी बेटी के साथ चल पड़े.

राजीव के मोटरसाइकिल स्टार्ट करते ही भीड़ ने छंटना शुरू कर दिया. घटनास्थल से विदा होते समय वह काफी गंभीर नजर आ रहा था.

राजेंद्रजी ने घर पहुंचते ही अपनी पत्नी सरला को सारी घटना का ब्योरा सुनाया. शाम को पार्क में घूमते हुए अपने हमउम्र दोस्तों से सारी बात कही. आज के युवावर्ग के गलत व्यवहार को ले कर दोनों जगह उन्होंने अपने मन की कड़वाहट खूब निकाली.

‘‘पापा, उस की मुझ से बात करने की हिम्मत नहीं होती है औफिस में. जो मेरे पापा की बेइज्जती करे, मैं उस की शक्ल भी देखना पसंद नहीं करूंगी,’’ वंदना के मुंह से यह बात 2 दिन बाद सुन कर राजेंद्रजी के मन को बड़ा चैन मिला.

उन का राजीव से झगड़ा रविवार के दिन हुआ था. अगले रविवार तक वे सारी बात को लगभग भूल चुके थे, लेकिन राजीव के मातापिता को अचानक अपने घर आया देख उन के मन में पूरी घटना की याद फिर से ताजा हो गई.

अपने यों अचानक आने का मकसद राजीव की मां मीना ने आंखों में आंसू भर कर उन तीनों के सामने बयां किया.

‘‘भाई साहब, राजीव सप्ताह भर से न ठीक से खा रहा है, न सो रहा है, ढंग से हंसनाबोलना पूरी तरह से भूल गया है. उस का उदास, मुरझया चेहरा हम से देखा नहीं जाता. बड़ा गहरा सदमा लगा है उसे,’’ अपने बेटे की दयनीय हालत बयां करते हुए मीना की आंखों से आंसू बह निकले.

‘‘आप की बातों पर विश्वास करना कठिन लग रहा है मुझे,’’ राजेंद्रजी हैरानपरेशान नजर आने लगे, ‘‘बुरा मत मानिएगा पर मुझे आप का बेटा संवेदनशील इंसान नहीं लगा था. उस ने बड़े गंदे ढंग से मुझ से बात करी थी.’’

‘‘राजेंद्रजी, वह सचमुच अपने व्यवहार के लिए बेहद शर्मिंदा और दुखी है. प्लीज, आप हम पर तरस खाइए और उसे माफ कर दीजिए,’’ राजीव के पिता कैलाशजी ने भावुक अंदाज में हाथ जोड़ कर कहा.

राजेंद्रजी ने फौरन कहा, ‘‘भाई साहब, आप यों दुखी न हों. बात इतनी बड़ी भी नहीं है कि माफी न दी जा सके. मेरा गुस्सा तो कभी का जा चुका है. आप राजीव को कहिएगा कि मैं ने उसे दिल से माफ कर दिया है.’’

‘‘वह बाहर कार में बैठा है. अंदर आने का हौसला अपने भीतर पैदा नहीं कर पा रहा था. अगर यह बात आप खुद उस से कह दें, तो उस का असर ज्यादा होगा.’’

‘‘अरे, उसे अंदर आना चाहिए था. वंदना, तुम उसे बुला लाओ,’’ राजेंद्रजी ने अपनी बेटी को आदेश दिया.

‘‘मैं अपने कमरे में जा रही हूं, पापा.

आप की जो मरजी हो करो, पर मैं उस से एक शब्द भी बोलना नहीं चाहती हूं,’’ गुस्से से पैर पटकती वंदना ड्राइंगरूम से उठ कर अपने कमरे में चली गई.

अपनी बेटी के व्यवहार पर शर्मिंदा से होते राजेंद्रजी खुद उठ कर राजीव को बुलाने चल पड़े. सरला भी उन के साथ चलीं, तो कैलाश और मीना भी साथ हो लिए.

बाहर सड़क पर ही राजेंद्रजी ने राजीव को पहले प्यार से बुजुर्गों के साथ सदा सही ढंग से पेश आने की बात समझईर् और फिर सिर पर हाथ फिराते हुए उसे माफ करने की बात कही.

‘‘सर, मेरा गंदा व्यवहार माफी के काबिल ही नहीं है,’’ राजीव का चेहरा उदास और मुरझया हुआ ही बना रहा, तो सब की बेचैनी व चिंता फौरन बढ़ गई.

सरला ने राजीव को घर के अंदर चलने का निमंत्रण दिया, पर वह राजी नहीं हुआ.

‘‘आंटी, वंदना की आंखों में मैं अपने लिए गुस्से व नफरत के जो भाव देखता हूं, वह मेरे लिए असहनीय है. उस का सामना करने की हिम्मत मुझ में नहीं है,’’ राजीव की दर्दभरी आवाज सब के दिल को छू गई.

आर्यन के किडनैप होते ही Imlie की जिंदगी में होगी मालिनी की वापसी, पढ़ें खबर

सीरियल ‘इमली’ (Imlie) को दिलचस्प बनाने के लिए जहां मेकर्स ज्योति को नई-नई साजिशें करते दिखा रहे हैं तो वहीं आर्यन (फहमान खान) और इमली (सुम्बुल तौकीर) के रोमांस से दर्शकों का दिल जीत रहे हैं. लेकिन अब मेकर्स ने कहानी को और भी मजेदार बनाने के लिए शो में दो कलाकारों की धमाकेदार वापसी (Malini Aka Mayuri Deshmukh Entry) का प्लान बना लिया है. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

आर्यन होगा किडनैप

अब तक आपने देखा कि ज्योति का पर्दाफाश करने के चक्कर में इमली की हालत खराब होती नजर आ रही है. वहीं आर्यन भी इमली की बातों पर विश्वास नहीं कर पा रहा है. लेकिन अपकमिंग एपिसोड में इमली की जिंदगी में नई मुसीबत आने वाली है. दरअसल, जहां राठौड़ हाउस में गुंडों की एंट्री होगी तो वहीं आर्यन किडनैप हो जाएगा.

मालिनी के साथ होगी इस विलेन की एंट्री

अपकमिंग एपिसोड में जहां आर्यन को बचाने के लिए इमली परेशान होगी तो वहीं मालिनी की शो में एंट्री होगी. दरअसल, हाल ही में शेयर किए गए प्रोमो में मालिनी की झलक देखने को मिली है, जिसमें वह कहती नजर आ रही है कि वह अब सौतेली नहीं बल्कि सगी बहनों का फर्ज निभाती नजर आएगी. एक्ट्रेस की इस एंट्री से जहां फैंस बेताब हैं तो वहीं खबर है कि मालिनी के साथ-साथ उसकी मां अनु की भी एंट्री होते हुए दिखने वाली है.

ज्योति का ट्रैक नहीं कर रहे फैंस पसंद

हाल ही में नए विलेन यानी आर्यन की दोस्त ज्योति के ट्रैक से फैंस नाखुश हैं. वहीं एक के बाद एक आर्यन और इमली के रिश्ते के खिलाफ चालों को देख फैंस शो को बंद करने की सलाह दे रहे हैं. हालांकि मेकर्स फैंस के इस गुस्से के चलते शो में मालिनी की एंट्री करते हुए दिखने वाले हैं.

बता दें, हाल ही में इमली और आर्यन यानी फहमान खान और सुंबुल तौकीर खान के डेटिंग की खबरें सोशलमीडिया पर छाई हुई थीं. हालांकि अब खबरें हैं कि एक्ट्रेस सुंबुल तौकीर खान किसी और शख्स को डेट कर रही हैं.

Mahhi Vij और Jay Bhanushali को कुक ने दी जान से मारने की धमकी

टीवी के पौपुलर कपल्स में से एक एक्टर जय भानुशाली और एक्ट्रेस माही विज इन दिनों सुर्खियों में हैं, जिसका कारण उन्हें धमकी मिलना है. दरअसल, हाल ही में कपल ने पुलिस में अपने कुक के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है, जिसने उनकी बेटी को जान से मारने की धमकी दी है. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

कुक ने दी धमकी

हाल ही में एक्ट्रेस माही विज ने अपने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर किए थे, जिसमें उन्होंने हादसे से जुड़ी बातें शेयर की थीं. हालांकि एक्ट्रेस ने तुरंत ही सारे पोस्ट डिलीट कर दिए थे. लेकिन अब एक्ट्रेस ने इस मामले की पूरी जानकारी देते हुए एक इंटरव्यू में बताया कि ‘तीन दिन हुए थे और हमें पता चला कि वो चोरी कर रहा है, जिसके बाद मैंने पति जय को जानकारी दी तो उसने बिल का सेटलमेंट किया, लेकिन वो पूरे महीने का पेमेंट मांग रहा था. जब जय ने तर्क करने की कोशिश की तो उसने कहा, ‘200 बिहारी लाकर खड़ा कर दूंगा. वो नशे में घुत था और हमारे साथ गाली-गलौज करने लगा, जिसके बाद हम पुलिस के पास गए. धमकी के बारे में एक्ट्रेस ने कहा कि अगर मुझे कुछ हो भी जाए तो मुझे परवाह नहीं, लेकिन मैं अपनी बेटी के लिए डरी हुई थी.’

फैमिली के लिए डरी हुई हैं माही

‘जब हम पुलिस स्टेशन गए तो वो मुझे फोन करता रहा, जिसकी मेरे पास सारी रिकॉर्डिंग्स हैं. हर जगह इतना कुछ हो रहा है, जिसे देखकर बहुत डर लगता है कि क्या होगा अगर वो मुझे छूरा घोंप दे? अगर मुझे कुछ हुआ तो लोग बाद में विरोध करेंगे. फिर इसका क्या प्वॉइंट रह जाएगा? मैं अपनी फैमिली की सिक्योरिटी को लेकर डरी हुई हूं. मैंने सुना है कि वो जमानत पर बाहर है. क्या होगा अगर वो रियलिटी में जेल से बाहर आने के बाद लोगों को इकट्ठा करता है और हमें निशाना बनाता है?’

बता दें, टीवी का ये कपल बीते दिनों अपने गोद लिए हुए बच्चों के कारण सुर्खियों में है. दरअसल, ट्रोलर्स का कहना है कि तारा के जन्म के बाद से गोद लिए हुए दोनों बच्चे उनके साथ नहीं रहते. हालांकि एक्ट्रेस का कहना है कि वह अपने गांव गए हुए हैं.

चुनौती- भाग 3: शर्वरी मौसी ने कौनसी तरकीब निकाली

दोनों घंटों कंप्यूटर पर बातचीत करते थे. फिर अचानक न जाने क्या हुआ कि दोनों के बीच तनाव उत्पन्न हो गया. सुप्रिया को लगा कि अभीष्ट उसे धोखा दे रहा है.’’

‘‘हाय, इतना कुछ हो गया और सुप्रिया ने मुझे हवा तक नहीं लगने दी.’’

‘‘तुझे तो क्या मुझे भी हवा नहीं लगने दी. यह नई पीढ़ी बहुत स्मार्ट है. मुझे तो अभीष्ट की मां ने पूरी कहानी सुनाई. उन्हीं ने बताया कि अभीष्ट ने प्रण लिया है कि विवाह करेगा तो सुप्रिया से नहीं तो जीवनभर कुंआरा रहेगा. मुझ से कहने लगीं कि इस समस्या का हल आप ही निकाल सकती हैं.’’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर क्या, मैं ने बहुत सोचा. क्या करूं क्या न करूं. अभीष्ट को मैं बचपन से जानती हूं. हर क्षेत्र में सुप्रिया से बीस ही होगा. किसी तरह का कोई व्यसन नहीं. ऐसे युवक आजकल मिलते कहां हैं. सुप्रिया को भी मैं भली प्रकार जानती हूं. किसी से मिलनेजुलने या प्रेम की पींगें बढ़ाने का समय ही कहां है उस के पास. वैसे भी अभीष्ट जैसा वर तो दीया ले कर ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेगा. यही सोच कर मैं ने उस के परिवार को तुम सब से मिलवाने का निर्णय लिया. मुझे पूरा विश्वास है कि वह मेरी बात नहीं टालेगी.’’

‘‘काश, ऐसा ही हो. मुझे तो यह सब सुन कर सुप्रिया की चिंता होने लगी है. यह तो बड़ी छिपी रुस्तम निकली. प्रताप और नीरजा ने मुझ से कभी कोई बात नहीं छिपाई.’’

‘‘होता है, ऐसा भी होता है. मेरी छवि ने तो ऐन शादी के दिन बताया था. तुझे तो सब पता है कि कैसे हम ने सारी बात संभाली थी. ऐसी बातों को दिल से नहीं लगाया करते,’’ शर्वरी ने समझाया.

‘‘ललिता, क्या कर रही हो तुम? वहां सारे मेहमान प्रतीक्षा कर रहे हैं,’’ तभी अपूर्व आ खड़े हुए.

‘‘अभी आती हूं. आप जा कर मेहमानों के पास बैठिए न,’’ ललिता ने अनुनय की.

‘‘ललिता, तू जा कर सुप्रिया को ले आ. मैं मेहमानों के पास जा कर बैठती हूं,’’ शर्वरी बोलीं तो ललिता सुप्रिया के कक्ष की ओर बढ़ गईं.

‘‘चल सुप्रिया, तेरे पापा और शर्वरी मौसी तेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं,’’ ललिताजी हड़बड़ाहट में बोलीं.

‘‘क्या मां, मेरा तमाशा बना कर रख दिया है. मैं क्या कोई अजूबा हूं जो सब के सामने मेरी नुमाइश करवा रही हो.’’

‘‘अरे वाह, मन मन भावे, मूड़ हिलावे,’’ ललिताजी हंसीं.

‘‘तात्पर्य क्या है आप का?’’ सुप्रिया ने त्योरियां चढ़ा लीं.

‘‘लो, अब तात्पर्य भी मुझे ही समझाना पड़ेगा. शर्वरी दीदी ने मुझे सब बतला दिया है. ड्राइंगरूम में चल, सब समझ में आ जाएगा.’’

‘‘दीदी, मां क्या कह रही हैं? मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा,’’ नीरजा साक्षात प्रश्नचिह्न बनी खड़ी थी.

‘‘धीरज से काम लो. सब समझ में आ जाएगा. चलो जल्दी, मेहमान प्रतीक्षा कर रहे हैं,’’ ललिता अपनी ही धुन में बोलीं.

अभीष्ट और उस के परिवार को देख कर सुप्रिया को अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ. ‘शर्वरी मौसी को तो जासूसी कंपनी खोल लेनी चाहिए. न जाने कैसे सब पता लगा लेती हैं,’ उस ने सोचा.

‘‘यह सब क्या है? यहां आने से पहले मुझे सूचित तो कर सकते थे,’’ तनिक सा एकांत मिलते ही सुप्रिया ने अभीष्ट से शिकायत की.

‘‘चकित करने का अधिकार क्या केवल तुम्हें है? याद नहीं कैसे बिना कहेसुने गायब हो गई थीं तुम. मैं ने भी कसम खाई थी कि तुम्हें ढूंढ़ कर ही दम लूंगा. भला हो शर्वरी आंटी का जिन्होंने मेरा काम आसान कर दिया.’’

‘‘तुम्हारी सुनयना का क्या हुआ?’’ सुप्रिया ने व्यंग्यपूर्ण स्वर में प्रश्न किया.

‘‘फिर वही सुनयनापुराण. मैं ने तुम्हें पहले भी समझाया था कि मैं किसी सुनयना को नहीं जानता. पर तुम हो कि सुनने को तैयार ही नहीं हो,’’ अभीष्ट नाराज स्वर में बोला.

‘‘लो और सुनो. उस ने स्वयं मुझे फोन कर के बताया था कि तुम उस से अथाह प्रेम करते हो और विवाह उसी से करोगे.’’

‘‘मुझे क्या पता किस ने तुम्हें यह शुभ समाचार दिया था. पर इस बात का दुख अवश्य है कि तुम्हें मुझ से अधिक किसी अनजान के फोन पर विश्वास है,’’ अभीष्ट के स्वर में क्षोभ स्पष्ट था.

‘‘तुम मुझ पर झूठ बोलने का आरोप लगा रहे हो? मैं ने उस फोन नंबर को संभाल कर रखा है जिस से मुझे पूरे 3 बार फोन आया था.’’

‘‘ठीक है, फोन नंबर दो मुझे. हम दोनों बात करेंगे,’’ अभीष्ट बोला था.

‘‘हैलो सुनयना,’’ फोन पर किसी युवती का स्वर सुनते ही अभीष्ट ने प्रश्न किया था.

‘‘हैलो, अभीष्ट, कहो, कहां तक पहुंची तुम्हारी प्रेम कहानी,’’ उधर से खिलखिलाहट के साथ प्रश्न किया गया.

‘‘कौन, ऋचा? तो यह तुम्हारी शरारत थी. तुम्हीं ने सुप्रिया को सुनयना के नाम से फोन कर के बरगलाया था.’’

‘‘क्या कह रहे हो? मैं ने तो बस तुम्हारे कथनानुसार तुम्हारे प्रेम की परीक्षा ली थी. लगता है तुम्हारी बात ही सच थी. तुम दोनों को सचमुच एकदूसरे पर अटूट विश्वास है. विश्वास ही तो सच्चे प्रेम की नींव का पत्थर होता है.’’

‘‘ठीक कह रही हो तुम, सुप्रिया तो यह मानने को तैयार ही नहीं थी कि मेरे जीवन में कोई और लड़की भी हो सकती है. फिर भी वह यह जानने को बहुत उत्सुक थी कि उसे कई बार फोन किस ने किया था.’’

‘‘मुझे क्या पता था कि तुम सुनयना बन कर फोन कर रही थीं, अब तुम ही उसे समझा दो,’’ अभीष्ट ने फोन सुप्रिया को थमा दिया.

‘‘हाय, सुप्रिया, कैसी हो? अभीष्ट ने तुम्हारे बारे में इतने विस्तार से बताया है कि ऐसा आभास हो रहा है मानो तुम मेरी आंखों के सामने बैठी हो. आशा है हम शीघ्र मिलेंगे. मैं ने ही तुम्हें सुनयना के नाम से फोन किए थे. मेरी अभीष्ट से शर्त लगी थी कि आजकल का कामचलाऊ प्रेम जरा सा झटका भी नहीं सह सकता. उस ने मुझे चुनौती दी थी कि मैं चाहूं तो परीक्षा ले सकती हूं तो मैं ने वही किया. पर मुझे प्रसन्नता है कि अभीष्ट की जीत हुई,’’ ऋचा ने सबकुछ स्पष्ट कर दिया.

‘‘पर तुम हो कौन?’’ सुप्रिया ने प्रश्न किया.

‘‘क्या अभीष्ट ने बताया नहीं अभी तक. मैं ऋचा अभीष्ट के मामाजी की बेटी. हम दोनों भाईबहन कम, मित्र अधिक हैं. नर्सरी से ले कर कालेज तक की पढ़ाई हम दोनों ने साथ की थी, पर विवाह करने में मैं अभीष्ट से आगे निकल गई,’’ ऋचा हंसी. उस की स्वच्छ, निर्मल हंसी सीधे सुप्रिया के दिल में उतर गई.

‘‘तुम से बात कर के बहुत अच्छा लगा, ऋचा. आशा है हम शीघ्र ही मिलेंगे,’’ किसी प्रकार सुप्रिया के मुंह से निकला. वार्त्तालाप समाप्त होते ही सुप्रिया ने सिर झुका लिया. उस की आंखों से टपटप आंसू झरने लगे.

‘‘अब क्या हुआ?’’ अभीष्ट ने प्रश्न किया.

‘‘मैं तो तुम्हारी परीक्षा में असफल हो गई अभीष्ट, मैं ने तुम पर अविश्वास किया.’’

‘‘ऐसा कुछ नहीं है, सुप्रिया. मैं भी तुम्हारी जगह होता तो शायद ऐसा ही सोचता. प्रेम को विश्वास में बदलने में तो सारा जीवन लग जाता है. अब शीघ्रता से अपने आंसू पोंछ लो, सब हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं.’’

सुप्रिया आंसुओं के बीच भी मुसकरा दी थी. शर्वरी ने सुप्रिया को देखा तो आंखों ही आंखों में ललिता को बता दिया कि उन का परिश्रम व्यर्थ नहीं गया था. ललिता अपनी दीदी की योग्यता की कायल हो गई थी.

शादी के दिन ये काम करेंगे Payal और Sangram, किसी सेलेब्रेटी ने नहीं किया आज तक ऐसा

हल्दी, संगीत, शादी और तमाम शादी से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम,मानो दूल्हा- दुल्हन के पास साँस तक लेनें की फुरसत नही होती हैं इस दिन. लेकिन क्या आप ने सुना हैं कि शादी के ही दिन किसी दूल्हा-दुल्हन ने 200 जानवरों को, 100 अनाथ बच्चों को खाना खिलाया और 100 पेड़ लगाए हो. शादी जैसे अटूट पवित्र रिश्ते की शुरुवात इतने नेक काम से, वाकई ये एक बड़ी पहल है.

जी हाँ, शायद ही हमारे इंडस्ट्री में देखा गया हैं कि किसी सितारे ने शादी के दिन ये पहल की हो. लेकिन कॉमन वेल्थ विनर रेसलर संग्राम सिंह और पायल रोहतगी अपनी शादी के दिन सबसे पहले इस नेक काम से शुरुवात करेंगे. जहाँ वो प्रकृति और मानवता को सलाम करेंगे जिसकी मिसालें सदियों तक दी जाएंगी.

 

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संग्राम सिंह और पायल रोहतगी का कहना हैं कि,” ये सबसे खूबसूरत और शुभ दिन है,प्रकृति और मानवता के लिए कुछ करने का .शायद इससे नेक शुरुवात इस पवित्र रिश्ते के लिए हो नही सकती, जहाँ हम शादी के दिन,सबसे पहले 200 बेजुबां और मासूम जानवरों को जिसमें 50 गायें, 40 कुत्ते,10 गधे और 100 पक्षी उसके साथ 100 अनाथ बच्चों को खाना खिलाएंगे और 100 नए वृक्ष लगाएंगे,जो फलदार और छायादार होंगे. क्योंकि जिस नेचर ने हमें इतना कुछ दिया हैं जिसके छांव तले हम खुलकर सांस ले पा रहे है, उसे अगर रिटर्न में इतना भी दे दे,तो हमारी खुसनसीबी होगी, जो बेजुबां जानवर कुछ कह नही पाते,जो गरीब और अनाथ बच्चे भूखे हो,अगर उनका पेट भी, एक वक्त के लिए हम भर पाए, तो परमात्मा से इससे ज्यादा हमें और कुछ नही चाहिए”.

 

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आपको बता दे कि संग्राम सिंह ने पायल रोहतगी से शादी करने की इच्छा हाल ही में जताई, जो अपने बर्थडे के दिन यानि को 21 जुलाई को शादी करनेवाले थे. लेकिन शुभ मुहूर्त 9 जुलाई को निकला हैं इसीलिए 9 जुलाई को आगरा के जेपी पैलेस में इन दोनों के शादी की रस्में निभाई जाएंगी, जहाँ पर हल्दी,मेहन्दी और संगीत का कार्यक्रम होगा और शादी किसी बड़े मंदिर में होगी और उसके बाद दिल्ली और मुम्बई में अपने खास लोगों के लिए ये दोनों रिसेप्शन भी देंगे.

खुशियों के पल- भाग 6: कौन थी नीरजा

नीरजा के चेहरे पर बड़ी प्यारी सी मुसकराहट आई.‘‘बस, इस चौराहे पर रोक लीजिए. मैं यहीं से औटो कर लूंगी.’’

‘‘पर…’’

‘‘रोकिए न प्लीज.’’

उन्होंने गाड़ी रोक ली. नीरजा तुरंत उतर गई. ‘‘फिर मिलते हैं,’’ कहते हुए उस ने दरवाजा बंद किया व सामने ही खड़े औटो में जा बैठी. औटो आगे बढ़ गया. उन्होंने भी गाड़ी घर की तरफ घुमा ली.

अगले 10 दिनों तक उन की लाइब्रेरी जाने की हिम्मत नहीं हुई. फिर उन का एक बाहर का प्रोग्राम बन गया. उन के कार्यकाल के समय में हुई 2 अनियमितताओं की जांच चल रही थी. यह जांच उन के खिलाफ नहीं थी पर जांच अधिकारी ने उन्हें विटनैस बनाया था. जांच का कार्य मुंबई में हो रहा था. सो, उन्हें 15 दिनों के लिए मुंबई जाना था. जाने से पहले उन्हें एक बार लाइब्रेरी जाना था. किताबें वापस करनी थीं वरना देर हो जाती.

वे लाइब्रेरी पहुंचे पर नीरजा नहीं आई थी. वे निराश हो गए व किताबें वापस कर के चले आए. फिर वे मुंबई चले गए. दोनों जांच कमेटियों में अपना विटनैस का काम खत्म करने में उन्हें 20 दिन लग गए. आने के दूसरे दिन ही शाम को 4 बजे लाइब्रेरी पहुंचे.

आज भी नीरजा वहां नहीं थी. वे परेशान हो गए. उस दिन ही उस की तबीयत ठीक नहीं थी. दोएक लोगों से पूछताछ की, पर कुछ पता न चला. तब वे सीधे लाइब्रेरियन के पास पहुंच गए.

‘‘एक्सक्यूज मी,’’ उन्होंने पूछा, ‘‘मुझे आप की नीरजा नाम की ट्रेनी से कुछ काम था. मुझे पता चला है कि वह आज नहीं आई है, वह छुट्टी पर है. क्या आप बता सकती हैं कि वह कब तक छुट्टी पर है?’’

लाइब्रेरियन ने उन्हें ध्यान से देखा, ‘‘आप नीरजा के क्या लगते हैं? किस रिलेशन में हैं?’’

‘‘नहीं, रिलेशन में तो नहीं हूं पर दे आर वेल नोन टू मी.’’

‘‘आप कैसे परिचित हैं, आप को नीरजा से क्या काम है?’’

‘‘दरअसल, नीरजा ने ही अपने एक पर्सनल काम के लिए मुझ से कहा था. उसी की जानकारी उसे देनी है. नीरजा कहां है और कैसी है, मैडम?’’

‘‘नीरजा इज नौट वैल. वह बीमार है. करीब 20 दिनों से वह छुट्टी पर है. उस की एप्लीकेशन आई थी.’’

‘‘क्या, 20 दिनों से छुट्टी पर है. तब तो सीरियस बात लगती है. क्या आप ने उसे देखा है?’’

‘‘नहीं, मैं तो नहीं गई थी. पर स्टाफ  के लोग गए थे. शी इज रियली सीरियसली सिक.’’

‘‘क्या आप मुझे उस के घर का ऐड्रैस दे सकती हैं, प्लीज,’’ वे बेचैन हो गए.

‘‘मुझे मालूम नहीं है. आप औफिस से ले लें. मैं स्लिप लिख देती हूं.’’

उन्होंने स्लिप लिख कर दे दी. उन का धन्यवाद कर के वे औफिस में गए व नीरजा का पता ले लिया. हाउस नंबर 144, मीरापट्टी रोड. उन्होंने बाहर आ कर गाड़ी दौड़ा दी. मीरापट्टी रोड ज्यादा दूर नहीं थी. वे एड्रैस पर पहुंच गए. उसी के बगल में पार्किंग की जगह मिल गई. उन्होंने गाड़ी वहीं खड़ी कर दी. घर ढूंढ़ते हुए 2-3 लोगों से पूछना पड़ा. आखिरकार वे पहुंच गए. वह एक मंजिला मकान था. मकान साधारण था. उन्होंने कुंडी खटखटाई.

एक उम्रदराज महिला ने दरवाजा खोला.

‘‘कहिए?’’ उन्होंने पूछा, ‘‘किस से मिलना है?’’

‘‘जी, क्या नीरजाजी का यही मकान है?’’

‘‘जी हां, यही मकान है, कहिए?’’

‘‘दरअसल मुझे उन से मिलना है.’’

‘‘उस की तबीयत ठीक नहीं है. आप कौन हैं?’’

‘‘जी, मैं लाइब्रेरी से आया हूं. उन की तबीयत के बारे में ही जानने आया हूं.’’

‘‘आइए, अंदर आ जाइए.’’

अंदर का कमरा ड्राइंगरूम था. कमरा बड़ा नहीं था. फर्नीचर थोड़े से ही थे पर ढंग से लगे थे. वे एक कुरसी पर बैठ गए. महिला को चलने में परेशानी हो रही थी. उन महिला ने दरवाजा खुला रहने दिया, पर परदा खींच दिया. फिर आ कर दूसरी कुरसी पर बैठ गईं.

‘‘मैं नीरजा की मां हूं. नीरजा का भाई दवा लाने गया है.’’

‘‘अब कैसा हाल है नीरजा का?’’

‘‘हालत ठीक नहीं है. लाइब्रेरी से सुमनजी आईर् थीं. तब तो नीरजा ने उन से बात भी की थी. अब वह सो रही है. सुमन ने तो उस के बारे में बताया ही होगा.’’

‘‘मैं बाहर गया हुआ था. आज ही लौटा, तो लाइब्रेरियन मैडम ने नीरजा के बारे में बताया. मैं ने सोचा, मैं भी नीरजा को देख आऊं. क्या हुआ है नीरजा को?’’

‘‘नीरजा को कैंसर है, ब्लडकैंसर.’’

‘‘क्या?’’ उन का सिर घूम गया. उन्हें लगा कि जैसे पूरा कमरा घूम रहा है, ‘‘पा…पानी…पानी मिलेगा क्या?’’

नीरजा की मां ने उन्हें पानी दिया. पानी पी कर वे जरा संभले.

‘‘क्या कह रही हैं आप, कैंसर क्या ऐसे होता है. अभी कुछ दिनों पहले ही तो मैं उन से मिला था. एकदम ठीकठाक थीं. कहीं कोई गलती तो नहीं हुई है?’’

‘‘गलती कैसी साहब. इस का पता तो 6 महीने पहले ही चल गया था. कितना रुपया इस के इलाज में खर्चा हो गया. अब तो यही लगता है कि किसी तरह से इसे आराम मिले. बड़ी तकलीफ है इसे. नींद की गोली दे कर सुलाया जाता है,’’ वे रो पड़ीं.

‘‘डाक्टर क्या कह रहा है?’’

‘‘अब डाक्टर कुछ नहीं कह रहे हैं. कहते हैं कभी भी कुछ भी हो सकता है.’’

‘पर इस में तो बोनमैरो वगैरह…

‘‘हो चुका है. 2 बार हुआ है. तभी तो लाइब्रेरी वालों ने मदद की थी. अब नहीं हो सकता है.’’

नीरजा की मां चुप हो गईं. वे भी चुप रहे. उन की समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या कहें. आखिर वे बोले, ‘‘क्या मैं एक बार नीरजा को देख सकता हूं? मैं उसे बिलकुल भी डिस्टर्ब नहीं करूंगा.’’

2 लमहे वे उन्हें देखती रहीं, फिर बोलीं, ‘‘आइए.’’

वे उन्हें ले कर अंदर के कमरे में गईं. उन का जी धक से रह गया. सीने तक चादर ओढ़े नीरजा सो रही थी. पर यह जैसे वह वाली नीरजा नहीं थी. उस का गोरा गुलाबी चेहरा सांवला लग रहा था. चादर से निकले उस के हाथ स्किनी लग रहे थे. माथा उभरा हुआ व काफी चौड़ा लग रहा था.

‘‘बहुत कमजोर हो गई है साहब.’’ उस की मां ने फुसफुसा कर कहा. वे ज्यादा देर तक खड़े न रह सके, बाहर आ गए. पर्स निकाल कर देखा. करीब 10 हजार रुपए थे. निकाल कर नीरजा की मां की तरफ बढ़ाए. उन्होंने सवालिया निगाहों से उन्हें देखा.

‘‘लाइब्रेरी से हैं. मैं कल सुबह फिर आऊंगा. तब और रुपयों का इंतजाम हो जाएगा. सरकारी मदद है. उस का अच्छे से अच्छा इलाज होगा. वह बच जाएगी. अब मैं चलता हूं, कल फिर आऊंगा,’’ वे किसी तरह से अपनेआप को जब्त किए रहे.

नया सवेरा- भाग 1: बड़े भैया के लिए पिताजी का क्या था फैसला

बड़ी भाभी बंबई में पलीबढ़ी थीं. खातेपीते अच्छे परिवार से आई थीं. ऐसा नहीं था कि हम लोग उन के मुकाबले कम थे. पिताजी बैंक में मैनेजर थे. मां जरूर कम पढ़ीलिखी थीं किंतु समझदार थीं.

बड़ी भाभी बंबई से आई थीं, शायद इसी कारण हम सभी को गंवार समझती थीं क्योंकि हम जौनपुर जैसे छोटे शहर में रहते थे. हां, भैया को वे जरूर आधुनिक समझती थीं. कारण, घर के बड़े बेटे होने के नाते उन का लालनपालन बड़े लाड़प्यार से हुआ था. कौन्वैंट में पढ़ने के कारण धाराप्रवाह अंगरेजी बोल लेते थे. सुबह से ही बड़ी भाभी का बड़बड़ाना चालू था, ‘जाने क्या समझते हैं सब अपनेआप को. आखिर हैं तो जौनपुर जैसे छोटे शहर के…रहेंगे गंवार के गंवार. किसी को आगे बढ़ते देख ही नहीं सकते. हमारे बंबई में देखो, रातरात भर लोग बाहर रहते हैं किंतु कोई हंगामा नहीं होता.’

छोटी भाभी सिर झुकाए आटा गूंधती रहीं जैसे कुछ सुनाई न दे रहा हो. मुझे कालेज जाने में देर हो रही थी. हिम्मत कर के रसोई में पहुंची. धीमी आवाज में बोली, ‘‘भाभी, मेरा टिफिन.’’

‘‘लो आ गई…कालेज में पहुंच गई, किंतु अभी तक प्राइमरी के बच्चों की तरह बैग में टिफिन डाल कर जाएगी. एक हमारे यहां बंबई में सिर्फ एक कौपी उठाई, पैसे लिए और बस भाग चले.’’ वहां रुक कर और सुनने की हिम्मत नहीं हुई. सोचने लगी, ‘आखिर भाभी को हो क्या गया है, आज से पहले उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा.’

जैसे ही भोजनकक्ष में गई, छोटे भैया की आवाज सुन कर पैर रुक गए.

‘‘आखिर आप करते क्या हैं बाहर आधी रात तक? हम सभी की नींद खराब करते हैं…’’

पिताजी बीच में ही बोल पड़े, ‘‘बेटे, आखिर ऐसी कौन सी कमाई करते हो जिस के कारण तुम्हें आधीआधी रात तक बाहर रहना पड़ता है? तुम्हारा दफ्तर तो 5 बजे तक बंद हो जाता है न?’’

‘‘पिताजी, दफ्तर के बाद कभी मीटिंग होती है, बड़ेबड़े लोगों के साथ उठनाबैठना पड़ता है. आगे बढ़ने के लिए आखिर उन के तौरतरीके भी तो सीखने पड़ते हैं,’’ बड़े भैया ने अत्यंत धीमी आवाज में कहा.

पिताजी के सामने किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी तेज आवाज में बोलने की. वे न ऊंचा बोलते थे और न ही उन्हें ऊंची आवाज पसंद थी. वे बड़े भैया को हिदायत दे कर छड़ी संभालते हुए बाहर निकल गए. किंतु मां से नहीं रहा गया, उन्होंने बड़े भैया को डांटते हुए कहा, ‘‘तुझ को पिताजी से झूठ बोलते शर्म नहीं आती. आगे बढ़ने की इतनी ही फिक्र थी तो 3-3 ट्यूशनों के बावजूद तुम कभी प्रथम क्यों नहीं आए? मन लगा कर पढ़ा होता तो यह नाटक करने की जरूरत ही न पड़ती. हम सब को पाठ पढ़ाने चले हो. रात 12 बजे कौन सी शिक्षा लेते हो, जरा मैं भी तो सुनूं.’’

‘‘मां, तुम क्या जानो दफ्तर की बातें. तुम्हारी समझ में कुछ नहीं आएगा. तुम तो बस आराम करो और छोटे, तू अपने काम से काम रख,’’ बड़े भैया ने छोटे भैया की तरफ घूर कर कहा.

तभी पीठ पर किसी का स्पर्श पा मैं पीछे पलटी. बड़ी भाभी टिफिन लिए खड़ी थीं. कंधे पर हाथ रख प्यार से बोलीं, ‘‘मेरे कहे का बुरा मत मानना, बीनू, पता नहीं मुझे क्या हो गया था.’’

मैं ने मुसकराते हुए टिफिन लिया और बिना कुछ कहे बाहर चली गई.

करीब 10-12 दिनों तक सब ठीक चलता रहा. बड़े भैया भी समय से घर आ जाते थे. मां, पिताजी तो पहले खा कर सोने चले जाते. बाद में हम सभी साथ खाना खाते. इकट्ठे खाना खाते बड़ा अच्छा लगता. दोनों भाभियों में भी पहले की तरह बात होने लगी थी. अचानक एक रात ‘खटखट’ की आवाज से नींद खुल गई. मन आशंका से कांप गया. बगल का कमरा बड़े भैया का था. हिम्मत कर के मैं उठी. सोचा, उन्हें उठा दूं. कुंडी खोलतेखोलते किसी की आवाज सुन अचानक हाथ रुक गया. ध्यान से सुनने पर पता चला कि यह बड़े भैया की आवाज है. वे भाभी से कह रहे थे, ‘‘दरवाजा बंद कर के सो जाओ. जल्दी लौट आऊंगा.’’

घड़ी की तरफ देखा, साढ़े 11 बज रहे थे. आखिर क्या बात है? इतनी रात गए भैया क्यों बाहर जा रहे हैं? कहीं किसी की तबीयत तो नहीं खराब हो गई? किंतु आवाज तो बस बड़े भैया, भाभी की ही थी. सोचा, जा कर भाभी से पूछूं, किंतु हिम्मत न हुई.इसी उधेड़बुन में नींद गायब हो गई. काफी कोशिश के बाद जब हलकी नींद आई ही थी कि ‘खटपट’ सुन कर आंख फिर खुल गई. शायद भैया आ गए थे. घड़ी देखी, 3 बज रहे थे. भैया ने बाहर जाना छोड़ा नहीं था. सब की आंखों में धूल झोंकने के लिए यह चाल चली थी. उन की इस चाल में भाभी भी शरीक थीं.

रात को आनेजाने का सिलसिला करीब रोज ही चलता था. एक रात दरवाजे पर होती लगातार दस्तक से मेरी नींद उचट गई. भाभी को शायद गहरी नींद आ गई थी. मैं जल्दी से उठी क्योंकि नहीं चाहती थी कि मांजी उठ जाएं और पिताजी तक बात पहुंचे. जैसे ही मैं ने दरवाजा खोला, बदबू का एक झोंका अंदर तक हिला गया. भैया ने शायद ज्यादा पी ली थी. अंदर आते ही बोले, ‘‘क्यों जानू, आज इतनी…’’ तभी मेरी तरफ नजर पड़ते ही खामोश हो गए.

तब तक भाभी आ गई थीं. वे बिना कुछ कहे सहारा दे कर भैया को कमरे में ले गईं. उस रात मैं सो न सकी. सारी रात करवटें बदलते बीती. यही सोचती रही कि मां से कह दूं या नहीं? कुछ समझ में नहीं आ रहा था. सुबह थोड़ी झपकी आई ही थी कि

बड़ी भाभी ने आ कर जगा दिया. बोलीं, ‘‘बीनू, कृपया रात की बात किसी से न कहना.’’

तब तक मैं ने भी निर्णय कर लिया था कि बात छिपाने से अहित भैया का ही है. मैं ने उन की तरफ सीधे देखते हुए कहा, ‘‘वह तो ठीक है भाभी, किंतु जब मैं ने रात को दरवाजा खोला तो विचित्र बू का आभास हुआ. कहीं भैया…’’

भाभी बीच में ही मुंह बना कर बोलीं, ‘‘हमें तो कोई गंध नहीं आई.’’

मैं खुद अपने प्रश्न पर लज्जित हो गई. अपने पर क्रोध भी आया कि जब भाभी को भैया की फिक्र नहीं है तो मैं ही क्यों चिंता में पड़ूं. इसी तरह 2 हफ्ते और बीत गए. मैं भी घर में कलह नहीं कराना चाहती थी, इसीलिए मुंह सी लिया.

Monsoon Special: रिमझिम फुहारों में कैसा हो आपका मेकअप

बारिश का मौसम चिलचिलाती गरमी से तो राहत देता है, मगर यह मौसम कभी भी आप के मेकअप को बिगाड़ सकता है. मौनसून के शुरू होने से ले कर उस के समाप्त होने तक पार्टी और औफिस के लिए किस तरह का मेकअप होना चाहिए, आइए जानते हैं:

डेली मेकअप

बारिश के दिनों में फाउंडेशन का इस्तेमाल करना सुरक्षित नहीं होता है.

कौंपैक्ट पाउडर के जरीए मैट लुक सब से बेहतर विकल्प है. फाउंडेशन की जगह फेस पाउडर का इस्तेमाल करें.

कौंपैक्ट के साथ हलका मेकअप करें. इस से पूरा फेस भी कवर हो जाएगा और वह तैलीय भी नहीं दिखेगा.

लाइलैक ब्लौसम और प्रीसियस पिंक कलर के परिधान के साथ सौफ्ट पिंक और डीप रास्पबैरी लिपस्टिक बेहतर रहती है.

काजल के इस्तेमाल से आंखों को खूबसूरत बनाएं.

औफिस मेकअप

कौंपैक्ट पाउडर, आईलाइनर, काजल और मसकारा का इस्तेमाल कर हलका मेकअप करें. बाद में ग्रेसफुल लुक के लिए फ्लेमिंग पीच, लिपस्टिक लगाएं.

पार्टी मेकअप

मौनसून सीजन के दौरान चेहरे को ब्लशर के हलके प्रयोग से निखारें. अगर आप भीग जाती हैं तो चेहरे को टिशू पेपर से सुखा लें. टिशू पेपर को पूरे चेहरे पर न मलें.

ब्लशर को बाहर की तरफ ब्लैंड करें.

हलके रंगों का ज्यादा इस्तेमाल करें. क्रीम की जगह पाउडर्ड आईशैडो का प्रयोग करें. यह चेहरे पर आईशैडो को फैलने से रोकेगा.

अगर आप मसकारे का इस्तेमाल करना चाहती हैं, तो वाटर रैसिस्टैंस मसकारे का इस्तेमाल करें ताकि भारी बारिश में भी वह सुरक्षित रहे.

मौनसून के दौरान लिक्विड आईलाइनर की जगह पैंसिल आईलाइनर का इस्तेमाल करें.

अब बात करते हैं होंठों और नाखूनों के कलर की.

पार्टी

पिंक स्टेटमैंट नेलपेंट और मैड अबाउट पिंक लिपस्टिक के जरीए खुद को बोल्ड पिंक लुक दें.

औफिस

कौंपैक्ट पाउडर, आईलाइनर, काजल और ऐट्टियूड मसकारे का इस्तेमाल कर हलका मेकअप करें. बाद में ग्रेसफुल लुक के लिए फ्लेमिंग पीच लिपस्टिक लगाएं.

डेली

लाइलैक ब्लौसम और प्रीसियस पिंक कलर के परिधान के साथ सौफ्ट पिंक और डीप रास्पबैरी लिपस्टिक बेहतर रहती है. अपनी आंखों को ऐट्टियूड काजल से हाईलाइट करें.

– श्वेता पौल   कैटेगरी हैड, ब्यूटी ऐंड पर्सनल केयर, एमवे इंडिया

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