6 Tips: ग्लोइंग स्किन के लिए नहीं करनी पड़ेगी मेहनत

निखरी और खूबसूरत त्वचा पाना हर किसी का सपना होता है, खासतौर पर लड़कियों का. शायद ही कोई लड़की होगी जो अपने लुक्स को लेकर गंभीर न हो. मनचाही त्वचा पाने के लिए वे बहुत कुछ करती भी हैं. पार्लर जाना, घरेलू उपाय करना और न जाने क्या-क्या. पर वहीं कुछ लड़कियां ऐसी भी होती हैं जिन्हें निखरी त्वचा तो चाहिए होती है पर वे उसके लिए मेहनत करने से कतराती हैं.

अगर आप भी ऐसी ही लड़कियों में से हैं तो दिल छोटा करने की जरूरत नहीं है. अगर आप चाहें तो बिना किसी मेहनत के भी खूबसूरत और निखरी त्वचा पा सकती हैं. अगर आप अब भी इस बात पर यकीन नहीं कर पा रही हैं तो आपको बता दें कि ये किसी तरह का मजाक नहीं है और खूबसूरत त्वचा पाना कोई मुश्किल काम नहीं है. बस आपको करना ये है कि खुद के प्रति संवेदनशील बने रहें.

अगर आपकी त्वचा ड्राई या फिर ऑयली है तो आपको थोड़ा अधिक गंभीर होने की जरूरत है.

1. जितना ज्यादा हो सके उतना अधिक पानी पिएं. जी हां, ये खूबसूरत त्वचा पाने का एक नुस्खा है. इससे त्वचा की नमी बनी रहती है. साथ ही पानी पीने से त्वचा कोमल और ग्लोइंग बनती है.

2. जितनी बार भी आप बाहर से घर आएं उतनी बार चेहरे को साफ, ठंडे पानी से धोएं. जरूरी नहीं है कि आप हर बार फेसवॉश से ही चेहरा धोएं. पानी से भी चेहरा धोना फायदेमंद रहता है. इससे चेहरे पर मौजूद गंदगी धुल जाती है और सूक्ष्म रंध्र बंद नहीं होते हैं.

3. अगर आपने चेहरे पर मेकअप लगा रखा है तो कोशिश कीजिए कि उसे साफ करने के बाद ही सोएं. चेहरे पर बहुत देर तक मेकअप लगा रहना सही नहीं है. इससे त्वचा का नेचुरल ग्लो फीका पड़ने लगता है.

4. खूबसूरत त्वचा के लिए पर्याप्त नींद लेना भी बहुत जरूरी है. हमारी नींद हमारी बॉडी को रीचार्ज करने का काम करती है. ऐसे में फ्रेश त्वचा पाने के लिए पूरी नींद लेना बहुत जरूरी है.

5. दोपहर के समय सूरज की रोशनी में खुले बदन जाने से परहेज करना चाहिए. इससे त्वचा को नुकसान पहुंच सकता है.

6. आपका खान-पान अच्छा होना चाहिए. साथ ही ये बेहद जरूरी है कि आप जो कुछ भी खाएं वो फ्रेश हो और अगर वो पौष्ट‍िक है तो इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता.

ये भी पढ़ें- इन 6 दवाईयों से बनाएं फेस पैक और पाएं बेदाग स्किन

इन बेकार सामानों से बनाएं ट्रैंडी ज्वैलरी

घर, दफ्तर या किसी भी जगह बेकार पड़े सामानों को अब फेंकने के बजाए उसका विभिन्न तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है. आप बेकार पड़े सामानों से खुद ही आकर्षक आभूषण बना सकते हैं. इसके लिए आपको अपने बजट की चिंता करने की भी कोई जरूरत नहीं है. इसे स्वयं ही बड़ी आसानी से बनाया जा सकता है.

“इंटरनेशनल स्कूल ऑफ डिजाइन” के छात्र आपको घर में पड़े बेकार सामान जैसे पेपर, प्लास्टिक, तार, मोती और बटन की मदद से अद्भुत और रचनात्मक ज्वेलरी बनाने में मार्गदर्शन कर रहे हैं.

1. पेपर ज्वेलरी/ब्रेसलेट

– एक पुराना अखबार लेकर स्केल की मदद से पेपर के सबसे ऊपरी भाग पर अल्टरनेटिव इंच का उपयोग कर निशान लगा लें. इसी तरह, पेपर के तल पर यानी नीचे की ओर आधे इंच के अंतराल पर निशान लगायें. ऊपर के अल्टरनेटिव निशान से नीचे के निशान तक (कोण की तरह) लाइन बना लें.

– अब इस कोण को काट लें और दो रंग की मदद से पेपर पर अल्टरनेटिव रूप से रंग करें. सूखने के बाद, इसे विस्तृत से संकीर्ण तक रोल बना लें और और गोंद की मदद से इसके टिप को सुरक्षित करें. आप इसे पूरा करने के लिए रोल पर पारदर्शी नेल पेंट लगा दें. इसी तरह आप और बीड्स (मोती) भी बना सकते हैं.

– ब्रेसलेट बनाने के लिए, एक इलास्टिक धागा लें और मोतियों को एक के बाद एक डालकर और अंत में दोनों कोनों को टाई करके बंद कर दें.

2. साटन रिबन पर्ल नेकलेस

– एक रिबन लेकर उसे दो हिस्सों में फोल्ड कर दें. फिर फोल्डेड अंत में एक गांठ बनाये. एक साइड का किनारा लेकर उस पर गांठ बना लें.

– अब सिरों में से एक के माध्यम से मोती डालना शुरू करें और दूसरी गांठ से मोती को सुरक्षित करें. अब अन्य साइड को किनारा लेकर उस पर गांठ बना लें. अब इसमें मोती को जोड़े और गांठ की मदद से इसे सुरक्षित कर लें और ऐसा ही दूसरी तरफ से भी करें. अब दोनों सिरों को एक साथ पकड़कर उसमें गांठ बांध दें.

– अब जहां से मोती डालना शुरू किया था उसी अंत में गांठ बना लें. बस गांठ के नीचे एक मोती जोड़ कर इसे फिर से सुरक्षित करने के लिए एक गांठ बना लें. एक और मोती जोड़ कर गांठ बना लें. दूसरे किनारे पर एक मोती जोड़ें. दोनों सिरों को एक साथ रखने के लिए एक गांठ बना दें.

– इसे तब तक करें जब तक आप इच्छित आकार नहीं पा लेते.

– रिबन के दो और हिस्से लेकर उसे दो टुकड़ों में फोल्ड कर लें. नेकलेस के दोनों साइट पर इस साटन रिबन जोड़ दें, इस तरह आपका साटन पर्ल नेकलेस तैयार है.

3. सेफ्टी पिन ब्रेसलेट

– दो से तीन पैकेट सेफ्टी पिन और अलग-अलग रंगों के मोती ले लें. अब पिन को खोलकर, हर रंग के मोती को एक-एक करके उसमें डालें और मोती को सुरक्षित रखने के लिए पिन को बंद कर दें. ऐसा सभी पिनों के साथ करें.

– अब पिन की आंख के माध्यम से सबसे पहले इलास्टिक तार और अगले पिन के नीचे के छेद से वैकल्पिक रूप से डालें. एक बार जब सभी पिन के माध्यम से तार गुजर जाये तो इसे बाहर ले लें और वैकल्पिक रूप से पिन के दूसरे छोर के माध्यम से डालें जैसे की आपने पहली जगह में किया था.

– अंत में इलास्टिक के दोनों सिरों को सुरक्षित करने के लिए अतिरिक्त तार को काट दें. हमारा सेफ्टी पिन ब्रेसलेट तैयार है.

ये भी पढ़ें- Deepika के कांस लुक को कौपी करती दिखीं Taarak Mehta की ‘रीटा रिपोर्टर’, देखें फोटोज

एहसास- भाग 1: क्यों सास से नाराज थी निधि

मालती ने अलमारी खोली. कपड़े ड्राईक्लीनर को देने के लिए, सुबह ही अजय बोल कर गया था, ‘मां ठंड शुरू हो गई है. मेरे कुछ स्वेटर और जैकेट निकाल देना,’ कपड़े समेटते हुए उस की नजर कुचड़मुचड़ कर रखे शौल पर पड़ी. उस ने खींच कर उसे शैल्फ से निकाला. हलके क्रीम कलर के पश्मीना के चारों ओर सुंदर कढ़ाई का बौर्डर बना था. गहरे नारंगी और मैजेंटा रंग के धागों से चिनार के पत्तों का पैटर्न. शौल के ठीक बीचोंबीच गहरा दाग लगा था. शायद, चटनी या सब्जी के रस का था जो बहुत भद्दा लग रहा था.

यह वही शौल था जो उस ने कुछ साल पहले कश्मीर एंपोरियम से बड़े शौक से खरीदा था. प्योर पश्मीना था. अजय की बहू को मुंहदिखाई पर दूंगी, तब उस ने सोचा था. पर इतने महंगे शौल का ऐसा हाल देख कर उस ने माथा पीट लिया. हद होती है, किसी भी चीज की. निधि की इस लापरवाही पर बहुत गुस्सा आया. पिछले संडे एक रिश्तेदार की शादी थी, वहीं कुछ गिरगिरा दिया गया होगा खाना खाते वक्त, दाग लगा, सो लगा, पर महारानी से इतना भी न हुआ की ड्राईक्लीन को दे देती या घर आ कर साफ ही कर लेती.

तमीज नाम की चीज नहीं इस लड़की को. कुछ तो कद्र करे किसी सामान की. ऐसा अल्हड़पन कब तब चलेगा. मालती बड़बड़ाती हुई किचन में आई. किचन में काम कर रही राधा को उन्होंने शाम के खाने के लिए क्या बनाना है, यह बताया और कपड़ों को ड्राइंगरूम में रखे दीवान के ऊपर रख दिया. और फिर हमेशा की तरह शाम के अपने नित्य काम में लग गई.

देर शाम अजय और निधि हमेशा की तरह हंसतेबतियाते, चुहल करते घर में दाखिल हुए. ‘‘राधा, कौफी,’’ निधि ने आते ही आवाज दी और अपना महंगा पर्स सोफे पर उछाल कर सीधे बाथरूम की ओर बढ़ गई. अजय वहीं लगे दीवान पर पसर गया था. मालती टीवी पर कोई मनपसंद सीरियल देख रही थी, पर उस की नजरें निधि पर ही थीं. वह उस के बाथरूम से आने का इंतजार करने लगी. शौल का दाग दिमाग में घूम रहा था.

‘‘और मां, क्या किया आज?’’ जुराबें उतारते हुए अजय ने रोज की तरह मां के दिनभर का हाल पूछा. बेचारा कितना थक जाता है, बेटे की तरफ प्यार से देखते हुए उन्होंने सोचा और किचन में अपने हाथों से उस के लिए चाय बनाने चली गई. इस घर में, बस, वे दोनों ही चाय के शौकीन थे. निधि को कौफी पसंद थी.

निधि फ्रैश हो कर एक टीशर्ट और लोअर में अजय की बगल में बैठ कर कौफी के सिप लेने लगी. मालती उस की तरफ देख कर थोड़े नाराजगीभरे स्वर में बोली, ‘‘निधि, ड्राईक्लीन के लिए कपड़े निकाल दिए हैं. सुबह औफिस जाते हुए दे देना. तुम्हारे औफिस के रास्ते में ही पड़ता है तो मैं ने निकाल कर रख दिए,’’ मालती ने जानबू झ कर शौल सब से ऊपर दाग वाली तरफ से रखा था कि उस पर निधि की नजर पड़े.

‘‘ठीक है मां,’’ कह कर निधि अपने मोबाइल में मैसेज पढ़ने में बिजी हो गई. उस ने नजर उठा कर भी उन कपड़ों की तरफ नहीं देखा.

मालती कुनमुना कर रह गई. उस ने उम्मीद की थी की निधि कुछ नानुकुर करेगी कि नहीं, मैं नहीं दे पाऊंगी, टाइम नहीं है, औफिस के लिए लेट हो जाएगा वगैरहवगैरह. पर यहां तो उस के हाथ से एक और वाकयुद्ध का मौका निकल गया. हमेशा यही होता है, उस के लाख चाहने के बावजूद निधि का ठंडापन और चीजों को हलके में लेना मालती की शिकायतों की पोटली खुलने ही नहीं देता था.

मालती उन औरतों में खुद को शुमार नहीं करना चाहती थी जो बहू से बहाने लेले कर लड़ाई करे और बेटे की नजरों में खुद मासूम बनी रहे. वह खुद को आधुनिक सम झती थी और यही वजह थी कि अपनी तरफ से वह कोई राई का पहाड़ वाली बात नहीं उठाती थी. वैसे भी, घर में कुल जमा 3 प्राणी थे और चिकचिक उसे पसंद नहीं थी. पर कभीकभी वह निधि की आदतों से चिढ़ जाती थी. मालती को घर में बहू चाहिए थी जो सलीके से घरबाहर की जिम्मेदारी संभाले. पर यहां तो मामला उलटा था. ठीक है, उस ने सोचा, अगर किसी को कोई परवा नहीं तो मैं भी क्यों अपना खून जलाऊं, मैं भी दिखा दूंगी कि मु झे फालतू का शौक नहीं कि हर बात में इन के पीछे पड़ूं. इन की तरह मैं भी, वह क्या कहते हैं, कूल हूं.

अपनी इकलौती संतान को ले कर हर मां की तरह मालती के भी बड़े सपने थे. अजय को जौब मिली भी नहीं थी कि रिश्तेदारी में उस की शादी की बातें उठने लगीं. मालती खुद से कोई जल्दी में नहीं थी. पर कोई भाभी, चाची या पड़ोसिन अजय के लिए किसी न किसी लड़की का रिश्ता खुद से पेश कर देती. ‘अभी अजय की कौन सी उम्र निकली जा रही है. जरा सैटल हो जाने दो.’ यह कह कर वह लोगों को टरकाया करती.

पर दिल ही दिल में अपनी होने वाली बहू की एक तसवीर उस के मन में बन चुकी थी. चांद सी खूबसूरत, गोरी, पतली, नाजुक सी, सलीकेदार जो घर में खाना पकाने से ले कर हर काम में हुनरमंद हो. अब यह सब थोड़ा मुश्किल तो हो सकता है पर नामुमकिन नहीं. वह तो ऐसी लड़की ढूंढ़ कर रहेगी अपने लाड़ले के लिए. लेकिन उस की उम्मीदों के गुब्बारे को उस के लाड़ले ने ही फोड़ा था. एक दिन, निधि को घर ला कर.

उसे निधि का इस तरह घर पर आना बहुत अटपटा लगा था. क्योंकि अजय किसी लड़की को इस तरह से कभी घर ले कर नहीं आया था. वह बात अलग थी कि स्कूलकालेज के दोस्त  झुंड बना कर कभीकभार आ धमकते थे. जिस में बहुत सी लड़कियां भी होती थीं.

मालती को कभी अखरता नहीं था अजय के यारदोस्तों का आना. पर उस ने अपने लिए कोई लड़की पसंद कर ली थी, यह बात मालती को सपने में भी नहीं आई थी. उस का बेटा अपनी मां की पसंद से शादी करेगा, यही मालती को गुमान था. जिस दिन अजय ने बताया कि वह अपनी किसी खास दोस्त को उस से मिलाने ला रहा है, वह सम झ कर भी अनजान बनने का नाटक करती रही. एक बार भी नहीं पूछा अजय से कि आखिर इस बात का मतलब क्या है?

उस दिन शाम को अजय निधि को अपनी बाइक पर बिठा कर घर ले आया. मालती ने कनखियों से निधि को देखा. नहीं, नहीं, उस के सपनों में बसी बहूरानी के किसी भी सांचे में वह फिट नहीं बैठती थी. आते ही ‘नमस्ते आंटी’ बोल कर धम्म से सोफे पर पसर गई. निधि लगातार च्युइंगम चबा रही थी. बौयकट हेयर, टाइट जींस और टीशर्ट में उस की हलकी सी तोंद भी  झलक रही थी. अजय ने मालती को ऐसे देखा जैसे कोई बच्चा अपना इनाम का मैडल दिखा कर घरवालों के रिऐक्शन का इंतजार करता है.

कर्तव्य पालन- भाग 2: क्या रामेंद्र को हुआ गलती का एहसास

घर पर ताला लगा देख उन्होंने लोगों से पूछताछ की तो पता लगा कि अविवाहित बेटी के गर्भवती होने की बदनामी के डर से उन्होंने हमेशा के लिए गांव छोड़ दिया. वे पागलों की भांति इधरउधर भटक कर उस की तलाश करने लगे परंतु कहीं कुछ पता न चला. उधर, उन के मातापिता ने जबरदस्ती उन का विवाह बिरादरी की एक लड़की अलका के साथ संपन्न कर दिया. तभी अलका ने करवट बदली. बिस्तर हिलने से इरा की तसवीर फिसल कर फिर से नीचे जा गिरी. ‘‘सोए नहीं अभी तक?’’ अलका आंखें खोल कर असमंजस से पूछने लगी, ‘‘तुम अभी तक राजेश की चिंता में जाग रहे हो? क्या वह आया नहीं अभी तक?’’ अलका चिंतित हो उठ कर बैठ गई.

‘‘वह आ चुका है और कमरे में सो रहा है.’’‘‘तुम भी सो जाओ, नहीं तो बीमार पड़ जाओगे,’’ अलका ने कहा और फिर अलमारी खोल कर नींद की एक गोली ला कर उन्हें थमा दी.

पानी के साथ गोली निगल कर वे सोने की कोशिश करने लगे. अलका कहती रही, ‘‘जब बाप के पैर का जूता बेटे के पैरों में सही बैठने लगे तो बाप को बेटे के कार्यों में मीनमेख न निकाल कर, उसे मित्रवत समझाना चाहिए.’’ पर रामेंद्र का ध्यान कहीं और अटका हुआ था. सुबह बिस्तर से उठ कर वे स्नान, नाश्ते से निबट कर फैक्टरी जाने हेतु कार की तरफ बढ़े तो पाया कि राजेश अभी भी सो रहा है. अलका ने कहा कि वह राजेश को फैक्टरी भेज देगी, ताकि उस को जिम्मेदारी निभाने की आदत पड़ जाए. रामेंद्र जैसे ही फैक्टरी के दफ्तर में प्रविष्ट हुए तो वहां पहले से उपस्थित एक अनजान लड़की को बैठा देख कर चकित रह गए.

लड़की ने उठ कर उन्हें नमस्ते किया.

‘‘कौन हो तुम? क्या चाहती हो?’’ वे रूखेपन से बोले.

‘‘मेरा नाम श्वेता है. नौकरी पाने की उम्मीद ले कर आई हूं.’’

‘‘हमारे यहां कोई रिक्त स्थान नहीं है. तुम जा सकती हो,’’ कह कर वे अंदर जा कर काम देखने लगे. कुछ देर बाद जब वे किसी कार्यवश बाहर निकले तो लड़की को उसी अवस्था में बैठी देख कर हतप्रभ रह गए, ‘‘तुम गईं नहीं?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘मुझे राजेश ने भेजा है.’’

‘‘तुम उसे कैसे जानती हो?’’

‘‘मैं आप की बेटी त्रिशाला की सहेली हूं,’’ कहतेकहते श्वेता का स्वर आर्द्र हो उठा, ‘‘मैं अपने सौतेले बाप व सौतेले भाइयों से बेहद परेशान हूं. आप मुझे नौकरी दे कर मुझ पर बहुत बड़ा एहसान करेंगे. मैं व मेरी मां दोनों भूखों मरने से बच जाएंगी.’’

‘‘सौतेला बाप,’’ उन के मन में जिज्ञासा पनपी.

श्वेता ने कुछ झिझक के साथ कहा, ‘‘मेरी मां ने प्रेमी से धोखा खाने के पश्चात 2 बेटों के बाप, विधुर डेविड से शादी की थी. मैं मां के प्रेमी की निशानी हूं.’’

छि:छि:…रामेंद्र का मन घिन से भर उठा. कहीं अवैध संतान भी किसी की सगी होती है. जी चाहा अभी इस लड़की को धक्के दे कर फैक्टरी से बाहर निकाल दें पर श्वेता के चेहरे की दयनीयता देख उन की कठोरता बर्फ की भांति पिघल गई. उस का सूखा चेहरा बता रहा था कि उस ने कई दिनों से पेटभर कर भोजन नहीं किया है. सहानुभूतिवश उन्होंने श्वेता को थोड़े वेतन पर महिला श्रमिकों की देखरेख पर रख लिया. श्वेता उन के समक्ष नतमस्तक हो उठी व कुछ संकोच के साथ बोली, ‘‘सर, अपने बारे में मैं ने जो कुछ आप को बताया है उसे अपने तक ही सीमित रखें. राजेश व त्रिशाला को भी न बताएं.’’

‘‘नहीं बताऊंगा.’’श्वेता आश्वस्त हो कर घर चली गई और अगले दिन से नियमित काम पर आने लगी. पर रामेंद्र के मन में श्वेता व राजेश को ले कर उधेड़बुन शुरू हो चुकी थी. आखिर राजेश की श्वेता से किस प्रकार की जानपहचान है. श्वेता उस की सिफारिश ले कर नौकरी पाने क्यों आई? उन्होंने श्वेता के घर का संपूर्ण पता व उस की योग्यता के प्रमाणपत्रों की फोटोस्टेट की प्रतियां अपने पास संभाल कर रख लीं. राजेश पूरे दिन फैक्टरी में नहीं आया. शाम को रामेंद्र ने घर पहुंचते ही अलका से उस के बारे में पूछा तो पता लगा कि वह बुखार के कारण पूरे दिन घर में ही पड़ा रहा. वे दनदनाते हुए राजेश के कमरे में दाखिल हो गए, ‘‘कैसी है तबीयत?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘जी,’’ अचकचा कर राजेश ने उठते हुए कहा.

‘‘लेटे रहो, स्वास्थ्य का खयाल न रखोगे तो यही होगा. क्या आवश्यकता है देर तक घूमनेफिरने की?’’

‘‘कल एक मित्र के यहां पार्टी थी,’’ राजेश सफाई पेश करने लगा.

‘‘फैक्टरी का काम देखना अधिक आवश्यक है. तुम अपनी इंजीनियरिंग व एमबीए की पढ़ाई पूरी कर चुके

हो. अब तुम्हें अपनी जिम्मेदारियां समझनी चाहिए.’’

‘‘जी, जी.’’

‘‘श्वेता को कब से जानते हो?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘जी, काफी अरसे से. वह एक दुखी व निराश्रित लड़की है, इसलिए मैं ने उसे फैक्टरी में नौकरी पाने के लिए भेजा था, पर आप को इस बारे में बताना याद नहीं रहा.’’

‘‘मैं ने उसे नौकरी दे दी है. लड़की परिश्रमी मालूम पड़ती है, पर तुम्हें इस प्रकार के छोटे स्तर के लोगों से मित्रता नहीं रखनी चाहिए.’’

‘‘जी, खयाल रखूंगा.’’

रामेंद्र के उपदेश चालू रहे. कई दिनों बाद आज उन्हें बेटे से बात करने का अवसर मिला था. सो, देर तक उसे जमाने की ऊंचनीच समझाते रहे.तभी त्रिशाला ने पुकारा, ‘‘पिताजी, चाय ठंडी हुई जा रही है. मैं ने नाश्ते में पनीर के पकौड़े बनाए हैं, आप खा कर बताइए कैसे बने हैं?’’ रामेंद्र आ कर चायनाश्ता करने लगे. त्रिशाला बताती रही कि आजकल वह बेकरी का कोर्स कर रही है, फिर दूसरा कोई कोर्स करेगी.

वे पकौड़ों की प्रशंसा करते रहे. अलका काफी देर से खामोश बैठी थी. अवसर मिलते ही उबल पड़ी, ‘‘तुम्हें बीमार बेटे से इस प्रकार के प्रश्न नहीं पूछने चाहिए. श्वेता को सिर्फ वही अकेला नहीं, बल्कि हम सभी जानते हैं. वह त्रिशाला की सखी है, इस नाते घर में आनाजाना होता रहता है. राजेश ने दयावश ही उसे अपनी फैक्टरी में नौकरी पाने हेतु आप के पास भेज दिया होगा.’’

‘‘पर मैं ने भी तो बुरा नहीं कहा. बस, यही कहा कि बच्चों को अपने स्तर के लोगों से ही मित्रता रखनी चाहिए.’’

‘‘बच्चों के मन में, छोटेबड़े का भेदभाव बैठाना उचित नहीं है.’’

‘‘ये दोनों अब बच्चे नहीं रहे, तभी तो कह रहा हूं,’’ रामेंद्र हार मानने को तैयार नहीं थे,  ‘‘देखो अलका, छोटी सी चिनगारी से आग का दरिया उमड़ पड़ता है. युवा बच्चों के कदम फिसलते देर नहीं लगती. तुम राजेश पर नजर रखा करो, उस का श्वेता जैसी लड़कियों के साथ उठनाबैठना उचित नहीं.’’ अलका पति रामेंद्र व इरा की प्रेम कहानी से भली प्रकार वाकिफ थी, इसलिए उस के मन में आया कि कह दे कि राजेश तुम्हारे जैसा नहीं है कि मछुआरिन जैसी लड़की के प्रेमपाश में बंध जाएगा. उस के लिए एक से एक बड़े घरों के रिश्ते आ रहे हैं. तुम्हें तो सिर्फ श्वेता से दोस्ती ही दिखाई दे रही है, उस के बड़े घरों के मित्र क्यों नहीं दिखाई देते? पर वह शांत बनी रही. इरा का नाम लेने से घर में फालतू का क्लेश ही उत्पन्न होता. श्वेता ने जिस खूबी से फैक्टरी का कार्य संभाला, उसे देख रामेंद्र दंग रह गए.

GHKKPM: विराट की हरकत पर भड़के फैंस, मेकर्स को सुनाई खरी खोटी

सीरियल गुम है किसी के प्यार में (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) में इन दिनों फैमिली ड्रामा देखने को मिल रहा है, जिसके चलते सीरियल की टीआरपी तो बढ़ रही है लेकिन मेकर्स को खरीखोटी भी सुननी पड़ रही है. इसी बीच लेटेस्ट ट्रैक के चलते विराट यानी एक्टर नील भट्ट  (Neil Bhatt) ट्रोलर्स के निशाने पर आ गए हैं. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

पाखी और विराट के रिएक्शन से ट्रोल हुए मेकर्स

 

View this post on Instagram

 

A post shared by @sairat__fandom

हाल ही में सीरियल के अपकमिंग ट्रैक का प्रोमो सोशलमीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें पाखी के घर से निकलने पर विराट का चेहरा फैंस को पसंद नहीं आ रहा है. दरअसल, सई (Ayesha Singh) के बच्चा खोने के बाद भवानी, पाखी को घर से निकलने के लिए कहती है, जिसके चलते वह घर से जाते हुए नजर आती है. वहीं विराट, सई को संभालते हुए पाखी की तरफ देखता हुआ नजर आता है, जिस पर पाखी समझती है कि विराट उसे सई के मिसकैरिज का जिम्मेदार नहीं मानता और वह फिर विराट के बारे में सोचने लगती है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by @sairat__fandom

फैंस को आया गुस्सा

जहां मेकर्स इस नए ट्रैक के कारण ट्रोलिंग के शिकार हो रहे हैं तो वहीं सोशलमीडिया पर गुम है किसी के प्यार में के फैंस विराट को खरी खोटी सुना रहे हैं.  दरअसल, विराट के रिएक्शन को देखकर एक यूजर ने लिखा, ‘विराट को ऐसा नहीं करना चाहिए. उसे इस वक्त सई को संभालना चाहिए.’ वहीं दूसरे यूजर्स ने विराट के फेशियल एक्सप्रेशन पर मेकर्स की क्लास लगाई है और शो को बर्बाद ना करने की बात कहते नजर आ रहे हैं.

बता दें, अपकमिंग ट्रैक की बात करें तो विराट और सई के बच्चे को जन्म देने के लिए पाखी मान जाएगी और वह सरोगेट मदर बनने के लिए तैयार होगी. लेकिन इन सब के पीछे पाखी का प्लान होगा और वह मां बनने के बाद बच्चे को नहीं देगी. अब देखना है कि सई और विराट की जिंदगी में कौनसा नया मोड़ आएगा.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Ayesha 🕊️ (@ayeshaxslays)

ये भी पढ़ें- Anupama: वनराज की हरकत पर काव्या को आया गुस्सा, इस तरह निकाली भड़ास

Anupama: वनराज की हरकत पर काव्या को आया गुस्सा, इस तरह निकाली भड़ास

स्टार प्लस के सीरियल अनुपमा (Anupama) में जहां अनुज के परिवार की एंट्री हो चुकी है तो वहीं वनराज और काव्या के रिश्ते में दूरियां देखने को मिल रही है. इसी बीच सोशलमीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है. वीडियो में वनराज (Sudhanshu Pandey) ने कुछ ऐसा काम कर दिया है, जिसके कारण उसे काव्या (Madalsha Sharma) की मार खानी पड़ रही है. आइए आपको दिखाते हैं वायरल वीडियो…

वनराज पर आया काव्या को गुस्सा

हाल ही में एक्ट्रेस काव्या के रोल में नजर आने वाली एक्ट्रेस मदालसा शर्मा ने वनराज यानी सुधांशू पांडे के साथ वीडियो शेयर किया है. वीडियो में जहां वनराज बड़े ही प्यार से काव्या की तारीफ करना तो शुरू करता है. लेकिन अगले ही पल वह उसकी बेइज्जती करते हुए कहता है, ‘मैंने उसे दिल दिया हालांकि जरूरत उसे दिमाग की थी.’ वनराज की ये बात सुनते ही काव्या को गुस्सा आता है और वह उसे पीटने लगती है. फैंस को दोनों का ये वीडियो काफी पसंद आ रहा है.

अनुपमा के परिवार के कारण परेशान हुई बरखा

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Anupama Serial (@_anupamaserial_)

अब तक आपने देखा कि अनुज के परिवार के आने से अनुपमा बेहद खुश है.  हालांकि वह अनुज की भाभी बरखा और भाई के इरादों से अनजान है. वहीं अनुज की अनुपमा के परिवार के साथ बढ़ती नजदीकियों के कारण बरखा भाभी प्लानिंग में जुट गई हैं. ताकि वह अनुज को अनुपमा के परिवार से  दूर कर सके.

अनुज से घर और बिजनेस छीनेगी बरखा

अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंदे कि जहां अनुज और अनुपमा अपने नए घर में गृहप्रवेश के लिए बेहद खुश होंगे तो वहीं वनराज, बा को अनुपमा के परिवार से दूर रहने के लिए कहेगा. इसी के साथ बरखा भाभी अपने पति से कहेगी कि वह गृहप्रवेश से पहले अनुज-अनुपमा के घर पर एंट्री करेगी और फिर बिजनेस छीनेगी.

ये भी पढ़ें- TMKOC: गोकुलधाम में पड़े दयाबेन के कदम! जेठालाल को सुंदर ने दी खुशखबरी

रिश्तों का सच- भाग 3: क्या सुधर पाया ननद-भाभी का रिश्ता

‘‘रवि की तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’ रसोईघर से आता दीदी का स्वर सुन रवि के कान चौकन्ने हो गए. पलभर की खामोशी के बाद चंद्रिका का स्वर उभरा, ‘‘नहीं तो, आजकल औफिस में काम अधिक होने से ज्यादा थक जाते हैं, इसलिए थोड़े खामोश हो गए हैं. आप को बुरा लगा क्या?’’

‘‘अरे नहीं, इस में बुरा मानने की क्या बात है? वैसे भी तुम्हारा साथ ज्यादा भला लग रहा है. पहली बार ऐसा लग रहा है कि अपने मायके आई हूं. मां तो थीं नहीं, जिन से यहां आने पर मायके का एहसास होता. पिताजी और भाई का मानदुलार था तो, पर असली मायके का एहसास तो मां या भौजाई के प्यार और मनुहार से ही होता है.’’

‘‘दीदी, मुझे माफ कर दीजिए,’’ चंद्रिका ने हौले से कहा, ‘‘मैं ने आप के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया…’’ ‘‘ऐसी बात नहीं है, हम ने तुम्हें अवसर ही कहां दिया था कि तुम अपना अच्छा या बुरा व्यवहार सिद्ध कर सको. खैर छोड़ो, इस बार जैसा सुकून मुझे पहले कभी नहीं मिला,’’ दीदी का स्वर संतुष्टिभरा था.

टीवी के सामने बैठे रवि का मन भी दीदी की खुशी और संतुष्टि देख चंद्रिका के प्रति प्यार और गर्व से भर उठा था. सुबह उस के उठने से पहले ही दीदी और चंद्रिका उठ कर काम के साथसाथ बातों में व्यस्त थीं. रात भी रवि तो सो गया था, वे दोनों जाने कितनी देर तक एकसाथ जागती रही थीं. जाने उन के अंदर कितनी बातें दबी पड़ी थीं, जो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं. रवि को एक बार फिर अपनी मूर्खता पर पछतावा हुआ. बिस्तर से उठ कर वह औफिस जाने की तैयारी में लग गया.

‘‘कहां जा रहे हो?’’ शीशे के सामने बाल संवार रहे रवि के हाथ अचानक चंद्रिका को देख रुक गए. ‘‘औफिस.’’

‘‘दीदी आई हैं, फिर भी?’’ चंद्रिका की हैरानी वाजिब थी. दीदी के लिए रवि पहले पूरे वर्ष की छुट्टियां बचा के रखता था. जितने भी दिन वह रहतीं, वे उन्हें घुमानेफिराने के लिए छुट्टियां ले कर घर बैठा रहता था. ‘‘छुट्टी क्यों नहीं ले लेते? हम सब घूमने चलेंगे,’’ चंद्रिका जोर देते हुए बोली.

‘‘नहीं, इस बार छुट्टियां बचा रहा हूं, शरारतभरी नजर चंद्रिका के चेहरे पर डालता हुआ रवि बोला.’’ ‘‘क्यों?’’ चंद्रिका के सवाल के जवाब में उस ने उसे अपने पास खींच लिया, ‘‘क्योंकि इस बार मैं तुम्हें मसूरी घुमाने ले जा रहा हूं. अभी छुट्टी ले लूंगा, तो बाद में नही मिलेंगी.’’

चंद्रिका की आंखें भीग उठी थीं, शायद वह विश्वास नहीं कर पा रही थी कि रवि की जिंदगी और दिल में उस के लिए भी इतना प्यार छिपा हुआ है. अपने को संभाल आंखें पोंछती वह लाड़भरे स्वर में बोली, ‘‘मसूरी जाना क्या दीदी से अधिक जरूरी है? मुझे कहीं नहीं जाना, तुम्हें छुट्टी लेनी ही पड़ेगी.’’

‘‘अच्छा, ऐसा करता हूं, सिर्फ आज की छुट्टी ले लेता हूं,’’ वह समझौते के अंदाज में बोला. ‘‘लेकिन इस के बाद जितने भी दिन दीदी रहेंगी, तुम्हीं उन के साथ रहोगी.’’

‘‘मैं, अकेले?’’ चंद्रिका घबरा रही थी, ‘‘मुझ से फिर कोई गलती हो गई तो?’’ ‘‘तो क्या, उसे सुधार लेना. मुझे तुम पर पूरा विश्वास है,’’ मन ही मन सोचता जा रहा था रवि, ‘मैं भी तो अपनी गलती ही सुधार रहा हूं.’

वह रवि की प्यार और विश्वासभरी निगाहों को पलभर देखती रही, फिर हंस कर बोली, ‘‘अच्छा, अब छोड़ो, चल कर कम से कम आज की पिकनिक की तैयारी करूं.’’ दीदी पूरे 15 दिनों के लिए रुकी थीं, चंद्रिका और उन के बीच संबंध बहुत मधुर हो गए थे. इस बार पिताजी भी अधिक खुश नजर आ रहे थे. दीदी के जाने का दिन ज्योंज्यों नजदीक आ रहा था, चंद्रिका उदास होती जा रही थी.

आखिरकार, जीजाजी के बुलावे के पत्र ने उन के लौटने की तारीख तय कर दी. दौड़ीदौड़ी चंद्रिका बाजार जा कर दीदी के लिए साड़ी और जीजाजी के लिए कपड़े खरीद लाई थी. तरहतरह के पापड़ और अचार दीदी के मना करने के बावजूद उस ने बांध दिए थे. शाम की ट्रेन थी. चंद्रिका दीदी के साथ के लिए तरहतरह की चीजें बनाने में व्यस्त थी. रवि सामान पैक करती दीदी के पास आ बैठा. दीदी ने मुसकरा कर उस की तरफ देखा, ‘‘अब तुम कब आ रहे हो चंद्रिका को ले कर?’’

‘‘आऊंगा दीदी, जल्दी ही आऊंगा,’’ बैठी हुई दीदी की गोद में वह सिर रख लेट गया था, ‘‘तुम नाराज तो नहीं हो न?’’ ‘‘किसलिए?’’ उस के बालों में हाथ फेरती हुई दीदी एकाएक ही उस की बात सुन हैरत में पड़ गईं.

‘‘मैं तुम्हारे साथ पहले जितना समय नहीं बिता पाया न?’’ रवि बोला. ‘‘नहीं रे, बल्कि इस बार मैं यहां जितनी खुश रही हूं, उतनी पहले कभी नहीं रही. चंद्रिका के होते मुझे किसी भी चीज की कमी महसूस नहीं हुई. एक बात बताऊं, मुझे बहुत डर लगता था. तेरे इतने प्यार जताने के बाद भी लगता था, मेरा भाई मुझ से अलग हो जाएगा. कभीकभी सोचती, शायद मेरे आने की वजह से ही चंद्रिका और तुम्हारे बीच झगड़ा होता है. तुझे देखने के लिए मन न तड़पता तो शायद यहां कभी आती ही नहीं.

‘‘चंद्रिका के इस बार के अच्छे व्यवहार ने मुझे एहसास दिलाया है कि भाई तो अपना होता ही है, पर भौजाई को अपना बनाना पड़ता है, क्योंकि वह अगर अपनी न बने तो धीरेधीरे भाई भी पराया हो जाता है. आज मैं सुकून महसूस कर रही हूं. चंद्रिका जैसी अच्छी भौजाई के होते मेरा भाई कभी पराया नहीं होगा. इस सब से भी बढ़ कर पता है, उस ने क्या दिया है मुझे?’’ ‘‘क्या?’’

‘‘मेरा मायका, जो मुझे पहले कभी नहीं मिला था. चंद्रिका ने मुझे वह सब दे दिया है,’’ दीदी की आंखें बरस उठी थीं, ‘‘चंद्रिका ने यह जो एहसान मुझ पर किया है, इस का कर्ज कभी नहीं चुका पाऊंगी.’’ ‘‘खाना तैयार है,’’ चंद्रिका कब कमरे में आई, पता ही न चला. लेकिन उस की भीगीभीगी आंखें बता रही थीं कि वह बहुतकुछ सुन चुकी थी. गर्व से निहारती रवि की आंखों में झांक चंद्रिका बोली, ‘‘कैसे भाई हो, पता नहीं, आज सुबह से दीदी ने कुछ नहीं खाया. चलो, खाना ठंडा हो रहा है.’’

दीदी को ट्रेन में बिठा रवि उन का सामान व्यवस्थित करने में लगा हुआ था. चंद्रिका दीदी के साथ ही बैठी उन्हें दशहरे की छुट्टियों में आने के लिए मना रही थी. हमेशा उतरे मुंह से वापस होने वाली दीदी का चेहरा इस बार चमक रहा था. ट्रेन की सीटी की आवाज के साथ ही रवि ने कहा, ‘‘उतरो चंद्रिका, ट्रेन चलने वाली है.’’

चंद्रिका दीदी से लिपट गई, ‘‘जल्दी आना और जाते ही पत्र लिखना.’’ ‘‘अब पहले तुम दोनों मेरे घर आना,’’ भीगी आंखों के साथ दीदी मुसकरा रही थीं.

उन के नीचे उतरते ही ट्रेन ने सरकना शुरू कर दिया. ‘‘दीदी, पत्र जरूर लिखना,’’ दोनों अपनेअपने रूमाल हिला रही थीं. ट्रेन गति पकड़ स्टेशन से दूर होती जा रही थी. चंद्रिका ने पलट कर रवि की तरफ देखा. रवि की गर्वभरी आंखों को निहारती चंद्रिका की आंखें भी चमक उठी थीं.

ये भी पढ़ें- अर्पण: क्यों रो बैठी थी अदिति

क्यों जरूरी है करियर काउंसलिंग

मीनू के पेरैंट्स उसे डाक्टर बनाना चाहते थे. पेरैंट्स के कहने पर उस ने मैडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी की, पर उस का स्कोर सही न होने की वजह से कहीं एडमिशन नहीं मिला. उस के पेरैंट्स उस से फिर मैडिकल प्रवेश की तैयारी करने को कहने लगे. लेकिन मीनू ने साफ मना कर दिया और अब वह बीएससी फाइनल में है और अच्छा स्कोर कर रही है. उस की साइंटिस्ट बनने की इच्छा है.

पेरैंट्स कुछ चाहते हैं, जबकि बच्चों की इच्छा कुछ और होती है. बिना मन के किसी भी विषय में बच्चा सफल नहीं होता है. इसलिए 12वीं कक्षा के बाद कैरियर काउंसलिंग करवा लेनी चाहिए ताकि बच्चे की इच्छा का पता चल सकें मगर कुछ हठी पेरैंट्स का जवाब बहुत अलग होता है. मसलन, कैरियर काउंसलिंग क्या है? उसे करवाना क्यों जरूरी है? पहले तो हम ने कभी नहीं करवाई? क्या हमारी बेटी पढ़ाई में कमजोर है? हम जानते हैं कि उसे क्या पढ़ना है आदि. ऐसे हठधर्मी पेरैंट्स को समझना बहुत मुश्किल होता है.

अर्ली कैरियर काउंसलिंग है जरूरी

इस बारें में पिछले 30 सालों से छात्रों की काउंसलिंग कर रहे कैरियर काउंसलर एवं डाइरैक्टर डा. अजित वरवंडकर, जिन्हें इस काम के लिए राष्ट्रपति अवार्ड भी मिल चुका है. कहते हैं, ‘‘मैं बच्चों की काउंसलिंग 10वीं कक्षा से शुरू करता हूं क्योंकि कैरियर प्लानिंग का सही समय 10वीं कक्षा ही होती है.

‘‘इस कक्षा के बाद ही छात्र विषय का चुनाव करते हैं, जिस में ह्यूमिनिटीस, कौमर्स, साइंस आदि होते है. अगर कोई बच्चा डाक्टरी या इंजीनियरिंग की पढ़ाई करना चाहता हो और उस ने कोई दूसरा विषय ले लिया तो उसे आगे चल कर मुश्किल होगी. इसलिए इस की प्लानिंग पहले से करने पर बच्चे को सही गाइडेंस मिलती है.’’

बच्चे के 12वीं कक्षा में आने पर यह समझ लेना चाहिए कि उस ने अपने स्ट्रीम का चुनाव कर लिया है. बड़ेबड़े कैरियर औप्शन 6-7 ही होते है, जिन में डाक्टर, इंजीनियर, चार्टेड अकाउंटैंट, मैडिसिन, ला आदि हैं, लेकिन आज इंडिया में

5 हजार से अधिक कैरियर औप्शन हैं, जिन्हें वे जानते नहीं हैं, इसलिए बच्चों को परेशान होने की जरूरत नहीं.

उन्हें केवल यह पता होना चाहिए कि उन के लिए कौन सा कैरियर औप्शन सही है, जिस में वे अधिक खुश रह सकते हैं. बच्चों का वैज्ञानिक रूप से 3 बातों को ध्यान में रखते हुए कैरियर औप्शन का चुनाव करना ठीक रहता है-व्यक्तित्व, कार्यकुशलता, व्यावसायिक रुचि.

नौकरियों की नहीं कमी

व्यावसायिक रुचि के बारे में 1958 में जौन हौलैंड सोशल साइकोलौजिस्ट ने सब से पहले परिचय करवाया था. उन के अनुसार व्यक्ति उस काम को चुनता है, जिस में उस के जैसे वातावरण और काम करने वाले हों, तो उन की योग्यता और क्षमता का विकास जल्दी होगा और वे अपनी किसी भी समस्या को खुल कर कोलिंग से कहने में समर्थ होते है.

डा. अजित वरवंडकर का कहना है कि इन 3 चीजों को मिला कर कैरियर चुनना सब से अच्छा होता है. इस के अलावा 12वीं कक्षा के बाद अपने हुनर को पहचानने और उस के अनुसार पढ़ाई या वोकेशनल ट्रेनिंग भी ली जा सकती है.

हर किसी को इंजीनियर बनने की जरूरत नहीं क्योंकि हर साल हमारे देश में 17% से भी ज्यादा इंजीनियर बन रहे हैं, जबकि केवल डेढ़ लाख बच्चों को ही उस में जौब मिलती है. बाकी या तो पोस्ट ग्रेजुएट कर रहे हैं या फिर लाइन बदल कर कोई दूसरा काम कर रहे हैं. इसलिए बच्चा अपने हुनर को पहले से पहचान कर पायलट, एनिमेशन ऐक्सपर्ट, रिसर्च आदि कुछ भी अपनी इच्छा के अनुसार कर सकती है, लेकिन इस की जानकारी बहुत कम बच्चों और उन के पेरैंट्स को होती है, जो कैरियर काउंसलिंग से आसानी से मिल सकती है.

इनफौर्मैशन टैक्नोलौजी में बदलाव

डा. अजित कहते हैं कि कोविड के बाद इनफौर्मेशन टैक्नोलौजी में जितना बदलाव पिछले 2 सालों में आया है, उतना कोविड न होने पर 10 सालों में भी नहीं आता. आईटी इंडस्ट्री में बच्चों को बहुत रोजगार मिला है. आगे की सारी जौब डिजिटल टैक्नोलौजी के साथ तेजी से ग्रो करेंगी. इस में जौब डिजिटल टैक्नोलौजी, डेटा ऐनालिटिक और आर्टिफिशियल इंटैलीजैंट एनेबल्ड होंगे.

अब डाक्टर्स को भी डिजिटल टैक्नोलौजी पर ही काम करना पड़ेगा. अभी 60 से 70% सर्जरी रोबोट्स कर रहे हैं, इसलिए 12वीं कक्षा पास करने वाले बच्चों के लिए मेरा सुझव है कि वे अपनी 2-3 तरीके की स्किल्स को तैयार करें, जिस में सब से जरूरी है, डाटा ऐनालिटिक्स औरबेसिक कोडिंग की स्किल्स का भी होना. मसलन, कार चलने वाले को टायर बदलना आना चाहिए.

इस के अलावा किसी भी क्षेत्र में जाने पर प्रोग्रामिंग आना चाहिए क्योंकि यही हमारा भविष्य होगा. कम्युनिकेशन भी अच्छा होना चाहिए ताकि आप की बातचीत को समझने में किसी को समस्या न हो. साथ ही बच्चे की अपने विषय पर कमांड होनी भी जरूरी है.

स्किल डैवलपमैंट है जरूरी

अजित कहते हैं कि ऐसे बहुत सारे बच्चे हमारे देश में हैं, जिन के पास वित्तीय क्षमता बहुत कम है. उन के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ से स्किल डैवलपमैंट की कई सुविधाए मिलती हैं. उस के अंदर भी बहुत सारे कोर्सेज चलते हैं और कोर्सेज करने की वजह से स्टाइपैंड भी मिलता है. इसलिए थोड़ा जागरूक हो कर सरकार के रोजगार विभाग में जाएं और पता लगाएं कहां क्या हो रहा है. इस में एक बात तय है कि बिना कुछ किए आप आगे नहीं बढ़ सकते. स्किल डैवलप तो करना ही पड़ेगा.

क्षेत्र के हिसाब से चुनें स्किल्स

कई बार ऐसा भी देखा गया है कि अलगअलग शहरों में अलगअलग तरीके के जौब पैटर्न होते है. ऐसे में बच्चे का अपने आसपास के वातावरण को देखते हुए स्किल डैवलपमैंट करना सही रहता है. गांव कृषि प्रधान हैं, इसलिए वहां के छात्रों को कृषि से संबंधित जानकारी, खदानों में काम करने के लिए उन से जुड़ी जानकारी होने की अधिक जरूरत होती है. छोटे शहरों में रिटेल नैटवर्किंग, डिस्ट्रीब्यूशन आदि होते हैं.

इस के अलावा यह भी देखना जरूरी है कि किस क्षेत्र में किस तरह के उद्योग का विकास हो रहा है. मसलन, खनिज, बिजली, मनोरंजन इंडस्ट्री आदि में नियुक्तियों को देखते हुए अपनी योग्यता को बढ़ाना चाहिए ताकि जौब मिलने में आसानी हो. इस के लिए बच्चों का अपने क्षेत्र के बारे में जानकारी लेते रहना जरूरी है और यह उन्हें अच्छी पत्रपत्रिकाएं पढ़ते रहने से मिलती रहेगी.

ये भी पढ़ें- Father’s Day 2022: पर्यटकों को लुभाता रंगीलो राजस्थान

महामारी के बाद छोटे बच्चों को स्कूल जाने और पढने की रूचि को बढ़ाएं कुछ ऐसे

कोविड के बाद रीना अपनी 5 साल के बेटे से बहुत परेशान है, क्योंकि उसका बेटा रेयान दिन भर खेलना चाहता है. स्कूल जाना नहीं चाहता, रोज कुछ न कुछ बहाने बनाता है, एक दिन उसकी माँ बहुत घबरा गयी, क्योंकि उसने माँ को बताया कि उसे पेटदर्द हो रहा है, माँ पहले उसे पेट दर्द की दवा दी और उसे लेकर डॉक्टर के पास जब जाने लगी तो उसने माँ से कहा कि उसका पेट दर्द ठीक हो गया है. फिर भी माँ नहीं मानी और डॉक्टर ने जाँच कर बताया कि कुछ सीरियस नहीं है, शायद मौसम की वजह से ऐसा हुआ है. उसे सादा खाना देना ठीक रहेगा.

कोविड महामारी की वजह से ऑनलाइन पढाई कर रहे छोटे बच्चों कीसमस्या पेरेंट्स के लिए यह भी है कि अब ऑनलाइन नहीं है,लेकिन बच्चेमोबाइल के लिए जिद करते है, न देने पर अपनी मनमानी कुछ भी करते है. मोबाइल मिलने पर कार्टून देखना शुरू कर देते है. कल्पना की 6 साल की बेटी मायरा भी कुछ कम नहीं अपनी अपर केजी की क्लास में न जाकर नर्सरी में बैठी रहती है,उसकी भोली सूरत देखकर टीचर भी कुछ नहीं कहती. कल्पना के लिए बहुत समस्या है. उन्हें हर दूसरे दिन उसे दूसरे बच्चे से क्लास की पढाई का नोट्स लेना पड़ता है. पूछने पर मायरा कहती है कि आप तो पहले ऑनलाइन पढ़ाते समय सारे नोट्स लेती थी, अब भी ले लीजिये, मैं घर आकर आपसे पढ़ लेती हूँ. ऐसे व्यवहार केवल रीना और कल्पना ही फेस नहीं कर रही, बल्कि बाकी बच्चों की माएं भी परेशान है, उन्हें इस बात की फ़िक्र है कि पहले की तरह बच्चों में स्कूल के प्रति रुझान कैसे लाई जाय. हालाँकि बच्चे स्कूल जाकर खुश है, लेकिन उनके पुराने मित्र भी नए बन चुके है. वे चुपचाप एक कोने में बैठे रहते है और टीचर के कुछ कहने पर अनसुना कर देते है. दो साल का गैप छोटे बच्चों और उनके पेरेंट्स के लिए एक समस्या अवश्य है, लेकिन उसे ठीक करने के लिए कुछ उपाय निम्न है, जिसे टीचर्स और पेरेंट्स को धैर्य के साथ पालन करना है.

बच्चों के व्यवहार को समझे

देखा जाय, तो इसमें बच्चों का दोष भी नहीं, उन्हें क्लासरूम में सारेटीचर्स उन्हें नए लग रहे है,पिछले दो सालों में कई टीचर्स बदले गए या फिर छोड़कर चले गए, जिससे बच्चे उनसे बात करने या कुछ पूछने से डर रहे है. इस बारें में मुंबई की ओर्किड्स द इंटरनेशनल स्कूल की इंग्लिश अध्यापिका नेहा लोहाना कहती है कि छोटे बच्चों को एक रूटीन और अनुसाशन में लाना अब एक बड़ी चुनौती हो चुकी है, क्योंकि अभी इन बच्चों ने अधिकतर समय अपने पेरेंट्स के साथ इनडोर गेम्स खेलते हुए बिताया है. इसे ठीक करने के लिए पेरेंट्स और टीचर्स मिलकर कदम उठाने की जरुरत है, जिसमे उन्हें लर्निंग अनुभव और एक्टिविटीज के द्वारा एक प्लान बनाने की जरुरत होती है.पेरेंट्स अपने काम को थोड़ा रोककर बच्चे की सीखने या कुछ देखने की आदतों को सुधारें. अगर बच्चा रोज-रोज घर आकर टीचर्स के बारें में कुछ आरोप लगाता है, तो उसे धैर्य से समझने की कोशिश करें, डांटे नहीं. इसके बाद टीचर से कहकर उसके लिए कुछ दूसरे एक्टिविटीज को लागू करने की कोशिश करें, जो उसके लिए रुचिपूर्ण हो. इसके अलावा टीचर्स के साथ स्कूल के नए माहौल में बच्चे को सुरक्षा और सुरक्षित महसूस करें, ये सुनिश्चित करना बहुत जरुरी है. हालाँकि ये थोड़े दिनों में ठीक हो जायेगा, पर अभी के लिए ये बहुत चुनौतीपूर्ण है.

नए क्लास में उत्तीर्ण की चुनौती

कोविड के दौरान कुछ बच्चों ने शुरू के दो साल के क्लासेस पढ़े नहीं है और उन्हें अगले कक्षा में उत्तीर्ण कर दिया गया है,ऐसे में उन्हें नयी कक्षा में पढाई को समझ पाना मुश्किल हो रहा है. इस समस्या के बारें में पूछने पर इंग्लिश टीचर नेहा कहती है कि ये समस्या वाकई सभी स्कूलों के लिए एक बड़ी चुनौती है. लॉकडाउन के दौरान घर पर ऑनलाइन पढ़ाते हुएटीचर्स ने कई प्रकार के चैलेन्ज फेस किये है, मसलन पाठ को रिवाईज करवाना, कुछ नया सिखाना आदि, क्योंकि अधिकतर बच्चे ऑनलाइन समय पर नहीं आते थे, उनकी उपस्थिति बहुत अधिक अनियमितऔर अनुपस्थित रहना होता था, जिससे टीचर्स को एक पाठ को कई बार पढाना पड़ता था. कई बच्चों ने तो कलम और पेंसिल से लिखना बंद कर दिया और उन्हें लिखने से अधिक ओरल परीक्षा अच्छी लगने लगी थी. देखा जाय,तो ये पेरेंट्स और टीचर्स के लिए मुश्किल समय है, इसे लगातार मेहनत के साथ ही इम्प्रूव किया जा सकेगा.

मुश्किल है अनुसाशन में रखना

ये सही है कि दो साल बाद बड़े बच्चों को भी एडजस्ट करने में समस्या आ रही है, क्योंकि स्कूल के अनुसाशन, सहपाठी से खेलना, किसी चीज को शेयर करना आदि सब बच्चों से दूर चले गए है, क्योंकि उन्हें अब स्कूल में मास्क पहनना, बार-बार हाथ सेनिटाइज करना, डिस्टेंस बनाए रखना आदि सब स्कूल में करना पड़ता है, ऐसे में किसी से सहज तरीके से बात करने में भी बच्चे हिचकिचाते है. ओर्किड्स द इंटरनेशनल स्कूल में बच्चों की काउंसलिंग कर रही काउंसलर और एचओडी बेथशीबा सेठ कहती है कि इतने सालों बाद बच्चे ही नहीं, टीचर्स को भी बच्चों के साथ एडजस्ट करने में मुश्किल आ रही है. महामारी के बाद मानसिक स्वास्थ्य पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि जैसे-जैसे हम जीवन के नए तरीकों को अपनाना शुरू करते है. जीवन की नई शर्तों के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है. बच्चों और उनके मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा करना असंभव है.छोटे बच्चे स्वभाव से फ्लेक्सिबल दिमाग के होते है और वे अपनी समस्या को किसी के सामने कह नहीं पाते. वे शाय और डीनायल मूड में होते है,उनके हाँव-भाँव से उनकी समस्या को पकड़ना पड़ता है. इसके अलावा उन्हें खुद को और अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए सुरक्षित वातावरण देना पड़ता है, ताकि खुलकर वे अपनी बात रख सकें.

अपने एक अनुभव के बारें में काउंसलर बताती है कि एक बच्चे का एडमिशन क्लास वन में हुआ, उसने लोअर और अपर केजी नहीं पढ़ा है, जब वह अपनी माँ और बड़े भाई के साथ स्कूल आया, तो उसे स्कूल बहुत ही अजीब लग रहा था, जब उसने अपनी टीचर को देखा, तो भाई के पीछे छुप गया और कहने लगा कि ये टीवी वाली टीचर यहाँ क्यों आई है, फिर किसी दूसरे टीचर को बुलाकर उसे क्लास में भेजा गया. अगले दिन टीचर ऑनलाइन आकर बच्चे को समझाई कि वह अब उसके पेरेंट्स की तरह सामने दिखेगी और उन्हें पढ़ाएगी. तब जाकर बच्चे ने माना और उस टीचर की क्लास में बैठा. ये समय कठिन है, इसलिए अध्यापकों और पेरेंट्स को बहुत धैर्य के साथ बच्चों को पढाना है, ताकि उन्हें फिर से वही ख़ुशी मिले और स्कूल आने से परहेज न करें.

ये भी पढ़ें- घर और औफिस में यों बनाएं तालमेल

हिस्टेरेक्टोमी के बाद मैं सो नहीं पाती, क्या करुं?

सवाल-

मैं ने कुछ महीने पहले हिस्टेरेक्टोमी (गर्भाशय को काट कर निकाल देना) करवाई थी. इस के बाद मेरे सोने का चक्र बदल गया. मैं सो नहीं पाती. मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब-

जिन महिलाओं के गर्भाशय को सर्जरी से निकाल दिया जाता है उन्हें  वर्चुअल रूप से रातोंरात मेनोपौज (रजोनिवृत्ति यानी माहवारी बंद होना) हो जाता है. इन मामलों में नींद में बाधा आना आम बात है. संभावित रूप से हौट फ्लशेज या रात में पसीना आने के अलावा यह मेनोपौज का सब से आम लक्षण है. मेनोपौज के बाद ज्यादा से ज्यादा आराम करें, सोने के दौरान साफसफाई का पूरा ध्यान रखें. कौफी कम से कम पीएं, सही खानपान लें, नियमित रूप से व्यायाम करें और सोने का एक निश्चित समय तय करें. सर्जरी के कारण होने वाले मेनोपौज में महिलाओं को नींद आने में काफी मुश्किल आती है और वे रात में ज्यादा बार जागती हैं. मेनोपौज के साइड इफैक्ट्स को कम करने के लिए हारमोन रिप्लेसमैंट थेरैपी पर विचार करने की भी सलाह दी जाती है.

ये भी पढ़ें- यदि मुझे पीसीओएस है तो मुझे Pregnant होने में कितना समय लगेगा?

ये भी पढ़ें- 

गर्भाशय फाइब्रोइड्ससुसाध्य (गैरकैंसर) ट्यूमर है, जो गर्भाश्य की मांसपेशीय परत पर अथवा उसके भीतर विकसति होता है.इसमें तंतुमय टिश्यू और चिकने मांसपेशी सेल्स होते है, जिनका पोषण रक्तवाहिनी के सघन नेटवर्क से होता है. फाइब्रोइड्स महिलाओं में होने वाला बहुत ही सामान्य सुसाध्य ट्यूमर है. अनुमान है कि 30 से 50 वर्ष के बीच की महिलाओं में करीब 25 से 35 प्रतिशत में फाइब्रोइड्स का इलाज सापेक्ष हो गया है. सामान्यतया जिस महिला में गर्भाशय फाइब्रोइड्स की समस्या है, उनमें एक से अधिक फाइब्रोइड्स है और वे बडे़ आकार के हो सकते है. कुछ मटर से बडे़ नहीं होते है, जबकि अन्य बढ़कर खरबूजे के आकार का हो सकते है.

लक्षण

एक महिला मासिक धर्म में अधिक रक्तस्राव, दर्दभरा मासिकधर्म, मासिकधर्म के दौरान रक्तस्राव और पीठशूल या पीठदर्द जैसे लक्षणों से इसका अनुभव करती है. अधिकतर मरीजों में रक्तस्राव इतना अधिक होगा किउनमें यह खून की कमी का कारण बन जाता है. खून की कमी से थकान,सिरदर्द हो सकता है.जब फाइब्रोइड्स आकार में बड़ा होता है, तब यह अन्य पेल्विक अंगो पर दबाव बनाने लगता है. इसके फलस्वरूप पेट के नीचले हिस्से में भारीपन, बार-बार पेशाब लगना, पेशाब होने में कठिनाई और कब्ज महसूस हो सकता है. ये लक्षण किसी को हल्का, कम आकर्षक लग सकते है और चिड़चिड़ापन आगे चलकर कामेच्छा घटा सकती है और इसका असर लोगों की जिंदगी पर पड़ सकता है. ओबेस्ट्रिक्स एंड ग्यानकोलाजी जर्नल तथा वुमेन हेल्थ जर्नल में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार गर्भाशय फाइब्रोइड से काफी भय एवं रूग्णता हो सकती है और वर्कप्लेस प्रदशर्न से समझौता करना पड़ सकता है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें