शिक्षा के लिए भटकते छात्र

हमारे युवाओं में पढऩे की ललक नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता क्योंकि अकेले चीन में 23,000 भारतीय युवा मीडिकल की पढ़ाई करने नहीं जाते. विदेश में अपनों से दूर, अलग भाषा, अलग रहनसहन में मेडिकल की पढ़ाई का रिस्क लेना इन स्टूडेंट्स की किसी भी तरह एक स्किच जानवर अपना भविष्य बनाने का एम साबित करता है पर कोविड की वजह से ये अब भारत लौट कर अपनी आधीअधूरी पढ़ाई औन लाइन कर रहे हैं.

ये 2300 स्टूडेंट्स केवल बड़े शहरों के नहीं, यूपी, हरियाणा, उत्तराखंड, तमिलनाडू के भी हैं और अब इंतजार कर रहे हैं कोविड का कहर खत्म हो. हालांकि चीन लौटना इन के लिए बेहद मंहगा होगा क्योंकि इस समय एयर टिकट 1 लाख रुपए का है और फिर 15-20 दिन अपने खर्च पर क्वारंटीन होना पड़ता है. सस्ती फीस और एडमिशन के चक्कर में भी युवा चीन गए थे और इन्हें उम्मीद थी कि धीरेधीरे स्थिति ठीक होगी और वे चीनी डिग्री के साथ दुनियाभर में मेडिकल प्रेक्टिस करने की कोशिश कर सकते हैं.

जब यूक्रेन पर रूस ने हमला किया था तो भी पता चला कि कितने भारतीय स्टेडेंट्स वहां पढ़ रहे हैं जबकि यूक्रेन तो चीन की तरह विकसित भी नहीं है. भारतीय स्टूडेंट्स पहले अफगानिस्तान में पढ़ रहे थे. तजाकिस्तान, कजाकिस्तान जैसे पूर्व सोवियत संघ के देशों में भी हजारों छात्र हैं.

यह भारतीय एजूकेशन की पोल खोलता है कि देश अपने ही स्टूडेंट्स के प्रति इतना ज्यादा बेरहम है कि उन्हें शिक्षा बेचने वाली देशी विदेशी संस्थाओं के आगे लुटनेपिटने भेज देता है. अपने चारों ओर कोई आस न देख कर हार कर भारतीय स्टूडेंट्स जहां भी एडमिशन मिलता है वहां का रूख कर लेते हैं. मेडिकल के अलावा और बहुत से कोर्स आज विदेशों में किए जा रहे हैं.

मानना पड़ेगा कि भारतीय मांबाप इतने दिलेर है कि लाखों खर्च कर के अपने लाडलों को अनजाने देशों की अनजानी डिग्री लेने भेजे देते हैं जिस की क्लालिटी और एक्स्पटैंस का कोई अतापता नहीं है. यह भी मानना पड़ेगा कि हमारी शिक्षा ब्यूरोक्रेसी कितनी मोटी खाल की है कि उसे भारतीय छात्रों की इन तकलीफो का कोई ख्याल नहीं है और देश में ही सस्ती शिक्षा सुलभ कराने में वे कुछ नहीं कर रहे. कहने को हम जगद्गुरू हैं पर हमारे यहां का हर अच्छा छात्र विदेश में जा कर गुरू ढूंढ़ता है.

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वाइट पीरियड्स से परेशान हो गई हूं, इसका कोई इलाज बताएं

सवाल-

मैं 35 वर्षीय महिला हूं. मुझे योनि से कभी पतला, कभी सफेद व चिपचिपा और दुर्गंधयुक्त स्राव आने की परेशानी है. पति से डाक्टर के यहां चलने के लिए कहती हूं तो वे बात को गंभीरता से नहीं लेते यानी टाल जाते हैं. क्या यह समस्या सभी स्त्रियों को होती है? क्या मुझे इसे नजरअंदाज कर देना चाहिए या इस का इलाज करवाना जरूरी है?

जवाब-

अगर योनि से दुर्गंधयुक्त स्राव आए तो यह इस बात का लक्षण है कि बच्चेदानी या योनि में या तो किसी तरह का इन्फैक्शन पैठ किए हुए है या फिर कोई दूसरी गंभीर समस्या जन्म ले चुकी है. दोनों ही स्थितियों में इसे नजरअंदाज करना सरासर नासमझी है. इस से रोग भीतर ही भीतर बढ़ कर अधिक गंभीर रूप ले सकता है. यह आप को तो हानि पहुंचाएगा ही, आप के पति के लिए भी हानिकर सिद्ध हो सकता है. पतिपत्नी में किसी भी एक को सैक्सुअली ट्रांसमिटिड इन्फैक्शन होने से दूसरे को यह इन्फैक्शन होने का पूरापूरा खतरा रहता है. अपने पति को यह बात समझाएं और आप दोनों ही डाक्टर से मिल कर अपना ठीक से इलाज करवाएं. यदि आप की पूरी कोशिश करने के बावजूद आप के पति इलाज के लिए समय न निकालें तो आप स्वयं किसी बड़े अस्पताल में स्त्रीरोग विशेषज्ञा से मिल कर अपनी जांच और इलाज करवाएं. मगर इलाज योग्य डाक्टर से ही करवाएं. दीवारों, अखबारों और पत्रिकाओं में विज्ञापन छाप कामधंधा चलाने वाले यानी झोलाछाप तथाकथित सैक्सोलौजिस्ट, नीमहकीम या वैद्य वगैरह के चक्कर में गलती से भी न फंसें. स्पैशलिस्ट डाक्टर आप की आंतरिक शारीरिक जांच करने के साथसाथ योनि से आने वाले स्राव के नमूने की जांच कराने के बाद ही आप के पति और आप को उचित दवा लिखेगा. नियम से दवा लेने पर आप दोनों पतिपत्नी इस परेशानी से उबर जाएंगे.

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अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

सास को अपनी कमाई कब दें कब नहीं

भले ही सासबहू के रिश्ते को 36 का आंकड़ा कहा जाता हो पर सच यह भी है कि एक खुशहाल परिवार का आधार सासबहू के बीच आपसी तालमेल और एकदूसरे को समझने की कला पर निर्भर करता है.

एक लड़की जब शादी कर के किसी घर की बहू बनती है तो उसे सब से पहले अपनी सास की हुकूमत का सामना करना पड़ता है. सास सालों से जिस घर को चला रही होती हैं उसे एकदम बहू के हवाले नहीं कर पातीं. वे चाहती हैं कि बहू उन्हें मान दे, उन के अनुसार चले.

ऐसे में बहू यदि कामकाजी हो तो उस के मन में यह सवाल उठ खड़ा होता है कि वह अपनी कमाई अपने पास रखे या सास के हाथों पर? बात केवल सास के मान की ही नहीं होती बहू का मान भी माने रखता है. इसलिए कोई भी फैसला लेने से पहले कुछ बातों का खयाल जरूर रखना चाहिए.

बहू अपनी कमाई सास के हाथ पर कब रखे

जब सास हों मजबूर:

यदि सास अकेली हैं और ससुर जीवित नहीं हों तो ऐसे में एक बहू यदि अपनी कमाई सास को सौंपती है तो सास उस से अपनापन महसूस करने लगती हैं. पति के न होने की वजह से सास को ऐसे बहुत से खर्च रोकने पड़ते हैं जो जरूरी होने पर भी पैसे की तंगी की वजह से नहीं कर पातीं. बेटा भले ही अपने रुपए खर्च के लिए देता हो पर कुछ खर्चे ऐसे हो सकते हैं जिन के लिए बहू की कमाई की भी जरूरत पड़ सकती. ऐसे में सास को कमाई दे कर बहू परिवार की शांति कायम रख सकती है.

सास या घर में किसी और के बीमार होने की स्थिति में:

यदि सास की तबीयत खराब रहती है और इलाज पर बहुत रुपए लगते हैं तो यह बहू का कर्तव्य है कि वह अपनी कमाई सास के हाथों पर रख कर उन्हें इलाज की सुविधाएं उपलब्ध कराने में मदद करे.

अपनी पहली कमाई:

जैसे एक लड़की अपनी पहली कमाई को मांबाप के हाथों पर रख कर खुश होती है वैसे ही यदि आप बहू हैं तो अपनी पहली कमाई सास के हाथों पर रख कर उन का आशीर्वाद लेने का मौका न चूकें.

यदि आप की सफलता की वजह सास हैं:

यदि सास के प्रोत्साहन से आप ने पढ़ाई की या कोई हुनर सीख कर नौकरी हासिल की है यानी आप की सफलता में आप की सास का प्रोत्साहन और प्रयास है तो फिर अपनी कमाई उन्हें दे कर कृतज्ञता जरूर प्रकट करें. सास की भीगी आंखों में छिपे प्यार का एहसास कर आप नए जोश से अपने काम में जुट सकेंगी.

यदि सास जबरन पैसे मांग रही हों:

पहले तो यह देखें कि ऐसी क्या बात है जो सास जबरन पैसे मांग रही हैं. अब तक घर का खर्च कैसे चलता था? इस मामले में अच्छा होगा कि पहले अपने पति से बात करें. इस के बाद पतिपत्नी मिल कर इस विषय पर घर के दूसरे सदस्यों से  विचारविमर्श करें. सास को समझएं. उन के आगे खुल कर कहें कि आप कितने रुपए दे सकती हैं. चाहें तो घर के कुछ खास खर्चे जैसे राशन, बिल, किराए आदि की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लें. इस से सास को भी संतुष्टि रहेगी और आप पर भी अधिक भार नहीं पड़ेगा.

यदि सास सारे खर्च एक जगह कर रही हों:

कई परिवारों में घर का खर्च एक जगह किया जाता है. यदि आप के घर में भी जेठ, जेठानी, देवर, ननद आदि साथ रह रहे हैं और पूरा खर्च एक ही जगह हो रहा है तो स्वाभाविक है कि घर के प्रत्येक कमाऊ सदस्य को अपनी हिस्सेदारी देनी होगी.

सवाल यह उठता है कि कितना दिया जाए? क्या पूरी कमाई दे दी जाए या एक हिस्सा दिया जाए? इस तरह की परिस्थिति में पूरी कमाई देना कतई उचित नहीं होगा. आप को अपने लिए भी कुछ रुपए बचा कर रखने चाहिए. वैसे भी घर के प्रत्येक सदस्य की आय अलगअलग होगी. कोई 70 हजार कमा रहा होगा तो कोई 20 हजार, किसी की नईनई नौकरी होगी तो किसी ने बिजनैस संभाला होगा. इसलिए हर सदस्य बराबर रकम नहीं दे सकता.

बेहतर होगा कि आप सब इनकम का एक निश्चित हिस्सा जैसे 50% सास के हाथों में रखें. इस से किसी भी सदस्य के मन में असंतुष्टि पैदा नहीं होगी और आप भी निश्चिंत रह सकेंगी.

यदि मकान सासससुर का है:

जिस घर में आप रह रही हैं यदि वह सासससुर का है और सास बेटेबहू से पैसे मांगती हैं तो आप को उन्हें पैसे देने चाहिए. और कुछ नहीं तो घर और बाकी सुखसुविधाओं के किराए के रूप में ही पैसे जरूर दें.

यदि शादी में सास ने किया है काफी खर्च:

अगर आप की शादी में सासससुर ने शानदार आयोजन रखा था और बहुत पैसे खर्च किए थे, लेनदेन, मेहमाननवाजी तथा उपहारों आदि में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, बहू और उस के घर वालों को काफी जेवर भी दिए थे तो ऐसे में बहू का भी फर्ज बनता है कि वह अपनी कमाई सास के हाथों में रख कर उन्हें अपनेपन का एहसास दिलाए.

ननद की शादी के लिए:

यदि घर में जवान ननद है और उस की शादी के लिए रुपए जमा किए जा रहे हैं तो बेटेबहू का दायित्व है कि वे अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा दे कर अपने मातापिता का सहयोग करें.

जब पति शराबी हो:

कई बार पति शराबी या निकम्मा होता है और पत्नी के रुपयों पर ऐय्याशी करने का मौका ढूंढ़ता है. वह पत्नी से रुपए छीन कर शराब या गलत संगत में खर्च कर सकता है. ऐसी स्थिति में अपने रुपयों की सुरक्षा के लिए जरूरी है कि आप ला कर उन्हें सास के हाथों पर रख दें.

कब अपनी कमाई सास के हांथों में न रखें

जब आप की इच्छा न हो. अपनी इच्छा के विरुद्ध बहू अपनी कमाई सास के हाथों में रखेगी तो घर में अशांति पैदा होगी. बहू का दिमाग भी बौखलाया रहेगा और उधर सास बहू के व्यवहार को नोटिस कर दुखी रहेंगी. ऐसी स्थिति में बेहतर है कि सास को रुपए न दिए जाएं.

जब ससुर जिंदा हो और घर में पैसों की कमी न हो:

यदि ससुर जिंदा हैं और कमा रहे हैं या फिर सास और ससुर को पैंशन मिल रही है तो भी आप को अपनी कमाई अपने पास रखने का पूरा हक है. परिवार में देवर, जेठ आदि हैं और वे कमा रहे हैं तो भी आप को कमाई देने की जरूरत नहीं है.

जब सास टैंशन करती हों:

यदि आप अपनी पूरी कमाई सास के हाथों में दे रही हैं इस के बावजूद सास आप को बुराभला कहने से नहीं चूकतीं और दफ्तर के साथसाथ घर के भी सारे काम कराती हैं, आप कुछ खरीदना चाहें तो रुपए देने से आनाकानी करती हैं तो ऐसी स्थिति में सास के आगे अपने हक के लिए लड़ना लाजिम है. ऐसी सास के हाथ में रुपए रख कर अपना सम्मान खोने की कोई जरूरत नहीं है बल्कि अपनी मरजी से खुद पर रुपए खर्च करने का आनंद लें और दिमाग को टैंशनफ्री रखें.

जब सास बहुत खर्चीली हों:

यदि आप की सास बहुत खर्चीली हैं और आप जब भी अपनी कमाई ला कर उन के हाथों में रखती हैं तो वे उन रुपयों को 2-4 दिनों के अंदर ही बेमतलब के खर्चों में उड़ा देती हैं या फिर सारे रुपए मेहमाननवाजी और अपनी बेटियों और बहनों पर खर्च कर देती हैं तो आप को संभल जाना चाहिए. सास की खुशी के लिए अपनी मेहनत की कमाई यों बरबाद होने देने के बजाय उन्हें अपने पास रखें और सही जगह निवेश करें.

जब सास माता की चौकी कराएं:

जब सासससुर घर में तरहतरह के धार्मिक अनुष्ठान जैसे माता की चौकी वगैरह कराएं और पुजारियों की जेबें गरम करते रहें या अंधविश्वास और पाखंडों के चक्कर में रुपए बरबाद करते रहें तो एक पढ़ीलिखी बहू उन की ऐसी गतिविधियों का हिस्सा बनने या आर्थिक सहयोग करने से इनकार कर सकती है. ऐसा कर के वह सास को सही सोच रखने को प्रेरित कर सकती है.

बेहतर है कि उपहार दें

इस संदर्भ में सोशल वर्कर अनुजा कपूर कहती हैं कि जरूरी नहीं आप पूरी कमाई सास को दें. आप उपहार ला कर सास पर रुपए खर्च कर सकती हैं. इस से उन का मन भी खुश हो जाएगा और आप के पास भी कुछ रुपए बच जाएंगे. सास का बर्थडे है तो उन्हें तोहफे ला कर दें, उन्हें बाहर ले जाएं, खाना खिलाएं, शौपिंग कराएं, वे जो भी खरीदना चाहें वे खरीद कर दें. त्योहारों के नाम पर घर की साजसजावट और सब के कपड़ों पर रुपए खर्च कर दें.

पैसों के लेनदेन से घरों में तनाव पैदा होता है पर तोहफों से प्यार बढ़ता है, रिश्ते संभलते हैं और सासबहू के बीच बौंडिंग मजबूत होती है. याद रखें रुपयों से सास में डौमिनैंस की भावना बढ़ सकती है जबकि बहू के मन में भी असंतुष्टि की भावना उत्पन्न होने लगती है. बहू को लगता है कि मैं कमा क्यों रही हूं जब सारे रुपए सास को ही देने हैं. इसलिए बेहतर है कि जरूरत के समय सास या परिवार पर रुपए जरूर खर्च करें पर हर महीने पूरी रकम सास के हाथों में रखने की मजबूरी न अपनाएं.

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7 लेटेस्ट फ्लोरिंग ट्रैंड्स

फर्श आप के घर के सौंदर्य को तय करने में बड़ी भूमिका निभाता है. आज तमाम मार्केट्स अनेक प्रकार की सुंदर टाइल्स से भरी पड़ी हैं. लेकिन जिस जगह आप हैं वहां का मौसम, तापमान और नमी को ध्यान में रख कर फर्श का चुनाव करने में ही समझदारी है. इस के अलावा फ्लोरिंग टाइल्स, किचन टाइल्स,

वाल टाइल्स का चुनाव भी सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए.

जब आप अपने घर के पुनर्निर्माण के लिए पैसा खर्च कर रहे हैं तो निश्चित ही हर कमरे में एक जैसी टाइल्स देखना आप को अच्छा नहीं लगेगा. आप हर कमरे में कुछ अलग, कुछ नया देखना पसंद करेंगे ताकि हर कमरे के साथ कुछ अलग फीलिंग आए.

अकसर गृहिणियां अपने घर के लिए सर्वोत्तम टाइल्स खरीदने के लिए इंटरनैट सर्च करती हैं. कई बार इंटरनैट पर भ्रमित होने के बाद वे कुछ. दुकानों का दौरा करने निकल पड़ती हैं और वहां दुकानदार आप को कन्फ्यूज कर देता है. फिर परेशान हो कर आप ऐसी टाइल्स पसंद कर आती हैं जो कुछ ही दिनों में आप को बोर लगने लगती हैं. ऐसे में कुछ सुझव हैं जिन्हें अगर आप घर की फ्लोरिंग डिसाइड करने से पहले ध्यान में रखें तो आप के घर की फ्लोरिंग देख कर आप की पड़ोसिनों और सहेलियां चौंक उठेंगी.

टाइल्स खरीदने से पहले

सब से पहले आप उस कमरे के बारे में सोचें, जिस का फर्श बनना है. उस कमरे में जो फर्नीचर है और जो अलमारियां हैं, उन पर क्या रंग है? दीवारों का रंग क्या है? उस कमरे में आप किस रंग के परदे लगाने वाली हैं? इन सब सवालों के जवाब तलाशने के बाद ही टाइल्स की दुकान पर जाएं. वहां आप दुकानदार से सारी बातें शेयर करें. इस से उसे भी कमरे की अन्य चीजों से मेल खाती टाइल्स या फ्लोरिंग दिखाने में मदद मिलेगी और आप को भी ज्यादा कन्फ्यूजन नहीं होगी.

एक बार जब आप का कमरा टाइल्स लगाने के लिए तैयार हो, तो आप गणना कर लीजिए कि आप को कितनी टाइल की आवश्यकता होगी. एक बार में टाइल्स खरीदने और आप को जितनी भी जरूरत है उस से अधिक लेना हमेशा अच्छा होता है क्योंकि लगाने के दौरान अगर कुछ टाइल्स खराब हो या टूट जाएं तो दोबारा वैसी ही टाइल्स आप को मिले या न मिले, कहना मुश्किल है. इसलिए कुछ ज्यादा ले लेना ठीक होता है.

टाइल्स या फ्लोरिंग के लिए बेहतर होगा कि आप डिजाइनर या ठेकेदार को साथ ले जाएं. टाइल्स के साइज बगैरा को देख कर वह आप को बता सकेगा कि कौन सी टाइल्स अधिकांश कमरों के रंगों से मेल खाएंगी और आप को एक विशेष कमरे जैसे बैडरूम या ड्राइंगरूम के लिए कितनी टाइल्स की आवश्यकता है.

यदि आप की फर्श टाइल्स अच्छी स्थिति में हैं तो आप अपने कमरे के लुक को बदलने के लिए उस पर पीवीसी पौलीविनाइल क्लोराइड या विनाइल फ्लोरिंग करवा सकते हैं. यह काम कम बजट में हो जाएगा.

कुछ बातें जो ध्यान देने की हैं वे यह कि छोटे आकार के कमरे के लिए कभी बड़े आकार की टाइल्स नहीं लेनी चाहिए. ये सुंदर नहीं दिखती हैं. एक छोटे कमरे पर खर्च को कम करने के लिए आप को छोटी साइज की टाइल्स लेनी चाहिए.

टाइल्स खरीदने के लिए कभी शाम या रात को दुकान पर न जाएं. हमेशा दिन के उजाले में जाएं और विभिन्न कमरों की आवश्यकता के अनुरूप सूर्य के प्रकाश में टाइल्स के रंग और डिजाइन का चयन करें.

विट्रिफाइड टाइल्स

यह मार्बल और ग्रेनाइट के लिए एक बढि़या विकल्प है. सिलिका और मिट्टी की बनी विट्रिफाइड टाइल्स टिकाऊपन के मामले में सर्वश्रेष्ठ होती हैं. बरामदे, आंगन या बाहरी फर्श के लिए यह एक अच्छा विकल्प है. खरोंचों और दाग प्रतिरोधी होने के कारण, विट्रिफाइड टाइल्स रसोई जैसे फुट ट्रैफिक वाले स्थानों के लिए भी अच्छी हैं. चमकदार फिनिश या मैट फिनिश के साथ ये कई डिजाइनों और पैटर्न्स में उपलब्ध हैं.

संगमरमर का फर्श

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि संगमरमर भारत में घरों में उपयोग किया जाने वाला सब से प्रिय और शाही लुक प्रदान करने वाला मैटीरियल है. उच्च गुणवत्ता वाला भारतीय संगमरमर सस्ता भी है और लंबे समय तक टिकाऊ भी है. यह सभी प्रकार के रंगों और डिजाइनों में भी उपलब्ध है. इस की बढि़या चमक और नाजुक लुक आप के घर को ग्लैमरस बना देता है. इस के कारण कुछ शाहीपन का सा अंदाज झलकता है.

विनाइल

विनाइल फर्श का विचार उन लोगों के लिए अच्छा विकल्प है जो अपने घर के फर्श को वुडन फ्लोरिंग का लुक देना चाहते हैं. विनाइल कई अलगअलग लुक, रंगों, चमक और डिजाइन में आता है. आप बाजार में सोम्ब्रे वुडन लुक या चमकदार मार्बल जैसी सतह वाला विनाइल फर्श पा सकते हैं. लकड़ी या संगमरमर के फर्श के विपरीत विनाइल फर्श कम बजट में आ जाता है और ज्यादा समय तक टिकता है. इसलिए आप निश्चिंत हो सकते हैं कि आप का निवेश बेकार नहीं जाएगा.

ग्राफिक चीनीमिट्टी की बरतन टाइल्स

यदि आप बोल्ड और ब्राइट पसंद करते हैं, तो ग्राफिक टाइलें सिर्फ आप के लिए बनाई गई हैं. यह उदार, चमकदार टाइल्स ध्यान आकर्षित करने का एक शानदार तरीका है. ये कमरे का स्टेटमैंट पीस बनाती हैं. ये टाइलें आप के कमरे को एक पल में रोशन कर देती हैं. पानी और अन्य कठोर दागों को झेलने की क्षमता के कारण ये ज्यादातर रसोई, बाथरूम अथवा दीवारों में उपयोग की जाती हैं.

लकड़ी का फर्श

लकड़ी का फर्श कमरे में गरमी और खुलेपन का अहसास दिलाता है. यह कमरे को और अधिक स्वागत योग्य बनाने के लिए आधार भी देता है. यदि लकड़ी के फर्श की सही देखभाल हो तो यह बेहद टिकाऊ होता है, और हर तरह की सजावट के साथ आता है.

लैमिनेट

लैमिनेट लकड़ी के फर्श के विचार के लिए एक अच्छा वैकल्पिक विकल्प है. कम लागत में इस का बिना लकड़ी के फर्श का सा आनंद ले सकते हैं. यह सिंथैटिक मिश्रण, लैमिनेट्स सामग्री की भारी दबाव वाली परतों से बना होता है और इस के ऊपर सुरक्षा के लिए एक उच्च प्रतिरोधी सैल्यूलोजरल कोट कवर होता है.

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एक साथी की तलाश- भाग 1: कैसी जिंदगी जी रही थी श्यामला

शाम गहरा रही थी. सर्दी बढ़ रही थी. पर मधुप बाहर कुरसी पर बैठे  शून्य में टकटकी लगाए न जाने क्या सोच रहे थे. सूरज डूबने को था. डूबते सूरज की रक्तिम रश्मियों की लालिमा में रंगे बादलों के छितरे हुए टुकड़े नीले आकाश में तैर रहे थे.

उन की स्मृति में भी अच्छीबुरी यादों के टुकड़े कुछ इसी प्रकार तैर रहे थे. 2 दिन पहले ही वे रिटायर हुए थे. 35 सालों की आपाधापी व भागदौड़ के बाद का आराम या विराम, पता नहीं, पर अब, अब क्या…’ विदाई समारोह के बाद घर आते हुए वे यही सोच रहे थे. जीवन की धारा अब रास्ता बदल कर जिस रास्ते पर बहने वाली थी, उस में वे अकेले कैसे तैरेंगे.

‘‘साहब, सर्दी बढ़ रही है, अंदर चलिए’’, बिरुवा कह रहा था.

‘‘हूं,’’ अपनेआप में खोए मधुप चौंक गए, ‘‘हां चलो.’’ और वे उठ खड़े हुए.

‘‘इस वर्ष सर्दी बहुत पड़ रही है साहब,’’ बिरुवा कुरसी उठा कर उन के साथ चलते हुए बोला, ‘‘ओस भी बहुत पड़ती है. सुबह सब भीगाभीगा रहता है, जैसे रातभर बारिश हुई हो,’’ बिरुवा बोलते जा रहा था.

मधुप अंदर आ गए. बिरुवा उन के अकेलेपन का साथी था. अकेलेपन का दुख उन्हें मिला था पर भुगता बिरुवा ने भी था. खाली घर में बिरुवा कई बार अकेला ही बातें करता रहता. उन की आवश्यकता से अधिक चुप रहने की आदत थी. उन की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न पा कर, बड़बड़ाता हुआ वह स्वयं ही खिसिया कर चुप हो जाता.

पर श्यामला खिसिया कर चुप न होती थी, बल्कि झल्ला जाती थी, ‘मैं क्या दीवारों से बातें कर रही हूं. हूं हां भी नहीं बोल पाते, चेहरे पर कोई भाव ही नहीं रहते, किस से बातें करूं,’ कह कर कभीकभी उस की आंखों में आंसू आ जाते.

उन की आवश्यकता से अधिक चुप रहने की आदत श्यामला के लिए इस कदर परेशानी का सबब बन गई थी कि वह दुखी हो जाती थी. उन की संवेदनहीनता, स्पंदनहीनता की ठंडक बर्फ की तरह उस के पूरे व्यक्तित्व को झुलसा रही थी. नाराजगी में तो मधुप और भी अभेद हो जाते थे. मधुप ने कमरे में आ कर टीवी चला दिया.

तभी बिरुवा गरम सूप ले कर आ गया, ‘‘साहब, सूप पी लीजिए.’’

बिरुवा के हाथ से ले कर वे सूप पीने लगे. बिरुवा वहीं जमीन पर बैठ गया. कुछ बोलने के लिए वह हिम्मत जुटा रहा था, फिर किसी तरह बोला, ‘‘साहब, घर वाले बहुत बुला रहे हैं, कहते हैं अब घर आ कर आराम करो, बहुत कर लिया कामधाम, दोनों बेटे कमाने लगे हैं. अब जरूरत नहीं है काम करने की.’’

मधुप कुछ बोल न पाए, छन्न से दिल के अंदर कुछ टूट कर बिखर गया. बिरुवा का भी कोई है जो उसे बुला रहा है. 2 बेटे हैं जो उसे आराम देना चाहते हैं. उस के बुढ़ापे की और अशक्त होती उम्र की फिक्रहै उन्हें. लेकिन सबकुछ होते हुए भी यह सुख उन के नसीब में नहीं है.

बिरुवा के बिना रहने की वे कल्पना भी नहीं कर पाते. अकेले में इस घर की दीवारों से भी उन्हें डर लगता है, जैसे कोनों से बहुत सारे साए निकल कर उन्हें निगल जाएंगे. उन्हें अपनी यादों से भी डर लगता है और अकेले में यादें बहुत सताती हैं.

‘सारा दिन आप व्यस्त रहते हैं, रात को भी देर से आते हैं, मैं सारा दिन अकेले घर में बोर हो जाती हूं,’ श्यामला कहती थी.

‘तो, और औरतें क्या करती हैं और क्या करती थीं, बोर होना तो एक बहाना भर होता है काम से भागने का. घर में सौ काम होते हैं करने को.’

‘पर घर के काम में कितना मन लगाऊं. घर के काम तो मैं कर ही लेती हूं. आप कहो तो बच्चों के स्कूल में एप्लीकेशन दे दूं नौकरी के लिए, कुछ ही घंटों की तो बात होती है, दोपहर में बच्चों के साथ घर आ जाया करूंगी,’ श्यामला ने अनुनय किया.

‘कोई जरूरत नहीं. कोई कमी है तुम्हें?’ अपना निर्णय सुना कर जो मधुप चुप हुए तो कुछ नहीं बोले. उन से कुछ बोलना या उन को मनाना टेढ़ी खीर था. हार कर श्यामला चुप हो गई, जबरदस्ती भी करे तो किस के साथ, और मनाए भी तो किस को.

‘नौवल्टी में अच्छी पिक्चर लगी है, चलिए न किसी दिन देख आएं, कहीं भी तो नहीं जाते हैं हम?’

‘मुझे टाइम नहीं, और वैसे भी, 3 घंटे हौल में मैं नहीं बैठ सकता.’

‘तो फिर आप कहें तो मैं किसी सहेली के साथ हो आऊं?’

‘कोई जरूरत नहीं भीड़ में जाने की, सीडी ला कर घर पर देख लो.’

‘सीडी में हौल जैसा मजा कहां

आता है?’

लेकिन अपना निर्णय सुना कर चुप्पी साधने की उन की आदत थी. श्यामला थोड़ी देर बोलती रही, फिर चुप हो गई. तब नहीं सोच पाते थे मधुप, कि पौधे को भी पल्लवित होने के लिए धूप, छांव, पानी व हवा सभी चीजों की जरूरत होती है. किसी एक चीज के भी न होने पर पौधा मर जाता है. फिर, श्यामला तो इंसान थी, उसे भी खुश रहने के लिए हर तरह के मानवीय भावों की जरूरत थी. वह उन का एक ही रूप देखती थी, आखिर कैसे खुश रह पाती वह.

‘थोड़े दिन पूना हो आऊं मां के

पास, भैयाभाभी भी आए हैं आजकल, मुलाकात हो जाएगी.’

‘कैसे जाओगी इस समय?’ मधुप आश्चर्य से बोले, ‘किस के साथ जाओगी?’

‘अरे, अकेले जाने में क्या हुआ, 2 बच्चों के साथ सभी जाते हैं.’

‘जो जाते हैं, उन्हें जाने दो, पर मैं तुम लोगों को अकेले नहीं भेज सकता.’

फिर श्यामला लाख तर्क करती, मिन्नतें करती. पर मधुप के मुंह पर जैसे टेप लग जाता. ऐसी अनेक बातों से शायद श्यामला का अंतर्मन विरोध करता रहा होगा. पहली बार विरोध की चिनगारी कब सुलगी और कब भड़की, याद नहीं पड़ता मधुप को.

‘‘साहब, खाना लगा दूं?’’ बिरुवा कह रहा था.

‘‘भूख नहीं है बिरुवा, अभी तो सूप पिया.’’

‘‘थोड़ा सा खा लीजिए साहब, आप रात का खाना अकसर छोड़ने लगे हैं.’’

‘‘ठीक है, थोड़ा सा यहीं ला दे,’’ मधुप बाथरूम से हाथ धो कर बैठ गए.

इस एकरस दिनचर्या से वे दो ही दिन में घबरा गए थे, तो श्यामला कैसे बिताती पूरी जिंदगी. वे बिलकुल भी शौकीन तबीयत के नहीं थे. न उन्हें संगीत का शौक था, न किताबें पढ़ने का, न पिक्चरों का, न घूमने का, न बातें करने का. श्यामला की जीवंतता, मधुप की निर्जीवता से अकसर घबरा जाती. कई बार चिढ़ कर कहती, ‘ठूंठ के साथ आखिर कैसे जिंदगी बिताई जा सकती है.’

उन्होंने चौंक कर श्यामला की तरफ देखा, एक हफ्ते बाद सीधेसीधे श्यामला का चेहरा देखा था उन्होंने. एक हफ्ते में जैसे उस की उम्र 7 साल बढ़ गई थी. रोतेरोते आंखें लाल, और चारों तरफ कालेस्याह घेरे.

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मजबूरियां- भाग 1: प्रकाश को क्या मिला निशा का प्यार

‘‘अब सिर दर्द कैसा है आप का?’’ थोड़ी देर बड़े प्रेम से सिर दबाने के बाद ज्योति ने प्रकाश से पूछा.

‘‘तुम्हारे हाथों में जादू है, ज्योति,’’ प्रकाश उस की आंखों में आंखें डाल कर मुसकराया, ‘‘दर्द उड़नछू हो गया. अब मैं खुद को बिलकुल तरोताजा महसूस कर रहा हूं, पर यह कमाल हर बार तुम कैसे कर देती हो?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘कौन सा कमाल?’’ ज्योति बोली.

‘‘मेरे थकेहारे शरीर और दिलोदिमाग में जीवन के प्रति उमंग और उत्साह भरने का कमाल,’’ प्रकाश ने जवाब दिया.

‘‘मैं कोई कमाल नहीं करती जनाब, उलटा मैं जब आप के साथ होती हूं तब मेरी जीवन बगिया के फूल खिल उठते हैं,’’ ज्योति ने कहा.

‘‘और जरूर उन्हीं खूबसूरत फूलों की शानदार महक मु झे यों मस्त और तरोताजा कर जाती है, डार्लिंग,’’ अपनी गरदन घुमा कर प्रकाश ने एक छोटा चुंबन ज्योति के गुलाबी होंठों पर अंकित कर दिया.

‘‘बड़ी जल्दी शरारत सू झने लगी है, साहब,’’ कहते हुए ज्योति के गोरे गाल शर्म से गुलाबी हो उठे.

‘‘तुम कितनी सुंदर हो,’’ अपना मुंह उस के कान के पास ला कर प्रकाश ने कोमल स्वर में कहा, ‘‘एक बात मु झे अभी भी बहुत हैरान कर जाती है.’’

‘‘कौन सी बात?’’ ज्योति ने पूछा.

‘‘हमारी जानपहचान अब 5 साल पुरानी हो गई है. सैकड़ों बार मैं तुम्हें प्रेम कर चुका हूं. पर अब भी मेरा छोटा सा चुंबन तुम्हारे रोमरोम को पुलकित कर जाता है. यही बात मु झे हैरान करती है.’’

‘‘है न कमाल की बात. अब जवाब दो कि जादूगर मैं हुई कि आप?’’ ज्योति शरारती अदा से मुसकराई तो प्रकाश ने इस बार एक लंबा चुंबन उस के होंठों पर अंकित कर दिया.

अपनी सांसें व्यवस्थित करने के बाद प्रकाश ने मुसकराते हुए जवाब दिया, ‘‘जादूगरनी तो तुम हो ही ज्योति. पहली मुलाकात के दिन से ही तुम्हारा जादू मेरे सिर चढ़चढ़ कर बोलने लगा था.’’

‘‘याद है आप को हमारी वह पहली मुलाकात?’’ ज्योति ने पूछा.

‘‘बिलकुल याद है, मीठे खरबूजे चुनने में तुम ने मेरी खुद आगे बढ़ कर मदद की थी,’’ प्रकाश बोला.

‘‘और मैं ने जब अपने खरीदे खरबूजे प्लास्टिक के थैले में डाले तो थैला ही फट गया और थैले में रखे आलूप्याज भी चारों तरफ बिखर गए थे. कितनी चुस्ती दिखाई थी आप ने उन्हें समेटने में. भला 3-4 आलूप्याज निकालने को खरबूजे वाले के ठेले के नीचे घुसने की क्या जरूरत थी आप को?’’ पुराना दृश्य याद कर के ज्योति खिलखिला कर हंस पड़ी.

‘‘अरे, अगर ठेले के नीचे न घुसता तो कील में अटक कर मेरी कमीज न फटती. अगर कमीज न फटती तो तुम अफसोस प्रकट करने की मु झ से ढेरों बातें न करतीं. तब हमारा आपस में न परिचय होता, न हम साथसाथ थोड़ी देर पैदल चलते. उस 15 मिनट के साथसाथ चलने में ही तो हमारे दिलों में एकदूसरे के लिए प्रेम का बीज पड़ा था, मैडम. इसलिए मेरा ठेले के नीचे घुसना बड़ा जरूरी था. यदि मैं ऐसा न करता तो दुनिया की सब से खूबसूरत, सब से प्यारी सर्वगुणसंपन्न युवती के प्यार से वंचित रह जाता या नहीं?’’ प्रकाश का बोलने का नाटकीय अंदाज ज्योति को हंसाहंसा कर उस के पेट में बल डाल गया.

‘‘तुम से उस दिन मिल कर पहली नजर में ही मु झे ऐसा लगा था जैसे मु झे अपने सपनों का राजकुमार मिल गया हो,’’  प्रकाश की गोद में सिर रख कर लेटते हुए ज्योति ने भावुक स्वर में कहा.

‘‘और जब बाद में तुम्हें यह मालूम चल गया कि तुम्हारे सपनों का राजकुमार शादीशुदा है, 2 बच्चों का पिता है तब तुम ने उस की तसवीर को अपने दिल से क्यों नहीं निकाल फेंका?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘बुद्धू, इतने सोचविचार में ‘प्रेम’ कहां पड़ता है. प्रेम को अंधा कहा जाता है, जनाब. जिस से हो गया, हो गया. जिस से नहीं, तो नहीं. कोई जोरजबरदस्ती नहीं चलती प्रेम में.’’

‘‘ठीक कहती हो तुम, निशा के साथ मेरी शादी हुए 18 साल से ज्यादा समय बीत चुका है. हमारे बीच प्रेम का अंकुर कभी जड़ ही नहीं पकड़ सका. एकदूसरे के दिलों में जगह नहीं बना पाए

कभी हम. तुम्हारे मेरे साथ संबंधों  की जानकारी होने के बाद उस से मेरे संबंध बहुत बिगड़ गए हैं, ज्योति,’’ प्रकाश बोला.

‘‘मेरे कारण आप उन से मत उल झा करें, प्लीज. मैं कभी नहीं चाहूंगी कि मैं आप के जीवन में समस्याएं पैदा करूं. मेरा प्रेम आप की सुखशांति और खुशियों के अलावा और कुछ भी नहीं मांगता,’’ कहते हुए ज्योति की आंखों में आंसू  िझलमिला उठे.

‘‘तुम कुछ मांगती नहीं. और मैं जो तुम्हें देना चाहता हूं वह दे नहीं सकता. अपनी मजबूरियां देख कर कभीकभी मु झे लगता है, मैं ने तुम से प्रेमसंबंध जोड़ कर तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया है,’’  कहता हुआ प्रकाश उदास हो उठा.

‘‘बिलकुल गलत,’’ ज्योति फौरन हंस कर बोली, ‘‘तुम्हारा प्रेम मेरे लिए अनमोल है. प्रेम से मिलने वाला सुख सात फेरों का मुहताज नहीं होता. बस, मु झे तुम्हारे होंठों पर हंसी नजर आती रहे तो मैं अपने जीवन से, अपने हालात से कभी शादी न करने के अपने फैसले से, तुम्हारे प्रेम से पूरी तरह संतुष्ट हूं.’’

‘‘आई लव यू टू, ज्योति,’’ प्रकाश ने उस की आंखों को चूम कर कहा.

‘‘आई लव यू, प्रकाश,’’ ज्योति उस के कान में फुसफुसा उठी.

‘‘तुम मु झ से कभी दूर न होना, प्लीज,’’ प्रकाश बोला.

‘‘यह कभी नहीं होगा,’’ यह कह कर ज्योति प्रकाश की आगोश में समा गई थी.

निशा ने शयनकक्ष में घुसते ही प्रकाश से  झगड़ने के अंदाज में पूछा, ‘‘लंच के बाद औफिस से कहां गए थे आप?’’

‘‘क्यों जानना चाहती हो?’’ प्रकाश ने भावहीन लहजे में उलटा सवाल किया.

‘‘तुम्हारी पत्नी होने के नाते मु झे यह सवाल पूछने का अधिकार है.’’

‘पत्नी के अधिकार तुम कभी नहीं भूलीं और अपने कर्तव्यों के बारे में कभी प्रेम से सोचा ही नहीं तुम ने,’ प्रकाश बहुत धीमे स्वर में बुदबुदाया.

‘‘मुंह ही मुंह में क्या बड़बड़ा रहे हो, अगर गालियां देनी हैं तो सामने जोर से दो,’’ निशा चिढ़ उठी.

‘‘मैं गाली नहीं दे रहा हूं तुम्हें,’’ प्रकाश ने गहरी सांस छोड़ कर कहा.

‘‘कहां गए थे आप लंच के बाद?’’ निशा ने अपना सवाल दोहराया.

‘‘तुम्हें अच्छी तरह पता है मैं कहां गया था,’’ प्रकाश बोला.

‘‘उसी चुड़ैल ज्योति के पास?’’ निशा ने विषैले अंदाज में पूछा.

शायद- भाग 1: क्या हुआ था सुवीरा के साथ

पदचाप और दरवाजे के हर खटके पर सुवीरा की तेजहीन आंखों में चमक लौट आती थी. दूर तक भटकती निगाहें किसी को देखतीं और फिर पलकें बंद हो जातीं. सिरहाने बैठे गिरीशजी से उन की बहू सीमा ने एक बार फिर जिद करते हुए कहा था,  ‘‘पापा, आप समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रहे? जब तक नानीजी और सोहन मामा यहां नहीं आएंगे, मां के प्राण यों ही अधर में लटके रहेंगे. इन की यह पीड़ा अब मुझ से देखी नहीं जाती,’’ कहतेकहते सीमा सिसक उठी थी.

बरसों पहले का वह दृश्य गिरीशजी की आंखों के सामने सजीव हो उठा जब मां और भाई के प्रति आत्मीयता दर्शाती पत्नी को हर बार बदले में अपमान और तिरस्कार के दंश सहते उन्होंने ऐसी कसम दिलवा दी थी जिस की सुवीरा ने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

‘‘आज के बाद अगर इन लोगों से कोई रिश्ता रखोगी तो तुम मेरा मरा मुंह देखोगी.’’

बरसों पुराना बीता हुआ वह लम्हा धुल-पुंछ कर उन के सामने आ गया था. अतीत के गर्भ में बसी उन यादों को भुला पाना इतना सहज नहीं था. वैसे भी उन रिश्तों को कैसे झुठलाया जा सकता था जो उन के जीवन से गहरे जुड़े थे.

आंखें बंद कीं तो मन न जाने कब आमेर क्लार्क होटल की लौबी में जा पहुंचा और सामने आ कर खड़ी हो गई सुंदर, सुशील सुवीरा. एकदम अनजान जगह में किसी आत्मीय जन का होना मरुस्थल में झील के समान लगा था उन्हें. मंदमंद हास्य से युक्त, उस प्रभावशाली व्यक्तित्व को बहुत देर तक निहारते रहे थे. फिर धीरे से बोले, ‘आप का प्रस्तुतिकरण सर्वश्रेष्ठ था.’

‘धन्यवाद,’ प्रत्युत्तर में सुवीरा बोली तो गिरीश अपलक उसे देखते ही रह गए थे. इस पहली भेंट में ही सुवीरा उन के हृदय की साम्राज्ञी बन गई थी. फिर तो उसी के दायरे में बंधे, उस के इर्दगिर्द घूमते हुए हर पल उस की छोटीछोटी गतिविधियों का अवलोकन करते हुए इतना तो वह समझ ही गए थे कि उन का यह आकर्षण एकतरफा नहीं था. सुवीरा भी उन्हें दिल की अतल गहराइयों से चाहने लगी थी, पर कह नहीं पा रही थी. अपने चारों तरफ सुवीरा ने कर्तव्यनिष्ठा की ऐसी सीमा बांध रखी थी जिसे तोड़ना तो दूर लांघना भी उस के लिए मुश्किल था.

लगभग 1 माह बाद दफ्तर के काम से गिरीश दिल्ली पहुंचे तो सीधे सुवीरा से मिलने उस के घर चले गए थे. बातोंबातों में उन्होंने अपने प्रेम प्रसंग की चर्चा सुवीरा की मां से की तो अलाव सी सुलग उठी थीं वह.

‘बड़ी सतीसावित्री बनी फिरती थी. यही गुल खिलाने थे?’ मां के शब्दों से सहमीसकुची सुवीरा कभी उन का चेहरा देखती तो कभी गिरीश के चेहरे के भावों को पढ़ने का प्रयास करती पर अम्मां शांत नहीं हुई थीं.

अगले दिन कोर्टमैरिज के बाद सुवीरा हठ कर के अम्मांबाबूजी के पास आशीर्वाद लेने पहुंची तो अपनी कुटिल दृष्टि बिखेरती अम्मां ने ऐसा गर्जन किया कि रोनेरोने को हो उठी थी सुवीरा.

‘अपनी बिरादरी में लड़कों की कोई कमी थी जो दूसरी जाति के लड़के से ब्याह कर के आ गई?’

‘फोन तो किया था तुम्हें, अम्मां… अभी भी तुम्हारा आशीर्वाद ही तो लेने आए हैं हम,’ सुवीरा के सधे हुए आग्रह को तिरस्कार की पैनी धार से काटती हुई अम्मां ने हुंकार लगाई.

‘तू क्या समझती है, तू चली जाएगी तो हम जी नहीं पाएंगे…भूखे मरेंगे? डंके की चोट पर जिएंगे…लेकिन याद रखना, जिस तरह तू ने इस कुल का अपमान किया है, हम आशीर्वाद तो क्या कोई रिश्ता भी नहीं रखना चाहते तुझ से.’

व्यावहारिकता के धरातल पर खड़े गिरीश, सास के इस अनर्गल प्रलाप का अर्थ भली प्रकार समझ गए थे. नौकरीपेशा लड़की देहरी लांघ गई तो रोटीपानी भी नसीब नहीं होगा इन्हें. झूठे दंभ की आड़ में जातीयता का रोना तो बेवजह अम्मां रोए जा रही थीं.

बिना कुछ कहेसुने, कांपते कदमों से सुवीरा सीधे बाबूजी के कमरे में चली गई थी. वह बरसों से पक्षाघात से पीडि़त थे. ब्याहता बेटी देख कर उन की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा फूट पड़ी थी. सुवीरा भी उन के सीने से लग कर बड़ी देर तक सिसकती रही थी. रुंधे स्वर से वह इतना ही कह पाई थी, ‘बाबूजी, अम्मां चाहे मुझ से कोई रिश्ता रखें या न रखें, पर मैं जब तक जिंदा रहूंगी, मायके के हर सुखदुख में सहभागिता ही दिखाऊंगी, ये मेरा वादा है आप से.’

बेटी की संवेदनाओं का मतलब समझ रहे थे दीनदयालजी. आशीर्वाद- स्वरूप सिर पर हाथ फेरा तो अम्मां बिफर उठी थीं, ‘हम किसी का एहसान नहीं लेंगे. जरूरत पड़ी तो किसी आश्रम में चाहे रह लें लेकिन तेरे आगे हाथ नहीं फैलाएंगे.’

अम्मां चाहे कितना चीखती- चिल्लाती रहीं, सुवीरा महीने की हर पहली तारीख को नोटों से भरा लिफाफा अम्मां के पास जरूर पहुंचा आती थी और बदले में बटोर लाती थी अपमान, तिरस्कार के कठोर, कड़वे अपदंश. गिरीश ने कभी अम्मां के व्यवहार का विश्लेषण करना भी चाहा तो बड़ी सहजता से टाल जाती सुवीरा, पर मन ही मन दुखी बहुत होती थी.

‘जो कुछ कहना था, मुझे कहतीं. दामाद के सामने अनापशनाप कहने की क्या जरूरत थी?’ ऐसे में अपंग पिता का प्यार और पति का सौहार्द ठंडे फाहे सा काम करता.

दौड़भाग करते कब सुबह होती, कब शाम, पता ही नहीं चलता था. गिरीश ने कई बार रोकना चाहा तो सुवीरा हंस  कर कहती, ‘समझने की कोशिश करो, गिरीश. मेरे ऊपर अम्मां, बीमार पिता और सोहन का दायित्व है. जब तक सोहन अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता, मुझे नौकरी करनी ही पड़ेगी.’

‘सुवीरा, मैं ने अपने मातापिता को कभी नहीं देखा. अनाथालय में पलाबढ़ा लेकिन इतना जानता हूं कि सात फेरे लेने के बाद पतिपत्नी का हर सुखदुख साझा होता है. उसी अधिकार से पूछ रहा हूं, क्या तुम्हारे कुछ दायित्व मैं नहीं बांट सकता?’

गिरीश के प्रेम से सराबोर कोमल शब्द जब सुवीरा के ऊपर भीनी फुहार बन कर बरसते तो उस का मन करता कि पति के मादक प्रणयालिंगन से निकल कर, भाग कर सारे खिड़कीझरोखे खोल दे और कहे, देखो, गिरीश मुझे कितना प्यार करते हैं.

2 बरस बाद सुवीरा ने जुड़वां बेटों को जन्म दिया. गिरीश खुद ससुराल सूचना देने गए पर कोई नहीं आया था. बाबूजी तो वैसे ही बिस्तर पर थे पर मां और सोहन…इतने समय बाद संतान के सुख से तृप्त बेटी के सुखद संसार को देखने इस बार भी नहीं आए थे. मन ही मन कलपती रही थी सुवीरा.

गिरीश ने जरा सी आत्मीयता दर्शायी तो पानी से भरे पात्र की तरह छलक उठी थी सुवीरा, ‘क्या कुसूर किया था मैं ने? उस घर को सजाया, संवारा अपने स्नेह से सींचा, पर मेरे अस्तित्व को ही नकार दिया. कम से कम इतना तो देखते कि बेटी कहां है, किस हाल में है. मात्र यही कुसूर है न मेरा कि मैं ने प्रेम विवाह किया है.’

इतना सुनते ही गिरीश के चेहरे पर दर्द का दरिया लरज उठा था. बोले, ‘इस समय तुम्हारा ज्यादा बोलना ठीक नहीं है. आराम करो.’

सुवीरा चुप नहीं हुई. प्याज के छिलकों की तरह परत दर परत बरसों से सहेजी संवेदनाएं सारी सीमाएं तोड़ कर बाहर निकलने लगीं.

‘मैं उस समय 5 साल की बच्ची ही तो थी जब अम्मां दुधमुंहे सोहन को मेरे हवाले छोड़ पड़ोस की औरतों के बीच गप मारने में मशगूल हो जाती थीं. लौट कर आतीं तो किसी थानेदार की तरह ढेरों प्रश्न कर डालतीं.

Anupama के मालकिन होने की बात से ‘अनुज की भाभी’ को लगेगा झटका, देखें वीडियो

सीरियल अनुपमा (Anupamaa) की कहानी में इन दिनों नए-नए ट्विस्ट आते दिख रहे हैं. जहां अनु को गोद लेने के लिए अनुज (Gaurav Khanna) और अनुपमा (Rupali Ganguly) तैयार हैं तो वहीं पाखी और समर की जिंदगी में प्यार की एंट्री होने वाली है, जिसका अपकमिंग एपिसोड  (Anupamaa Serial Update) में खुलासा होगा. आइए आपको बताते हैं क्या होगा शो में आगे…

अनुज की भाभी से मिली अनुपमा

 

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अब तक आपने देखा कि अनुपमा और अनुज अपनी हनीमून से वापस घर लौटते हैं. जहां बरखा दोनों का स्वागत करती है. वहीं अपनी भाभी से मिलकर अनुज बेहद खुश होता है. दूसरी तरफ, बा, किंजल को कॉन्सर्ट में जाने से रोकती है. हालांकि पाखी, परितोष और समर, बा को मनाने की कोशिश करते हैं. लेकिन वह किंजल को नहीं जाने देती.

पाखी-समर के जिंदगी में आएंगे दो नए शख्स

 

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अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि अनुज के भैया भाभी, अनुपमा को देखकर बेहद खुश होंगे. और बैठकर बातें करेंगे. वहीं पाखी की जहां एक नए लड़के से मुलाकात होगी तो वहीं समर भी एक लड़की से मिलेगा और सभी कॉसर्ट में मस्ती करेंगे. वहीं अरुण, बरखा को अनुज-अनुपमा के प्यार को देखकर ताना मारेगा, जिसे सुनकर वह गुस्सा होती दिखेगा.

बरखा को लगेगा झटका

 

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इसी के साथ आप देखेंगे कि बरखा, अनुज को उसका नया घर डेकोरेट करने के लिए कहेगी, जिसका जवाब देते हुए वह कहेगा कि उन्हें घर की मालकिन से पूछना पड़ेगा. वहीं अनुपमा के मालकिन होने की बात सुनकर बरखा का चेहरा देखने लायक होगा. दूसरी तरफ, तोषू को गलतफहमी होगी कि एक लड़का उसे छेड़ रहा है और वह उसे पीटेगा. लेकिन पाखी लड़के का बचाव करते हुए कहेगी कि उसने कुछ नहीं किया. वहीं जाते वक्त दोनों आंखों ही आखों में एक दूसरे को देखते हुए नजर आएंगे.

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सीरियल ‘गुम हैं किसी के प्यार में’ की कहानी दिलचस्प मोड़ लेती नजर आ रही है. जहां सम्राट की मौत के बाद पाखी का दिल टूट गया है तो वहीं सई की प्रैग्नेंसी ने भवानी के अरमान जगा दिए हैं. इसी बीच सीरियल में पाखी औऱ भवानी के बीच जंग होते हुए नजर आने वाली है. आइए आपको बताते हैं क्या होगा सीरियल में आगे…

सम्राट की मौत से टूटा परिवार

अब तक आपने देखा कि चौह्वाण परिवार, सम्राट के अंतिम संस्कार करता है. जहां भवानी और पूरा परिवार टूटता हुआ नजर आथा है. वहीं सम्राट की मां की हालत बिगड़ जाती है, जिसके चलते सई उसका इलाज करने की कोशिश करती है. लेकिन पाखी की तरह मानसी भी सई को सम्राट की मौत का जिम्मेदार मानती है और उसे जाने के लिए कहती है. हालांकि सई, सम्राट से किए वादे के चलते उनका ख्याल रखती हुई दिखती है.

सई को दोषी मानेगी पाखी

अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि सम्राट की शांति सभा में पाखी, सम्राट से आखिरी मुलाकात याद करेगी, जिसके चलते वह सई पर भड़क जाएगी और उसे सम्राट की फोटो पर हार चढ़ाने से रोकेगी और उसे घर से निकल जाने के लिए कहेगी. वहीं उसे धक्का भी देगी. हालांकि विराट उसे रोक लेगा. हालांकि पाखी पूरे को पूरा परिवार समझाएगा. लेकिन वह सई को कसूरवार ठहराएगी. इसी बीच भवानी, विराट और परिवार को सई का समर्थन करना बंद करने के लिए कहेगी और पाखी की तरह वह भी सई को सम्राट की मौत का दोषी ठहराएगी.

 

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भवानी के कारण बढ़ेगा पाखी का गुस्सा

 

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इसके अलावा आप देखेंगे कि पाखी, सई को घसीटते हुए दरवाजे की ओर ले जाएगी. जहां भवानी, सई का हाथ पकड़कर उसे रोकेगी और कहती है कि सई चव्हाण परिवार के वारिस को जन्म देने वाली है और इसलिए वह सई को घर से बाहर नहीं जाने देगी. भवानी की ये बात सुनकर पाखी का गुस्सा और ज्यादा बढ़ जाएगा.

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