रिश्तों का सच- भाग 1: क्या सुधर पाया ननद-भाभी का रिश्ता

घर में घुसते ही चंद्रिका के बिगड़ेबिगड़े से तेवर देख रवि भांपने लगा था कि आज कुछ हुआ है, वरना रोज मुसकरा कर स्वागत करने वाली चंद्रिका का चेहरा यों उतरा हुआ न होता. ‘‘लो, दीदी का पत्र आया है,’’ चंद्रिका के बढ़े हुए हाथों पर सरसरी सी नजर डाल रवि बोला, ‘‘रख दो, जरा कपड़ेवपड़े तो बदल लूं, पत्र कहीं भागा जा रहा है क्या?’’

चंद्रिका की हैरतभरी नजरों का मुसकराहट से जवाब देता हुआ रवि बाथरूम में घुस गया. चंद्रिका के उतरे हुए चेहरे का राज भी उस पर खुल गया था. रवि मन ही मन सोच कर मुसकरा उठा, ‘सोच रही होगी कि आज मुझे हुआ क्या है, दीदी का पत्र हर बार की तरह झपट कर जो नहीं लिया.’ हर साल गरमी की छुट्टियों में दीदी के आने का सिलसिला बहुत पुराना था. परंतु विवाह के 5 वर्षों में शायद ही ऐसा कभी हुआ हो जब उन के आने को ले कर चंद्रिका से उस की जोरदार तकरार न हुई हो. बेचारी दीदी, जो इतनी आस और प्यार के साथ अपने एकलौते, छोटे भाई के घर थोड़े से मान और सम्मान की आशा ले कर आती थीं, चंद्रिका के रूखे बरताव व उन दोनों के बीच होती तकरार से अब चंद दिनों में ही लौट जाती थीं.

दीदी से रवि का लगाव कम होता भी, तो कैसे? दीदी 10 वर्ष की ही थीं, जब मां रवि को जन्म देते समय ही उसे छोड़ दूसरी दुनिया की ओर चल दी थीं. ‘दीदी न होतीं तो मेरा क्या होता?’ यह सोच कर ही उस की आंखें भर उठतीं. दीदी उस की बड़ी बहन बाद में थी, मां जैसी पहले थीं. कैसे भूल जाता रवि बचपन से ले कर जवानी तक के उन दिनों को, जब कदमकदम पर दीदी ममता और प्यार की छाया ले उस के साथ चलती रही थीं.

दीदी तो विवाह भी न करतीं, परंतु रिश्तेदारों के तानों और बेटी की बढ़ती उम्र से चिंतित पिताजी के चेहरे पर बढ़ती झुर्रियों को देखने के बाद रवि ने अपनी कसम दे कर दीदी को विवाह के लिए मजबूर कर दिया था. उन के विवाह के समय वह बीए में आया ही था. विवाह के बाद भी बेटे की तरह पाले भाई की तड़प दीदी के अंदर से गई नहीं थी, उस की जरा सी खबर पाते ही दौड़ी चली आतीं. वह भी उन के जाने के बाद कितना अकेला हो गया था. यह तो अच्छा हुआ कि जीजाजी अच्छे स्वभाव के थे. दीदी की तड़प समझते थे, भाईबहन के प्यार के बीच कभी बाधा नहीं बने थे.

चंद्रिका को भी तो वह ही ढूंढ़ कर लाई थीं. उन दिनों की याद से रवि मुसकरा उठा. दीदी उस के विवाह की तैयारी में बावरी हो उठी थीं. ऐसा भी नहीं था कि चंद्रिका को इन बातों की जानकारी न हो, विवाह के शुरुआती दिनों में ही सारी रामकहानी उस ने सुना दी थी. विवाह के बाद जब पहली बार दीदी आईर् थीं तो चंद्रिका भी उन से मिलने के लिए बड़ी उत्साहित थी और स्वयं रवि तो पगला सा गया था. आखिर उस के विवाह के बाद वह पहली बार आ रही थीं. वह चाहता था भाई की सुखी गृहस्थी देख वह खिल उठें.

पति के ढेरों आदेशनिर्देश पा कर चंद्रिका का उत्साह कुछ कम हो गया था, वह कुछ सहम सी भी गई थी. परंतु रवि तो अपनी ही धुन में था, चाहे कुछ हो जाए, दीदी को इतना सम्मान और प्यार मिलना चाहिए कि उन की ममता का जरा सा कर्ज तो वह उतार सके.

दीदी के आने के बाद उन दोनों के बीच चंद्रिका कहीं खो सी गई थी. उन दोनों को अपने में ही मस्त पा उन के साथ बैठ कर स्वयं भी उन की बातों में शामिल होने की कोशिश करती, पर रवि ऐसा मौका ही न देता. तब वह खीज कर रसोई में घुस खाना बनाने की कोशिश में लग जाती. मेहनत से बनाया गया खाना देख कर भी रवि उस पर नाराज हो उठता, ‘यह क्या बना दिया? पता नहीं है, दीदी को पालकपनीर की सब्जी अच्छी लगती है, शाही पनीर नहीं.’ फिर रसोई में काम करती चंद्रिका का हाथ पकड़ कर बाहर ला खड़ा करता और कहता, ‘आज तो दीदी के हाथ का बना हुआ ही खाऊंगा. वे कितना अच्छा बनाती हैं.’

तब भाईबहन चुहलबाजी करते हुए रसोई में मशगूल हो जाते और चंद्रिका बिना अपराध के ही अपराधी सी रसोई के बाहर खड़ी उन्हें देखती रहती. दीदी जरूर कभीकभी चंद्रिका को भी साथ लेने की कोशिश करतीं, लेकिन रवि अनजाने ही उन के बीच एक ऐसी दीवार बन गया था कि दोनों औपचारिकता से आगे कभी बढ़ ही न पाई थीं. उस समय तो किसी तरह चंद्रिका ने हालात से समझौता कर लिया था, लेकिन उस के बाद जब भी दीदी आतीं, वह कुछ तीखी हो उठती. सीधे दीदी से कभी कुछ नहीं कहा था, लेकिन रवि के साथ उस के झगड़े शुरू हो गए थे. दीदी भी शायद भांप गई थीं, इसीलिए धीरेधीरे उन का आना कम होता जा रहा था. इस बार तो पूरे एक वर्ष बाद आ रही थीं, पिछली बार उन के सामने ही चंद्रिका ने रवि से इतना झगड़ा किया कि वे बेचारी 4 दिनों में ही वापस चली गई थीं. जितने भी दिन वे रहीं, चंद्रिका ने बिस्तर से नीचे कदम न रखा, हमेशा सिरदर्द का बहाना बना अपने कमरे में ही पड़ी रहती.

एक दोपहर दीदी को अकेले काम में लगा देख भनभनाता हुआ रवि, चंद्रिका से लड़ पड़ा था. तब वह तीखी आवाज में बोली थी, ‘तुम क्या समझते हो, मैं बहाना कर रही हूं? वैसे भी तुम्हें और तुम्हारी दीदी को मेरा कोई काम पसंद ही कब आता है, तुम दोनों तो बातों में मशगूल हो जाओगे, फिर मैं वहां क्या करूंगी?’ बढ़तेबढ़ते बात तेज झगड़े का रूप ले चुकी थी. दीदी कुछ बोलीं नहीं, पर दूसरे ही दिन सुबह रवि द्वारा मिन्नतें करने के बाद भी चली गई थीं. उन के चले जाने के बाद भी बहुत दिनों तक उन दोनों के संबंध सामान्य न हो पाए थे, दीदी के इस तरह चले जाने के कारण वह चंद्रिका को माफ नहीं कर पाया था.

दोनों के बीच बढ़ते तनाव को देख अभी तक खामोशी से सबकुछ देख रहे पिताजी ने आखिरकार एक दिन रात को खाने के बाद टहलने के लिए निकलते समय उसे भी साथ ले लिया था. वे उसे समझाते हुए बोले थे, ‘पतिपत्नी के संबंध का अजीब ही कायदा होता है, इस रिश्ते के बीच किसी तीसरे की उपस्थिति बरदाश्त नहीं होती है…’ ‘लेकिन दीदी कोई गैर नहीं हैं,’ बीच में ही बात काटते हुए, रवि का स्वर रोष से भर उठा था.

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विक्की कौशल ने दोबारा रचाई शादी! जानें क्या है मामला

बौलीवुड एक्टर विक्की कौशल ने साल 2021 में एक्ट्रेस कटरीना कैफ संग शादी रचाई थी, जिसकी फोटोज और वीडियो आज भी सोशलमीडिया पर वायरल होती रहती हैं. इसी बीच एक्टर विक्की कौशल की एक वीडियो वायरल हो रही है, जिसमें वह दोबारा घोड़ी पर चढे हुए नजर आ रहे हैं. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

ऐसे हुई विक्की कौशल की दोबारा शादी

 

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हाल ही में शादी के बाद पहले अवौर्ड शो आईफा 2022 में पहुंचे विक्की कौशल की शो के होस्ट रितेश देशमुख और मनीष पॉल ने टांग खींची. दरअसल, शो में अकेले आए विक्की कौशल की टांग खींचते हुए होस्ट ने उन्हें घोड़ी चढाई और फिर  कैटरीना कैफ का बड़ा सा पोस्टर लेकर उन्हें वरमाला पहनाई. एक्टर की इस वीडियो पर फैंस के मजेदार रिएक्शन देखने को मिल रहे हैं.

 

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शादी के बाद लाइफ के बारे में कही ये बाद

 

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आईफा अवॉर्ड 2022 में फिल्म ‘सरदार उधम सिंह’ के लिए बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड जीत चुके विक्की कौशल ने हाल ही में शादी के बाद अपनी लाइफ के बारे में चुप्पी तोड़ते हुए एक इंटरव्यू में कहा था कि  ‘कैटरीना कैफ के साथ मैरिड लाइफ बहुत अच्छी चल रही है… सुकून भरी है. मैं कैटरीना कैफ को अवॉर्ड शो में मिस कर रहा हूं. उम्मीद है कि अगले साल हम आईफा में एक साथ आएंगे.’

 

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बता दें, ‘सरदार उधम सिंह’ के बाद एक्टर विक्की कौशल ‘गोविंदा नाम मेरा’ और आनंद तिवारी और लक्ष्मण उतरेकर की अनटाइटल्ड फिल्म का हिस्सा हैं. वहीं ‘सूर्यवंशी’ के बाद एक्ट्रेस कैटरीना कैफ फिल्म ‘टाइगर 3’, फिल्म ‘मेरी क्रिसमस’ और फिल्म ‘फोनभूत’ जैसी फिल्मों की शूटिंग में बिजी हैं, जिसके कारण दोनों एक दूसरे से दूर हैं. हालांकि वह कई बार एयरपोर्ट पर साथ नजर आ चुके हैं.

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Khatron Ke Khiladi 12: शिवांगी जोशी के साथ हुई धक्कामुक्की तो रोहित शेट्टी ने किया ये काम

बौलीवुड डायरेक्टर रोहित शेट्टी का जल्द ही सुपरहिट शो खतरों के खिलाड़ी 12 शुरु होने वाला है, जिसकी शूटिंग भी शुरु हो चुकी है. वहीं इस शो से जुड़े कंटेस्टेंट अपनी अपडेट फैंस के साथ शेयर कर रहे हैं. इसी बीच Khatron Ke Khiladi 12 का इस बार हिस्सा बन रहीं एक्ट्रेस शिवांगी जोशी की एक वीडियो वायरल हो रही है, जिसमें एक्ट्रेस के साथ धक्कामुक्की होते हुए नजर आ रही है. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

शिवांगी की मदद करने पहुंचे रोहित

दरअसल, एक्ट्रेस शिवांगी जोशी ने Khatron Ke Khiladi 12  की शूटिंग के बीच वीडियो शेयर किया है, जिसमें एक्ट्रेस शिवांगी, धक्कामुक्की से परेशान होती नजर आ रही हैं. वहीं एक्ट्रेस को बचाने के लिए रोहित शेट्टी सामने आते नजर आ रहे हैं. इसी बीच रोहित शेट्टी के आते ही शिवांगी जोशी के तेवर भी बदल गए हैं और दोनों मिलकर बदमाशों को भगाते नजर आ रहे हैं.

 

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सीरियल हुआ था फ्लौप

खतरों के खिलाड़ी का हिस्सा बनने से पहले एक्ट्रेस शिवांगी जोशी सीरियल बालिका वधू 2 में नजर आ चुकी हैं, जिसके चलते शुरु में तो उन्होंने खूब सुर्खियां बटोरी. लेकिन एक समय के बाद सीरियल फ्लौप हो गया. इसी के कारण मेकर्स ने सीरियल को बंद करने का फैसला लिया. वहीं इस मामले में हाल ही में एक्ट्रेस ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा था कि मेकर्स ने सीरियल को लेकर काफी मेहनत की थी औऱ उन्हें इसका कोई अफसोस नहीं है क्योंकि उन्होंने भी अपना पूरा 100 पर्सेंट दिया था.

बता दें, एक्ट्रेस शिवांगी जोशी को सीरियल ये रिश्ता क्या कहलाता है में नायरा के रोल में काफी पसंद किया गया था. वहीं मोहसिन खान संग एक्ट्रेस की कैमेस्ट्री आज भी फैंस का दिल जीतती है, जिसके चलते फैंस दोनों को साथ देखने की डिमांड करते हुए नजर आते हैं. हालांकि दोनों म्यूजिक वीडियो का भी हिस्सा बने थे.

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एहसास- भाग 2: क्यों सास से नाराज थी निधि

मालती चायनाश्ता लेने किचन में चली गई. अजय उस के पीछेपीछे चला आया. मां के मन की टोह लेने कुछ मदद करने के बहाने. मालती बड़ी रुखाई से बिना कुछ कहे नमकीन बिस्कुट ट्रे में रखती गई और चाय ले कर बाहर आ गई. निधि बहुतकुछ बातें कर रही थी जिन्हें मालती अनमने मन से सुन रही थी. अजय को मालती के चेहरे से पता चल गया कि उस की मां को निधि जरा भी पसंद नहीं आई.

क्या लड़की है, बाप रे. आते ही ऐसे मस्त हो गई जैसे इस का अपना घर हो. न शरमाना, न कोई  िझ झक, बातबात पर अजय को एकआध धौल जमा रही निधि उन्हें कहीं से भी लड़कियों जैसी नहीं लगी. चलो, ठीक है, आजकल का जमाना है लड़कियां लड़कों से कम नहीं. पर इस तरह किसी लड़की का बिंदासपन उसे अजीब लगा. वह भी तब जब वह पहली बार होने वाली सास से मिल रही हो. मालती पुराने खयालों को ज्यादा नहीं मानती थी पर जब बात बहू चुनने की आई तो एक छवि उस के मन में थी, किसी खूबसूरत सी दिखने वाली लड़की को देखते ही मालती उस के साथ अजय की जोड़ी मिलाने लगती दिल ही दिल में, पर अजय और यह लड़की? मालती की नजरों में यह बेमेल था.

यह सही है कि हर मां को अपना बच्चा सब से सुंदर लगता है. लेकिन अजय तो सच में लायक था. देखने में जितना सजीला, मन का उतना ही उजला.

मालती ने सोचा, आखिर अजय को सारी दुनिया की लड़कियां छोड़ कर एक निधि ही पसंद आनी थी? उस ने लाख चाहा कि अजय अपना इरादा बदल दे निधि से शादी करने का, उस के लिए बहुत से रिश्ते आए और कुछेक सुंदर लड़कियों के. मालती ने फोटो भी छांट कर रख ली थी उसे दिखाने के लिए.

पर, आखिर वही हुआ जो अजय और निधि ने चाहा. बड़ी ही धूमधाम से निधि उस के बेटे की दुलहन बन कर आ गई. अपनी इकलौती बेटी निधि को बहुतकुछ दिया उस के मांबाप ने. लेकिन रिश्तेदारों और जानपहचान वालों की दबीदबी बातें भी मालती तक पहुंच ही गईं. खूब दहेज मिला होगा, एकलौती बेटी जो है अपने मांबाप की, लालच में हुई है यह शादी वगैरहवगैरह.

बेटे की खुशी में ही मालती ने अपनी खुशी ढूंढ़ ली थी. उस के बेटे का घर बस गया. यह एक मां के लिए खुशी की बात थी. वह निधि को घर के कामकाज सिखा देगी, यह मालती ने सोचा. पर मालती को क्या पता था, निधि बिलकुल कोरा घड़ा निकलेगी. घरगृहस्थी के मामलों में, अव्वल तो उसे कुछ आता नहीं था और अगर कुछ करना भी पड़े तो बेमन से करती थी. मालती खुद बहुत सलीकेदार थी. हर काम में कुशल, उसे हर चीज में सफाई और तरीका पसंद था.

शादी के शुरुआती दिनों में मालती ने उसे बहुत प्यार से घर के काम सिखाने की कोशिश की. जिस निधि ने कभी अपने घर में पानी का गिलास तक नहीं उठाया था, उस के साथ मालती को ऐसे लगना पड़ा जैसे कोई नर्सरी के बच्चे को  हाथ पकड़ कर लिखना सिखाता है. एक दिन मालती ने उसे चावल पकाने का काम सौंपा और खुद बालकनी में रखे गमलों में खाद डालने में लग गई. थोड़ी देर बाद रसोई से आते धुएं को देख कर वह  झटपट किचन की ओर भागी. चावल लगभग आधे जल चुके थे. मालती ने लपक कर गैस बंद की.

बासमती चावल पतीले में खिलेखिले बनते हैं, यह सोच कर उस के घर में चावल कुकर में नहीं, पतीले में पकाए जाते थे. वह निधि को तरीका सम झा कर गई थी. उस ने निधि को आवाज दी. कोई जवाब न पा कर वह बैडरूम में आई तो देखा, निधि अपने कानों पर हैडफोन लगा कर मोबाइल में कोई वीडियो देखने में मस्त थी. मालती को उस दिन बहुत गुस्सा आया. इतनी बेपरवाही. अगर वह न होती तो घर में आग भी लग सकती थी. उस ने निधि को उस दिन दोचार बातें सुना भी दीं.

‘सौरी मां’ बोल कर निधि खिसियाई सी चुपचाप रसोई में जा कर पतीले को साफ करने के लिए सिंक में रख आई. उस दिन के बाद मालती ने उसे फिर कुछ पकाने को नहीं कहा कभी. कुछ पता नहीं, कब क्या जला बैठे. और वैसे भी, अजय मां के हाथ का ही खाना पसंद करता था. उस ने भी निधि को टिपिकल वाइफ बनाने की कोई पहल नहीं की. निधि और अजय की कोम्पैटिबिलिटी मिलती थी और दोनों साथ में खुश थे. यही बहुत था मालती के लिए.

पर उस को एक कमी हमेशा खलती रही. वह चाहती थी कि औरों की तरह उस के घर में भी पायल की रुन झुन, चूडि़यों की खनक गूंजे, सरसराता साड़ी का आंचल लहराती घर की बहू रसोई संभाले या छत पर अचारपापड़ सुखाए. कुछ तो हो जो लगे कि नई बहू आई है घर में. शादी के एक हफ्ते बाद ही निधि ने पायल, बिछुए और कांच की चूडि़यां उतार कर रख दी थीं. हाथों में, बस, एक गोल्ड ब्रैसलेट और छोटे से इयर रिंग्स पहन कर टीशर्ट व पाजामे में घूमने लगी थी. मालती ने उसे टोका भी पर उस के यह बोलने पर कि, मां ये सब चुभते हैं, मालती चुप हो गई थी.

छुट्टी वाले दिन दोनों अपने लैपटौप पर या तो कोई मूवी देखते या वीडियो गेम खेलते रहते. मालती अपने सीरियल देखती रहती और कसमसाती रहती कि कोई होता जो उस के साथ बैठ कर यह सासबहू वाले प्रोग्राम देखता. कभी पासपड़ोस में कोई कार्यक्रम होता, तो मालती अकेली ही जाती. लोगबाग पूछते, ‘अरे बहू को क्यों नहीं लाए साथ?’ तो वह मुसकरा कर कोई बहाना बना देती. अब कैसे बोले कि बहू तो वीडियो गेम खेल रही है अपने कमरे में.

कुल मिला कर उस के सपने मिट्टी में मिल गए थे. घर में बहू कम दूसरा बेटा आया हो जैसे. किसी शादीब्याह में भी निधि को खींच कर ले जाना पड़ता था. उसे कोई शौक ही नहीं था सजनेसंवरने का. शादी की इतनी सारी एक से एक कीमती साडि़यां पड़ी थीं, पर मजाल है जो निधि ने कभी पहनने की जहमत उठाई हो.

अपने एक रिश्तेदार की शादी में जयपुर जाना पड़ा मालती को, तो निधि और अजय को खूब सारी हिदायतें दे कर गई. खाना बहुत थोड़ा जल्दी उठ कर बना के फ्रिज में रख जाना. अजय को बाहर का खाना पचता नहीं. पेट अपसैट हो जाता है. फिर राधा को भी 10 दिन के लिए अपने गांव जाना था. ऐसे में घर की जिम्मेदारी उन दोनों पर ही है, मालती उन को बारबार यह बता रही थी. उसे पता था, दोनों लापरवाह हैं, पर जाना जरूरी था.

जहां से चले थे- भाग 1: पेरेंट्स की मौत के बाद क्या हुआ संध्या के साथ

मां को अग्नि के सुपुर्द कर के मैं लौटी तो पहली बार मुझे ऐसा लगा जैसे मैं दुनिया में बिलकुल अकेली रह गई हूं. श्मशान पर लिखे शब्द अभी भी मेरे दिमाग पर अंकित थे, ‘यहां तक लाने का धन्यवाद, बाकी का सफर हम खुद तय कर लेंगे.’ मां तो परम शांति की ओर महाप्रस्थान कर गईं और मुझे छोड़ गईं इस अकेली जिंदगी से जूझने के लिए.

मां थीं तो मुझे अपने चारों ओर एक सुरक्षा कवच सा प्रतीत होता था. शाम को जब तक मैं आफिस से न लौटती, उन की सूनी आंखें मुझे खोजती रहतीं और मुझे देख कर अपना सारा प्यार उड़ेल देतीं. मैं भी मां को सारे दिन के कार्यक्रमों को बता कर अपना जी हलका कर लेती. आफिस में अपनी पदप्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए मुझे एक चेहरा ओढ़ना पड़ता था पर घर में तो मैं मां की बच्ची थी, हठ भी करती और प्यार भी. पर अब मैं बिलकुल अकेली पड़ गई थी.

कुछ दिन बाद आफिस के केबिन में बैठ कर मैं सामने दीवार पर देखने लगी तो मन में खयाल आया कि पापा के फोटो के साथ मां की भी फोटो लगा दूं, इतने में दरवाजा खोल कर मेरे निजी सचिव ने आ कर बताया कि कुछ जरूरी कागज साइन करने हैं, जो टेबल पर ही रखे हैं.

‘‘मिश्राजी, मेरी मानसिक हालत अभी ठीक नहीं है. मैं अभी कोई भी निर्णय नहीं ले सकती. अभी तो मां को गुजरे 4 दिन भी नहीं हुए हैं और…’’ इतना कह कर मैं भावुक हो गई.

‘‘सौरी, मैडम, मुझे इस समय ऐसा नहीं कहना चाहिए था,’’ कह कर वह वापस जाने लगे.

‘‘मिश्राजी, एक मिनट,’’ कह कर मैं ने उन्हें रोका और पूछा, ‘‘अच्छा, ब्रांच मैनेजर का इंटरव्यू कब है?’’

‘‘मैडम, चेयरमैन साहब खुद इस इंटरव्यू में बैठना चाहते हैं. आप कोई भी डेट…मेरा मतलब है जब भी आप कहेंगी मैं उन्हें बता दूंगा,’’ कह कर मिश्राजी चले गए.

हमारी मल्टीनेशनल कंपनी देश की 5 बड़ी ब्रांचों के लिए कुशल मैनेजर रखना चाहती थी. 6 महीने से चल रहे ये महत्त्वपूर्ण इंटरव्यू अब निर्णयात्मक दौर में थे. उन का वार्षिक पैकेज भी 10 लाख रुपए का था. यानी मुझ से आधा. चेयरमैन को तो इस इंटरव्यू में आना ही चाहिए.

मैं अनमने और भारी मन से एकएक पत्र देखने लगी. मन कहीं भी टिक नहीं रहा था. मां की भोली सूरत बारबार आंखों के सामने तैर जाती. मैं ने सारी फाइलें बंद कर दीं और अपने सचिव को बता कर घर चली आई.

रिश्तेदार, सगेसंबंधी सब एकएक कर के जा चुके थे. महरी अपना काम समेट कर टीवी देख रही थी. शायद उसे इस का एहसास नहीं था कि मैं घर जल्दी आ जाऊंगी. उसे टीवी के पास बैठी देख कर मैं एकदम झल्ला गई और अपना सारा गुस्सा उस पर ही उतार दिया, फिर निढाल हो कर पलंग पर पसर गई.

थोड़ी देर में महरी चाय बना कर ले आई. मुझे इस समय सचमुच चाय की ही जरूरत थी. वह चाय मेज पर रख कर बोली, ‘‘मेम साहब, आप ही बताइए, मैं सारा दिन यहां अकेली क्या करूं. मांजी और मैं इस समय टीवी ही देखा करते थे. आप को पसंद नहीं है तो अपना घर खुद ही संभालिए,’’ कह कर वह तेजी से चली गई.

मेरे क्रोध और धैर्य की सीमा न रही. इस की इतनी हिम्मत कि मुझे कुछ कह सके, मेरी बात काट सके. वह इस बात पर मेरा काम छोड़ भी देती तो मैं उसे रोकती नहीं, चाहे बाद में मुझे कितनी ही परेशानी होती. झुक कर बात करना तो मैं ने कभी सीखा ही नहीं था. बचपन से आज तक मैं ने वही किया जो मेरे मन को भाया. जिस से सहमति नहीं बन पाती, उस से मैं किनारा कर लेती.

चाय पीने के बाद भी मुझे चैन नहीं आया. मैं बदहवास एक कमरे से दूसरे कमरे में बिना मकसद घूमती रही. मुझे लग रहा था कि मां की आकृति कहीं आसपास ही तैर रही है. मैं ने मां की तसवीर पापा की तसवीर के साथ लगा दी. उन की फोटो पर लगे गेंदे के फूल मुरझा कर पापा की तसवीर पर लगे नकली फूलों की शक्ल ले रहे थे.

मैं मां की तसवीर के पास जा कर उन्हें देखती रही और फिर बीते दिनों के ऐसे तहखाने में जा पहुंची जहां बहुत अंधेरा था. पर अंधेरा भी मैं ने ही किया हुआ था, वरना ये दोनों तो मेरे जीवन में उजाला करना चाहते थे.

मुझे अपना खोया हुआ बचपन याद आने लगा और मैं अपने ही अतीत के पन्नों को एकएक कर पलटने लगी.

इकलौती संतान होने के कारण मां और पापा का सारा प्यार मेरे ही हिस्से में था. जब भी पापा को कोई मेरे लड़की होने का एहसास करवाता, पापा हंस कर कहते कि यही मेरा बेटा है और यही मेरी बेटी भी. उन्होंने मेरी परवरिश भी मुझे बहुत सी स्वतंत्रता दे कर अलग ढंग से की थी. मां जब भी मुझे किसी लड़के के साथ देखतीं या देर शाम को घर आते देखतीं तो अच्छाबुरा समझाने लगतीं और पापा एक सिरे से मां की बात को नकार देते.

स्कूल की पढ़ाई खत्म होते ही मैं ने प्रोफेशनल कोर्स ज्वाइन कर लिया, साथ ही दूसरे वह सभी काम सीख लिए जो पुरुषों के दायरे में आते थे. मैं किसी भी तरह खुद को लड़कों से कम नहीं समझती और न ही उन को अपने ऊपर हावी होने देती थी. मेरे इस दबंग और अक्खड़ स्वभाव के कारण कई लड़के तो मेरे पास आने से भी डरते थे.

एक बार मैं कालिज टीम के साथ टेबलटेनिस का मैच खेलने सहारनपुर गई थी. रात को खाने के समय बातोंबातों में मुझे एक लड़के ने प्रपोज किया तो उस लड़के के कंधे पर हाथ रख कर मैं बोली, ‘एक बात तुम्हें साफसाफ बता दूं कि मैं ऐसीवैसी लड़की नहीं हूं और न ही मुझे आम लड़कियों की तरह हलके में लेना. दोबारा मेरे साथ नाम जोड़ने की कोशिश भी मत करना.’

वह लड़का तो चुपचाप वहां से चला गया पर मेरी अंतरंग सहेली वंदना ने मुझ से कहा, ‘इतना गुस्सा भी ठीक नहीं है संध्या. उस ने कौन सी तेरे साथ बदसलूकी की है, प्रपोज ही तो किया है. तू विनम्रता से इनकार कर देती, बातबात पर ऐसा रौद्र रूप दिखाना ठीक नहीं है.’ यह बात हमारे कालिज में दावानल की तरह फैल गई. मेरा कद 2 इंच और बढ़ गया. उस के बाद फिर किसी लड़के ने मेरी ओर आंख उठाने की भी हिम्मत नहीं की.

एम.बी.ए. करने के बाद मुझे एक से एक अच्छे आफर आने लगे. मैं भी दिखा देना चाहती थी कि मैं किसी से कम नहीं हूं. पापा का वरदहस्त तो सिर पर था ही. जहां मेरे साथ पढ़े लड़कों को 20 हजार के आफर मिले, मुझे 45 हजार का आफर मिला था.

पापा को अब मेरी शादी की चिंता सताने लगी, पर मैं अभी ठीक से सेटल नहीं हुई थी. वैसे भी मुझे अपने लिए एक ऐसा घरवर ढूंढ़ना था जो मेरी बराबरी और विचारों के अनुकूल हो. मैं पापा के अनुरोध को टालना भी नहीं चाहती थी और शादी कर के अपना आने वाला सुनहरा कल गंवाना भी नहीं चाहती थी. इसलिए पापा जब भी कोई रिश्ता ले कर आते मैं कोई न कोई कमी निकाल कर इनकार कर देती.

खुशियों की दस्तक- भाग 3: क्या कौस्तुभ और प्रिया की खुशी वापस लौटी

फिर एक खूबसूरत सी लड़की से उस की शादी करा दें और पोतेपोतियों को खिलाएं. मगर एक दिन मोहित के आए फोन ने उन के इस सपने पर भी पल में पानी फेर दिया, जब उस ने बताया कि पापा मुझे सिंगापुर में एक अच्छी जौब मिल गई है और अगले महीने ही मैं हमेशा के लिए सिंगापुर शिफ्ट हो जाऊंगा. ‘‘क्या? सिंगापुर जा रहा है? पर क्यों बेटे?’’ कौस्तुभ की जबान लड़खड़ा गई, ‘‘अपने देश में भी तो अच्छीअच्छी नौकरियां हैं, फिर तू बाहर क्यों जा रहा है?’’ लपक कर प्रिया ने फोन ले लिया था, ‘‘नहींनहीं बेटा, इतनी दूर मत जाना. तुझे देखने को आंखें तरस जाएंगी. बेटा, तू हमारे साथ नहीं रहना चाहता तो न सही पर कम से कम इसी शहर में तो रह. हम तेरे पास नहीं आएंगे, पर इतना सुकून तो रहेगा कि हमारा बेटा हमारे पास ही है. कभीकभी तो तेरी सूरत देखने को मिल जाएगी. पर सिंगापुर चला गया तो हम…’’ कहतेकहते प्रिया रोने लगी थी.

‘‘ओह ममा कैसी बातें करती हो? भारत में कितनी गंदगी और भ्रष्टाचार है. मैं यहां नहीं रह सकता. विदेश से भी आनाजाना तो हो ही जाता है. कोशिश करूंगा कि साल दो साल में एक दफा आ जाऊं,’’ कह कर उस ने फोन काट दिया था. प्रिया के आंसू आंखों में सिमट गए. उस ने रिसीवर रखा और बोली, ‘‘वह फैसला कर चुका है. वह हम से पूरी तरह आजादी चाहता है, इसलिए जाने दो उसे. हम सोच लेंगे हमारी कोई संतान हुई ही नहीं. हम दोनों ही एकदूसरे के दुखदर्द में काम आएंगे, सहारा बनेंगे. बस यह खुशी तो है न कि हमारी संतान जहां भी है, खुश है.’’ उस दिन के बाद कौस्तुभ और प्रिया ने बेटे के बारे में सोचना छोड़ दिया. 1 माह बाद मोहित आया और अपना सामान पैक कर हमेशा के लिए सिंगापुर चला गया. शुरुआत में 2-3 माह पर एकबार फोन कर लेता था, मगर धीरेधीरे उन के बीच एक स्याह खामोशी पसरती गई. प्रिया और कौस्तुभ ने दिल पत्थर की तरह कठोर कर लिया. खुद को और भी ज्यादा कमरे में समेट लिया. धीरेधीरे 7 साल गुजर गए. इन 7 सालों में सिर्फ 2 दफा मोहित का फोन आया. एक बार अपनी शादी की खबर सुनाने को और दूसरी दफा यह बताने के लिए कि उस का 1 बेटा हो गया है, जो बहुत प्यारा है.

कौस्तुभ और प्रिया का शरीर अब जर्जर होता रहा था. कहते हैं न कि आप के शरीर का स्वास्थ्य बहुत हद तक मन के सुकून और खुशी पर निर्भर करता है और जब यही हासिल न हो तो स्थिति खराब होती चली जाती है. यही हालत थी इन दोनों की. मन से एकाकी, दुखी और शरीर से लाचार. बस एकदूसरे की खातिर दोनों जी रहे थे. पूरी ईमानदारी से एकदूसरे का साथ दे रहे थे. एक दिन दोनों बाहर बालकनी में बैठे थे, तो एक महिला अपने बच्चे के साथ उन के घर की तरफ आती दिखी. कौस्तुभ सहसा ही बोल पड़ा, ‘‘उस बच्चे को देख रही हो प्रिया, हमारा पोता भी अब इतना बड़ा हो गया होगा न? अच्छा है, उसे हमारा चेहरा देखने को नहीं मिला वरना मोहित की तरह वह भी डर जाता,’’ कहतेकहते कौस्तुभ की पलकें भीग गईं. प्रिया क्या कहती वह भी सोच में डूब गई कि काश मोहित पास में होता.

तभी दरवाजे पर हुई दस्तक से दोनों की तंद्रा टूटी. दरवाजा खोला तो सामने वही महिला खड़ी थी, बच्चे की उंगली थामे. ‘‘क्या हुआ बेटी, रास्ता भूल गईं क्या?’’ हैरत से देखते हुए प्रिया ने पूछा.

‘‘नहीं मांजी, रास्ता नहीं भूली, बल्कि सही रास्ता ढूंढ़ लिया है,’’ वह महिला बोली. वह चेहरे से विदेशी लग रही थी मगर भाषा, वेशभूषा और अंदाज बिलकुल देशी था. प्रिया ने प्यार से बच्चे का माथा चूम लिया और बोली, ‘‘बड़ा प्यारा बच्चा है. हमारा पोता भी इतना ही बड़ा है. इसे देख कर हम उसे ही याद कर रहे थे. लेकिन वह तो इतनी दूर रहता है कि हम आज तक उस से मिल ही नहीं पाए.’’

‘‘इसे भी अपना ही पोता समझिए मांजी,’’ कहती हुई वह महिला अंदर आ गई.

‘‘बेटी, हमारे लिए तो इतना ही काफी है कि तू ने हमारे लिए कुछ सोचा. कितने दिन गुजर जाते हैं, कोई हमारे घर नहीं आता. बेटी, आज तू हमारे घर आई तो लग रहा है, जैसे हम भी जिंदा हैं.’’

‘‘आप सिर्फ जिंदा ही नहीं, आप की जिंदगी बहुत कीमती भी है,’’ कहते हुए वह महिला सोफे पर बैठ गई और वह बच्चा भी प्यार से कौस्तुभ के बगल में बैठ गया. सकुचाते हुए कौस्तुभ ने कहा, ‘‘अरे, आप का बच्चा तो मुझे देख कर बिलकुल भी नहीं घबरा रहा.’’

‘‘घबराने की बात ही क्या है अंकल? बच्चे प्यार देखते हैं, चेहरा नहीं.’’ ‘‘यह तो तुम सही कह रही हो बेटी पर विश्वास नहीं होता. मेरा अपना बच्चा जब इस की उम्र का था तो बहुत घबराता था मुझे देख कर. इसीलिए मेरे पास आने से डरता था. दादादादी के पास ही उस का सारा बचपन गुजरा था.’’

‘‘मगर अंकल हर कोई ऐसा नहीं होता. और मैं तो बिलकुल नहीं चाहती कि हमारा सागर मोहित जैसा बने.’’ इस बात पर दोनों चौंक कर उस महिला को देखने लगे, तो वह मुसकरा कर बोली, ‘‘आप सही सोच रहे हैं. मैं दरअसल आप की बहू सारिका हूं और यह आप का पोता है, सागर. मैं आप को साथ ले जाने के लिए आई हूं.’’ उस के बोलने के लहजे में कुछ ऐसा अपनापन था कि प्रिया की आंखें भर आईं. बहू को गले लगाते हुए वह बोली, ‘‘मोहित ने तुझे अकेले क्यों भेज दिया? साथ क्यों नहीं आया?’’ ‘‘नहीं मांजी, मुझे मोहित ने नहीं भेजा मैं तो उन्हें बताए बगैर आई हूं. वे 2 महीने के लिए पैरिस गए हुए हैं. मैं ने सोचा क्यों न इसी बीच आप को घर ले जा कर उन को सरप्राइज दे दूं. ‘‘मोहित ने आज तक मुझे बताया ही नहीं था कि मेरे सासससुर अभी जिंदा हैं. पिछले महीने इंडिया से आए मोहित के दोस्त अनुज ने मुझे आप लोगों के बारे में सारी बातें बताईं. फिर जब मैं ने मोहित से इस संदर्भ में बात करनी चाही तो उस ने मेरी बात बिलकुल ही इग्नोर कर दी. तब मुझे यह समझ में आ गया कि वह आप से दूर रहना क्यों चाहता है और क्यों आप को घर लाना नहीं चाहता.’’

‘‘पर बेटा, हम तो खुद भी वहां जाना नहीं चाहते. हमें तो अब ऐसी ही जिंदगी जीने की आदत हो गई है,’’ कौस्तुभ बोला.

‘‘मगर डैडी, आज हम जो खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं, सब आप की ही देन है और अब हमारा फर्ज बनता है कि हम भी आप की खुशी का खयाल रखें. जिस वजह से मोहित आप से दूर हुए हैं, मैं वादा करती हूं, वह वजह ही खत्म कर दूंगी.’’ ‘‘मेरे अंकल एक बहुत ही अच्छे कौस्मैटिक सर्जन हैं और वे इस तरह के हजारों केस सफलतापूर्वक डील कर चुके हैं. कितना भी जला हुआ चेहरा हो, उन का हाथ लगते ही उस चेहरे को नई पहचान मिल जाती है. वे मेरे अपने चाचा हैं. जाहिर है कि वे आप से फीस भी नहीं लेंगे और पूरी एहतियात के साथ  इलाज भी करेंगे. आप बस मेरे साथ सिंगापुर चलिए. मैं चाहती हूं कि हमारा बच्चा दादादादी के प्यार से वंचित न रहे. उसे वे खुशियां हासिल हों जिन का वह हकदार है. मैं नहीं चाहती कि वह मोहित जैसा स्वार्थी बने और हमारे बुढ़ापे में वैसा ही सुलूक करे जैसा मोहित कर रहा है’’ प्रिया और कौस्तुभ स्तंभित से सारिका की तरफ देख रहे थे. जिंदगी ने एक बार फिर करवट ली थी और खुशियों की धूप उन के आंगन में सुगबुगाहट लेने लगी थी. बेटे ने नहीं मगर बहू ने उन के दर्द को समझा था और उन्हें उन के हिस्से की खुशियां और हक दिलाने आ गई थी.

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इन 5 तरीकों से भी हटा सकती हैं नेल पॉलिश

कई बार ऐसा होता है कि आपको किसी खास मौके पर जाना होता है और नेल पॉलिश का रंग आपकी ड्रेस के साथ मेल नहीं खा रहा होता है. आप ड्रेसिंग टेबल की दराज ये सोचकर खोलती हैं कि उसमें से रिमूवर निकालर फटाफट से नेल पॉलिश साफ कर लेंगी लेकिन बोतल खाली पाती हैं. खाली बोतल देखते ही आपका चेहरा उतर जाता है.

ऐसी स्थिति किसी के भी सामने आ सकती है. पर कितना अच्छा हो अगर आपको नेल पॉलिश हटाने के कुछ दूसरे विकल्प पता हों. जरूरी नहीं कि आप इन्हीं उपायों को अपनाएं लेकिन अगर ये तरीके आपको पता होंगे तो नेल पॉलिश रिमूवर न होने की स्थिति में आपका काम रुकेगा नहीं.

1. अल्कोहल

अगर आपके घर में अल्कोहल है तो आप इसकी मदद से नेल पॉलिश छुड़ा सकती हैं. कॉटन बॉल को लेकर अल्कोहल में डुबा लें और उसे धीरे-धीरे नाखून पर रगड़ें. ऐसा करने से नेल पॉलिश उतर जाएगी.

2. सिरका

सिरके की मदद से भी आप नेल पॉलिश उतार सकती हैं. इसे भी कॉटन बॉल की मदद से नाखूनों पर लगाएं. अगर आपको और बेहतर रिजल्ट चाहिए तो सिरके को एक कटोरी में लेकर उसमें कुछ बूंद नींबू के रस की मिला लें. इस घोल से नेल पॉलिश साफ करें.

3. गर्म पानी

नेल पॉलिश छुड़ाने का ये सबसे आसान तरीका है. एक कटोरी में गर्म पानी ले लें और अपने नाखूनों को 10 मिनट तक उसमें डुबो कर रखें. उसके बाद कॉटन से मल लें. पुराना नेल पॉलिश उतर जाएगा.

4. टूथपेस्ट

ये सुनने में भले ही बहुत मजेदार लग रहा हो लेकिन टूथपेस्ट एक बहुत कारगर उपाय है. थोड़ा सा टूथपेस्ट लेकर नाखूनों पर लगा लें. अब इसे कॉटन की मदद से धीरे-धीर रगड़ें. कुछ ही देर में नाखून साफ हो जाएंगे.

5. नेल पॉलिश

क्या आपको पता है हर नेल पॉलिश में रिमूवल का गुण होता है. अगर आपके पास नेल पॉलिश रिमूवर नहीं है तो आप किसी दूसरे नेल पॉलिश को पुराने नेल पॉलिश पर लगाकर तुरंत पोछ लें. ऐसा करने से पुराना पॉलिश उतर जाएगा.

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सीसैक्शन और 2 बार अबौर्शन के बाद सेफ प्रैग्नेंसी के लिए टिप्स बताएं?

सवाल-

मेरा पहला बच्चा सीसैक्शन से हुआ था. उस के बाद 2 बार मेरा गर्भपात हुआ. कृपया सुरक्षित तरीके से गर्भधारण करने की सलाह दें?

जवाब- 

सीसैक्शन डिलिवरी आगे गर्भधारण की संभावना को प्रभावित करती है. गर्भपात का कारण अधिक उम्र और आनुवंशिक रूप से असामान्य गर्भधारण है. चूंकि आप ने अपनी उम्र का उल्लेख नहीं किया है तो यह मानते हुए कि रोगी की उम्र 35 वर्ष से अधिक है तो भू्रण के आनुवंशिक परीक्षण के साथसाथ आईवीएफ की सलाह दी जाती है. सीसैक्शन का जख्म अल्ट्रासाउंड पर देखा जा सकता है और भू्रण का प्लेसमैंट उस के अनुसार किया जा सकता है. यदि आप 35 वर्ष से कम उम्र की हैं और उस के बावजूद

2 बार गर्भपात का सामना करना पड़ा है तो मैं आप को सलाह दूंगी कि गर्भधारण करने से पहले किसी फर्टिलिटी विशेषज्ञा से सलाह लें. यह देखा गया है कि संभावित गर्भावस्था में गर्भपात का अनुमानित जोखिम एक गर्भपात के बाद लगभग

20% रहता है. लगातार 2 गर्भपात के बाद एक और गर्भपात का जोखिम लगभग 28% तक बढ़ जाता है और लगातार 3 या इस से अधिक गर्भपात के बाद अगले गर्भपात का जोखिम लगभग 43% होता है.

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कोविड-19 ने हर व्यक्ति के जीने का तरीका पूरी तरह से बदल दिया है. देश में कोरोना वायरस के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. प्रैग्नेंट महिलाओं में इस संक्रमण का खतरा ज्यादा है. दरअसल, प्रैग्नेंट महिलाओं को वक्तवक्त पर जांच की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन कोरोनाकाल में उन का बाहर जाना खतरे से खाली नहीं है. घर से बाहर न जाना पड़े इसलिए गाइनेकोलौजिस्ट प्रैग्नेंट महिलाओं को औनलाइन वीडियो कंसल्टेशन के जरीए परामर्श दे रहे हैं.

अच्छी खबर यह है कि यह वायरस प्लेसेंटा के पार नहीं जा सकता है. इस का अर्थ यह है कि गर्भ में पल रहे बच्चे को इस वायरस से कोई खतरा नहीं है. लौकडाउन के दौरान एक कोरोना पौजिटिव महिला ने बिलकुल स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया. लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि आप अपनी सेहत या अपनी प्रैगनैंसी को ले कर लापरवाह हो जाएं, क्योंकि ऐसा करना आप और आप के होने वाले बच्चे के लिए बिलकुल सही नहीं होगा.

कोरोना वायरस के कारण बढ़ा तनाव का स्तर

हारमोनल बदलावों के कारण प्रैग्नेंट महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है. ऐसे में उन में तनाव, डिप्रैशन, चिंता, गुस्सा, मूड स्ंिवग्स आदि आम समस्याएं बन जाती हैं. इसलिए इस महामारी के दौरान उन्हें अपने स्वास्थ्य का खास खयाल रखने की आवश्यकता है. कोरोना का खतरा उन में ज्यादा है, यह जान कर तनावग्रस्त होना स्वाभाविक है. लेकिन एक प्रैग्नेंट महिला पर यह तनाव बहुत भारी पड़ सकता है.

आइए, जानते हैं कि कोरोना वायरस के दौरान प्रैग्नेंट महिलाओं को किनकिन बातों का ध्यान रखना चाहिए और किस प्रकार की सावधानी बरतनी चाहिए ताकि जच्चा और बच्चा दोनों स्वस्थ रहें:

पूरी खबर पढ़ने के लिए- डाक्टर्स से जानें कोरोना में कैसे सेफ रहें प्रैग्नेंट महिलाएं

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

अपराजिता: क्या रिश्तों से आजाद हो पाई वह

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महिला नेता: नाम बड़े और दर्शन छोटे

राजस्थान की सत्ता वसुंधरा राजे के हाथों से फिसल चुकी है और इसलिए फिलहाल सिर्फ पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य है जहां एक महिला मुख्यमंत्री हैं और वे हैं ममता बनर्जी. कुछ साल पहले तक यानी 2011 और 2014 में भारत के 4 राज्यों की जिम्मेदारी महिला मुख्यमंत्रियों के हाथों में थी.

जम्मूकश्मीर में महबूबा मुफ्ती, गुजरात में आनंदीबेन पटेल, राजस्थान में वसुंधरा राजे और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी. इस से पहले तमिलनाडु में जयललिता भी थीं. आजादी के बाद से अब तक भारत में कुल 16 महिला मुख्यमंत्री हुई हैं जिन में उमा भारती, राबड़ी देवी और शीला दीक्षित, मायावती, जैसे नाम शामिल हैं.

भले ही भारत में महिला मुख्यमंत्रियों की संख्या गिनीचुनी हो, मगर हम इस से इनकार नहीं कर सकते कि ममता बनर्जी, जयललिता और मायावती जैसी महिलाएं सब से ताकतवर मुख्यमंत्रियों में से एक रही हैं. इन का कार्यकाल काफी प्रभावी रहा है. फिर चाहे वह तमिलनाडु में जयललिता की जनवादी योजनाएं हों या उत्तर प्रदेश में मायावती का कानूनव्यवस्था को काबू में करना और ममता का हर दिल पर राज करना.

मगर जब बात उन के द्वारा महिलाओं के हित में किए जाने वाले कामों की होती है तो हमें काफी सोचना पड़ता है. दरअसल, इस क्षेत्र में उन्होंने कुछ याद रखने लायक किया ही नहीं. यह बात सिर्फ मुख्यमंत्रियों या प्रधानमंत्री के ओहदे पर पहुंची महिला शख्सियतों की ही नहीं है बल्कि हर उस महिला नेता की है जो सत्ता पर आसीन होने के बावजूद महिला हित की बातें नहीं उठाती.

प्रभावी और बराबरी का हक

एक सामान्य सोच यह है कि यदि महिलाएं शीर्ष पदों पर होंगी तो महिलाओं के हित में फैसले लेंगी. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता. इंदिरा गांधी जब देश की प्रधानमंत्री थीं तब कोई क्रांति नहीं आ गई या जिन राज्यों में महिलाएं मुख्यमंत्री थीं वहां महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी हो गई ऐसा भी नहीं है. हम यह भी नहीं कह सकते कि पुरुष राजनेता महिलाओं के हक में फैसले ले ही नहीं सकते. मगर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि महिलाओं से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को महिला नेताओं द्वारा उठाया जाना ज्यादा प्रभावी और बराबरी का हक देने वाला हो सकता है.

महिला और पुरुष जिन समस्याओं का सामना करते हैं, वे बिलकुल अलग होती हैं. हाल ही में लोकसभा में सैरोगेसी बिल पास किया गया. संसद में 90% सांसद पुरुष थे जो चाह कर भी गर्भधारण नहीं कर सकते. फिर भी इन पुरुषों ने यह बिल पास किया. हमारी नीतियां देश की 50% आबादी यानी महिलाओं की जरूरतों से मेल नहीं खातीं. इसलिए हमें ऐसी महिला नेताओं की ज्यादा जरूरत है जो महिलाओं के मुद्दों को उठा सकें.

उदाहारण के लिए राजस्थान में गांवों की महिलाएं पीढि़यों से पानी की कमी का सामना कर रही हैं. लेकिन इन महिलाओं को राहत देने के लिए वहां की सरकार द्वारा कभी कोई महत्त्वपूर्ण कदम नहीं उठाया गया क्योंकि सरकार में कोई महिला मंत्री नहीं है. सच यह है कि महिला मंत्री ही महिलाओं की स्थिति में कुछ बदलाव ला सकती हैं क्योंकि वे औरतों की समस्याओं को सम झ पाती हैं.

गंभीर मुद्दों पर ध्यान नहीं

महिलाओं को लगता कि महिला प्रतिनिधि को इसलिए चुनना चाहिए क्योंकि वह महिला मुद्दों को प्रमुखता देगी या कम भ्रष्ट होगी या ज्यादा नैतिक होगी, मगर ऐसा होता नहीं.

हाल ही में जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने महिलाओं की रिप्पड जींस को ले कर एक विवादित बयान दिया तो महिला नेताओं ने उन की जम कर क्लास लगाई. सपा सांसद जया बच्चन से ले कर तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा, शिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी, कांग्रेस प्रवक्ता गरिमा दसौनी ने तीरथ सिंह रावत पर निशाना साधा. किसी ने सोच बदलने की नसीहत दी तो किसी ने उन के बयान को अमर्यादित बताया.

मगर सवाल उठता है कि क्या केवल इस तरह के छोटेमोटे मुद्दों पर बयानबाजी कर के ही महिला नेताओं के कर्तव्यों की इतिश्री हो जाती है? क्या महिलाओं से जुड़े गंभीर मुद्दों पर उन्हें ध्यान नहीं देना चाहिए?

महिलाओं में विश्वास पैदा करना जरूरी

महिला नेताओं द्वारा महिला सुरक्षा या सम्मान पर तो काफी बातें की जाती हैं और यह जरूरी भी है लेकिन इस के साथ ही महिलाओं के कई अहम मुद्दे होते हैं जिन्हें अकसर नजरअंदाज कर दिया जाता है. ऐसे में जरूरी है कि उन के अधिकारों की बात को शामिल किया जाए ताकि महिलाओं को लगे कि अब कोई आ गई है जो उन के लिए सोचेगी, उन की तकलीफ महसूस कर सकेगी. इस से वोट देने में भी उन की दिलचस्पी बढ़ेगी. उन्हें इस बात का एहसास होगा कि सरकार बनाने में उन का योगदान भी जरूरी है और वे अपनी पसंद की प्रतियोगी को आगे ला सकती हैं.

क्यों नहीं लेतीं फैसले

दरअसल, जब कोई महिला नेता बनने के मार्ग में आने वाली तमाम अड़चनें पार कर के राजनीति में ऊंचे पद पर पहुंचती है तो उस की प्रतियोगिता उन तमाम पुरुषों से होती है जो पहले से सत्ता में काबिज हैं और हर तरह के हथकंडे अपना कर अपना नाम बनाए रखने में सक्षम हैं. ऐसे में महिला नेताएं भी चुनाव जीतने के लिए वही हथकंडे अपनाने लगती हैं जो पुरुष अपनाते हैं. ऐसे में इस पूरी प्रक्रिया में महिलाओं के मुद्दे कहीं पीछे चले जाते हैं.

असली फर्क तब आएगा जब महिलाओं की संख्या में बड़ा अंतर आए. पुरुष अपनी बात मनवाने में इसलिए कामयाब होते हैं क्योंकि वे राजनीति में बहुसंख्यक और महिलाएं अल्पसंख्यक हैं. जब अधिक महिलाएं सत्ता पर आसीन होंगी तो वे अपने मकसद को सही दिशा दे पाएंगी. उन्हें सत्ता खोने का उतना डर नहीं रह जाएगा.

राजनीति में महिलाएं कम क्यों हैं

स्वतंत्रता आंदोलनों के समय से ले कर आजाद भारत में सरकार चलाने तक में महिलाओं की राजनीतिक भूमिका अहम रही है. इस के बावजूद जब राजनीति में महिला भागीदारी की बात आती है तो आंकड़े बेहद निराशाजनक तसवीर पेश करते हैं. बात ऐक्टिव पालिटिक्स की हो या वोटर्स के रूप में भागीदारी की, दोनों ही स्तर पर महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत कम है. वैसे महिला वोटरों की स्थिति पहले से थोड़ी बेहतर हुई है. मगर विश्व स्तर पर भारत की पौलिटिक्स में सक्रिय महिलाओं की दृष्टि से भारत 193 देशों में 141वें स्थान पर ही है.

भारत में आजादी के बाद पहली केंद्र सरकार की 20 कैबिनेट मिनिस्टरी में सिर्फ 1 महिला राजकुमारी अमृत कौर थीं जिन्हें स्वास्थ्य मंत्री का कार्यभार सौंपा गया था. लाल बहादुर शास्त्री की सरकार में एक भी महिला को जगह नहीं दी गई. यहां तक कि इंदिरा गांधी के कैबिनेट में भी एक भी महिला यूनियन मिनिस्टर नहीं थी. राजीव गांधी की कैबिनेट में सिर्फ 1 महिला मोहसिना किदवई को शामिल किया गया. मोदी सरकार में महिलाओं की स्थिति पहले से बेहतर हुई है. लेकिन अभी भी स्थिति को पूरी तरह से बेहतर नहीं माना जा सकता है. महिला वोटरों की बात करें या महिला नेताओं की, कहीं न कहीं अभी भी घर के पुरुष उन के फैसलों को प्रभावित करते हैं.

अगर भारतीय राजनीति में सक्रिय महिलाओं को देखें तो उन में से ज्यादातर सशक्त राजनीतिक परिवारों से आती हैं. फिर चाहे वे इंदिरा गांधी हों या वसुंधरा राजे. ऐसी कई वजहें हैं जो महिलाओं को राजनीति में आने से रोकती हैं. मसलन, इस क्षेत्र में सफल होने के लिए जेब में काफी पैसे होने चाहिए और जरूरत पड़ने पर हिंसा का रास्ता भी इख्तियार करने की हिम्मत होनी चाहिए.

वैसे भी राजनीति एक मुश्किल पेशा है. इस में काफी अनिश्चिंतताएं होती हैं. जब तक आप के पास कमाई का कोई ठोस और अतिरिक्त विकल्प न हो आप सक्रिय राजनीति में ज्यादा समय तक नहीं टिक सकते. अगर हम मायावती और जयललिता का उदाहरण लें तो उन के पास कांशीराम और एमजीआर जैसे राजनीतिक गुरु थे जिन्होंने उन की आगे बढ़ने में मदद की थी.

यही नहीं महिलाओं को राजनीति में ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र में दोहरा काम करना पड़ता है. महिलाओं को पुरुषों के साथ कंपीटिशन के लिए खुद को उन से बेहतर साबित करना पड़ता है.

ऐक्टिव पौलिटिक्स में महिलाओं की स्थिति

वैसे ऐक्टिव पौलिटिक्स में महिलाओं का टिकना भी आसान नहीं होता. उन की बुरी स्थिति के लिए जिम्मेदार सिर्फ राजनीतिक पार्टियों ही नहीं बल्कि हमारा समाज भी है जो महिलाओं को राजनीति में स्वीकारने को तैयार नहीं होता है. महिला नेताओं के प्रति लोगों की सोच आज भी संकीर्ण है. हमारे देश में महिलाएं अपने काम से ज्यादा वेशभूषा और लुक के लिए जानी जाती हैं. पुरुष सहयोगी समयसमय पर टीकाटिप्पणियां करने से बाज नहीं आते. प्रियंका गांधी अगर राजनीति में आती हैं तो उन के कपड़ों से ले कर उन के नैननक्श पर टिप्पणियां की जाती हैं. प्रियंका को ले कर ये बातें भी खूब कही गईं कि खूबसूरत महिला राजनीति में क्या कर पाएगी.

शरद यादव ने वसुंधरा राजे के मोटापे पर कमैंट करते हुए कहा था कि वसुंधरा राजे मोटी हो गई हैं, उन्हें आराम की जरूरत है. इस तरह की टिप्पणियों का क्या औचित्य? इसी तरह ममता बनर्जी, मायावती, सुषमा स्वराज से ले कर तमाम उन महिला राजनीतिज्ञ को इस तरह के कमैंट्स  झेलने पड़ते हैं. उन की किसी भी विफलता पर उन के महिला होने के ऐंगल को सामने ला दिया जाता है जबकि विफलता एक पुरुष राजनीतिज्ञ को भी  झेलनी पड़ती है.

निराधार बातें क्यों

लोगों को लगता है कि महिला कैंडिडेट के जीतने की उम्मीद बहुत कम होती है. उन के मुताबिक महिलाएं अपने घरेलू कामों के बीच राजनीति में एक पुरुष के मुकाबले कम समय दे पाती हैं. लोगों को ऐसा भी लगता है कि महिलाओं को राजनीतिक सम झ कम होती है, इसलिए अगर वे जीत कर भी आती हैं तो महिला विभाग, शिशु विभाग जैसे क्षेत्रों तक सीमित रखा जाता है. मगर हम निर्मला सीतारमण, शीला दीक्षित, ममता बनर्जी जैसी महिला नेताओं की तरफ देखें तो ये बातें निराधार महसूस होंगी.

एक महिला कैंडिडेट को अपने क्षेत्र में

एक पुरुष कैंडिडेट के मुकाबले ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. शायद यही सारी वजहें हैं कि वे अपना वजूद बचाए रखने के लिए महिला मुद्दों

के बजाय दूसरे अधिक प्रचारित मुद्दों पर नजर बनाए रख कर खुद को सुरक्षित रखने का प्रयास करती हैं. महिला नेताओं को वैसे भी अपनी सुरक्षा के मामले में खासतौर पर सतर्क रहना पड़ता है.

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