समाधान: भाग 2- अनुज और अरुण ने क्या निकाला अंजलि की तानाशाही का हल

अंजलि खुद को घर की मुखिया मानती थी. हर किसी को आदेश देना उसे अपना हक लगता. सब उस के ढंग से उस के कहे पर चलें, यह इच्छा उस के मन में गहरी जड़ें जमाए हुए थी.

सीमा और प्रिया बाहर से आ कर परिवार का अंग बनी थीं. अंजलि सब की शुभचिंतक है, इस का एहसास सभी को था, पर उस के तानाशाही व्यवहार के चलते घर का माहौल तनावपूर्ण रहता. पूरी स्थिति अनुज की शादी के बाद ज्यादा बिगड़ी थी. सीमा और प्रिया को एकदूसरे के सामने अंजलि से दबनाडरना जरा भी नहीं भाता था. बड़ी ननद का व्यवहार दोनों को धीरेधीरे असहनीय होता जा रहा था.

घर में बढ़ती कलह व असंतोष की खबरें मुझे रोज ही फोन पर मिल जाती थीं. घर की तीनों स्त्रियां मुझे अपनेअपने पक्ष में करने के लिए एक ही घटना को अलगअलग रंग दे कर सुनातीं. दोनों भाई इन परिस्थितियों से बेहद दुखी व परेशान थे.

अपने दिवंगत भैयाभाभी के परिवार को यों दुखी, परेशान व तनावग्रस्त देख मैं अकसर आंसू बहाने लगती. इस समस्या के समाधान की जरूरत मुझे शिद्दत से महसूस होने लगी थी.

समस्या का समाधान करीब 3 महीने पहले राकेश के रूप में सामने आया था. वह मेरी बहुत पुरानी सहेली सुषमा का बड़ा बेटा था. उस की पत्नी सड़क दुर्घटना में करीब 3 साल पहले चल बसी थी. कोई संतान न होने के कारण राकेश बिलकुल अकेला रह गया था. अपने दोनों छोटे भाइयों के परिवारों के साथ रहते हुए भी अकेलापन दर्शाने वाली उदासी उस के चेहरे पर बनी ही रहती थी.

मेरी समझ से जीवनसाथी को ढूंढ़ निकालना अंजलि और राकेश दोनों की भावी खुशियां व सुखशांति सुनिश्चित करने के लिए जरूरी था. इसी सोच के तहत मैं ने अलगअलग बहाने बना कर राकेश और अंजलि की आपस में मुलाकात कई बार कराई थी.

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आज भी राकेश आएगा, मुझे पता था. कल शाम मैं ने ही फोन पर अंजलि को बुखार होने की सूचना दी थी. राकेश अंजलि में दिलचस्पी ले रहा है, यह मेरी और दूसरे लोगों की आंखों से छिपा नहीं था.

लेकिन अंजलि की प्रतिक्रिया से मुझे खासी निराशा मिली थी.

‘‘मीना बूआ, किस कोण से यह राकेश आप को मेरे लिए उपयुक्त जीवनसाथी लग रहा है?’’ कुछ दिनों पहले ही अंजलि ने बुरा सा मुंह बना कर मुझे अपनी राय बताई थी, ‘‘मैं भी कोई रूप की रानी नहीं हूं, पर उस की पर्सनेल्टी तो बिलकुल ही फीकी है.’’

‘‘मुझे तो ऐसा नहीं लगता…लंबा कद है…काना, बहरा, लंगड़ा या गूंगा नहीं है. हां, दुबलापतला जरूर है पर शादी के बाद सुकड़े लड़कों की अकसर तोंद निकल आती है,’’ मैं ने राकेश के पक्ष में उसे समझाने का प्रयास शुरू किया.

‘‘मुझे न किसी तोंदू में दिलचस्पी है, न भोंदू में.’’

‘‘वह सीधा है, भोंदू नहीं. पूरे घर में अपनी बीमार मां का वही सब से ज्यादा ध्यान रखता है.’’

‘‘मैं उस से बंध गई तो उस की यह जिम्मेदारी भी मेरे गले पड़ जाएगी. उस के घर में 10  लोग तो होंगे ही. मेरी अब वह उम्र नहीं रही कि इतने बड़े संयुक्त परिवार में जा कर मैं खट सकूं.’’

‘‘हम किसी दूसरे के काम नहीं आएंगे…किसी का सहारा नहीं बनेंगे तो हमारे काम भी कोई नहीं आएगा,’’ मेरे इस तर्क को सुनने के बाद अंजलि कुछ उदास जरूर हो गई पर राकेश से संबंध जोड़ने में मैं उस की दिलचस्पी पैदा नहीं कर पाई.

मैं राकेश को ले कर जब अंजलि के कमरे में पहुंची, तो वह खस्ता हालत में नजर आ रही थी. उस का सिर पहले ही दर्द से फट रहा था. अब उलटियां भी शुरू हो गईं.

उन दोनों के बीच औपचारिक बातचीत शुरू हुई और मैं पलंग पर लेटी अंजलि के माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखने लगी.

कुछ देर बाद मैं ने यह काम राकेश को सौंपा और अदरक वाली चाय बनाने के लिए रसोई में चली आई. अंजलि के अंदर शायद इतनी ताकत नहीं थी कि वह राकेश द्वारा पट्टियां रखे जाने का विरोध कर पाती.

हमारे बहुत जोर देने पर अंजलि ने दो घूंट चाय ही पी थी कि फिर उस का जी मिचलाने  लगा और 2 मिनट बाद उलटी हो गई.

‘‘इस का बुखार कम नहीं हो रहा है. कोई लौट आता तो इसे डाक्टर को दिखा लाते,’’ मेरी आवाज चिंता से भरी थी.

‘‘हम दोनों ले चलते हैं इन्हें डाक्टर के पास,’’  राकेश ने सकुचाए अंदाज में सुझाव पेश किया.

‘‘गुड आइडिया. मैं कपड़े बदल कर आती हूं,’’ अंजलि के कुछ कहने से पहले ही मैं कमरे से बाहर निकल आई थी.

अंजलि को राकेश की उपस्थिति असहज बना रही थी. वह उस की किसी भी तरह की सहायता लेना नहीं चाहती थी पर कमजोरी ने उसे मजबूर कर दिया था.

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मेरी एक आवाज पर राकेश भागभाग कर काम कर रहा था. घर बंद करने में उस ने मेरी सहायता की. अंजलि को सहारा दे कर बाहर लाया. फिर डाक्टर के क्लिनिक तक जाने के लिए 2 रिकशे लाया.

‘‘मुझ से अंजलि नहीं संभलेगी,’’ ऐसा कहते हुए मैं ने राकेश को अंजलि के साथ रिकशे में बिठा दिया.

इस बार बीमार अंजलि की आंखों में मैं ने नाराजगी के भाव साफ देखे, पर उस की परवा न कर मैं दूसरे रिकशे की तरफ चल दी.

उन का रिकशा चल पड़ा. सड़क  के कोने पर जा कर जब वह मेरी आंखों से ओझल हो गया तो मैं ने अपने रिकशा वाले को 5 रुपए दे कर खाली वापस भेज दिया.

मेरा राकेश और अंजलि के साथ क्लिनिक तक जाने का कोई इरादा न था. ताला खोल कर मैं घर में घुसी और टीवी खोल कर देवआनंद की सदाबहार फिल्म ‘ज्वैल थीफ’ देखने का आनंद लेने लगी.

राकेश से अंजलि हर बार कटीकटी सी मिलती आई थी. मैं ने इस बार उन दोनों का काफी समय एकसाथ गुजरे, इस का इंतजाम कर दिया था. अब आगे जो होगा देखा जाएगा, ऐसा सोच कर मैं आराम से फिल्म देखने में मग्न हो गई.

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पहल: भाग 3- शीला के सामने क्या था विकल्प

शीला ने डब्बे में बैठे यात्रियों का सिंहावलोकन किया. लगभग सभी यात्री अवाक् और हतप्रभ थे. किसी ने सोचा भी न था कि ऊंट इस तरह करवट ले बैठेगा.

‘‘अरे भैया, लड़की का पार्टी के लिए मन नहीं है तो काहे जबरदस्ती कर रहे ससुर?’’ नेताजी ने बीचबचाव की पहल की तो पिंटू तुनक कर खड़ा हो गया, ‘‘ओ बादशाहो, तुसी वड्डे मजाकिया हो जी. त्वाडे दिल विच्च इस कुड़ी के लिए एन्नी हमदर्दी क्यों फड़फड़ा रेहंदी है, अयं?’’

नेताजी की ओर कड़ी दृष्टि से देखते हुए अतुल शीला से मुखातिब हो कर बोला, ‘‘आइए, गेट के पास चलते हैं.’’

‘‘नहींनहीं, मैं नहीं जाऊंगी,’’ शीला की आंखों में भय उतर आया, ‘‘प्लीज…’’

‘‘अब नखरे मत दिखा,’’ यादव और अतुल भी खडे़ हो गए. यादव ने शीला की कलाई थाम ली तो शीला ने झटके से छुड़ाते हुए विनम्र भाव से कहा, ‘‘प्लीज, छोड़ दें मुझे. पार्टी फिर कभी,’’ फिर सहायता के लिए प्रोफैसर से गुहार लगाते हुए चीख पड़ी, ‘‘देखिए न, सर…’’

‘‘आप लोग छात्र हैं या आतंकवादी, अयं? इस तरह जबरदस्ती नहीं कर सकते,’’ प्रतिरोध करने की उत्तेजना में प्रोफैसर सीट से खड़े हो गए.

‘‘शटअप,’’ यादव ने चीखते हुए प्रोफैसर को इतनी जोर से धक्का दिया कि वे लड़खड़ाते हुए धप्प से सीट पर लुढ़क गए.

तभी जीआरपी के 2 जवान गश्त लगाते हुए उधर से गुजरे. शीला को जैसे नई जान मिल गई हो, वह चीख पड़ी, ‘जीआरपी अंकल.’

शिवानंद के आगे बढ़ते कदम ठिठक गए. पीछे मुड़ कर बर्थ के भीतर तक झांका तो दृष्टि सब से पहले अतुल से टकराई. वे खिल उठे, ‘‘अरे, अतुल बाबू, आप? नत्थूराम, ई अतुल बाबू हैं, आईजी रेल, तिवाड़ी साहब के सुपुत्र.’’

‘‘अंकल, आप इस टे्रन में?’’ अतुल शिवानंद से हाथ मिलाते हुए मुसकराया.

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‘‘जनता को भी न सरकार और पुलिस विभाग को बदनाम करने में बड़ा मजा मिलता है एकरा माय के. शिकायत किहिस है जे टे्रन में लूटडकैती, छेड़छाड़, किडनैपिंग बढ़ रहा है. बस… आ गया ऊपर से और्डर लोकलवा सब में गश्त लगाने का, हंह. लेकिन अभी तक एक्को केस ऐसा नय मिल सका है.’’

‘‘जनता की बात छोडि़ए,’’ अतुल ने लापरवाही से कंधे झटके. शिवानंद ने युवती की ओर देख कर संकेत से पूछा, ‘‘ई आप के साथ हैं?’’

‘‘जी हां, क्लासफ्रैंड हैं हमारी,’’ अतुल मुसकराया तो शीला का मन हुआ, सारी बात बता दे पर जबान से बोल नहीं फूटे.

‘‘मैडम, अतुल बाबू बड़े सज्जन और सुशील नौजवान हैं. इन की दोस्ती से आप फायदे में ही रहेंगी. अच्छा, अतुल बाबू, सर को हमारा परनाम कहिएगा.’’

शीला की आंखों के आगे सारी स्थिति आईने की तरह साफ हो गई. अतुल आईजी रेल का लड़का है. पावर और पैसा, जब दोनों ही चीजें हों जेब में तो यादव और पिंटू जैसे वफादार चमचे वैसे ही दौड़े आएंगे जैसे गुड़ को देख कर चींटियां. सिपाहियों के जाते ही तीनों एक बार फिर जोरों से हंस पड़े. पिंटू ने आगे बढ़ कर शीला की कलाई थाम ली और खींच कर उसे उठाने का प्रयास करने लगा. शीला की इच्छा हुई, एक झन्नाटेदार तमाचा उस के गाल पर जड़ दे. बड़ी मुश्किल से ही उस ने क्रोध को जज्ब किया. इस तरह रिऐक्ट करने से बात ज्यादा बिगड़ सकती है.

तभी न जाने किस जेब से निकल कर अतुल की हथेली में छोटा सा रिवौल्वर चमक उठा.

‘‘किसी ने भी चूंचपड़ की तो…’’ रिवौल्वर यात्रियों की ओर तानते हुए वह गुर्रा उठा, ‘‘मनीष मिश्रा केस के बारे में तो सुना होगा न?’’

मनीष मिश्रा, वही जिस के तार स्वयं पीएम साहब से जुड़े हुए थे. बदमाशों ने चलती टे्रन से बाहर फेंक दिया था उसे. अपराध? सफर कर रही एक लड़की से छेड़खानी का मुखर विरोध. यात्रियों के बदन भय से कंपकंपाने लगे और रोंगटे खड़े हो गए.

सब से पहले नेताजी उठे, ‘‘थानापुलिस में तो एतना पहचान है कि का कहें ससुर. पर ई छात्र लोग का आपसी मामला न है. पुलिस हस्तक्षेप नहीं कर सकती.’’

फिर प्रोफैसर साहब भी अटैची संभालते हुए उठ खड़े हुए, ‘‘जब इतने प्यार से पार्टी दे रहे हैं ये लोग तो क्या हर्ज है स्वीकारने में? पर घर लौट कर मेरा आलेख पढि़एगा जरूर.’’

धीरेधीरे शकीला के अलावा सभी यात्री डब्बे के दूसरे हिस्सों में चले गए. शकीला वहीं बैठी रही. हिजड़ा होते हुए भी इतना तो समझ चुकी थी कि अकेली लड़की मुसीबत में पड़ गई है. ये लोग इसे जबरदस्ती अगवा करने पर उतारू हैं. पर इस हाल में वह करे भी तो क्या?

‘‘तेरे यार सब तो भाग गए.’’ पिंटू चुटकी बजाते हुए व्यंग्य से बोला, ‘‘तू कौन सा तीर मार लेगी, अयं?’’

‘‘किन्नरों को मामूली न समझियो,’’ शकीला ताली पीटती हुई अदा से खिलखिलाई, ‘‘हमारे 2 किन्नरों ने तो महाभारत का किस्सा ही बदल डाला

था. एक थे शिखंडी महाराज, दूसरे बिरहनला (बृहन्नला).’’

ये नोंकझोंक चल ही रही थी कि तभी उस हिस्से में बूटपौलिश वाला एक लड़का हवा के झौंके की तरह आ पहुंचा. दसेक साल की उम्र. काला स्याह बदन. बाईं कलाई में पौलिश वाला बक्सा झुलाए, दाएं हाथ से ठोस ब्रश को बक्से पर ठकठकाता, ‘‘पौलिश साब.’’

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‘‘तू कहां से आ टपका रे? चल फूट यहां से,’’ अतुल ने रिवौल्वर उस की ओर तान दिया. लड़का तनिक भी न घबराया. पूरा माजरा भांपते एक पल भी नहीं लगा उसे. खीखी करता खीसें निपोर बैठा, ‘‘समझा साब, कोई शूटिंग चल रहेला इधर. अपुन डिस्टप नहीं करेगा साब. थोड़ा शूटिंग देखने को मांगता. बिंदास…’’

‘‘इस को रहने दो बड़े भाई,’’ पिंटू ने मसका लगाया, ‘‘तुम लगते ही हीरो जैसे हो.’’

शकीला के रसीले बतरस और पौलिश वाले लड़के के आगमन से तीनों का ध्यान शीला की ओर से कुछ देर के लिए हट गया. शीला के भीतर एक बवंडर जन्म लेने लगा. कैसा हादसा होने जा रहा है यह? इन की नीयत गंदी है, यह तो स्पष्ट हो चुका है, पार्टी के नाम पर अगवा करने की कुत्सित योजना. उफ.

इस तरह की विषम परिस्थितियों में अकेली लड़की के लिए बचाव के क्या विकल्प हो सकते हैं भला? सहायता के लिए ‘बचाओ, बचाओ’ की गुहार लगाने पर सचमुच कोई दौड़ा चला आएगा? डब्बे में बैठे यात्रियों का पलायन तो देख ही रही है वह. फिर? इन निर्मम, नृशंस और संवेदनहीन युवकों के आगे हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने से भी कोई लाभ होने वाला नहीं. इन के लिए तो हर स्त्री सिर्फ मादा भर ही है. हर रिश्तेनाते से परे. सिर्फ मादा.

शीला सतर्क नजरों से पूरी स्थिति का जायजा लेती है. डब्बे में शकीला और पौलिश वाला लड़का ही रह गए थे. भावावेश में शकीला की ओर देखती है वह. तभी आंखों के आगे धुंध छाने लगती है, ‘अरे, बृहन्नला के भीतर से यह किस की आकृति फूट रही है? अर्जुन, हां, अर्जुन ही हैं जो कह रहे हैं, नारी सशक्तीकरण की सारी बातें पाखंड हैं री. पुरुषवादी समाज नारियों को कभी भी सशक्त नहीं होने देगा. सशक्त होना है तो नारियों को बिना किसी की उंगली थामे स्वयं ही पहल करनी होगी.’

शीला अजीब से रोमांच से सिहर उठती है. नजरें वहां से हट कर पौलिश वाले लड़के पर टिक जाती हैं. पौलिश वाले लड़के का चेहरा भी एक नई आकृति में ढलने लगता है, ‘बचपन में लौटा शम्बूक. होंठों पर आत्मविश्वास भरी निश्छल हंसी, ‘ब्राह्मणवादी, पुरुषवर्चस्ववादी व्यवस्था’ ने नारियों व दलितों को कभी भी सम्मान नहीं दिया. अपने सम्मान की रक्षा के लिए तुम्हारे पास एक ही विकल्प है, पहल. एक बार मजबूत पहल कर लो, पूरा रुख बदल जाएगा.’

शीला असाधारण रूप से शांत हो गई. भीतर का झंझावात थम गया. आसानी से तो हार नहीं मानने वाली वह. मन ही मन एक निर्णय लिया. तीनों युवक शकीला के किसी मादक चुटकुले पर होहो कर के हंस रहे थे कि अचानक जैसे वह पल ठहर गया हो. एकदम स्थिर. शीला ने दाहिनी हथेली को मजबूत मुट्ठी की शक्ल में बांधा और भीतर की सारी ताकत लगा कर मुट्ठी को पास खड़े यादव की दोनों जांघों के संधिस्थल पर दे मारा.

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उसी ठहरे हुए स्थिर पल में शकीला के भीतर छिपे अर्जुन ने ढोलक को लंबे रूप में थामा और पूरी शक्ति लगा कर चमड़े के हिस्से वाले भाग से पिंटू के माथे पर इतनी जोर से प्रहार किया कि ढोलक चमड़े को फाड़ती उस की गरदन में फंस गई. और उसी ठहरे हुए स्थिर पल में पौलिश वाले लड़के के भीतर छिपे शंबूक ने दांतों पर दांत जमा कर हाथ के सख्त ब्रश को अतुल की कलाई पर फेंक मारा. इतना सटीक निशाना कि रिवौल्वर छिटक कर न जाने कहां बिला गया और ओहआह करता वह फर्श पर लुढ़क कर तड़पने लगा.

पलक झपकते आसपास के डब्बों से आए यात्रियों की खासी भीड़ जुट गई वहां और लोग तीनों पर लातघूंसे बरसाते हुए फनफना रहे थे, ‘‘हम लोगों के रहते एक मासूम कोमल लड़की से छेड़खानी करने का साहस कैसे हुआ रे?’’

पहल: भाग 2- शीला के सामने क्या था विकल्प

प्रोफैसर भड़क उठे, ‘‘आप छात्र हैं न? मुझे नहीं पहचान रहे? मैं प्रोफैसर शुभंकर सान्याल. नारी सशक्तीकरण पर उसी परचे का प्रख्यात लेखक जिस की चर्चा आज हर बुद्धिजीवी और हर छात्र की जबान पर है.’’

‘‘प्रोफैसर हैं? चलिए, एगो पहेली बुझिए तो…’’ पिंटू बोली बदलबदल कर बोलने में माहिर था, खालिस बिहारी अंदाज में प्रोफैसर की ओर मुंह कर के हुंकार भर उठा, ‘‘एगो है जो रोटी बेलता है, दूसरा एगो है जो रोटी खाता है. एगो तीसरा अऊर है ससुर जो न बेलता है, न खाता है, बल्कि रोटी से कबड्डी खेलता है. ई तीसरका को कोई भी नय जानत. हमारी संसद भी नहीं. आप जानत हैं?’’

प्रोफैसर चुप. अन्य यात्रीगण भी चुप. युवती मन ही मन खुश हुई. प्रश्न क्लासरूम में किया गया होता तो वह हाथ अवश्य उठा देती. यादव दोनों ओर की बर्थ के भीतर तक चला आया और खिड़की की ओर इशारा कर के प्रोफैसर से बोला, ‘‘यहां बैठने दीजिए तो.’’

प्रोफैसर इन लोगों के व्यंग्य से खिन्न तो थे ही, चीखते हुए फट पड़े, ‘‘कपार पर बैठोगे? जगह दिख रही है कहीं? और ये बोली कैसी है?’’

यादव ने लैक्चर खत्म होने का इंतजार नहीं किया. वह प्रोफैसर को ठेलठाल कर ऐन युवती के सामने बैठ ही गया.

पिंटू बोली में ‘खंडाला’ स्टाइल का बघार डालते हुए नेताजी की ओर मुड़ा, ‘‘ऐ, क्या बोलता तू? बड़े भाई को यहां बैठने को मांगता, क्या? बोले तो थोड़ा सरकने को,’’ पिंटू की आवाज में कड़क ही ऐसी थी कि नेताजी अंदर ही अंदर सकपका गए. लेकिन फिर सोचा, इस तरह भय खाने से काम नहीं चलेगा. यही तो मौका है युवती पर रौब गांठने का.

‘‘तुम सब स्टुडैंट हो या मवाली? जानते हो हम कौन हैं? धनबाद विधानसभा क्षेत्र के भावी विधायक. विधायक से इसी तरह बतियाया जाता है?’’

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‘‘विधायक हो या एमपी, स्टुडैंट फर्स्ट,’’ अतुल के बदन पर कपड़े नए स्टाइल के थे. कीमती भी. संपन्नता के रौब से चमचमा रहा था चेहरा. पिंटू ने उसे ‘बडे़ भाई’ का संबोधन यों ही नहीं दिया था. वह इन दोनों का नायक था. अतुल ने आगे बढ़ कर नेताजी की बगलों में हाथ डाला और उन्हें खींच कर खड़ा करते हुए खाली जगह पर धम्म से बैठ गया. नेताजी ‘अरे अरे’ करते ही रह गए. अंदर ही अंदर सभी लोग आतंकित हो उठे थे. ये लड़के ढीठ ही नहीं बदतमीज व उच्छृंखल भी हैं. इन से पंगा लेना बेकार है. शकीला स्वयं ही अपनी सीट से खड़ी हो गई और पिंटू से बोली, ‘‘अरे भाई, प्यार से बोलने का था न कि हम कालेज वाले एकसाथ बैठेंगे. आप यहां बैठो, मैं उधर बैठ जाती.’’

फिर जैसे सबकुछ सामान्य हो गया. तीनों युवती के इर्दगिर्द बैठने में सफल हो गए. गाड़ी अपनी रफ्तार से दौड़ती रही.

‘‘आप का नाम जान सकते हैं? कहां रहती हैं आप?’’ थोड़ी देर बाद अतुल ने युवती को भरपूर नजरों से निहारते हुए सवाल किया. उस का लहजा विनम्रता की चाशनी से सराबोर था.

‘‘जी शीला मुर्मू. काशीपुर डंगाल में रहती हूं. धनबाद से 60 किलोमीटर दूर.’’

‘‘वाह,’’ तीनों लड़के चौंक पड़े.

‘‘कोई उपाय भी तो नहीं. हमारे कसबे में इंटर तक की ही पढ़ाई है.’’

‘‘बहुत खूब. मोगैम्बो खुश हुआ,’’ पिंटू ने नई बोली का नमूना पेश किया.

एक क्षण का मौन.

‘‘जाहिर है, कोई पसंदीदा सपना भी जरूर होगा ही?’’ अतुल उस की आंखों में भीतर तक झांक रहा था, ‘‘ऐसा सपना जो अकसर रात की नींदों में आ कर परेशान करता रहता हो.’’

‘‘बेशक है न,’’ मजाक में पूछे प्रश्न का शीला ने सीधा और सच्चा जवाब दे दिया, ‘‘परिस्थितियों ने साथ दिया तो… तो डाक्टर बनूं.’’

‘‘ऐक्सीलैंट,’’ शीला के उत्तर पर तीनों ने एकदूसरे की ओर देखा. इस देखने में व्यंग्य का पुट घुला था, यह मुंह और मसूर की दाल. फिर तीनों के ठहाके फूट उठे.

फिर कुछ क्षणों का मौन.

तीनों ने देखा, शीला स्मृतियों की धुंध में खोई बाहर के दृश्यों को देख रही है. तीनों की नजरें परस्पर गुंथ गईं. आंखों ही आंखों में मौन संकेत हुए. फिर आननफानन एक मादक गुदगुदा देने वाली योजना की रूपरेखा तीनों के जेहन में आकृति लेने लगी.

‘‘कहां खो गईं आप?’’

‘‘जी?’’ शीला हौले से मुसकरा दी.

‘‘आज पहला दिन था. रैगिंग तो हुई होगी?’’ अतुल ने प्रश्न किया तो शीला एक पल के लिए सकपका गई. दिमाग में आज हुई रैगिंग का एकएक कोलाज मेढक की तरह फुदकने लगा. 3 सीनियरों का उसे घेर कर द्वितीय तल के एक क्लासरूम में ले जाना फिर ऊलजलूल द्विअर्थी यक्ष प्रश्नों का सिलसिला. शीला मन ही मन घबरा रही थी. पर रैगिंग का स्तर खूब नीचे नहीं उतरा था और तीनों छात्र मर्यादा के भीतर ही रहे थे.

‘‘आप न भी बताएंगी तो भी अनुमान लगाना कठिन नहीं कि रैगिंग के नाम पर बेहद घटिया हरकत की गई होगी आप के साथ,’’ अतुल फुफकारा, ‘‘बीसी कालेज के छात्रों को हम अच्छी तरह जानते हैं. इस शहर के सब से ज्यादा बदतमीज और लफंगे छात्र, हंह.’’

शीला मौन रही. क्या कहती भला?

‘‘एकदम ठीक बोल रहा दादा,’’ पिंटू इस बार अपने लहजे में बंगाली टोन का छौंक डालते हुए हिनहिनाया, ‘‘माइरी, अइसा अभद्रो व्यवहार से ही तो हमारा छात्र समुदाय बदनाम हो रहा. इस बदनामी को साफ करने का एक उपाय है, दोस्तो,’’ इसी बीच मादक योजना की रूपरेखा मुकम्मल आकार ले चुकी थी, ‘‘क्यों न हम इस नए दोस्त को नए प्रवेश की मुबारकबाद देने के लिए छोटी सी पार्टी दे दें?’’

‘‘गजब, क्या लाजवाब आइडिया है, अतुल,’’ यादव समर्थन में चहक उठा, ‘‘मुबारकबाद का मुबारकबाद और बदनामी का परिमार्जन भी.’’

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‘‘पर बड़े भाई, पार्टी होगी कहां और कब?’’

‘‘पार्टी आज ही होगी यार और अभी कुछ देर बाद,’’ अतुल हंसा. दरअसल, योजना बनी ही इतनी मादक थी कि भीतर का रोमांच लहजे के संग बह कर बाहर टपकना चाह रहा था, ‘‘अगले स्टेशन पर हम उतर जाएंगे. स्टेशन के पास ही बढि़या होटल है, ‘होटल शहनाई.’ वहीं पार्टी दे देंगे. ओके.’’

शीला अतुल के अजूबे और अप्रासंगिक प्रस्ताव पर चकित रह गई. किसी अन्य कालेज के अपरिचित छात्र. अचानक इतनी उदारता.

‘‘नो, नो, थैंक्स मित्रो, मेरे सीनियर्स ने वैसा कुछ भी नहीं किया है अभद्र, जैसा आप सब समझ रहे हैं.’’

‘‘चलिए ठीक है. माना कि आप के सीनियर्स शरीफ हैं पर पार्टी तो हमारी ओर से तोहफा होगी आप को. परिचय और अंतरंगता इसी तरह तो बनती है. हम छात्र किसी भी कालेज के हों, हैं तो एक ही बिरादरी के.’’

‘‘आप ठीक कह रहे हैं. अब तो मिलना होता ही रहेगा न. पार्टी फिर कभी,’’ शीला ने दृढ़ता से इनकार कर दिया.

‘‘उफ, 12 बजे हैं अभी. 3:25 बजे की लोकल पकड़वा देंगे. देर नहीं होगी.’’

‘‘सौरी…मैं ने कहा न, मैं पार्टी स्वीकार नहीं कर सकती,’’ शीला ने चेहरा खिड़की की ओर फेर लिया.

कुछ क्षणों का बेचैनी भरा मौन.

‘‘इधर देखिए दोस्त,’’ अतुल की तर्जनी शीला की ठोढ़ी तक जा पहुंची, ‘‘जब मैं ने कह दिया कि पार्टी होगी, तो फिर पार्टी होगी ही. हम अगले स्टेशन पर उतर रहे हैं.’’

अतुल के लहजे में छिपी धमकी की तासीर से शीला भीतर तक कांप उठी.

‘‘आखिर हम भी तो आप के सीनियर्स ही हुए न,’’ तीनों बोले.

आगे पढ़ें- नेताजी की ओर कड़ी दृष्टि से देखते हुए…

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पहल: भाग 1- शीला के सामने क्या था विकल्प

धनबाद बर्दवान के बीच चलने वाली लोकल ईएमयू टे्रनों की सवारियों को दूर से ही पहचाना जा सकता है. इन रेलगाडि़यों में रोज अपडाउन करते हैं ग्रामीण मजदूर, सरकारी व निजी संस्थानों में लगे चतुर्थ श्रेणी के बाबू, किरानी, छोटीछोटी गुमटियों वाले व्यवसायी, यायावर हौकर्स और स्कूलकालेजों के छात्रछात्राएं. उस रोज दोपहर का वक्त था. लोकल टे्रन में भीड़ न थी. यात्रियों की भनभनाहट, इंजनों की चीखपुकार और वैंडरों की चिल्लपों का लयबद्ध संगीत पूरे वातावरण में रसायन की तरह फैला हुआ था. आमनेसामने वाली बर्थों पर कुछ लोग बैठे थे. उन में एक नेताजी भी थे. अभी ट्रेन छूटने में कुछ समय बाकी था कि  एक भरीपूरी नवयुवती सीट तलाशती हुई आई. कसा बदन, धूसर गेहुआं रंग, तनिक चपटी नाक. हाथ में पतली सी फाइल. उस की चाल में आत्मविश्वास की तासीर तो थी पर शहरी लड़कियों सा बिंदासपन नहीं था. एक किस्म का मर्यादित संकोच झलक रहा था चेहरे से और यही बात उस के आकर्षण को बढ़ा रही थी.

उसे देखते ही नेताजी हुलस कर तुरंत ऐक्शन में आ गए. गांधी टोपी को आगेपीछे सरका कर सेट किया और खिड़की के पास जगह बनाते हुए हिनहिनाए, ‘‘अरे, यहां आओ न बेटी. खिड़की के पास हवा मिलेगी.’’

युवती एक क्षण को ठिठकी, फिर आगे बढ़ कर नेताजी के बगल में खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ गई.

सामने की बर्थ पर बैठे प्रोफैसर सान्याल का मन ईर्ष्या से सुलग उठा. थोड़ी देर तक तो वे चोर नजरों से लड़की के मासूम सौंदर्य को निहारते रहे. फिर नहीं रहा गया तो युवती से बातों का सूत्र जोड़ने की जुगत में बोल उठे, ‘‘कालेज से आ रही हैं न?’’

‘‘जी हां, नया ऐडमिशन लिया है,’’ युवती हौले से मुसकराई तो प्रोफैसर  निहाल हो गए.

फिर बातों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए बोले, ‘‘मुझे पहचान रही हैं? मैं प्रोफैसर शुभंकर सान्याल. नारी सशक्तीकरण व स्वतंत्रता पर मेरे आलेख ने शिक्षा जगत में धूम मचा रखी है. आप ने देखा है आलेख?’’

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‘‘न,’’ युवती के इनकार में सिर हिलाते ही प्रोफैसर को कसक का एहसास हुआ. शिक्षा जगत की इतनी महत्त्वपूर्ण घटना से युवती वाकिफ नहीं, प्रोफैसर के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच आईं.

नेताजी ने जब देखा कि लड़की प्रोफैसर की ओर ही उन्मुख बनी हुई है तो क्षुब्ध हो उठे और उस का ध्यान आकृष्ट करने के लिए बोल पड़े, ‘‘अरे बेटी, आराम से बैठो न. कोई तकलीफ तो नहीं हो रही है?’’ फिर जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकाल कर लड़की को देते हुए उस की उंगलियों को थाम लिया, ‘‘हमरा कार्डवा रख लो. धनबाद क्षेत्र के भावी विधायक हैं हम. अगला चुनाव में उम्मीदवार घोषित हो चुके हैं, बूझी? बर्दवान से ले कर धनबाद तक का हर थाना में हमरा रुतबा चलता है. कभी कोई कठिनाई आए तो याद कर लेना.’’

युवती की उंगलियां नेताजी के हाथों में थीं. असमंजस से भर कर उस ने झट से हाथ नीचे कर लिया. प्रोफैसर की नजरों से नेताजी की चालाकी छिपी न रह सकी. शर्ट के तले उन की धुकधुकी भी रोमांच से भरतनाट्यम् करने लगी. आननफानन अटैची खोल कर आलेख की जेरौक्स प्रति निकाली और युवती को थमाते हुए उस की पूरी हथेली को अपनी हथेलियों में भर लिया, ‘‘इस आलेख में आप जैसी युवतियों की समस्याओं का ही तो जिक्र किया है मैं ने. नारी स्वावलंबी बने, घर की चारदीवारी से मुक्त हो कर खुले में सांस ले, समाज के रचनात्मक कार्यों से जुड़े. जोखिम तो पगपग पर आएंगे ही. जोखिम से आप युवतियों की रक्षा समाज करेगा. समाज यानी हम सब. यानी मैं, ये नेताजी, ये भाईसाहब, ये… और ये…’’

प्रोफैसर अपनी धुन में पास बैठे यात्रियों की ओर बारीबारी से संकेत कर ही रहे थे कि नजरें घोर आश्चर्य से सराबोर हो कर पास बैठी शकीला पर जा टिकीं.

सांवला रंग, काजल की गहरी रेखा. लगातार पान चबाने से कत्थई हुए होंठ. पाउडर की अलसायी परत. कंधे से झूलती पुरानी ढोलक. अरे, भद्र लोगों की जमात में यह नमूना कहां से घुस आया भाई. अभी तक किसी की नजरें गईं कैसे नहीं इस अजूबे पर.

प्रोफैसर की नजरों की डोर थाम कर अन्य यात्री भी शकीला की ओर देखने लगे.

‘‘तू इस डब्बे में कैसे घुस आई रे?’’ प्रोफैसर फनफना उठे. इसी बीच उस युवती ने कसमसा कर अपनी हथेली प्रोफैसर के पंजे से छुड़ा ली.

‘‘हिजड़े न तीन में होते हैं न तेरह में, हुजूर. सभी जगह बैठने की छूट मिली हुई है इन्हें,’’ पास बैठे पंडितजी ने टिप्पणी की तो जोर का ठहाका फूट पड़ा.

‘‘ऐ जी,’’ शकीला विचलित और उत्तेजित हुए बिना चिरपरिचित अदा से ताली ठोंकती हुई हंस पड़ी, ‘‘अब हम हिजड़ा नहीं, किन्नर कहे जाते हैं, हां.’’

‘‘किन्नर कहे जाने से जात बदल जाएगी, रे?’’ नेताजी ने हथेली पर खैनी रखते हुए व्यंग्य कसा.

‘‘जात न सही, रुतबा तो बदला ही है,’’ शकीला का चेहरा एक अजीब सी ठसक से चमक उठा.

‘‘असल में जब से तुम लोगों की मौसियां विधायक बनी हैं, दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ कर नाचने लगा है, हंह,’’ नेताजी के भीतर एक तीव्र कचोट फुफकारने लगी. उन्हें राजनीति के अखाड़े में कूदे 25 साल हो गए थे. क्याक्या सपने देखे थे. विधायक का गुलीवर कद, लालबत्ती वाली कार, स्पैशल सुरक्षा गार्ड, भीड़ की जयजयकार. पर हाय, 3-3 बार प्रयास के बावजूद विधानसभा तो दूर, स्थानीय नगरनिगम का चुनाव तक नहीं जीत पाए और ये नचनिया सब विधायक बनने लगे. हाय रे विधाता.

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‘‘बिलकुल ठीक कह रहे हैं आप,’’ प्रोफैसर के लहजे में क्षोभ घुला हुआ था, ‘‘क्या होता जा रहा है इस देश की जनता को? ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का क्या गौरवपूर्ण समरसता का इतिहास रहा है हमारा. पहले राजा प्रताप, शिवाजी, भामाशाह, कौटिल्य आदि. उस के बाद गांधी, नेहरू, अंबेडकर, शास्त्री वगैरह. देश पूरी तरह सुरक्षित था इन के हाथों में. पर अब जनता की सनक तो देखिए, हिजड़ों के हाथों में शासन की लगाम देने लगी है.’’

‘‘अब छोडि़ए भी ये बातें,’’ शकीला खीखी कर के हंसी. शकीला के वक्ष से छींटदार नायलोन की पारदर्शी साड़ी का आंचल ढलक गया था.

बातों का सिलसिला अभी चल ही रहा था कि टे्रन की सीटी की कर्कश आवाज फिजा में गूंज गई. फिर टे्रन के चक्कों ने गंतव्य की ओर लुढ़कना शुरू कर दिया. ठीक उसी समय 3 युवक भी डब्बे में चढ़ आए. कसीकसी जींस, अजीबोगरीब स्लोगन अंकित टीशर्ट, हाथों में एकाध कौपी या फाइल. एकदूसरे को धकियाते, हल्ला मचाते तीनों डब्बे के उसी हिस्से में आ गए जहां प्रोफैसर और नेताजी बैठे हुए थे. युवती पर नजर जाते ही उन के पांव थम गए और बाछें खिल गईं.

‘‘अतुल, क्यों न यहीं बैठा जाए?’’ पिंटू चहक उठा. फिर युवती से मुखातिब हो कर पूछ बैठा, ‘‘हैलो, आप स्टुडैंट हैं न? किस कालेज में हैं?’’

सवाल इतने आकस्मिक रूप में आया था कि युवती को सोचने का तनिक भी मौका नहीं मिला और वह हड़बड़ा कर बोली, ‘‘जी हां, बीसी कालेज में फर्स्ट ईयर साइंस की स्टुडैंट.’’

‘‘ओह, वंडरफुल,’’ यादव ने उड़ती नजरों से बैठे हुए लोगों का मुआयना किया, ‘‘ई बुढ़वन सब देश का कबाड़ा कर के छोड़ेंगे. हर जगह पर, चाहे सत्ता हो या साहित्य, ई लोग कुंडली मार कर बैठ गए हैं और हिलने का नाम ही नहीं ले रहे, हंह.’’

‘‘भाईसाहब, आप का परिचय?’’ अतुल प्रोफैसर से संबोधित था.

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जिंदगी: भाग 3- क्यों अभिनव से नफरत करने लगी सुनैना

मेरे दिल में एक टीस सी उभरी और मैं ने नौवेल वही बंद कर के रख दिया. बहुत देर तक पुरानी यादें मु झे बेचैन करती रही. जीवन के जिस अध्याय को मैं ने अपनी तरफ से बंद कर दिया था उस का इस तरह फिर से खुल जाना मु झे बहुत तकलीफ दे रहा था.

कहने को आज मेरा एक सुखी संसार था. प्यार करने वाला पति था. सफल कैरियर था. मेरी गोद में नन्हामुन्ना भी आने वाला था. मगर अचानक अनुभव का जिक्र होते ही दिल के तार फिर से  झन झना उठे. ऐसा नहीं था कि पति के प्यार ने कोई कसर छोड़ी थी. पर पहले प्यार का पहला एहसास अनुभव के साथ ही जुड़ा हुआ था. काफी हिम्मत कर के मैं ने एक बार फिर नौवेल खोल कर पढ़ना शुरू किया.

नौवेल की शुरुआत के 2-3 पन्ने पढ़ते ही मैं सम झ गई कि यह हमारी कहानी है. मेरे और उस के प्यार का खूबसूरत चित्रण है. हमारी जिंदगी में जिस तरह जो कुछ भी हुआ था उस नौवेल में वही था. मेरी कही हुई बातें, हमारी जिंदगी से जुड़ी छोटीछोटी घटनाएं सबकुछ बिलकुल वैसे ही था. लग रहा था जैसे मैं अपनी जिंदगी के उन खूबसूरत लमहों को फिर से जी रही हूं.

मैं रातभर नौवेल पढ़ती रही. सुबह 4 बजे उस पन्ने पर पहुंची जहां हमारे ऐक्सीडैंट वाली घटना का विवरण था. मैं ने अचानक नौवेल बंद कर दिया. जिस तरह मैं ने इस से आगे की कहानी को अपनी जिंदगी से काट दिया था वैसे ही अभी भी करना चाहती थी. मगर दिल नहीं माना. बढ़ी हुई धड़कनों को संभालते हुए मैं ने आगे पढ़ना शुरू किया.

अनुभव ने लिखा था:

‘‘हमारा ऐक्सीडैंट हो गया था. मैं कुछ सोच पाता तब तक वह नीचे गिर गई थी. इधर मेरा सिर एक चट्टान से बुरी तरह टकराया था. मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया था. सिर में दाहिनी तरफ खून रिस रहा था, पर मैं एक बार अपनी जिंदगी को देखना चाहता था. किसी तरह मैं उठा और नीचे  झांका. वह एक कातिल लमहा था. मेरी छोटी सी गलती ने मेरी जिंदगी को इस कातिल लमहे के हवाले कर दिया.

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‘‘मेरी जिंदगी अपने प्राण बचाने के लिए जू झ रही थी और मेरी आंखें उस पर टिकी थीं. मैं किसी भी तरह उसे बचाना चाहता था. मैं ने उसे आश्वासन दिया कि मैं उसे बचाऊंगा. मगर अगले ही पल मेरा माथा घूम गया. मेरी आंखें बंद हो चुकी थीं. जब आंखें खुलीं तो खुद को एक अस्पताल के बैड पर पाया. बाद में पता चला कि वहां से गुजर रहे कुछ लोगों ने मु झे उठा कर अस्पताल पहुंचाया था.

‘‘धीरेधीरे मु झे सब याद आने लगा. सब से पहले मु झे अपनी जिंदगी का खयाल आया और मैं चिल्ला पड़ा, ‘जिंदगी, मेरी जिंदगी कहां हो तुम?’ मु झे इस तरह जिंदगी को पुकारते देख डाक्टर को लगा जैसे मेरे दिमाग पर असर पड़ा है. उन्होंने तुरंत मु झे इंजैक्शन दे दिया. मैं फिर सो गया. दोबारा आंख खुली तो अपने मांबाप को सामने पाया. मेरे सिर पर पट्टियां बंधी थीं. बहुत दर्द हो रहा था. हाथ भी घायल था.

मम्मी ने प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, ‘‘तू ठीक तो है बेटा?’’

मेरी आंखों से आंसू निकल आए. मैं ने तड़प कर पूछा, ‘‘मैं तो ठीक हूं पर जिंदगी…’’

‘‘जिंदगी?’’

‘‘जिंदगी मतलब सुनैना. वह लड़की जो मेरे साथ थी. वह कैसी है मां?’’

‘‘पता नहीं बेटा तू किस सुनैना की बात कर रहा है ? तू तो अकेला ही यहां लाया गया था.’’

‘‘मैं ने जल्दी से पापा से फोन मांगा और सुनैना को फोन करने लगा. मगर वह नंबर उपलब्ध नहीं था. मैं निराश हो कर रोने लगा. अस्पताल में मु झे करीब 20-22 दिन रुकना

पड़ा. वह समय एक सजा से कम नहीं था. घर

आ कर भी 1 महीना मु झे सख्त निगरानी में रखा गया. मैं घर से निकल नहीं सकता था. वैसे भी सिर की चोट बहुत गहरी थी. पूरी तरह ठीक होने में 2-3 महीने लग गए.

‘‘ठीक हो कर मैं सब से पहले सुनैना के इंस्टिट्यूट पहुंचा. मगर वहां उस का कोई पता नहीं चल सका. उस का बैच पासआउट हो चुका था. सुनैना का पूरा नाम भी मैं नहीं जानता था. मेरे लिए तो वह केवल जिंदगी थी. हर बैच में कई सैक्शन थे, जिन में सैकड़ों लड़कियां थीं और वैसे भी वहां के टीचर्स किसी अनजान लड़के को अपने स्टूडैंट्स की जानकारी देना उचित नहीं सम झते थे. मु झ से जितना हो सका मैं ने खोजने की कोशिश की. मगर मेरी जिंदगी मु झे कहीं नहीं मिली. मेरी जिंदगी की कहानी उन्हीं लमहों में ठहरी रह गई थी जहां मैं ने अंतिम बार सुनैना को देखा था.

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‘‘उस दिन मैं बिस्तर पर उलटा लेट कर एक पत्रिका पढ़ रहा था. तभी दरवाजा

खुलने की आवाज सुनाई दी है. खुली जुल्फों और मोहक मुसकान के साथ कमरे में सुनैना ने प्रवेश किया है. मैं उसे देखता रह गया. वह हंसती हुई पास आई है और गले से लगा कर हौले से बोली, ‘आई लव यू अनुभव.’

‘‘मैं उसे देख कर बहुत खुश हो गया पर आई लव यू सुन कर थोड़ा चौंक भी गया.

‘‘वह कुछ और कहती तभी मेरी नींद खुल गई यानी मैं सपना देख रहा था. मिलेजुले से एहसास मेरी आंखों में थे. मैं सम झ नहीं पा रहा था कि जिंदगी चाहती क्या है. क्या वह मु झे याद कर रही है पर मिलने नहीं आ सकती या हमेशा के लिए मेरी हो जाना चाहती है.’’

अनुभव के मन की इसी उल झन के साथ नौवेल खत्म हो गया. सुनैना को लगा है जैसे नौवेल अभी अधूरा है, पर शायद यही अधूरापन इस नौवेल को इतना लोकप्रिय बना रहा है यानी अधूरापन ही इस की खूबसूरती है. वैसे भी यह आज के युवाओं की मनोस्थिति का बहुत खूबसूरत चित्रण कर रहा था.

इधर सुनैना नौवेल पढ़ कर तय करती है कि वह जल्द ही अनुभव के पते पर उस से मिलने जाएगी. अब वह उस की हो तो नहीं सकती, मगर उस के सपने को सच करने और गले लग कर आई लव यू कहने जरूर जाएगी. वह प्यार के रिश्ते को दोस्ती में बदल देगी ताकि अनुभव भी अपनी जिंदगी में आगे बढ़ सके. सुनैना ने नौवेल साइड टेबल पर रखा और अनुभव के बारे में सोचने लगी.

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जिंदगी: भाग 2- क्यों अभिनव से नफरत करने लगी सुनैना

अचानक एक मोड़ पार करते ही सामने से आती कार की वजह से अनुभव का बैलेंस बिगड़ा और बाइक तेजी से फिसलती हुई रोड के किनारे घिसटती चली गई. अनुभव ने तो किसी तरह खुद को नीचे गिरने से बचा लिया, मगर मैं घाटी में नीचे गिरने लगी. तभी मेरे हाथ एक पेड़ का तना लग गया और पैर के नीचे चट्टान का कोई कोना आ गया. मैं ने किसी तरह खुद को गहरी घाटी में गिरने से बचाया और बीच में लटकी हुई हैल्प के लिए अनुभव को आवाज देने लगी.

अनुभव ने नीचे  झांका और सहायता करने का वादा करता हुआ पीछे की

तरफ हो गया. मु झे लगा वह मेरी मदद के लिए कोई रस्सी या कुछ और ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा होगा. मु झे उम्मीद थी कि वह जरूर किसी जाने वाली गाड़ी को भी रोक लेगा और मदद करने को कहेगा. मगर इस बात को काफी समय बीत गया और वह नहीं आया. मैं चिल्लाती रही. अब पेड़ का तना मेरे हाथ से छूटने वाला था. डर से मेरा पूरा शरीर कांप रहा था. हाथ छूटते ही मैं हजारों फुट गहरी खाई में गिर जाती. अनुभव ने दोबारा एक बार भी नहीं  झांका. शायद वह वहां से जा चुका था.

तभी एक बच्चे ने चिल्ला कर मु झे पुकारा. फिर वह अपने पापा को पुकारने लगा. मु झे नई आस बंधी कि शायद मैं बच जाऊं. तभी बच्चे के पिता ने नीचे  झांका और 2-3 मिनट के अंदर दुपट्टों और कमीजों को जोड़ कर बनाई गई रस्सी नीचे लटकने लगी. मैं ने रस्सी पकड़ ली और उन लोगों ने तेजी से मु झे ऊपर खींच लिया. ऊपर पहुंच कर मेरी जान में जान आई. अभी भी मैं डर कर कांप रही थी. मौत मु झे बिलकुल करीब से छू कर निकली थी.

मैं ने बच्चे को प्यार से चूमा और सब को धन्यवाद कहा. वे करीब 8-10 लोग थे जो सपरिवार घूमने निकले थे. बच्चे को सूसू कराने के लिए उन्होंने गाड़ी रोकी थी. तभी बच्चे ने मु झे देख लिया. मेरे हाथपैर जगहजगह से छिल गए थे. मु झे अनुभव कहीं भी नजर नहीं आ रहा था. मैं सम झ गई थी कि वह मु झे परेशानी में अकेला छोड़ कर भाग चुका.

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तभी उन लोगों ने मु झे गाड़ी में बैठने को कहा. वे मु झे अस्पताल पहुंचा कर चले गए. मैं ने अपने घर वालों को फोन किया. अगली सुबह मेरी मां और पापा आ कर मु झे घर ले गए.

इस घटना ने मेरी जिंदगी और मेरी सोच को पूरी तरह बदल कर रख दिया. मैं सम झ गई कि जिंदगी बहुत छोटी है और इस का अंत कभी भी हो सकता है. इस छोटी सी जिंदगी में अपनों को कभी दर्द नहीं पहुंचाना चाहिए, साथ ही मु झे महसूस हो चुका था कि अब अनुभव की मेरी जिंदगी में कोई जगह नहीं. अब मैं उस से बात भी करना नहीं चाहती थी. मैं ने उसे अपनी अपनी जिंदगी से निकाल दिया था. वैसे भी मेरा फोन घाटी में गिर चुका था. नए मोबाइल के साथ मैं ने सिम भी नई ले ली थी.

अनुभव मेरे घर का पता नहीं जानता था. उसे केवल मेरे इंस्टिट्यूट का पता मालूम था.

मेरे लिए यह राहत की बात थी कि मेरी पढ़ाई

भी 1 महीने में खत्म होने वाली थी. छुट्टियों के बाद हमें केवल ऐग्जाम के लिए इंस्टिट्यूट जाना था. इधर हमारी प्लेसमैंट भी होने वाली थी. मैं ने तय कर लिया था कि अब मैं अनुभव से कभी नहीं मिलूंगी.

उस घटना को गुजरे हुए आज 5 -6 साल बीत चुके हैं. 2 साल जौब करने के बाद

मैं ने शादी कर ली और घर पर ही अपना व्यवसाय शुरू कर लिया. मैं ने एक बुटीक खोला था. उस दिन मैं अपने बुटीक से जल्दी आ गई थी. चाय पी कर आराम से सोफे पर पसर कर नौवेल पढ़ने लगी थी. किताबें पढ़ने का शौक मु झे शुरू से था. मार्केट में कोई भी नया नौवेल आता तो सब से पहले मैं पढ़ती थी. अनुभव से दोस्ती गहरी होने की एक वजह यह भी थी कि वह एक लेखक था.

किसी समय अनुभव को अपनी जान से ज्यादा चाहने वाली मैं आज उस के नाम से भी नफरत करती. वह मेरी जिंदगी का ऐसा काला पन्ना बन गया था जिसे मैं कभी पलट कर देखना भी नहीं चाहती थी.

‘‘क्या बात है भाभी आप क्या सोच रही हैं? लगता है भैया की यादें ज्यादा परेशान कर रही हैं. भैया 2 दिन के लिए आउट औफ स्टेशन क्या गए आप तो सैड हुए बैठी हैं, नीरू ने मु झ से हंसते हुए कहा.

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है नीरू. आ बैठ न,’’ मैं ने अपनी ननद को बैठने को कहा और पूछा, ‘‘क्या लाऊं तेरे लिए?’’

‘‘आप को नौवेल पढ़ना बहुत पसंद है न. यह देखो आज का सब से ज्यादा ट्रैंडिंग नौवेल ले कर आई हूं. बहुत अच्छे रिव्यूज हैं इस के. क्रिटिक्स भी अनुभव कुमार के इस नौवेल की तारीफ किए बिना नहीं रह सके.’’

अनुभव कुमार नाम सुनते ही मैं चौंक पड़ी.

‘‘दिखा तो जरा,’’ मैं ने लपक कर किताब नीरू के हाथों से ले ली. वाकई यह अनुभव की किताब थी. दूसरे पन्ने पर उस के हाथों से लिखी लाइन थी, ‘‘प्यार… मेरी जिंदगी को समर्पित.’’

मु झे याद था वह हमेशा मु झे जिंदगी कहा करता था. उस ने मेरा निकनेम ही जिंदगी रख दिया था. तो क्या यह नौवेल  उस ने मेरे लिए लिखा है? मैं सोच में पड़ गई. मगर तुरंत पिछले कुछ समय की नफरत चेहरे पर सिमट आई. सामने बैठी नीरू लगातार मु झे देख रही थी.

उस ने पूछा, ‘‘क्या हुआ भाभी सब ठीक

तो है?’’

‘‘हां नीरू मैं ठीक हूं. तू बता,’’ मैं ने बात बदलनी चाही.

‘‘चलो फिर ठीक है.  मैं तो यह नौवेल देने आई थी. सोचा, भैया नहीं हैं तो भाभी का मन लगाने का इंतजाम किया जाए.’’

‘‘नीरू आजकल नौवेल पढ़ने की इच्छा

ही नहीं होती,’’ मैं ने नौवेल को किनारे रखते

हुए कहा.

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उस ने मेरा मन टटोला, ‘‘कोई तो बात है भाभी. एनी वे यदि आप को नहीं पढ़ना तो मैं ले जाती हूं.’’

‘‘मैं ने कब कहा कि नहीं पढ़ना है. देखती

हूं समय मिला तो पढ़ लूंगी. वैसे काम भी ज्यादा है आजकल बुटीक में पर समय मिला तो पढ़

भी लूंगी,’’ कह कर मैं ने नौवेल उस के हाथों से छीन ली.

वह हंसती हुई चली गई और मैं ने नौवेल  के पन्ने पलटने शुरू

किए. पहली लाइन पर ही रुक गई. लिखा था कि कुछ रिश्ते कभी नहीं टूटते, कितनी भी कोशिश कर लो. कोई न कोई तार जुड़ा ही रह जाता है. ऐसा ही एक रिश्ता जुड़ा है मेरी जिंदगी का मेरे साथ.

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जिंदगी: भाग 1- क्यों अभिनव से नफरत करने लगी सुनैना

‘‘लाइफ,ओ मेरी लाइफ,’’ कहता हुआ अनुभव मेरे पीछे दौड़ता आ रहा था.

मैं ने उसे आंखें दिखाईं तो उस ने कान पकड़ने का दिखावा करते हुए कहा, ‘‘ओके बाबा, लाइफ नहीं जिंदगी. अब तो ठीक है न?’’

‘‘ठीक क्या है? भला कोई किसी को लाइफ या जिंदगी जैसे नामों से पुकारता है क्या? मेरा इतना खूबसूरत सा नाम है सुनैना. फिर जिंदगी क्यों कहते हो?’’

‘‘क्योंकि तुम मेरी जिंदगी हो. जब मैं जिंदगी बोलता हूं न तब महसूस होता है जैसे तुम सिर्फ मेरी हो. सुनैना तो सब के लिए हो पर जिंदगी सिर्फ मेरे लिए,’’ मेरी आंखों में एकटक देखते हुए अनुभव ने कहा तो मैं शरमा गई. मु झे एहसास हो गया कि अनुभव मु झे बहुत चाहता है.

वैसे अनुभव से मिले हुए मु झे ज्यादा समय नहीं हुआ था. जब मैं ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया था और फर्स्ट डे कालेज आई तब पहली दफा मैं ने उसे सीनियर्स को रैगिंग देते देखा था. वह सीनियर्स के आगे अलगअलग जानवरों के ऐक्सप्रैशंस दे रहा था. उसे देख कर मु झे भी हंसी आ गई थी. तब उन सीनियर लड़कों में से एक ने मु झे देख लिया और तुरंत बुला भेजा.

मु झे अनुभव के सामने खड़ा किया गया और फिर उन में से एक दादा टाइप लड़के ने मु झ से कहा, ‘‘बहुत हंसी आ रही है न, चलो इस लड़के को हमारे सामने प्रोपोज करो. लेकिन प्रोपोजल एक अलग अंदाज में होना चाहिए,’’

मैं घबरा गई थी. मैं ने सवालिया नजरों से उस की तरफ देखा तो उस ने कहा, ‘‘बिना कुछ बोले बस डांस करते हुए उसे प्रोपोज करो.’’

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मैं अकसर डांस करती रहती थी. इसलिए बहुत सहजता से डांस की मुद्राओं द्वारा मैं ने उसे प्रोपोज किया. इस तरह अपनी जिंदगी में पहली बार मैं ने किसी को प्रोपोज किया था और वह भी इतने लोगों के बीच और इतने अलग अंदाज में. अनुभव तो मु झे देखता ही रह गया था. उस दिन के बाद से हमारी बातचीत होने लगी और हम अच्छे दोस्त बन गए.

रैगिंग पीरियड गुजरने के बाद एक दिन अनुभव मेरे पास आया और कहने

लगा, ‘‘यार, उस दिन तुम ने मु झे प्रोपोज किया पर मैं ने कोई जवाब नहीं दिया. इस बात को

भी 2 महीने बीत गए हैं. मु झे लगता है कि खूबसूरत लड़कियों से ज्यादा इंतजार नहीं कराना चाहिए. इसलिए आज मैं भी अपने प्यार का इजहार करता हूं.’’

‘‘सुनो, ज्यादा ड्रामेबाजी मु झे पसंद नहीं है,’’ मैं ने उसे  िझड़कते हुए कहा.

तब उस ने मेरा हाथ पकड़ लिया और एकदम से सीरियस हो कर बोला, ‘‘ड्रामेबाजी नहीं हकीकत है. तुम ही मेरी जिंदगी हो. मेरी हर धड़कन अब तुम्हारे नाम है. तुम भले ही कभी मु झे भूल भी जाओ, मगर मैं सारी उम्र तुम से ही प्यार करूंगा. भला अपनी जिंदगी से जुदा हो कर भी कोई जी पाता है?’’

उस की आंखों में सचाई थी. बस उस

दिन से हम दोनों एकदूसरे के हो गए और मैं उस की जिंदगी बन गई. उस ने मेरा नाम ही जिंदगी रख दिया.

अनुभव अकसर मु झ से कहता कि मैं उसे आई लव यू कहूं, पर मैं ऐसा नहीं करती. एक दिन उस के बहुत जिद करने पर मैं ने कहा था, ‘‘देखो अनुभव मेरी नजर में जब 2 इंसान एकदूसरे के करीब होते हैं और उन के दिल में प्यार होता है तो अपने एहसासों को सम झाने के लिए लफ्जों की जरूरत नहीं पड़ती. लफ्जों की जरूरत तब पड़ती है जब वे मजबूर हों और एकदूसरे से दूर हों, चाह कर भी वे पास नहीं आ सकते हों, पर याद आ रही हो, ऐसे में लफ्जों से काम चलाना जरूरी हो जाता है.’’

‘‘फिर तो मैं यही चाहूंगा कि तुम मु झे कभी भी आई लव यू न बोलो यानी तुम कभी भी मु झ से दूर रहने को मजबूर न रहो,’’ कह कर वह

हंस पड़ा.

कालेज के दिन पंख लगा कर उड़ने लगे. मु झे अनुभव के साथ वक्त बिताना बहुत पसंद था. इस बीच मेरा निफ्ट में चयन हो गया. मैं आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली चली गई. निफ्ट से फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करना मेरा सपना था और अनुभव मेरे सपने को हकीकत बनते देखना चाहता था. अब हम दूर जरूर हो गए थे, मगर दिल से बहुत गरीब थे. कभी वह दिल्ली आ जाता और कभी छुट्टियों में मैं बनारस पहुंच जाती.

इधर अनुभव ने बनारस में बीएचयू से ही पढ़ाई जारी रखी थी. मैं उसे अपने

इंस्टिट्यूट की मजेदार घटनाएं सुनाती थी और वह मु झे अपने कालेज की बातें बताया करता था.

एक दिन मैं ने अनुभव को सरप्राइज देते हुए बताया, ‘‘इन गरमी की छुट्टियों में हमें संस्था की तरफ से मनाली ले जाया जा रहा है.’’

मैं जानती थी कि मनाली से 2 घंटे की दूरी पर अनुभव का गांव था. वह खुद छुट्टियों में अकसर मनाली में रहता था.

‘‘क्या बात है यार, तब तो हमारा मिलना कन्फर्म है,’’ खुश हो कर अनुभव ने कहा.

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‘‘मगर हमारा प्रोग्राम 2 दिन बाद का ही है जबकि तुम तो अभी बनारस में ही हो.’’

‘‘तो क्या हुआ, मैं 1 सप्ताह की छुट्टी

ले कर अभी निकलता हूं,’’ अनुभव ने सहजता

से कहा.

‘‘ज्यादा मजनू न बनो. पहले देखो कि तुम्हारी पढ़ाई में हरज तो नहीं होगा?’’ मैं ने टोका.

‘‘बिलकुल नहीं यार. ऐग्जाम खत्म हो चुके हैं. वैसे भी घर ही जा रहा था और फिर अपनी जिंदगी से मिलने का मौका मिल रहा हो तब तो मैं 7 समंदर पार कर के भी पहुंच जाऊं.’’

‘‘इतने उतावले भी न बनो. कभी मेरे बगैर जीना पड़ जाए तो क्या करोगे?’’ मैं ने गंभीर स्वर में कहा.

‘‘सांसें चल रही होंगी, मगर तुम्हारे बिना जिंदगी का कोई अर्थ नहीं होगा.’’

‘‘हाय इतनी इमोशनल बातें मत किया करो. चलो फिर मिलते हैं,’’ मैं ने उस से मिलने का वादा किया.

मनाली में बिताए उन दिनों को मैं कभी नहीं भूल सकती. कालेज की सहेलियों के ग्रुप को छोड़ मैं अनुभव के पास आ जाती और फिर अनुभव मु झे अपनी बाइक पर बैठा कर पूरी मनाली की सैर कराता. हम हवाओं के साथ बहते, नएनए सपने बुनते. लगता जैसे मेरे और अनुभव के सिवा दुनिया में कोई नहीं.

एक दिन शाम में हम यों ही खुली वादियों में घूम रहे थे. एक तरफ ऊंचीऊंची पहाडि़यां थीं तो दूसरी तरफ हरियाली के साए में छिपी गहरी घाटियां. अनुभव उस वक्त अपनी बाइक बहुत तेज चला रहा था. उस पर एक अलग ही नशा छाया हुआ था. बारबार मना करने के बावजूद वह उस खतरनाक रास्ते पर बाइक तेज रफ्तार से भगाता रहा.

आगे बढ़ें- अनुभव ने नीचे  झांका और…

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दूसरी पारी: भाग 3- क्यों स्वार्थी हो गए मानव के बच्चे

लेखिका- मृदुला नरुला

महीने के इन 2 दिनों में पिता से मिलना बेटे के लिए ‘मूल्यवान भीख’ के समान लगती है. दीपा को अब समझ आ रहा है कि वह… कहीं तो गलत थी. लोगों ने बहुत समझाया था, ‘दीपा, सोच ले. जिस सुरंग में बेटे को ले कर सफ़र पर जा रही है उस के दूसरे छोर पर ख़ुशी का सूरज है भी या नहीं, कौन जाने…’

पर उस ने किसी की न सुनी. सिर पर जनून सवार था, ‘अलग रहूंगी.’

आज 2 साल बाद इस तरह एक छत के नीचे क़ानून के दायरे में रहना, संभवतया मजबूरी है. यह कब तक चलेगा, नहीं जानती? वह मर्द, जिसे वह पति कहती थी, से बात करते झिझकती है, सामना करते घबराती है. बेटा, दोनों के बीच पहले की तरह बातचीत हो, मन से चाहता है.

ये बातें सोमू भी समझता है. दोनों के बीच संभवतया समझौतों की दीवार है. तलाक़ के बाद उसे यह नया जीवन जरा भी रास नहीं आ रहा. रोहिणी में 2 कमरों के फ्लैट में निपट अकेला रहता है.

शराब बिलकुल छोड़ दी थी. घर में चाय तक नहीं बनती. अब खाना होटल से आता है. घर में सफ़ाई हफ्ते में एक बार होती थी. कुरसी पर कपड़ों का ढेर लगा होता है. कामवाली कपड़े धो व सुखा कर प्रैस भी करा लाती. कई बार टोक भी देती, ‘साब जी, प्रैस किए कपड़े तो संभाल लिया करो. और अपने को भी संभालो.’ फिर हंस पड़ती, ‘बहू जी को ले आओ. क्यों अकेले रहते हो?’

सोमू क्या कहता? चुपचाप बाथरूम में जा कर रो लेता. वह क्या करे? सबकुछ उस के हाथ से निकल चुका है.

आज 2 महीने से लौकडाउन के कारण सोमू यहां अटका है, अनवान्टेड गेस्ट की तरह.

घर में सारा दिन टीवी चलता है. पहले कभी कनक टीवी चलाता था, तो मम्मी घूर कर बेटे को देखती थी. वह घबरा कर टीवी ही बंद कर देता था. लेकिन अब ऐसा बिलकुल नहीं होता. टीवी का वौल्यूम फ़ुल होता है. कनक हैरान है, मम्मी अब चिल्लाती नहीं है. पर क्यों? कनक ने अनुभव किया है मां अब पहले की तरह बातबात पर ग़ुस्सा नहीं करती. मम्मी बदल रही है. अब पापा की तरफ़ देख कर हंसती भी है. माहौल सहज होता जा रहा है. जिसे सभी ने अनुभव किया है. यह बात अलग है कि पहले की तरह दोनों खुल कर बहस नहीं करते.

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एक दिन सुमित्रा बोली, “बाई सा, लगता है साब ने दारू छोड़ दी है.”

“लगता तो है. चलो, अच्छा है,” दीपा से ऐसा सुनना सुमित्रा को भा गया. भूली नहीं है वह वो सब…

यह दारू ही तो थी जिस ने दोनों के बीच दीवार खींच दी थी.

पिछले 2 महीने से कनक हर रात पापा से चिपट कर सोता है पर दीपा आधी रात में अपने बिस्तर पर ले आती है. एक रात जब सोते कनक को ले जाने आई तो सोमू ने उसे ऐसा करने से मना किया, ‘आज इसे यहीं सोने दें. सुबह देखिएगा क्या होता है?’

वह चुप चाप वापस अपने कमरे में आ कर सो गई.

सोमू ने जो कहा था वही हुआ. बिस्तर से उठते ही कनक ख़ुशी से चिल्लाया, “ये…मैं पूरी रात कल पापा के पास सोया था. वाह, मुझे रोज़ाना मम्मी आधी रात में अपने बिस्तर पर शिफ़्ट कर देती थी, कल ऐसा नहीं हुआ. माय स्वीट मम्मी, थैंक्यू. मैं पापा के पास ही सोना चाहता हूं.”

“देखिए, मैं ने यही तो कहा था, कितना ख़ुश है,” सोमू उस की तरफ़ देख कर मुसकरा पड़ा, बोला, “थैंक्यू.” दीपा को भी अच्छा लगा था.

औपचारिकता की इसी दीवार को ढाने के लिए सोमू एड़ी से चोटी तक का जोर लगा चुका है. वह दिल से चाहता है सब पहले सा हो जाए. पर ‘अहं’ है जो दोनों को रोकता है.

फिर भी उम्मीद का दामन उस ने नहीं छोड़ा है. पानी को लकड़ी मार कर 2 टुकड़ों में बांटा नहीं जा सकता.

पानी तो पानी में ही मिलेगा, यह वह जानता है.

एक रात, सोतेसोते सोमू चौंक पड़ा. कनक का तन गरम था. नहीं… हो सकता है, वैसे ही मेरा भ्रम है.

कुछ देर बाद लगा तेज़ बुखार से कनक का तन तप रहा है. घबरा गया था सोमू. कहीं…करोना…?

बारबार सांस की गति पर ध्यान जा रहा था. दीपा को उठाऊं? पर कैसे? वह तो अंदर से दरवाज़ा बंद कर के सोती है. फ़ोन किया. “कनक को तेज़ बुखार है,” उस की आवाज़ में घबराहट थी.

कुछ पल में दीपा कनक के पास थी. बेटे को देख वह भी घबरा गई. निढाल पड़े बेटे को देख अपने को रोक न पाई. सब भूल कर सोमू के क़रीब आ कर रोने लगी, “प्लीज़ सोमू, किसी डाक्टर को जल्दी से फ़ोन कर के बुलाओ.”

और न चाहते हुए भी भावुक हो उस ने सोमू को कस कर पकड़ लिया.

सोमू भी अपने को न संभाल सका. हाथपैर उस के भी कांप रहे थे. “ठहरो, मेरा एक डाक्टर मित्र यहीं पास में रहता है. उस से फ़ोन पर बात करता हूं. इस वक्त कहीं किसी हौस्पिटल में हमें कोई भी तवज्जुह नहीं देगा. यह मेरा बचपन का यार है. जरूर सहायता करेगा.” डाक्टर सुरेश को हाल बताया तो उस ने दवा बता कर कहा, “माथे पर ठंडे पानी की पट्टी रखो जब तक बुखार 100 पर न आ जाए. यह सीजनल है. दवा से कम न हो, तो मुझे बताना. सुबह कोरोना टैस्ट करा लेना.”

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“दीपा, तुम कनक के माथे पर ठंडे पानी की पट्टी रखो. मैं फ़ार्मेसी से दवा ले कर आता हूं.”

दवा देने के साथ माथे पर ठंडी पट्टी से कनक का बुखार कम हो गया. वह सो गया था. पर दीपा अभी भी अपने पल्लू से आंसू पोंछ रही थी.

सामने बैठे सोमू को देख कर सोच रही थी- आज यह न होता तो क्या करती.

पूरी रात दोनों बेटे के सिरहाने से नहीं हटे थे. “आप थक गए होंगे, कुछ देर सो लें. सुबह इसे ले कर कोविड टैस्ट के लिए जाना है.”

“नहीं, मैं यहीं ठीक हूं. मेरी चिंता न करो.”

कुछ देर बाद दीपा ने देखा, सोमू कुरसी पर सिर टिका कर सो गया था. कितने बरसों बाद यों, बच्चे की तरह सोते देखा था. कितना प्यारा दिखता है. आज उसे वह पल याद आ रहा था जब कनक का जन्म हुआ था. सोमू ने बड़े प्यार से कहा था, ‘यह कनक है. हमें कुदरत ने हमारे जीवन का सब से क़ीमती तोहफ़ा दिया है. हमें जीवनभर इस की क़द्र करनी है. वादा करो, हम कोई ऐसा काम नहीं करेंगे जिस से इसे दुख हो.’

आज की इस घटना ने बहुतकुछ सोचने को मजबूर कर दिया है. क्या दोनों ही उस वादे को भूल गए…?

बाई सा, अपना न सही, इस बच्चे का तो ख़याल करो. बेटा, साब को कितना प्यार करता है. और आप उन से बच्चे को दूर कर रही हो? यह बच्चे के साथ अन्याय नहीं है? न बाई सा, आप सही नहीं कर रहे हो. तब उस ने सुमित्रा को ‘अनपढ़गंवार’ कहा था. आज लगता है वही सही थी, दीपा गलत!

कनक का करोना टैस्ट नैगेटिव आया. सब ख़ुश हैं. इस खुशी में सोमू की मनपसंद मखाने की खीर दीपा ने बनाई है. कनक बोला, ‘पापा ने तो 2 कटोरी भर कर खाई और मां की प्रशंसा भी की.

अब कई बार दोनों साथ बैठ कर बातें भी करते हैं. बातों में कभी कुछ सीरियस भी होता है.

पर सब से अहम बात है, बच्चे के लिए मम्मीपापा दोनों की उपस्थिति ज़रूरी है. यह सच दोनों ने मान लिया है. परंतु इस सच को मुंह से कहने से पता नहीं क्यों दोनों झिझकते हैं. आसमान में उड़ते परिंदों को उड़ते देख सोचते हैं, इन्हें भी तो देखो… बच्चा जब तक उड़ना सीख नहीं जाता, साथ उड़ते हैं. उसे आसमान की राह दिखाने में दोनों की बेजोड़ मेहनत होती है.

लेकिन, मनुष्य कितना स्वार्थी है. अपने अहं और स्वार्थ के वश अपनी असली ज़िम्मेदारी से मुंह मोड़ लेता है. लानत है हम पर. कनक की बीमारी के बाद से सोमू और दीपा दोनों के बीच की दीवार हौलेहौले ढहने लगी है.

लौकडाउन ख़त्म हो रहा है. क़ानून के तहत सोमू को वापस जाना पड़ेगा. उस का औफ़िस खुल गया है.

“मुझे अब जाना होगा.”

“पापा, कहां जा रहे हो? मैं भी आप के साथ चलूंगा.”

“नहीं बेटा, मिलूंगा एक हफ्ते बाद,” कहते हुए कनक के गाल पर चुम्मी दी.

“नहीं, पापा रहो हमारे साथ ही रहो,” पापा से लिपट कर कनक सिसकी भरने लगा.

सुमित्रा सामने खड़ी मार्मिक दृष्य से अविभूत है. दीपा भी. वह तो मुंह फेर कर खड़ी हो गई थी. इस दृष्य का सामना करने की हिम्मत न थी उस में. अचानक किसी निर्णय के साथ पलटी, “बेटा, पापा को जाने दो. वैसे, पापा हमें माफ़ कर दें तो हम उन के साथ रोहिणी चल सकते हैं, पर शर्त है, उन्हें हमारे साथ वापस आना होगा.”

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“मम्मी, क्या कहा?” हैरान कनक मां को विस्फारित नेत्रों से देख रहा था.

सोमू को भी कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था.

यानी, मम्मी ने भी हमे माफ़ कर दिया.

दीपा ने मुसकरा कर उस को हाथों से पकड़ा. दीपा की आंखों से दो आंसू ढलक कर उस के गालों पर आ गए थे.

कनक ख़ुशी से- “ये…” कहता हुआ गाड़ी में बैठ गया था.

बालकनी में खड़ी सुमित्रा बाई सा, जो बड़ी देर से सब का हिस्सा बनी हुई थी, हाथ जोड़ कर मन ही मन कह रही थी, ‘हे माताजी महाराज, बहुतबहुत शुक्रिया. यह लौकडाउन ने दुख तो बड़े दिए पर ऐसे अंत के वास्ते हज़ार बार लौकडाउन लगे, तो भी कोई दुख नाहिं.

दूसरी पारी: भाग 2- क्यों स्वार्थी हो गए मानव के बच्चे

लेखिका- मृदुला नरुला

सोमू की गाड़ी लगभग एक फ़र्लांग ही चली थी कि आगे से होमगार्ड वाले ने गाड़ी रोकने का सिगनल दिया.

..”कहॉ जाना है साब?”

“रोहिणी.”

“लौट जाइए. पूरे दिल्ली में आवाजाही बंद है. मैं जाने दूंगा तो आप को आगे रोक दिया जाएगा. बेहतर है वापस चले जाएं.”

समझ गया है, आगे सारे रास्ते बंद ही मिलेंगे. टीवी पर भी यही कह रहे थे- ‘कृपया घर में रहें, सुरक्षित रहें.’ अब जाना पड़ेगा वापस. दीपा के पास जाना तो बिलकुल नहीं चाहता, उस को बापबेटे का यों मिलना जरा भी नहीं भाता. वह तो कोर्ट की परमीशन ले कर मिलने आता है. दीपा कुछ कर नहीं सकती.

सोमू यहां आसपास काफ़ी लोगों को जानता तो है पर वह किसी के घर जाना नहीं चाहता. सब को सारी कहानी बतानी पड़ेगी. इधरउधर गाड़ी घुमाना बेकार है. चलता हूं वापस, वहीं.

कैसा अजीब सा लगेगा उस घर में दोबारा पहुंच कर. जबकि कभी यह घर उस का अपना घर था. जैसे शाम ढलते ही चिड़िया अपने घोंसले में लौटने को उतावली होती है, कभी वह भी उड़ान भरता था. गाड़ी औफ़िस से उड़ाता हुआ लाता था. आज गाड़ी उधर मोड़ना भी अच्छा नहीं लग रहा था. इस के सिवा कुछ और विकल्प है भी तो नहीं.

गाड़ी मोड़ ली.

“अरे पापा, वाह, आप वापस आ गए!” कनक को हैरानी हो रही थी. दीपा को कोई हैरानी न थी. शायद, उसे पता था, यही होगा.

सोमू को वापस आया देख सब से ज्यादा ख़ुश था कनक, मन की मुराद पूरी जो हो गई थी.

और दोंनों बड़ी रात तक लीगों टौयज जोड़ते रहे थे. ‘पापा-पापा’ की गूंज बहुत देर तक घर में गूंजती रही थी.

उस रात दोनों बापबेटे साथ में चिपक कर सोए थे.

आधी रात को सोमू को लगा, कोई बैड के पास खड़ा है.

“दीपा, आप?”

“हां, कनक के साथ सोने में आप को दिक़्क़त हो रही होगी,” दीपा ने सीधेसीधे कह दिया.

सोमू ने कहना चाहा, ‘नहीं रहने दो,’ पर कुछ न बोला. पूरा दिन बीत गया, दीपा ने सोमू से कोई बात नहीं की.

इस वक्त जी चाहा पूछे, कैसी हो दीपा.

नहीं, कुछ भी नहीं पूछेगा. क्या दीपा को नहीं पूछना चाहिए था- सोमू, कैसे जीवन कट रहा है?

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तलाक़ हुए 2 साल बीत गए हैं. कभी फ़ोन करना तो दूर, कनक से मिलने आता हूं तो मेरे यहां पहुंचने से पहले ही निकल जाती है.

कनक की पढ़ाईलिखाई व स्कूल से जुड़े सवालों का हमेशा एक ही जवाब मिलता- ‘ठीक है,’ बस. कितना जी करता है, कुछ कहे, कुछ पूछे. मकान का पिछला हिस्सा कमज़ोर हो गया है, ठीक कराना है. कौन खड़ा हो कर सब देखेगा… मैं यहां आ कर, चला जाता हूं. जैसे एक विज़िटर हूं. यह घर सोमू के नाम था. अब दीपा के नाम है. ये सब किन हालात में हुआ, यह एक अलग कहानी है.

दीपा सोए बेटे को कंधे पर उठा कर ले जा चुकी है. वह बिस्तर पर लेटा कड़ियां गिन रहा है. नींद आंखों से कोसों दूर हो गई है.

एक हफ्ते के लिए लौकडाउन लगा है. एक दोस्त बता रहा था, औफ़िस भी बंद है. हो सकता है एक हफ्ते बाद हमें घर से काम करने को कहा जाए. कैसे, क्या होगा… सोमू परेशान है.

लौकडाउन चालू है. 4 दिन बीत गए हैं. कपड़ों को ले कर परेशान है सोमू. कुछ अंदर के कपड़े पुरानी अलमारी में पड़े हैं, उसे याद है. सुमित्रा बाई सा को जरूर याद होगा. उस से पूछा तो हंस कर बोली, “साब, मुझे याद है. कुछ कपड़े तो अभी भी रखे हैं पर कपड़े छोटे न हो गए होंगे? 2 साल में आप की तोंद निकल आई है.”

बाई सा की बात पर कनक खिलखिला कर हंसा. मुह फेर कर दीपा भी मुसकरा दी थी. और सोमू शरमा कर कमरे में चला गया था.

पुराने कपड़ों का बक्सा खोला तो अंदर से एक नाइट सूट और 2 पैंटें भी निकल आईं. “साब, इन पैंटों की टांगें काट कर बरमूडा बना देती हूं. आप को कहीं जाना तो है नहीं. घर में सब चलेगा.”

लो जी, बाई सा ने बरमूडा बना डाला. पापा को बरमूडा में देख कनक ने खूब एंजौय किया.

बाथरूम में जा कर दीपा भी हंसी थी.

सोमू का ज्यादातर समय कनक के साथ बीतता है. वर्क फ्रौम होम शुरू होने से नए तरीक़े से हर कोई बिजी हो गया है.

बाई सा सुबह 8 बजे ही नाश्ता मेज पर पहुंचा देती है. सोमू, दीपा और कनक नाश्ता कर के अपनेअपने काम में लग जाते हैं. कनक की औनलाइन क्लास हो रही है.

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सोमू और दीपा अपनेअपने कमरे में लैपटौप खोल कर काम में लग जाते हैं. उस के आधे घंटे बाद कनक की क्लास शुरू हो जाती है. शुरू में कनक को औनलाइन पढ़ाई करने में बहुत दिक़्क़त आती थी. बहुत जल्दी खीझ जाता था. दीपा को भी समझ नहीं आता पढ़ाई के इस नए तरीक़े से कैसे बेटे को अवगत कराए. एक रोज सोमू ने कनक से कहा, “बेटा, मैं आप की हैल्प करूं?”

“यस पापा.”

पता नहीं कौन सा मंत्र उस ने कान में फूंका कि वह हैरान रह गई.

“अब तो होम वर्क भी पापा ही कराएंगे.” यह सुन कर दीपा मन ही मन ख़ुशी महसूस करती है.

एक दिन सोमू बोला, ” बाई सा, मैं घर का राशन ले आऊंगा. सुबह ब्रैड, बटर, सब्ज़ी और जरूरत का सामान लाने की ज़िम्मेदारी मुझ पर है. लौकडाउन जल्दी खुलने वाला नहीं है. मेम सा से उन की दवाइयों की लिस्ट ले कर मुझे पकड़ा दो. एक ही बार में सब ले आऊंगा.”

दीपा को सुन कर अच्छा लगा था. ‘बहुत ज़िम्मेदार हो गए हो सोमू.’ घर का सामान लाने पर दोनों की हमेशा लड़ाई होती थी. यह बात उस ने कोर्ट में जज साहब के सामने भी कही थी. चलो, कुछ बदलाव तो आया.

घर की छोटी से छोटी ज़िम्मेदारी को ले कर सोमू अब सजग है. बाई सा का भी हाथ बंटा देता है. बग़ैर पूछे बहुत से काम अपनेआप करते देख बाई सा मन ही मन मातारानी को धन्यवाद देती. यह जिम्मेदारी क्या सदा के लिए साब के कंधों पर नहीं आ सकती… कोई नहीं, वक्त का इतंजार करना चाहिए. ख़ुश है बाई सा इस नए माहौल से. पर सब से ज्यादा ख़ुश कनक है. शनिवार व इतवार रिलैक्स डेज हैं पूरे घर के लिए. कनक का शिड्यूल तय है. सुबह जल्दी नाश्ता कर के पापा के साथ खुले आसमान में पतंग उड़ाई जाती है. ढेरों परिंदों को ख़ूबसूरती से उड़ते देख सोमू को भी बहुत अच्छा लगता है.

परिंदों के झुंडों को बेख़ौफ़ उड़ते सभी ने पहली बार देखा था इस लौकडाउन में. कभी छत पर न आने वाली दीपा भी इस जादू से खिंची चली आती है. यहां छत से सामने के फ्लैटों की छतों पर भी लोग पतंगों का आनंद ले रहे हैं. यह अनुभव बचपन को उस के सामने ला कर खड़ा कर देता है.

दीपा को याद आता है, जब सोमू और वह छत पर छिपछिप कर मिलते थे. तब दीपा व सोमू इसी बिल्डिंग में ऊपरनीचे के फ्लैट में रहते थे. स्कूल अलग था पर क्लास एक ही थी. आज वह बीते कल को याद कर रही है.

प्यार को किसी रितु का इतंजार नहीं होता. फिर भी हर दिन दोनों को उसी प्यारे चेहरे का इतंजार रहता है जिसे वे बेहद चाहते हैं. दोनों मिले, हर दिन मिले और फिर लगने लगा कि दोनों एकदूसरे के बिना रह नहीं सकते.

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सो, दोनों ने शादी कर ली. उन की मुहब्बत पर समाज ने मुहर लगा दी. और अब छत की जरूरत न थी.

एक साल बाद कनक का जन्म हुआ. दीपा सबकुछ भूल कर बेटे में खो गई. पति को कनक से बेपनाह प्यार था. पर न जानें क्यों उसे लगा, जैसे सोमू घर और बच्चे की ज़िम्मेदारी से दूर जाता जा रहा है. वह चिड़चिड़ा होता जा रहा था. अकसर सब्ज़ी की कटोरी से दीवार पर चित्रकारी होती उस के ग़ुस्से का. या दारू के गिलासों से दीवारों पर निशाना लगाया जाता. छोटीछोटी बात पर दोनों झगड़ पड़ते.

सोमू की शराब बढ़ती जा रही थी तो, झगड़े भी.

…और फिर जो न होना था, हो गया- तलाक़! एक भयानक हादसा. शुरू में दोनों को लगा, यही ठीक है, कहीं शांति तो है. पर कैलेंडर पर तारीख़ बदल जाने से कुछ नहीं होता है. कल क्या होगा, यह चिंता वक्त के साथ उसे खा रही थी. नई जिदगी में बच्चे का उतरा चेहरा देख समझ जाती, पिता से दूर रह कर बेटा ख़ुश नहीं है.

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दूसरी पारी: भाग 1- क्यों स्वार्थी हो गए मानव के बच्चे

लेखिका- मृदुला नरुला

“कितनी अजीब बात है, मुझे औफ़िस जाना है और सोमू अभी तक नहीं पहुंचा. आज रोड पर भीड़ भी खास नहीं है.”

“बाई साब आते ही होंगे. आप को औफ़िस के लिए लेट हो रहा है, तो चली जाओ. घर पर कनक के साथ मैं तो हूं.”

“ठीक है, मैं जा रही हूं. और सुनो, हमेशा की तरह लंच वही बनाना जो दोनों को पसंद है. मैं शाम तक आऊंगी.”

दीपा के घर से जाते ही सुमित्रा ने घर का दरवाज़ा बंद कर लिया. कनक अपने खेल में व्यस्त है. 8 साल का कनक आज बहुत उत्साहित है. खेल छोड़ कर बारबार खिड़की के बाहर झांक लेता है.

आज उस के पापा उस से मिलने आ रहे हैं. महीने में सिर्फ 2 बार आते हैं. कनक को बेसब्री से पापा का इतंजार रहता है. पर मां को क़तई भी सोमू का इतंजार नहीं होता. यह बात उसे अच्छी नहीं लगती. आज भी उस ने गाड़ी की चाबी उठाती मां को टोका था.

“मम्मी, रुक जातीं. पापा से मिलने के बाद भी तो औफिस जा सकती हो,” बड़ी हिम्मत की थी कनक ने, जानता था, क्या जबाब मिलेगा.

“वह बेटा, स्पैशल मीटिंग है औफ़िस में. सो, फिर कभी,” कहती हुई दीपा ने उस के गाल पर किस किया और निकल ली थी. मां को बेटे ने ऐसे देखा जैसे कुछ गलत कर बैठी है.

कनक ने गाल को कस कर रगड़ा और मुंह मोड़ कर खेल में अपने को व्यस्त करने का प्रयत्न करने लगा. सुमित्रा से कुछ भी छिपा नहीं है. पिछले 10 वर्षों से इस घर में काम कर रही है वह. उस का पति राघव सोमू साब का ड्राइवर था. 6 वर्षों पहले उस की एक कार दुर्घटना में मौत हो गई थी. तब से सुमित्रा यहीं, इन लोगों के बीच घर के सदस्य की तरह रहती है. राघव के जाने के बाद सोमू साब ने ही उस से कहा था, “किसी के जाने से दुनिया ख़त्म नहीं हो जाती. जब तक चाहो यहां रहो, यह घर पहले भी तुम ने संभाला था, अब भी तुम को ही संभालो. कनक की ज़िम्मेदारी अब तुम पर है.”

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इस बीच, बहुतकुछ बदल गया. सांब और दीपा बाई सा के बीच तनाव बढ़ता जा रहा था. बात बढ़ते बढ़ते तलाक़ तक पहुंच गई.

कनक की कस्टडी मां दीपा को मिली. सुमित्रा ने बहुतकुछ देखा है. पर सब से ज्यादा दुख उसे इस मासूम को ले कर है. आज तक वह दिन नहीं भूली जब पापा से अलग होने के बाद कनक बुरी तरह रोया था. मां के साथ कोर्ट से बाहर निकलते हुए सहम गया था वह. ‘….मम्मा, पापा को भी साथ ले चलो. हम पापा और आप सब साथ रहेंगे. सुमित्रा बाई सा, आप ही पापा को ले आओ. आप के बुलाने से जरूर आ जाएंगे, मम्मी से तो नाराज़ हैं वे.’

बच्चे को इस तरह बिलखते और लोगों ने भी देखा था. सब की आंखें नम थीं. उस रोज कोर्ट से लौट कर किसी ने भी खाना नहीं खाया था. एक लंबी चुप्पी कई हफ्ते तक घर में पसरी रही थी. कनक की इतंजार करती आंखें सुमित्रा को आज भी याद है.

तब से सोमू साब महीने में दोबार कनक से मिलने आते हैं. जिस दिन पापा आते हैं उस दिन वह ख़ुश रहता है. जितनी देर सोमू बेटे के साथ रहते हैं, लगता है उस हर क्षण को जी लेना चाहता है वह. सुमित्रा भी साब व बेटे को हंसता, खिलखिलाता देख ख़ुश हो जाती है. पर वह जानती है कि यह खुशी मात्र 5 घंटे की है. फिर घर मे लंबा सन्नाटा पसर जाएगा जैसे टीवी पर चलतेचलते लाइट औफ़ हो जाती है.

“बाई सा, पापा की पसंद के सूखे आलू बनाए हैं न. देखना, 10 मिनट में पापा आ जाएंगे, फिर हम खूब खेलेंगे.”

कि तभी किर्रकिर्र घंटी बज उठी.

दरवाज़ा सुमित्रा ने खोला, “अरे, बाई सा, आप!”

दीपा को सामने देख हैरान थी. “मम्मा, आप? और पापा नहीं आए?” कनक मां को देख ख़ुश तो था पर सोच रहा था, ‘पापा भी आते ही होंगे.’

आज तो मम्मीपापा दोनों घर पर होंगे. ऐसा अवसर इतने सालों में कभी नहीं आया. हां, कई बार पापा घर में एंट्री लेते हैं, तो पापामम्मी आपस में हैलो का आदानप्रदान कर एकदूसरे को अवौइड कर के निकल जाते हैं.

कनक अब छोटा नहीं है. वक्त व हालात ने उसे बहुतकुछ सिखा दिया है तथा बहुत बड़ा बना दिया है.

मम्मी व पापा का एकदूसरे को ‘पहचानने से इनकार करना’ उसे बेहद चुभता है.

सुमित्रा बाई सा भी सब समझती है. लेकिन आज पापामम्मी दोनों घर पर होंगे. कनक कई बार सोचता है- मम्मीपापा पहले तो साथ रहते थे, पता नहीं अब पापा किसी और जगह रहते हैं. लेकिन ऐसा क्यों? दोनों आपस में बात भी नहीं करते. कभी सोचता है, मम्मी से पूछे, पर डरता है कहीं ऐसा न हो कि महीने में 2 बार पापा आते हैं वह अवसर भी उस से छिन जाए. नहीं, वह किसी से कुछ नहीं पूछेगा.

“मम्मी, आप लौट आईं, क्या हुआ?” वैसे, मम्मी की उपस्थित उसे भा रही है.

“मीटिंग कैंसिल हो गई. चौराहे तक पहुंची थी कि पुलिस वाले ने गाड़ी रोक कर कहा, ‘मेम सा, वापस जाएं, आज सभी औफ़िस बंद हैं.” मम्मी यह बता ही रही थी कि तभी डोरबैल बजी.

“ये तो पापा ही हैं. हमेशा, किर्र…किर्र 2 बार बैल बजाते हैं. पापा आ गए, पापा आ गए.”

स्टूल पर चढ़ कर दरवाज़ा खोला और हमेशा की तरह, ‘मेरे पापा’ कहता सोमू से लिपट गया वह.

रसोई की खिड़की के पार से बेटेबाप का मधुर मिलन दीपा ने देखा और मुह फेर लिया. जानती है, दोनों एकदूसरे से मिलने को कितने बेसब्र होते हैं. पर क्या करे. अब सबकुछ उस के हाथ से निकल चुका है. बेटा किसी भी हाल में पिता से दूर होना नहीं चाहता. इधर सुमित्रा से सोमू बता रहा था, “आज मुझे चौराहे पर पुलिस वाले ने रोक कर कहा, ‘बाबू जी, आगे आप नहीं जा सकते. शहर पूरा बंद है. जहां से आए हैं वहीं वापस चले जाएं.’ मैं ने कहा, मैं अपनी मां की दवा ले कर वापस घर ही जा रहा हूं. बाई सा, आज झूठ न बोलता तो यहां न पहुंच पाता. फिर हम अपने बेटे से कैसे मिलते?” और मुसकरा कर साथ लाया गिफ़्टपैक कनक को पकड़ा दिया.

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“हां पापा, लौट जाते तो मैं ग़ुस्सा हो जाता.” वह गिफ़्ट खोल कर बड़ी देर तक खेलता रहा.

उस दिन कनक को बहुत अच्छा लगा क्योंकि खाने की टेबल पर मम्मी पापा दोनों थे.

तीनों जन खाना खाते हुए 3 दिशाओं में अलगअलग सोच रहे थे.

5 बजे पापा चले जाएंगे. काश, पापा आज रुक जाते तो हम दोनों पूरी रात खूब मस्ती करते. खाना खाने के बाद छत पर हम पतंग उड़ाएंगे. पापा को अपनी नई वाली पेंटिंग भी दिखाऊंगा. पिछली बार पापा जो लीगों टौयज लाए थे, मैं ने अभी खोला भी नहीं है. आज हम दोनों मिल कर इसे जोड़ेंगे. मैं अकेला तो बना ही नहीं पाऊंगा. पापा मेरी हैल्प करेंगे.

दूसरी तरफ़, सोमू सोच रहा है- टीवी में दिखा रहे हैं करोना बीमारी के कारण शहर में लौकडाउन है. सड़कें खाली हैं. लोगों को घर से बाहर न आने की हिदायत दी जा रही है. जो घर से बाहर आ रहा है उसे पुलिस वाले वापस घर भेज रहे हैं. ये सब कब तक चलेगा? कहीं शाम को भी ऐसा रहा तो वह क्या करेगा? यहां आते वक्त तो झूठ बोल कर आ गया था लेकिन वापसी में नहीं चलेगा. यहीं रात बितानी पड़ी तो…? कहीं ऐसा न हो दीपा कुछ गलतसलत समझे. क़रार के मुताबिक़, कनक के साथ वह सिर्फ 5 घंटे बिता सकता है. जानता है, हमेशा की तरह उस की एंट्री के समय आज भी समय नोट किया गया होगा. खाने की टेबल पर बैठी दीपा उस को कनखियों से देख रही है. मेरे मन में क्या चल रहा है, जानने की पूरी कोशिश कर रही है.

और, जैसेजैसे घड़ी की सूई आगे बढ़ रही है, दीपा की बेसब्री बढ़ती जा रही है. कनक और सोमू ने पूरे दिन खूब मस्ती की. घड़ी में 5 बजते ही सोमू ने अपना बैग समेटा और बेटे को बाय कर के बाहर आ गया. नीचे गाड़ी चलाने से पहले कनक का उतरा चेहरा बालकनी से झांक रहा है. कनक का आख़िरी प्रयास- ‘पापा, प्लीज़ मत जाओ,’ सोमू के कानों को छू रहा है.

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जानता है, जैसे ही मेरी गाड़ी स्टार्ट होगी…कनक का रोना शुरू हो जाएगा. दीपा लंबी सांस खींच कर मन ही मन कहेगी, हे प्रकृति, शुक्र है दिन निकल गया. सोमू का मन भारी था.

आगे पढ़ें- सोमू की गाड़ी लगभग एक…

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